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और पहुँच गए नैनीताल

चलो अब शुरू करते हैं मुसाफिरगिरी। घूमने का शौक तो बहुत है, लेकिन घर वाले कहीं नहीं जाने देते। जहाँ भी जाता हूँ, चोरी से जाता हूँ, अकेला जाता हूँ। वो एक गाना है ना- चल अकेला चल अकेला, तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला। कभी कभी दिमाग में आता है कि अगर कभी कोई मुसीबत आ गई तो। बन्दे के पास इसका भी जवाब है- जिंदगी एक सफर है सुहाना, यहाँ कल क्या हो किसने जाना।
पिछले साल इन्ही दिनों मैं नोएडा की एक कंपनी में कार्यरत था। शिफ्टों की ड्यूटी, कभी सुबह पाँच बजे ही निकलना, कभी देर रात बारह एक बजे तक आना, कभी पूरी पूरी रात जागना। अपनी तो यही जिंदगी थी। इतवार को सुकून मिलता था। उसमे मैं पता नहीं कहाँ कहाँ निकल पड़ता था।
एक बार शनिवार को मैं कंपनी से कमरे पर गया। सितम्बर अक्टूबर के दिन थे। शाम को खाना खाकर मैं सोने की तैयारी करने लगा। सोचने लगा कि कल इतवार है, क्या करूंगा। तभी याद आया कि गाजियाबाद से रात को करीब एक बजे एक पैसेंजर ट्रेन मुरादाबाद जाती है। वहां से सुबह को कोई ना कोई ट्रेन काठगोदाम के लिए भी मिल सकती है। काठगोदाम में कुमाऊँ के पहाडों को देखकर वापस आ जाऊँगा।
बस तुंरत उठा। एक हलकी फुलकी सी जैकेट पहनी, और चल पड़ा। गाजियाबाद स्टेशन पर पहुंचकर काठगोदाम का एक पैसेंजर टिकट लिया। करीब ग्यारह बजे रानीखेत एक्सप्रेस प्लेटफोर्म पर आई। यह ट्रेन भी काठगोदाम तक ही जाती है। एक बार तो सोचा कि निकल ले बेटा इसी से। बस तुंरत अपनी सोच को अंजाम दे दिया। ठीक ठाक भीड़ थी। बैठने को जगह मिल गई। मुरादाबाद आते आते दो बज गए। अब नींद भी आने लगी। अब तक तो झेल लिया था, लेकिन अब नहीं झेल सकता था। मुरादाबाद में ही उतर गया। बढ़िया सी जगह देखी और सो गया।
सुबह सफाई कर्मचारी ने मुझे उठाया। बड़ी ताजगी सी महसूस हो रही थी। अगर मैं यहाँ पर ना उतरता तो नींद के मारे पूरा दिन ख़राब हो जाता। मुँह हाथ धोके पता किया कि काठगोदाम की कोई ट्रेन है भी या नहीं। पता चला कि प्लेटफार्म नंबर पाँच से चलने ही वाली है। मैंने पाँच रूपये वाला एक बिस्कुट का पैकेट लिया, चाय ली, बैठ गया ट्रेन में।
ट्रेन पहुँची काशीपुर। यहाँ पर आधे घंटे का स्टाप था। खूब उचक उचक कर देखा मगर पहाड़ नहीं दिखे। काशीपुर से बाजपुर, गुलरभोज होते हुए पहुंचे लालकुआ। यहाँ भी आधे घंटे का स्टाप था। यहाँ से भी मुझे पहाड़ नहीं दिखे। लालकुआ से हल्द्वानी। यहाँ पर पहाडों के दर्शन हो गए। काठगोदाम पहुंचे। ऐसा लगा कि पहाडों में टक्कर मारकर ट्रेन रुक गई हो। गढ़वाल में जैसे कि हरिद्वार में शुरू में शिवालिक की छोटी पहाडियां हैं। लेकिन यहाँ पर शिवालिक नाम की कोई चीज नहीं। एकदम एक के बाद एक जबरदस्त पहाड़।
यहाँ तक पहुँचते पहुँचते बारह बज चुके थे। बस यही तक का तो प्रोग्राम था मेरा। अब थोड़ा आस पास घूम लिया जाए, इस इरादे से मै बाहर निकल गया। मेन रोड पर पहुँचा। दर्जन भर केले खाए। फ़िर पहाडों को देखने लगा। इन्हे देखकर मन हुआ कि बेटा बैठ ले किसी बस में। वादियाँ मेरा दामन, रास्ते मेरी बाहें, जाओ मेरे सिवा तुम जाओगे कहाँ? मुझे लगा कि इस गीत के बहाने पहाड़ मुझे बुला रहे हैं। मैं पहले तो थोड़ा सड़क के साथ साथ चला। एक जगह लिखा था- नैनीताल 31 किलोमीटर। अंदाजा लगाया कि किराया भी करीब तीस रूपये ही होगा। चल, जो होगा देखा जाएगा। 
चढ़ लिया नैनीताल जाने वाली एक बस में। दूरी इकत्तीस किलोमीटर और किराया उनत्तीस रूपये। काठगोदाम से निकलते ही सफर शुरू हो जाता है पहाडों का। सामने एक के बाद एक सिर उठाते हुए पहाड़ ही पहाड़। दाहिनी तरफ़ सौंग नदी गहरी घाटी में पूरे मजे से बह रही थी। मै सोच रहा था कि चला कहाँ के लिए था और जा कहाँ रहा था। बहुत सुना था कि काठगोदाम से नैनीताल का सफर पूर्णतया पहाडी है। उस समय शरीर में झुरझुरी सी होती थी। सोचता था कि मै भी कभी नैनीताल जाऊंगा। वो सपना आज पूरा हो रहा था।
जब बस पहाडी सड़क पर पूरे एक सौ अस्सी डिग्री मुडती थी तो उस समय मै आँखे मूँद लेता था। बड़ा मजा आता था। ऐसा लगता था कि जैसे झूले में बैठे हों। जितने ऊपर चढ़ते जा रहे थे, पहाड़ उतने ही विकट और दूर दूर तक नजर आ रहे थे।
ज्योलीकोट के आस पास एक जगह पर बस रुकी। पन्द्रह बीस मिनट का स्टाप लिया। यहाँ पर मैंने पकोडियां ली। भई वाह! नितांत पहाडों पर हरियाली के बीच पकौडी खाने में मजा आ गया। बस फ़िर चल पड़ी।
आगे एक तिराहा था। यह सड़क सीधे तो भवाली जाती है, जबकि बाएं मुड़कर नैनीताल। जो चोटियाँ पहले सिर उठाकर खड़ी थी, अब उन्हें देखने के लिए गर्दन झुकानी पड़ रही थी। मै सोच रहा था कि नैनीताल तो जा रहा हूँ, वहां पर कहाँ घूमूँगा? मेरे दिमाग में ऋषिकेश का नक्शा आ गया। ऋषिकेश में जो असली जगह है, वह है लक्ष्मण झूला, जो ऋषिकेश से छः सात किलोमीटर आगे है। ऐसा ही मैंने अंदाजा यहाँ लगाया। फ़िर सोचा कि देखा जाएगा।
बस रुक गई। सामने विशाल झील (ताल)। समझते देर नहीं लगी कि यही नैनीताल है। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि मैं आज नैनीताल में हूँ। आज पहली बार पहाड़ की ठंडक को महसूस कर रहा था। मै यहाँ से दाहिने मुडा । झील के किनारे किनारे चलता रहा। बाद में पता चला कि यह मॉल रोड है। चलता चलता दूसरी तरफ़ पहुँच गया। यहाँ ताल के किनारे एक बेंच पर बैठ गया। पास में ही किसी भोजपुरी फ़िल्म की शूटिंग चल रही थी। इसमे हीरो एक ठेले पर बैठकर डांस करता है। बगल में ही डीजे पर गाना चला रखा था। कई बार हीरो को डांट पड़ी, तब जाकर सीन ओके हुआ। हीरोइन कहीं नहीं दिखी।
चार बजे के बाद मैंने वापसी शुरू कर दी। इस बार दूसरी तरफ़ से गया। इसी तरफ़ नैना देवी का मन्दिर है। शायद इस सड़क को ठंडी सड़क कहते हैं। इस तरफ़ सड़क पर पहाड़ की परछाई पड़ रही थी, इसलिए मुझे भी ठण्ड लगने लगी थी। जल्दी जल्दी चलकर बस स्टैंड पर पहुँचा। हल्द्वानी की बस पकडी और काठगोदाम पहुँच गया। शाम को काठगोदाम से दिल्ली जाने वाली रानीखेत एक्सप्रेस से वापस गाजियाबाद पहुँच गया।

नैनीताल की एक और यात्रा का वर्णन और फोटो यहाँ क्लिक करके देख सकते हैं।

Comments

  1. बहुत दिलचस्प post रही आप की...बहुत maja आ रहा है पढ़ कर...आगे क्या होगा की ललक है मन में...ये ही लेखन की सफलता है...
    नीरज

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  2. बहुत अच्छा लिखा है। सरसता निरन्तर लेख को बाँधे रखती है।

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  3. अरे वाह गजब हुत्‍थली हैं आप भी। इस तरह के अनियोजित घुमक्‍कड़ी में जो मजा उसे वहीं समझ सकता है जिसने इसे भोगा है

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  4. बहुत चुस्त लेखन है आपका ! तारतम्य टूटता नही है ! इस तरह की यायावरी के अपने ही मजे हैं ! हम लोग भी कालेज से छुटियो में दार्जिलिंग जाया करते थे ५/६ दोस्त मिलकर ! वहाँ के खर्चे के लिए दिन में दो दोस्त स्टाल लगाते थे ! और नंबर से बाक़ी के घूमते थे ! सब सामान जैसे कंघा, शीसा , बटन सूई धागे जैसी जरुरत की चीजे कलकाता से ही थोक में ले जाते थे ! कोई महीना भर आराम से वहाँ रहते थे ! क्या दिन थे वो भी ? पर आपकी तरह अचानक नही गए कभी ! सब प्लानिंग से जाते थे ! आप तो हमारे भी गुरु निकले ! बधाई ! घूमते रहिये और लिखते रहिये ! शुभकामनाएं !

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  5. bahut rochak --mujhey bhi nainitaal ki sair ki yaad aa gayee-shayad sari trains kathgodam se badali jaati hain

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  6. भाग दो का इंतज़ार रहेगा!

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  7. @tau rampuria,
    ताऊ, कॉलेज की छुट्टियों में जाने का मजा ही कुछ और है. भरपूर टाइम मिलता है घूमने के लिए. अब मेरे ऊपर तो घरवालों का डंडा है, कहीं जा ही नहीं सकता. अब अपने पैरों पर खडा होकर थोडा बहुत चोरी छिपे घूम लेता हूँ. मेरी इस यायावरी का तो घर वालों को पता ही नहीं है. इसलिए मै अचानक निकल पड़ता हूँ.

    @masijeevi,
    भाई, ये हुत्थली क्या है, मेरी समझ में नहीं आया.

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  8. भई, ये भी एक निराला अंदाज ही निकला घुमक्कड़ी का. इसका निश्चित ही अलग रोमांच होगा. बढ़िया है..किस्सागोही भी रोचक है. जारी रहिये.

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  9. शानदार अनुभव, पहली बार जाने का रोमांच ही अलग होता है।

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