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Monday, May 21, 2018

जंजैहली से छतरी, जलोड़ी जोत और सेरोलसर झील

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पिछली पोस्ट ‘शिकारी देवी यात्रा’ में मित्र आलोक कुमार ने टिप्पणी की थी - “एक शानदार यात्रा वृतांत... वरना हिमाचल में हम लोग कुल्लू-मनाली और शिमला के अलावा जानते ही क्या हैं!”
बिल्कुल सही बात कही है आलोक जी ने। और इसी बात को आगे बढ़ाते हुए आज हम आपको हिमाचल के एक ऐसे स्थान की यात्रा कराएँगे, जिसके बारे में मुझे भी नहीं पता था।
आज 1 अप्रैल 2018 था। यात्रा कार्यक्रम के अनुसार तय था कि ब्रेकफास्ट के बाद नीरज मिश्रा जी हमसे विदा ले लेंगे और शाम तक आराम से मंडी पहुँचकर दिल्ली की बस पकड़ लेंगे। शाम आठ बजे उनकी बस थी। वे बड़े आराम से इसे पकड़ लेते।
और हम क्या करते? हमारे पास मोटरसाइकिल थी। क्या हम आज का पूरा दिन जंजैहली से दिल्ली लौटने में खर्च करते? यह बात जँच नहीं रही थी। मई में हमें फिर से कुछ मित्रों को इधर लाना है और उनकी यात्रा में जंजैहली के साथ-साथ जलोड़ी जोत के साथ-साथ तीर्थन घाटी को भी शामिल करना है, तो हमें उधर जाना ही पड़ेगा।
इस बात का पता तरुण गोयल को चला, तो उन्होंने कहा - “उधर जाओ तो छतरी का मंदिर भी जरूर देखना।”
जंजैहली से जलोड़ी का छोटा रास्ता छतरी से ही होकर जाता है, तो सोच लिया कि इसे भी देखते हुए चलेंगे। यही बात मिश्रा जी को बता दी। सुनकर उनका भी मन डाँवाडोल होने लगा। यह बात कल शाम की है। टैक्सीवाला भी आ गया था। हम तीनों बैठकर बातें कर रहे थे। सारे विचार-विमर्श के बाद टैक्सीवाले ने कहा - “मैं छतरी, जलोड़ी घुमाते हुए आपको शाम सात बजे तक मंडी छोड़ दूँगा, लेकिन सुबह छह बजे हर हाल में निकल लेना है।”
“मंजूर।” बाकी सबने एक सुर में कहा।
4500 रुपये में टैक्सी बुक हो गई। हालाँकि यात्रा-कार्यक्रम के अनुसार यह यात्रा का हिस्सा नहीं था, इसलिए ये पैसे मिश्रा जी को ही देने होंगे। हमारे पास पहले से दो मोटरसाइकिलें थीं, अब एक टैक्सी भी हो गई। अदल-बदलकर बैठते रहेंगे।
...
निकलते-निकलते सात बज गए।
हिमाचल का यह इलाका सिराज कहलाता है। इसके बीचोंबीच से वो धार निकलती है, जिसके बारे में हमने पिछली पोस्ट में बताया था। इसी धार पर कमरुनाग और शिकारी देवी स्थित हैं। यही धार आगे जलोड़ी जोत चली जाती है। इसी धार के दोनों ओर सिराज स्थित है। धार के उत्तर में सिराज का जो इलाका है, उसे इनर सिराज कहते हैं; जबकि दक्षिण में जो हिस्सा है, उसे आउटर सिराज कहते हैं। फिलहाल हम इनर सिराज में थे। छतरी आउटर सिराज में है। जाहिर है कि हमें फिर से वो धार पार करनी पड़ेगी।
जंजैहली से निकलकर एकदम सुनसान सड़क से सामना हुआ। हिमाचल में अमूमन सुनसान सड़कें नहीं मिलतीं। यहाँ तक कि लाहौल और स्पीति की सड़कें भी सुनसान नहीं होतीं, लेकिन यह सड़क एकदम सुनसान थी। यह कच्ची भी थी और टूटी-फूटी भी। हमें खराब सड़कें वाकई खराब लगती हैं, लेकिन हम हिमाचल के बहुत दूरस्थ क्षेत्र में भ्रमण कर रहे थे, तो अच्छा भी लग रहा था। पता नहीं मिश्रा जी को और मिश्रानी जी को कैसा लग रहा होगा!
रास्ते में एक गड़रिया मिला तो मेमनों के साथ फोटोग्राफी हो गई।
धूल उड़ने के कारण हमने आपस में एक स्वाभाविक गैप बना रखा था। सबसे आगे टैक्सी में मिश्राजी जा रहे थे, जो हर थोड़ी-थोड़ी देर बाद रुककर हमारी प्रतीक्षा कर लेते थे। उधर मुझे प्रतीक्षा थी 2700 मीटर ऊँचे उस स्थान की, जहाँ से हम इस धार को पार करेंगे। इस धार के एक तरफ ब्यास का जलक्षेत्र है और दूसरी तरफ सतलुज का जलक्षेत्र। अभी तक हम ब्यास के जलक्षेत्र में थे।
इस स्थान का नाम है मगरुगला। हिमाचल में कम ऊँचाई के दर्रों को ‘गला’ या ‘गलू’ भी कहते हैं। बाकी सभी लोग आगे जा चुके थे। उन्हें पता भी नहीं चला होगा कि उन्होंने इतने महत्वपूर्ण स्थान को पार कर लिया है।
यहीं कटनालू के पास एक मंदिर मिला - इसे मंदिर मैं नहीं, गोयल साहब कहते हैं। यह जहल देवता या जाहर देवता का मंदिर है। इसके अलग-अलग नाम हैं और इसे घटोत्कच भी माना जाता है। यहाँ गाड़ियों की नंबर प्लेटें चढ़ाई जाती हैं। इसके अलावा अन्य पुर्जे भी - मिरर, हैडलाइट, हैंडल, रिफ्लेक्टर आदि। ज्यादातर नंबर प्लेटें हिमाचल की ही थीं, लेकिन एक राजस्थान की भी थी। इसकी कहानी क्या है, पता नहीं।

और कुछ ही देर में हम जा पहुँचे छतरी। यहाँ मगरू महादेव का मंदिर है। तरुण गोयल ने इसके बारे में बड़ा अच्छा आर्टिकल लिखा है। जब कुछ दिन पहले उन्हें पता चला था कि हम इस रास्ते से गुजरने वाले हैं, तो उन्होंने इस मंदिर को देखने के बारे में विशेष तौर पर कहा था। लकड़ी का यह मंदिर ऊँचे चबूतरे पर बना है। गोयल साहब के अनुसार यह मंदिर हिमाचल आर्कियोलोजी की लिस्ट में भी शामिल है।
मुझे आर्कियोलोजी की तो परख नहीं है, लेकिन सब के सब यहाँ आकर बड़े खुश हुए। हमारे अलावा कोई भी यात्री यहाँ नहीं था। बाद में एक-दो स्थानीय यात्री ही आए। बाहर से शायद ही कोई आता होगा।
हिमाचल में मुख्यतः दो टूरिस्ट सर्किट हैं - पहला, शिमला-किन्नौर सर्किट जोकि सतलुज के उस तरफ से निकल जाता है और छतरी बहुत दूर रह जाता है। दूसरा, मनाली सर्किट जोकि ब्यास के साथ-साथ निकल जाता है और छतरी से बहुत दूर है। कुछ साहसी यात्री इन सर्किटों से हटकर जंजैहली, करसोग, तीर्थन घाटी आदि स्थानों पर हो आते हैं। छतरी इन स्थानों के पास है, लेकिन फिर भी यात्रियों की निगाह से छुपा रहता है। अगर गोयल साहब न बताते तो हम भी इसे बिना देखे ही निकल जाते।
मंदिर खुला था और किसी भी तरह की कोई रोक-टोक नहीं थी। आप कहीं भी, कैसे भी फोटो ले सकते हैं। इसकी छत दर्शनीय है। अद्‍भुत है यह! मुझे तो कुछ नहीं पता, लेकिन गोयल साहब लिखते हैं कि छत के आधे हिस्से पर रामायण के दृश्य उकेरे गए हैं और आधे हिस्से पर महाभारत के।
“भाई जी, कहीं चाय-नाश्ते के लिए रुक लेना।” यहाँ से चलते समय मैंने ड्राइवर से कहा।
“थोड़ा ही आगे एक नदी किनारे रुकेंगे।”
यह नदी कुल्लू जिले और मंडी जिले की सीमा बनाती है। अब हम मंडी से कुल्लू में प्रवेश कर गए। यहीं कुछ दुकानें थीं, जहाँ आराम से बैठकर चाय आदि पी जा सकती थी। हम जंजैहली से आलू के पराँठे पैक कराकर लाए थे। चाय के साथ निपटा दिए।
इससे थोड़ा ही आगे नगान है, जहाँ हमें जलोड़ी जोत वाली सड़क मिल गई। सड़क सिंगल तो जरूर है, लेकिन बहुत अच्छी बनी है। आनी होते हुए जलोड़ी जोत की चढ़ाई चढ़ने लगे। कई साल पहले जब हम इधर आए थे, तो सड़क खराब थी और उसके बाद भी इसके खराब ही होने की रिपोर्ट मिलती रही है, लेकिन आज यह बहुत अच्छी हालत में थी।
साढ़े बारह बजे जलोड़ी जोत पहुँचे। उम्मीद थी कि जंजैहली से चार घंटे में ही पहुँच जाएँगे, लेकिन साढ़े पाँच घंटे लग गए। अब फिर से सेरोलसर जाने या न जाने के बारे में पुनर्विचार करना पड़ा। मिश्राजी की बस मंडी से आठ बजे है, तो सात बजे तक मंडी पहुँचना पड़ेगा। यहाँ से मंडी पहुँचने में कम से कम तीन घंटे लगेंगे, यानी चार बजे तक हर हाल में यहाँ से चल देना है। इस तरह हमारे पास केवल साढ़े तीन घंटे ही थे - सेरोलसर जाने और लौटने के लिए। दूरी आना-जाना दस किलोमीटर है, रास्ता चढ़ाई-उतराई दोनों वाला है। तय हुआ कि केवल ढाई बजे तक पैदल चलेंगे। उस समय जहाँ भी होंगे, वहीं से लौट आएँगे।
मिश्राजी के लड़के वैभव ने अपने पापा को बड़ा परेशान किया। थोड़ी दूर चलते ही उसने आगे बढ़ने से मना कर दिया। यह अच्छा हुआ कि बाकी लोग तब तक आगे बढ़ गए और इत्मीनान से सेरोलसर झील के दर्शन किए। तो मिश्राजी ने उसे साइकिल और मोटरसाइकिल पता नहीं क्या-क्या लालच देकर धकेल-धकेलकर आगे बढ़ाया।
वापस जलोड़ी जोत लौटने में पाँच तो बज गए, लेकिन सभी ने आराम से झील देखी और उसकी परिक्रमा भी की। झील के किनारे थोड़ी-सी बर्फ थी और सर्दियों में यह झील जम भी जाती है। इसके किनारे बूढ़ी नागिन का मंदिर है। बाहर वालों को पता होना चाहिए कि हिमाचल में देव-परंपरा है और वहाँ देवता और देवियाँ मनुष्यों की तरह व्यवहार करते हैं और वार्तालाप भी करते हैं। अगर आप इन सब बातों को अंधविश्वास भी कहते हैं, तब भी कोई बात नहीं। लेकिन यह उनकी परंपरा है और हमें इसका सम्मान करना ही चाहिए।
ऊपर की दो लाइनें लिखने का मेरा मतलब यह है कि पिछले दिनों कुछ बाहरी लोग अपने साथ रबड़ की नाव लेकर आए और इस झील में उन्होंने नाव चलाई। उनका यह फोटो देखकर मुझे बड़ा झटका लगा, तो स्थानीय लोगों को कितना बड़ा झटका लगा होगा। वे इस झील में पैर तक नहीं डालते और हाथ-मुँह धोकर ही झील के किनारे जाते हैं और इसके जल को पवित्र मानकर घर में रखते हैं। इसमें नाव चलाने का तो सवाल ही नहीं। कल अगर वे बाहरी लोगों का यहाँ आना बैन कर दें, या तलाशी लेकर ही आने दें, तो आपको कैसा लगेगा?
समझ रहे हो ना?
आपकी अपनी तो कोई परंपरा है नहीं, दूसरों का सम्मान करना आपको आता नहीं... तो क्यों न आपको दिल्ली से या आपके शहर से बाहर निकलने पर बैन लगा दिया जाए?
ऐसा नहीं है कि ऐसे लोग कहीं बाहर से आते हैं। वे हम और आप ही लोग हैं। हम और आप ही हैं।
समझ रहे हो ना?

तो पाँच बजे मिश्राजी को टैक्सी में विदा कर दिया। और हम उनके पीछे-पीछे चल पड़े।
जलोड़ी जोत भी उसी धार पर स्थित है, जिसका जिक्र मैं इस पोस्ट में करता आया हूँ। एक तरफ सतलुज का जलक्षेत्र और दूसरी तरफ ब्यास का। जोत से चलते ही तीर्थन घाटी आरंभ हो जाती है, जो औट के पास ब्यास में जा मिलती है। तीर्थन घाटी हिमाचल की सुंदरतम घाटियों में से एक है। आज मैं पहली बार इधर आया था और अभिभूत था। लेकिन समय कम था, हम रुक नहीं सकते थे, इसलिए इन ढाई-तीन घंटों में जो भी देखने को मिला, मन खुश हो गया। यहाँ हर गाँव में होम-स्टे हैं और ठहरने की सुविधाएँ हैं। ज्यादातर की बुकिंग ऑनलाइन हो जाती है। सेब का इलाका तो है ही। हमने भी कुछ अच्छी लोकेशन पर स्थित होटलों के फोटो ले लिए। भविष्य में कोई यात्रा आयोजित करेंगे, तो काम आएँगे।
मंडी तक पहुँचते-पहुँचते आठ बज चुके थे और अब हम कमर कस चुके थे पूरी रात मोटरसाइकिल चलाने के लिए। ऐसा करना खतरनाक माना जाता है, क्योंकि हम संयम से बाइक चलाना नहीं चाहते। लेकिन अगर आपने संयम विकसित कर लिया और हर गाड़ी को ओवरटेक करने की जिद नहीं की है, तो रात के समय बाइक चलाना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है। साथ ही आपकी बाइक की हैडलाइट, टेललाइट, इंडिकेटर और बैक व्यू मिरर भी ठीक हालत में होने जरूरी हैं। और अगर नाइट विजन चश्मा भी हो, तो बहुत सुविधा रहती है।
सुंदरनगर में हल्का-फुल्का कुछ खाकर फिर आगे बढ़ चले। रात के दस बज चुके थे। दिल्ली की ओर जाने वाली गाड़ियाँ एक के बाद एक जा रही थीं। तीन-चार दिनों की लंबी छुट्टियों का आज आखिरी दिन था, इसलिए सभी लोग मनाली से छुट्‍टियाँ मनाकर लौट रहे थे। लेकिन इससे हमें कोई असुविधा नहीं थी। असुविधा उन्हें होती है, जो हमेशा आगे निकलने की कोशिश में रहते हैं।
बिलासपुर बस अड्‍डे पर कुछ देर रुके - चाय-पानी के लिए। यहाँ भी बड़ी भीड़ थी - दिल्ली जाने वालों की। अगर हम भी इस भीड़ में होते तो पूरी रात खड़े-खड़े ही बीतती या गैलरी में मेंढक की तरह बैठकर।
पंजाब में प्रवेश किया तो चार-लेन की सड़क मिल गई। बड़े आराम से अच्छी स्पीड से चलते रहे। कुराली के पास एक ढाबे पर चाय पीने रुक गए। यहाँ कुछ खाटें भी बिछी थीं, मौसम में ठंडक थी, चाय के साथ आधे घंटे की नींद भी ले ली और हम और ज्यादा तरोताजा हो गए।
सुबह पाँच बजे अंबाला पहुँचे तो नींद आने लगी थी। नरेंद्र के एक मित्र यहीं रहते हैं। पहले से ही बात कर रखी थी, बिस्तर लगे मिले और जाते ही ऐसे फैल गए, जैसे...

अगले दिन यानी 2 अप्रैल को दस बजे सोकर उठे और आधे घंटे में नाश्ता करके दिल्ली के लिए निकल पड़े। करनाल तक तो ठीक आ गए। धूप हो चुकी थी और करनाल पार करके गन्ने का जूस पीने का पक्का इरादा कर चुके थे।
कि तभी...
जाम मिला। खेतों से होते हुए कुछ आगे निकले तो फिर से जाम में फँस गए। मोटरसाइकिल खींचते-खींचते आगे बढ़ते रहे तो हमने स्वयं को भीम आर्मी के सैनिकों के सामने खड़े पाया। हथियार लहराए जा रहे थे और पुलिस भी इर्द-गिर्द ही थी। इस समय हम गंभीर खतरे में थे। ऐसे में आसानी से दंगे हो जाया करते हैं और मोटरसाइकिलें, कारें फूँक दी जाती हैं। दूसरी लेन भी एकदम खाली पड़ी थी। उसका ट्रैफिक भी पता नहीं कहाँ रोक रखा होगा। हम डिवाइडर कूदकर हाईवे से बाहर निकलकर करनाल शहर की गलियों में घुस जाने ही वाले थे कि किसी ‘सैनिक’ ने हमें आगे जाने दिया। लेकिन अगले ही मोड पर हमें पुलिस व ‘सैनिकों’ द्वारा हाईवे से बाहर कर दिया गया और हम गूगल मैप खोलकर करनाल शहर से निकलने का रास्ता ढूँढ रहे थे।
तो आगे की कहानी यह है कि पानीपत टोल तक किसी तरह पहुँच गए और आगे का रास्ता पूरी तरह बंद मिला। फिर कभी नहर के रास्ते, कभी खेतों के रास्ते, कभी इधर से, कभी उधर से ... शाम पाँच बजे दिल्ली पहुँचे।
यात्रा समाप्त।


मगरुगला


हिमाचल की अनजानी सड़कों पर





बुरांश का फूल

मगरू महादेव मंदिर की छत के अंदर लकड़ी पर कलाकृति




मगरू महादेव मंदिर







मगरू महादेव मंदिर, छतरी गाँव और पीछे करसोग जाने वाली सड़क

नदी के इधर मंडी जिला और उधर कुल्लू जिला


जलोड़ी जोत

जलोड़ी जोत से सेरोलसर झील जाने का रास्ता

तुझे साइकिल दिलाऊँगा... नहीं, आपने पिछली बार भी यही वादा किया था... इस बार पक्का...


सेरोलसर झील



जलोड़ी से तीर्थन घाटी की सड़क


तीर्थन घाटी


करनाल में दलितों का भारत बंद

पानीपत में फँसे हुए


पानीपत में नहर पर लगा जाम

फिर भी मुस्कुराहट जानी नहीं चाहिए...




4 comments:

  1. अपने लेख में स्थान देने के लिए धन्यवाद नीरज भैया....उम्मीद है जल्द ही मैं भी इन लेखों में एक किरदार के तौर पर नजर आऊं ... आपके साथ यात्रा का बेहद मन है

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  2. तो भाई हमेशा की तरह शानदार ज़बरदस्त ज़िंदाबाद।मई वली यात्रा हुई कि नहीं?और मेरा पूर्वोत्तर का क्या हुआ?

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  3. सेरोलसर झील से जलोड़ी जोत जाने के लिए पदल जाना पड़ता है ओर कितने किलोमीटर है sir

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    1. जलोडी जोत से सेरोलसर पैदल पाँच किलोमीटर है और रास्ता उतार-चढ़ाई वाला है...

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