Thursday, May 25, 2017

छत्तीसगढ़ में नैरोगेज ट्रेन यात्रा

29 अप्रैल 2017 को अचानक ख़बर मिली कि छत्तीसगढ़ की एकमात्र नैरोगेज रेलवे लाइन और भी छोटी होने जा रही है। किसी ज़माने में रायपुर जंक्शन से ट्रेनें आरंभ होती थीं, लेकिन पिछले कई सालों से तेलीबांधा से ट्रेनें चल रही हैं। रायपुर जंक्शन और तेलीबांधा के बीच में रायपुर सिटी स्टेशन था, जहाँ अब कोई ट्रेन नहीं जाती।
तो ख़बर मिली कि 1 मई से यानी परसों से ये ट्रेनें तेलीबांधा की बजाय केन्द्री से चला करेंगी। यानी तेलीबांधा से केन्द्री तक की रेलवे लाइन बंद हो जायेगी और इनके बीच में पड़ने वाले माना और भटगाँव स्टेशन भी बंद हो जायेंगे। मैं इसलिये भी बेचैन हो गया कि रायपुर से केन्द्री तक इस लाइन का गेज परिवर्तन नहीं किया जायेगा। इसके बजाय रायपुर से मन्दिर हसौद और नया रायपुर होते हुए नयी ब्रॉड़गेज लाइन केन्द्री तक बनायी जा रही है। केन्द्री से आगे धमतरी और राजिम तक गेज परिवर्तन किया जायेगा। केन्द्री तक का यह नैरोगेज का मार्ग रायपुर प्रशासन को सौंप दिया जायेगा, जहाँ हाईवे बनाया जायेगा।
अब जबकि केन्द्री तक नैरोगेज की यह लाइन बंद हो ही जायेगी, तो कभी भी इस पर हाईवे बनाने का काम आरंभ हो सकता है। यानी रायपुर सिटी, तेलीबांधा, माना और भटगाँव स्टेशन हमेशा के लिये समाप्त हो जायेंगे। मुझे उनके फोटो लेने की उत्कंठा हो गयी और 3 मई 2017 को मैं दिल्ली से निकल पड़ा। हालाँकि ट्रेन बंद हो चुकी थी, इसलिये मोटरसाइकिल से या किसी भी तरीके से बंद हो चुके स्टेशनों तक जाऊँगा और उनके फोटो लूँगा।



मेरा यह काम आसान कर दिया सुनील पांडेय जी ने। वे कसडोल के रहने वाले हैं और आजकल बिलासपुर में रहते हैं। 29 अप्रैल को जिस समय मैंने लाइन के बंद होने की ख़बर पढ़ी तो उस समय वे सपरिवार दिल्ली में हमारे यहाँ ही थे। तभी बैठे-बैठे योजना बन गयी और उन्होंने आश्वासन दिया कि वे 4 मई की सुबह कार लेकर रायपुर में उपस्थित रहेंगे और मुझे बंद हो चुके स्टेशन दिखायेंगे।
मुझे और क्या चाहिये था? ऐसे मित्र भगवान सबको दे और देश-दुनिया के कोने-कोने में दे।
दुर्ग हमसफ़र अभी हाल ही में आरंभ हुई है और आज इसका दूसरा या तीसरा ही फेरा था। ट्रेन में चढ़ते ही फेसबुक पर स्टेटस दे मारा:
“हमसफर एक्सप्रेस... पूरी तरह थर्ड एसी डिब्बों वाली यह ट्रेन अभी हाल ही में चलायी गयी है... मतलब पूरी सिरीज है यह ट्रेनों की... फ़िलहाल निजामुद्दीन - दुर्ग हमसफर में बैठा हूँ... और भी दूसरे मार्गों पर हमसफर चलती हैं... आने वाले समय में और भी चलेंगी... अब हम जैसे मध्यम वर्गीय यात्री ए.सी. का खर्च तो उठा ही सकते हैं...
कुछ ही देर पहले यह ट्रेन दुर्ग से यहाँ आयी है... अच्छी तरह साफ सफाई भी नहीं हुई कि वापस चल दी... नए लुक की ट्रेन अच्छी लग रही है... मुझे तो वैसे भी ट्रेनें अच्छी लगती हैं... हमसफर हों या लोकल...
अन्दर घुसा तो मामूली-सी अव्यवस्था से सामना हुआ... प्रत्येक बर्थ पर कम्बल, चादरें, तकिये, तौलिये अस्त व्यस्त पड़े थे... कुछ पर तो सब्जियों आदि के दाग भी लगे थे... मुझे इनसे कोई असुविधा नहीं थी... कुछ साफ सुथरी चादरें, कम्बल उठाये, झाडे और अपने नाम कर लिए... नयी ट्रेन चली है... एक ही सप्ताह हुआ है... दूसरा या तीसरा ही फेरा है... हो सकता है कि कोच अटेंडेंट की व्यवस्था न हो पायी हो... इस छोटी-सी बात के लिए रेलवे को गाली देना, अपशब्द कहना, कोसना ठीक नहीं... और मैं क्या, सभी यात्रियों ने शांति से कपडे झाडे और अपने पास रख लिए... पूरे डिब्बे में एक भी यात्री नहीं बोल रहा... सब शांत... पूर्वी भारत के यात्री बहुत जल्दी अशांत हो जाते हैं... छत्तीसगढ़ मध्य भारत में आता है...
निजामुद्दीन स्टेशन पर उदघोषणा हो रही है कि मंगला एक्सप्रेस में A1 कोच की व्यवस्था नहीं हो पायी है... इसके स्थान पर थर्ड ए.सी. का कोच लगाया गया है... जिसे जाना हो, वो थर्ड ए.सी. में बैठ जाओ... बाद में टी.डी.आर. क्लेम कर देना... जिसे नहीं जाना, वो फलानी खिड़की पर जाकर रिफंड ले ले...
बराबर में गीता जयंती एक्सप्रेस आ गयी... मथुरा से कुरुक्षेत्र तक... नयी चली है... इसलिए ज्यादा भीड़ नहीं ... दिन की ट्रेन है, इसलिए सभी सीटिंग वाले डिब्बे हैं... ए.सी. भी और नॉन ए.सी. भी...
फ़िलहाल गोइंग टू रायपुर टु ट्रेवल इन नैरोगेज...”

इसके कुछ देर बाद फिर से लिखा:
“अच्छा, अब आगे की कहानी सुनाता हूँ... इसके बाद हुआ ये कि... ... हाँ... हमसफर एक्सप्रेस... तो इसमें सब चादरें चूदरें फैली पड़ी थीं... यात्रियों ने हंगामा तो नहीं किया... लेकिन शिकायत कर दी... ट्विटर पे ही की होगी, मुझे नहीं पता... बेचारे दो अटेंडेंट य्यै बड़ा बोरा लेकर आये और चादरें उसमे भरकर ले जाने लगे... ठूँस ठूँस कर भरकर ले गए... कहीं पटककर फिर आ गए... नयी चादरें दे दीं... तकिये के कवर दे दिए... जिसने जो माँगा, उसे वो दे दिया...
मैंने पूछ लिया... भाई, मामला क्या है... बोला- नयी ट्रेन चली है... जो हमारा इंचार्ज है, उसकी शादी है... तो ठीक इंतजाम नहीं हो पाया... पूरी ट्रेन के 16-17 डिब्बों में केवल हम दो ही अटेंडेंट हैं... जबकि सामान्य तौर पर एक डिब्बे में एक अटेंडेंट होता है... ट्रेन छह बजे निजामुद्दीन आयी और साढ़े आठ बजे चल दी... इन ढाई घंटों में हम पसीना पसीना हो गए... फिर भी ये तीन डिब्बे अभी भी छूट गए... बाकी सभी डिब्बों में हमने ठीक कर दिया है... और इन्हीं तीन डिब्बों से चार शिकायतें भेजी जा चुकी हैं...
और पेंट्रीकार के तो और भी मजेदार हाल हैं... जी हाँ, ट्रेन में पेंट्रीकार है... लेकिन सभी यात्री... दोबारा लिख रहा हूँ... सभी यात्री... भूखे हैं... पेंट्री में केवल चार कर्मचारी हैं... अब ये चार बेचारे 16 डिब्बों की ट्रेन के यात्रियों को कैसे खाना खिलाएंगे???? फिर भी ये बड़ी मेहनत कर रहे हैं... आज पहली बार मुझे महसूस हो रहा है कि पेंट्री वाले मेहनत कर रहे हैं... वाकई...
सुबह नाश्ते में पोहा और इडली बनायीं... चाय कॉफ़ी भी... चाय चाय का कोई शोर नहीं... घंटे घंटे भर में कोई आता है और यात्रियों से बता जाता है कि सर जी, मैडम जी... पेंट्री में पोहा बना रखा है... जाकर ले लो... खाने का आर्डर ले गए... उतना ही खाना बना दिया... और सभी ने पेंट्री में जाकर ही खाना लिया... शाम के नाश्ते में मैगी बनी थी... हाहाहा... मैगी... यूँ ऐसे गर्म पानी डालो... तैयार... मन कर रहा है कि पेंट्री में जाकर रोटियाँ बनवाऊँ...
टी.टी.ई. भी निजामुद्दीन से वही है... शायद कल यही टी.टी.ई. दुर्ग से चला होगा... 48 घंटे की नॉन स्टॉप ड्यूटी हो जाएगी... सबकी शक्लें पहचान गया... लग रहा है जैसे कितनी पुरानी जान पहचान है...
पुलिस वाला एक भी नहीं दिखा...
सागर में गाड़ी रुकी तो खाली स्टेशन मिला... तभी कहीं से समोसे बेचने वाला एक लड़का आ गया... दो मिनट में ही सब समोसे बिक गए... लड़के ने कहा- नई ट्रेन है, टाइम नहीं मालूम था, हम ट्रेन के टाइम पर ही समोसे बेचने आते हैं... ए.सी. वाले यात्री फेरी वाले समोसे नहीं लेते, लेकिन आज सब भूखे है...
मैंने टी.टी.ई. से पूछा - इस कूपे में कहाँ से यात्री आयेंगे... चार्ट में देखा... कोई यात्री नहीं आएगा... मैं अकेला ही था... मैंने साइड अपर बर्थ चुनी थी... लेकिन अब नीचे वाली पर ही रहूँगा... लैपटॉप है... एक पोस्ट तैयार कर दी...
दरवाजे के पास बैठा एक यात्री दरवाजे के बार बार खोले जाने और बंद किये जाने से परेशान होकर इसी कूपे में आ गया... लेकिन जल्दी ही मुझे पता चल गया कि यह दरवाजे के पास ही ठीक था... बार बार पाद रहा है... आवाज वाला... भला बंद डिब्बे में भी कभी पादना चाहिए??? या फिर बिना आवाज के करो...
कुल मिलाकर नयी ट्रेन में बिंदास यात्रा चल रही है...
गोइंग टू रायपुर टु ट्रेवल इन नैरोगेज...”

तो इस तरह हमसफ़र ट्रेन की यात्रा रही। बिलासपुर से सुनील पांडेय जी भी इसी ट्रेन में आ चढ़े। चूँकि यह पूरी तरह वातानुकूलित ट्रेन थी और उनका कोई आरक्षण नहीं था। भला बिलासपुर से रायपुर तक भी कोई आरक्षण कराता है? फोन पर बोले कि दूसरी किसी ट्रेन से आ जाऊँगा। मैंने दबाव दिया कि सुपरफ़ास्ट का साधारण टिकट लेकर इसी ट्रेन में चढ़ जाना और टी.टी.ई. से मिलकर अतिरिक्त पैसे देकर रसीद बनवा लेना। खैर, वे आये तो टी.टी.ई. नहीं मिला। बोले - अब? मैंने कहा - आराम से सो जाओ। पकड़े गये तो पेनल्टी दे देंगे।
और ट्रेन के अंदर पकड़े जाने का सवाल ही नहीं। रायपुर स्टेशन पर पकड़े जाते, लेकिन वैध टिकट था ही।
सुबह-सुबह ही एक मित्र की कार ली और स्टेशन नापने चल दिये। सबसे पहले पहुँचे रायपुर सिटी। यह स्टेशन शहर के बीच में बस अड्डे के पास भीड़भाड़ वाले स्थान पर स्थित था। ढूँढ़ने में बड़ी परेशानी हुई। कई साल पहले ही यहाँ ट्रेनें बंद हो गयी हैं, तो झुग्गियाँ बन गयी हैं और झुग्गियों के बीच में दबा हुआ स्टेशन दूर से भी नहीं दिखता। फिर भी स्टेशन बोर्ड ठीकठाक अवस्था में था। दो-तीन कमरे भी थे, लेकिन टूटे हुए। बैठने वाली बेंचें ठीक हालत में थीं और झुग्गी वाले इनका जमकर प्रयोग करते। सुबह लोटा लेकर बोर्ड के पीछे व इधर-उधर बैठे लोगों से बचकर कुछ फोटो लिये और कुछ सेल्फियाँ भी।
समय-सारणी भी स्पष्ट थी, जिस पर ट्रेनों के पुराने नंबर लिखे थे, जैसे 1RD रायपुर-धमतरी पैसेंजर, 1RR रायपुर-राजिम पैसेंजर। गौरतलब है कि 20 दिसंबर 2010 से ट्रेनों को पाँच अंकों वाले वर्तमान नंबर मिले थे। उससे पहले चार अंकों वाले या अंग्रेजी अक्षरों वाले ही नंबर होते थे।
यहाँ से निकले तो सीधे तेलीबांधा जाकर दम लिया। चूँकि यहाँ चार दिन पहले तक ट्रेनें चलती थीं, तो स्टेशन साफ-सुथरा था और बोर्ड भी एकदम स्पष्ट। सभी कमरों में ताले लगे थे और स्टेशन पर मोर्निंग वाक वाले ही टहल रहे थे। रेल की पटरियों पर थोड़ी धूल अवश्य थी, लेकिन अभी जंग लगनी शुरू नहीं हुई थी। नगरपालिका निगम, रायपुर की तरफ़ से एक काला पत्थर भी लगा था, जिस पर लिखा था - तेलीबांधा रेलवे स्टेशन का लोकार्पण माननीय श्री अलाने-फलाने के करकमलों द्वारा दिनांक 11 सितंबर 2010, शनिवार को संपन्न। क्या अर्थ है इसका? रेलवे स्टेशन तो बहुत पहले से मौज़ूद है। तो क्या इस दिन रायपुर की बजाय तेलीबांधा से ट्रेनें चलना शुरू हुई थीं?
माना पहुँचे। यह एक हाल्ट था और स्टेशन गाँव के एकदम बीच में स्थित है। एक चबूतरे पर कुछ लड़के बैठे थे। हमें फोटो लेते देख पास आये और बात करने लगे। बताने लगे कि यहाँ हाईवे बनेगा और हमारे घर भी टूटेंगे। उन्होंने हमें उच्चाधिकारी समझा और पूछने लगे कि क्या कोई ऐसी भी संभावना है कि हमारे घर न टूटें। हम भला क्या उत्तर देते? बिल्कुल बगल में, आधा किलोमीटर दूर ही रायपुर-जगदलपुर राजमार्ग गुज़रता है। उसके चौड़ीकरण का काम चल रहा है - चार लेन बनाने का। और उससे आधा किलोमीटर ही दूर उसके समांतर ही, रेलवे लाइन के स्थान पर फिर छह लेन का हाईवे बनेगा? जबकि रेलवे लाइन वर्तमान राजमार्ग को कई बार काटती है, रहती समांतर ही है। क्या तुक है भला? मुझे तो कोई तुक नज़र नहीं आ रही। हाईवे न बने तो अच्छा हो। रायपुर-जगदलपुर मार्ग को ही अभनपुर तक चार की बजाय छह लेन का कर देना चाहिये।
भटगाँव स्टेशन राजमार्ग से करीब एक किलोमीटर दूर है। एकदम सन्नाटा पसरा था।
लेकिन केन्द्री स्टेशन पर सन्नाटा नहीं था। पहले केन्द्री एक हाल्ट हुआ करता था। एक ही लाइन थी। ट्रेन आती थी, एक मिनट रुकती थी और चली जाती थी। लेकिन अब यहाँ कुछ और भी लाइनें बिछायी गयी हैं। आख़िर अब यह नैरोगेज लाइनों का टर्मिनल जो बन गया है। एक लोको शेड़ भी बनाया गया है और स्टेशन की इमारत भी नयी बनी है। हालाँकि आने वाले समय में केन्द्री फिर से हाल्ट हो जाने वाला है, इसलिये स्टेशन की इमारत पक्की नहीं बनी है। टिन की चादरों से बनी है। मन्दिर हसौद से नया रायपुर होते हुए केन्द्री तक ब्रॉड़गेज लाइन बिछाने का काम भी जोरों से चल रहा है।
सुनील जी मुझे यहाँ छोड़कर अभनपुर चले गये। मैं ट्रेन से अभनपुर जाऊँगा और सुनील जी व ललित शर्मा जी के साथ पहला चक्कर राजिम का लगाकर आऊँगा।
यह ट्रेन धमतरी जायेगी। मुझे अभनपुर उतरकर दूसरी ट्रेन से राजिम जाना होगा। दूसरी ट्रेन तैयार खड़ी थी। और दोनों सहयात्री भी। धमतरी वाली ट्रेन भी लगभग खाली ही गयी और राजिम वाली भी खाली ही थी। पहले जब ट्रेनें रायपुर तक चला करती थीं, तो इनमें खूब भीड़ होती थी। लोग छतों पर भी यात्रा करते थे। लेकिन तेलीबांधा तक होने के बाद भीड़ में बहुत कमी आयी। अब केन्द्री तक होने पर और भी कमी आयेगी।
रायपुर से धमतरी तक की लाइन सन 1900 में चालू हुई थी और अभनपुर से राजिम की लाइन 1909 में। यानी सौ साल से भी ज्यादा पुरानी हैं ये लाइनें।
पहले मानिक चौरी स्टेशन है, फिर राजिम है। मानिकचौरी के पास एक बहुत बड़ा तालाब है। अच्छी-खासी नमभूमि बन गयी है और विभिन्न प्रजातियों के पक्षी यहाँ डेरा जमाये थे। ललित जी फोटोग्राफर होने के साथ साथ ही पक्षी विशेषज्ञ भी हैं। यह तो उनके लिये खुला आमंत्रण था। बोले - आऊँगा यहाँ जल्द ही। और आज 16 मई को जब मैं यह पोस्ट लिख रहा हूँ, तो ख़बर है कि वे वहाँ जाकर और बर्ड फोटोग्राफी करके लौट चुके हैं।
राजिम छत्तीसगढ़ का बड़ा ही प्रसिद्ध तीर्थस्थान है। यहाँ महानदी बहती है और कई अन्य नदियों का संगम भी है। बाद में इलाके को फुरसत से देखने के लिये इधर आयेंगे। फिलहाल तो सारा ध्यान ट्रेन पर है।
इसी ट्रेन से वापस अभनपुर लौट आये। ललित जी यहीं के रहने वाले हैं। तीन घंटे का समय था। उनके घर पर ही बिताया। आलू के पराँठे और कई तरह की सब्जियाँ।
रेलवे लाइन इनके घर के एकदम बगल से होकर गुजरती है। जिस समय केन्द्री से धमतरी की ट्रेन गुजरी, ठीक उसी समय हम भी इनके घर से निकल पड़े। सुनील जी ने मुझे स्टेशन छोड़ दिया और स्वयं रायपुर चले गये। मैं बस से धमतरी से रायपुर जाऊँगा।
धमतरी से आगे चटौद है, फिर सिर्री है, कुरुद है, सरसोंपुरी है, सांकरा हाल्ट है और आख़िर में धमतरी है।
हिमांशु चव्हाण जी धमतरी में ही रहते हैं। स्टेशन आ गये। दो साल पहले वे बाइक से लद्दाख गये थे, इस बार फिर जायेंगे। कल सुबह उन्हें भी दिल्ली जाने के लिये रायपुर से हमसफ़र एक्सप्रेस पकड़नी है। दिल्ली से फिर वे कुमाऊँ जायेंगे। तो आज वे धमतरी से कार से रायपुर जाने वाले थे। मेरी वजह से रुके हुए थे। घर ले गये। हल्का-फुल्का खाना-पीना हुआ और रायपुर की तरफ़ चल दिये। धमतरी में ही मित्र रोहित जैन भी रहते हैं। उनसे भी मिलना हुआ।
इस रेलवे लाइन को असल में लकड़ी ढोने के लिये बिछाया गया था। जंगल अभी भी बहुत हैं इधर, तब और भी ज्यादा थे। सुना है कि सिहावा तक रेलवे लाइन बिछी थी। सिहावा तक से लकड़ी लायी जाती थी। हालाँकि सिहावा तक कभी भी यात्री गाड़ी नहीं चली। आज़ादी से पहले ही उस लाइन पर मालगाड़ियों का आवागमन बंद हो गया। लेकिन फिर भी मुझे उम्मीद है कि धमतरी से सिहावा तक कहीं न कहीं उस पुरानी लाइन के अवशेष अवश्य मिल जायेंगे। हिमांशु जी ने बताया कि आगे जंगल में रेलवे लाइन के अवशेष उपस्थित है। दोबारा इधर आऊँगा तो उन्हें भी देखूँगा।




रायपुर सिटी








केन्द्री स्टेशन पर नयी पटरियाँ बिछायी गयी हैं।


केन्द्री स्टेशन


अभनपुर से धमतरी की ओर जाती ट्रेन। बायें वाली लाइन राजिम जाती है।

सुनील पांडेय जी ट्रेन यात्रा का आनंद लेते हुए।





आलू के पराँठों के साथ घिया की सब्जी का आनंद विशिष्ट होता है। ☺

धमतरी की ओर


ललित शर्मा जी और पीछे झाँक रहे सुनील पांडेय जी

धमतरी में हिमांशु चव्हाण जी






9 comments:

  1. रोहित जैनMay 25, 2017 at 7:43 AM

    सभी रेलवे स्टेशन का फोटो ना डालने का कारण हाल की घटनाओं से संबंधित है,ऐसा लगता है. छोटी सी मुलाकात को याद करने के लिए धन्यवाद

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    1. धन्यवाद रोहित जी, मैं पहले भी चुनिंदा स्टेशनों के फोटो ही लगाता आया हूँ, सभी फोटो नहीं लगाता। और बहुत अच्छा लगा आपसे मिलकर।

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  2. इस एतिहासिक नैरोगेज लाइन की रोचक जानकारी और शानदार फोटो रेल प्रेमियों के लिए एक दस्तावेज के रूप में आप के ब्लॉग पर संग्रहीत रहेंगी।

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  3. बढिया जानकारी

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  4. यात्रा वृतांत पढ़ कर बहुत अच्छा लगा, आप बहुत अच्छे मित्र हैं और क्या लिखूं

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  5. Very nice story and superb coverage

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  6. भोत बढ़िया, वैसे घिया का स्वाद लेते रहना चाहिए।

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  7. isme ek photo me dikh raha hi train ko janjeer se bandh ke rakha gya aisa kyon

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    1. ऐसा अक्सर तब होता है, जब ट्रेन यार्ड़ में लंबे समय तक खड़ी रहे... ट्रेन को या तो लकड़ी के ब्लॉक से रोककर रखते हैं, या जंजीर से बाँधकर... अन्यथा ट्रेन ढलान पर अपने-आप लुढ़क सकती है...

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