Tuesday, November 19, 2013

इलाहाबाद से मुगलसराय पैसेंजर ट्रेन यात्रा

मुझे नये नये रेलमार्गों पर पैसेंजर ट्रेनों में घूमने का शौक है। मेरे लिये ऐसी यात्राएं एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने का साधन नहीं बल्कि साध्य होती हैं। अर्थात रेल यात्रा करना ही लक्ष्य होता है। इस बार मैं इलाहाबाद गया, वाराणसी गया और लखनऊ भी गया लेकिन इन स्थानों के दर्शनीय स्थलों को देखने नहीं बल्कि इनके मध्य में पडने वाली रेलवे लाइनों पर यात्रा करने। मेरी इन पैसेंजर यात्राओं का नेटवर्क बढता जा रहा है और इस कार्य में मुझे अपूर्व आनन्द भी मिलता है। पहले यात्रा करना, फिर घर लौटकर उनका लेखा-जोखा तैयार करना, स्टेशनों की लिस्ट को अपडेट करना, पैसेंजर के नक्शे को अपडेट करना; आहा! अभूतपूर्व आनन्द!
इसी तरह मेरा नेटवर्क इलाहाबाद तक तो पहुंच गया लेकिन बहुत कोशिशें कर लीं, उससे आगे नहीं बढ पाया। इसका कारण है कि इलाहाबाद और मुगलसराय के बीच मात्र एक ही पैसेंजर चलती है। इलाहाबाद से यह ट्रेन सुबह सवा सात बजे चलती है और वापसी में रात साढे आठ बजे इलाहाबाद लौटती है। यानी अच्छा खासा उजाला होने पर चलती है और मुगलसराय से अन्धेरे में लौटती है। मुझे ये यात्राएं उजाले में ही करना पसन्द हैं इसलिये एकमात्र चारा था इलाहाबाद से मुगलसराय जाना।
13 नवम्बर को इस काम में हाथ डाल दिया। पिछले कई दिनों से मैं इस गाडी की दिनचर्या पर गौर कर रहा था, यह नियमित रूप से चार घण्टे विलम्ब से मुगलसराय पहुंचती रही। इस कारण आज पूरे दिन में मात्र 153 किलोमीटर लम्बी इस यात्रा को ही करने की सोची, अन्यथा आमतौर पर दिनभर में चार सौ किलोमीटर की पैसेंजर यात्राएं हो जाती हैं।
ठीक समय पर गाडी चल पडी। यमुना पार करके नैनी जंक्शन पहुंचे। नैनी से एक लाइन अलग होकर मानिकपुर चली जाती है जो पुनः विभक्त होकर जबलपुर और झांसी जाती है। मानिकपुर वाली लाइन दोहरी तो है लेकिन विद्युतीकृत नहीं है।
नैनी से आगे छिवकी जंक्शन मिला। असल में छिवकी कुछ समय पहले तक एक केबिन हुआ करता था जहां से मुख्यतः मालगाडियों को नैनी बाईपास से मुगलसराय और मानिकपुर के बीच चलाया जाता था। यात्री गाडियां जो मुगलसराय और मानिकपुर के बीच चलती थीं, उन्हें इलाहाबाद जाकर इंजन की बदली करके पुनः यमुना पार करके दूसरी दिशा में जाना होता था। ऐसा करने से इलाहाबाद पर काम का बोझ बढने लगा और इलाहाबाद-नैनी लाइन पर भी। इससे बचने के लिये छिवकी को स्टेशन का रूप दे दिया। अब कई यात्री गाडियों को इलाहाबाद नहीं जाना पडता। इलाहाबाद की बजाय छिवकी में रुकती हैं और अपने अपने गन्तव्य को निकल पडती हैं।
कल ही चन्द्रेश ने बता दिया था कि वे मुझे मिर्जापुर मिलेंगे और मेरे साथ अपने गृह स्टेशन अहरौरा रोड तक यात्रा करेंगे। हां, ‘कल’ से कुछ बातें और याद आ गईं। कल मैंने नाइट ड्यूटी करके सुबह साढे छह बजे नीलांचल एक्सप्रेस पकड ली थी नई दिल्ली से। मेरा आरक्षण कानपुर तक था। यह लखनऊ कोटे का डिब्बा था। लखनऊ तक यह खाली ही जाने वाला था। नई दिल्ली से लखनऊ के बीच इटावा तक, कानपुर तक या लखनऊ तक जिसने भी आरक्षण कराया, सभी को इसी डिब्बे में जगह दे दी गई।
कानपुर स्टेशन पर उतर भी नहीं पाया कि प्रदीप शर्मा जी का फोन आ गया। वे यहीं रहते हैं। मेरा कार्यक्रम देखा तो मिलने चले आये। मुझे आगे रायबरेली पैसेंजर में रायबरेली तक जाना था डलमऊ के रास्ते। गाडी ढाई बजे चलती है। हम दोनों करीब घण्टे भर तक गाडी के बराबर में खडे बतियाते रहे। शर्मा जी ने कहा- “जब मैंने आज तुम्हें फोन किया तो बडी मासूम सी आवाज होने की कल्पना की थी। लेकिन जब कडक और जोरदार आवाज सुनाई दी तो एकबारगी यही लगा कि गलत नम्बर मिला दिया। मेरी उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत गला है तुम्हारा।”
शर्मा जी एक पन्नी में कुछ खाने का सामान भी लाये। नाम तो उन्होंने नहीं बताया लेकिन इतना अवश्य बताया कि यह कानपुर की मशहूर डिश है जो केवल यहीं बनती है, वो भी सर्दियों में ही। इसमें ज्यादातर क्रीम थी। जब यह डिश मेरे हाथ में आई तो गाडी चलने में आधा घण्टा शेष था। यह सोचकर इसे अपने बैग और दो-तीन अमरूदों के साथ ऊपर वाली सीट पर रख दिया कि आगे रास्ते में खा लूंगा। लेकिन ऐसा नहीं होना था।
जब गाडी चली तो यह भयंकर तरीके से भर चुकी थी। रही सही कसर गंगा पार करके शुक्लागंज में दूधियों ने पूरी कर दी। अनुभव ने कह दिया कि उन्नाव तक भीड बढेगी ही। फिर मैं इस तरह की पैसेंजर यात्राओं में दो प्राणियों से पर्याप्त दूरी बनाकर रहता हूं- छात्र और दूधिये। दूधियों को देखते ही मैं खिडकी छोडकर अन्दर घुस गया। अन्दर भी उतनी ही भीड थी। उन्नाव से जब गाडी चली तो बाहर खिडकी पर यात्री बुरी तरह लटके हुए थे।
बीघापुर तक गाडी की भीड छंट चुकी थी। अब मैं डिब्बे में इधर से उधर घूम सकता था, खिडकी पर भी खडा हो सकता था। सोचा कि शर्मा जी वाली कनपुरिया डिश निपटा ली जाये। उस जगह पहुंचा, जहां बैग, अमरूद और डिश रखे थी। अब उस ऊपर वाली रैक पर सामानों व बडे बडे गट्ठरों का ढेर लगा था। बैग तो दिख गया लेकिन अमरूद व डिश नहीं दिखाई दिये। मैंने गट्ठर इधर उधर सरकाने शुरू किये। नीचे बैठे यात्रियों ने पूछा कि क्या ढूंढ रहे हो? मैंने कहा कि यहां मेरी एक खाने की चीज रखी थी। इतना सुनते ही बैठे हुए दो यात्री तमतमाते हुए उठे और अवधी में भला-बुरा कहने लगे। उनके कपडों पर लगे दूध जैसे निशान को देखते ही मैं माजरा समझ गया। इससे पहले कि बात आगे बढती, मेरे हाथ में एक अमरूद आ गया। मैंने तुरन्त अपना बचाव किया- “देखो, देखो, अमरूद थे। यहां अमरूद की पन्नी रखी थी, दो अमरूद थे। ये देखो, एक मिल गया, दूसरा नहीं मिल रहा।” उन्होंने कहा कि तुम्हारे अमरूदों ने हमारे कपडे खराब कर दिये। ये ऊपर सामानों के नीचे दबकर पिचक गये और हमारे ऊपर गिर पडे। तभी दूसरा अमरूद भी मिल गया। मैंने कहा- “नहीं, दो ही अमरूद थे। ये देखो, दोनों सलामत हैं। तुम्हारे ऊपर कुछ और गिरा है। क्या गिरा है, मुझे नहीं मालूम।”
अमरूदों ने जान बचा ली। कानपुर में सम्मान हुआ, बीघापुर में अपमान हो जाता। बाद में जब डलमऊ में पूरा डिब्बा खाली हो गया, मैं पुनः उस स्थान पर गया कि डिश के कुछ अवशेष मिल जाये, दबी पिचकी पन्नी मिल जाये, लेकिन कुछ नहीं मिला।
रायबरेली से गंगा गोमती एक्सप्रेस से आधी रात तक इलाहाबाद पहुंच गया जहां स्टेशन से आधा किलोमीटर दूर डेढ सौ में एक नन्हा सा कमरा मिल गया। रात भर का जगा था, सुबह सात बजे फिर ट्रेन पकडनी है, एक अच्छी नींद लेनी जरूरी थी।
ओके, वापस आते हैं मुद्दे पर। छिवकी से आगे चलते हैं। करछना, भीरपुर, मेजा रोड, ऊंचडीह, माण्डा रोड, जिगना, गैपुरा, बिरोही, विन्ध्याचल, मिर्जापुर, झिंगुरा, पहाडा, डगमगपुर, चुनार जंक्शन, कैलहट, अहरौरा रोड, जिवनाथपुर के बाद है मुगलसराय जंक्शन। विन्ध्याचल तक गाडी आधी से ज्यादा दूरी तय कर चुकी थी और आधे घण्टे लेट भी हो चुकी थी। इसमें फर्रूखाबाद-इलाहाबाद पैसेंजर के डिब्बे लगे थे। डिब्बों पर भी फर्रूखाबाद-इलाहाबाद ही लिखा था, मुगलसराय नहीं लिखा था।
विन्ध्याचल के बाद ट्रेन और ज्यादा लेट होना शुरू हो गई। मुगलसराय पहुंचते पहुंचते यह साढे तीन घण्टे लेट हो चुकी थी। मुझे इसकी चार घण्टे लेट होने तक की उम्मीद थी। मेरी उम्मीद से यह आधा घण्टा पहले ही गन्तव्य पहुंच गई।
गंगा के दक्षिणी अर्थात इस इलाके में मैं पिछले साल चन्द्रेश के साथ घूम चुका था। विन्ध्याचल भी देखा था तब। चन्द्रेश का घर अहरौरा रोड स्टेशन के पास है। आज चन्द्रेश एक अन्य मित्र के साथ कैलहट स्टेशन पर मिले। दोनों ने मेरे साथ कैलहट से अहरौरा रोड तक यात्रा भी की। मित्र ने मुझसे आज यहीं रुकने को कहा लेकिन चन्द्रेश ने उसे समझा दिया कि ऐसा होना असम्भव है। मुगलसराय को अपने पैसेंजर रेल नेटवर्क से जोडना बहुत जरूरी है, कम से कम इसी ट्रेन से मुगलसराय जाना ही पडेगा।
जब अहरौरा रोड से ट्रेन चली तो मेरे पास अथाह भोजन हो गया था। चन्द्रेश घर से खाना बनवाकर लाया था। साथ में बिस्कुट-नमकीन के पैकेट व एक किलो बर्फी भी। और हां, सेर भर से ज्यादा कच्चे सिंघाडे भी। आज इसमें बिखरने जैसा कुछ नहीं था और ट्रेन में भीड भी नहीं थी। कल प्रदीप वाली डिश वाला हाल तो नहीं होने वाला। आराम से मुगलसराय पहुंचकर खाऊंगा।
यह लाइन भारत की प्राचीनतम रेलवे लाइनों में से एक है। भले ही पहली ट्रेन बम्बई में चली हो लेकिन उसी दौरान कलकत्ता में भी लाइन बिछ चुकी थी। कलकत्ता से दिल्ली को जोडने का काम युद्ध स्तर पर शुरू हुआ। बम्बई से पहले कलकत्ता दिल्ली से जुड चुका था। यह उसी कलकत्ता-दिल्ली लाइन का एक हिस्सा है।
चुनार जंक्शन से एक लाइन चोपन चली जाती है। चोपन भी एक जंक्शन है जहां से एक लाइन झारखण्ड में बरवाडीह और बरकाकाना जाती है और दूसरी मध्य प्रदेश में सिंगरौली होते हुए कटनी। चोपन-बरवाडीह लाइन घोर नक्सली इलाके से गुजरती है। सुना हैं कि वहां ट्रेनों में हर खिडकी पर हथियारबन्द जवान मुस्तैद खडे रहते हैं। मुगलसराय अपने पैसेंजर नक्शे में आ गया, अब पूर्वी भारत में भी मेरी घुसपैठ बढने वाली है।
डेढ घण्टे बाद ही मुगलसराय से जौनपुर पैसेंजर चलने वाली थी। इसी से वाराणसी जाऊंगा। पांच रुपये का टिकट लगा।
जौनपुर पैसेंजर के चलने से पहले बरकाकाना-वाराणसी पैसेंजर आ गई। इसे देखते ही मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। यह गाडी बरकाकाना से 435 किलोमीटर की दूरी तय चुकी है, 13 घण्टे इसे चलते हुए हो चुके हैं। लेकिन अपने निर्धारित समय से दस मिनट पहले ही यह मुगलसराय आ गई। इसका चरित्र भी चार-चार पांच पांच घण्टे लेट होने का रहा है। यह चली भी जौनपुर पैसेंजर से पहले ही हालांकि समय सारणी के अनुसार जौनपुर पैसेंजर इससे दस मिनट पहले चलती है। मैं जौनपुर पैसेंजर में ही बैठा था, लेकिन जब देखा कि यह पहले जा रही है, तो भागकर इसमें चढ लिया। रास्ते में व्यासनगर स्टेशन के बाद एक बन्द पडा हाल्ट मिला- बाबा भगवानदास राम हाल्ट। ट्रेन यहां नहीं रुकी, अन्धेरा भी होने लगा था, अचानक जब स्टेशन का बोर्ड दिखाई दिया तो फोटो खींचने तक की फुरसत नहीं मिली। यहां तक कि ढंग से नाम भी नहीं पढा जा सका। कहीं पर इसका नाम मैंने बाबा भगवान राम हाल्ट भी पढा है।
राजघाट पुल से गंगा पार की। यहीं से बनारस के घाट शुरू हो जाते हैं और कई किलोमीटर दूर अस्सी घाट से भी आगे तक चले जाते हैं। घाटों पर कोई चहल-पहल नहीं दिखाई दी। वैसे भी चहल-पहल वाले घाट इने-गिने ही हैं।
वाराणसी पहुंचकर सबसे पहला काम किया डोरमेटरी में एक बिस्तर लेना। सौ रुपये लगे। साथ ही नहा भी लिया। दो दिनों से लगातार ट्रेनों में यात्रा कर रहा हूं, नहाने की तलब लग ही जाती है।
कल वाराणसी से प्रतापगढ के रास्ते लखनऊ और उसके बाद मुरादाबाद तक की पैसेंजर यात्रा करूंगा।

पहले कानपुर से रायबरेली की यात्रा करते हैं। यह स्टेशन कानपुर और उन्नाव के बीच में है।





इलाहाबाद जंक्शन। आज की मुख्य यात्रा शुरू।

यमुना नदी












चन्द्रेश और उसका मित्र

मुगलसराय से वाराणसी जाने वाली लाइन




अगले भाग में जारी...

7 comments:

  1. आपके साथ - साथ देश के विभिन्न रेल पथ की यात्रा हम भी कर आए। इसके लिय आपको बहुत- बहुत धन्यवाद हमेशा आगे बड़ते रहे.......

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  2. बढिया यात्रा वर्णन

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  3. neeraj ji aapka blog yatra sansmaran hai. lekin kuchh samay se mai mahsoos kar raha hoon ki aapne esko train information site bana diya. jaise ki Allahabad_ Mugalsaray Yatra. Rochakta Banaye rakhane ke liye Train Information ke bajay Yatra ke apne anubhavon par jyada likhen. Krapya annyatha na samjhen._ Brajesh mishra Lucknow

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  4. mera photu ki jagah mera photo likho to acchha rahega ji

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  5. mera photu ki jagah mera photo likho to acchha rahega ji

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  6. Mast hai beeruu...

    great memoirs NEERAJ ji.

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  7. नीरज जी बढ़िया पोस्ट है, गाव कि याद दिला दी । कानपुर उन्नाव बीघापुर तकिया, मैं भी उधरी का हूँ
    कानपुर मेरा घर है लेकिन दिल्ली नौकरी करता हूँ इसलिए गाव जाना कम ही ho pata hai, रघुराज सिंह के आगे एक मुख्या स्टेशन छूट गया । लालगंज जहा पर नई रेल कोच फैक्ट्री lagai गई है

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