Thursday, March 25, 2010

आज हमारा घर देखिये

यह पोस्ट अपने तय समय से कुछ विलम्ब से छप रही है। क्योंकि नीचे दिये गये ज्यादातर फोटू होली पर खींचे गये थे। उस समय खेतों में बहार आयी हुई थी, सरसों मस्ती मार रही थी। अब तो सरसों अपने पकने के दौर में चल रही है। लेकिन फिर भी देर से ही सही।

मेरे गांव का नाम है- दबथुवा। यह मेरठ जिले में सरधना और शामली जाने वाली सडक पर स्थित है। मुझे दिल्ली से अपने गांव जाने में कम से कम तीन घण्टे लगते हैं। नजदीकी रेलवे स्टेशन मेरठ छावनी है। दबथुवा काफी बडा गांव है। यह जाट बहुल है। हमारा घर पंघाल पट्टी में है, पंघाल पट्टी मतलब पंघाल गोत्र वाले जाट। अपन भी पंघाल हैं। हमारा घर मुख्य सडक से काफी हटकर गांव के बाहरी इलाके में है, खेतों के पास। घर के सामने और बायें, दो तरफ खेत हैं। आजकल गन्ना और गेहूं की खेती हो रही है। गन्ना धीरे-धीरे कट रहा है, एक महीने बाद गेहूं भी कटने लगेगा। गन्ने वाले खेतों में दोबारा गन्ना ही बो दिया जायेगा, गेहूं वाले खेतों में ज्वार या धान बोये जायेंगे। पूरे सालभर यही चक्र चलता रहता है।



हां, गांव में तो कुछ घूमने-घामने लायक नहीं है, लेकिन आस-पास बहुत कुछ है। सरधना है जहां बेगम समरु का विश्व प्रसिद्ध चर्च है। बरनावा है जहां लाक्षागृह है। इसी में दुर्योधन ने पाण्डवों को जलाकर मारने का षडयन्त्र रचा था था। करीब साठ किलोमीटर दूर हस्तिनापुर है।

अच्छा चलो, अब फोटू देखो:








(यह है आजकल दुर्लभ होती अंगीठी। इसमें गोबर के बने उपलों के ईंधन का प्रयोग होता है। फिलहाल नहाने के लिये पानी गरम हो रहा है।)

(यह है हमारा घर। बीच में नीम का पेड है। नीम के नीचे खाट बिछी है।)

(लट्ठधारी)

(चल, अब तू बछिया के पास खोर में बैठ।)

(हां भई, तसले में गोब्बर भरा रखा है। गेर आ।)

(जब सरसों बोयी जाती है, तो पहले तो सरसों दा साग बनता है, अब सरसों दी रौनक है, बाद में सरसों दा तेल और सरसों दी खल बनेगी। हमारे यहां सरसों की सूखी लकडी को ईंधन के रूप में जलाया जाता है। या फिर कहीं बाड लगाने के काम में लायी जाती है। राजस्थान की तरफ देखा है कि सूखी लकडियों का भूसा बनाकर चारे के रूप में प्रयोग करते होंगे।)


26 comments:

  1. नीरज जी, आज ऐसे ही आपके ब्लॉग पे घूमते टहलते आ गया...वैसे तो आपके ब्लॉग पे हम पहले भी आ चुके हैं लेकिन टिपण्णी नहीं कर पाए..

    ये पोस्ट देख मुझे अपने गाँव कि याद आ गयी..मेरा गाँव ऐसा खूबसूरत तो नहीं लेकिन हाँ जो घर कि तस्वीरें हैं वो काफी मिलती है मेरे गाँव के घर से...
    बहुत ही अच्छा लगा...तस्वीरें सब अच्छी हैं....अच्छा लगा :)

    ReplyDelete
  2. ये पोस्ट देख मुझे अपने गाँव कि याद आ गयी..मेरा गाँव ऐसा खूबसूरत तो नहीं लेकिन हाँ जो घर कि तस्वीरें हैं वो काफी मिलती है मेरे गाँव के घर से...
    बहुत ही अच्छा लगा...तस्वीरें सब अच्छी हैं....अच्छा लगा

    ReplyDelete
  3. दिल्ली से सिकंदराबाद वाया ग्रेटर नोयडा जाते समय १० किलोमीटर का रास्ता गांवों से होकर तय करता हूँ तब आपके ही जैसे घर , पशुओं के घेर , गोबर से बने उपलों के व्यस्थित ढेर और खेतों में खड़ी फसल और काम करते लोगो के दृश्य देखने को मिलते है | जिन्हें देखकर वाकई मन हर्षित होता है |

    ReplyDelete
  4. कभी मौका मिलेगा तो साक्षात देखूँगा। वैसे तस्ले में क्या है?

    ReplyDelete
  5. यही तो स्वर्ग है नीरज।न प्रदूषण,न खरदूषण,न छल,न कपट सिर्फ़ प्यार और शुद्ध प्यार्।भारत के हर कोने के गांवो के घर ऐसे ही मिलेंगे मगर अफ़सोस अब उन्हे भी शहर की हवा लगने लगी है।बचपन मे पढा करते थे भारत कृषीप्रधान देश है।यंहा की 70 प्रतिशत आबादी गांवो मे बसती है।भारत गांवों का देश है।जाने क्या-क्या।आनंद आ गया तुम्हारे गांव और घर की सैर करके।पहले गर्मियों की छुट्टियों मे दो महिने गांव मे ही बिताया करते थे अब बड़ी मुश्किल से दो दिन गुज़ारने का मौका निकलना पड़ता है।याद दिला दी तुमने गांव की।मस्त पोस्ट्।

    ReplyDelete
  6. ऐसा लग रहा है कि हम भी गाँव में ही जाकर बस जाये, सारी मोह माया छोड़कर...

    ReplyDelete
  7. मुसाफिर भाई,

    गाँव की याद ताज करदी आपने.

    बचपन में तुम्हारी ही तरह खेल-खेल में गोबर ईक्ट्ठा करते थे.

    शिकायत फिर वही.... फोटू बहुत कम हैं.

    ReplyDelete
  8. गाँव का परिवेश बहुत सुहाना लगा!

    ReplyDelete
  9. अरे आप यहां भी घूम आये, वो भी अकेले अकेले ;-)

    गोबर तै नूं तसले म्है मन्नै भी ठा राखा सै
    तेरे ब्याह म्है आऊंगां तेरे गाम मै
    राम-राम

    ReplyDelete
  10. भाई वो किस्मत वाले हैं जिनका ऐसा घर है जो प्रकृति के इतना करीब है...शहर में रहने वालों को तुमसे इर्षा हो रही है...यहाँ शहर में सब कुछ है लेकिन न आँगन में बंधी गाय है न नीम का पेड़ है न उसके नीचे बिछी चारपाई है और न वो चूल्हा है जिसपर सिकी रोटियों की खुशबू दूर तक फ़ैल जाती है और भूख को बढ़ा देती है...

    नीरज

    ReplyDelete
  11. हमें तो आपके लठ्ठधारी गबरू जवान पसन्‍द आए। आपका कम्‍प्‍यूटर कक्ष तो आपने दिखाया ही नहीं। और जब हम वहाँ पर ब्‍लागर मीट करेंगे तब कहाँ करेंगे कृपया इसका भी उल्‍लेख करें।

    ReplyDelete
  12. बहुत बढ़िया नीरज जी, आपकी यात्राओं का विवरण तो पढता रहता हूँ मगर टिपण्णी करने का दिल आज ही हुआ ! जिस सुन्दरता और इमानदारी से आपने खुद के घर के चित्र प्रस्तुत किये , वाकई तारीफे काविल है ! वरना तो लोग आजकल इसमें भी अपनी शान में गुस्ताखी समझते है !

    ReplyDelete
  13. भाई यो लठ्ठधारी का परिचय नही करवाया? यो कुणसा और कठ्ठे का ताऊ सै? गोबर का तसला सर पै ठा के घणा सुथरा लागरया सै भाई.

    रामराम.

    ReplyDelete
  14. जियो प्यारे
    ,और ये फ़ोटो तसले वाली, क्या कहने।

    ReplyDelete
  15. आज की आधुनिकता में ऐसे भारत का दर्शन बड़ा ही मुश्किल है ...सुंदर सचित्र बढ़िया प्रस्तुति..आभार भाई

    ReplyDelete
  16. अरे कर दी ना जाट आई बात, अरे इस भेंस को ताऊ की करीम लगा कर ना भेंसो मै रहने दिया, ओर नाही गाय माता मै :)

    बहुत सुंदर लगा आप का गांव,मै तो खुब घुमा हुं गांव मै, जोहड मै नाहाया भी शिवाल्ये मै बेठ कर चोरी चोरी बीडी भी फ़ुंकी है, चिल्म भी खुब भरी, कोलू पै भी खुब गुड्ड निकाला, गोबर का तसला भी खुब ढोया ओर बिटोडॆ तक भी गया गोबर को ले कर, इस लिये सभी चित्र देख कर पुराने दिन याद आ गये... मेरे बच्चो ने ओर बीबी ने नही देखा गांव जब उन से भारत के गांव के बारे बात करता हुं तो पहले तो वो घिन्न से नाक चढाते है, फ़िर जब उन्हे गांव की अच्छी अच्छी बाते बताता हुं तो खुब ललचाते है गांव देखने के लिये, अपना वादा मत भुलना, वेसे जाट का वादा उसे याद नही दिलाना पडता... खुश किस्मत हो भाई जो स्वर्ग मै रहते हो

    ReplyDelete
  17. Bahut bhadiya post aapke madhyam se gaavn ki ser kar ke aanand aagaya...chitra bhi bahut acche hai!!
    Dhanywaad.

    ReplyDelete
  18. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  19. हम भी बुढ़ापा ऐसी ही जगह में बिताएंगे...
    आधुनिकता की होड़ में सादगी का मंजर ...दिल में गहरे उतर गया...
    (पिछली टिप्पणी में वर्तनी अशुद्ध हो गयी थी ...क्षमा चाहती हूँ )

    ReplyDelete
  20. आपके और हमारे गाँव में कुछ ज्यादा अंतर नहीं है !

    ReplyDelete
  21. चलो जी पहली बार मिले आप से और गाँव के घर तक हो आये हम तो.लट्ठधारी तो बड़ा प्यारा है नीम तले खटिया देख के ईच्छा हुई यही पड़ जाऊं.देखोगे तो जगा ही दोगे मट्ठा छाछ पीला ही दोगे रात रोटी शोटी भी मिल ही जायेगी.बस फिर क्या अपन तो 'पोड' लिए वहीं, अब ध्यान जरा इस बिन बुलाए मेहमान का वो कब आ धमके उसे भी नही पता. बदा नालायक है ये नया दोस्त,याद रखना.
    हा हा हा

    ReplyDelete
  22. mera gaun mera desh,,,waqai mian Riyadh me baithe is real gaun ki photo dekh ker and jis sadgi se aap ne apne gher and asali bharat ki dershan karai hai , aisa ek saaf dil wala hi ker sakta hai,,
    shukriya niraj ji, mai bhi aap ke blog se chepak jata hu, maja ata hai ,,,

    ReplyDelete
  23. दूर के ढोल सुहावने

    ReplyDelete
  24. Niraj ji.. namaskar.. may aap ke bare me jo pura vivaran likha tha vo wala post fir se padhana chahta hu... jab aap ne diploma kar ke job ki starting kari vaha se laga ke aap metro me lage vaha tak ki.. plz. muje aap us ki link mere email = aapkahi84@gmail.com ya mere whatsapp 9374273690 pe plz dena sir ji. plz.

    ReplyDelete