Monday, December 25, 2017

सूरत से भुसावल पैसेंजर ट्रेन यात्रा

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25 अगस्त 2017
कल बडनेरा से ट्रेन नंबर 18405 एक घंटा लेट चली थी। मैंने सोचा सूरत पहुँचने में कुछ तो लेट होगी ही, फिर भी साढ़े तीन का अलार्म लगा लिया। 03:37 का टाइम है सूरत पहुँचने का। 03:30 बजे अलार्म बजा तो ट्रेन उधना खड़ी थी, समझो कि सूरत के आउटर पर। मेरे मुँह से निकला, तुम्हारी ऐसी की तैसी मध्य रेल वालों।
फिर तीन घंटे जमकर सोया। पौने सात बजे उठा तो भगदड़ मचनी ही थी। सात बीस की ट्रेन थी और अभी नहाना भी था, टिकट भी लेना था और नाश्ता भी करना था। दिनभर की बारह घंटे की पैसेंजर ट्रेन में यात्रा आसान नहीं होती। कुछ ही देर में आलस आने लगता है और अगर बिना नहाये ही ट्रेन में चढ़ गये तो समझो कि सोते-सोते ही यात्रा पूरी होगी। इसलिये टिकट से भी ज्यादा प्राथमिकता होती है नहाने की। टिकट का क्या है, अगले स्टेशन से भी मिल जायेगा।
पश्चिम रेलवे वाले अच्छे होते हैं। पंद्रह मिनट में टिकट भी मिल गया और नहा भी लिया। इतने में राकेश शर्मा जी का फोन आ गया। वे स्टेशन पहुँच चुके थे। जिस प्लेटफार्म पर ट्रेन आने वाली थी, उसी प्लेटफार्म पर इत्मीनान से मिले। इत्मीनान से इसलिये क्योंकि पंद्रह मिनट की मुलाकात में हमने दो-दो समोसे भी निपटा दिये, चाय भी पी और बातें भी खत्म हो गयीं। घुमक्कड़ी, घर-परिवार, काम-धाम की सब बातें साझा करने के बाद हमारी कोई बात ही नहीं बची। राकेश जी बिहार से हैं और यहाँ हीरा कंपनी में काम करते हैं। समय मिलते ही घूमने निकल जाते हैं। इन्होंने बताया कि सापूतारा का कुछ हिस्सा महाराष्ट्र में है और गुजराती लोग वहाँ हिल-स्टेशन की वजह से नहीं जाते, बल्कि दारू पीने जाते हैं।

Monday, December 18, 2017

शकुंतला रेलवे: मुर्तिजापुर से अचलपुर

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24 अगस्त 2017
आज की योजना थी मुर्तिजापुर से यवतमाल जाकर वापस मुर्तिजापुर आने की। इसलिये दो दिनों के लिये कमरा भी ले लिया था और एडवांस किराया भी दे दिया था। कल अर्थात 25 अगस्त को मुर्तिजापुर से अचलपुर जाना था।
लेकिन कल रात अचानक भावनगर से विमलेश जी का फोन आया - "नीरज, एक गड़बड़ हो गयी। मैंने अभी मुर्तिजापुर स्टेशन मास्टर से बात की। यवतमाल वाली ट्रेन 27 अगस्त तक बंद रहेगी।"
मैं तुरंत स्टेशन भागा। वाकई यवतमाल की ट्रेन बंद थी। लेकिन अचलपुर की चालू थी। अब ज्यादा सोचने-विचारने का समय नहीं था। यवतमाल तो अब जाना नहीं है, तो कल मैं अचलपुर जाऊंगा। यवतमाल के लिए फिर कभी आना होगा। अब एक दिन अतिरिक्त बचेगा, उसे भी कहीं न कहीं लगा देंगे। कहाँ लगायेंगे, यह अचलपुर की ट्रेन में बैठकर सोचूंगा।
टिकट लेकर नैरोगेज के प्लेटफार्म पहुँचा तो दो-चार यात्री इधर-उधर बैठे थे। ट्रेन अभी प्लेटफार्म पर नहीं लगी थी।

Monday, December 4, 2017

नागपुर-अमरावती पैसेंजर ट्रेन यात्रा

22 अगस्त 2017
मैं केरल एक्स में हूँ, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि केरल जा रहा हूँ। सुबह चार बजे नागपुर उतरूँगा और पैसेंजर ट्रेन यात्रा आरंभ कर दूँगा। कल क्या करना है, यह तो कल की बात है। तो आज क्यों लिखने लगा? बात ये है कि बीना अभी दूर है और मुझे भूख लगी है। आज पहली बार ऑनलाइन खाना बुक किया। असल में मैंने ग्वालियर से ही खाना बुक करना शुरू कर दिया था, लेकिन मोबाइल को पता चल गया कि अगला खाने की फ़िराक में है। नेट बंद हो गया। सिर्फ टू-जी चल रहा था, वो भी एक के.बी.पी.एस. से भी कम पर। झक मारकर मोबाइल को साइड में रख दिया और नीचे बैठी हिंदू व जैन महिलाओं की बातें सुनने लगा। पता चला कि सोनागिर एक जैन तीर्थ है और जैन साधु यहाँ चातुर्मास करते हैं। कहीं पहाड़ी की ओर इशारा किया और दोनों ने हाथ भी जोड़े।
हाँ, हाथ जोड़ने से याद आया। सुबह सात बजे जब मैं ऑफिस से घर पहुँचा तो देखा कि दीप्ति जगी हुई है। इतनी सुबह वह कभी नहीं जगती। मैं आश्चर्यचकित तो था ही, इतने में संसार का दूसरा आश्चर्य भी घटित हो गया। बोली - “आज हनुमान मंदिर चलेंगे दोनों।” कमरे में गया तो उसने दीया भी जला रखा था और अगरबत्ती भी। मैं समझ गया कि सपना देख रहा हूँ। अभी मैं घर पहुँचा ही नहीं हूँ और ऑफिस में ही लुढ़क गया हूँ। सपने में यह सब दिख रहा है।

Friday, December 1, 2017

तीसरी किताब: पैडल पैडल

आज हम बतायेंगे कि मेरी तीसरी किताब ‘पैडल पैडल’ की क्या हिस्ट्री रही और यह कैसे अस्तित्व में आयी।
पहली किताब छपी थी अप्रैल 2016 में, नाम था ‘लद्दाख में पैदल यात्राएँ’। उसी समय सोच लिया था और बहुत सारे मित्रों की भी इच्छा थी कि लद्दाख साइकिल यात्रा को भी पुस्तकाकार बनाना चाहिये। लद्दाख में साइकिल चलाना वाकई एक विशिष्ट अनुभव होता है और इसकी किताब भी अवश्य प्रकाशित होनी चाहिये। लेकिन जून 2016 में एवरेस्ट बेसकैंप की ट्रैकिंग कर ली और वहाँ से लौटकर उसके अनुभवों को लिखने में लग गया। वह मार्च 2017 में पूरी हुई और हिंदयुग्म प्रकाशन को भेज दी। मैं चाहता था कि अप्रैल में ही एवरेस्ट वाली किताब आ जाये, लेकिन तय हुआ कि यह किताब जुलाई 2017 में आयेगी।
अब मैं लगभग खाली था। ‘लद्दाख साइकिल यात्रा’ फिर से याद आयी। यह यात्रा पहले ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुकी थी। इसके शब्द गिने - लगभग 30000 मिले। इतने शब्दों में 200 पृष्ठों की किताब नहीं बन सकती। इसका अर्थ है कि शब्द बढ़ाने पड़ेंगे। और ऐसे कहने से ही शब्द नहीं बढ़ते। वो वृत्तांत चार साल पहले लिखा था। अब तक मेरी लेखन शैली में भी कुछ परिवर्तन आ चुका था। यह परिवर्तन पाठकों को महसूस नहीं होना चाहिये। ऐसा करते-करते अप्रैल भी निकल गया और मई, जून, जुलाई भी।