Skip to main content

टेढ़ा मन्दिर

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें
आज आपको टेढ़ा मंदिर के बारे में जानकारी देते हैं। यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में ज्वालामुखी के पास स्थित है। ज्वालामुखी के ज्वाला देवी मंदिर की बगल से ही इसके लिए रास्ता जाता है। ज्वाला जी से इसकी दूरी करीब दो किलोमीटर है। पूरा रास्ता ऊबड़-खाबड़ पत्थरों से युक्त चढ़ाई भरा है। खतरनाक डरावने सुनसान जंगल से होकर यह रास्ता जाता है।
...
यह मंदिर पिछले 104 सालों से टेढ़ा है। कहा जाता है कि वनवास काल के दौरान पांडवों ने इसका निर्माण कराया था। 1905 में कांगड़ा में एक भयानक भूकंप आया। इससे कांगड़ा का किला तो बिलकुल खंडहरों में तब्दील हो गया। भूकंप के ही प्रभाव से यह मंदिर भी एक तरफ को झुककर टेढ़ा हो गया। तभी से इसका नाम टेढ़ा मंदिर है। इसके अन्दर जाने पर डर लगता है कि कहीं यह गिर ना जाए।

...
अच्छा, अब अगली बार जब भी ज्वाला जी जाओगे, तो टेढ़ा मंदिर को जरूर देखना। ज्वाला जी जाने के लिए कांगड़ा, दिल्ली, चण्डीगढ़, शिमला, जालंधर व पठानकोट से नियमित बसें चलती हैं। निकटतम सुविधाजनक रेलवे स्टेशन ऊना व चण्डीगढ़ हैं। हवाई पट्टी गग्गल (कांगड़ा) में है।
(टेढ़ा मन्दिर। है ना वाकई टेढ़ा)
.
(मन्दिर के सामने बना बरामदा। बरामदा बाद में बना है, इसलिए सीधा है। मुख्य मन्दिर स्पष्ट टेढ़ा दिख रहा है।)
.
(शिवबाड़ी टेढ़ा मन्दिर से भी आगे है। मैं समयाभाव के कारण वहां तक नहीं जा पाया था।)
.
(ऊबड़-खाबड़ पथरीला रास्ता टेढ़ा मन्दिर जाने के लिए)
.
(रास्ते में करीब डेढ़ किलोमीटर पर यह आश्रम सा स्थित है। सुनसान जंगल में पीपल के पेड़ के नीचे चबूतरा। यहाँ पर सन्नाटा कानों को चुभता है।)


धर्मशाला कांगडा यात्रा श्रंखला
1. धर्मशाला यात्रा
2. मैक्लोडगंज- देश में विदेश का एहसास
3. दुर्गम और रोमांचक- त्रियुण्ड
4. कांगडा का किला
5. ज्वालामुखी- एक चमत्कारी शक्तिपीठ
6. टेढा मन्दिर

Comments

  1. वाह भाई नीरज, आपके साथ साथ हम भी यात्रा कर लेते हैं मुफ़्त मे, आभार

    ReplyDelete
  2. टेढा़ है पर मंदिर है ये..


    कहां घूमा मुसाफिर वाले नक्शे में लाल से लगता है कि नक्सली एरिया है.. :)

    ReplyDelete
  3. घुमक्कडी जिन्दाबाद

    प्रणाम

    ReplyDelete
  4. ऐसे तो शायद कभी न जाते टेढ़ा मंदिर..आपके बहाने दर्शन हो गये. बहुत आभार.

    ReplyDelete
  5. दुनिया पीसा की झुकी मीनार के ही गुण गाती रहती है जबकि अपने देश में एक अनजान जगह पर भी अजूबे की तरह खड़ा है टेड़ा मंदिर...टेड़ा है पर मेरा है...:)) इस ग़ज़ब की जानकारी के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद....
    नीरज

    ReplyDelete
  6. बढ़िया जानकारी दी।आभार।

    ReplyDelete
  7. ओडिशा में भी सम्बलपुर के पास "धूमाँ" नाम की जगह है. वहाँ भी ऐसे कई मंदिर हैं. बिलकुल झुकी हुई...
    ऐसा लगता है की मंदिर बस अब गिरी की तब...
    यह मंदिर सम्बलपुर से ३० किलोमीटर की दुरी पैर दक्षिण की और है, महानदी के किनारे ही, वहीँ नदी के बीच टापू पैर भी शिव जी का एक मंदिर है. इसी रस्ते में कहीं महात्मा गाँधी जी का भारत का इकलौता मंदिर है..

    ReplyDelete
  8. इस मंदिर के बारे में पहली बार सुना

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

मुगलसराय से गोमो पैसेंजर ट्रेन यात्रा

दिल्ली से मुगलसराय 1 सितम्बर 2014, सोमवार सितम्बर की पहली तारीख को मेरी नंदन कानन एक्सप्रेस छूट गई। सुबह साढे छह बजे नई दिल्ली से ट्रेन थी और मुझे ऑफिस में ही सवा छह बज गये थे। फिर नई दिल्ली जाने की कोशिश भी नहीं की और सीधा कमरे पर आ गया। इस बार मुझे मुगलसराय से हावडा को अपने पैसेंजर ट्रेन के नक्शे में जोडना था। ऐसा करने से दिल्ली और हावडा भी जुड जाते। दिल्ली-मुम्बई पहले ही जुडे हुए हैं। पहले भी हावडा की तरफ जाने की कोशिश की थी लेकिन पीछे हटना पडता था। इसका कारण था कि भारत के इस हिस्से में ट्रेनें बहुत लेट हो जाती हैं। चूंकि स्टेशनों के फोटो भी खींचने पडते थे, इसलिये सफर दिन में ही कर सकता था। इस तरह मुगलसराय से पहले दिन चलकर गोमो तक जा सकता था और दूसरे दिन हावडा तक। हावडा से वापस दिल्ली आने के लिये वैसे तो बहुत ट्रेनें हैं लेकिन शाम को ऐसी कोई ट्रेन नहीं थी जिससे मैं अगले दिन दोपहर दो बजे से पहले दिल्ली आ सकूं। थी भी तो कोई भरोसे की नहीं थी सिवाय राजधानी के। राजधानी ट्रेनें बहुत महंगी होती हैं, इसलिये मैं इन्हें ज्यादा पसन्द नहीं करता।

डायरी के पन्ने- 12

[डायरी के पन्ने हर महीने की पहली व सोलह तारीख को छपते हैं।] 18 अगस्त 2013, रविवार 1. पिछले दो तीन दिनों से अमित का परिवार आया हुआ है। साथ में दो सालियां भी हैं। जमकर मन लग रहा था कि आज उनके जाने का फरमान आ गया। हर एक से पूछा कि अगली बार कब आओगी, किसी ने ढंग का उत्तर नहीं दिया। साढे दस वाली ट्रेन से वे चले गये। 2. अमन साहब का फोन आया कि वे दिल्ली आ चुके हैं और कल हमारे यहां आयेंगे। अमन बोकारो के रहने वाले हैं और हमारी फोन पर हर दूसरे तीसरे दिन हालचाल पूछने के बहाने बातचीत होती रहती है। आज मेरी नाइट ड्यूटी है, तो कल पूरे दिन खाली रहूंगा। कह दिया कि पूरे दिन किसी भी समय आ धमको।

मेरा नौकरीपेशा जीवन-1

कुछ समय के लिये घुमक्कडी से फुरसत मिली तो आज याद कर रहा हूं अपने नौकरीपेशा जीवन के बारे में। कितना उतार-चढाव भरा रहा वो समय! बल्कि उतार ही ज्यादा कहना चाहिये। जून 2007 में मैकेनिकल से डिप्लोमा करने के बाद मैं इंजीनियर कहलाने का अधिकारी हो गया- जूनियर इंजीनियर। मई में जब प्रैक्टिकल हो रहे थे, तभी से कई कम्पनियां ताजे ताजे इंजिनियरों को लेने कॉलेज आने लगी। गाजियाबाद की प्रतिष्ठित श्रीराम पिस्टन की शर्त होती है कि इंजिनियर ने इण्टर भी कर रखी हो। इस मामले में मैं दसवीं पास होने की वजह से उसका इंटरव्यू नहीं दे पाया था। लेकिन इसका फायदा यह हुआ कि वे सबसे पहले आये और टॉपर्स को छांट-छांटकर ले गये। अब मुझे टॉपर्स से कम्पटीशन नहीं करना था। फिर आई दो और कम्पनियां- नोयडा से डेकी इलेक्ट्रोनिक्स और कानपुर से लोहिया स्टारलिंगर लिमिटेड। कानपुर वाले बल्कि आये नहीं, उन्होंने कॉलेज में न्योता भेज दिया कि दस लडके इधर भेज दो, हम नापतौल करेंगे और एक को ही रखेंगे। दस लडकों में मेरा भी नाम था। मेरठ से कानपुर जाने के लिये सभी के साथ साथ मैंने भी संगम एक्सप्रेस से रिजर्वेशन करा लिया।