Thursday, April 27, 2017

गुजरात मीटरगेज ट्रेन यात्रा: बोटाद से गांधीग्राम

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18 मार्च 2017
पहले तो योजना थी कि आज पूरे दिन भावनगर में रुकूँगा और विमलेश जी जहाँ ले जायेंगे, जाऊँगा। उन्होंने मेरे लिये बड़ी-बड़ी योजनाएँ बना रखी थीं और रेलवे के कारखाने में मेरे एक लेक्चर की भी प्लानिंग थी। लेकिन जब मुझे पता चला कि आंबलियासन से विजापुर वाली मीटरगेज की लाइन चालू है और उस पर रेलबस भी चलती है, तो मेरा मन बदल गया। अगर इस बार उस लाइन पर यात्रा नहीं की तो पता नहीं कब इधर आना हो और कौन जाने तब तक वो लाइन बंद भी हो जाये। विजापुर से आदरज मोटी, कलोल से महेसाणा और अहमदाबाद से खेड़ब्रह्म वाली लाइनें पहले ही बंद हो चुकी हैं। गेज परिवर्तन का कार्य जोरों पर चल रहा है।
यही बात विमलेश जी को बतायी तो वे इसके लिये तुरंत राज़ी हो गये। तय हुआ कि आज बोटाद से अहमदाबाद तक यात्रा करूँगा और कल आंबलियासन से विजापुर। बोटाद से अहमदाबाद जाने के लिये दो बजे वाली ट्रेन पकडूँगा और यहाँ भावनगर से बोटाद के लिये साढ़े ग्यारह वाली। यानी आज साढ़े ग्यारह बजे तक हमारे पास समय रहेगा विमलेश जी के कारखाने में घूमने का। बाइक उठायी और निकल पड़े।



भावनगर परा पश्चिम रेलवे की एक डिवीजन है और जहाँ भी डिवीजन होती है, वहाँ बहुत बड़े इलाके में रेलवे का ही वर्चस्व होता है। बड़े-बड़े अधिकारियों के क्वार्टर होते हैं, खाली सड़कें होती हैं, चौराहे होते हैं, पार्क होते हैं। और इन्हीं में पुराने ज़माने के इंजन आदि रखे होते हैं। एक पार्क में ऐसे ही दो-तीन इंजन रखे थे। मुझे पुराने इंजनों की पहचान नहीं है और न ही उनकी खूबियों की जानकारी है, इसलिये ये सिवाय फोटो खिंचवाने के मेरे किसी काम के नहीं थे।
मीटरगेज का एक बंद पड़ा कारखाना भी है। जब भावनगर में मीटरगेज का नेटवर्क था तो यह कारखाना चालू रहता था और हज़ारों लोग यहाँ काम करते थे। आज केवल कबाड़घर ही बना हुआ है।
आख़िर में पहुँचे भावनगर परा रेलवे स्टेशन के ठीक सामने बने रेलडिब्बा कारखाने में। विमलेश जी इस कारखाने के लगभग सबसे बड़े अधिकारी हैं - सहायक कारखाना प्रबंधक। इत्मीनान से पूरा कारखाना दिखाया। यहाँ ट्रेनों के डिब्बों की ओवरहॉलिंग और मरम्मत होती है। प्रत्येक डेढ़ साल में प्रत्येक डिब्बे की ओवरहॉलिंग होनी आवश्यक है। देशभर में पचास हज़ार से ज्यादा डिब्बे हैं और सभी की ओवरहॉलिंग होती है। इतनी मात्रा को हैंडल करने के लिये पर्याप्त कारखाने नहीं हैं, इसलिये प्रत्येक कारखाने पर काम का भारी दबाव रहता है। यह दबाव यहाँ भी दिखायी दिया।
वरिष्ठ इंजीनियरों व अधिकारियों के साथ छोटा-सा परिचय हुआ। सारा परिचय विमलेश जी ने ही दिया, मुझे कुछ नहीं बोलना पड़ा। इतने लोगों के सामने मुझे बोलने में असहजता होती है।
और साढ़े ग्यारह बजे सुरेंद्रनगर जाने वाली पैसेंजर पकड़ ली।
सोनगढ़ में भावनगर-कोचुवेली एक्सप्रेस का क्रोसिंग।
विमलेश जी के यहाँ से पेट भरकर नहीं चलना चाहिए था। बाहर लू चल रही है। पानी पर पानी पीये जा रहा हूँ। प्यास फिर भी नहीं मिट रही। पेट फटने को हो रहा है।
धोला जंक्शन। ये कौन सी ट्रेन आ रही है सामने से? उठने का मन तो नहीं है, लेकिन उठना पड़ेगा। अब जब शौक ही ऐसे पाल लिए हैं तो धूप, लू सब बर्दाश्त करनी पड़ेगी।
लेकिन मेरा यह काम उदघोषिका ने कर दिया। टणैन... कृपया ध्यान दीजिये... सुरेन्द्रनगर-भावनगर पैसेंजर... और मुझे पता चल गया कि यह कौन-सी ट्रेन है। उठकर देखने का झंझट ख़त्म। लेकिन ऐसे थोड़े ही झंझट ख़त्म होते हैं? मुझे दूर से ही इसमें एक वातानुकूलित डिब्बा दिख गया। मतलब इस ट्रेन में दिल्ली से आने वाले डिब्बे भी जुड़े हुए हैं। अब तो उठकर देखना पड़ेगा। एक थर्ड ए.सी., चार शयनयान और एक एस.एल.आर. - ये छह डिब्बे सराय रोहिल्ला से आये हैं। इनके पीछे भावनगर पैसेंजर के आठ-दस साधारण डिब्बे तो हैं ही। प्रत्येक शुक्रवार को दोपहर बाद एक बजे दिल्ली सराय रोहिल्ला से एक ट्रेन चलती है - राजकोट एक्सप्रेस। इसमें कुछ डिब्बे भावनगर वाले भी होते हैं। सुरेंद्रनगर में ये डिब्बे अलग हो जाते हैं। राजकोट एक्सप्रेस राजकोट चली जाती है और भावनगर वाले डिब्बों को पैसेंजर में जोड़कर भावनगर लाया जाता है।
सीहोर जंक्शन से एक लाइन पालिताना जाती है। पालिताना जैन धर्म का एक बड़ा तीर्थ है। पहले यहाँ के लिये कुछ पैसेंजर ट्रेनें केवल भावनगर से ही चला करती थीं, लेकिन अब मुंबई के बांद्रा टर्मिनस से भी एक एक्सप्रेस ट्रेन चलने लगी है।
धोला जंक्शन से एक लाइन ढसा होते हुए महुवा जाती है। उधर ही कहीं पिपावाव पोर्ट है, जहाँ से मालगाड़ियों का आवागमन होता है। एक वातानुकूलित मालगाड़ी आयी, जिसमें दवाईयाँ आदि लदी होंगी और ये कहीं विदेश जायेंगी। एक डबल स्टैक कंटेनर वाली मालगाड़ी भी खड़ी थी। भारतीय रेलवे को माल ढुलाई से ही कमाई होती है, इसलिये मालगाड़ी कॉरीडोर बनाना आवश्यक था। अच्छी बात यह है कि मालगाड़ी कॉरीडोर का काम तेजी से चल रहा है। जैसे-जैसे यह ऑपरेशनल होता जायेगा, माल ढुलाई और तेजी से होने लगेगी तथा यात्री गाड़ियाँ भी समय से चलने लगेंगी।
बोटाद में गांधीग्राम जाने वाली मीटरगेज की ट्रेन तैयार खड़ी थी। मीटरगेज की ट्रेन भावनगर से आने वाली ब्रॉड़गेज की ट्रेन के आने के बाद ही प्रस्थान करती है, इसलिये बहुत से यात्री इस बात को जानते हैं। ये यात्री जल्दी मीटरगेज की ट्रेन में जा चढ़े। बहुत लंबी ट्रेन थी। गुजरात में इससे लंबी कोई मीटरगेज की ट्रेन नहीं चलती। दिनभर में पाँच जोड़ी ट्रेनें चलती हैं। इसका अर्थ है कि इस मार्ग पर यात्रीभार काफ़ी अच्छा है।
बोटाद में एक सीनियर सेक्शन इंजीयर मिले। जाते ही कोल्ड़ ड्रिंक और नमकीन परोस दीं। पेट पहले ही बहुत भरा था। लेकिन गर्मी में कोल्ड़ ड्रिंक पीने में आनंद आ गया।
सारंगपुर रोड़ और जलीला रोड़ के बाद चंदरवा एक सर्विस हाल्ट है। यहाँ प्लेटफार्म है, दोनों और साफ सुथरे स्टेशन बोर्ड हैं और टूटी फूटी इमारत है। लेकिन टिकट लेने का इंतजाम नहीं है। कुल मिलाकर यह एक टेक्नीकल हाल्ट है। केवल रेलकर्मियों के लिए ही गाडी यहाँ रुकती है।
धुंधका में गार्ड के डिब्बे में 'टिकट काउंटर' चढ़ा दिया गया। अब अगले एक दो स्टेशनों पर गार्ड ही टिकट बाँटेगा। रायका में किसी ने टिकट नहीं लिया। एक दो ही यात्री चढ़े। गार्ड को इससे कोई परेशानी नहीं कि रायका वालों ने टिकट नहीं लिए। इससे रायका का ही नुकसान है। रेलवे के पास लगातार इस बात की जानकारी रहती है कि किस स्टेशन से कितने टिकट बिके। अब जब रायका जैसे स्टेशनों से एक भी टिकट नहीं बिकेगा या महीने में नगण्य टिकट बिकेंगे तो ऐसे स्टेशनों पर ट्रेन का ठहराव स्थायी रूप से बंद कर दिया जायेगा।
अगले स्टेशन धोली भाल पर अच्छी बिक्री हुई। शायद 200 रुपये से ज्यादा ही बिक्री हुई होगी।
रायका स्टेशन खतरे में है। शायद गेज परिवर्तन के बाद इसे बंद न कर दिया जाये। धोली भाल को कोई ख़तरा नहीं।
लोलिया स्टेशन पर गार्ड ने ही आवाज लगायी कि आ जाओ, टिकट ले लो। ट्रेन में चढ़ते-चढ़ते कुछ यात्री नीचे उतरे और टिकट लिए।
लोलिया और लोथल भुरकी के बीच में एक जलधारा है। इसे मैं समुद्र का ही हिस्सा कहूँगा। इसी के किनारे प्रसिद्द हड़प्पा कालीन नगर लोथल बसा है। कच्छ के छोटे रन से यह जलधारा आती है और खम्भात की खाड़ी में मिल जाती है। इस तरह देखा जाए तो सौराष्ट्र एक द्वीप है। इस जलधारा को पार करके हम मुख्यभूमि में पहुँच जाते हैं।
चार गुजराती बैठे बातें कर रहे थे - गुजराती में। मुझे छे, छूँ समेत एकाध शब्द को छोड़कर कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। अचानक सब समझ में आने लगा। मैं हैरान कि यह क्या हो गया। क्या मुझे गुजराती आ गयी? जब मैं आत्मविमुग्ध होकर झाड़ पर चढ़ने लगा तो ध्यान गया कि वे हिंदी बोलने लगे थे। गुजराती लोग आपस में हिंदी में? एक हिंदी में बोलता, दूसरा गुजराती में, फिर पहला गुजराती में, तीसरा हिंदी में। गुजराती-हिंदी की खिचड़ी बन गयी। किसी की आलोचना कर रहे थे और निंदारस का भरपूर आनंद ले रहे थे।
एक कोने में एक चने बेचने वाला बैठा था - अपने टोकरे को पास रखकर। थोड़ी देर में पानी की थैलियाँ बेचने वाला भी आ बैठा। फिर दूसरा चने वाला, तीसरा चने वाला और दूसरा पानी वाला - कुल मिलकर पाँच। नींबू प्याज की खुशबू से कोना महक उठा। 40-50 किमी तक वहीं बैठे रहे, खुद ही चनादाल बनाकर खाते रहे और पानी पीते रहे। मेरा बड़ा मन था इनके साथ बैठूँ और उनकी जिन्दगी में झाँकूँ। लेकिन मैं केवल दर्शक ही बना रहा। सोचता रहा कि हमारे जैसे ही दिखने वाले ये लोग कौन हैं। अपने अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं। बच्चों के भविष्य के सपने देख रहे हैं।
मैं बातचीत नहीं कर पाता किसी से भी। बस देखता रहता हूँ। कल्पना करता रहता हूँ कि उनकी जगह अगर मैं होता तो? सिहर उठता हूँ। कितनी मुश्किल जिन्दगी होती! अच्छा हुआ कि फैशनपरस्त लोगों ने फटी जींस को फैशन बना दिया है। ये लोग भी फैशनपरस्त हो गए।
और अब आप कहेंगे कि ये लोग जिन्दगी के मजे ले रहे हैं। मजे-वजे कुछ ना ले रहे, कठोर संघर्ष कर रहे हैं। सुबह से न जाने कितनी ट्रेनों में कितने डिब्बों में कितना किलोमीटर चल चुके होंगे। एक ही डिब्बे में अगर दो टोकरे वाले भी चढ़ जाते हैं तो इनकी आपस में लड़ाई भी हो जाती है। फिर भी जब तक यहाँ कोने में बैठे रहे, मुस्कुराते और एक-दूसरे को छेड़ते रहे।
आखिरकार 60 किलोमीटर तक बैठे रहने के बाद धोलका में ये सब उतर गए। यहाँ गांधीग्राम से आती ट्रेन का क्रासिंग था, अब ये वापस बोटाद चले जायेंगे। जाते-जाते मुझे एक कप चाय भी पिलाते गए। इन 60 किलोमीटर में ये अच्छी तरह जान गए थे कि एक परदेसी भी इस ट्रेन में लगभग इन्हीं के बीच यात्रा कर रहा है।
सब अपनी-अपनी जिन्दगी जी रहे हैं।
एक स्टेशन मिला बावला। उधर बड़ौत के पास बावली स्टेशन है। रेवाड़ी के पास बावल है। कहीं बवाल भी होगा।
गांधीग्राम स्टेशन पर नवरोज़ हुड़ा मिले। यात्रा पर आने से काफ़ी दिन पहले ही उन्होंने यह कहकर मुझे चौंका दिया था कि गुजरात आ रहे हो। मैंने केवल विमलेश जी के अलावा किसी को भी इस यात्रा के बारे में नहीं बताया था। मैं आश्चर्यचकित रह गया - आपको कैसे पता? बोले - विमलेश जी ने बताया। नवरोज़ भी भावनगर के हैं। एक दिन विमलेश जी से मिले तो मेरी यात्रा की जानकारी नवरोज़ को मिल गयी। आज गांधीग्राम ही आ गये। कालूपुर तक साथ जायेंगे। अहमदाबाद स्टेशन को कालूपुर भी कहते हैं। बाइक से चल दिये। गांधीग्राम से कालूपुर तक भारी ट्रैफिक में केवल एक ही व्यक्ति के सिर पर हैलमेट रखा दिखा और वो सिर था नवरोज़ का। बस कॉरीडोर में ऑटो वाले और बाइक वाले भी घुस जाते। इन्हें रोकने के लिये पुलिसवाले भी बैठे थे, लेकिन फिर भी इन लोगों को बस कॉरीडोर में नहीं चलना चाहिये। दिल्ली में यह योजना सफल नहीं हो सकी। अहमदाबाद में सफल हो गयी है। आप कभी सिटी बस में यात्रा करोगे और आपकी बस जाम में फँसेगी तो आप ही गाली देने वालों में सर्वप्रथम रहोगे। लेकिन नवरोज़ ने बस लेन में बाइक नहीं चलायी। हम सबको नवरोज़ जैसा होना चाहिये।
अहमदाबाद से महेसाणा जाने के लिए चार ट्रेनें थीं। जब मैं गांधीग्राम भी नहीं पहुँचा था, आश्रम निकल गयी। जब गांधीग्राम पहुँचा और नवरोज़ की बाइक पर अहमदाबाद के 'हेलमेटलेस' मोटरसाइकिल सवारों के बीच चले जा रहे थे, पाटन डेमू निकल गयी। टिकट लिया तो प्लेटफार्म तीन पर हमसफ़र खड़ी थी। पूरी वातानुकूलित गाडी भी मेरे काम की नहीं। बची विवेक एक्सप्रेस, एकमात्र यही काम आयी। जनरल डिब्बों में भीड़ थी, लेकिन सब अहमदाबाद उतर गए।
नवरोज़ से काफ़ी बातें हुईं। उनकी पढ़ाई के बारे में, कैरियर के बारे में, घर-परिवार के बारे में। उन्होंने पूछा - गुजरात में आपको क्या चीज अच्छी लगी? मैंने कहा - मुसलमानों का रहन-सहन। दूसरे राज्यों में मुसलमानों की बस्तियाँ आसानी से पहचानी जा सकती हैं। छोटे-छोटे फटे हुए पर्दे लगे गंदे घर, घरों के सामने गंदा नाला बन चुका रास्ता और बकरियाँ। लेकिन गुजरात में केवल टोपी से ही मुसलमान पहचाने जा सकते हैं। नवरोज़ ने बताया कि वे भी मुसलमान हैं - इस्माईली मुसलमान। मैंने कहीं पढ़ा था कि इन्हें ‘खोजा’ भी कहते हैं और आम मुसलमान इन्हें मुसलमान ही नहीं मानते। क्योंकि ये दूसरे धर्मों के प्रति समभाव रखते हैं और उनके कुछ रीति-रिवाज़ भी मानते हैं। नवरोज़ भाई ने बताया कि ये लोग अपने नाम के साथ हिंदू नाम भी लगाते हैं, जैसे अज़ीम प्रेमजी।
जब तक विवेक एक्सप्रेस सरकने नहीं लगी, यहीं खड़े होकर नवरोज़ से बातचीत होती रही। बड़ा अच्छा लगा।
एक यात्री को दिल्ली जाना था। वह चिंतित था कि कैसे जाये। एक ने सलाह दी कि सुबह चार बजे जोधपुर उतर जाना। दूसरे ने सलाह दी कि जयपुर उतरना। तीसरे ने कहा अजमेर उतरना, चौथे ने मारवाड़। एक ने तो उसे इसी ट्रेन में ‘गुडगाँव की सीमा’ तक जाने का सुझाव दिया। अता-पता किसी को हो न हो, लेकिन सलाह सब देते हैं। केवल एक को छोड़कर। हाँ जी, सही पहचाना। जाटराम आसानी से सलाह नहीं दिया करता।
उस यात्री के पास इतनी सलाहें आ रहीं, सब बेकार थीं। वो भी समझ रहा होगा कि सब कबाड़ सलाहें हैं। तो मेरी सलाह भी कबाड़ में फेंक दी जाती। फिर भी अगर उसके स्थान पर मैं होता तो दो विकल्पों में से एक को अपनाता। प्राथमिकता होती पालनपुर से आला हज़रत पकड़ने की। और अगर समय की तंगी न होती तो इस ट्रेन से सादुलपुर उतरता। यह ट्रेन न अजमेर जाती है और न जयपुर और न ‘गुड़गाँव की सीमा’ तक। मैं चुप बैठा रहा और धीरे-धीरे सलाहें देने वाले भी चुप हो गए।
समाज को आज के ज़माने में मेरे जैसे दर्शकों और श्रावकों की ज्यादा आवश्यकता है। हीहीही।
महेसाणा में जब नहाने लगा तो फव्वारे के नीचे नहाने का मन करने लगा। फव्वारे की टोंटी को जैसे ही पकड़कर घुमाया तो नरम नरम सा कुछ लगा और बाथरूम में बड़े जोर की चींचींचीं की आवाज गूँज उठी। देखा टोंटी पर छिपकली थी और मैंने उसे भी घुमा दिया था। छोड़ते ही वह नीचे कूदी और बाल्टी के पीछे जा छुपी।
यकीन कर लिया आपने इस कहानी पर? कहानी तो सच्ची है, लेकिन इसमें एक पेंच है। चलिए, दोबारा बताता हूँ। तो छिपकली ने चींचींचीं की आवाज की। बस, यही पेंच है। एकाध ही मित्र समझे होंगे, बाकी ज्यादातर नहीं समझे होंगे। छिपकली इस तरह पकड़े जाने पर, चोटिल होने पर या खतरे में होने पर आवाज़ नहीं करती है। यह केवल तभी आवाज़ निकालती है, जब मिलन-काल चल रहा हो। वो भी मामूली ठक-ठक जैसी। आप सोचेंगे कोई पडोसी ठोकापीटी कर रहा होगा।


एक पार्क के अंदर





बंद हो चुके मीटरगेज कारखाने का इतिहास


वर्तमान ब्रॉड़गेज कारखाना





साला मैं तो साहब बन गया..

धोला स्टेशन पर डबल स्टैक कंटेनर ट्रेन... यानी डबल डेकर मालगाड़ी

मीटरगेज की ट्रेन बोटाद से निकलते हुए...


ब्रॉड़गेज का काम तेजी से चल रहा है और उम्मीद है कि इसी साल में इसे बंद कर दिया जायेगा।


धोली भाल स्टेशन

ट्रेन खाड़ी क्षेत्र को पार करती हुई...

छोटे रन और खंभात की खाड़ी को जोड़ने वाले प्राचीन समुद्रीय क्षेत्र में ब्रॉड़गेज के लिये पुल का निर्माण





धोलका स्टेशन


धोलका में गांधीग्राम से आने वाली ट्रेन का क्रॉसिंग था और अच्छी-खासी भीड़ थी।












13 comments:

  1. नीरज जी आप हमारे यहाँ आए यह मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य था। आप से मिलने के पहले आप से जुड़ी बहुत सारी कल्पनाएं बनती बिगड़ती रहीं। फिलहाल मुलाक़ात हुई। बहुत अच्छा लगा। सोंच; विचार और रुचि एक जैसे हों तो घनिष्टा बढ़नी ही थी। ज्यादा तो क्या कहूँ;जो थोड़ा बहुत कहना था। वह 20 मार्च के आप के पोस्ट के कमेन्ट में विस्तार से लिख चुका हूँ। कुल मिला कर आप के साथ विताए गए बारह चौदह घंटे समय बहुत खूब सूरत और गौरव भरे पल रहे।

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    1. मेरे लिये भी आपसे मिलना बहुत अच्छा रहा... आपका बहुत बहुत धन्यवाद सर...

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  2. जहां तक इस पोस्ट की बात है। बहुत गहराई और बारीकी से ये जानकारी दिये है जिसके बारे में शायद ही किसी को पता हो। सब कुछ एक टेली फिल्म की तरह लगा जो मन की गहराई में अपना छाप छोड़ गया। स्टेशन और ट्रेन फोटो, सहयात्री, थोड़ी सी सामाजिक चर्चा , भौगोलिक जानकारी सब कुछ जोरदार और रोचक लगा।

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  3. मज़ा आ गया। अनजाने लोगों से बातचीत करने में मेरा भी हाथ थोड़ा तंग है। मेरे कुछ मित्र इस काम को आसानी से कर लेते हैं। बाकी मुझे भी सुनना अच्छा लगता है। और अगर किसी में विषय में पता न हो या कंफ्यूजन हो तो गलत सलाह की जगह माफ़ी मांग लेने में ही भलाई होती है। आपने तो पता होते हुए भी नहीं बताया लेकिन आपका तर्क भी सही था। वृत्तांत पढ़कर मज़ा आया। छिपकली के विषय में तो हम बचपन से सुनते आये थे कि खतरे में वो अपनी पूँछ ही छोड़कर भाग लेती है, ये खटखट वाली बात पहले पता चली। अब कोई खटखट होगी तो पता रहेगा क्या हो रहा है। हा हा

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    1. आपका बहुत बहुत धन्यवाद विकास जी...

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  4. बहुत बढ़िया लेख नीरज भाई, लेख के माध्यम से आपने ट्रेन में बैठे फेरी वालों का सजीव सा चित्रण किया है वाकई पढ़कर मज़ा आ गया ! एक और बात जो मजेदार लगी वो ये थी "अचानक सब समझ में आने लगा। मैं हैरान कि यह क्या हो गया। क्या मुझे गुजराती आ गयी?" !

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    1. धन्यवाद प्रदीप भाई... इसी तरह उत्साह बढ़ाते रहिये...

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  5. यह डबल स्टॅक कंटैनेर वाली ट्रेन का इंजिन EMD का WDG 5 लग रहा है , आजकल ALCO के इंजिन दिखना दुर्लभ हो गए हैं

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  6. नीरज जी आप तो रेलवे वाले हो कृपया एक यात्रा स्न्समरण डिजल लोकोमोटिव वर्क्स वाराणसी और कोलकाता के चितरंजन लोकोमोटिव वर्क्स का भी लिखिए , सभी को पसंद आएगा यह

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    1. धन्यवाद चिन्मय जी... लेकिन मैं रेलवे वाला नहीं हूँ... मैं दिल्ली मेट्रो में कार्यरत हूँ... दोनों अलग-अलग विभाग हैं... और सभी रेल यात्राएँ अपने खर्चे से करता हूँ... हाँ, कभी मौका मिलेगा तो DLW और CLW में अवश्य भ्रमण करूँगा...

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  7. ये विवेक एक्सप्रेस का बड़ा लोचा है यार, एक ही नाम की चार जोड़ी ट्रेनें चलाने का क्या औचित्य है।

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    1. जिस तरह शताब्दी और राजधानी एक्सप्रेस चलती हैं.... उसी तरह विवेक एक्सप्रेस की भी चेन है... ये ट्रेनें स्वामी विवेकानंद की 150वीं जयंती पर आरंभ की गयी थीं...

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