Monday, November 3, 2014

पटना से दिल्ली ट्रेन यात्रा

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4 सितम्बर 2014 की सुबह सुबह उजाला होने से पहले मैंने पटना स्टेशन पर कदम रखा। हालांकि पहले भी एक बार पटना से होकर गुजर चुका हूं लेकिन तब रात होने के कारण नीचे नहीं उतरा था। आज मुझे पटना से मुगलसराय तक लोकल ट्रेन से यात्रा करनी है।
इधर आने से पहले एक मित्र ने बताया था कि स्टेशन के सामने ही महावीर जी यानी हनुमान जी का बडा भव्य मन्दिर है। वहां के लड्डू बडे स्वादिष्ट होते हैं। एक बार लेकर चखना जरूर। अब जब मैं यहां आ गया तो लड्डू लेना तो बनता था, लेकिन मैंने नहीं लिये। हालांकि मन्दिर वास्तव में भव्य है।
सीधे मुगलसराय का पैसेंजर का टिकट ले लिया। बक्सर में ट्रेन बदलनी पडेगी। पटना से बक्सर के लिये पहली लोकल सुबह पांच बजकर चालीस मिनट पर चलती है। लेकिन यह सभी स्टेशनों पर नहीं रुकती। फिर पांच से छह बजे तक उजाला भी नहीं होता, इसलिये इसे छोड दिया। अगली ट्रेन सात चालीस पर है। यह ग्यारह बजकर पांच मिनट पर बक्सर पहुंचेगी और वहां से मुगलसराय की लोकल साढे ग्यारह बजे है। पटना-बक्सर लोकल का नम्बर 63227 है जबकि बक्सर-मुगलसराय का नम्बर 63229 है। इससे पता चलता है कि पटना-बक्सर लोकल ही आगे मुगलसराय तक जायेगी। मुझे ट्रेन नहीं बदलनी पडेगी।

मैं अपने पसन्दीदा यानी सबसे पीछे वाले डिब्बे में जा बैठा। यह एक मेमू ट्रेन थी। मेमू ट्रेनों में 3x3 की सीटिंग होती है। अगर मैं खिडकी के पास वाली किसी सीट पर बैठ जाता हूं और बाद में कोई प्लेटफार्म दूसरी दिशा में आ जायेगा तो या तो मुझे फोटो खींचने के लिये सीट छोडनी पडेगी, या फिर फोटो से वंचित रहना पडेगा। इसलिये मेमू ट्रेनों में मैं सीट पर नहीं बैठता हूं। खिडकी पर ही खडा रहता हूं। कल पूरे दिन मेमू ट्रेनों में ही घूमा था, आज फिर से मेमू; भयंकर थकान हो जाती है। कभी कभी लगता है कि अब के बाद पैसेंजर यात्रा बन्द।
भीड तो पटना में ही हो गई थी। ऐसा अक्सर होता नहीं है कि बडे शहरों से दैनिक यात्री जिनमें ज्यादातर नौकरीपेशा व छात्र होते हैं, सुबह सुबह बाहर जाते हों। इस समय तो बाहर गांव देहात के लोग बडे शहरों में आते हैं और शाम को चले जाते हैं। लेकिन यहां मामला उल्टा था। पटना में ही गाडी भर गई। उधर इस समय जो लोकल ट्रेनें दूर से पटना आ रही हैं, वे भी बुरी तरह भरी होंगी।
पहला स्टेशन है- सचिवालय हाल्ट, फिर फुलवारी शरीफ। फुलवारी शरीफ में इतनी भीड हो गई कि फोटो खींचना असम्भव हो गया। हालांकि अब सोचता हूं तो लगता है कि मैं फोटो खींच सकता था। लेकिन वास्तव में जबरदस्त भीड थी। इनमें भी ज्यादातर कॉलेज के छात्र। छात्रों से मैं दूर ही रहता हूं।
मेरा लक्ष्य ही स्टेशनों के फोटो खींचना था। लेकिन भीड के कारण मैं ऐसा नहीं कर पा रहा था। एक स्टेशन छूट गया, आगे से ऐसा न हो इसलिये मैं दूसरी खिडकी पर जा खडा हुआ। यह लाइन दोहरी है। कोई भी स्टेशन आयेगा, दोनों तरफ प्लेटफार्म होंगे। अभी तक मैं बायी तरफ था, अब दाहिनी तरफ आ गया। इससे फायदा यह होगा कि किसी स्टेशन पर ट्रेन रुकी होगी तो सामने वाला प्लेटफार्म मेरी नजरों के सामने होगा और मैं हल्का सा जूम करके स्टेशन बोर्ड का फोटो ले सकता हूं। अगर कहीं ‘आइलैण्ड’ प्लेटफार्म आयेगा, तब भी मुझे ही फायदा होगा। और वास्तव में यह तरकीब काम आई। इसके बाद हर स्टेशन का फोटो खींचा।
जब फुलवारी शरीफ पर खडे थे तो दानापुर जाने वाली साउथ बिहार एक्सप्रेस आगे निकल गई। फिर जब यह लोकल ट्रेन दानापुर पहुंची तो साउथ बिहार एक्सप्रेस आउटर पर खडी मिली और लोकल धडधडाती हुई आगे निकल गई।
दानापुर से आगे के स्टेशन हैं- नेऊरा, गांधी हाल्ट, सदीसोपुर, पटेल हाल्ट, बिहटा, पाली हाल्ट, कोइलवर, कुल्हाडिया, जमीरा हाल्ट, आरा, जगजीवन हाल्ट, महतबनिया हाल्ट, कारीसाथ, कौडिया हाल्ट, सर्वोदय हाल्ट, रामानन्द तिवारी हाल्ट, बिहिया, अमर शहीद जगदेव प्रसाद हाल्ट, बनाही, सिकरिया हाल्ट, रघुनाथपुर, वीर कुंवर सिंह धरौली हाल्ट, टुडीगंज, वी वी गिरी हाल्ट, डुमरांव, कुशलपुर हरनाहा हाल्ट, बरुना, नदांव, बक्सर।
जैसा कि दिख ही रहा है कि कई स्टेशन बडे अनोखे नाम वाले हैं- गांधी, पटेल, वी वी गिरी आदि। ये सभी हाल्ट हैं। हाल्ट अर्थात लोकल ट्रेनों के लिये- रुको और जाओ। ट्रेनों को प्रस्थान करने के लिये हरे सिग्नल की जरुरत नहीं है। जैसे ही सभी सवारियां उतरीं-चढी, गार्ड क्लियरेंस दे देता है और गाडी आगे बढ जाती है। एक स्थानीय से पता चला कि पहले ये हाल्ट स्टेशन नहीं थे। स्थानीय यात्री अपने गांवों के सामने ट्रेन की चेन खींच देते थे और उतर जाते थे। इससे ट्रेनें लेट हो जाती थीं। तत्कालीन रेलमन्त्री लालू प्रसाद ने ऐसे कुछ स्थानों की पहचान करवाकर उन्हें हाल्ट बना दिया। अब लोकल ट्रेनें यहां आधिकारिक रूप से रुकने लगीं।
एक स्टेशन है- टुडीगंज। इसे अंग्रेजी में Twining Ganj लिखा जाता है। अंग्रेजी देखकर अगर हिन्दी में पढा जाये तो ट्विनिंग गंज पढा जायेगा। लेकिन पता नहीं यह वास्तव में ही ‘टुडी’ है या भोजपुरी में ‘ट्विनिंग’ नहीं बोला जा सकता। खैर, जो हो।
बक्सर ट्रेन बिल्कुल ठीक समय पर आई। यहां गाडी पूरी खाली हो गई। अब इसे मुगलसराय जाना था। आगे चलकर गाडी भले ही भर जाये, लेकिन अब उतनी भीड नहीं होने वाली जितनी पटना से यहां तक रही। लेकिन आधा घण्टा हो गया, गाडी नहीं चली। मैं एक खाली सीट पर लेट गया। आंख लग गई। गाडी चलेगी तो आंख खुल जायेगी।
आंख खुली तो सवा एक बजा था और ट्रेन अभी भी बक्सर ही खडी थी। पटना-कोटा एक्सप्रेस के आने की उद्घोषणा हो रही थी। मैंने फटाफट मोबाइल में देखा- इसके बाद पटना-सिकन्दराबाद आयेगी। ब्रह्मपुत्र मेल व गुवाहाटी-लोकमान्य एक्सप्रेस लेट चल रही थीं। उधर वाराणसी से शाम साढे सात बजे मेरी दिल्ली की ट्रेन थी, उसमें मेरा आरक्षण था। उसे मैं नहीं छोड सकता था। इस तरह मेरे पास आखिरी विकल्प पटना-कोटा के बीस मिनट बाद पटना-सिकन्दराबाद थी। मैं जल्दी से इस लोकल ट्रेन के आगे गया ताकि ड्राइवर से पूछ सकूं कि कितना और लेट होने की सम्भावना है। लेकिन जब वहां पहुंचा तो ड्राइवर ही गायब था। यानी मुगलसराय वाली यह लोकल अभी नहीं चलने वाली। पटना-कोटा से वाराणसी जाने का फैसला कर लिया।
डेढ बजे तय समय पर ट्रेन आई। साधारण डिब्बों में बिल्कुल भी भीड नहीं थी। मुझे अफसोस तो था कि मुगलसराय-बक्सर मार्ग मेरे पैसेंजर नक्शे में नहीं जुड सकेगा। इसके लिये फिर कभी आना पडेगा। इससे आगे के फोटो भी नहीं खींचे। बाद में पता चला कि वह लोकल दो बजे बक्सर से चल पडी थी। बक्सर से मुगलसराय की 94 किलोमीटर की दूरी को लोकल तीन घण्टे में तय करती है। यानी पांच बजे तक वह मुगलसराय पहुंच गई होगी। पता होता कि दो बजे चलेगी तो मैं उसी में बैठा रहता। कम से कम दोबारा तो नहीं आना पडेगा।
पटना-कोटा एक्सप्रेस में एक बुजुर्ग महिला भी बैठी थीं। उन्होंने एक यात्री से पूछा कि यह गाडी अकबरपुर जायेगी क्या। कोटा तक पहुंचने में अभी भी इस गाडी को हजार किलोमीटर की दूरी तय करनी है। उस बेचारे को नहीं पता था कि अकबरपुर कहां है। उसने अनभिज्ञता जाहिर कर दी। तब मैंने तकनीक का इस्तेमाल किया। पता चला कि यह गाडी आज सुल्तानपुर के रास्ते जायेगी यानी अकबरपुर नहीं जायेगी। यह सप्ताह में तीन दिन अकबरपुर-फैजाबाद के रास्ते जाती है तो चार दिन सीधे सुल्तानपुर के रास्ते। महिला ने बताया कि उसके बेटे ने पटना से इस ट्रेन में बैठा दिया है कि अकबरपुर आयेगा तो उतर जाना। बेटे को नहीं पता होगा कि यह चार दिन अकबरपुर नहीं जाती।
तभी मुझे ध्यान आया कि मुझे प्रारम्भिक योजना के अनुसार मुगलसराय से वाराणसी जाने के लिये फैजाबाद पैसेंजर से जाना था। फैजाबाद पैसेंजर मुगलसराय से चार बजे चलती है। वह अकबरपुर होकर ही जायेगी। महिला को मैंने बता दिया। हालांकि उनकी समझ में कुछ भी नहीं आया। कुछेक यात्रियों को मेरी बात पर यकीन नहीं हुआ। उन्होंने महिला को सुझाव दिया कि आप टीटीई से मिलो, वह बता देगा कि गाडी अकबरपुर जायेगी या नहीं। यह साधारण डिब्बा एक शयनयान डिब्बे से जुडा हुआ था। महिला उठकर शयनयान में टीटीई को ढूंढने चली गई। अगर वह मेरी बात पर यकीन कर लेती तो मैं इस गाडी को मुगलसराय में ही छोड देता और वहां से स्वयं फैजाबाद पैसेंजर पकडता। आप वाराणसी उतर जाता और महिला को अकबरपुर उतरने को कह देता। या फिर वाराणसी में भी बदली कर सकता था। बेचारी को मुगलसराय या वाराणसी जैसे बडे स्टेशनों पर गाडी ढूंढने में कोई परेशानी नहीं होती।
वाराणसी से मेरा आरक्षण गरीब रथ में था जो आनन्द विहार जाती है। ठीक समय पर यानी शाम साढे सात बजे ट्रेन चल पडी और मैं सो गया। अगले दिन कुछ सहयात्री मुरादाबाद उतर गये तो कूपा पूरा खाली हो गया था। हापुड के पास एक रेलवे पुलिस वाला एक लडके को लाया और मेरे सामने वाली बर्थ पर बैठा दिया- तू यहीं बैठ और आनन्द विहार उतर जाना। मैं तुरन्त सारा माजरा समझ गया। मैंने पूछा कि कितने पैसे लिये इन्होंने? बोला कि सात सौ। कहां से चढा था? बोला बरेली से। कहने लगा कि बरेली से मैंने यह साधारण टिकट लिया। इण्टरसिटी निकल गई। जब यह गरीब रथ आई तो किसी ने बताया कि यह भी दिल्ली जायेगी तो मैं इसमें चढ लिया। कुछ देर खिडकी पर खडा रहा। तभी उस पुलिस वाले की निगाह मुझ पर पडी। उसने टिकट चेक किया। जुर्माने और जेल की बात करने लगा, मैं डर गया। उसने सात सौ मांगे, मैंने दे दिये।
मैंने बताया कि छह बजे आला हजरत चलती है, उसमें आ जाना था। नहीं तो यार तू इतना बडा हो गया है, तुझे पता नहीं कि साधारण डिब्बा कैसा होता है और एसी का कैसा होता है? भविष्य में कभी ऐसा हो जाये तो सबसे पहले टीटीई को पकडना, वो तेरा टिकट बना देगा, फिर तुझे जुर्माना नहीं देना पडेगा।
उसे आजादपुर जाना था। जब आनन्द विहार पर उतरे तो पूछने लगा कि आजादपुर कैसे जाऊं? मैंने बताया कि मेट्रो से चला जा। बोला कि नहीं मेट्रो में तो बहुत पैसे लगेंगे, पहले ही मेरे बहुत पैसे खर्च हो गये हैं। ऑटो से चला जाऊंगा। मैंने समझाया कि ऑटो वाला कम से कम दो सौ लेगा जबकि मेट्रो में पन्द्रह-बीस ही लगेंगे। जब मेट्रो स्टेशन में प्रवेश करने लगे तब भी उसे यकीन नहीं था कि मेट्रो में इतना कम किराया लगेगा। स्टेशन की चकाचौंध देखकर वो हैरान लग रहा था। जब उसने अठारह रुपये का टिकट लिया तो कहने लगा कि बडा सस्ता है। मैं तो मेट्रो को बहुत महंगी मान रहा था।
कश्मीरी गेट तक मैं उसके साथ आया। फिर वो सीधा आजादपुर चला गया और मैं शास्त्री पार्क।














1. मुगलसराय से गोमो पैसेंजर ट्रेन यात्रा
2. गोमो से हावडा लोकल ट्रेन यात्रा
3. पटना से दिल्ली ट्रेन यात्रा

10 comments:

  1. हमेशा की तरह एक बढ़िया चित्रमय संस्मरण

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  2. स्वतंत्रता एवं समाजवादी आन्दोलन का बिहार में जोर "हॉल्ट" के नामकरण पर दिखाई दे रहा है। बढिया घुमक्कड़ी।

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  3. "इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें।"
    नीरज इसका लिंक अपडेट कर लो...

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    1. लिंक अपडेट कर दिया सर जी। आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

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  4. अरे वाह ! बढ़िया विवरण I
    पर क्या पूरा बिहार हाल्टों से भरा है ?

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    1. नहीं, ऐसा नहीं है। हाल्ट हर जगह होते हैं। मैंने कुछ मजेदार हाल्टों के ही फोटो दिखाये हैं। वैसे बिहार में बडे बडे जंक्शन भी हैं।

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  5. नीरज , अगली बार जाओगे तो हो सकता है लालू यादव हॉल्ट या नीतीश कुमार हॉल्ट भी देखने को मिल जाए ! हाहाहा , हर बार की तरह बहुत ही बढ़िया वृतांत

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  6. पटना में हम राजेंदर नगर उतरे थे पुरे शहर में गंदगी विध्यमान थी और तो और सड़क के बीचो बीच कचरा था और कहने वाला कोई नहीं सभी आराम से साईड से गाडी निकल कर जा रहे थे और लाइट का तो कुछ पूछो ही मत कब आएगी किसी को पता नहीं ---मेरे ख्याल से पटना एक गंदा शहर है

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  7. very very intresting article.in many train ac compartment packed by general passenger.who is responcible for this. पूरा बिहार हाल्टों से भरा है it is a record for bihar and indian railways.

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  8. yaha bahut se log ticket nahi lete hai es liye railway bhi koe subhidha pani bijli nahi deti hai.yah ek kadawa satya hai.

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