Skip to main content

राजाजी राष्ट्रीय पार्क में मोर्निंग वाक

बात करीब दो साल पुरानी है। उस समय मैं कॉलेज में पढता था। फाइनल इयर की परीक्षाएं होने को थी। इन परीक्षाओं के बाद मेरा मन आगे पढने का नहीं था, बल्कि नौकरी करने का था। मैंने सोचा कि परीक्षा ख़त्म होने के बाद BHEL हरिद्वार में एक साल की ट्रेनिंग करूंगा। इसके लिए पहले ही आवेदन करना जरूरी था। इसलिए एक दिन समय निकालकर मैं और कमल हरिद्वार पहुँच गए।
अप्रैल का महीना था। सुबह सुबह चार बजे हम दोनों हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर थे। हमें BHEL ग्यारह बजे के बाद जाना था। सात घंटे अभी भी बाकी थे। इतना टाइम कैसे गुजारें। तय हुआ कि चंडी देवी मन्दिर तक घूम कर आते हैं। यह हरिद्वार से छः किलोमीटर दूर पहाडी पर स्थित है। रास्ता भी पैदल का ही है। चल पड़े दोनों।
गंगा का पुल पार करके हम बाइपास रोड पर पहुंचे। यह रोड आगे ऋषिकेश चली जाती है। इसी में से एक रास्ता दाहिने से कटकर ऊपर चंडी देवी मन्दिर तक जाता है। मैंने सोचा कि मन्दिर जायेंगे, वहां पर कम से कम ग्यारह ग्यारह रूपये का प्रसाद भी चढाना पड़ेगा। चलो आज इस रोड पर सीधे चलते है। कमल कहने लगा कि पता नहीं यह रोड कहाँ जाती है। आगे पूरा इलाका राजाजी राष्ट्रीय पार्क का है। इतनी सुबह को कोई वाहन भी नहीं दिख रहा है। रहने दे।
लेकिन अपने को कहाँ तसल्ली थी। बैरियर पार करके निकल पड़े। उस समय बैरियर बंद था और वाहनों की कतारें लगी हुई थी। छः बजे के बाद बैरियर खुलता है। ये भी शुक्र था कि हमें किसी ने टोका नहीं।
बिल्कुल सुनसान सड़क। हलकी सी चढाई और पहाडी घुमाव। दूर पूरब में सूरज के निकलने का एहसास भी हो रहा था। डर तो हमें भी लग रहा था कि कहीं कोई हाथी ना आ जाए। मुझे तो जंगल में सबसे ज्यादा डर हाथी से ही लगता है। क्योंकि उसे अपने शरीर और ताकत पर घमंड होता है। खासतौर से जंगली हाथी को।
तभी सामने करीब सौ मीटर दूर कुछ काला काला सा दिखा। हम दोनों के कदम एकदम रुक गए। हम अंदाजा लगा रहे थे कि वो शायद भालू है। बेटे आज नहीं बचेंगे। पेड़ पर भी नहीं चढ़ सकते। इस समय कमल की जुबान का सारा कबाड़ मुझ पर ही उतर रहा था। साठ सेकंड से भी ज्यादा हम ऐसे ही खड़े रहे। जब उस "भालू" में कोई हलचल नहीं हुई तो हम हल्का सा आगे बढे। अब सोचा कि वो तेंदुआ है। हम पर घात लगाये बैठा है। जब भी हम उसकी रेंज में आ जायेंगे, वो हम पर टूट पड़ेगा।
मेरे दिल में इस समय धक् धक् नहीं धाड़ धाड़ हो रही थी। पेड़ पर अब भी नहीं चढ़ सकते थे क्योंकि तेंदुआ भी पेड़ पर चढ़ जाता है। कमल तो आगे चलने को तैयार ही नहीं, कहने लगा कि वापस चल। लेकिन धन्य- अधन्य है यह जाट खोपडी। मरना मंजूर, लेकिन वापस नहीं जाना। पता नही क्या सूझी, एक पत्थर उठाया, और ऊपर वाले से भी ऊपर वाले का नाम लेकर उस "तेंदुए " पर निशाना लगाकर फेंक दिया। इसकी एक प्रतिक्रिया हुई, जितना तेज पत्थर आगे को गया, उतना ही तेज कमल पीछे को वापस। खैर, निशाना तो नहीं लगा। लेकिन अब हमारे आगे बढ़ने का रास्ता खुल गया था।
पत्थर फेंकने पर वो "जानवर" जरा सा भी नहीं हिला। इसका मतलब था कि वहाँ वास्तव में कोई जानवर ही नहीं था। हो सकता है कि किसी पेड़ का ठूंठ हो। पास जाने पर पता चला कि वो सड़क के किनारे सुरक्षा के लिहाज से लगायी गई छोटी सी दीवार थी। पहाडों पर अक्सर इस तरह की दीवारें बनाई जाती हैं।
कमल पूछने लगा कि यार यह रास्ता तो आगे पहाडों में ही जा रहा है। हमें वापस भी आना है। ज्यादा अन्दर मत जाओ। मैंने बताया कि हो सकता है कि यह रास्ता आगे भीमगोड़ा बैराज के पास से निकलता हो, वहीँ से बैराज पार करके हरिद्वार में घुस जायेंगे। कमल मान गया।
अब हम थोड़ा सुस्ताने के लिए रुक गए। सामने दूर तक ढलान, फ़िर बड़ी ही मस्त घाटी। और फ़िर पहाड़। पूरी घाटी में जंगल राज। इस जंगल में पता नहीं कहाँ कौन सा जानवर हो। खूब बारीकी से देख लिया, कोई नहीं दिखा। उस समय बड़ी ही तमन्ना थी कि कोई जानवर दिख जाए। इसलिए एक पत्थर उठाया और फेंक दिया घाटी में। दूर तक लुढ़कता चला गया। सूखे पत्तों की आवाजें देर तक आती रही। हमें उम्मीद थी कि इस तरह कोई जानवर आवाज सुनकर हिले-डुलेगा। कई पत्थर फेंके, नतीजा जीरो।
आगे बढे। रास्ते में किसी मोबाइल कंपनी का टावर पड़ा। वहाँ खड़े कर्मचारी से रास्ता पूछा। उसने बताया कि आगे जब तुम बाएं मुडोगे, वहीं से एक कच्ची सड़क नीचे को जाती है। वह सीधी बैराज पर ही जाती है। इसके अलावा बैराज से आने वाली एक पक्की सड़क भी इसी में मिलती है। लेकिन वो कुछ दूर पड़ेगी।
आगे जैसे ही हम बाएं मुडे, देखा कि एक रास्ता नीचे को जा रहा है। जैसे ही हम उस पर बढे, हमारी साँस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह गई। उस रास्ते पर कम से कम बीस लंगूर बैठे हुए थे। काले काले मुहं और लम्बी पूँछ। हमने सीधे ही चलना ठीक समझा। भले ही थोड़ा ज्यादा चल लें।
एक मोड़ को पार करके जैसे ही चले, सामने से एक भैंसा (भैंस भी हो सकती है ) आता दिखा। उसके पीछे दूसरा, फ़िर तीसरा, अरे लो एक और चौथा। उन्हें देखकर हम रुक गए, और हमें देखकर वे। मैं तो कमल के कारण रुका था। भैंसों को देखकर वो डर गया था। कहने लगा कि ये जंगली भैंसे हैं। देख किस तरह हमें घूर घूर कर देख रहे हैं। मैं (जाट बुद्धि) बोला कि यार यहाँ पर शायद कोई गाँव होगा, उनकी भैंसें है। चल कुछ नहीं कहेगी। लेकिन कमल टस से मस नहीं हुआ। बोला कि यार तुझे जाना हो चला जा, ले मैं तो यहीं बैठ गया, जब ये भैंसे चले जायेंगे, तभी जाऊंगा। और वही सड़क के किनारे पर बैठ गया।
लेकिन मेरी अक्ल देखिये, मेरी हिम्मत देखिये। मैं कमल की परवाह ना करके दो कदम भी नहीं चला था। भैंसों ने सलाह सी मिलाई और गर्दन हिला हिला कर हमारी तरफ़ बढ़ने लगे। उनका यह रूप देखकर मैं तुंरत वापस भगा। देखा कि कमल गायब, एक पेड़ पर चढा बैठा है। मुझ पर तो पेड़ पर ही चढ़ना नहीं आता। मैं सड़क छोड़कर पहाड़ पर नीचे हो गया। अब पीछे देखने की फुरसत मिली। केवल एक भैंसा दिखा। वो भी इस सड़क को छोड़कर दूसरी तरफ़ जंगल में जाता हुआ।
हमने राहत की साँस ली। मुसीबत टल चुकी थी। यहाँ से भीमगोड़ा बैराज का रास्ता भी मिल गया। और हम ठीक ठाक हर की पैडी पहुंचकर, गंगा स्नान करके सीधे BHEL चले गए।

Comments

  1. वाह यार नीरज भाई.. जाट आदमी होकर भैंसो से डर गये ! :) चलो अच्छा हुआ , वैसे वो जन्गली ही होन्गे और कभी कभी बडे खतरनाक भी हो जाते हैं ! शायद बायसन ये ही होते हैं ?

    राम राम !

    ReplyDelete
  2. पत्थर फैंक कर खतरा नापने की तकनीक बड़ी बढ़िया है। पेटेण्ट कराने योग्य!

    ReplyDelete
  3. भाई साहब आपके ब्लॉग में अब बार बार पोस्ट पढ़ने आऊंगा। बहुत ही अच्छा यात्रा विवरण देते हैं आप।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

कोटेश्वर और नारायण सरोवर

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 18 जनवरी 2015 लखपत से नारायण सरोवर की दूरी करीब 35 किलोमीटर है। किले से निकलते ही एक सडक तो बायें हाथ भुज चली जाती है और एक दाहिने वाली जाती है नारायण सरोवर। नारायण सरोवर से दो किलोमीटर आगे कोटेश्वर है। जैसा कि कई अन्य स्थानों पर भी कथा प्रचलित है कि रावण ने तपस्या करी, शिवजी प्रसन्न हुए और शिवलिंग के रूप में रावण के साथ लंका जाने लगे। लेकिन शर्त लगा दी कि अगर शिवलिंग को जमीन पर रख दिया तो फिर उठाये नहीं उठूंगा। ऐसा ही कोटेश्वर में हुआ। रावण को लघुशंका लगी और शिवजी यहीं पर विराजमान हो गये। अब वर्तमान में मानचित्र देखें तो सन्देह होता है कि रावण शिवजी को कैलाश से ला रहा था या पुरुषपुर से। कैलाश-लंका के बीच में कोटेश्वर दूर-दूर तक भी नहीं आता।

मैं जंगल में भटक गया

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । कुल्लू के पास बिजली महादेव का मन्दिर है। यहां से पूरा कुल्लू शहर और भून्तर साफ-साफ दिखाई देते हैं। जाने का एकमात्र रास्ता कुल्लू से ही है। लेकिन मैने इरादा किया भून्तर की तरफ से उतरने का। उतरने लगा तो कुछ चरवाहे मिले। उन्होने रास्ता बता दिया। उनके बताये रास्ते पर चलते हुए कुछ दूर जाने पर नीचे उतरती सीढियां मिलीं। सामने बहुत दूर पार्वती नदी दिख रही थी और मणिकर्ण जाने वाली सडक भी। सडक पर चलती हुईं कारें, बसें बहुत नन्ही-नन्ही दिख रही थीं। शाम के पांच बजे के आसपास का टाइम था। मैने अपना लक्ष्य रखा दो घण्टे में यानी सात बजे तक नीचे नदी तक उतरने का। पहाडों का जो थोडा बहुत अनुभव था, उससे अन्दाजा लगाया कि दो घण्टे में नदी तक उतरना बहुत मुश्किल काम है। इसीलिये चलने की स्पीड भी बढा दी।

गोवर्धन परिक्रमा

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 13 फरवरी 2013 सुबह आठ बजे सोकर उठे। कमरे में गीजर लगा था, दो तो नहा लिये, तीसरे का नहाना जरूरी नहीं था। आज हमें गोवर्धन जाना था, ट्रेन थी दस बजे यानी दो घण्टे बाद। धीरज का पाला अभी तक मेरठ छावनी जैसे छोटे स्टेशनों से ही पडा था, इसलिये अनुभव बढोत्तरी के लिये उसे गोवर्धन के टिकट लेने भेज दिया। पहले तो उसने आनाकानी की, बाद में चला गया। आधे घण्टे बाद खाली हाथ वापस आया, बोला कि दस बजे कोई ट्रेन ही नहीं है। क्यों? पता नहीं। पूछताछ पर गये तो पता चला कि यह ट्रेन कुछ दिनों के लिये रद्द है। जरूर इस गाडी को यहां से हटाकर किसी दूसरे रूट पर स्पेशल के तौर पर चला रखा होगा। अब ट्रेन की प्रतीक्षा करने का कोई अर्थ नहीं बनता था, इसलिये रिक्शा करके बस अड्डे पहुंचे और घण्टे भर बाद ही गोवर्धन।