Friday, June 28, 2019

पुस्तक-चर्चा: लद्दाख-यात्रा की डायरी

पिछले दिनों किसी ने एक फेसबुक ग्रुप में एक फोटो डाला, जो किसी किताब के एक पन्ने का फोटो था। उन्होंने इस किताब की जानकारी चाही थी। उस पन्ने पर सबसे ऊपर लिखा था - लद्दाख-यात्रा की डायरी। फिर साइबर एक्सपर्ट प्रकाश यादव जी ने पता नहीं कहाँ से ढूँढ़कर इस किताब को डाउनलोड करने का लिंक उपलब्ध करा दिया। मैंने भी यह किताब डाउनलोड कर ली। आप भी इसे डाउनलोड कर सकते हैं। लिंक इस लेख के आखिर में दिया गया है।

किताब 1955 में सत्साहित्य प्रकाशन से प्रकाशित हुई थी। इसका मतलब यह हुआ कि यात्रा 1955 से पहले की गई थी। आजकल तो लद्दाख में यात्राओं का एक बँधा-बँधाया रूटीन होता है - लेह से खारदुंग-ला, नुब्रा वैली और पेंगोंग, शो-मोरीरी देखते हुए वापस। चार दिनों में यह रूटीन पूरा हो जाता है और आजकल की लद्दाख यात्रा कम्पलीट हो जाती है। इन यात्राओं को पढ़ने में रोमांच भी नहीं आता और न ही कोई नयापन लगता है। लेकिन 1955 से पहले की यात्राएँ हमेशा ही रोमांचक होती थीं। उस समय तक चीन ने भी अक्साई-चिन और तिब्बत पर कब्जा नहीं किया था और लद्दाख का लगभग समूचा क्षेत्र व्यापारियों, शिकारियों और पर्यटकों के लिए खुला था।

पुस्तक के लेखक लेफ्टिनेंट कर्नल सज्जन सिंह अपने जमाने में ओरछा राज्य के दीवान थे। साथ ही साथ शिकारी भी थे। बातों-बातों में एक बार एक अंग्रेज महिला ने इनसे कहा - “और सब शिकार तो आप हिंदुस्तानियों के बस के हैं, लेकिन लद्दाख में शिकार और उनमें भी ओविस अमोन (एक जंगली भेड़) को मारने का बूता आपका नहीं है।”

Tuesday, June 11, 2019

देवदार के खूबसूरत जंगल में स्थित है बाहू और बालो नाग मंदिर


एक दिन की बात है मैं मोटरसाइकिल लेकर घियागी से बाहू की तरफ चला। इरादा था गाड़ागुशैनी और छाछगलू पास तक जाना। छाछगलू पास का नाम मैंने पहली बार तरुण गोयल से सुना था और इस नाम को मैं हमेशा भूल जाता हूँ। तब हमेशा गोयल साहब से पूछता हूँ और आज भी गोयल साहब से पूछने के बाद ही लिख रहा हूँ। उनसे पूछने का एक कारण और भी है कि वे इसे “छाछगळू” बोलते हैं। और इस तरह बोलते हैं जैसे मुँह में छाछ और गुड़ भरकर बोल रहे हों। तो मुझे यह उच्चारण सुनना बड़ा मजेदार लगता है और मैं बार-बार उनसे इसका नाम पूछता रहता हूँ।

तो उस दिन मैं बाहू तक गया और सामने दिखतीं महा-हिमालय की चोटियों को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया। यह समुद्र तल से 2300 मीटर ऊपर है और एकदम सामने ये चोटियाँ दिखती हैं। जीभी और घियागी तो नीचे घाटी में स्थित हैं और वहाँ से कोई बर्फीली चोटी नहीं दिखती। तो यहाँ आकर ऐसा लगा जैसे रोज आलू खाते-खाते आज शाही पनीर मिल गया हो।
जीभी से इसकी दूरी 10 किलोमीटर है और शुरू में बहुत अच्छी सड़क है, फिर थोड़ी खराब है, फिर और खराब है और आखिर में जब आप बाहू में खड़े होते हैं और कोई बस गुजर जाए, तो आप धूल से सराबोर हो जाएँगे, बशर्ते कि उस दिन धूप निकली हो। उस दिन भी तेज धूप निकली थी और जैसे ही बंजार-छतरी बस आई, मुझे गर्मागरम चाय का कप हथेली से ढकना पड़ा था।
फिर हुआ ये कि तेज धूप के कारण मेरी आँखों में जलन होने लगी और मैं वापस घियागी लौट आया - गाड़ागुशैनी और छाछगलू फिर कभी जाने का वादा करके।

Monday, June 10, 2019

आश्चर्यचकित कर देने वाली इमारत: चैहणी कोठी


घर की मुर्गी दाल बराबर... इस वजह से हम डेढ़ महीने यहाँ गुजारने के बाद भी चैहणी कोठी नहीं जा पाए। हमारे यहाँ घियागी से यह जगह केवल 10 किलोमीटर दूर है और हम ‘चले जाएँगे’, ‘चले जाएँगे’ ऐसा सोचकर जा ही नहीं पा रहे थे। और फिर एक दिन शाम को पाँच बजे अचानक मैं और दीप्ति मोटरसाइकिल से चल दिए।

चलते रहे, चलते रहे और आखिर में सड़क खत्म हो गई। इससे आगे काफी चौड़ा एक कच्चा रास्ता ऊपर जाता दिख रहा था, जिस पर मोटरसाइकिल जा सकती थी, लेकिन कुछ दिन पहले यहाँ आए निशांत खुराना ने बताया कि उस कच्चे रास्ते पर मोटरसाइकिल से बिल्कुल भी मत जाना। तो इस बारे में वहीं बैठे एक स्थानीय से पूछा। उसने भी एकदम निशांत वाले शब्द कहे। मोटरसाइकिल यहीं किनारे पर खड़ी करने लगे, तो उसने कहा - “यहाँ की बजाय वहाँ खड़ी कर दो। अभी बस आएगी, तो उसे वापस मुड़ने में समस्या आएगी।”

यहाँ से आगे पैदल रास्ता है।
“कितना दूर है? आधे घंटे में पहुँच जाएँगे क्या?”
“नहीं, आधे घंटे में तो नहीं, लेकिन पौण घंटे में पहुँच जाओगे।” उसी स्थानीय ने बताया।
“मतलब दो किलोमीटर दूर है।”
“हाँ जी।”