Tuesday, February 26, 2019

बंगलौर से बेलूर और श्रवणबेलगोला


Shravanabelagola Travel Guide

23 फरवरी 2019
चार दिन बंगलौर में रुकने के बाद आज हम निकल ही पड़े। असल में हमने इस यात्रा के लिए तय कर रखा है कि यूट्यूब और ब्लॉग साथ-साथ अपडेट करते चलेंगे। तो गोवा से चलने के बाद बादामी और हम्पी आदि की वीडियो हम तैयार नहीं कर सके थे। इसलिए इन चार दिनों में हमने केवल यही काम किया। इस दौरान मनीष खमेसरा और जयश्री खमेसरा जी से भी मिल आए। ये दोनों एक नंबर के घुमक्कड़ हैं और पुरातत्व आदि के बारे में उत्तम जानकारी के भंडार हैं। इनसे मिलकर हमें भी दक्षिण के मंदिरों, उनकी संरचना आदि के बारे में काफी जानकारी प्राप्त हुई। अब दक्षिण के मंदिरों को देखने का एक अलग नजरिया विकसित हुआ।
जहाँ हम रुके हुए थे, वहाँ से मनीष जी का घर 15 किलोमीटर दूर था और इस दूरी को दो बार तय करने में हमें अंदाजा हो गया कि बंगलौर का ट्रैफिक बहुत खराब है।

तो आज बंगलौर से निकल पड़े। शहर से निकलते ही ट्रैफिक अचानक गायब हो गया और हमारे सामने थी खाली सड़क। हम शहर के खराब ट्रैफिक को भूल गए।

लेपाक्षी मंदिर


Lepakshi Temple History

19 फरवरी 2019

लेपाक्षी मंदिर का नाम हमने एक खास वजह से सुना था। यहाँ एक ऐसा पिलर है जो हवा में लटका है। अब जब हमें आंध्र प्रदेश में गंडीकोटा से कर्नाटक में बंगलौर जाना था, तो लेपाक्षी जाने की भी योजना बन गई। इसके लिए कोई बहुत ज्यादा लंबा चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा।

गंडीकोटा से कदीरी जाने वाला रास्ता बहुत खूबसूरत है। ट्रैफिक तो है ही नहीं, साथ ही खेतों में काम करते ग्रामीण असली भारत की झलक दिखाते हैं। अगर आप मोटरसाइकिल यात्रा पर हैं, तो आपको ऐसे डी-टूर भी लगा देने चाहिए। कई बार तो लोग मुड़-मुड़कर आपको देखते हैं, क्योंकि इस तरह बहुत कम लोग ही उनकी सड़कों पर आते हैं। और अगर आप रुक गए तो इनका अपनापन आपको हैरान कर देगा।

वैसे तो हम श्री सत्य साईं प्रशांति निलयम यानी पुट्टापार्थी होते हुए भी जा सकते थे, लेकिन हमारी दिलचस्पी इन बातों में नहीं है, इसलिए कदीरी से सीधे ग्रंथला का रास्ता पकड़ा और सीधे नेशनल हाइवे 44 पर आ गए। यह नेशनल हाइवे कश्मीर को कन्याकुमारी को जोड़ता है। कुछ दूर बंगलौर की ओर चलने पर लेपाक्षी का रास्ता अलग हो जाता है। लेपाक्षी इस हाइवे से 15-16 किलोमीटर दूर है।

Monday, February 25, 2019

गंडीकोटा: भारत का ग्रैंड कैन्योन


Gandikota View

15 फरवरी 2019

जिस समय हम्पी का विजयनगर साम्राज्य अपने पूरे वैभव पर था, उसी समय हम्पी से कुछ ही दूर एक छोटा-सा साम्राज्य बना हुआ था, जिसकी राजधानी गंडीकोटा थी। फिर दिल्ली सल्तनत ने जब दक्कन पर आक्रमण करने शुरू किए तो न हम्पी टिक पाया और न ही गंडीकोटा। हाँ, इस सल्तनत के खिलाफ लड़ने को हम्पी और गंडीकोटा एक जरूर हुए, लेकिन खुद को नहीं बचा पाए। आज हम्पी भी खंडहर हो गया है और गंडीकोटा भी।

गंडीकोटा आंध्र प्रदेश में है। लेकिन यह उन खंडहरों और किले के लिए उतना नहीं जाना जाता, जितना अपने अद्‍भुत प्राकृतिक नजारे के लिए। यहाँ पेना नदी बहुत गहरी बहती है - सीधी खड़ी चट्टानों के बीच। इसलिए इसे भारत का ग्रैंड कैन्योन भी कहा जाता है। नदी के दोनों किनारे 100-100 मीटर तक एकदम खड़े हैं। असल में ग्रांड कैन्योल अमरीका में है। वहाँ कोलोराडो नदी इसी तरह का कटान करती है और काफी प्रसिद्ध हो गई है। अब हम उतनी आसानी से अमरीका तो नहीं जा सकते, तो क्या हुआ? हमारे पास भी अपना ग्रांड कैन्योन है।

दक्कन का पठार मुख्यतः मैदानी ही है, लेकिन कहीं-कहीं छोटी-छोटी पहाड़ियाँ भी हैं। यहाँ भी एक पहाड़ी श्रंखला है, जो उत्तर से दक्षिण दिशा में है। पेना नदी पश्चिम से पूर्व में बहती है। इस पहाड़ी श्रंखला को पेना नदी ऐसे काटकर निकल जाती है, जैसे चाकू से पनीर काट देते हैं।

दारोजी भालू सेंचुरी में काले भालू के दर्शन


Daroji Bear Sanctuary Karnataka

15 फरवरी 2019
उस दिन जब हम विट्ठल मंदिर से पैदल हम्पी लौट रहे थे, तो अंधेरा हो गया। हम तुंगभद्रा के किनारे-किनारे धीरे-धीरे चलते आ रहे थे। एक विदेशी महिला अपने दो बच्चों के साथ हम्पी से विट्ठल मंदिर की ओर जा रही थी। रास्ते में एक सिक्योरिटी गार्ड ने उन्हें टोका - “मैडम, गो बैक टू हम्पी। नॉट एलाऊड हियर आफ्टर दा इवनिंग। बीयर एंड चीता कम्स हीयर।”
मेरे कान खड़े हो गए। चीते को तो मैंने सिरे से नकार दिया, क्योंकि भारत में चिड़ियाघरों के अलावा चीता है ही नहीं। हाँ, तेंदुआ हर जगह होता है। और बीयर?
“क्या यहाँ भालू हैं?” मैंने पूछा।
“हाँ जी, पास में बीयर सेंचुरी है, तो यहाँ तक भालू आ जाते हैं केले खाने।”

और अगले ही दिन हम उस भालू सेंचुरी के गेट पर थे। दोपहर का डेढ़ बजा था। पता चला कि दो बजे के बाद ही एंट्री कर सकते हैं। तो दो बजे के बाद हमने एंट्री कर ली। प्रति व्यक्ति शुल्क है 25 रुपये और बाइक का कोई शुल्क नहीं। कार के 500 रुपये। चार किलोमीटर अंदर जंगल में जाने के बाद एक वाच टावर है। वहाँ बैठ जाना है और भालू के दिखने की प्रतीक्षा करनी है।

क्या आपने हम्पी देखा है?


Tungbhadra River in Hampi

जब हम बादामी से हम्पी जा रहे थे, तो मन में एक सवाल बार-बार आ रहा था। क्या हमें हम्पी पसंद आएगा? क्योंकि मैंने हम्पी की बहुत ज्यादा प्रशंसा सुनी थी। कभी भी आलोचना नहीं सुनी। जहाँ भी पढ़ी, हम्पी की प्रशंसा... जिससे भी सुनी, हम्पी की प्रशंसा। Top 100 Places to see before you die की लिस्ट हो या Top 10 Places to see before you die की लिस्ट हो... हम्पी जरूर होता।

तो एक सवाल बार-बार मन में आता - कहीं हम्पी ओवररेटिड तो नहीं?

इस सवाल का जवाब हम्पी पहुँचते ही मिल गया। हम यहाँ दो दिनों के लिए आए थे और पाँच दिनों तक रुके। छठें दिन जब प्रस्थान कर रहे थे, तो आठ-दस दिन और रुकने की इच्छा थी।

वाकई हम्पी इस लायक है कि आप यहाँ कम से कम एक सप्ताह रुककर जाओ।

जिस समय उत्तर में मुगल साम्राज्य का दौर था, यहाँ विजयनगर साम्राज्य था। इस साम्राज्य के सबसे प्रतापी राजा थे कृष्णदेवराय। और आपको शायद पता हो कि तेनालीराम भी इन्हीं के एक दरबारी थे। तो इस दौर में हम्पी का जमकर विकास हुआ। इनके साम्राज्य की सीमा पश्चिम में अरब सागर तक थी और विदेशों से समुद्र के रास्ते खूब व्यापार और आवागमन होता था। विदेशी भी खूब आते थे और इनकी भी निशानियाँ हम्पी के खंडहरों में देखने को मिल जाती हैं।

Sunday, February 24, 2019

दक्षिण भारत यात्रा: पट्टडकल - विश्व विरासत स्थल


Pattadakal Travel Guide

11 फरवरी 2019
पट्टडकल एक ऐसा विश्व विरासत स्थल है, जिसका नाम हम भारतीयों ने शायद सबसे कम सुना हो। मैंने भी पहले कभी सुना था, लेकिन आज जब हम पट्टडकल के इतना नजदीक बादामी में थे, तो हमें इसकी याद बिल्कुल भी नहीं थी। इसकी याद बाई चांस अचानक आई और हम पट्टडकल की तरफ दौड़ पड़े।

सूर्यास्त होने वाला था और टिकट काउंटर से टिकट लेने वाले हम आखिरी यात्री थे। हालाँकि हम यहाँ की स्थापत्य कला को उतना गहराई से नहीं देख पाए, क्योंकि उसके लिए गहरी नजर भी चाहिए। हमें स्थापत्य कला में दिलचस्पी तो है, लेकिन उतनी ही दिलचस्पी है जितनी देर हम वहाँ होते हैं। वहाँ से हटते ही सारी दिलचस्पी भी हट जाती है और फिर दो-चार और भी स्थानों की खासियत मिक्स हो जाती है।

“मैं स्थापत्य कला के क्षेत्र में एक दिन कोई बड़ा काम जरूर करूँगा” - यह वादा मैं पिछले दस सालों से करता आ रहा हूँ और तभी करता हूँ, जब ब्लॉग लिखना होता है और शब्द नहीं सूझते।

Thursday, February 21, 2019

दक्षिण भारत यात्रा: बादामी भ्रमण


Badami Travel

11 फरवरी 2019
कर्नाटक कर्क रेखा के पर्याप्त दक्षिण में है। कर्क रेखा के दक्षिण का समूचा भारत उष्ण कटिबंध में स्थित है। इस क्षेत्र की खासियत होती है कि यहाँ गर्मी बहुत ज्यादा पड़ती है। उधर कर्क रेखा के उत्तर में यानी उत्तर भारत में भयानक शीतलहर चल रही थी और हिमालय में तो बर्फबारी के कई वर्षों के रिकार्ड टूट रहे थे। और इधर हम गर्मी से परेशान थे।
और हम एक-दूसरे से पूछ भी रहे थे और इल्जाम भी लगा रहे थे - “इसी मौसम में साउथ आना था क्या?”

तो हमने तय किया था कि अभी चूँकि हमें साउथ में कम से कम एक महीना और रहना है, इसलिए गर्मी तो परेशान करेगी ही। और इससे बचने का सर्वोत्तम तरीका था कि केवल सुबह और शाम के समय ही घूमने के लिए बाहर निकलो। दोपहर को कमरे में रहो। यहाँ तक कि दोपहर को कभी बाइक भी नहीं चलानी।

इसी के मद्देनजर आज की योजना थी - सुबह छह बजे से दोपहर दस-ग्यारह बजे तक बादामी घूमना है, शाम चार बजे तक आराम करना है और चार बजे के बाद ऐहोल की तरफ निकल जाना है और साढ़े पाँच बजे तक पट्टडकल पहुँचना है। इन सभी की दूरियाँ बहुत ज्यादा नहीं हैं।

बादामी में एक तालाब है - अगस्त्य तालाब या अगस्त्य लेक। और जो भी यहाँ दर्शनीय है, बादामी जिस वजह से भी प्रसिद्ध है, वो सब इस तालाब के पास ही है। आपको बहुत दूर नहीं जाना होता। हम होटल में ही मोटरसाइकिल छोड़कर पैदल निकल पड़े। रास्ते में ‘क्लार्क्स इन’ नामक थ्री-स्टार होटल के सामने एक रेहड़ी पर दस-दस रुपये की भरपेट इडली मिल रही थी, सूतने में देर नहीं लगी।

गोवा से बादामी की बाइक यात्रा

गोवा से बेलगाम की सड़क
चोरला घाट

फरवरी के दूसरे सप्ताह का पहला दिन था यानी आज आठ तारीख थी। हम गोवा में अपने एक मित्र के यहाँ थे। इनके पिताजी किसी जमाने में आर्मी में थे और रिटायरमेंट के बाद गोवा में ही बस गए तो इन्होंने गोवा में ही कारोबार बढ़ाया और आज दाबोलिम में अपने आलीशान घर में रहते हैं। दाबोलिम में ही चूँकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट है, इसलिए कुछ कुछ मिनट बाद घर के ऊपर से हवाई जहाज गुजरते रहते हैं और उन पर लिखा नाम व नंबर आसानी से पढ़ा जा सकता है। और उससे भी कमाल की बात यह है कि ये यूपी में मुजफ्फरनगर के मूल निवासी हैं और गोवा में कई दशक रहने के बाद भी मुजफ्फरनगर की ठेठ खड़ी बोली का प्रभाव एक डिग्री भी कम नहीं हुआ है। ‘तझै’, ‘मझै’, ‘इंगै’, ‘उंगै’ आदि शब्दों से सराबोर होने के बाद एक पल को भी हमें नहीं लगा कि हम अपने गाँव से ढाई हजार किलोमीटर दूर हैं। हमें लग रहा था कि इनके भोजन में थोड़ा-बहुत कोंकणी प्रभाव देखने को मिलेगा, लेकिन हमारा अंदाजा गलत साबित हुआ। यहाँ इतनी दूर और इतने दशक बाद भी इनके भोजन में घी, दूध, दही और मट्‍ठे की ही प्रधानता थी।
वैसे तो गोवा मुझे कभी पसंद नहीं आया, क्योंकि मुझे लगता था कि यह लफंगों की मौजमस्ती और हनीमून-पसंद युवाओं के लिए पूरी दुनिया के कुछेक स्थानों में से एक है। मैं न लफंगे की श्रेणी में आता हूँ और न ही हनीमून-पसंद युवा की श्रेणी में, तो गोवा के बारे में मेरे मन में कुछ नकारात्मक धारणाएँ ही बनी हुई थीं। एक बार कई साल पहले जब अपने दो मित्रों के साथ गोवा आया था तो मेरा एकमात्र उद्देश्य दूधसागर जलप्रपात देखना ही था। जबकि उन दोनों को गोवा के समुद्रतट देखने थे, इसलिए मैं पूरे एक दिन होटल के कमरे में पड़ा रहा था और वे दोनों समुद्रतट देख रहे थे। शाम को वापस लौटकर जब उन्होंने गोवा की महंगाई की गाथा सुनानी शुरू की, तो प्रसन्न होने वालों में मैं अकेला था।

दक्षिण भारत यात्रा के बारे में

कोंकण रेलवे की यात्रा

कई बार हम जो चाहते हैं, वैसा नहीं होता। इस बार हमारे साथ भी वैसा ही हुआ। हम असल में दक्षिण भारत की यात्रा नहीं करना चाहते थे, बल्कि पूर्वोत्तर में पूरी सर्दियाँ बिता देना चाहते थे। लेकिन दूसरी तरफ हम दक्षिण से भी बंधे हुए थे। सितंबर 2018 में जब हम कोंकण यात्रा पर थे, तो अपनी मोटरसाइकिल गोवा में ही छोड़कर दिल्ली लौट आए थे। अब चाहे हमारी आगामी यात्रा पूर्वोत्तर की हो या कहीं की भी हो, हमें गोवा जरूर जाना पड़ता - अपनी मोटरसाइकिल लेने।

दक्षिण तो मानसून में भी घूमा जा सकता है, लेकिन पूर्वोत्तर घूमने का सर्वोत्तम समय होता है सर्दियाँ। सिक्किम और अरुणाचल के ऊँचे क्षेत्रों को छोड़ दें, तो पूरा पूर्वोत्तर सर्दियों में ही घूमना सर्वोत्तम होता है। पिछले साल से ही हमारी योजना इस फरवरी में अरुणाचल में विजयनगर जाने की थी और हम इसके लिए तैयार भी थे। एक साल की छुट्टियाँ भी इसीलिए ली गई थीं, ताकि पूर्वोत्तर को अधिक से अधिक समय दे सकें और भारत के इस गुमनाम क्षेत्र को हर मौसम में हर कोण से देख सकें और आपको दिखा भी सकें।

लेकिन हम बंधे हुए थे गोवा से। भले ही विजयनगर जाने में मोटरसाइकिल का बहुत ज्यादा काम न हो, लेकिन बाकी पूर्वोत्तर देखने के लिए अपनी मोटरसाइकिल होना ही सबसे अच्छा विकल्प होता है। अपनी मोटरसाइकिल के बिना हम जो भी समय काट रहे थे, वो बस ‘काट’ ही रहे थे। हमें तलब लगी थी कि हम जल्द से जल्द गोवा जाकर अपनी मोटरसाइकिल लेंगे और इसी से यात्राएँ करेंगे। गोवा से सीधे पूर्वोत्तर जाएँगे - ऐसा हमने सोच रखा था।