Monday, December 30, 2019

दूसरा दिन: पोखरण फोर्ट और जैसलमेर वार मेमोरियल




12 दिसंबर 2019...
अपने आप सुबह सुबह ही आँख खुल गई। और खुलती भी क्यों न? हमने खुद ही कल ऐलान किया था कि सुबह 8 बजे हर हाल में सबको गाड़ी में बैठ जाना है। रेस्टोरेंट में पहुँचे, तो देखा कि सबने नाश्ता कर लिया है... बस, हम ही बाकी थे।

गाड़ी में चढ़ा, तो सामने गुप्ता जी दिखे, फिर भी मैंने आवाज लगाई... "गुप्ता जी आ गए क्या??" गुप्ता जी ने हँसते हुए कहा... "हाँ जी, आ गए।"

असल में कल सभी लोग गाड़ी में बैठ जाते और गुप्ता जी को फोन करके बुलाना पड़ता। कई बार ऐसा हुआ। हो सकता है कि एकाध बार किसी को खराब लगा हो, लेकिन यह सबसे युवा जोड़ी थी और फिर गुप्ता जी को आवाज लगाना हमारा नियमित क्रियाकलाप बन गया।

पहले तो ओसियाँ के रास्ते जाने का विचार था, लेकिन अब गाड़ी जैसलमेर वाले सीधे रास्ते पर दौड़ रही थी। बाहर धूप निकली थी, लेकिन रात बूँदाबाँदी हो जाने के कारण ठंडक बढ़ गई थी, इसलिए किसी ने भी खिड़की नहीं खोली। आधे घंटे के अंदर सब के सब सो चुके थे। मैं खुद गहरी नींद में था।

दो-ढाई घंटे बाद आँख खुली। गाड़ी एक होटल के सामने रुकी हुई थी। अभी हम पोखरण पहुँचने वाले थे और यहाँ हमें लंच करना था। भूख तो नहीं थी, लेकिन आलू की सब्जी और छाछ देखकर भूख लग आई।

मैं एक बार पहले भी पोखरण आ चुका था - ट्रेन से। जैसलमेर से जोधपुर वाली पैसेंजर पकड़ी थी। ट्रेन पोखरण में लगभग आधा घंटा रुकी थी और इंजन भी इधर से उधर हुआ था। स्टेशन पर मिर्ची-बड़े बिक रहे थे और मैंने नहीं खाए थे। जबकि आज अगर मुझे कहीं मिर्ची-बड़े दिख जाते हैं, तो मैं फटाक से ले लेता हूँ। मारवाड़ की शान है मिर्ची-बड़ा।

Thursday, December 26, 2019

जोधपुर में मेरा मन नहीं लगा



मैं अनगिनत बार जोधपुर जा चुका हूँ, लेकिन कभी भी यहाँ के दर्शनीय स्थल नहीं देखे। ज्यादातर बार अपनी ट्रेन-यात्राओं के सिलसिले में गया हूँ और एक बार दो साल पहले बाइक से। तब भी जोधपुर नहीं घूमे थे और एक रात रुककर आगे बाड़मेर की ओर निकल गए थे। इस बार भी हम जोधपुर नहीं घूमने वाले थे, लेकिन मित्रों के सुझाव पर जोधपुर लिस्ट में जोड़ा गया। यह यात्रा जैसलमेर और थार मरुस्थल की होने वाली थी, लेकिन सभी के लिए जोधपुर पहुँचना ज्यादा सरल है, इसलिए जोधपुर जोड़ना पड़ा - जोधपुर से शुरू और जोधपुर में खत्म। मैं भूल गया था कि हमारे सभी मित्र हमारे एक आग्रह पर कहीं भी पहुँच सकते हैं। मैंने सभी मित्रों को सुविधाभोगी समझ लिया था और मान लिया था कि अगर हम इस यात्रा को जोधपुर से जोधपुर तक रखेंगे, तो ज्यादा मित्र शामिल होंगे।

हम आजकल दो तरह की यात्राएँ करते हैं - अपनी निजी यात्राएँ और कॉमर्शियल यात्राएँ। यह यात्रा एक कॉमर्शियल यात्रा थी - 11 से 15 दिसंबर 2019... सभी को 11 की सुबह जोधपुर में एकत्र होना था, पूरे दिन जोधपुर के दर्शनीय स्थल देखने थे और रात जोधपुर में रुककर अगले दिन टैक्सी से जैसलमेर के लिए निकल जाना था। यात्रा के लिए 14 मित्रों ने रजिस्ट्रेशन कराया। हमें उम्मीद थी कि दिल्ली से भी कुछ मित्र जाएँगे और वे मंडोर एक्सप्रेस का प्रयोग करेंगे, इसलिए तय किया कि सुबह 8 बजे निर्धारित स्थान पर सभी एकत्र होंगे और आगे बढ़ेंगे।

लेकिन दिल्ली से कोई भी नहीं आया। कुछ लखनऊ से, कुछ रायबरेली से और कुछ मित्र इंदौर से आए। ये सभी एक दिन पहले ही अर्थात 10 को ही जोधपुर पहुँचने वाले थे। कुछ का आग्रह आज भी उसी होटल में ठहरने का था, जिसमें सभी लोग 11 को ठहरेंगे... और कुछ ने अपने ठहरने की व्यवस्था अपने-आप कहीं और कर ली।

Sunday, December 22, 2019

हिंदुस्तान... फुरसत... रविवार... 22 दिसंबर 2019


एक यात्रा स्कूली बच्चों के साथ



जब से हम Travel King India Private Limited कंपनी बनाकर आधिकारिक रूप से व्यावसायिक क्षेत्र में आए हैं, तब से हमारे ऊपर जिम्मेदारी भी बढ़ गई है और लोगों की निगाहें भी। कंपनी आगे कहाँ तक जाएगी, यह तो हमारी मेहनत पर निर्भर करता है, लेकिन एक बात समझ में आ गई है कि यात्राओं का क्षेत्र असीमित है और इसके बावजूद भी प्रत्येक यात्री हमारा ग्राहक नहीं है। अपनी सरकारी नौकरी को किनारे रखकर एक साल पहले जब मैं इस क्षेत्र में उतरा था, तो यही सोचकर उतरा था कि प्रत्येक यात्री हमारा ग्राहक हो सकता है, लेकिन अब समझ में आ चुका है कि ऐसा नहीं है। मैं अपनी रुचि का काम करने जा रहा हूँ, तो यात्राओं में भी मेरी एक विशेष रुचि है, खासकर साहसिक और दूरस्थ यात्राएँ; तो मुझे ग्राहक भी उसी तरह के बनाने होंगे। जो ग्राहक मीनमेख निकालने के लिए ही यात्राएँ करते हैं, वे हमारे किसी काम के नहीं।

खैर, मैं बहुत दिनों से चाहता था कि दस साल से ऊपर के छात्रों को अपनी पसंद की किसी जगह की यात्रा कराऊँ। छात्रों को इसलिए क्योंकि इनमें सीखने और दुनिया को देखने-समझने की प्रबल उत्सुकता होती है। इनके माँ-बाप अत्यधिक डरे हुए लोग होंगे और अपने बच्चों को मेरी पसंद की जगह पर भेजना पसंद नहीं करेंगे, इसलिए अगर कोई स्कूली ट्रिप कराने का मौका लग जाए, तो मजा आ जाए। ज्यादातर माँ-बाप को खुद भी नहीं पता होता कि सेफ्टी क्या होती है और वे बच्चों को ‘ये मत करो, वो मत करो’ कह-कहकर सेफ रहना सिखाते हैं।

और जैसे ही एक स्कूल ने अपने 100 बच्चों की यात्रा के लिए संपर्क किया, तो मैंने सबसे पहले तीर्थन वैली का चुनाव किया। यात्रा जीभी-घियागी क्षेत्र में होनी थी, जो तीर्थन वैली नहीं है, लेकिन तीर्थन वैली से सटा होने के कारण पर्यटन की दृष्टि से इस वैली को भी तीर्थन वैली कह दिया जाता है। इसी कारण से मैं आगे भी जीभी वैली को तीर्थन वैली ही कहूँगा।

मैं बहुत दिनों से ऐसी कोई यात्रा कराना चाह रहा था और नवंबर में मुझे यह मौका मिला... 100 बच्चे... 9वीं और 11वीं कक्षा के...

Saturday, December 21, 2019

एक दिन रीठाखाल में


मुझे तीन दिन बाद दिल्ली पहुँचना था और मैं आज खिर्सू के पास मेलचौरी गाँव में था। यूँ तो समय की कोई कमी नहीं थी, लेकिन अनदेखे पौड़ी को देखने के लिए यह समय काफी कम था। पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड के 13 जिलों में से वह जिला है, जो पर्यटन नक्शे में नहीं है। पौड़ी गढ़वाल जिले का सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थल लक्ष्मणझूला है, जो आधा टिहरी के साथ साझा हो जाता है और आधा देहरादून के साथ और नाम होता है हरिद्वार का। बद्रीनाथ और केदारनाथ जाने वाले यात्री श्रीनगर से होकर गुजरते हैं, जो पर्यटक स्थल कम, सिरदर्द ज्यादा होता है। अब ले-देकर पौड़ी में लैंसडाउन बचता है और थोड़ा-सा खिर्सू, जो प्रसिद्धि पा रहे हैं। जबकि पौड़ी बहुत बड़ा है और मध्य हिमालय में स्थित होने के बावजूद भी यहाँ 3000 मीटर से भी ऊँची चोटियाँ विराजमान हैं। 2000 मीटर से ऊपर के तो कई स्थान हैं, जो बिल्कुल भी प्रसिद्ध नहीं हैं। और सबसे खास बात - 1500 मीटर ऊँची अनगिनत ‘खालों’ से हिमालयी चोटियों का जो नजारा दिखता है, वो अविस्मरणीय है।

आज मुझे 2400 मीटर ऊँची चौंरीखाल नामक ‘खाल’ से होते हुए थलीसैंण जाना था। कल थलीसैंण से लैंसडाउन की सड़क नापनी थी और परसों दिल्ली पहुँचना था।

तभी सत्य रावत जी का फोन आया - “सुना है तुम खिर्सू में हो?”
“हाँ जी, सही सुना है।”
“आगे का क्या प्लान है?”
“आज थलीसैंण रुकूँगा।”
“हम्मम्म... इसका मतलब चौंरीखाल से होकर जाओगे।”
“हाँ जी।”
“तो एक काम करो... थलीसैंण जाने की बजाय रीठाखाल आ जाओ।”
“उधर कौन है?”
“अरे, मैं ही हूँ...”
“अरे वाह... तो फटाफट फोन काटो... मैं पहुँच रहा हूँ रीठाखाल।”
“कैसे-कैसे आओगे?”
“गूगल मैप से।”
“गूगल तो तुम्हें मेन रोड से लाएगा... तुम ऐसा करो... कि चौंरीखाल से चोबट्टाखाल पहुँचकर फोन करो... आगे का रास्ता तुम्हें तभी बताऊँगा।”

मैंने फटाफट गूगल मैप खोला। दूरी और समय का अंदाजा लगाने लगा। मुझे पहाड़ों में रात में बाइक चलाने में कोई दिक्कत नहीं होती है, लेकिन नवंबर के आखिर में मैं इस क्षेत्र में रात में बाइक नहीं चलाना चाहता था। और 2000 मीटर से ऊपर तो कतई नहीं। कारण - ब्लैक आइस का डर।

Friday, December 20, 2019

उत्तराखंड की जन्नत है खिर्सू



18 नवंबर 2019
मैं बीनू के यहाँ जयालगढ़ में पड़ा हुआ था और पड़ा ही रहता, अगर टैंट पर धूप न आती। धूप आने से टैंट ‘ग्रीन हाउस’ बन गया और अंदर तापमान तेजी से बढ़ गया। आँख खुल गई। नाश्ते के लिए आलू के पराँठे बने हुए थे। गुनगुनी धूप में बैठकर तिवारी जी के साथ आलू के पराँठे खाने का अलग ही आनंद था।

बाइक की सर्विस करानी थी और धुलाई भी। बल्कि अगर सर्विस न होती, तब भी बात बन जाती... लेकिन धुलाई जरूरी थी। पास में ही धुलाई सेंटर था और उसके पास सर्विस सेंटर। लेकिन मैं धुलाई वाले से सर्विस की बात करने लगा और उसने मुझे आगे भेज दिया। आगे सर्विस वाले से धुलाई की भी बात की, तो उसने सुझाव दिया कि पहले सर्विस करा लो, वापसी में जाते हुए धुलाई कराते चले जाना।

एक घंटे बाद वापस आया, तो धुलाई वाले का शटर गिरा हुआ था। इस प्रकार आज बाइक की सर्विस तो हो गई, लेकिन धुलाई फिर भी न हो सकी।

लगता है कहीं नाले में घुसाकर खुद ही धोनी पड़ेगी।

दोपहर बाद मैं खिर्सू के लिए निकल पड़ा। खिर्सू इसलिए क्योंकि वहाँ अपना एक मित्र आदित्य निगम भी पहुँच चुका था। आदित्य ने अभी-अभी आर्किटेक्ट की पढ़ाई पूरी की है और घुमक्कड़ तो एक नंबर का है। हम दोनों की अच्छी बनती है, इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि हम बात-बात में एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं और बुरा भी नहीं मानते।

Thursday, December 19, 2019

बीनू कुकरेती का The Jayalgarh Resort



16 नवंबर 2019
आज मैं करोड़ों वर्ष बाद ऋषिकेश से देवप्रयाग वाली सड़क पर बाइक चला रहा था। इससे पहले तब गया था, जब चारधाम परियोजना का काम शुरू नहीं हुआ था। अब चारधाम परोयोजना का काम जोर-शोर से चल रहा था, लेकिन ज्यादातर सड़क बन चुकी थी। बाइक फर्राटे से चलती गई। हाँ, कहीं-कहीं ज्यादा जोर-शोर से काम होता, तो कई जगहों पर गाड़ियों की एक-एक किलोमीटर लंबी लाइन मिली। ऐसे में बहुत सारे ड्राइवर रोंग साइड पर चलकर अपनी गाड़ी को सबसे आगे ले जाते हैं और सामने से आने वाली गाड़ियों का रास्ता बंद कर देते हैं। मैं ऐसे सभी ड्राइवरों को गालियाँ देता हुआ रोंग साइड में चलकर अपनी बाइक को सबसे आगे ले जाकर खड़ी कर देता।

आज मैं जा रहा था बीनू कुकरेती के यहाँ। वह पौड़ी गढ़वाल जिले के बरसूड़ी गाँव का रहने वाला है और कई सालों से दिल्ली में ट्रांसपोर्ट का धंधा कर रहा था। पूरा परिवार दिल्ली में ही रहता है, लेकिन बीनू का मन पहाड़ों में लगता है, तो वह अपना धंधा छोड़कर पहाड़ में आ गया और श्रीनगर के पास जमीन खरीदकर एक रिसोर्ट बना लिया। मैं भी कई दिनों से हरिद्वार-देहरादून क्षेत्र में ही मंडरा रहा था, तो बीनू कई बार श्रीनगर आने को कह चुका था। आज मैं वहीं जा रहा था।

श्रीनगर से दस किलोमीटर पहले जयालगढ़ नामक स्थान है। यहीं पर The Jayalgarh Resort नाम से बीनू का ठिकाना है। उसने पहले ही बता दिया था कि सड़क के किनारे नीले रंग का बोर्ड लगा मिलेगा, लेकिन मेरा भरोसा गूगल मैप पर ज्यादा होता है और हमेशा यह मेरे भरोसे पर खरा उतरता है। अंधेरा हो चुका था और नीले रंग का बोर्ड मुझे नहीं दिखा। अगर गूगल गर्ल न चिल्लाती, तो मैं श्रीनगर पहुँच गया होता।

Wednesday, December 4, 2019

आप अपनी नौकरी कब छोड़ रहे हो?

“अनदेखे पहाड़” किताब के विमोचन के समय नरेंद्र से मुलाकात हुई... मैं उससे मिलने की बड़ी प्रतीक्षा कर रहा था... खासकर कुछ बड़े और जिम्मेदार लोगों के सामने...
“नरेंद्र, आज तुम यहीं रुक जाओ...”
“नहीं नीरज भाई, मन तो है रुकने का, लेकिन कल मुझे ड्यूटी जाना है..."
“मन है, तो छुट्टी मार लो...”
“नहीं, बिल्कुल भी छुट्टी नहीं मार सकता..."

मैंने डॉक्टर सुभाष शल्य जी को आवाज लगाई... “सर, इधर आना जरा... नरेंद्र का ब्रेनवाश करना है..."
वे एकदम लपककर आए... “हाँ हाँ, करो... मैं इसका ब्रेनवाश करने में फेल हो चुका हूँ... अब तुम कोशिश करो..."

“नरेंद्र, तुम्हारे हिस्से कितनी जमीन आएगी गाँव में?"
“तकरीबन 30 बीघे..."
“पिछले साल कितना तेल बेचा था??" पीली सरसों का तेल बेचने के कारण मैं कभी-कभार नरेंद्र को तेली भी कह देता हूँ...
“1500 लीटर"
“और इस साल?”
“3000 लीटर..."
“और तेल के अलावा गुड़ व आसाम की स्पेशल चाय भी बेच रहे हो.."
“हाँ...”
“नौकरी से सैलरी कितनी मिलती है??”
“यही कोई 15-16 हजार...”
“यानी 500 रुपये रोजाना"
“हाँ..."
“बस्स?? 500 रुपये रोजाना??... वो भी दिन और रात की शिफ्ट ड्यूटी??... यह तो तुम बहुत बड़ा घाटा उठा रहे हो..."

Friday, November 15, 2019

ग्राम आनंद: खेतों के बीच गाँव का वास्तविक आनंद



कुछ दिन पहले मैं देहरादून के पास उदय झा जी के यहाँ बैठा था। उनका घर विकासनगर शहर से बाहर खेतों में है। चारों तरफ खेत हैं और बासमती की कटाई हो चुकी है। अब गेहूँ की बुवाई की जाएगी।
अब चूँकि मैं आजीविका के लिए पूरी तरह पर्यटन के क्षेत्र में उतर चुका हूँ, इसलिए बातों-बातों में उदय जी ने पूछा - “पर्यटन के क्षेत्र में बहुत ज्यादा कंपटीशन है। कैसे सर्वाइव करोगे?”
मैंने कहा - “कंपटीशन जरूर है, लेकिन यह क्षेत्र अनंत संभावनाओं वाला है। आप वहाँ खेत में दस खाटें बिछा दो और प्रचार कर दो। जल्दी ही वे ऑनलाइन बुक होने लगेंगी और ‘हाउसफुल’ हो जाएँगी और आपको पचास खाटें और खरीदनी पड़ जाएँगी।”

Friday, November 8, 2019

जिंदगी जिंदाबाद - एक नया सफर



अभी मैं चिंतामणि जयपुरी की एक वीडियो देख रहा था, जिसमें उन्होंने बताया है कि उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी है। वैसे तो नौकरी छोड़ने का मेरा भी इरादा कई वर्षों का है, लेकिन वो एक लालच होता है हर महीने निर्बाध आती सैलरी का। वो जो चालीस-पचास हजार रुपये आते हैं और तमाम सुविधाएँ जो मिलती हैं, आजीवन मेडिकल आदि; उन्हें देखते हुए हिम्मत भी नहीं पड़ती। फिर इस नौकरी के लिए किया गया संघर्ष भी याद आता है। हमने दस साल पहले, बारह साल पहले कितना संघर्ष किया था इसके लिए! कितनी भागदौड़ की थी! कितने बलिदान किए थे!
चिंतामणि ने बताया कि उनके विभाग में किसी ने उनकी शिकायत की थी, जिसके बाद उनके अधिकारी उनके पीछे पड़ गए और रिश्वत तक माँगने लगे थे। आज के समय में चिंतामणि अपनी सैलरी से भी ज्यादा यूट्यूब से कमा रहा है; फिर उन्होंने कोई बिजनेस भी शुरू किया है; तो उन्हें नौकरी छोड़ने के लिए ऐसे ही एक झटके की आवश्यकता थी। अधिकारियों का पीछे पड़ना और रिश्वत माँगना ही वो झटका था और उन्होंने नौकरी छोड़ने का निर्णय ले लिया। अन्यथा वे भी पता नहीं कब से इस निर्णय को टालते आ रहे होंगे।
खैर, एक झटका मुझे भी लगा था पिछले साल, जब मेरा ट्रांसफर दिल्ली में ही 25 किलोमीटर दूर कर दिया गया। हालाँकि मेरी कोई शिकायत नहीं हुई और न ही किसी ने रिश्वत माँगी; यह एक रूटीन ट्रांसफर था। मैं 9 साल से एक ही जगह पर ड्यूटी बजा रहा था, तो ट्रांसफर लाजिमी था भी। लेकिन मुझे यह अच्छा नहीं लगा। शास्त्री पार्क से सरिता विहार डिपो तक जाने में डेढ़ घंटा तक लग जाता था। इसलिए मैंने बाद में बाइक से भी जाना शुरू किया, इससे 45 मिनट लगते थे।

Wednesday, September 18, 2019

मानसून में बस्तर के जलप्रपातों की सैर



13 अगस्त 2019
यदि आपके मन में छत्तीसगढ़ और बस्तर का नाम सुनते ही डर समा जाता है और आप स्वयं, अपने बच्चों को और अपने मित्रों को बस्तर जाने से रोकते हैं, तो आप एक नंबर के डरपोक इंसान हैं और दुनिया की वास्तविकता को आप जानना नहीं चाहते। अपनी पूरी जिंदगी अपने घर में, अपने ऑफिस में और इन दोनों स्थानों को जोड़ने वाले रास्ते में ही बिता देना चाहते हैं।

जब-जब भी छत्तीसगढ़ का नाम आता है, नक्सलियों का जिक्र भी अनिवार्य रूप से होता है। और आप डर जाते हैं। मैं दाद देना चाहूँगा कंचन सिंह को कि वह नहीं डरी। वह अपने एक फेसबुक मित्र (मैं और दीप्ति) और एक उसके भी मित्र (सुनील पांडेय) के साथ बस्तर की यात्रा कर रही थी। उसके सभी (अ)शुभचिंतक डरे हुए होंगे और हो सकता है कि उसने सबको अपने छत्तीसगढ़ में होने की बात बता भी न रखी हो। वह अपनी इस यात्रा को हर पल खुलकर जी रही थी और आज जब तक हम सब सोकर उठे, तब तक वह दंतेवाड़ा शहर की बाहरी सड़क पर चार किलोमीटर पैदल टहलकर आ चुकी थी। उसने सड़क पर एक साँप देखा था, जो कंचन के होने का आभास मिलते ही भाग गया था।

दंतेवाड़ा से गीदम और बारसूर होते हुए हम जा रहे थे चित्रकोट जलप्रपात की तरफ। भारत के सबसे चौड़े जलप्रपात की तरफ। भारत के नियाग्रा कहे जाने वाले जलप्रपात की तरफ। बारसूर से चित्रकोट का यह रास्ता छोटी-छोटी पहाड़ियों से युक्त है और घने जंगल से होकर गुजरता है। एक समय यह क्षेत्र नक्सलियों का गढ़ हुआ करता था, लेकिन आज ऐसा नहीं है। सुनील पांडेय जी चूँकि छत्तीसगढ़ के ही रहने वाले हैं, इसलिए नक्सल के बारे में हमसे ज्यादा जानते हैं। उन्होंने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में आदिवासियों के बीच काम भी किया है। इस डरावने जंगल में वे अपने अनुभव सुना रहे थे कि किस तरह नक्सली उन्हें उठाकर ले गए थे और किस तरह समझाने के बाद उन्होंने उन्हें छोड़ा।

Thursday, September 12, 2019

मानसून में बस्तर: दंतेवाड़ा, समलूर और बारसूर

बस्तर से अबूझमाड़

11 अगस्त 2019

छत्तीसगढ़ के हमारे सदाबहार, सदाहरित मित्र सुनील पांडेय जी अपने अडतालीस काम छोड़कर कसडोल से रायपुर आ गए थे - अपनी गाड़ी से। उधर कंचन भी आ चुकी थी, जो पहले लखनऊ से आगरा गई, आगरा से झेलम एक्सप्रेस पकड़कर दिल्ली गई और अगले दिन दिल्ली से फ्लाइट से रायपुर। तो इस तरह हम चार जने रायपुर से बस्तर की ओर जा रहे थे। वैसे तो हमने अपनी पूरी फेसबुक बिरादरी से इस यात्रा पर चलने को कहा था, लेकिन "डर के आगे जीत है" का हौंसला इन चार ने ही दिखाया। हम ये तो नहीं जानते कि हमारी इस यात्रा पर कितने लोगों की आँखें लगी थीं, लेकिन यह जरूर जानते हैं कि कुछ लोग नक्सली हमला और बम-भड़ाम होने की उम्मीद जरूर कर रहे होंगे।

कंचन को भूख लगी थी, इसके बावजूद भी उन्होंने हमें फ्लाइट में मिले पेटीज, बर्गर बाँट दिए। इससे हमारी भूख तो कांकेर तक के लिए मिट गई, लेकिन कंचन की भूख ने धमतरी भी नहीं पहुँचने दिए। कुरुद में बस अड्डे पर कुछ छोटा-मोटा मिलने की आस में गाड़ी रोकी, लेकिन वहाँ तो जन्नत मिल गई। चाय के साथ ताजे समोसे और जलेबियाँ। पोहा भी था, लेकिन मैं और दीप्ति रायपुर से ही इतना पोहा खाकर चले थे कि और खा लेते, तो वापस निकल जाता। इसलिए समोसे, जलेबी और चाय ले लिए।

हमारी मित्र-मंडली में समोसे आदि पर बहस चलती रहती है। कोई कहता है खाना चाहिए, कोई कहता है कि नहीं खाना चाहिए, कोई कहता है कि इस तेल में बने तो ही खाने चाहिए... जितने मूँ, उतनी बातें। उधर मैंने अभी हाल ही में सिंगापुर की 110 साल की एक बुढ़िया की खबर पढ़ी, जिसके मुँह में सिगरेट थी और नीचे लिखा था - "मेरे जो भी दोस्त सिगरेट नहीं पीते थे, वे सभी मर गए।”

Friday, August 16, 2019

रायपुर से केवटी पैसेंजर ट्रेन यात्रा



10 अगस्त 2019
यह रेलवे लाइन पहले दल्ली राजहरा तक थी। रेलवे लाइन दुर्ग से शुरू होती है और बालोद होते हुए दल्ली राजहरा तक जाती है। दल्ली राजहरा में लौह अयस्क की खदानें हैं, जिनसे भिलाई स्टील प्लांट में स्टील बनाया जाता है।
फिर इस लाइन को आगे जगदलपुर तक बढ़ाने का विचार किया गया। इसे जगदलपुर तक ले जाने में एक समस्या थी कि यह लाइन अबूझमाड़ से होकर गुजरनी थी। माड़ का अर्थ है पहाड़ी और अबूझ का अर्थ है जिसका पता न हो। यह पूरा क्षेत्र छोटी-बड़ी पहाड़ियों से युक्त है और घना जंगल तो है ही। वर्तमान में लगभग पूरा अबूझमाड़ नक्सलियों का गढ़ है और आए दिन नक्सलियों व सुरक्षाबलों के बीच मुठभेड़ की खबरें आती रहती हैं। नक्सली यहाँ सड़क तक नहीं बनने देते, तो रेलवे लाइन क्यों बनने देंगे?
लेकिन रेलवे लाइन बन रही है। पहले दल्ली राजहरा से गुदुम तक बनी, फिर गुदुम से भानुप्रतापपुर तक और अभी 30 मई को भानुप्रतापपुर से केवटी तक भी यात्री ट्रेनें चलने लगीं। केवटी से अंतागढ़ ज्यादा दूर नहीं है और जल्द ही अंतागढ़ में रेल की सीटी सुनाई देने लगेगी। फिर अंतागढ़ से नारायणपुर, कोंडागाँव होते हुए यह रेलवे लाइन जगदलपुर में केके लाइन में मिल जाएगी।

Sunday, July 21, 2019

रघुपुर किले की फटाफट यात्रा

Raghupur Fort, Jalori Pass, Kullu

19 जुलाई 2019, शुक्रवार...
दोपहर बाद दिल्ली से करण चौधरी का फोन आया - "नीरज, मैं तीर्थन वैली आ रहा हूँ।”
"आ जाओ।”
फिर दोपहर बाद के बाद फोन आया - "नीरज, मैं नहीं आ रहा हूँ।”
"ठीक है। मत आओ।”
शाम को फोन आया - " हाँ नीरज, कैसे हो?... क्या कर रहे हो?... मैं आ रहा हूँ।”
"आ जाओ।”
रात नौ बजे फोन आया - "अरे नीरज, खाना खा लिया क्या?... सोने की तैयारी कर रहे होंगे?... बस, ये बताने को फोन किया था कि मैं नहीं आ रहा हूँ।”
"ठीक है। मत आओ।”
रात दस बजे फोन आया - "अरे बड़ी जल्दी सो जाते हो तुम।... इतनी जल्दी कौन सोता है भाई!... मैं आ रहा हूँ... बस में बैठ गया हूँ... ये देखो फोटो... सबसे पीछे की सीट मिली है।”
"खर्र.र्र.र्र..."
रात ग्यारह बजे फोन आया - "अरे सुनो, एक पंगा हो गया। बस वाले ने मुझे बाइपास पर उतार दिया है। उस बस में पहले से ही किसी और की बुकिंग थी और बस वाले ने मुझे भी बैठा लिया था। अब उतार दिया है। तो अब मैं नहीं आ रहा हूँ।"
"खर्र.र्र.र्र... खर्र.र्र.र्र..."
रात साढ़े ग्यारह बजे फोन आया - "होये उठ... हमेशा सोता रहता है... मैं आ रहा हूँ... दूसरी बस में सीट मिल गई है।”
"खार्र.र्र.र्र... खूर्र.र्र.र्र... खिर्र.र्र.र्र..."

Monday, July 8, 2019

राज ठाकुर का गाँव: बीजल



शांघड़ में थे, तो बड़ी देर तक राज ठाकुर को फोन करता रहा, लेकिन उसने उठाया नहीं। उसने आज हमें अपने घर पर बुलाया था - लंच के लिए और हमने उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया था। निमंत्रण इसलिए लिख रहा हूँ, क्योंकि लंच करके हमें वहाँ से चले जाना था। अगर चले जाने की बात न होती, तो आमंत्रण लिखता। उसके घर में कुछ काम चल रहा है, इसलिए वह अतिथियों का अच्छा सत्कार नहीं कर पाएगा, इसका उसे डर था और इसीलिए वह हमें ठहराने से मना कर रहा था।
आधे घंटे बाद जब उसका फोन आया, तो मेरा उत्तर था - “भाई जी, आपने फोन नहीं उठाया और हम बंजार पहुँच गए हैं। अब फिर कभी आएँगे।”
“ओहो... मुझे पता नहीं चला... मोबाइल खराब हो गया है... देख लो अगर आ सको तो...”
“नहीं आ सकते...”
“ये क्या हो गया मुझसे! ये तो बड़ी भारी गलती हो गई...”
“अच्छा, अच्छा ठीक है... आ रहे हैं आधे घंटे में... अभी शांघड़ से चले हैं... और अबकी बार फोन उठा लेना।”
रोपा में कमल जी को अलविदा कहा, क्योंकि उन्हें आज शिमला जाना था। लेकिन शाम को पता चला कि वे कसोल चले गए। मैं नशे से मीलों, कोसों, प्रकाश वर्षों दूर रहता हूँ, इसलिए मुझे कसोल और मलाणा कतई पसंद नहीं हैं और जो लोग कसोल जाते हैं, वे छँटे हुए नशेड़ी दिखाई पड़ते हैं। वैसे कमल जी ऐसे तो नहीं थे।

Sunday, July 7, 2019

शांघड़: बेहद खूबसूरत मुकाम



मनु ऋषि मंदिर से लौटकर हम रोपा में एक ढाबे पर चाय पी रहे थे। रसोई के दरवाजे पर लिखा था - "नो एंट्री विदाउट परमिशन"... और अजीत जी ने रसोई में घुसकर मालिक के हाथ में ढेर सारी प्याज और मालकिन के हाथ में ढेर सारे टमाटर देकर बारीक काटने को कह दिया। वे दोनों बाहर बैठकर प्याज-टमाटर काटने में लगे थे और अजीत जी रसोई में अपनी पसंद का कोई बर्तन ढूँढ़ने में लगे थे।
इस तरह एक बेहद स्वादिष्ट डिश हमारे सामने आई - साकशुका। मैं और कमल रामवाणी जी इस नाम को बार-बार भूल जाते थे और आखिरकार कमल जी ने इसका भारतीय नामकरण किया - सुरक्षा। अब हम यह नाम कभी नहीं भूलेंगे। जमकर ‘सुरक्षा’ खाई और बनाने की विधि मालिक-मालकिन दोनों को समझा दी।
अब बारी थी शांघड़ जाने की। आप गूगल पर शांघड़ (Shangarh) टाइप कीजिए, आपको ऐसे-ऐसे फोटो देखने को मिलेंगे कि आप इस स्थान को अपनी लिस्ट में जरूर नोट कर लेंगे। पक्का कह रहा हूँ। भरोसा न हो, तो करके देख लेना। तो हमने भी इसे नोट कर रखा था और आज आखिरकार उधर जा रहे थे।
रोपा से एक किलोमीटर आगे से शांघड़ की सड़क अलग होती है। दूरी 7 किलोमीटर है। नई बनी सड़क है और अभी कच्ची ही है। मोटरेबल है, बसें चलती हैं, कारें भी चलती हैं और मोटरसाइकिलें भी। रास्ते-भर इसे पक्का करने का काम लगा हुआ है। ठेकेदार काम छोड़कर न भागा, तो बारिश के इसी सीजन में सड़क पक्की बन जाएगी। वैसे भी बारिश में ग्रामीण सड़कें नहीं बना करतीं। गिट्टी के ऊपर डाली गई मिट्टी बह जाती है, बहती रहती है और आखिरकार ठेकेदार काम छोड़ देता है। ऐसा मैंने सुना है।
तो जिस समय शांघड़ पहुँचे, बूंदाबांदी होने लगी थी और अजीत जी ने तय कर लिया था कि कहाँ रुकना है। यह स्नोलाइन होम-स्टे था और इसके बोर्ड रोपा से ही देखने में आ रहे थे। बोर्ड से फोन नंबर लेकर जिस आदमी से कमरे की बात की, वह कहीं बाहर था और उसने 1000 रुपये का कमरा बोल दिया। जब कमरे में पहुँचे, तो लड़का उदास था, क्योंकि वह 1500 का देना चाहता था। 1000 बोलने वाला उसका पापा था, इसलिए बात माननी पड़ी अन्यथा हमें कहीं और ट्राई करना पड़ता। शांघड़ में कमरों की कोई कमी नहीं है और आज जून का आखिरी शनिवार होने के बावजूद भी कोई चहल-पहल नहीं थी। इसका मतलब था कि सब कमरे खाली पड़े थे।

Saturday, July 6, 2019

एक यात्रा सैंज वैली की



मैं जब अप्रैल 2019 के दूसरे सप्ताह में दिल्ली से हिमाचल के लिए निकला था, तो यही सोचकर निकला था कि तीर्थन वैली में रहूँगा और ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क में ट्रैकिंग किया करूँगा। लेकिन समय का चक्र ऐसा चला कि न मैं तीर्थन वैली में रह पाया और न ही ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क में जा पाया। तीर्थन वैली के बगल में एक छोटी-सी वैली है - जीभी वैली। इस वैली के घियागी गाँव में अपना ठिकाना बना और मेरा सारा समय घियागी में ही कटने लगा।
अभी पिछले दिनों अजीत सिंह जी आए और जीभी वैली से बाहर कहीं घूमकर आने को उकसाने लगे। मैं उनके उकसाए में नहीं आता और कल चलेंगे, परसों चलेंगे कहकर बच जाता। फिर कल-परसों आते-आते शनिवार आ जाता और मैं “वीकएंड पर बहुत भीड़ रहेगी और हम जाम में फँसे रहेंगे" कहकर फिर से अपना बचाव कर लेता। हालाँकि यहाँ न भीड़ होती है और न ही जाम। और कमाल की बात ये है कि घियागी की खाली सड़क पर मैं अजीत सिंह जी को भरोसा दिला देता कि भीड़ बहुत है और जाम भी लगा है।
लेकिन शुक्रवार 28 जून को मेरी नहीं चली और हम अपनी-अपनी मोटरसाइकिलों से सैंज वैली की ओर बढ़े जा रहे थे। आज मेरी न चलने का भी एक कारण था। मेरे सिर के बाल बहुत बढ़ गए थे और इतनी बेचैनी होने लगी थी कि रोज नहाना पड़ता था। यहाँ नाई न घियागी में था और न ही जीभी में। नजदीकी नाई 10 किलोमीटर दूर बंजार में था और नहाने से बचने के लिए बंजार जरूर जाना पड़ता। बस, इसी वजह से मुझे निकलना पड़ा और जब एक बार निकल गया तो सीधे सैंज वैली के प्रवेश द्वार लारजी पहुँचकर ही दम लिया। लारजी से चार किलोमीटर दूर ही औट है, जहाँ से दिल्ली-मनाली सड़क गुजरती है।

Friday, June 28, 2019

पुस्तक-चर्चा: लद्दाख-यात्रा की डायरी

पिछले दिनों किसी ने एक फेसबुक ग्रुप में एक फोटो डाला, जो किसी किताब के एक पन्ने का फोटो था। उन्होंने इस किताब की जानकारी चाही थी। उस पन्ने पर सबसे ऊपर लिखा था - लद्दाख-यात्रा की डायरी। फिर साइबर एक्सपर्ट प्रकाश यादव जी ने पता नहीं कहाँ से ढूँढ़कर इस किताब को डाउनलोड करने का लिंक उपलब्ध करा दिया। मैंने भी यह किताब डाउनलोड कर ली। आप भी इसे डाउनलोड कर सकते हैं। लिंक इस लेख के आखिर में दिया गया है।

किताब 1955 में सत्साहित्य प्रकाशन से प्रकाशित हुई थी। इसका मतलब यह हुआ कि यात्रा 1955 से पहले की गई थी। आजकल तो लद्दाख में यात्राओं का एक बँधा-बँधाया रूटीन होता है - लेह से खारदुंग-ला, नुब्रा वैली और पेंगोंग, शो-मोरीरी देखते हुए वापस। चार दिनों में यह रूटीन पूरा हो जाता है और आजकल की लद्दाख यात्रा कम्पलीट हो जाती है। इन यात्राओं को पढ़ने में रोमांच भी नहीं आता और न ही कोई नयापन लगता है। लेकिन 1955 से पहले की यात्राएँ हमेशा ही रोमांचक होती थीं। उस समय तक चीन ने भी अक्साई-चिन और तिब्बत पर कब्जा नहीं किया था और लद्दाख का लगभग समूचा क्षेत्र व्यापारियों, शिकारियों और पर्यटकों के लिए खुला था।

पुस्तक के लेखक लेफ्टिनेंट कर्नल सज्जन सिंह अपने जमाने में ओरछा राज्य के दीवान थे। साथ ही साथ शिकारी भी थे। बातों-बातों में एक बार एक अंग्रेज महिला ने इनसे कहा - “और सब शिकार तो आप हिंदुस्तानियों के बस के हैं, लेकिन लद्दाख में शिकार और उनमें भी ओविस अमोन (एक जंगली भेड़) को मारने का बूता आपका नहीं है।”

Tuesday, June 11, 2019

देवदार के खूबसूरत जंगल में स्थित है बाहू और बालो नाग मंदिर


एक दिन की बात है मैं मोटरसाइकिल लेकर घियागी से बाहू की तरफ चला। इरादा था गाड़ागुशैनी और छाछगलू पास तक जाना। छाछगलू पास का नाम मैंने पहली बार तरुण गोयल से सुना था और इस नाम को मैं हमेशा भूल जाता हूँ। तब हमेशा गोयल साहब से पूछता हूँ और आज भी गोयल साहब से पूछने के बाद ही लिख रहा हूँ। उनसे पूछने का एक कारण और भी है कि वे इसे “छाछगळू” बोलते हैं। और इस तरह बोलते हैं जैसे मुँह में छाछ और गुड़ भरकर बोल रहे हों। तो मुझे यह उच्चारण सुनना बड़ा मजेदार लगता है और मैं बार-बार उनसे इसका नाम पूछता रहता हूँ।

तो उस दिन मैं बाहू तक गया और सामने दिखतीं महा-हिमालय की चोटियों को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया। यह समुद्र तल से 2300 मीटर ऊपर है और एकदम सामने ये चोटियाँ दिखती हैं। जीभी और घियागी तो नीचे घाटी में स्थित हैं और वहाँ से कोई बर्फीली चोटी नहीं दिखती। तो यहाँ आकर ऐसा लगा जैसे रोज आलू खाते-खाते आज शाही पनीर मिल गया हो।
जीभी से इसकी दूरी 10 किलोमीटर है और शुरू में बहुत अच्छी सड़क है, फिर थोड़ी खराब है, फिर और खराब है और आखिर में जब आप बाहू में खड़े होते हैं और कोई बस गुजर जाए, तो आप धूल से सराबोर हो जाएँगे, बशर्ते कि उस दिन धूप निकली हो। उस दिन भी तेज धूप निकली थी और जैसे ही बंजार-छतरी बस आई, मुझे गर्मागरम चाय का कप हथेली से ढकना पड़ा था।
फिर हुआ ये कि तेज धूप के कारण मेरी आँखों में जलन होने लगी और मैं वापस घियागी लौट आया - गाड़ागुशैनी और छाछगलू फिर कभी जाने का वादा करके।

Monday, June 10, 2019

आश्चर्यचकित कर देने वाली इमारत: चैहणी कोठी


घर की मुर्गी दाल बराबर... इस वजह से हम डेढ़ महीने यहाँ गुजारने के बाद भी चैहणी कोठी नहीं जा पाए। हमारे यहाँ घियागी से यह जगह केवल 10 किलोमीटर दूर है और हम ‘चले जाएँगे’, ‘चले जाएँगे’ ऐसा सोचकर जा ही नहीं पा रहे थे। और फिर एक दिन शाम को पाँच बजे अचानक मैं और दीप्ति मोटरसाइकिल से चल दिए।

चलते रहे, चलते रहे और आखिर में सड़क खत्म हो गई। इससे आगे काफी चौड़ा एक कच्चा रास्ता ऊपर जाता दिख रहा था, जिस पर मोटरसाइकिल जा सकती थी, लेकिन कुछ दिन पहले यहाँ आए निशांत खुराना ने बताया कि उस कच्चे रास्ते पर मोटरसाइकिल से बिल्कुल भी मत जाना। तो इस बारे में वहीं बैठे एक स्थानीय से पूछा। उसने भी एकदम निशांत वाले शब्द कहे। मोटरसाइकिल यहीं किनारे पर खड़ी करने लगे, तो उसने कहा - “यहाँ की बजाय वहाँ खड़ी कर दो। अभी बस आएगी, तो उसे वापस मुड़ने में समस्या आएगी।”

यहाँ से आगे पैदल रास्ता है।
“कितना दूर है? आधे घंटे में पहुँच जाएँगे क्या?”
“नहीं, आधे घंटे में तो नहीं, लेकिन पौण घंटे में पहुँच जाओगे।” उसी स्थानीय ने बताया।
“मतलब दो किलोमीटर दूर है।”
“हाँ जी।”

Friday, May 31, 2019

गर्मी जा रही है, मानसून आ रहा है


आज भारत के मौसम की स्टडी करते हैं... भारत का काफी हिस्सा उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में आता है... यानी सूरज सीधा सिर के ऊपर चमकता है... गर्मी खूब होती है... गर्मी होने से हवाओं की डेंसिटी कम हो जाती है... जबकि हिंद महासागर में भूमध्य रेखा के दक्षिण में सर्दी पड़ने के कारण हवाओं की डेंसिटी ज्यादा रहती है... हिंद महासागर के धुर दक्षिण में अंटार्कटिका है और धुर उत्तर में भारत... यानी हिंद महासागर के दक्षिण में ज्यादा डेंसिटी वाली हवाएँ होती हैं और उत्तर में कम डेंसिटी की हवाएँ... तो जाहिर-सी बात है कि हवा ज्यादा डेंसिटी से कम डेंसिटी की ओर चलना शुरू कर देंगी...

अब होता ये है कि धरती के घूमने के कारण व अन्य कई कारणों से ये हवाएँ अफ्रीका को स्पर्श करती हुई उत्तर की ओर चलने लगती हैं... पूर्वी अफ्रीका में इन हवाओं की वजह से मार्च से ही बारिश होने लगती है... भूमध्य रेखा तक आते-आते ये ठंडी हवाएँ गर्म भी होने लगती हैं... चलते-चलते ये अरब सागर से होती हुई खाड़ी देशों से टकराती हैं और अपनी दिशा परिवर्तन करते हुए पूर्व की ओर बहने लगती हैं... ईरान, पाकिस्तान के दक्षिणी हिस्से से लगती हुए ये भारत के गुजरात राज्य के कच्छ में तेजी से प्रवेश करती हैं... खाड़ी देशों से कच्छ तक का सारा क्षेत्र मरुस्थल है और गर्मियों में अत्यधिक गर्म भी रहता है... ये हवाएँ भले ही समुद्र के ऊपर से आती हों, लेकिन इस गर्म मरुस्थल के ऊपर से गुजरने के कारण इनकी सारी नमी समाप्त हो जाती है और ये बारिश करने लायक नहीं बचतीं...

Friday, May 24, 2019

जलोड़ी जोत से लांभरी हिल का ट्रैक

अभी हाल ही में तरुण गोयल साहब ने बशलेव पास का ट्रैक किया। यह ट्रैक तीर्थन वैली में स्थित गुशैनी से शुरू होता है। कुछ दूर बठाहड़ गाँव तक सड़क बनी है और कुल्लू से सीधी बसें भी चलती हैं। बशलेव पास लगभग 3300 मीटर की ऊँचाई पर है और ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के एकदम बाहर है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इस नेशनल पार्क के अंदर जितना घना जंगल है, उससे भी ज्यादा घना जंगल नेशनल पार्क के बाहर है। काले भालू और तेंदुए तो इतने हैं कि दिन में भी देखे जा सकते हैं। मैं भी आजकल इसी ‘आउटर’ जंगल में स्थित एक गाँव घियागी में रहता हूँ। हालाँकि मुझे कोई भी जानवर अभी तक दिखाई नहीं दिया है। एक बार रात को टहलते समय नदी के पार भालू के चीखने की आवाज सुनी थी, तो उसी समय से रात में टहलना बंद कर दिया था। और अभी दो-तीन दिन पहले ग्रामीणों ने बताया कि शाम के समय जीभी और घियागी के बीच में एक तेंदुआ सड़क पर आ गया था, जिसे बस की सभी सवारियों ने देखा।
तो मैं बता रहा था कि गोयल साहब सपरिवार बशलेव पास का ट्रैक करके आए। और जिस दिन वे बशलेव पास पर थे, उस दिन मैं भी ट्रैक कर रहा था और उनसे 8 किलोमीटर ही दूर था। उन्होंने अपने ब्लॉग में एक फोटो लगाया और लिखा कि वे बशलेव से लांभरी/जलोड़ी का संभावित रास्ता देख रहे हैं। (शायद वे अगला ट्रैक बशलेव से लांभरी/जलोड़ी का करेंगे।) मैं ठीक इसी समय जलोड़ी से लांभरी का ट्रैक कर रहा था, जिसकी कहानी विस्तार से आप अभी पढ़ेंगे।

अशोक लीलेंड में काम करने वाले शिवेंद्र प्रताप चतुर्वेदी अपनी पत्नी और कुछ मित्रों के साथ तीर्थन वैली घूमने आए। उनका इरादा कोई बड़ी ट्रैकिंग करने का नहीं था, लेकिन ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क नजदीक ही है, उनका मन डोल गया - “नीरज भाई, जी.एच.एन.पी. में एकाध दिन की ट्रैकिंग हो जाएगी क्या?”
“हो जाएगी, बात करता हूँ।”

Wednesday, May 8, 2019

तीर्थन डायरी - 1 (7 मई 2019)

आज की इस पोस्ट का नाम “होटल ढूँढो टूर” होना चाहिए था। असल में जब से हमारे दोस्तों को यह पता चला है कि हम कुछ महीने यहाँ तीर्थन वैली में बिताएँगे, तो बहुत सारों ने आगामी छुट्टियों में शिमला-मनाली जाना रद्द करके तीर्थन आने का इरादा बना लिया है। अब मेरे पास तमाम तरह की इंक्‍वायरी आती हैं। बहुत सारे दोस्त तो ऐसी बातें पूछ लेते हैं, जिनका एक महीना बिताने के बाद मुझे भी नहीं पता। फिर मैं पता करता हूँ, तो खुद पर हँसता हूँ।

एक दोस्त ने 5-6 दिन यहाँ बिताने और अपने लिए एक यात्रा डिजाइन करने का ठेका मुझे दिया। अब मैं तो खाली बैठा हूँ। लग गया डिजाइन करने में। पहले दिन ये, दूसरे दिन वो... फिर ये, फिर वो। सबसे महँगे होटलों में उनके ठहरने का खर्चा भी जोड़ दिया और टैक्सी आदि का भी। फिर जब सारा टोटल किया, तो मेरे होश उड़ गए। करोड़ों रुपये का बिल बन गया। अबे इतना खर्चा थोड़े ही होता है... कम कर, कम कर... फिर सस्ते होटल की कैलकुलेशन करी। खर्चा कुछ कम तो हुआ, लेकिन था फिर भी करोड़ों में ही। और मैंने उन्हें कह दिया - “सर जी, आपकी फैमिली के लिए इतने करोड़ रुपये का बिल बना है।”

जैसी उम्मीद थी, वैसा ही जवाब आया - “फिर रहने दो... यह तो बहुत ज्यादा है।”
फिर मैंने सस्ता खर्चा बता दिया - “सर जी, इतने करोड़ रुपये का बिल बनेगा।”
“हाँ, ये ठीक लग रहा है... फोटो भेजो उन होटलों के।”

Wednesday, April 24, 2019

किन्नर कैलाश की डिजीटल यात्रा


अभी कल्पा में हूँ और सामने किन्नर कैलाश चोटी भी दिख रही है और शिवलिंग भी। चोटी लगभग 6000 मीटर की ऊँचाई पर है और शिवलिंग लगभग 4800 मीटर पर। यात्रा शिवलिंग की होती है और लोग बताते हैं कि वे चोटी तक की यात्रा करके आए हैं। कुछ समय पहले तक मैं चोटी और शिवलिंग को एक ही मानता था और इसी चिंता में डूबा रहता था कि 6000 मीटर तक जाऊँगा कैसे? दूसरी चिंता ये बनी रहती थी कि वे कौन लोग होते हैं जो 6000 मीटर तक पहुँच जाते हैं?

6000 मीटर की ऊँचाई और ट्रैकिंग बहुत ज्यादा होती है... बहुत ही ज्यादा...। मेरी अपर लिमिट 5000 मीटर की है, हद से हद 5200 मीटर तक... बस। जिस दिन इससे ज्यादा ऊँचाई का ट्रैक कर लूँगा, उस दिन एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे के बराबर मान लूँगा खुद को। 

पिछले साल गोयल साहब किन्नर कैलाश का ट्रैक करके आए... और आते ही सबसे पहले तो उन लोगों को खरी-खोटी सुनाई, जो बताते हैं कि यात्रा 6000 मीटर तक होती है। और फिर बताया कि यात्रा केवल 4800 मीटर तक ही होती है। यह सुनते ही मुझे बड़ा सुकून मिला। अभी तक जो किन्नर कैलाश मेरी अपर लिमिट से बहुत ऊपर था, अब अचानक अपर लिमिट के अंदर आ गया। इसका मतलब ये हुआ कि मैं इस यात्रा को कर सकता हूँ।

मैं 4800 मीटर की ऊँचाई तक आराम से जा सकता हूँ और इतनी ऊँचाई पर रात भी रुक सकता हूँ। मैंने पहले भी इतनी ऊँचाई के कई ट्रैक किए हैं, जिनमें रूपकुंड प्रमुख है... लेकिन जैसे ही ऊँचाई 5000 मीटर को पार करती है, मेरी साँसें उखड़ने लगती हैं।

Thursday, April 18, 2019

इन छुट्टियों में हिमाचल में तीर्थन वैली जाइए

हम आपको भारत के अल्पप्रसिद्ध स्थानों के बारे में बताते रहते हैं। लेकिन अब हमने बीड़ा उठाया है आपको इन स्थानों की यात्रा कराने का... वो भी एकदम सुरक्षित और सुविधाजनक तरीके से। तो चलिए, इसकी शुरूआत करते हैं तीर्थन वैली से।

दिल्ली-मनाली हाइवे पर मंडी से 40 किलोमीटर आगे और कुल्लू से 30 किलोमीटर पीछे एक स्थान है औट। यहाँ 3 किलोमीटर लंबी एक सुरंग भी बनी हुई है, जो किसी जमाने में भारत की सबसे लंबी सड़क सुरंग हुआ करती थी। इस सुरंग का एक छोटा-सा दृश्य ‘थ्री ईडियट्स” फिल्म में भी दिखाया गया है।
औट के पास ब्यास नदी पर एक बाँध बना हुआ है। और ठीक इसी स्थान पर ब्यास में तीर्थन नदी भी आकर मिलती है और यहीं से तीर्थन वैली की शुरूआत हो जाती है। अब अगर हम तीर्थन नदी के साथ-साथ चलें, तो सबसे पहले जो नदी इसमें मिलती है, उस नदी की घाटी को सैंज वैली कहते हैं। उसके बारे में हम फिर कभी बात करेंगे। फिलहाल तीर्थन वैली की ही बात करते हैं।
तो औट से चलने के 20 किलोमीटर बाद एक कस्बा आता है, जिसका नाम है बंजार। यह यहाँ का तहसील मुख्यालय भी है और तीर्थन वैली का सबसे बड़ा और सबसे मुख्य स्थान भी है। बंजार समुद्र तल से लगभग 1400 मीटर ऊपर है। यहाँ से सड़क तो तीर्थन वैली को छोड़कर सीधे जलोडी जोत और रामपुर की ओर चली जाती है, लेकिन एक अन्य सड़क तीर्थन वैली में भी जाती है, जो साईरोपा, गुशैनी होते हुए बठाहड़ तक जाती है। चलिए, हम भी इसी सड़क पर चलते हैं।

Tuesday, April 9, 2019

तमिलनाडु से दिल्ली वाया छत्तीसगढ़

8 मार्च 2019
हम ऊटी में थे और आज पूरे दिन ऊटी में ही रहने वाले थे। ऊटी के कुछ दर्शनीय स्थलों की लिस्ट दीप्ति ने बना रखी थी और मुझे भी उन स्थलों पर जाना ही था। मुझे पहली नजर में ऊटी पसंद नहीं आया था, पता नहीं क्यों।
तो लिस्ट के अनुसार जहाँ-जहाँ भी गए, सभी जगहें दीप्ति को नापसंद होती चली गईं। और उसे ऊटी के भीड़-भरे टूरिस्ट स्पॉट्स भला पसंद भी क्यों आएँगे!
पहले ‘रोज गार्डन’ गए, लेकिन वहाँ एक ही क्यारी में कुछ फूल खिले थे। कर्मचारी कह रहे थे कि सभी फूल देखने अप्रैल में आना।
ऊटी लेक गए, तो यह देखकर हैरान रह गए कि अलग-अलग नाव ठेकेदारों ने झील के भी अपने-अपने हिस्से बाँट रखे हैं। मोटर बोट पैडल बोट के हिस्से में नहीं जा सकती और पैडल बोट चप्पू वाले हिस्से में नहीं जा सकती। यहाँ तक कि आप झील के किनारे पर भी तभी बैठ पाएँगे, जब आपने उस हिस्से वाली बोट का टिकट लिया हो। यहाँ से भी वापस भाग लिए।
वापस होटल आए और “हाय गर्मी, हाय गर्मी” कहते सो गए। हालाँकि ऊटी में गर्मी नहीं थी।

Monday, April 8, 2019

दक्षिण के जंगलों में बाइक यात्रा

6 मार्च 2019
हम मैसूर में थे और इतना तो फाइनल हो ही गया था कि अब हम पूरा केरल नहीं घूमेंगे और कन्याकुमारी तक भी नहीं जाएँगे। यहाँ गर्मी बर्दाश्त से बाहर होने लगी थी और हिमालय से बर्फबारी की खबरें आ रही थीं। मुझे चेन्नई निवासी शंकर राजाराम जी की याद आई। आजकल वे हिमालय में थे और जनवरी में हिमालय जाते समय वे हमारे यहाँ भी होकर गए थे। और उस समय वे चेन्नई की गर्मी से परेशान थे और बार-बार कह रहे थे कि उन्हें भी साउथ की गर्मी बर्दाश्त नहीं होती। अब जैसे-जैसे दिन बीतते जा रहे हैं, हमें शंकर सर भी याद आ रहे हैं और साउथ की गर्मी भी उतनी ही भयानक लगती जा रही है।
लेकिन दीप्ति की इच्छा ऊटी देखने की थी। ऊटी समुद्र तल से 2000 मीटर से ज्यादा ऊँचाई पर है और इतनी ऊँचाई पर तापमान काफी कम रहता है। लेकिन हम कितने दिन ऊटी में बिता सकते हैं? ऊटी के चारों तरफ ढलान है और चारों ही तरफ नीचे उतरने पर भयानक गर्मी है। हम दो-चार दिन ऊटी में रुक सकते हैं, लेकिन आखिरकार कहीं भी जाने के लिए इस भयानक गर्मी में एंट्री मारनी ही पड़ेगी। इसलिए मुझे ऊटी भी आकर्षक नहीं लग रहा था।
अब जब दीप्ति की इच्छा के कारण मैसूर से ऊटी जाना ही है, तो एक दिन और लगाकर कुछ जंगलों में बाइक राइडिंग करने की इच्छा होने लगी। कर्नाटक के इस हिस्से में दो नेशनल पार्क हैं - नागरहोल और बांदीपुर। नागरहोल कर्नाटक-केरल सीमा पर है और बांदीपुर कर्नाटक-केरल-तमिलनाडु सीमा पर। कर्नाटक से बाहर सीमा के उस तरफ केरल और तमिलनाडु में भी नेशनल पार्क और वाइल्डलाइफ सेंचुरी हैं। यानी यह क्षेत्र घने जंगलों वाला क्षेत्र है।
तो फाइनल डिसीजन ये लिया कि हम नागरहोल नेशनल पार्क से होते हुए केरल के वायनाड जिले में प्रवेश करेंगे। एक रात वायनाड में कहीं पर रुककर बांदीपुर नेशनल पार्क होते हुए वापस कर्नाटक आएँगे और फिर मैसूर-ऊटी सड़क पकड़कर तमिलनाडु स्थित मुदुमलई नेशनल पार्क से होते हुए ऊटी जाएँगे।

Saturday, April 6, 2019

प्राचीन मंदिरों के शहर: तालाकाडु और सोमनाथपुरा

All Information about Somanathapura Temple, Karnataka
5 मार्च 2019

कुछ दिन पहले जब हमारे एक दोस्त मधुर गौर मैसूर घूमने आए थे, तो उन्होंने अपनी वीडियो में तालाकाडु और सोमनाथपुरा का भी जिक्र किया था। इससे पहले इन दोनों ही स्थानों के बारे में हमने कभी नहीं सुना था। फिर जब हम विस्तार से कर्नाटक घूमने लगे और बादामी, हंपी, बेलूर, हालेबीडू जैसी जगहों पर घूमने लगे, तो बार-बार सोमनाथपुरा और तालाकाडु का नाम सामने आ ही जाता।

तो इसी के मद्देनजर हम आज जा पहुँचे पहले तालाकाडु और फिर सोमनाथपुरा।

तालाकाडु कावेरी नदी के किनारे स्थित है और मैसूर से लगभग 50 किलोमीटर दूर है। किसी जमाने में यह एक अच्छा धार्मिक स्थान हुआ करता था, लेकिन कालांतर में कावेरी में आई बाढ़ों के कारण यह पूरा शहर रेत के नीचे दब गया, जो आज भी दबा हुआ है। कुछ मंदिर रेत के नीचे से झाँकते दिखते हैं, जिनमें पातालेश्वर मंदिर, कीर्तिनारायण मंदिर, मरालेश्वर मंदिर और वैद्येश्वर मंदिर प्रमुख हैं।

तालाकाडु से 25 किलोमीटर और मैसूर से 33 किलोमीटर दूर सोमनाथपुरा स्थित है। इसे होयसला राजाओं ने 13वीं शताब्दी में बनवाया था। मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है और इसकी दीवारों व छतों पर बनी हुई मूर्तियाँ मूर्तिकला की उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

Thursday, April 4, 2019

मैसूर पैलेस: जो न जाए, पछताए

Mysore Palace Full Information
3 मार्च 2019
मैसूर रिंग रोड पर हमें एक मल्टी-स्टार होटल में 600 रुपये में अत्यधिक शानदार कमरा मिल गया। इसे हमने तीन दिनों के लिए ले लिया। ओयो की मेहरबानी थी, अन्यथा हम इसकी तरफ कभी न देखते। दूर से ही साष्टांग नमस्कार कर लेते।

तो जिस समय हम धूप में जल-भुनकर कूर्ग से मैसूर आए तो शाम होने वाली थी और मेरी इच्छा एसी रूम में कम्पलीट रेस्ट करने की थी, जबकि दीप्ति को मैसूर पैलेस देखने की जल्दी थी। मैंने उसे टालने को तमाम तरह के बहाने बनाए, मसलन “बड़ी लंबी लाइन लगी मिलेगी टिकट की।”
“मैं लेडीज लाइन में जाकर जल्दी टिकट ले लूँगी।”
“शहर में भयानक जाम लगा मिलेगा।”
“ज्यादा दूर नहीं है। पाँच-छह किलोमीटर ही दूर है। वैसे भी गूगल मैप सड़क खाली दिखा रहा है।”
“शाम पाँच बजे तक ही एंट्री होती है। ये देख, गूगल मैप पर।”

Tuesday, April 2, 2019

कूर्ग में एक दिन

All Information about Coorg in Hindi
2 मार्च 2019

अब तक गर्मी इतनी ज्यादा होने लगी थी कि हमने यात्रा में बदलाव करने का पक्का मन बना लिया था। अब हम न केरल जाएँगे, न तमिलनाडु। लेकिन कूर्ग का लालच अभी भी हमें यात्रा जारी रखने को कह रहा था, अन्यथा उडुपि से दिल्ली चार-पाँच दिन की मोटरसाइकिल यात्रा पर स्थित है। उधर हिमालय से बर्फबारी की खबरें आ रही थीं और हम गर्मी में झुलस रहे थे, तो बड़े गंदे-गंदे विचार मन में आ रहे थे।
क्या सोचकर गर्मी में साउथ का प्रोग्राम बनाया था?
हम नहीं लिखेंगे इस यात्रा पर किताब। और अगर किताब लिख भी दी, तो उसमें गर्मी के अलावा और कुछ नहीं होगा।

और फिर...
भारत वास्तव में विचित्रताओं का देश है। इधर से उधर या उधर से इधर आने में ही कितना कुछ बदल जाता है! न इधर के लोगों को उधर के मौसम का अंदाजा होता है और न ही उधर के लोगों को इधर के मौसम का। सबकुछ जानते हुए भी हम एक जैकेट लिए घूम रहे थे, जिसका इस्तेमाल घर से केवल नई दिल्ली रेलवे स्टेशन तक पहुँचने में किया गया था। वातानुकूलित ट्रेन थी और हमने जैकेट निकालकर बैग में रख ली थी और ट्रेन में मिलने वाला कंबल ओढ़कर सो गए थे। गोवा उतरे तो सर्दी दूर की चीज थी। दो दिनों तक तो वह जैकेट बैग में ऊपर ही रखी रही, इस आस में कि शायद कहीं से शीतलहर आ जाए, लेकिन तीसरे दिन उसे बैग के रसातल में जाते देर नहीं लगी।
और आज हम यह सोचकर हँसे जा रहे थे कि इतनी गर्मी में हम जैकेट भी लिए घूम रहे हैं।

Monday, April 1, 2019

सैंट मैरी आइलैंड की रहस्यमयी चट्टानें


1 मार्च 2019

जैसे ही प्रतीक ने सैंट मैरी आइलैंड का नाम लिया, तुरंत गूगल किया और मेरे सामने थे आइलैंड के बहुत सारे फोटो। जितना पढ़ सकता था, पढ़ा और फाइनली तय किया कि यहाँ जरूर जाएँगे।

हम उडुपि में थे और हमें दक्षिण की ओर जाना था। लेकिन प्रतीक ने हमें उडुपि के उत्तर में 50 किलोमीटर दूर मरवंते बीच जाने का भी लालच दे दिया। गर्मी बहुत ज्यादा होने लगी थी और हम दक्षिण की इस यात्रा को विराम दे देना चाहते थे। उडुपि से मरवंते जाकर फिर से उडुपि लौटना पड़ता। हम जाना भी चाहते थे और नहीं भी जाना चाहते थे।

लेकिन सैंट मैरी आइलैंड के बारे में कोई कन्फ्यूजन नहीं था।

होटल से सीधी सड़क जाती थी, नाक की सीध में। पहले उडुपि शहर और उसके बाद मालपे। मालपे पार करने के बाद हमारे सामने समुद्र था और यहीं पर एक पार्किंगनुमा जगह पर कुछ गाड़ियाँ खड़ी थीं, जिनमें दो बसें भी थीं। इन बसों से अभी-अभी स्कूली छात्र उतरे थे, जो सैंट मैरी आइलैंड जाएँगे। 300 रुपये प्रति व्यक्ति टिकट था आने-जाने का। मैंने 1000 रुपये देकर दो टिकट लिए और बाकी 400 रुपये लेना भूल गया, लेकिन जल्द ही कन्नड, हिंदी और इंगलिश में आवाजें लगाकर मुझे 400 रुपये दे दिए गए।

फेरी चल पड़ी साढ़े चार किलोमीटर की समुद्री यात्रा पर। इसमें डी.जे. लगा था और सभी के पास नाचने का बहाना भी था। सभी स्कूली छात्र नाचने लगे। इनके साथ कुछ अन्य यात्री भी लग लिए। हमारे अलावा कुछ बुजुर्ग यात्री और कुछ मुसलमान यात्री इन्हें नाचते देखते रहे।

Thursday, March 7, 2019

कुद्रेमुख, श्रंगेरी और अगुंबे


Travel Guide to Kudremukh

27 फरवरी 2019
सुबह सज-धजकर और पूरी तरह तैयार होकर कलश से निकले। आज हम कर्नाटक में पहली बार ट्रैकिंग करने जा रहे थे - कुद्रेमुख की ट्रैकिंग। पहले स्टेट हाइवे, फिर अच्छी ग्रामीण सड़क, फिर खराब ग्रामीण सड़क, फिर कच्ची सड़क और आखिर में फर्स्ट गियर में भी मुश्किल से चढ़ती बाइक... और हम पहुँचे फोरेस्ट ऑफिस, जहाँ से कुद्रेमुख ट्रैक का परमिट मिलता है। मैंने कहा - कुद्रेमुख। उन्होंने हाथ हिला दिया। यहाँ कुछ देर तक तो हिंदी, अंग्रेजी और कन्नड का लोचा पड़ा और आखिर में फोरेस्ट वालों ने किसी को आवाज लगाई। उसे बाकियों के मुकाबले हिंदी के कुछ शब्द ज्यादा आते थे।
“ये ड्राइ सीजन है, फोरेस्ट में फायर लग जाती है, इसलिए 1 फरवरी से 31 मई तक कुद्रेमुख ट्रैक बंद रहता है।”
यह तो बहुत गलत हुआ। हम इसी ट्रैक के कारण यहाँ इस क्षेत्र में आए थे। अगर पहले से पता होता, तो कुछ और प्लान करते।

खैर, कोई बात नहीं। वो स्टेट हाइवे कुद्रेमुख नेशनल पार्क से होकर जाता है। 10-15 किलोमीटर उसी पर घूम आए।

आज पहली बार हमें लगा कि हम गलत समय पर यहाँ घूम रहे हैं। यह पश्चिमी घाट और साउथ में घूमने का सही समय नहीं है। मानसून या सर्दियाँ सर्वोत्तम है। वापस दिल्ली लौटने का विचार आने लगा। फिर शाम को प्रतीक का मैसेज आया - नर हो, न निराश करो मन को।

Wednesday, March 6, 2019

बेलूर से कलश बाइक यात्रा और कर्नाटक की सबसे ऊँची चोटी मुल्लायनगिरी


Mullayanagiri Peak Travel Guide

26 फरवरी 2019
कुद्रेमुख ट्रैक कर्नाटक के सबसे प्रसिद्ध ट्रैकों में से एक है। यह पश्चिमी घाट की पहाड़ियों में है और हमारी इच्छा इस ट्रैक को करने की थी। हम अभी बेलूर में थे और कुद्रेमुख का ट्रैक मुल्लोडी नामक गाँव से शुरू होता है। बेलूर से इसकी दूरी तकरीबन 100 किलोमीटर है और इस दूरी को हम अधिकतम 3 घंटे में तय कर लेते।
लेकिन तभी पता चला कि हम मुल्लायनगिरी चोटी के भी काफी नजदीक हैं। यह चोटी कर्नाटक की सबसे ऊँची चोटी है और इसकी ऊँचाई लगभग 1900 मीटर है।
मुल्लायनगिरी तक पक्की सड़क बनी है। आखिर में 200-250 सीढियाँ चढ़नी होती हैं। यहाँ से चिकमगलूर शहर का शानदार विहंगम नजारा दिखता है।
मुल्लायनगिरी से मुल्लोडी की ओर चलते हैं तो लगभग पूरा रास्ता कॉफी के बागानों से होकर जाता है। असल में चिकमगलूर जिला कॉफी के लिए जाना जाता है।

Tuesday, March 5, 2019

बेलूर और हालेबीडू: मूर्तिकला के महातीर्थ - 2

Travel Guide to Halebeedu Karnataka
होयसलेश्वर मंदिर, हालेबीडू

24 फरवरी 2019
बेलूर से 15-16 किलोमीटर दूर हालेबीडू भी अपने मंदिरों और मूर्तिकला के लिए विख्यात है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और इसका निर्माण सन 1221 में करवाया गया था। मंदिर के बारे में और अपने यात्रा-वृत्तांत के बारे में हम कभी बाद में डिसकस करेंगे, फिलहाल फोटो के माध्यम से यहाँ की यात्रा कीजिए।








All Travel Information About Halebeedu Karnataka
मंदिर के द्वारपाल

Monday, March 4, 2019

बेलूर और हालेबीडू: मूर्तिकला के महातीर्थ - 1

Belur Karnataka Travel Guide

24 फरवरी 2019

अगर आप कर्नाटक घूमने जा रहे हैं, तो इन दो स्थानों को अपनी लिस्ट में जरूर शामिल करें। एक तो बेलूर और दूसरा हालेबीडू। दोनों ही स्थान एक-दूसरे से 16 किलोमीटर की दूरी पर हैं और हासन जिले में आते हैं। बंगलौर से इनकी दूरी लगभग 200 किलोमीटर है।
11वीं से 13वीं शताब्दी तक इस क्षेत्र में होयसला राजवंश ने शासन किया और ये मंदिर उसी दौरान बने। पहले हम बात करेंगे बेलूर की।
यहाँ चन्नाकेशव मंदिर है। चन्ना यानी सुंदर और केशव विष्णु को कहा जाता है। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। 300 रुपये तो जरूर खर्च होंगे, लेकिन मेरी सलाह है कि आप एक गाइड अवश्य ले लें। गाइड आपको वे-वे चीजें दिखाएँगे, जिन पर आपका ध्यान जाना मुश्किल होता।

Tuesday, February 26, 2019

बंगलौर से बेलूर और श्रवणबेलगोला


Shravanabelagola Travel Guide

23 फरवरी 2019
चार दिन बंगलौर में रुकने के बाद आज हम निकल ही पड़े। असल में हमने इस यात्रा के लिए तय कर रखा है कि यूट्यूब और ब्लॉग साथ-साथ अपडेट करते चलेंगे। तो गोवा से चलने के बाद बादामी और हम्पी आदि की वीडियो हम तैयार नहीं कर सके थे। इसलिए इन चार दिनों में हमने केवल यही काम किया। इस दौरान मनीष खमेसरा और जयश्री खमेसरा जी से भी मिल आए। ये दोनों एक नंबर के घुमक्कड़ हैं और पुरातत्व आदि के बारे में उत्तम जानकारी के भंडार हैं। इनसे मिलकर हमें भी दक्षिण के मंदिरों, उनकी संरचना आदि के बारे में काफी जानकारी प्राप्त हुई। अब दक्षिण के मंदिरों को देखने का एक अलग नजरिया विकसित हुआ।
जहाँ हम रुके हुए थे, वहाँ से मनीष जी का घर 15 किलोमीटर दूर था और इस दूरी को दो बार तय करने में हमें अंदाजा हो गया कि बंगलौर का ट्रैफिक बहुत खराब है।

तो आज बंगलौर से निकल पड़े। शहर से निकलते ही ट्रैफिक अचानक गायब हो गया और हमारे सामने थी खाली सड़क। हम शहर के खराब ट्रैफिक को भूल गए।

लेपाक्षी मंदिर


Lepakshi Temple History

19 फरवरी 2019

लेपाक्षी मंदिर का नाम हमने एक खास वजह से सुना था। यहाँ एक ऐसा पिलर है जो हवा में लटका है। अब जब हमें आंध्र प्रदेश में गंडीकोटा से कर्नाटक में बंगलौर जाना था, तो लेपाक्षी जाने की भी योजना बन गई। इसके लिए कोई बहुत ज्यादा लंबा चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा।

गंडीकोटा से कदीरी जाने वाला रास्ता बहुत खूबसूरत है। ट्रैफिक तो है ही नहीं, साथ ही खेतों में काम करते ग्रामीण असली भारत की झलक दिखाते हैं। अगर आप मोटरसाइकिल यात्रा पर हैं, तो आपको ऐसे डी-टूर भी लगा देने चाहिए। कई बार तो लोग मुड़-मुड़कर आपको देखते हैं, क्योंकि इस तरह बहुत कम लोग ही उनकी सड़कों पर आते हैं। और अगर आप रुक गए तो इनका अपनापन आपको हैरान कर देगा।

वैसे तो हम श्री सत्य साईं प्रशांति निलयम यानी पुट्टापार्थी होते हुए भी जा सकते थे, लेकिन हमारी दिलचस्पी इन बातों में नहीं है, इसलिए कदीरी से सीधे ग्रंथला का रास्ता पकड़ा और सीधे नेशनल हाइवे 44 पर आ गए। यह नेशनल हाइवे कश्मीर को कन्याकुमारी को जोड़ता है। कुछ दूर बंगलौर की ओर चलने पर लेपाक्षी का रास्ता अलग हो जाता है। लेपाक्षी इस हाइवे से 15-16 किलोमीटर दूर है।

Monday, February 25, 2019

गंडीकोटा: भारत का ग्रैंड कैन्योन


Gandikota View

15 फरवरी 2019

जिस समय हम्पी का विजयनगर साम्राज्य अपने पूरे वैभव पर था, उसी समय हम्पी से कुछ ही दूर एक छोटा-सा साम्राज्य बना हुआ था, जिसकी राजधानी गंडीकोटा थी। फिर दिल्ली सल्तनत ने जब दक्कन पर आक्रमण करने शुरू किए तो न हम्पी टिक पाया और न ही गंडीकोटा। हाँ, इस सल्तनत के खिलाफ लड़ने को हम्पी और गंडीकोटा एक जरूर हुए, लेकिन खुद को नहीं बचा पाए। आज हम्पी भी खंडहर हो गया है और गंडीकोटा भी।

गंडीकोटा आंध्र प्रदेश में है। लेकिन यह उन खंडहरों और किले के लिए उतना नहीं जाना जाता, जितना अपने अद्‍भुत प्राकृतिक नजारे के लिए। यहाँ पेना नदी बहुत गहरी बहती है - सीधी खड़ी चट्टानों के बीच। इसलिए इसे भारत का ग्रैंड कैन्योन भी कहा जाता है। नदी के दोनों किनारे 100-100 मीटर तक एकदम खड़े हैं। असल में ग्रांड कैन्योल अमरीका में है। वहाँ कोलोराडो नदी इसी तरह का कटान करती है और काफी प्रसिद्ध हो गई है। अब हम उतनी आसानी से अमरीका तो नहीं जा सकते, तो क्या हुआ? हमारे पास भी अपना ग्रांड कैन्योन है।

दक्कन का पठार मुख्यतः मैदानी ही है, लेकिन कहीं-कहीं छोटी-छोटी पहाड़ियाँ भी हैं। यहाँ भी एक पहाड़ी श्रंखला है, जो उत्तर से दक्षिण दिशा में है। पेना नदी पश्चिम से पूर्व में बहती है। इस पहाड़ी श्रंखला को पेना नदी ऐसे काटकर निकल जाती है, जैसे चाकू से पनीर काट देते हैं।

दारोजी भालू सेंचुरी में काले भालू के दर्शन


Daroji Bear Sanctuary Karnataka

15 फरवरी 2019
उस दिन जब हम विट्ठल मंदिर से पैदल हम्पी लौट रहे थे, तो अंधेरा हो गया। हम तुंगभद्रा के किनारे-किनारे धीरे-धीरे चलते आ रहे थे। एक विदेशी महिला अपने दो बच्चों के साथ हम्पी से विट्ठल मंदिर की ओर जा रही थी। रास्ते में एक सिक्योरिटी गार्ड ने उन्हें टोका - “मैडम, गो बैक टू हम्पी। नॉट एलाऊड हियर आफ्टर दा इवनिंग। बीयर एंड चीता कम्स हीयर।”
मेरे कान खड़े हो गए। चीते को तो मैंने सिरे से नकार दिया, क्योंकि भारत में चिड़ियाघरों के अलावा चीता है ही नहीं। हाँ, तेंदुआ हर जगह होता है। और बीयर?
“क्या यहाँ भालू हैं?” मैंने पूछा।
“हाँ जी, पास में बीयर सेंचुरी है, तो यहाँ तक भालू आ जाते हैं केले खाने।”

और अगले ही दिन हम उस भालू सेंचुरी के गेट पर थे। दोपहर का डेढ़ बजा था। पता चला कि दो बजे के बाद ही एंट्री कर सकते हैं। तो दो बजे के बाद हमने एंट्री कर ली। प्रति व्यक्ति शुल्क है 25 रुपये और बाइक का कोई शुल्क नहीं। कार के 500 रुपये। चार किलोमीटर अंदर जंगल में जाने के बाद एक वाच टावर है। वहाँ बैठ जाना है और भालू के दिखने की प्रतीक्षा करनी है।

क्या आपने हम्पी देखा है?


Tungbhadra River in Hampi

जब हम बादामी से हम्पी जा रहे थे, तो मन में एक सवाल बार-बार आ रहा था। क्या हमें हम्पी पसंद आएगा? क्योंकि मैंने हम्पी की बहुत ज्यादा प्रशंसा सुनी थी। कभी भी आलोचना नहीं सुनी। जहाँ भी पढ़ी, हम्पी की प्रशंसा... जिससे भी सुनी, हम्पी की प्रशंसा। Top 100 Places to see before you die की लिस्ट हो या Top 10 Places to see before you die की लिस्ट हो... हम्पी जरूर होता।

तो एक सवाल बार-बार मन में आता - कहीं हम्पी ओवररेटिड तो नहीं?

इस सवाल का जवाब हम्पी पहुँचते ही मिल गया। हम यहाँ दो दिनों के लिए आए थे और पाँच दिनों तक रुके। छठें दिन जब प्रस्थान कर रहे थे, तो आठ-दस दिन और रुकने की इच्छा थी।

वाकई हम्पी इस लायक है कि आप यहाँ कम से कम एक सप्ताह रुककर जाओ।

जिस समय उत्तर में मुगल साम्राज्य का दौर था, यहाँ विजयनगर साम्राज्य था। इस साम्राज्य के सबसे प्रतापी राजा थे कृष्णदेवराय। और आपको शायद पता हो कि तेनालीराम भी इन्हीं के एक दरबारी थे। तो इस दौर में हम्पी का जमकर विकास हुआ। इनके साम्राज्य की सीमा पश्चिम में अरब सागर तक थी और विदेशों से समुद्र के रास्ते खूब व्यापार और आवागमन होता था। विदेशी भी खूब आते थे और इनकी भी निशानियाँ हम्पी के खंडहरों में देखने को मिल जाती हैं।

Sunday, February 24, 2019

दक्षिण भारत यात्रा: पट्टडकल - विश्व विरासत स्थल


Pattadakal Travel Guide

11 फरवरी 2019
पट्टडकल एक ऐसा विश्व विरासत स्थल है, जिसका नाम हम भारतीयों ने शायद सबसे कम सुना हो। मैंने भी पहले कभी सुना था, लेकिन आज जब हम पट्टडकल के इतना नजदीक बादामी में थे, तो हमें इसकी याद बिल्कुल भी नहीं थी। इसकी याद बाई चांस अचानक आई और हम पट्टडकल की तरफ दौड़ पड़े।

सूर्यास्त होने वाला था और टिकट काउंटर से टिकट लेने वाले हम आखिरी यात्री थे। हालाँकि हम यहाँ की स्थापत्य कला को उतना गहराई से नहीं देख पाए, क्योंकि उसके लिए गहरी नजर भी चाहिए। हमें स्थापत्य कला में दिलचस्पी तो है, लेकिन उतनी ही दिलचस्पी है जितनी देर हम वहाँ होते हैं। वहाँ से हटते ही सारी दिलचस्पी भी हट जाती है और फिर दो-चार और भी स्थानों की खासियत मिक्स हो जाती है।

“मैं स्थापत्य कला के क्षेत्र में एक दिन कोई बड़ा काम जरूर करूँगा” - यह वादा मैं पिछले दस सालों से करता आ रहा हूँ और तभी करता हूँ, जब ब्लॉग लिखना होता है और शब्द नहीं सूझते।

Thursday, February 21, 2019

दक्षिण भारत यात्रा: बादामी भ्रमण


Badami Travel

11 फरवरी 2019
कर्नाटक कर्क रेखा के पर्याप्त दक्षिण में है। कर्क रेखा के दक्षिण का समूचा भारत उष्ण कटिबंध में स्थित है। इस क्षेत्र की खासियत होती है कि यहाँ गर्मी बहुत ज्यादा पड़ती है। उधर कर्क रेखा के उत्तर में यानी उत्तर भारत में भयानक शीतलहर चल रही थी और हिमालय में तो बर्फबारी के कई वर्षों के रिकार्ड टूट रहे थे। और इधर हम गर्मी से परेशान थे।
और हम एक-दूसरे से पूछ भी रहे थे और इल्जाम भी लगा रहे थे - “इसी मौसम में साउथ आना था क्या?”

तो हमने तय किया था कि अभी चूँकि हमें साउथ में कम से कम एक महीना और रहना है, इसलिए गर्मी तो परेशान करेगी ही। और इससे बचने का सर्वोत्तम तरीका था कि केवल सुबह और शाम के समय ही घूमने के लिए बाहर निकलो। दोपहर को कमरे में रहो। यहाँ तक कि दोपहर को कभी बाइक भी नहीं चलानी।

इसी के मद्देनजर आज की योजना थी - सुबह छह बजे से दोपहर दस-ग्यारह बजे तक बादामी घूमना है, शाम चार बजे तक आराम करना है और चार बजे के बाद ऐहोल की तरफ निकल जाना है और साढ़े पाँच बजे तक पट्टडकल पहुँचना है। इन सभी की दूरियाँ बहुत ज्यादा नहीं हैं।

बादामी में एक तालाब है - अगस्त्य तालाब या अगस्त्य लेक। और जो भी यहाँ दर्शनीय है, बादामी जिस वजह से भी प्रसिद्ध है, वो सब इस तालाब के पास ही है। आपको बहुत दूर नहीं जाना होता। हम होटल में ही मोटरसाइकिल छोड़कर पैदल निकल पड़े। रास्ते में ‘क्लार्क्स इन’ नामक थ्री-स्टार होटल के सामने एक रेहड़ी पर दस-दस रुपये की भरपेट इडली मिल रही थी, सूतने में देर नहीं लगी।

गोवा से बादामी की बाइक यात्रा

गोवा से बेलगाम की सड़क
चोरला घाट

फरवरी के दूसरे सप्ताह का पहला दिन था यानी आज आठ तारीख थी। हम गोवा में अपने एक मित्र के यहाँ थे। इनके पिताजी किसी जमाने में आर्मी में थे और रिटायरमेंट के बाद गोवा में ही बस गए तो इन्होंने गोवा में ही कारोबार बढ़ाया और आज दाबोलिम में अपने आलीशान घर में रहते हैं। दाबोलिम में ही चूँकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट है, इसलिए कुछ कुछ मिनट बाद घर के ऊपर से हवाई जहाज गुजरते रहते हैं और उन पर लिखा नाम व नंबर आसानी से पढ़ा जा सकता है। और उससे भी कमाल की बात यह है कि ये यूपी में मुजफ्फरनगर के मूल निवासी हैं और गोवा में कई दशक रहने के बाद भी मुजफ्फरनगर की ठेठ खड़ी बोली का प्रभाव एक डिग्री भी कम नहीं हुआ है। ‘तझै’, ‘मझै’, ‘इंगै’, ‘उंगै’ आदि शब्दों से सराबोर होने के बाद एक पल को भी हमें नहीं लगा कि हम अपने गाँव से ढाई हजार किलोमीटर दूर हैं। हमें लग रहा था कि इनके भोजन में थोड़ा-बहुत कोंकणी प्रभाव देखने को मिलेगा, लेकिन हमारा अंदाजा गलत साबित हुआ। यहाँ इतनी दूर और इतने दशक बाद भी इनके भोजन में घी, दूध, दही और मट्‍ठे की ही प्रधानता थी।
वैसे तो गोवा मुझे कभी पसंद नहीं आया, क्योंकि मुझे लगता था कि यह लफंगों की मौजमस्ती और हनीमून-पसंद युवाओं के लिए पूरी दुनिया के कुछेक स्थानों में से एक है। मैं न लफंगे की श्रेणी में आता हूँ और न ही हनीमून-पसंद युवा की श्रेणी में, तो गोवा के बारे में मेरे मन में कुछ नकारात्मक धारणाएँ ही बनी हुई थीं। एक बार कई साल पहले जब अपने दो मित्रों के साथ गोवा आया था तो मेरा एकमात्र उद्देश्य दूधसागर जलप्रपात देखना ही था। जबकि उन दोनों को गोवा के समुद्रतट देखने थे, इसलिए मैं पूरे एक दिन होटल के कमरे में पड़ा रहा था और वे दोनों समुद्रतट देख रहे थे। शाम को वापस लौटकर जब उन्होंने गोवा की महंगाई की गाथा सुनानी शुरू की, तो प्रसन्न होने वालों में मैं अकेला था।

दक्षिण भारत यात्रा के बारे में

कोंकण रेलवे की यात्रा

कई बार हम जो चाहते हैं, वैसा नहीं होता। इस बार हमारे साथ भी वैसा ही हुआ। हम असल में दक्षिण भारत की यात्रा नहीं करना चाहते थे, बल्कि पूर्वोत्तर में पूरी सर्दियाँ बिता देना चाहते थे। लेकिन दूसरी तरफ हम दक्षिण से भी बंधे हुए थे। सितंबर 2018 में जब हम कोंकण यात्रा पर थे, तो अपनी मोटरसाइकिल गोवा में ही छोड़कर दिल्ली लौट आए थे। अब चाहे हमारी आगामी यात्रा पूर्वोत्तर की हो या कहीं की भी हो, हमें गोवा जरूर जाना पड़ता - अपनी मोटरसाइकिल लेने।

दक्षिण तो मानसून में भी घूमा जा सकता है, लेकिन पूर्वोत्तर घूमने का सर्वोत्तम समय होता है सर्दियाँ। सिक्किम और अरुणाचल के ऊँचे क्षेत्रों को छोड़ दें, तो पूरा पूर्वोत्तर सर्दियों में ही घूमना सर्वोत्तम होता है। पिछले साल से ही हमारी योजना इस फरवरी में अरुणाचल में विजयनगर जाने की थी और हम इसके लिए तैयार भी थे। एक साल की छुट्टियाँ भी इसीलिए ली गई थीं, ताकि पूर्वोत्तर को अधिक से अधिक समय दे सकें और भारत के इस गुमनाम क्षेत्र को हर मौसम में हर कोण से देख सकें और आपको दिखा भी सकें।

लेकिन हम बंधे हुए थे गोवा से। भले ही विजयनगर जाने में मोटरसाइकिल का बहुत ज्यादा काम न हो, लेकिन बाकी पूर्वोत्तर देखने के लिए अपनी मोटरसाइकिल होना ही सबसे अच्छा विकल्प होता है। अपनी मोटरसाइकिल के बिना हम जो भी समय काट रहे थे, वो बस ‘काट’ ही रहे थे। हमें तलब लगी थी कि हम जल्द से जल्द गोवा जाकर अपनी मोटरसाइकिल लेंगे और इसी से यात्राएँ करेंगे। गोवा से सीधे पूर्वोत्तर जाएँगे - ऐसा हमने सोच रखा था।