Wednesday, October 31, 2018

उत्तर बंगाल यात्रा - नेवरा वैली नेशनल पार्क

Neora Valley National Park All Information
16 फरवरी 2018
हमारी इस यात्रा की शुरूआत नामदफा नेशनल पार्क से हुई थी और आज हम नेवरा वैली नेशनल पार्क जाने वाले थे। इनके बीच में भी हमने कई नेशनल पार्कों की यात्राएँ कीं। ये दोनों ही नेशनल पार्क कई मायनों में एक जैसे हैं। सबसे खास बात है कि आप दोनों ही नेशनल पार्कों में कुछ ही दूरी तक सड़क मार्ग से जा सकते हैं, लेकिन आपको बाकी यात्रा पैदल ही करनी पड़ेगी। हिमालयन काले भालू, तेंदुए और बाघ के जंगल में पैदल भ्रमण करना रोमांच की पराकाष्ठा होती है। किसी अन्य नेशनल पार्क में आपको पैदल घूमने की अनुमति आसानी से नहीं मिल सकती। यहाँ तक कि आप काजीरंगा तक में अपनी गाड़ी से नीचे नहीं उतर सकते।
कई बार तो हम बैठकर गणना करते रहते कि अपनी मोटरसाइकिल से जाएँ या गाड़ी बुक कर लें। कल फोरेस्ट वाले ने बताया था कि मोटरसाइकिल से न जाओ, तो अच्छा है। हालाँकि स्थानीय लोग बाहरियों को इस तरह हमेशा मना ही करते हैं, हमें भी एहसास था कि 15-16 किलोमीटर दूर जाने में हालत खराब हो जानी है। अभी कुछ ही दिन पहले हम मेघालय में अत्यधिक खराब रास्ते और अत्यधिक ढलान के कारण बीच रास्ते से वापस लौटे थे, तो आज हमने गाड़ी बुक करना ही उचित समझा।

Monday, October 29, 2018

उत्तर बंगाल - लावा और रिशप की यात्रा

All Information about Lava and Rishop
15 फरवरी 2018
हमने सोच रखा था कि अपनी इस यात्रा में 2000 मीटर से ऊपर नहीं जाएँगे। क्योंकि मुझे लग रहा था कि इतनी ऊँचाई पर कहीं न कहीं ब्लैक आइस मिलेगी और मुझे ब्लैक आइस से बड़ा डर लगता है। और आज जब हम माल बाजार में थे, तो लावा जाने और न जाने का मामला बराबर अधर में लटका हुआ था।
“लेकिन लावा क्यों? अभी हमारे पास कई दिन हैं और हम सिक्किम भी घूमकर आ सकते हैं।” दीप्ति ने पूछा।
“वो इसलिए कि अपनी मोटरसाइकिल से सिक्किम जाने में गुरदोंगमर झील भी जाना जरूर बनता है और फिलहाल या तो वहाँ का रास्ता बंद मिलेगा या खूब सारी ब्लैक आइस मिलेगी। मैं बिना गुरदोंगमर के सिक्किम नहीं घूमना चाहता।”
दूसरी बात, कोई भी उत्तर भारतीय यात्री लावा घूमने नहीं जाता। वे दार्जिलिंग जाते हैं, सिक्किम जाते हैं, लेकिन लावा नहीं जाते। उत्तर बंगाल में जहाँ से भी कंचनजंघा दिख जाए, वही स्थान घूमने योग्य है। इसीलिए दार्जिलिंग प्रसिद्ध है। लावा से भी कंचनजंघा दिखती है, लेकिन दार्जिलिंग के आगे यह प्रसिद्ध नहीं हो पाया। फिर यह 2000 मीटर से ऊपर है। एक अलग ही नशा होता है, इतनी ऊँचाई वाले किसी अप्रसिद्ध स्थान में।
माल बाजार में आलू के पराँठे खाते हुए कुल्हड़ की मिष्टी दोई मिल गई, तो समझ आ गया कि हमारी यात्रा सही दिशा में जा रही है। उस कुल्हड़ को हमने जितनी तल्लीनता से नहीं चाटा होगा, बाद में एक पिल्ले ने उसे उससे ज्यादा तल्लीनता से चाट लिया।

Sunday, October 28, 2018

घुमक्‍कड़ों का कार्यक्रम: बरसूडी घुमक्कड़ महोत्सव

Barsuri All Information
31 अगस्त 2018
एक बाइक पर मैं और दीप्ति व दूसरी बाइक पर नरेंद्र दिल्ली से सुबह-सवेरे निकल पड़े। सड़क खाली मिलती चली गई और हम नॉन-स्टॉप खतौली जा पहुँचे। भूख लगने लगी थी और खतौली बाईपास पर भोजन के विकल्पों की कोई कमी नहीं। लेकिन हम और भी सस्ते के चक्कर में सयाने बन गए और खतौली शहर में जा पहुँचे। यह सोचकर कि बाईपास पर तो टूरिस्ट लोग रुकते हैं और शहर में स्थानीय लोग ही होते हैं, इसलिए शायद किसी ठेले पर पाँच-दस रुपये में कुछ भरपेट मिल जाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। केले का एक ठेला था और अभी-अभी खुले हुए रेस्टॉरेंट थे, जिनमें कल के जूठे बर्तन माँजे जा रहे थे। भूख इतने जोर की लगी थी कि अगर केलेवाला न टोकता तो हम छिलका भी खा डालते।
इस यात्रा में हम अकेले नहीं थे। इससे जुड़े सभी लोग एक व्हाट्सएप ग्रुप में भी थे और अब लगातार अपनी लाइव लोकेशन शेयर कर रहे थे। साथ ही अपने खाने-पीने के भी फोटो डाल रहे थे। जैसे ही माथुर साहब ने बताया कि वे घर से पचास-साठ आलू के पराँठे बनाकर लाए हैं, तो कलेजा सुलग उठा। माथुर साहब की लाइव लोकेशन देखी, तो वे मेरठ के आसपास थे और मवाना की ओर बढ़ रहे थे।
“माथुर साहब को पकड़ो।” और हमने तुरंत खतौली से मीरांपुर की सड़क पर दौड़ लगा दी। जितनी दूरी है, उतने ही मिनट हमें मीरांपुर पहुँचने में लगे। फिर से माथुर साहब की लोकेशन देखी, वे अभी भी उसी जगह पर थे, जहाँ पंद्रह मिनट पहले थे। इसका मतलब वे रुके हुए हैं और पराँठे खा रहे हैं।
“कहीं वे सब पराँठे खत्म न कर दें।”
“पचास-साठ पराँठे थोड़े ही खा लेंगे वे दो जने?”
“क्या पता खा ही लें।"
“तो आगे गंगा बैराज पर रुकते हैं। कुछ देर उनकी प्रतीक्षा करेंगे और उन्हें बैराज पर ही रोक लेंगे। और वहीं हम भी पराँठे खा लेंगे।”

Friday, October 26, 2018

प्रजातंत्र... इंदौर... 24 अक्टूबर 2018







उत्तर बंगाल यात्रा - तीन बीघा कोरीडोर

Tin Bigha Corridoe All Information
14 फरवरी 2018
हम इतिहास की गहराइयों में नहीं जाएँगे, लेकिन इतना जान लीजिए कि आजादी से पहले इधर दो प्रमुख रियासतें हुआ करती थीं – कूचबिहार रियासत और रंगपुर रियासत। बँटवारा हुआ तो कूचबिहार भारत में आ गया और रंगपुर पूर्वी पाकिस्तान में। लेकिन इन दोनों रियासतों की सीमाएँ बड़ी अजीबो-गरीब थीं। एक रियासत के अंदर दूसरी रियासत की जमीनें थीं, जिन्हें ‘एंकलेव’ कहते हैं। यहाँ तक कि एक एंकलेव के अंदर दूसरा एंकलेव भी था और एक जगह तो तिहरा एंकलेव भी। बँटवारे में एंकलेव भी बँट गए। 1971 में बांग्लादेश बना, तब तक भी मामला ऐसा ही था।
मुझे पता है कि ऊपर का पैरा आप बिल्कुल भी नहीं समझे होंगे। चलिए, आसान शब्दों में बताता हूँ। एंकलेव मतलब एक देश की मुख्यभूमि के अंदर दूसरे देश के आठ-दस गाँव, जो चारों ओर से पूरी तरह पहले देश से घिरे हुए हों। भारत के अंदर बांग्लादेश के गाँव भी थे और बांग्लादेश के अंदर भारत के गाँव भी। ऐसे एक-दो नहीं, बल्कि लगभग 200 एंकलेव थे। यानी भारत के उस एंकलेव में स्थित आठ-दस गाँवों के लोगों को अगर कोलकाता या सिलीगुड़ी कहीं भी जाना होता था, तो बांग्लादेश से होकर ही निकलना पड़ता था। इसी तरह बांग्लादेश वालों को अपने ही देश में जाने के लिए भारत से होकर जाना होता था। और आप जानते ही हैं कि भारत और बांग्लादेश के बीच वीजा लेकर ही आवागमन किया जा सकता है। इन गाँवों में कोई वीजा अधिकारी नहीं बैठा होता था।

Wednesday, October 24, 2018

उत्तर बंगाल यात्रा - बक्सा टाइगर रिजर्व में

All Information of Buxa Tiger Reserve
13 फरवरी 2018
नौ बजे दुधनोई से चल दिए और लक्ष्य रखा राजा भात खावा। यानी बक्सा टाइगर रिजर्व के पास। दूरी चाहे जो भी हो, लेकिन हम दिन छिपने से पहले पहुँच जाएँगे।
लगभग ढाई किलोमीटर लंबा नरनारायण सेतु पार किया। यह रेल-सह-सड़क पुल है। नीचे रेल चलती है, ऊपर सड़क। यह पुल ज्यादा पुराना नहीं है। शायद 1998 में इसे खोला गया था। उसी के बाद इधर से रेल भी चलना शुरू हुई। उससे पहले केवल रंगिया के रास्ते ही रेल गुवाहाटी जाती थी।
पुल पार करते ही जोगीघोपा है। कोयला ही कोयला और ट्रक ही ट्रक। लेकिन हमें बजरंग जी के कार्यालय जाने की जरूरत नहीं पड़ी। उन्हें पता नहीं कैसे हमारी भनक लग गई थी और वे हमें सड़क पर ही हाथ हिलाते मिले। एक बार फिर से पुल पर आकर फोटोग्राफी का दौर चला।
यहाँ राजस्थानी भोजनालय भी है। राजस्थानी भोजनालय मतलब शुद्ध शाकाहारी। कोयले और ट्रकों के कारण माहौल तो ‘काला-काला’ ही था, लेकिन यहाँ अच्छा खाना खाने वालों की अच्छी भीड़ थी।
चलते समय हमें रास्ता भी समझा दिया गया कि आगे चलकर एक तिराहा आएगा और उधर से जाना, इधर से मत जाना। दो-चार स्थानों के नाम और बताए, लेकिन वे सब हमारे पल्ले नहीं पड़े।

Monday, October 22, 2018

अनजाने मेघालय में - चेरापूंजी-नोंगस्टोइन-रोंगजेंग-दुधनोई यात्रा

Riding on Shillong Tura Road
12 फरवरी 2018
मैं पहले ही बता चुका हूँ कि हमने नोंगस्टोइन होते हुए रोंगजेंग तक जाने का फैसला किया था। अगर समय पर्याप्‍त होगा, तो सीजू जाएँगे अन्यथा दुधनोई की तरफ निकल लेंगे। और इसके लिए सुबह चार बजे चेरापूंजी से निकलना भी पक्का कर लिया।
लेकिन ऐसा भला कभी हुआ है?
आठ बजे चेरापूंजी से निकले। चार घंटों का नुकसान कह रहा था कि अब हम सीजू तो नहीं जा रहे।
चेरापूंजी से शिलोंग वाली सड़क पर चल दिए। जब दो दिन पहले हम चेरापूंजी आए थे, तो इस सड़क को अंधेरे में तय किया था, ठंड से ठिठुरते हुए। लेकिन इसकी खूबसूरती अब दिखनी शुरू हुई। सड़क तो वैसे पठार के ऊपर ही है, लेकिन पठार और गहरी घाटियों के किनारों से भी यह गुजरती है। दक्षिण में गहरी घाटियाँ दूर-दूर तक दिखती हैं। अगर मौसम एकदम साफ हो, तो धुर दक्षिण में बांग्लादेश का मैदानी इलाका भी देखा जा सकता है। इस समय मौसम तो वैसे साफ ही था, लेकिन दूर धुंध भी बनी हुई थी।
जब शिलोंग दस-बारह किलोमीटर रह गया, तो मासिनराम से आने वाली सड़क भी मिल गई। हम इसी सड़क पर मासिनराम की ओर चल दिए। अब तक तो हम पूरी तरह पठार पर आ गए थे और गहरी घाटियाँ पीछे कहीं छूट गई थीं। अब पूरे रास्ते हमें घाटियाँ नहीं मिलेंगी, हम पठार पर ही रहेंगे।

Thursday, October 18, 2018

मेघालय यात्रा - गार्डन ऑफ केव, चेरापूंजी का एक अनोखा स्थान

11 फरवरी 2018
ठीक तीन बजे हम थे ‘गार्डन ऑफ केव’ के द्वार पर। पास में ही कुछ स्थानीय लोग पिकनिक मना रहे थे और हिंदी गानों पर थिरक रहे थे। यहीं द्वार के पास एक महिला पकौड़ियाँ तल रही थीं। चाय और पकौड़ी।
यह स्थान एक आश्‍चर्यजनक जगह है। सबसे शानदार है एक गुफा की छत में छेद और उससे नीचे गिरता पानी। पानी गुफा में बीचोंबीच गिरता है। यानी गुफा के भीतर जलप्रपात। फिलहाल बहुत थोड़ा पानी गिर रहा था। बारिश में तो वाकई दर्शनीय हो जाता होगा यह। इसके अलावा कुछ और भी जलप्रपात हैं। पूरे ‘गार्डन’ में पैदल घूमने के लिए पक्का रास्ता बना है। यह स्थान भी बड़ा पसंद आया।

Monday, October 15, 2018

मेघालय यात्रा - चेरापूंजी के अनजाने स्थल

All Information about Cherrapunjee
11 फरवरी 2018
यहाँ से आगे बढ़े तो ‘सेवन सिस्टर्स फॉल’ पड़ा। बड़ी दूर तक खड़ी चट्‍टानें चली गई हैं और ऊपर से कई स्थानों से पानी गिरता होगा। इस समय एक बूंद भी पानी नहीं था।
इससे आगे थंगखरंग पार्क है। मेन रोड़ से डेढ़ किलोमीटर हटकर। लेकिन यह वन विभाग का पार्क है। पठार के उस हिस्से के एकदम ऊपर स्थित है, जहाँ से दक्षिण में खड़ा ढलान आरंभ हो जाता है और यह ढाल बांग्लादेश सीमा तक जाता है। वातावरण में धुंध-सी थी, अन्यथा यहाँ से बांग्लादेश के मैदान भी दिख जाते। इस पार्क के पश्‍चिम में किनरेम जलप्रपात भी दिखता है। लेकिन बाकी सभी जलप्रपातों की तरह इसमें भी एक-दो बूंद ही पानी था। लेकिन इसकी भौगोलिक स्थिति और इसका खुलापन बता रहा था कि बारिश के दिनों में यह मेघालय के सबसे खूबसूरत जलप्रपातों में से एक बन जाता होगा।
किनरेम प्रपात के नीचे से सड़क भी जाती है, जिससे थोड़ी देर बाद हम जाएँगे।

Thursday, October 11, 2018

मेघालय यात्रा - मॉसमाई गुफा, चेरापूंजी

All Information about Mawsmai Cave Cherrapunjee
11 फरवरी 2018
मॉसमाई केव - सन्नाटा। हर तरफ सन्नाटा। रविवार होने के कारण लोगों की छुट्‍टी थी। दुकान, होटल सब बंद। फिर भी कुछ खुले हुए। जो भी खुले थे, उनमें चाय आदि ले लेने में समझदारी थी। हम साढ़े आठ बजे मॉसमाई पहुँच गए। टिकट काउंटर बंद था। झाँककर भी देखा, कोई नहीं। कहीं गुफा भी तो बंद नहीं है! पार्किंग में बाइक खड़ी कर दी। पार्किंग के चारों ओर रेस्टोरेंट हैं। एक-दो के सामने एक-दो जने बैठे थे। उन्हें हमारी उपस्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ा। यह सन्नाटा अजीब-सा लगा।
अरे भाई, कोई तो हमें टोक लो।
एक जगह लिखा था - वेलकम टू मॉसमाई केव। हम उसी तरफ चल दिए। एक रेस्टोरेंट के सामने दो बंगाली बैठे दिखे - धूप में इत्मीनान से। तभी बगल में एक स्थानीय बूढ़े ने हमें टोका। उसने क्या कहा, यह तो समझ नहीं आया, लेकिन बड़ी खुशी मिली। कोई और मौका होता, तो हम अनसुनी करके आगे बढ़ जाते, लेकिन अब रुक गए।
“क्या? व्हाट?” मैंने पूछा।
“टेन मिनट्स।”
“टेन मिनट्स क्या?”

Monday, October 8, 2018

मेघालय यात्रा - चेरापूंजी में नोह-का-लिकाई प्रपात और डबल रूट ब्रिज

Double Root Bridge Cherrapunjee all Information
10 फरवरी 2018
“एक महिला थी और नाम था का-लिकाई। उसने दूसरी शादी कर ली। पहले पति से उसे एक लड़की थी। तो उसका दूसरा पति उस लड़की से नफरत करता था। एक बार महिला बाहर से काम करके घर लौटी तो देखा कि पहली बार उसके पति ने उसके लिए मीट बनाया और परोसा भी। महिला बड़ी खुश हुई और साथ बैठकर भोजन कर लिया। बाद में उसे बाल्टी में कुछ उंगलियाँ मिलीं। उसे समझते देर नहीं लगी कि ये उंगलियाँ उसकी लड़की की हैं और उसके दूसरे पति ने लड़की को मार दिया है। इससे महिला बड़ी परेशान हुई और पास के झरने में छलांग लगाकर अपनी जान दे दी। बाद में उस झरने का नाम पड़ गया ‘नोह-का-लिकाई’, अर्थात का-लिकाई की छलांग।”
यह कहानी थी नोह-का-लिकाई जलप्रपात की, जो वहाँ लिखी हुई थी। इस जलप्रपात को भारत का सबसे ऊँचा जलप्रपात माना जाता है। शुष्क मौसम होने के बावजूद भी एक पतली-सी जलधारा नीचे गिर रही थी। जलप्रपात बारिश में ही दर्शनीय होते हैं। यह भी बारिश में ही देखने योग्य है, लेकिन अब भी चूँकि इसमें पानी था, तो अच्छा लग रहा था।
यहाँ ज्यादा देर नहीं रुके। वापस चेरापूंजी पहुँचे और ‘डबल रूट ब्रिज’ के लिए रवाना हो गए।

Thursday, October 4, 2018

मेघालय यात्रा - डौकी-चेरापूंजी सड़क और सुदूर मेघालय के गाँव

Mawlynnong Meghalaya Complete Information
9 फरवरी 2018
रात तक हमारा इरादा चेरापूंजी पहुँचने का था। वैसे तो चेरापूंजी यहाँ से लगभग 80 किलोमीटर दूर है, लेकिन हमने एक लंबे रास्ते से जाने का इरादा किया। डौकी पुल पार करने के दो किलोमीटर बाद यह मुख्य सड़क तो सीधी चली जाती है और एक सड़क बाएँ जाती है, जो रिवाई होते हुए आगे इसी मुख्य सड़क में मिल जाती है। रिवाई के पास ही मावलिननोंग गाँव है, जो एशिया का सबसे साफ-सुथरा गाँव माना जाता है। इसके आसपास भी कुछ दर्शनीय स्थान हैं। उन्हें देखते हुए हम चेरापूंजी जाएँगे।
तो रिवाई का यह रास्ता बांग्लादेश सीमा के एकदम साथ-साथ चलता है। रास्ता तो पहाड़ पर है, लेकिन बीस-तीस मीटर नीचे ही पहाड़ समाप्‍त हो जाता है और मैदान शुरू हो जाता है। मैदान पूरी तरह बांग्लादेश में है और पहाड़ भारत में। अर्थात् हम अंतर्राष्ट्रीय सीमा से केवल बीस-तीस मीटर दूर ही चल रहे थे।
यहीं सड़क से जरा-सा नीचे सोंग्रामपुंजी जलप्रपात भी है। चूँकि जलप्रपात एकदम सीमा पर है, तो बांग्लादेशी खूब आते हैं यहाँ। इस जलप्रपात की गिनती बांग्लादेश के प्रमुख प्रपातों में होती है।
और थोड़ा आगे चलने पर बोरहिल प्रपात मिला। एकाध बूंद ही पानी टपक रहा था इस समय तो, लेकिन मानसून में जबरदस्त लगता होगा। इस प्रपात का भी निचला सिरा बांग्लादेश में है, तो अवश्य ही नीचे बांग्लादेशी यात्री भी खूब आते होंगे।
कैसा अद्‍भुत अनुभव होता होगा! प्रपात का ऊपरी सिरा भारत में और निचला सिरा बांग्लादेश में। हमें मानसून में आने का बहाना मिल गया।

Monday, October 1, 2018

मेघालय यात्रा - डौकी में भारत-बांग्लादेश सीमा पर रोचक अनुभव

India Bangladesh Border near Dawki Tamabil Meghalaya
9 फरवरी 2018
सुबह-सुबह ही वो नाववाला आ गया, जो कल हमें यहाँ छोड़कर गया था। आज वह हमें उमगोट नदी में नौका विहार कराएगा। हमें वैसे तो नौका विहार में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन यह नदी इतनी प्रसिद्ध हो चुकी है कि नौका विहार का मन करने लगा। जब भी आप कभी इंटरनेट पर ऐसा कोई फोटो देखें, जिसमें इतना पारदर्शी पानी हो कि नाव हवा में चलती दिखती हो, तो बहुत ज्यादा संभावना है कि वह यही नदी होगी। लेकिन ऐसा फोटो लेने की भी एक तकनीक है। वो यह कि धूप निकली हो और नाव की परछाई नाव से बिल्कुल अलग होकर नदी की तली में दिख रही हो। साथ ही हवा एकदम शांत हो और पानी पर लहरें न बन रही हों।
“बांग्लादेश चलेंगे सर?” अचानक नाववाले ने ऐसी बात कह दी, जो अप्रत्याशित थी।
“क्या? बांग्लादेश?”
“हाँ जी, उधर झाल-मूड़ी खाकर आएँगे।”