Friday, August 31, 2018

गंगनानी में नहाना, ड्राइवर से अनबन और मार्कंडेय मंदिर

पता नहीं आपको पता है या नहीं, लेकिन पता होना चाहिए। दीप्ति ने इस साल कुछ यात्राएँ आयोजित करने की योजना बनाई है। इन्हीं के अंतर्गत वह जनवरी में रैथल और मार्च में जंजैहली की यात्रा करा चुकी है। और जून में योजना बनाई धराली, सात ताल, नेलांग और गंगोत्री की। उसकी ये यात्राएँ हमारी नियमित यात्राओं के उलट बेहद आसान होती हैं और हर आयुवर्ग के लिए सही हैं। लेकिन उसका फोकस एक पॉइंट पर है - हम अपने मित्रों को हमेशा अनसुनी, अनजानी जगहों पर ले जाया करेंगे और उन्हें घूमने का मतलब समझाया करेंगे।
कहने का अर्थ यह है कि अगर आप वाकई घूमना चाहते हैं, प्रकृति के सानिध्य में रहना पसंद करते हैं, शहरी पर्यटन स्थलों की भीड़ से दूर कहीं एकांत में जाना चाहते हैं, तो ये यात्राएँ आपके लिए हैं। मात्र एक बार इनमें से किसी भी यात्रा पर जाकर आपको पता चलेगा कि शिमला, मसूरी के अलावा भी घूमा जा सकता है। अनजान, अनसुने स्थानों पर भी उतनी ही आसानी से जाया जा सकता है, जितना आसान नैनीताल जाना है। और इन अनजाने स्थानों पर जाकर आप अगर आनंदित नहीं हुए, तो समझिए कि आप शिमला, मसूरी के लिए ही बने हैं; प्रकृति के बीच जाने के लिए नहीं बने। आप सौ वर्ग मीटर के पार्क में झूला झूलने के लिए ही बने हैं; सैकड़ों वर्ग किलोमीटर के जंगल में स्वच्छंद घूमने के लिए नहीं बने।
और आप होटलों में मेन्यू देखकर खाने का ऑर्डर देने के लिए ही बने हैं, कहीं जंगल में किसी घर में बचा-कुचा खाना खाने के लिए नहीं।
अब आप सोचेंगे कि बचा-कुचा खाना? भला कोई कहीं बचा-कुचा खाना कैसे खा सकता है? तो आप इस पोस्ट को पूरा पढ़े बिना मत हटना। हम इस पोस्ट के आखिर में फिर से यही बात दोहराएंगे।

Wednesday, August 29, 2018

धराली से दिल्ली वाया थत्यूड़


13 जून 2018
आज तो सुबह-सुबह ही उठ गए। उठना ही पड़ता। अन्यथा बहुत मुश्किल होती। एक सप्ताह से हम पहाड़ों में घूम रहे थे, आज आखिरी दिन था और कल दिल्ली पहुँचने के लिए आज हमें पहाड़ों से बाहर निकलना ही पड़ेगा।
होटल का दो दिनों का हिसाब करने बैठे तो पैसे कम पड़ गए। यह आँचल होटल अर्जुन नेगी का है। लेकिन उसने इसके खान-पान का ठेका किसी और को दे रखा है। इसके सामने वाले बड़े होटल के खान-पान का ठेका स्वयं ले रखा है। सामने वाले होटल के सामने खाली जगह बहुत सारी है और इसमें कमरे भी ज्यादा हैं, इसलिए प्रतिद्वंदी होने के बावजूद भी अर्जुन ने इसके खान-पान का ठेका ले लिया। दोनों हाथों में लड्डू।
हमारी अर्जुन से अच्छी जान-पहचान हो गई थी। दो दिनों तक खाना-पीना हमने आँचल होटल में ही किया था, यानी इसके पैसे हमें अर्जुन को नहीं देने थे, बल्कि किसी और को देने थे। यही पैसे कम पड़ गए। फिलहाल पैसे न हमारे पास थे और न सुमित के पास। अर्जुन से बात की और उसने सब मामला सुलझा दिया - “अगली बार आओगे, तब दे देना।”
सुबह पौने सात बजे मोटरसाइकिलें स्टार्ट हो गईं और उत्तरकाशी की तरफ दौड़ने लगीं। डेढ़ घंटा लगा गंगनानी पहुँचने में।
“नहाते हुए चलेंगे।” मैंने घोषणा की और गर्म पानी के कुंड में जा उतरा। बड़ी देर तक नहाते रहे। लेकिन एक बात भूल गए, जिसने मुझे शाम तक परेशान किए रखा।

Monday, August 27, 2018

मुखबा-हर्षिल यात्रा


12 जून 2018
धराली के एकदम सामने मुखबा दिखता है - भागीरथी के इस तरफ धराली, उस तरफ मुखबा। मुखबा गंगाजी का शीतकालीन निवास है। आप जानते ही होंगे कि उत्तराखंड के चारों धामों के कपाट शीतकाल में बंद रहते हैं। तब इनकी डोली मुख्य मंदिरों से चलकर नीचे दूसरे मंदिरों में लाई जाती है और वहीं पूजा होती है। गंगाजी की डोली भी गंगोत्री से मुखबा आ जाती है। मुखबा में भी गंगोत्री मंदिर की तर्ज पर एक मंदिर है। यह मंदिर धराली से भी दिखता है।
पैदल भी जा सकते थे, ज्यादा दूर नहीं है, लेकिन मोटरसाइकिलों से ही जाना उचित समझा। हर्षिल होते हुए मुखबा पहुँच गए। हर्षिल से मुखबा की सड़क पक्की है, लेकिन बहुत तेज चढ़ाई है।
मंदिर में लकड़ी का काम चल रहा था और बिहारी मजदूर जी-जान से लगे हुए थे। कुछ बच्चे कपड़े की गेंद से कैचम-कैच खेल रहे थे। गेंद मजदूरों के पास पहुँच जाती, तो मुँह में गुटखा दबाए मजदूर उन्हें भगा देते। हालाँकि गेंद बच्चों को मिल जाती, बच्चे धीरे-धीरे खेलने लगते, लेकिन अगले एक मिनट में ही वे पूरे रोमांच पर पहुँच जाते और गेंद फिर से मजदूरों के पास जा पहुँचती।
क्या? क्या बोले आप?
जी हाँ, मैंने पूछा था... मजदूर सीतामढ़ी के थे।

Friday, August 24, 2018

धराली सातताल ट्रैकिंग

Dharali Sattal Trek Gangotri All Information

12 जून 2018
मैं जब भी धराली के पास सातताल के बारे में कहीं पढ़ता था, तो गूगल मैप पर जरूर देखता था, लेकिन कभी मिला नहीं। धराली के ऊपर के पहाड़ों में, अगल के पहाड़ों में, बगल के पहाड़ों में, सामने के पहाड़ों में जूम कर-करके देखा करता, लेकिन कभी नहीं दिखा। इस तरह यकीन हो गया कि धराली के पास सातताल है ही नहीं। यूँ ही किसी वेबसाइट ने झूठमूठ का लिख दिया और बाकी वेबसाइटों ने उसे ही कॉपी-पेस्ट कर लिया।
फिर एक दिन नफेराम यादव से मुलाकात हुई। उन्होंने कहा - “हाँ, उधर सातताल झीलें हैं।”
“झीलें? मतलब कई झीलें हैं?”
“हाँ।”
“लगता है आपने भी वे ही वेबसाइटें पढ़ी हैं, जो मैंने पढ़ी हैं। भाई, उधर कोई सातताल-वातताल नहीं है। अगर होती, तो सैटेलाइट से तो दिख ही जाती। फिर आप कह रहे हो कि कई झीलें हैं, तो एकाध तो दिखनी ही चाहिए थी।”
“आओ चलो, तुम्हें दिखा ही दूँ।”
उन्होंने गूगल अर्थ खोला। धराली और...
“ये लो। यह रही एक झील।”
“हाँ भाई, कसम से, यह तो झील ही है।”
“अब ये लो, दूसरी झील।”

Monday, August 20, 2018

बाइक यात्रा: गिनोटी से उत्तरकाशी, गंगनानी, धराली और गंगोत्री


10 जून 2018
गिनोटी से सवा नौ बजे चले। हम हमेशा प्रोमिस करते, लेकिन उठते-उठते सूरज आसमान में चढ़ जाता और हम अगले दिन के लिए फिर से प्रतिज्ञा कर लेते - “कल तो सुबह-सुबह ही निकलेंगे।”
गिनोटी से थोड़ा ही आगे ब्रह्मखाल है। इसके नाम के साथ ‘खाल’ लगा होने के कारण मैं जन्म से लेकर कल तक यही सोचता आ रहा था कि धरासू बैंड और बडकोट के बीच में ब्रह्मखाल ही वो दर्रा है, जो भागीरथी घाटी और यमुना घाटी को जोड़ता है। लेकिन कभी इसकी पड़ताल नहीं की। गूगल मैप पर सैंकड़ों बार इस सड़क को देखा, लेकिन मन में स्थाई रूप से ब्रह्मखाल ही अंकित हो गया था। कल पता चला कि वो स्थान राडी टॉप है।
सुमित की बुलेट का असर हमारी डिस्कवर पर भी पड़ रहा था। यह भी बीमारू जैसा बर्ताव कर रही थी। बार-बार पंचर हो जाता। पुराने पंचर ही लीक होने लगते। टायर ट्यूबलेस हैं और पंचर किट हमेशा हमारे पास रहती है, इसलिए कभी हम खुद पंचर बना लेते, तो कभी पचास रुपये देकर बनवा लेते, तो कभी चालीस-पचास किलोमीटर बिना हवा भी चला लेते।
लेकिन ब्रह्मखाल तक अगले पहिये की बम-बम हो गई। पुराना पंचर जिंदा हो उठा और पिचके टायर के साथ मोड़ों पर संतुलन बनाना मुश्किल होने लगा। इरादा था उत्तरकाशी पहुँचकर इसे बदलवाने का, लेकिन अभी उत्तरकाशी बहुत दूर है।
“भाई जी, इसमें डबल ‘वो’ लगानी पड़ेगी, सौ रुपये लगेंगे।”
“लगा दे।”

Friday, August 17, 2018

बाइक यात्रा: टाइगर फाल - लाखामंडल - बडकोट - गिनोटी


9 जून 2018
रात हंगामा होने के कारण आधी रात के बाद ही सोए थे और देर तक सोए रहे। दस बजे उठे। हिमालय में यात्राएँ करने का एक लाभ भी है - नहाने से छुटकारा मिल जाता है।
बारिश हो रही थी। रेनकोट पहनकर हम बारिश में ही चल देते, लेकिन बिजलियाँ भी गिर रही थीं। और उसी दिशा में गिर रही थीं, जिधर हमें जाना था, यानी लाखामंडल वाली सड़क के आसपास। सुमित बारिश में ही चल देने को बड़ा उतावला था, शायद उसने कभी इन जानलेवा बिजलियों का सामना नहीं किया। सामना तो मैंने भी नहीं किया है, लेकिन डर लगता है तो लगता है।
आलू के पराँठे खाने के बाद पचास रुपये का डिसकाउंट मिल गया। रात मैंने जो हुड़दंग की वीडियो बनाई थीं, वे आज सभी ने देखी। कौन ग्रामीण सड़क पर कितनी जोर से लठ पटक रहा था और उससे उत्पन्न हुई आवाज से उत्साहित होकर शराबियों के खिलाफ बोल रहा था, उसे देखकर और सुनकर सब बड़े हँसे। और एक-दूसरे की टांग-खिंचाई भी की। आखिर में तय हुआ कि हम इन वीडियो को सार्वजनिक नहीं करेंगे और आधी रात को होटल से भगाए जाने से आहत होकर वकील साहब अगर कोई कार्यवाही करते हैं, तब ये वीडियो काम आएँगी।
न वकील साहब ने कार्यवाही करी, न वीडियो काम आईं।
तो इसलिए पचास रुपये का डिसकाउंट मिला।

Monday, August 13, 2018

टाइगर फाल और शराबियों का ‘एंजोय’


8 जून 2018
सुमित ने तार लगाकर अपनी बुलेट स्टार्ट की। अब जब भी इसे वह इस तरह स्टार्ट करता, हम खूब हँसते।
“भाई जी, एक बात बताओ। त्यूणी वाली रोड कैसी है?”
“एकदम खराब है जी।”
“कहाँ से कहाँ तक खराब है?”
“बस यहीं से खराब स्टार्ट हो जाती है और 15 किलोमीटर तक खराब ही है।”
हमें यही सुनना था और हम चकराता की ओर चल पड़े। अगर त्यूणी वाली सड़क अच्छी हालत में होती, तो हम आज हनोल और वहाँ का चीड़ का जंगल देखते हुए पुरोला जाते। आपको अगर वाकई चीड़ के अनछुए जंगल देखने हैं तो त्यूणी से पुरोला की यात्रा कीजिए। धरती पर जन्म लेना सफल न हो जाए, तो कहना! और अगर देवदार देखना है, तो लोखंडी है ही।
लोखंडी से त्यूणी की ओर ढलान है। कल विकासनगर में उदय झा साहब ने बता ही दिया था कि यह ढलान काफी तेज है और पथरीला कच्चा रास्ता और कीचड़ मोटरसाइकिल के लिए समस्या पैदा करेगा। फिर हमारा जाना भी कोई बेहद जरूरी तो था नहीं। क्यों कीचड़ में गिरने का रिस्क उठाएँ? टाइगर फाल ही चलो। आखिर में जाना तो गंगोत्री है, चाहे पुरोला से जाओ या लाखामंडल से।
चकराता न जाकर टाइगर फाल वाली सड़क पर मुड़ गए। जून का महीना था और टूरिस्टों से यह सड़क भरी पड़ी थी।

Saturday, August 11, 2018

मोइला डांडा, बुग्याल और बुधेर गुफा


8 जून 2018

नाम रोहन राणा। इस होटल के मालिक का नाम। शानदार व्यक्तित्व। रौबीली मूँछें। स्थानीय निवासी।
“भाई जी, आज हमें बुधेर केव जाना है।”
“बुधेर केव? मतलब मोइला डांडा?”
“मतलब?”
“मतलब उसे हम मोइला डांडा कहते हैं।”
मुझे यह जानकारी नहीं थी। अभी तक वो जगह मेरी नजरों में बुधेर केव ही थी, लेकिन अब इसे मैं मोइला डांडा कहूँगा। यह एक ‘डांडा’ है, इतना तो मुझे पता था, लेकिन इसका नाम मोइला है, यह नहीं पता था।
“भाई जी, हम 12 बजे तक आ जाएँगे और तभी चेक-आउट करेंगे।”
“नहीं भाई जी। आज होटल की कम्पलीट बुकिंग है। गुजराती लोगों ने इसे बुक किया हुआ है। अभी चेक-आउट कर देंगे, तो अच्छा रहेगा।
सारा सामान हमने नीचे रेस्टोरेंट में रख दिया और बिस्कुट, नमकीन, पानी लेकर मोइला डांडे की ओर बढ़ चले।
लोखंडी से तीन किलोमीटर तक कच्चा मोटर रास्ता है, जो फोरेस्ट रेस्ट हाउस के पास समाप्त हो जाता है। चौकीदार ने बताया कि इस रेस्ट हाउस की बुकिंग कालसी से होती है। यहाँ तक आने का रास्ता देवदार के घने जंगल से होकर है। वैसे यह जंगल देवदार का ही है या किसी और का, इसमें मुझे डाउट है। क्योंकि मेरा जैव-वनस्पति ज्ञान शून्य है। चीड़ और देवदार की पहचान मैं कर लेता हूँ, लेकिन चीड़ जैसे दिखने वाले अन्य पेड़ भी होते हैं और देवदार जैसे दिखने वाले भी। इसलिए इन ‘उप-चीड़ों’ और ‘उप-देवदारों’ में हमेशा डाउट रहता है। फिर भी यह चीड़-प्रजाति के पेड़ों का जंगल नहीं था। चीड़ का जंगल सूखा-सूखा होता है और उसमें केवल चीड़ ही पनपता है। वह किसी अन्य को नहीं पनपने देता। जबकि देवदार प्रजाति का जंगल ‘अतिथि देवो भवः’ का पालन करता दिखता है और इसके नीचे बाकी सब पेड़ और झाड़ियाँ जमकर पनपते हैं।
तो यह देवदार प्रजाति का जंगल था। हम कहेंगे कि देवदार का जंगल था। देवदार के जंगल में पलक भी झपकाने का मन नहीं करता, कहीं कोई नजारा ‘मिस’ न हो जाए।

Monday, August 6, 2018

विकासनगर-लखवाड़-चकराता-लोखंडी बाइक यात्रा


7 जून 2018

“क्या!!!"
“हाँ, मैं सच कह रहा हूँ।”
“टाइगर फाल से भी जबरदस्त जलप्रपात!”
“हाँ, यकीन न हो, तो शिव भाई से पूछ लो।”
और शिव सरहदी ने भी पुष्टि कर दी - “हाँ, उदय जी सही कह रहे हैं। उसकी ज्यादा लोगों को जानकारी नहीं है। लोकल लोगों को जानकारी है, तो हम वहाँ अक्सर दारू पीने चले जाते हैं।”
रास्ता हमने समझ लिया और कल्पना करने लगे टाइगर फाल से भी जबरदस्त झरने की। अगर ऐसा हुआ तो कमाल हो जाएगा। लोगों को जब मेरे माध्यम से इसका पता चलेगा तो बड़ा नाम होगा। अखबार में भेजूंगा। टी.वी. पर भेजूंगा। टाइगर फाल क्या कम जबरदस्त है! लेकिन यह तो उससे भी जबरदस्त होगा।
“नाम क्या है इसका?”
“नाम कुछ नहीं है।”

Thursday, August 2, 2018

मोटरसाइकिल यात्रा: सुकेती फॉसिल पार्क, नाहन

जून का तपता महीना था और हमने सोच रखा था कि 2500 मीटर से ऊपर ही कहीं जाना है। मई-जून में घूमने के लिए सर्वोत्तम स्थान 2500 मीटर से ऊपर ही होते हैं। और इसमें चकराता के आगे वह स्थान एकदम फिट बैठता है, जहाँ से त्यूनी की उतराई शुरू हो जाती है। इस स्थान का नाम हमें नहीं पता था, लेकिन गूगल मैप पर देवबन लिखा था, तो हम इसे भी देवबन ही कहने लगे। इसके पास ही 2700 मीटर की ऊँचाई पर एक बुग्याल है और इस बुग्याल के पास एक गुफा भी है - बुधेर गुफा। बस, यही हमें देखना था।
उधर इंदौर से सुमित शर्मा अपनी बुलेट पर चल दिया था। वह 5 जून की शाम को चला और अगले दिन दोपहर बाद दिल्ली पहुँचा। पूरा राजस्थान उसने अंधेरे में पार किया, क्योंकि लगातार धूलभरी आँधी चल रही थी और वह दिन में इसका सामना नहीं करना चाहता था। लेकिन उसे क्या पता था कि इन आँधियों ने दिल्ली का भी रास्ता देख रखा है। दिल्ली पूरी तरह इनसे त्रस्त थी।
जब मैं ऑफिस से लौटा तो सुमित बेसुध पड़ा सो रहा था। एक टांग दीवार पर इस तरह टिकी थी कि अगर वह जगा होता तो कोशिश करने पर भी इस स्टाइल में नहीं लेट सकता था। उसे रात मैंने सलाह भी दी थी कि चित्तौड़गढ़, अजमेर या जयपुर कहीं भी वातानुकूलित कमरा लेकर आठ-दस घंटे की नींद लेकर ही आगे बढ़ना, लेकिन उसने वही पिटा-पिटाया जवाब दोहरा दिया - “घुमक्कड़ी कम खर्चे में करनी चाहिए।”
“लेकिन मोटरसाइकिल चलाते समय कभी भी नींद से समझौता नहीं करना चाहिए। यह जीवन-मरण का सवाल है।”