Thursday, April 26, 2018

भारत प्रवेश के बाद: नेपाल बॉर्डर से दिल्ली



इस यात्रा की किताब हमसफ़र एवरेस्ट हमारे भारत में प्रवेश करते ही समाप्त हो जाती है। इसके बाद क्या हुआ, आज आपको बताते हैं।
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4 जून 2016
तो सीमा पार कर लेने के बाद फरेंदा की तरफ़ दौड़ लगा दी, जो यहाँ से 50 किलोमीटर दूर है। सड़क अच्छी बनी है। निकट भविष्य में और भी अच्छी बन जायेगी।
लेकिन सामने से आते गाड़ी वाले अपनी हैड़लाइट डाउन नहीं करते। नेपाल में दूर से देखते ही हैड़लाइट डाउन कर लेते थे। यदि हम ऐसा करने में देर लगा देते तो सामने वाला लाइटें जला-बुझाकर तब तक इशारा करता रहता, जब तक हम डाउन न कर लें। वास्तव में नेपाल में भारत के मुकाबले ‘ट्रैफिक सेंस’ ज्यादा अच्छी है।
लेकिन आज हमें कुछ भी ख़राब नहीं लग रहा था। जल्द ही मैंने भी हैड़लाइट डाउन करनी बंद कर दी और उसी ज़मात में शामिल हो गया, जिसकी अभी-अभी आलोचना कर रहा था।
विमलेश जी के भाई का नाम कमलेश है। वे फरेंदा में मिल गये। बिजली विभाग में अच्छे पद पर हैं। अपने क्वार्टर पर अकेले ही थे और हमारे लिये रोटी व दाल चावल बना रखे थे। दीप्ति ने कहा - “आज भी दाल-भात।” मैंने कहा - “नहीं, ये दाल-भात नहीं हैं। ये दाल-चावल हैं और ये उन दाल-भात से बिल्कुल अलग हैं।”
रात बारह बजे तक सो गये। कल रात घुर्मी में अच्छी नींद नहीं आयी थी। फिर आज 530 किलोमीटर से ज्यादा बाइक चलायी, जिसके कारण इतनी ज्यादा थकान हो गयी थी कि रातभर मच्छर काटते रहे, न मच्छरदानी लगाने की सुध रही और न आँख खुली।

5 जून, 2016
सुबह अपनी रात्रिकालीन ड्यूटी समाप्त करके कमलेश जी आ गये और मना करते-करते भी हमारे लिये नाश्ता बना दिया। हमारे पास पैसे नहीं थे। नेपाल में कल इसलिये नहीं निकाले कि नेपाली मुद्रा को भारतीय मुद्रा में बदलने का झंझट नहीं उठाना चाहते थे। आज कमलेश जी की बाइक पर बैठकर पूरे फरेंदा का चक्कर लगा डाला, लेकिन किसी भी ए.टी.एम. में पैसे नहीं मिले। हमारे अलावा भी कई और लोग बाइकों और स्कूटरों पर पैसों के लिये इधर से उधर चक्कर लगा रहे थे।
आख़िरकार कमलेश जी स्टेट बैंक के एक ए.टी.एम. पर पहुँचे। शटर नीचे गिरा था, लेकिन ताला नहीं लगा था। चौकीदार जान-पहचान वाला था। वह शटर उठाने को राज़ी हो गया, लेकिन साथ ही हिदायत भी दी कि इसमें पैसे कम हैं, किसी और से मत बताना कि यहाँ से निकाले हैं। आधा शटर उठाया और मैंने पर्याप्त पैसे निकाल लिये। तब तक बाहर कई व्यक्ति और भी आ चुके थे। चौकीदार ने हाथ से मुझे इशारा किया और मैं यह कहते हुए निकल गया - “पैसे नहीं हैं।”
नौ बजे फरेंदा से चल दिये। रास्ता हमारा देखा हुआ था ही। कैंपियरगंज में बाइक की टंकी फुल कराकर सीधे बस्ती की ओर दौड़ लगा दी। इसमें सात किलोमीटर का रास्ता अत्यंत ख़राब है, लेकिन वाया गोरखपुर के मुकाबले यह बहुत छोटा भी है। ग्यारह बजे बस्ती बाईपास पर फ्लाईओवर के नीचे जाकर रुके। जून की जला देने वाली गर्मी पड़ रही थी और लू भी चल रही थी। यहाँ दस-दस रुपये का गन्ना-रस पीया, तो जान में जान आयी। रस वाले को दस रुपये देते समय लग रहा था कि हमने फ्री में रस पीया है। नेपाल में खासकर एवरेस्ट ट्रैक में दस-बीस रुपये का कुछ नहीं मिलता।
आगे भी कई बार गन्ना-रस पीया। गर्मी इतनी थी कि रस पीकर एक किलोमीटर भी आगे नहीं जाते कि फिर से रस पीने की तलब लगने लगती। एक बजे फ़ैज़ाबाद पहुँचे - सीधे अपर्णा जी के यहाँ। लेकिन उनके घर पर मरम्मत का कार्य चल रहा था और सबकुछ तितर-बितर पड़ा था, इसलिये उन्होंने हमारे लिये शाने-अवध होटल में एक ए.सी. कमरा बुक कर दिया। वैसे दोपहर में फ़ैज़ाबाद पहुँचने का अर्थ था कि थोड़ा खाना खाकर और थोड़ा आराम करके शाम को निकल पड़ेंगे, लेकिन भयानक गर्मी में वातानुकूलित कमरा देखकर यहीं रुकने का मन हो गया। पहले तो जमकर नहाये और फिर सो गये।
शाम को अपर्णा जी सपरिवार आ गयीं और खाने-पीने का दौर चला। समय था, अयोध्या भी जा सकते थे, लेकिन बातों में इतना मन लगा कि अयोध्या जाना भूल गये। वे एवरेस्ट यात्रा के फोटो देखती रहीं और आश्चर्य भी करती रहीं। आधी रात तक बातों का सिलसिला चलता रहा। सुबह हम जल्दी निकल जायेंगे और वे नहीं मिल सकेंगी, इसलिये अभी जी भरकर मिले। फ़ुरसत में कभी फ़ैज़ाबाद आने का वादा किया और उनके साथ यू.पी. के एकमात्र राष्ट्रीय उद्यान दुधवा घूमने की प्रतिज्ञा भी। अपर्णा जी असल में दुधवा के पास की ही रहने वाली हैं। अभी तक दुधवा से फ़ैज़ाबाद तक की पट्टी में हमारी कोई जान-पहचान नहीं थी, अब अचानक सारी पट्टी अपनी हो गयी।




अगले दिन सुबह छह बजे ही फ़ैज़ाबाद से चल दिये। सुबह का समय था और धूप में तीखापन भी नहीं आया था। लगातार साढ़े तीन घंटे तक चलने और 200 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद उन्नाव के पास कहीं रुके। दही के साथ आलू-पराँठे का नाश्ता किया और दस बजे फिर चल दिये। मन में उत्कंठा थी कि आज ही दिल्ली पहुँचना है। रास्ता बहुत अच्छा है। हम रात होने तक दिल्ली पहुँच जायेंगे।
लेकिन बारह बजते-बजते जब गर्मी चरम पर होने लगी, तो दिल्ली पहुँचने की इच्छाएँ दबने लगीं। अगर आज इटावा में कपिल चौबे जी होते तो हम दोपहरी उनके यहाँ काट देते। ऐसी गर्मी में बाइक चलाने की बिल्कुल भी इच्छा नहीं हो रही थी। न मेरा मन लग रहा था और न ही दीप्ति का।
औरैया के पास एक जगह कोल्ड़ ड्रिंक पीने रुक गये। काफ़ी बड़ी जगह थी। छायादार भी और हवादार भी। लेकिन ठंड़ी कोल्ड़ ड्रिंक नहीं मिली। यहाँ एक घंटा रुके रहे। मैं नहा भी लिया। नहाने के बाद बड़ी राहत मिली। जून में हमारे उत्तर भारत में गर्मी चरम पर पड़ती है। ‘जेठ की तपती दुपहरिया’ इसे ही कहते हैं। आसमान में पक्षी तक नहीं दिखते। लेकिन हमारी मज़बूरी थी। दिल्ली भी पहुँचना था और बाइक से ही पहुँचना था।
ताकशिंदो-ला पर बाइक चलाने से भी ज्यादा मुश्किल अब हो रही थी। मन बना लिया कि आगरा में राहुल अवस्थी जी के यहाँ रुकेंगे। इस बारे में उन्हें भी बता दिया और वे हमारी प्रतीक्षा करने लगे।
टूंड़ला पहुँचते-पहुँचते चार बज गये और सामने यानी पश्चिम दिशा में धूल का बवंड़र उठता दिखायी दिया। हवा तेज चलने लगी और जल्दी ही यह तूफ़ान में बदल गयी। बारिश तो नहीं हुई, लेकिन गर्मी गायब हो गयी। हवा इतनी तेज थी कि हम पचास की स्पीड़ से चलने में भी ठीक संतुलन नहीं बना पा रहे थे।
दीप्ति खुश थी कि आज वह ताज-नगरी में थी, आगरा में थी। उसने अपने-आप ही वादा कर लिया था कि कल हम ताजमहल देखेंगे। यमुना पार करते समय हमने दक्षिण में देखा, लेकिन ताजमहल नहीं दिखा। हाँ, थोड़ा आगे चलकर आगरा का किला अवश्य दिख गया था।



राहुल जी हमें लेने कैंट स्टेशन पर आये। स्टेशन के पास ही उनका घर है।
अगले दिन यानी 7 जून को दीप्ति को यह कहकर ताजमहल देखने से मना करना पड़ा कि संगमरमर का बना ताज परिसर धूप में अत्यंत गर्म हो जायेगा और हमारे पैरों में छाले भी पड़ सकते हैं। फिर टिकट व सुरक्षा-जाँच के लिये लाइन में भी लगना पड़ता है। कभी मानसून में आयेंगे या फिर सर्दियों में। वह मान गयी, लेकिन आग्रह किया कि ऐसे मार्ग से चलो, जहाँ से ताजमहल दिख सके। उसका आग्रह मैंने मान लिया। पता नहीं उसे ताज दिखा या नहीं, लेकिन वह खुश थी।
यमुना एक्सप्रेसवे पर चल पड़े। मथुरा वाले मोड़ पर नरेश चौधरी जी मिल गये। एक महीने पहले जब हम इधर से नेपाल की ओर जा रहे थे, तब भी वे मिलते-मिलते रह गये थे। और इस बार तो अपने घर ले गये। दोपहरी होने से पहले ही धूप झुलसाने लगी थी। गाँव में नरेश जी के घर पर हमारी जो खातिरदारी हुई, अपने खास रिश्तेदार की भी क्या होती होगी! खाना-पीना तो हुआ ही, यमुना की रेत के खरबूजे बोरी भरकर लाद लिये। इनके अपने खेत के खरबूजे थे। कम से कम आधा मन खरबूजे लादकर शाम चार बजे दिल्ली की ओर चल दिये।
फिर दिल्ली पहुँचने में समय ही कितना लगता है!
कई दिनों तक हम गर्मी से बड़े परेशान रहे। अभी दो-तीन दिन पहले ही तो हम नेपाल में रजाइयाँ ओढ़कर सो रहे थे।


मथुरा में नरेश जी के घर पर

एक महीने पहले फ्रिज में नींबू रखकर स्विच-ऑफ करके चले गये थे। और नींबू सड़ गये।
यह इस शानदार यात्रा का आख़िरी फोटो है।








समाप्त।






1. फोटो-यात्रा-1: एवरेस्ट बेस कैंप - दिल्ली से नेपाल
2. फोटो-यात्रा-2: एवरेस्ट बेस कैंप - काठमांडू आगमन
3. फोटो-यात्रा-3: एवरेस्ट बेस कैंप - पशुपति दर्शन और आगे प्रस्थान
4. फोटो-यात्रा-4: एवरेस्ट बेस कैंप - दुम्जा से फाफलू
5. फोटो-यात्रा-5: एवरेस्ट बेस कैंप - फाफलू से ताकशिंदो-ला
6. फोटो-यात्रा-6: एवरेस्ट बेस कैंप - ताकशिंदो-ला से जुभिंग
7. फोटो-यात्रा-7: एवरेस्ट बेस कैंप - जुभिंग से बुपसा
8. फोटो-यात्रा-8: एवरेस्ट बेस कैंप - बुपसा से सुरके
9. फोटो-यात्रा-9: एवरेस्ट बेस कैंप - सुरके से फाकडिंग
10. फोटो-यात्रा-10: एवरेस्ट बेस कैंप - फाकडिंग से नामचे बाज़ार
11. फोटो-यात्रा-11: एवरेस्ट बेस कैंप - नामचे बाज़ार से डोले
12. फोटो-यात्रा-12: एवरेस्ट बेस कैंप - डोले से फंगा
13. फोटो-यात्रा-13: एवरेस्ट बेस कैंप - फंगा से गोक्यो
14. फोटो-यात्रा-14: गोक्यो और गोक्यो-री
15. फोटो-यात्रा-15: एवरेस्ट बेस कैंप - गोक्यो से थंगनाग
16. फोटो-यात्रा-16: एवरेस्ट बेस कैंप - थंगनाग से ज़ोंगला
17. फोटो-यात्रा-17: एवरेस्ट बेस कैंप - ज़ोंगला से गोरकक्षेप
18. फोटो-यात्रा-18: एवरेस्ट के चरणों में
19. फोटो-यात्रा-19: एवरेस्ट बेस कैंप - थुकला से नामचे बाज़ार
20. फोटो-यात्रा-20: एवरेस्ट बेस कैंप - नामचे बाज़ार से खारी-ला
21. फोटो-यात्रा-21: एवरेस्ट बेस कैंप - खारी-ला से ताकशिंदो-ला
22. फोटो-यात्रा-22: एवरेस्ट बेस कैंप - ताकशिंदो-ला से भारत
23. भारत प्रवेश के बाद: नेपाल बॉर्डर से दिल्ली




Monday, April 23, 2018

फोटो-यात्रा-22: एवरेस्ट बेस कैंप - ताकशिंदो-ला से भारत

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3 जून 2016



हम धीरे से नेपाल के द्वार से बाहर निकल गये। ‘नो मैंन्स लैंड़’ में पहुँचे और उतने ही धीरे से भारतीय द्वार में प्रवेश कर गये। किसी ने हमारी तरफ़ देखा तक नहीं। नेपाली बाइक भारत में और भारतीय बाइक नेपाल में दिनभर आती-जाती रहती हैं।
अब हम भारत में थे। अपने देश में थे। चाहे यह जैसा भी हो, इसके नागरिक जैसे भी हों, लेकिन है तो हमारा अपना ही। चौबीस दिन नेपाल में रहकर हमें अपने देश की सख़्त ज़रूरत महसूस होने लगी थी।
नेपाली सिम निकालकर भारतीय सिम डाल लिया। फेसबुक पर पहला संदेश भेजा - “भारत माता की जय।”

एवरेस्ट बेस कैंप ट्रैक पर आधारित मेरी किताब ‘हमसफ़र एवरेस्ट का एक अंश। किताब तो आपने पढ़ ही ली होगी, अब आज की यात्रा के फोटो देखिये:

Thursday, April 19, 2018

फोटो-यात्रा-21: एवरेस्ट बेस कैंप - खारी-ला से ताकशिंदो-ला

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1 जून 2016
“रास्ते में एक विदेशी और एक भारतीय ट्रैकर मिले। भारतीय का नाम शायद साहिल था और वह नोएड़ा का रहने वाला था। ये दोनों एवरेस्ट मैराथन में भाग लेकर लौट रहे थे। इन्हें वैसे तो लुकला से फ्लाइट से काठमांडू जाना था, लेकिन दो दिनों से मौसम ख़राब होने के कारण कोई भी वायुयान नहीं उड़ सका। विदेशी की काठमांडू से कल दोपहर की फ्लाइट थी, जिसे वह किसी भी हालत में नहीं छोड़ सकता था। इस समय उसके पास काठमांडू पहुँचने के लिये केवल चौबीस घंटे ही शेष थे। मौसम कब तक सामान्य होगा, कब उड़ानें नियमित होंगी, इसकी प्रतीक्षा न करते हुए उसने फाफलू पहुँचने का जो निर्णय लिया था, वो एकदम ठीक निर्णय था।”
“ट्रैकिंग के पहले दिन जिन स्थानों पर हम रुके थे, जहाँ-जहाँ पानी पीया था, सभी को ‘रिमाइंड़’ करते गये। कोठारी जी भी अदृश्य रूप में साथ थे। यहाँ इस पुल के पास बैठकर हमने कोठारी जी की एक घंटे तक प्रतीक्षा की थी। यहाँ कोठारी जी ने ‘तातोपानी’ पीया था। यहाँ हमें पहली ‘खच्चर-ट्रेन’ मिली थी।”

Monday, April 16, 2018

फोटो-यात्रा-20: एवरेस्ट बेस कैंप - नामचे बाज़ार से खारी-ला

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30 मई 2016
“‘मैं भी भारतीय हूँ, लद्दाख से’ यह सुनते ही जो खुशी हुई, उसे बयाँ नहीं कर सकता। एक ही साँस में मैंने उस पर कई प्रश्न उडेल डाले। वह भारतीय सेना के एवरेस्ट अभियान का एक हिस्सा था। उसने कल मैराथन में भाग भी लिया था। आठवाँ स्थान हासिल किया। इस दल में बाकी सभी उच्चाधिकारी थे, अकेला यही निचले दर्जे का था। नाम था मुरुप दोरज़े।”
“लगातार चलते रहने से, चलते ही रहने से मानसिक और शारीरिक दोनों थकान होती है। एक सीमा के बाद पैर अपने ही आप कहने लगते - अब, बस और नहीं। रुकने के ठिकाने हर जगह मौजूद हों, तो यह भावना जल्दी होने लगती है। अगर रुकने का ठिकाना दस किलोमीटर आगे होता, तो थकान होने के बावज़ूद भी दस किलोमीटर और चलना पड़ता।
आप जहाँ भी थक जायेंगे, वहीं एक होटल होगा और काफ़ी संभावना है कि आप वहीं रुक भी जायेंगे।”

Thursday, April 12, 2018

फोटो-यात्रा-19: एवरेस्ट बेस कैंप - थुकला से नामचे बाज़ार

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29 मई 2016
“यह ठीक है कि यहाँ सारा सामान खच्चरों पर या याकों पर या इंसानों की पीठ पर बड़ी दूर से ढोया जाता है। सामान पहुँचने में कई-कई दिन लग जाते हैं। लेकिन खाने की चीजें कई साल पहले एक्सपायर हो चुकी होती हैं। ज्यादातर विदेशी लोग यहाँ आते हैं, क्या किसी का ध्यान नहीं जाता इस बात पर? मुझे अपने देश का लद्दाख और कई दुर्गम इलाके याद आये। वहाँ इस तरह एक्सपायरी चीजें नहीं मिलतीं। और अगर मिलती भी हैं तो दुकानदार को इस बारे में पता रहता है और वह इसके लिये शर्मिंदा भी होता है। कई बार तो ऐसी चीजें फ्री में भी दे देते हैं, अन्यथा पैसे कम तो ज़रूर ही हो जाते हैं।
नेपाल को इस मार्ग से प्रतिवर्ष अरबों रुपये मिलते हैं। यह नेपाल की सबसे महँगी जगह भी है। लेकिन खाने की गुणवत्ता इस महँगाई के अनुरूप नहीं है। बेतहाशा व्यावसायिकता है। अंधी व्यावसायिकता। किसी को अगर इस तरह का खाना खाने से कुछ हो भी जाता होगा, तो ये लोग बड़ी आसानी से उस व्यक्ति की ही गलती घोषित कर देते होंगे - हाई एल्टीट्यूड़ की वजह से ऐसा हुआ।”

Monday, April 9, 2018

फोटो-यात्रा-18: एवरेस्ट के चरणों में

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28 मई 2016
“हम मानसिक और शारीरिक रूप से इतने थक चुके थे कि 5500 मीटर चढ़ने के लिये - अपना एक रिकार्ड़ बनाने के लिये - हम काला पत्थर नहीं जाने वाले थे। यदि मौसम साफ़ होता, तो एवरेस्ट देखने के लालच में जा भी सकते थे, लेकिन ऊँचाई के लालच में कभी नहीं जायेंगे।”
“मेरी शिखर पर चढ़ने की कभी इच्छा नहीं होती। बेसकैंप तक आने की इच्छा थी और आज बेसकैंप मेरे सामने था।”
“बेसकैंप से लौटते समय एक कसक भी थी कि एवरेस्ट के दर्शन नहीं हुए। लेकिन आभास भी हो रहा था कि वह हमें देख रही है और हम उसके साये में चल रहे हैं।”
“सोने से पहले आज के दिन के बारे में सोचने लगे। निःसंदेह आज का दिन हमारी ज़िंदगी का एक अहम दिन था। जिस ट्रैक पर जाने की इच्छा सभी ट्रैकर्स करते हैं, आज हमने उसी ट्रैक को पूरा कर लिया था।
एवरेस्ट बेस कैंप। हालाँकि प्रत्येक पर्वत का एक बेसकैंप होता है, लेकिन अगर कहीं दो ट्रैकर्स खड़े ‘बेसकैंप’ का ज़िक्र कर रहे हों, तो समझ लेना कि एवरेस्ट बेसकैंप की ही चर्चा चल रही होगी।”




Thursday, April 5, 2018

फोटो-यात्रा-17: एवरेस्ट बेस कैंप - ज़ोंगला से गोरकक्षेप

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27 मई 2016
“या तो गंगोत्री के पास तपोवन के बराबर में शिवलिंग चोटी ने मुझे इतना सम्मोहित किया था, या फिर आज आमा डबलम ने किया। ये आगे-पीछे दो चोटियाँ हैं। आगे वाली कुछ छोटी है और पीछे वाली ज्यादा ऊँची है। ऐसा लगता कि आमा ने - अम्मा ने - अपनी बेटी को गोद में बैठा रखा हो। आमा डबलम का मतलब क्या होता है? किसी ने कहा - अम्मा का आभूषण, तो किसी ने कहा - डबल अम्मा यानी दो माताएँ। मतलब कुछ भी हो, आमा डबलम ही एवरेस्ट क्षेत्र का आभूषण है।”
“आश्चर्यजनक रूप से गोरकक्षेप में हमें छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा दिखायी पड़ी। इसे पुणे की ‘गिरीप्रेमी’ संस्था ने 2012 में लगाया था। यहाँ इतनी दूर विदेश में, जहाँ से चीन की सीमा केवल चार हवाई किलोमीटर दूर थी, शिवाजी महाराज की प्रतिमा को देखकर लगा जैसे कोई अपना मिल गया हो। इसके लिये पुणे की यह संस्था वास्तव में बधाई की पात्र है। शायद ही कोई नेपाली या अन्य विदेशी ट्रैकर्स शिवाजी महाराज के बारे में जानते हों, लेकिन भारत का बच्चा-बच्चा इसी नाम से अपने लिखने-पढ़ने की शुरूआत करता है।”

Monday, April 2, 2018

फोटो-यात्रा-16: एवरेस्ट बेस कैंप - थंगनाग से ज़ोंगला

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26 मई 2016
आज का दिन हमारी इस यात्रा का सबसे मुश्किल दिन रहा। बर्फ़बारी के बीच ख़राब मौसम में 5320 मीटर ऊँचा चो-ला दर्रा पार करना आसान नहीं रहा। रही-सही कसर इसके उस तरफ ग्लेशियर ने पूरी कर दी।
“बर्फ़ होने के बावज़ूद भी हमें रास्ता मिल रहा था। कारण था कि ठीकठाक पगडंड़ी बनी थी। फिर हमसे एक-डेढ़ घंटे पहले पाँच लोग यहाँ से गुज़रे थे, तो उनके पैरों के निशान भी मिल रहे थे। ऐसा ही चलता रहा, तो उत्तम होगा। लेकिन यदि मामूली-सी बर्फ़ भी पड़ गयी, तो ये निशान मिट जायेंगे। क्या पता आगे दर्रे के पास कैसी पगडंड़ी हो? हो या न हो।”
“थोड़ी देर के लिये थोड़े-से बादल इधर-उधर हो गये और हमें सामने बिल्कुल सिर के लगभग ऊपर तीन चोटियाँ दिखायी पड़ीं। इनके बीच में दो दर्रों जैसी आकृतियाँ भी दिखीं। इनमें से एक चो-ला है। इसे देखना भर ही सिहरन पैदा कर रहा था। यह एक ‘रॉक-फ़ाल जोन’ था, जहाँ खड़े ढाल पर आपको ढीले पत्थरों पर चढ़ना होगा और कभी भी कोई भी पत्थर आपके चलने से या अपने-आप भी नीचे गिर सकता था। अभी तक हम बादलों की उपस्थिति को कोस रहे थे। अब खुश हुए कि बादल रहें, तो अच्छा हो। हमें यह ‘रॉक-फ़ाल जोन’ दूर तक नहीं दिखेगा और सिहरन व डर भी कम लगेगा। हमारा यह विचार ऊपर वाले से सुन लिया और अगले एक मिनट में फिर से सबकुछ ढक गया।”
“लेकिन अब एक नयी मुसीबत सामने आ गयी, जिसका सामना इस समय हम नहीं करना चाहते थे। यह एक ग्लेशियर था और झील ग्लेशियर के ऊपर ही बनी थी। ताज़ा बर्फ़बारी हो जाने से और घने बादल होने से चारों तरफ़ सबकुछ सफ़ेद ही दिख रहा था। हम दोनों की साँसें तब यकायक रुक गयीं, जब एक ‘क्रेवास’ पार किया।”