Friday, December 21, 2018

कोंकण में एक गुमनाम बीच पर अलौकिक सूर्यास्त

Best Beach in Maharashtra
19 सितंबर 2018
मुंबई से गोवा जाने के यूँ तो बहुत सारे रास्ते हैं। सबसे तेज रास्ता है पुणे होकर, जिसमें लगभग सारा रास्ता छह लेन, फोर लेन है। दूसरा रास्ता है मुंबई-गोवा हाइवे, जो कोंकण के बीचोंबीच से होकर गुजरता है, खासकर रेलवे लाइन के साथ-साथ। और तीसरा रास्ता यह हो सकता है, जो एकदम समुद्र तट के साथ-साथ चलता है। यह तीसरा रास्ता कोई हाइवे नहीं है, केवल मान-भर रखा है कि अगर समुद्र के साथ-साथ चलते रहें तो गोवा पहुँच ही जाएँगे। यह आइडिया भी हमें उस दिन प्रतीक ने ही दिया था। उसी ने बताया था कि इस रास्ते पर मुंबई से गोवा के बीच पाँच स्थानों पर नाव से क्रीक पार करनी पड़ेगी। अन्यथा लंबा चक्कर काटकर आओ। उसी ने बताया था दिवेआगर बीच के बारे में और शेखाड़ी होते हुए श्रीवर्धन जाने के बारे में भी।

शेखाड़ी बड़ी ही शानदार लोकेशन पर स्थित है। लेकिन इस शानदार गाँव के बारे में एक नकारात्मक खबर भी है। मुंबई ब्लास्ट में प्रयुक्त हुए हथियार और विस्फोटक समुद्री मार्ग से यहीं पर लाए गए थे और उन्हें ट्रकों में भरकर मुंबई पहुँचाया गया था। खबर यह रही

लेकिन जैसे ही शेखाड़ी पार किया, हम किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए कि रुकें या न रुकें। क्योंकि हम सूर्यास्त से पहले श्रीवर्धन पहुँचना चाहते थे और वहीं से सूर्यास्त देखना चाहते थे। लेकिन यहाँ हमें रुकना पड़ा। समुद्र के अंदर से पहाड़ियाँ निकलती हैं - एकदम नहाई-धोई-सी। नीला समुद्र और हरी-भरी पहाड़ियाँ। और इन दोनों के ठीक बीच से निकलती सड़क। दाहिनी तरफ समुद्र और बाईं तरफ पहाड़ियाँ।
हम रुके; दो-चार फोटो खींचे; सड़क के किनारे ट्राइपॉड लगाए एक फोटोग्राफर को देखा; बरगद का अकेला पेड़ देखा; श्रीवर्धन को याद किया और आगे बढ़ चले।

Wednesday, December 19, 2018

दिवेआगर बीच: खूबसूरत, लेकिन गुमनाम

All Information About Diveagar Beach
19 सितंबर 2018
हमें दिवेआगर बीच बहुत अच्छा लगा। चार किलोमीटर लंबा और काली रेत का यह बीच है। यहाँ ठहरने के लिए होमस्टे और होटल भी बहुत सारे हैं। यानी गुमनाम-सा होने के बावजूद भी यह उतना गुमनाम नहीं है। मुंबई से इसकी दूरी लगभग 150 किलोमीटर है और यहाँ होटलों की संख्या देखकर मुझे लगता है कि वीकेंड पर बहुत सारे यात्री आते होंगे। हम उत्तर भारतीयों ने तो गोवा के अलावा किसी अन्य स्थान का नाम ही नहीं सुना है, तो मेरी यह पोस्ट उत्तर भारतीयों के लिए है।

घूमना सीखिए...

चार किलोमीटर लंबे इस बीच पर आज अभी हमारे अलावा कोई भी नहीं था। साफ सुथरा, काली रेत का बीच और ढलान न के बराबर होने के कारण बड़ी दूर तक समुद्र का पानी उस तरह फैला था कि न तो उसमें पैर भीगते थे और न ही वह सूखा दिखता था। ऐसा लगता था जैसे काँच पर खड़े हों।
हर तरफ समुद्री जीवों के अवशेष थे और पक्षी उन्हें खाने के लिए मंडरा रहे थे। केवल पक्षी ही नहीं, केकड़े भी खूब दावत उड़ा रहे थे। इसी रेत में ये बिल बनाकर रहते हैं और किसी खतरे का आभास होते ही टेढ़ी चाल से दौड़ते हुए बिल में जा दुबकते हैं। इन्हें टेढ़े-टेढ़े दौड़ते देखना भी खासा मजेदार होता है। दीप्ति ने बताया कि केकड़े घोंघे को खाकर उसका खोल ओढ़ लेते हैं और खोल समेत ही समुद्र में विचरण करते हैं। इन्हें देखकर दूसरे घोंघे इन्हें अपना भाई समझ बैठते हैं और इस तरह केकड़े की दावत चलती रहती है। फिलहाल बीच पर बहुत सारी मछलियाँ मरी पड़ी थीं। गौरतलब है कि समुद्र कुछ भी अपने अंदर नहीं रखता है। जो मर जाता है, उसे समुद्र बाहर फेंक देता है। हर एक बीच पर आपको मरी हुई मछलियाँ, सीपियाँ आदि मिल जाएँगे।

Monday, December 17, 2018

जंजीरा किले के आसपास की खूबसूरती

All Information about Murud Janjira Fort
19 सितंबर 2018
उस दिन मुंबई में अगर प्रतीक हमें न बताता, तो हम पता नहीं आज कहाँ होते। कम से कम जंजीरा तो नहीं जाते और दिवेआगर तो कतई नहीं जाते। और न ही श्रीवर्धन जाते। आज की हमारी जो भी यात्रा होने जा रही है, वह सब प्रतीक के कहने पर ही होने जा रही है।
सबसे पहले चलते हैं जंजीरा। इंदापुर से जंजीरा की सड़क एक ग्रामीण सड़क है। कहीं अच्छी, कहीं खराब। लेकिन आसपास की छोटी-छोटी पहाड़ियाँ खराब सड़क का पता नहीं चलने दे रही थीं। हरा रंग कितने प्रकार का हो सकता है, यह आज पता चल रहा था।
रास्ते में एक नदी मिली। इस पर पुल बना था और पानी लगभग ठहरा हुआ था। यहाँ से समुद्र ज्यादा दूर नहीं था और ऊँचाई भी ज्यादा नहीं थी, इसलिए पानी लगभग ठहर गया था। ऐसी जगहों को ‘क्रीक’ भी कहते हैं। दोनों तरफ वही छोटी-छोटी पहाड़ियाँ थीं और नजारा भी वही मंत्रमुग्ध कर देने वाला था।

जंजीरा गाँव एक गुमसुम-सा गाँव है। गूगल मैप के अनुसार सड़क समाप्त हो गई थी और यहीं कहीं जंजीरा किले तक जाने के लिए जेट्टी होनी चाहिए थी, लेकिन हमें मिल नहीं रही थी। अपने घर के बाहर बैठे एक बुजुर्ग ने हमारे रुकते ही हमारी मनोदशा समझ ली और बिना कुछ बोले एक तरफ इशारा कर दिया। कुछ घरों के बीच से निकलने के बाद हम जेट्टी पर थे।
लेकिन न कोई नाव और न ही कोई यात्री। शिकंजी बेचने वाला एक ठेला था और पार्किंग का ठेकेदार भी आ गया।

Saturday, December 15, 2018

भीमाशंकर से माणगाँव

Bhimashankar to Pune Road18 सितंबर 2018
पिछली पोस्ट हमने इन शब्दों के साथ समाप्त की थी कि भीमाशंकर मंदिर और यहाँ की व्यवस्थाओं ने हमें बिल्कुल भी प्रभावित नहीं किया। यह एक ज्योतिर्लिंग है और पूरे देश से श्रद्धालुओं का यहाँ आना लगा रहता है। वैसे तो यह भीड़भाड़ वाली जगह है, लेकिन आज भीड़ नहीं थी। ठीक इसी स्थान से भीमा नदी निकलती है, जो महाराष्ट्र के साथ-साथ कर्नाटक की भी एक मुख्य नदी है और जो आंध्र प्रदेश की सीमा के पास रायचूर में कृष्णा नदी में मिल जाती है। नदियों के उद्‍गम देखना हमेशा ही अच्छा अनुभव रहता है। यहाँ वडापाव खाते हुए भीमा को निकलते देखना वाकई अच्छा अनुभव था।
और रही बात भगवान शिव के दर्शनों की, तो खाली मंदिर में यूँ ही चहलकदमी करते-करते दर्शन हो गए। हाँ, बाहर निकाले जूतों की चिंता अवश्य सताती रही। एक नजर भगवान शिव पर, तो दूसरी नजर जूतों पर थी।

वडापाव समाप्त भी नहीं हुआ कि बहुत सारे श्रद्धालु आ गए। इनमें उम्रदराज महिलाएँ ज्यादा थीं और हम दोनों इस बात पर बहस कर रहे थे कि ये राजस्थान की हैं या मध्य प्रदेश की। सभी महिलाओं ने सहज भाव से भीमा उद्‍गम कुंड में स्नान किया और एक-दूसरी को एक-दूसरी की धोतियों से परदा देते हुए कपड़े भी बदल लिए। कुछ ने हमारी मोटरसाइकिल का परदा बना लिया और जब तक वे मोटरसाइकिल के पीछे से कपड़े बदलकर न निकल गईं, तब तक हमें प्रतीक्षा करनी पड़ी और एक-एक बड़ा कप चाय और एक-एक वडापाव और लेने पड़े।

Wednesday, December 12, 2018

भीमाशंकर: मंजिल नहीं, रास्ता है खूबसूरत

Bhimashankar Travel Guide
17 सितंबर 2018
भीमाशंकर भगवान शिव के पंद्रह-सोलह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यहाँ जाने के बहुत सारे रास्ते हैं, जिनमें दो पैदल रास्ते भी हैं। ये दोनों ही पैदल रास्ते नेरल के पास स्थित खांडस गाँव से हैं। इनमें से एक रास्ता आसान माना जाता है और दूसरा कठिन। हमारे पास मोटरसाइकिल थी और पहले हमारा इरादा खांडस में मोटरसाइकिल खड़ी करके कठिन रास्ते से ऊपर जाने और आसान रास्ते से नीचे आने का था, जो बाद में बदल गया। फिलहाल हम भीमाशंकर पैदल नहीं जा रहे हैं, बल्कि सड़क मार्ग से जा रहे हैं। भीमाशंकर मंदिर तक अच्छी सड़क बनी है।
मालशेज घाट पार करने के बाद हम दक्कन के पठार में थे। दक्कन का पठार मानसून में बहुत खूबसूरत हो जाता है। छोटी-बड़ी पहाड़ियाँ, ऊँची-नीची और समतल जमीन, चारों ओर हरियाली, नदियों पर बने छोटे-बड़े बांध, ग्रामीण माहौल... और हम धीरे-धीरे चलते जा रहे थे।
गणेश खिंड से जो नजारा दिखाई देता है, वह अतुलनीय है। आप कुछ ऊँचाई पर होते हैं और दूर-दूर तक नीचे का विहंगम नजारा देखने को मिलता है। हम अचंभित थे यहाँ होकर। हमें ग्रामीण भारत के ये नजारे क्यों नहीं दिखाए जाते? ऐसी प्राकृतिक खूबसूरती देखने के लिए हमें विदेशों का सहारा क्यों लेना पड़ता है? सामने एक से बढ़कर एक चमत्कृत कर देने वाले पर्वत थे, इन पर्वतों के नीचे जोगा डैम का विस्तार था, हर तरफ फूल खिले थे और किसी की आवाजाही नहीं।
काश!, हमारे पास तंबू होता और हम आज यहीं रुकते।

Monday, December 10, 2018

मालशेज घाट - पश्चिमी घाट की असली खूबसूरती

Malshej Ghat Travel Guide in Hindi

17 सितंबर 2018
पश्चिमी घाट के पर्वत कहाँ से शुरू होते हैं, यह तो नक्शे में देखना पड़ेगा; लेकिन कन्याकुमारी में समाप्त होते हैं, यह नहीं देखना पड़ेगा। और महाराष्ट्र में ये पूरे वैभव के साथ विराजमान हैं, यह मैंने किताबों में भी पढ़ा था और नक्शे में भी देखा था। दो-तीन बार रेल से भी देखने का मौका मिला, जब मुंबई से भुसावल की यात्रा की, जब मडगाँव से हुबली की यात्रा की और जब हासन से मंगलूरू की यात्रा की। बस... इसके अलावा कभी भी पश्चिमी घाट में जाने का मौका नहीं मिला।
हम अपनी मोटरसाइकिल से कल्याण से मुरबाड की ओर बढ़ रहे थे। रास्ता अच्छा था। शहर की भीड़ पीछे छूट चुकी थी। हर दस-दस मिनट में अहमदनगर से कल्याण की बसें जाती मिल रही थीं। ज्यादातर बसों पर अहमदनगर की बजाय ‘नगर’ लिखा था। अहमदनगर को नगर भी कहते हैं। बसों की इतनी संख्या से पता चल रहा था कि यह सड़क अहमदनगर को मुंबई से जोड़ने वाली मुख्य सड़क है। लेकिन इन बसों के अलावा कोई ट्रैफिक नहीं था।
दोपहर बाद हो चुकी थी। तेज गर्मी थी। मुरबाड में पानी की एक बोतल लेनी पड़ी - केवल ठंडी होने के कारण। पहले गला तर किया, फिर सिर पर उड़ेल लिया। बड़ी राहत मिली।
धीरे-धीरे पश्चिमी घाट नजदीक आने लगे। ये पहाड़ एकदम ऊपर उठते हैं। एकदम मतलब नब्बे डिग्री पर। या तो उधर समुद्र है, या फिर एकदम पहाड़। बीच में कुछ किलोमीटर चौड़ी एक छोटी-सी मैदानी पट्टी है, जिसे समुद्रतटीय मैदान भी कहते हैं। मुंबई भी इसी मैदान में है और पूरा कोंकण भी इसी में है और गोवा भी इसी में है। फिर एकदम पहाड़ हैं। पश्चिमी घाट के पहाड़। कहीं-कहीं ये पहाड़ समुद्रतटीय मैदान में अतिक्रमण भी करते दिखते हैं, लेकिन सर्वमान्य रूप से यही प्रचलित है कि वो मैदान ही पहाड़ देखकर उठने लगा और समुद्र देखकर गिरने लगा, इसलिए ऊँचा-नीचा हो गया। फिर भी कुल मिलाकर मैदान मैदान है और पहाड़ पहाड़। यहाँ दोनों ही खूबसूरत हैं। कौन कहता है मैदानों में खूबसूरती नहीं होती? कभी कोंकण रेलवे में यात्रा करके आइए।

Friday, December 7, 2018

त्रयंबकेश्वर यात्रा

Triambakeshwar Travel Guide in Hindi

15 सितंबर 2018
हम त्रयंबकेश्वर नहीं जाना चाहते थे, लेकिन कुछ कारणों से जाना पड़ा। हम दोनों ही बहुत बड़े धार्मिक इंसान नहीं हैं। तो हमारे त्रयंबकेश्वर जाने का सबसे बड़ा कारण था सामाजिक। त्रयंबकेश्वर भारत के 14-15 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। और आप जानते ही हैं कि आजकल ज्योतिर्लिंग ‘कवर’ किए जाते हैं। गिनती बढ़ाई जाती है। तो हम भी त्रयंबकेश्वर ‘कवर’ करने चल दिए, ताकि हमारे खाते में भी एक ज्योतिर्लिंग की गिनती बढ़ जाए।
दूसरा कारण बड़ा ही अजीबोगरीब था। असल में हम बिना किसी तैयारी के ही इस यात्रा पर निकल पड़े थे। और मेरे दिमाग में त्रयंबकेश्वर और भीमाशंकर मिक्स हो गए थे। भीमाशंकर नाम दिमाग से उतर गया था और लगने लगा था कि त्रयंबकेश्वर का ट्रैक काफी मुश्किल ट्रैक है। गूगल मैप पर देखा तो पाया कि त्रयंबकेश्वर के आसपास कुछ दुर्गम पहाड़ियाँ भी हैं, गोदावरी भी यहीं कहीं से निकलती है, तो शायद वो मुश्किल ट्रैक यहीं कहीं होगा। शायद गोदावरी उद्‍गम तक जाने का ट्रैक सबसे मुश्किल होगा।
तो एक यह भी कारण था त्रयंबकेश्वर जाने का।

सारा सामान वकील साहब के यहीं छोड़ दिया और मोटरसाइकिल से हम दोनों नासिक शहर में प्रविष्ट हो गए। पीछे बैठी दीप्ति मोबाइल में गूगल मैप में देखकर रास्ता बताती रही। बहुत दूर चलने के बाद जब उसने कहा कि अब गूगल मैप में रास्ता समझ में नहीं आ रहा, तो मैं समझ गया कि हम त्रयंबकेश्वर पहुँच गए। मोटरसाइकिल खड़ी की और सामने ही मंदिर का प्रवेश द्वार था।

Wednesday, December 5, 2018

चलो कोंकण: इंदौर से नासिक

Indore Friends

14 सितंबर 2018
“अरे, जोगी भड़क जाएगा?” सुमित ने सुबह उठने से पहले ही पूछा।
“क्यों भड़केगा जोगी?”
“नहीं रे, इधर एक जलप्रपात है, बहुत ही शानदार। उसका नाम है जोगी भड़क। प्रसिद्ध भी नहीं है। तुम्हें जाना चाहिए।”
“हाँ, फिर तो जाएँगे। रास्ता कहाँ से है?”
“मानपुर के पास से। मानपुर से थोड़ा आगे निकलोगे ना? तो...”
“ठहर जा, गूगल मैप पर देख लेता हूँ।”

इंदौर की भौगोलिक स्थिति बहुत महत्वपूर्ण है। यह मालवा के पठार पर स्थित है और समुद्र तल से लगभग 600 मीटर ऊपर है। इसके दक्षिण में नर्मदा नदी बहती है, जो खलघाट में समुद्र तल से लगभग 150 मीटर पर है। तो यहाँ पठार की सीमा बड़ी तेजी से समाप्त होती है। एकदम खड़ी पहाड़ियाँ हैं, जो विन्ध्य पहाड़ों का हिस्सा है। यूँ तो इंदौर से खलघाट तक पूरा रास्ता लगभग समतल है, लेकिन जिस समय सड़क पठार से नीचे उतरती है, वो बड़ा ही रोमांचक समय होता है।
इसी वजह से विन्ध्य के इन पहाड़ों में बहुत सारे जलप्रपात भी हैं। पठार का सारा पानी अलग-अलग धाराओं के रूप में बहता है और विन्ध्य में ऊँचे जलप्रपात बनाता हुआ नीचे गिरता है। यहाँ कई ऊँचे जलप्रपात हैं - पातालपानी, शीतला माता आदि। और भी बहुत सारे हैं। जोगी भड़क भी इनमें से एक है। पिछले दिनों सुमित ने वहाँ की यात्रा की थी और अत्यधिक रोमांचक फोटो हमें दिखाए थे। आज हम मानपुर से ही होकर जाएँगे तो जोगी भड़क भी देखते हुए चलेंगे।

Monday, December 3, 2018

चलो कोंकण: दिल्ली से इंदौर वाया जयपुर

Delhi to Jaipur Road Trip11 सितंबर 2018
पता नहीं क्यों मुझे लगने लगा कि मोटरसाइकिल में कोई खराबी है। कभी हैंडल को देखता; कभी लाइट को देखता; कभी क्लच चेक करता; कभी ब्रेक चेक करता; तो कभी पहियों में हवा चेक करता; लेकिन कोई खराबी नहीं मिली। असल में कल-परसों जब इसकी सर्विस करा रहा था, तो मैकेनिक ने बताया था कि इसके इंजन में फलाँ खराबी है और उसे ठीक करने के दस हजार रुपये लगेंगे।
“और अगर ठीक न कराएँ, तो क्या समस्या होगी?”
“यह मोबिल ऑयल पीती रहेगी और आपको इस पर लगातार ध्यान देते रहना होगा।”
उसने कहा तो ठीक ही था। यह मोबिल ऑयल पीती तो है। हालाँकि एक लीटर मोबिल ऑयल 1200 किलोमीटर से ज्यादा चल जाता है। और अगर यह न पीती, तब भी इतनी दूरी के बाद मोबिल ऑयल बदलना तो पड़ता ही है। इसलिए हम चिंतित नहीं थे।

लेकिन आज ऐसा लग रहा था, जैसे यह कुछ असामान्य है। सत्तर की स्पीड तक पहुँचते-पहुँचते इंजन से कुछ घरघराहट जैसी आवाज भी आ रही थी। वैसे तो यह आवाज पहले भी आती थी, लेकिन आज ज्यादा लग रही थी। वाइब्रेशन भी ज्यादा लग रहे थे। इस बारे में दीप्ति से पूछा तो उसने कहा - “यह तुम्हारे मन का वहम है। बाइक में उतने ही वाइब्रेशन हैं, जितने पहले होते थे।”
लेकिन वहम यहीं खत्म नहीं हुआ।
नीमराना के पास डैशबोर्ड से धुआँ-सा उठता दिखाई पड़ा। इससे पहले कि ‘आग’ लगती, बाइक रोक ली। दिमाग में चल रहा था कि इसकी टंकी पर रखा मैग्‍नेटिक टैंक बैक सबसे पहले उतारूँगा और फिर पीछे बंधा मुख्य सामान।

Thursday, November 29, 2018

टाइगर फाल और लाखामंडल की यात्रा


1 अक्टूबर 2018
आज मैं सुबह सवेरे ही उठ गया था। इसका कारण था कि आज नाश्ते में पकौड़ियाँ बनवानी थीं, क्योंकि होटल के मालिक रोहन राणा को आलू के पराँठे बनाने नहीं आते। लेकिन सुबह सवेरे आठ बजे जब तक मैं उठा, तब तक पता नहीं किसने गोभी के पराँठे बनाने को कह दिया था। आज एहसास हुआ कि मुझसे पहले उठने वाले लोग भी इस दुनिया में होते हैं। और जब गोभी के पराँठे सामने आए, तो उनमें न गोभी थी और न ही पराँठा था। कतई पापड़ थे, जिनका नाम गोभी-पराँठा पापड़ रख देना चाहिए।
यहाँ से चले तो सीधे पहुँचे चकराता बाजार में। असल में परसों झा साहब ने बताया था कि चकराता बाजार में फलां दुकान पर सबसे अच्छा पहाड़ी राजमा मिलता है, तो ग्रुप की महिलाओं ने खत्म हो जाने तक राजमा खरीद लिया। मुझे एक कोने में बिस्कुट का खुला पैकेट रखा मिल गया, सबको एक-एक बिस्कुट बाँटकर पुण्य कमा लिया।
लेकिन सबसे अच्छा लगा गोल्डन एप्पल। सुनहरा सेब। वाह! एकदम नरम और मीठा।

Monday, November 26, 2018

एक यात्रा लोखंडी और मोइला बुग्याल की

Chakrata Travel Guide
29 सितंबर 2018...
जब भी सिर मुंडाते ही ओले पड़ने लगें, तो समझना कि अपशकुन होगा। पता नहीं होगा या नहीं होगा, लेकिन हमें यह गाड़ी बिल्कुल भी पसंद नहीं आई। दिल्ली से ही राज कुमार सुनेजा जी, सिरसा से डॉ. स्वप्निल गर्ग सर, रोहिणी से डॉ. विवेक पाठक और उनके बच्चे, गुड़गाँव से निशांत खुराना, कानपुर से शिखा गुप्ता इतनी सुबह हमारे यहाँ आ चुके थे। जैसे ही इन्होंने बस में कदम रखा, सबसे पहले सामना टायर से हुआ। और आगे बढ़े तो सीट-कवर के चीथड़ों के बीच सीट ढूँढ़ना मुश्किल हो गया। सीटों पर पड़ी चूहों की गोल-गोल टट्टियों को कुछ फूँक से और कुछ हाथ से साफ करना पड़ा। ड्राइवर अभी-अभी उठकर आया था और तकिये में से सबसे ज्यादा मैली शर्ट निकालकर लाया था।
और कुछ ही देर में शालिनी जी भी आने वाली हैं...
हे भगवान! आज रक्षा करना। पहली बार टेम्पो ट्रैवलर में किसी ग्रुप को ले जा रहे हैं, और पहली ही बार यह दिन देखना पड़ रहा है।
साढ़े सात बजे बस चली तो मैं सबसे पीछे वाली सीट पर मुँह छुपाए बैठा था और बाकी सब चुप बैठे थे। शास्त्री पार्क मेट्रो स्टेशन से ठेके वाले तिराहे तक पहुँचते-पहुँचते मुझे थोड़ी अक्ल आई... जिसके माध्यम से यह बस बुक की थी, उसे फोन मिलाया और जान-बूझकर जोर-जोर से बोलने लगा, ताकि बस की सभी सवारियाँ समझ जाएँ कि हमारी आगे की यात्रा के लिए दूसरी बस आ रही है।

Saturday, November 24, 2018

तिगरी गंगा मेले में दो दिन

Garhmukteshwar Tigri Kartik Poornima Melaकार्तिक पूर्णिमा पर उत्तर प्रदेश में गढ़मुक्तेश्वर क्षेत्र में गंगा के दोनों ओर बड़ा भारी मेला लगता है। गंगा के पश्चिम में यानी हापुड़ जिले में पड़ने वाले मेले को गढ़ गंगा मेला कहा जाता है और पूर्व में यानी अमरोहा जिले में पड़ने वाले मेले को तिगरी गंगा मेला कहते हैं। गढ़ गंगा मेले में गंगा के पश्चिम में रहने वाले लोग भाग लेते हैं यानी हापुड़, मेरठ आदि जिलों के लोग; जबकि अमरोहा, मुरादाबाद आदि जिलों के लोग गंगा के पूर्वी भाग में इकट्ठे होते हैं।
सभी के लिए यह मेला बहुत महत्व रखता है। लोग कार्तिक पूर्णिमा से 5-7 दिन पहले ही यहाँ आकर तंबू लगा लेते हैं और यहीं रहते हैं। गंगा के दोनों ओर 10-10 किलोमीटर तक तंबुओं का विशाल महानगर बन जाता है। जिस स्थान पर मेला लगता है, वहाँ साल के बाकी दिनों में कोई भी नहीं रहता, कोई रास्ता भी नहीं है। वहाँ मानसून में बाढ़ आती है। पानी उतरने के बाद प्रशासन मेले के लिए रास्ते बनाता है और पूरे खाली क्षेत्र को सेक्टरों में बाँटा जाता है।
यह मुख्यतः किसानों का मेला है। गन्ना कट रहा होता है, गेहूँ लगभग बोया जा चुका होता है; तो किसानों को इस मेले की बहुत प्रतीक्षा रहती है। ज्यादातर लोग सपरिवार आते हैं। बच्चों का मुंडन होता है और मृतकों की याद में दीए प्रवाहित किए जाते हैं। इसी वजह से मुझे केवल दो बार ही इस मेले में जाने का मौका मिला है - पाँच साल की उम्र में, जब मुंडन हुआ था और पच्चीस साल की उम्र में, जब माताजी की याद में दीए प्रवाहित करने थे। इन दो मौकों के अलावा मुझे कभी भी यहाँ जाने का मौका नहीं मिला। हमारे पड़ोसी महीनों पहले से उत्साहित हो जाते थे। भैंसों की खास खातिरदारी की जाती थी, उन्हें कई-कई किलोमीटर तक टहलाया और दौड़ाया जाता था, ताकि मेले में जाते समय लंबी दूरी तय करने के कारण उनके पैर अकड़ न जाएँ। ज्यादातर लोग भैंसा-बुग्गियों पर ही जाते थे। जिनके पास ट्रैक्टर थे, वे ट्रैक्टर-ट्रोलियों से जाते थे। आज भी ऐसा ही होता है।

Monday, November 19, 2018

अमृतसर वाघा बॉर्डर यात्रा (विमल बंसल)

मूलरूप से समालखा हरियाणा के रहने वाले और वर्तमान में चंडीगढ़ में रह रहे विमल बंसल जी ने अपना एक यात्रा वृत्तांत भेजा है... इसका पहला भाग (डलहौजी-खजियार यात्रा) उनकी फेसबुक वाल पर प्रकाशित हो चुका है, इसलिए हम उसे अपने ब्लॉग पर प्रकाशित नहीं कर सकते... तो आप आनंद लीजिए इस भाग का...

तो दोस्तों, अमृतसर यात्रा शुरू करने से पहले इस शहर के पुराने नाम, इतिहास और देखने योग्य स्थानों के बारे में बता दूं।
अमृतसर का पुराना नाम रामदास नगर था जो कि सिखों के गुरु रामदास के नाम पर था, जिन्होंने सबसे पहले 1577 में 500 बीघा जमीन में गुरुद्वारे की नीव रखी थी। बाद में गुरु रामदास ने ही इसका नाम बदलकर अमृतसर रखा। यह नाम किसलिए बदला, इसके बारे में भी एक कथा प्रचलित है कि यही वो धरती है, जहां पर ऋषि वाल्मीकि जी ने रामायण की रचना की थी और यहीं पर माता सीता ने लव को जन्म दिया था। एक दिन माता सीता जब नहाने के लिये गईं तो लव को ऋषि वाल्मिकी जी के पास छोड़ गईं। बालक लव खेलता-खेलता ना जाने कहां चला गया। जब ऋषि वाल्मीकि को काफी देर तक खोजने पर भी लव नही मिला तो उन्होंने सोचा कि अब सीता को क्या जवाब दूंगा। तब उन्होंने कुशा नामक घास के तिनको में प्राण डालकर कुश को प्रगट किया था। तो दोस्तों, कुश का जन्म माता सीता की कोख से नही बल्कि ऋषि वाल्मीकि के वरदान से हुआ था। घास को कुशा भी कहा जाता है इसीलिए माता सीता के दूसरे पुत्र का नाम कुश रखा। कहते हैं कि अमृतसर की स्थापना भगवान वाल्मीकि के अमृत से हुई है। जब पुरुषोत्तम श्री राम जी ने अश्वमेध यज्ञ के लिये घोड़ा छोड़ा था तो उसको लव कुश ने पकड़ लिया था। उसके बाद राजा राम की सेना और लव कुश के मध्य युद्ध हुआ जिसमें लव कुश ने राम की सेना को मौत के घाट उतार दिया। बाद में जब खुद श्रीराम युद्ध करने आये तो खुद महाकवि वाल्मीकि जी ने आकर भगवान राम और लव कुश के मध्य युद्ध होने से रोका। तब श्री राम की याचना पर मरे हुये सैनिकों को जीवित करने के लिये वाल्मीकि जी ने वहां पर अमृत की वर्षा की और प्रभु श्री राम की समस्त सेना को जीवित कर दिया। बाद में श्री राम की सेना के जीवित होने के बाद महर्षि वाल्मीकि ने उस अमृत को वहीं पर दबा दिया। जब सिखों के गुरु रामदास जी को यह बात पता चली तो उन्होंने इस शहर का नाम रामदास नगर से बदलकर अमृतसर कर दिया।

Thursday, November 8, 2018

आज ब्लॉग दस साल का हो गया

साल 2003... उम्र 15 वर्ष... जून की एक शाम... मैं अखबार में अपना रोल नंबर ढूँढ़ रहा था... आज रिजल्ट स्पेशल अखबार में दसवीं का रिजल्ट आया था... उसी एक अखबार में अपना रिजल्ट देखने वालों की भारी भीड़ थी और मैं भी उस भीड़ का हिस्सा था... मैं पढ़ने में अच्छा था और फेल होने का कोई कारण नहीं था... लेकिन पिछले दो-तीन दिनों से लगने लगा था कि अगर फेल हो ही गया तो?...
तो दोबारा परीक्षा में बैठने का मौका नहीं मिलेगा... घर की आर्थिक हालत ऐसी नहीं थी कि मुझे दसवीं करने का एक और मौका दिया जाता... निश्चित रूप से कहीं मजदूरी में लगा दिया जाता और फिर वही हमेशा के लिए मेरी नियति बन जाने वाली थी... जैसे ही अखबार मेरे हाथ में आया, तो पिताजी पीछे खड़े थे... मेरा रोल नंबर मुझसे अच्छी तरह उन्हें पता था और उनकी नजरें बारीक-बारीक अक्षरों में लिखे पूरे जिले के लाखों रोल नंबरों में से उस एक रोल नंबर को मुझसे पहले देख लेने में सक्षम थीं... और उस समय मैं भगवान से मना रहा था... हे भगवान! भले ही थर्ड डिवीजन दे देना, लेकिन पास कर देना... फेल होने की दशा में मुझे किस दिशा में भागना था और घर से कितने समय के लिए गायब रहना था, यह भी मैं सोच चुका था...
और जैसे ही अपने रोल नंबर पर निगाह गई, हृदय-गति लगभग बंद पड़ गई... आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा और भागने का दम ही नहीं रहा...
रोल नंबर के आगे लिखा था... F

Wednesday, November 7, 2018

सिलीगुड़ी से दिल्ली मोटरसाइकिल यात्रा

19 फरवरी 2018
पूर्वोत्तर में इतने दिन घूमने के बाद अब बारी थी दिल्ली लौटने की और इस यात्रा के आखिरी रोमांच की भी। सिलीगुड़ी से दिल्ली लगभग 1500 किलोमीटर है और हमारे पास थे तीन दिन, यानी 500 किलोमीटर प्रतिदिन का औसत। यानी हमें पहले दिन मुजफ्फरपुर रुकना पड़ेगा और दूसरे दिन लखनऊ। गूगल मैप के सैटेलाइट व्यू में मैंने पहले ही देख लिया था कि इस्लामपुर शहर को छोड़कर पूरा रास्ता कम से कम चार लेन है। इसका साफ मतलब था कि हम एक दिन में 500 किलोमीटर तो आसानी से चला ही लेंगे।
लेकिन कुछ समस्याएँ भी थीं। यू.पी. और बिहार के बड़े पर्यटन स्थलों को छोड़कर किसी भी शहर में होटल लेकर ठहरना सुरक्षित और सुविधाजनक नहीं होता। अगर आप तीस की उम्र के हैं और आपकी पत्नी भी आपके साथ है, तब तो बहुत सारी अनावश्यक पूछताछ होनी तय है। हम इन सबसे बचना चाहते थे। हमारे रास्ते में बिहार में दरभंगा और मुजफ्फरपुर बड़े शहर थे, लेकिन वहाँ शून्य पर्यटन है; इसलिए निश्चित कर लिया कि बिहार में कहीं भी होटल लेकर नहीं रुकना। उससे आगे यू.पी. में गोरखपुर है, जहाँ ठहरा जा सकता है। तो हम आज कम से कम गोरखपुर तक पहुँचने की योजना बना रहे थे।

Monday, November 5, 2018

दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के साथ-साथ

All Information about Darjeeling Himalayan Railway
18 फरवरी 2018
हम दार्जिलिंग केवल इसलिए आए थे ताकि रेलवे लाइन के साथ-साथ न्यू जलपाईगुड़ी तक यात्रा कर सकें। वैसे तो मेरी इच्छा न्यू जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग तक इस ट्रेन में ही यात्रा करने की थी, लेकिन बहुत सारी योजनाओं को बनाने और बिगाड़ने के बाद तय किया कि दार्जिलिंग से न्यू जलपाईगुड़ी तक मोटरसाइकिल से ही यात्रा करेंगे, ट्रेन के साथ-साथ।
दार्जिलिंग से न्यू जलपाईगुड़ी की एकमात्र ट्रेन सुबह आठ बजे रवाना होती है। हम छह बजे ही उठ गए थे। यह देखकर अच्छा लगा कि होटल वालों ने हमारी मोटरसाइकिल बाहर सड़क किनारे से हटाकर होटल के अंदर खड़ी कर दी थी। वैसे तो उन्होंने कल वादा किया था कि रात दस-ग्यारह बजे जब रेस्टोरेंट बंद होने वाला होगा, तो वे मोटरसाइकिल अंदर खड़ी करने के लिए हमें जगा देंगे। पता नहीं उन्होंने आवाज लगाई या नहीं, लेकिन मोटरसाइकिल हमें भीतर ही खड़ी मिली।
हमें शहर अच्छे नहीं लगते, इसलिए दार्जिलिंग भी नहीं घूमना था। लेकिन जब छह बजे उठ गए तो क्या करते? बाजार में चले गए। कल भी इधर आए थे और मीट की बड़ी-बड़ी दुकानें देखकर नाक सिकोड़ते हुए लौट गए थे। अब सुबह-सुबह का समय था और सभी दुकानें बंद थीं। टैक्सी स्टैंड तक पहुँच गए। कलिम्पोंग, गंतोक और सिलीगुड़ी जाने वाली शेयर्ड टैक्सियाँ तैयार हो चुकी थीं। यहीं चाय की एक दुकान खुली थी और अच्छा इंटरनेट भी चल रहा था। चाय भी पी और इंटरनेट भी चलाया।

Friday, November 2, 2018

उत्तर बंगाल यात्रा - लावा से लोलेगाँव, कलिम्पोंग और दार्जिलिंग

17 फरवरी 2018
आज शाम तक हमें दार्जिलिंग पहुँचना था। यहाँ से दूरी 80 किलोमीटर है। सड़क ठीक होगी तो कुछ ही देर में पहुँच जाएँगे और अगर खराब हुई, तब भी शाम तक तो पहुँच ही जाएँगे। लेकिन लोलेगाँव देखते हुए चलेंगे।
लोलेगाँव में क्या है?
यह जरूरी नहीं कि कहीं ‘कुछ’ हो, तभी जाना चाहिए। यह स्थान लगभग 1700 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और फरवरी के महीने में इतनी ऊँचाई वाले स्थान दर्शनीय होते हैं। फिर इसके पश्चिम में ढलान है, यानी कोई ऊँची पहाड़ी या चोटी नहीं है। तो शायद कंचनजंघा भी दिखती होगी। और अब तक आप जान ही चुके हैं कि कंचनजंघा जहाँ से भी दिखती हो, वो स्थान अपने-आप ही दर्शनीय हो जाता है। फिर वहाँ ‘कुछ’ हो या न हो, आपको चले जाना चाहिए।
हमें लावा से लोलेगाँव का सीधा और छोटा रास्ता समझा दिया गया। और यह भी बता दिया गया कि मोटरसाइकिल लायक अच्छा रास्ता है।
चलने से पहले बता दूँ कि यह पूरा रास्ता जंगल का है और झाऊ के पेड़ों की भरमार है। मुझे झाऊ की पहचान नहीं थी। यह मुझे कभी चीड़ जैसा लगता, तो कभी देवदार जैसा लगता। कल फोरेस्ट वालों ने बताया कि यह झाऊ है।
और अब चीड़ भी झाऊ जैसा लगने लगा है और देवदार भी।

Wednesday, October 31, 2018

उत्तर बंगाल यात्रा - नेवरा वैली नेशनल पार्क

Neora Valley National Park All Information
16 फरवरी 2018
हमारी इस यात्रा की शुरूआत नामदफा नेशनल पार्क से हुई थी और आज हम नेवरा वैली नेशनल पार्क जाने वाले थे। इनके बीच में भी हमने कई नेशनल पार्कों की यात्राएँ कीं। ये दोनों ही नेशनल पार्क कई मायनों में एक जैसे हैं। सबसे खास बात है कि आप दोनों ही नेशनल पार्कों में कुछ ही दूरी तक सड़क मार्ग से जा सकते हैं, लेकिन आपको बाकी यात्रा पैदल ही करनी पड़ेगी। हिमालयन काले भालू, तेंदुए और बाघ के जंगल में पैदल भ्रमण करना रोमांच की पराकाष्ठा होती है। किसी अन्य नेशनल पार्क में आपको पैदल घूमने की अनुमति आसानी से नहीं मिल सकती। यहाँ तक कि आप काजीरंगा तक में अपनी गाड़ी से नीचे नहीं उतर सकते।
कई बार तो हम बैठकर गणना करते रहते कि अपनी मोटरसाइकिल से जाएँ या गाड़ी बुक कर लें। कल फोरेस्ट वाले ने बताया था कि मोटरसाइकिल से न जाओ, तो अच्छा है। हालाँकि स्थानीय लोग बाहरियों को इस तरह हमेशा मना ही करते हैं, हमें भी एहसास था कि 15-16 किलोमीटर दूर जाने में हालत खराब हो जानी है। अभी कुछ ही दिन पहले हम मेघालय में अत्यधिक खराब रास्ते और अत्यधिक ढलान के कारण बीच रास्ते से वापस लौटे थे, तो आज हमने गाड़ी बुक करना ही उचित समझा।

Monday, October 29, 2018

उत्तर बंगाल - लावा और रिशप की यात्रा

All Information about Lava and Rishop
15 फरवरी 2018
हमने सोच रखा था कि अपनी इस यात्रा में 2000 मीटर से ऊपर नहीं जाएँगे। क्योंकि मुझे लग रहा था कि इतनी ऊँचाई पर कहीं न कहीं ब्लैक आइस मिलेगी और मुझे ब्लैक आइस से बड़ा डर लगता है। और आज जब हम माल बाजार में थे, तो लावा जाने और न जाने का मामला बराबर अधर में लटका हुआ था।
“लेकिन लावा क्यों? अभी हमारे पास कई दिन हैं और हम सिक्किम भी घूमकर आ सकते हैं।” दीप्ति ने पूछा।
“वो इसलिए कि अपनी मोटरसाइकिल से सिक्किम जाने में गुरदोंगमर झील भी जाना जरूर बनता है और फिलहाल या तो वहाँ का रास्ता बंद मिलेगा या खूब सारी ब्लैक आइस मिलेगी। मैं बिना गुरदोंगमर के सिक्किम नहीं घूमना चाहता।”
दूसरी बात, कोई भी उत्तर भारतीय यात्री लावा घूमने नहीं जाता। वे दार्जिलिंग जाते हैं, सिक्किम जाते हैं, लेकिन लावा नहीं जाते। उत्तर बंगाल में जहाँ से भी कंचनजंघा दिख जाए, वही स्थान घूमने योग्य है। इसीलिए दार्जिलिंग प्रसिद्ध है। लावा से भी कंचनजंघा दिखती है, लेकिन दार्जिलिंग के आगे यह प्रसिद्ध नहीं हो पाया। फिर यह 2000 मीटर से ऊपर है। एक अलग ही नशा होता है, इतनी ऊँचाई वाले किसी अप्रसिद्ध स्थान में।
माल बाजार में आलू के पराँठे खाते हुए कुल्हड़ की मिष्टी दोई मिल गई, तो समझ आ गया कि हमारी यात्रा सही दिशा में जा रही है। उस कुल्हड़ को हमने जितनी तल्लीनता से नहीं चाटा होगा, बाद में एक पिल्ले ने उसे उससे ज्यादा तल्लीनता से चाट लिया।

Sunday, October 28, 2018

घुमक्‍कड़ों का कार्यक्रम: बरसूडी घुमक्कड़ महोत्सव

Barsuri All Information
31 अगस्त 2018
एक बाइक पर मैं और दीप्ति व दूसरी बाइक पर नरेंद्र दिल्ली से सुबह-सवेरे निकल पड़े। सड़क खाली मिलती चली गई और हम नॉन-स्टॉप खतौली जा पहुँचे। भूख लगने लगी थी और खतौली बाईपास पर भोजन के विकल्पों की कोई कमी नहीं। लेकिन हम और भी सस्ते के चक्कर में सयाने बन गए और खतौली शहर में जा पहुँचे। यह सोचकर कि बाईपास पर तो टूरिस्ट लोग रुकते हैं और शहर में स्थानीय लोग ही होते हैं, इसलिए शायद किसी ठेले पर पाँच-दस रुपये में कुछ भरपेट मिल जाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। केले का एक ठेला था और अभी-अभी खुले हुए रेस्टॉरेंट थे, जिनमें कल के जूठे बर्तन माँजे जा रहे थे। भूख इतने जोर की लगी थी कि अगर केलेवाला न टोकता तो हम छिलका भी खा डालते।
इस यात्रा में हम अकेले नहीं थे। इससे जुड़े सभी लोग एक व्हाट्सएप ग्रुप में भी थे और अब लगातार अपनी लाइव लोकेशन शेयर कर रहे थे। साथ ही अपने खाने-पीने के भी फोटो डाल रहे थे। जैसे ही माथुर साहब ने बताया कि वे घर से पचास-साठ आलू के पराँठे बनाकर लाए हैं, तो कलेजा सुलग उठा। माथुर साहब की लाइव लोकेशन देखी, तो वे मेरठ के आसपास थे और मवाना की ओर बढ़ रहे थे।
“माथुर साहब को पकड़ो।” और हमने तुरंत खतौली से मीरांपुर की सड़क पर दौड़ लगा दी। जितनी दूरी है, उतने ही मिनट हमें मीरांपुर पहुँचने में लगे। फिर से माथुर साहब की लोकेशन देखी, वे अभी भी उसी जगह पर थे, जहाँ पंद्रह मिनट पहले थे। इसका मतलब वे रुके हुए हैं और पराँठे खा रहे हैं।
“कहीं वे सब पराँठे खत्म न कर दें।”
“पचास-साठ पराँठे थोड़े ही खा लेंगे वे दो जने?”
“क्या पता खा ही लें।"
“तो आगे गंगा बैराज पर रुकते हैं। कुछ देर उनकी प्रतीक्षा करेंगे और उन्हें बैराज पर ही रोक लेंगे। और वहीं हम भी पराँठे खा लेंगे।”

Friday, October 26, 2018

प्रजातंत्र... इंदौर... 24 अक्टूबर 2018







उत्तर बंगाल यात्रा - तीन बीघा कोरीडोर

Tin Bigha Corridoe All Information
14 फरवरी 2018
हम इतिहास की गहराइयों में नहीं जाएँगे, लेकिन इतना जान लीजिए कि आजादी से पहले इधर दो प्रमुख रियासतें हुआ करती थीं – कूचबिहार रियासत और रंगपुर रियासत। बँटवारा हुआ तो कूचबिहार भारत में आ गया और रंगपुर पूर्वी पाकिस्तान में। लेकिन इन दोनों रियासतों की सीमाएँ बड़ी अजीबो-गरीब थीं। एक रियासत के अंदर दूसरी रियासत की जमीनें थीं, जिन्हें ‘एंकलेव’ कहते हैं। यहाँ तक कि एक एंकलेव के अंदर दूसरा एंकलेव भी था और एक जगह तो तिहरा एंकलेव भी। बँटवारे में एंकलेव भी बँट गए। 1971 में बांग्लादेश बना, तब तक भी मामला ऐसा ही था।
मुझे पता है कि ऊपर का पैरा आप बिल्कुल भी नहीं समझे होंगे। चलिए, आसान शब्दों में बताता हूँ। एंकलेव मतलब एक देश की मुख्यभूमि के अंदर दूसरे देश के आठ-दस गाँव, जो चारों ओर से पूरी तरह पहले देश से घिरे हुए हों। भारत के अंदर बांग्लादेश के गाँव भी थे और बांग्लादेश के अंदर भारत के गाँव भी। ऐसे एक-दो नहीं, बल्कि लगभग 200 एंकलेव थे। यानी भारत के उस एंकलेव में स्थित आठ-दस गाँवों के लोगों को अगर कोलकाता या सिलीगुड़ी कहीं भी जाना होता था, तो बांग्लादेश से होकर ही निकलना पड़ता था। इसी तरह बांग्लादेश वालों को अपने ही देश में जाने के लिए भारत से होकर जाना होता था। और आप जानते ही हैं कि भारत और बांग्लादेश के बीच वीजा लेकर ही आवागमन किया जा सकता है। इन गाँवों में कोई वीजा अधिकारी नहीं बैठा होता था।

Wednesday, October 24, 2018

उत्तर बंगाल यात्रा - बक्सा टाइगर रिजर्व में

All Information of Buxa Tiger Reserve
13 फरवरी 2018
नौ बजे दुधनोई से चल दिए और लक्ष्य रखा राजा भात खावा। यानी बक्सा टाइगर रिजर्व के पास। दूरी चाहे जो भी हो, लेकिन हम दिन छिपने से पहले पहुँच जाएँगे।
लगभग ढाई किलोमीटर लंबा नरनारायण सेतु पार किया। यह रेल-सह-सड़क पुल है। नीचे रेल चलती है, ऊपर सड़क। यह पुल ज्यादा पुराना नहीं है। शायद 1998 में इसे खोला गया था। उसी के बाद इधर से रेल भी चलना शुरू हुई। उससे पहले केवल रंगिया के रास्ते ही रेल गुवाहाटी जाती थी।
पुल पार करते ही जोगीघोपा है। कोयला ही कोयला और ट्रक ही ट्रक। लेकिन हमें बजरंग जी के कार्यालय जाने की जरूरत नहीं पड़ी। उन्हें पता नहीं कैसे हमारी भनक लग गई थी और वे हमें सड़क पर ही हाथ हिलाते मिले। एक बार फिर से पुल पर आकर फोटोग्राफी का दौर चला।
यहाँ राजस्थानी भोजनालय भी है। राजस्थानी भोजनालय मतलब शुद्ध शाकाहारी। कोयले और ट्रकों के कारण माहौल तो ‘काला-काला’ ही था, लेकिन यहाँ अच्छा खाना खाने वालों की अच्छी भीड़ थी।
चलते समय हमें रास्ता भी समझा दिया गया कि आगे चलकर एक तिराहा आएगा और उधर से जाना, इधर से मत जाना। दो-चार स्थानों के नाम और बताए, लेकिन वे सब हमारे पल्ले नहीं पड़े।

Monday, October 22, 2018

अनजाने मेघालय में - चेरापूंजी-नोंगस्टोइन-रोंगजेंग-दुधनोई यात्रा

Riding on Shillong Tura Road
12 फरवरी 2018
मैं पहले ही बता चुका हूँ कि हमने नोंगस्टोइन होते हुए रोंगजेंग तक जाने का फैसला किया था। अगर समय पर्याप्‍त होगा, तो सीजू जाएँगे अन्यथा दुधनोई की तरफ निकल लेंगे। और इसके लिए सुबह चार बजे चेरापूंजी से निकलना भी पक्का कर लिया।
लेकिन ऐसा भला कभी हुआ है?
आठ बजे चेरापूंजी से निकले। चार घंटों का नुकसान कह रहा था कि अब हम सीजू तो नहीं जा रहे।
चेरापूंजी से शिलोंग वाली सड़क पर चल दिए। जब दो दिन पहले हम चेरापूंजी आए थे, तो इस सड़क को अंधेरे में तय किया था, ठंड से ठिठुरते हुए। लेकिन इसकी खूबसूरती अब दिखनी शुरू हुई। सड़क तो वैसे पठार के ऊपर ही है, लेकिन पठार और गहरी घाटियों के किनारों से भी यह गुजरती है। दक्षिण में गहरी घाटियाँ दूर-दूर तक दिखती हैं। अगर मौसम एकदम साफ हो, तो धुर दक्षिण में बांग्लादेश का मैदानी इलाका भी देखा जा सकता है। इस समय मौसम तो वैसे साफ ही था, लेकिन दूर धुंध भी बनी हुई थी।
जब शिलोंग दस-बारह किलोमीटर रह गया, तो मासिनराम से आने वाली सड़क भी मिल गई। हम इसी सड़क पर मासिनराम की ओर चल दिए। अब तक तो हम पूरी तरह पठार पर आ गए थे और गहरी घाटियाँ पीछे कहीं छूट गई थीं। अब पूरे रास्ते हमें घाटियाँ नहीं मिलेंगी, हम पठार पर ही रहेंगे।

Thursday, October 18, 2018

मेघालय यात्रा - गार्डन ऑफ केव, चेरापूंजी का एक अनोखा स्थान

11 फरवरी 2018
ठीक तीन बजे हम थे ‘गार्डन ऑफ केव’ के द्वार पर। पास में ही कुछ स्थानीय लोग पिकनिक मना रहे थे और हिंदी गानों पर थिरक रहे थे। यहीं द्वार के पास एक महिला पकौड़ियाँ तल रही थीं। चाय और पकौड़ी।
यह स्थान एक आश्‍चर्यजनक जगह है। सबसे शानदार है एक गुफा की छत में छेद और उससे नीचे गिरता पानी। पानी गुफा में बीचोंबीच गिरता है। यानी गुफा के भीतर जलप्रपात। फिलहाल बहुत थोड़ा पानी गिर रहा था। बारिश में तो वाकई दर्शनीय हो जाता होगा यह। इसके अलावा कुछ और भी जलप्रपात हैं। पूरे ‘गार्डन’ में पैदल घूमने के लिए पक्का रास्ता बना है। यह स्थान भी बड़ा पसंद आया।

Monday, October 15, 2018

मेघालय यात्रा - चेरापूंजी के अनजाने स्थल

All Information about Cherrapunjee
11 फरवरी 2018
यहाँ से आगे बढ़े तो ‘सेवन सिस्टर्स फॉल’ पड़ा। बड़ी दूर तक खड़ी चट्‍टानें चली गई हैं और ऊपर से कई स्थानों से पानी गिरता होगा। इस समय एक बूंद भी पानी नहीं था।
इससे आगे थंगखरंग पार्क है। मेन रोड़ से डेढ़ किलोमीटर हटकर। लेकिन यह वन विभाग का पार्क है। पठार के उस हिस्से के एकदम ऊपर स्थित है, जहाँ से दक्षिण में खड़ा ढलान आरंभ हो जाता है और यह ढाल बांग्लादेश सीमा तक जाता है। वातावरण में धुंध-सी थी, अन्यथा यहाँ से बांग्लादेश के मैदान भी दिख जाते। इस पार्क के पश्‍चिम में किनरेम जलप्रपात भी दिखता है। लेकिन बाकी सभी जलप्रपातों की तरह इसमें भी एक-दो बूंद ही पानी था। लेकिन इसकी भौगोलिक स्थिति और इसका खुलापन बता रहा था कि बारिश के दिनों में यह मेघालय के सबसे खूबसूरत जलप्रपातों में से एक बन जाता होगा।
किनरेम प्रपात के नीचे से सड़क भी जाती है, जिससे थोड़ी देर बाद हम जाएँगे।

Thursday, October 11, 2018

मेघालय यात्रा - मॉसमाई गुफा, चेरापूंजी

All Information about Mawsmai Cave Cherrapunjee
11 फरवरी 2018
मॉसमाई केव - सन्नाटा। हर तरफ सन्नाटा। रविवार होने के कारण लोगों की छुट्‍टी थी। दुकान, होटल सब बंद। फिर भी कुछ खुले हुए। जो भी खुले थे, उनमें चाय आदि ले लेने में समझदारी थी। हम साढ़े आठ बजे मॉसमाई पहुँच गए। टिकट काउंटर बंद था। झाँककर भी देखा, कोई नहीं। कहीं गुफा भी तो बंद नहीं है! पार्किंग में बाइक खड़ी कर दी। पार्किंग के चारों ओर रेस्टोरेंट हैं। एक-दो के सामने एक-दो जने बैठे थे। उन्हें हमारी उपस्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ा। यह सन्नाटा अजीब-सा लगा।
अरे भाई, कोई तो हमें टोक लो।
एक जगह लिखा था - वेलकम टू मॉसमाई केव। हम उसी तरफ चल दिए। एक रेस्टोरेंट के सामने दो बंगाली बैठे दिखे - धूप में इत्मीनान से। तभी बगल में एक स्थानीय बूढ़े ने हमें टोका। उसने क्या कहा, यह तो समझ नहीं आया, लेकिन बड़ी खुशी मिली। कोई और मौका होता, तो हम अनसुनी करके आगे बढ़ जाते, लेकिन अब रुक गए।
“क्या? व्हाट?” मैंने पूछा।
“टेन मिनट्स।”
“टेन मिनट्स क्या?”

Monday, October 8, 2018

मेघालय यात्रा - चेरापूंजी में नोह-का-लिकाई प्रपात और डबल रूट ब्रिज

Double Root Bridge Cherrapunjee all Information
10 फरवरी 2018
“एक महिला थी और नाम था का-लिकाई। उसने दूसरी शादी कर ली। पहले पति से उसे एक लड़की थी। तो उसका दूसरा पति उस लड़की से नफरत करता था। एक बार महिला बाहर से काम करके घर लौटी तो देखा कि पहली बार उसके पति ने उसके लिए मीट बनाया और परोसा भी। महिला बड़ी खुश हुई और साथ बैठकर भोजन कर लिया। बाद में उसे बाल्टी में कुछ उंगलियाँ मिलीं। उसे समझते देर नहीं लगी कि ये उंगलियाँ उसकी लड़की की हैं और उसके दूसरे पति ने लड़की को मार दिया है। इससे महिला बड़ी परेशान हुई और पास के झरने में छलांग लगाकर अपनी जान दे दी। बाद में उस झरने का नाम पड़ गया ‘नोह-का-लिकाई’, अर्थात का-लिकाई की छलांग।”
यह कहानी थी नोह-का-लिकाई जलप्रपात की, जो वहाँ लिखी हुई थी। इस जलप्रपात को भारत का सबसे ऊँचा जलप्रपात माना जाता है। शुष्क मौसम होने के बावजूद भी एक पतली-सी जलधारा नीचे गिर रही थी। जलप्रपात बारिश में ही दर्शनीय होते हैं। यह भी बारिश में ही देखने योग्य है, लेकिन अब भी चूँकि इसमें पानी था, तो अच्छा लग रहा था।
यहाँ ज्यादा देर नहीं रुके। वापस चेरापूंजी पहुँचे और ‘डबल रूट ब्रिज’ के लिए रवाना हो गए।

Thursday, October 4, 2018

मेघालय यात्रा - डौकी-चेरापूंजी सड़क और सुदूर मेघालय के गाँव

Mawlynnong Meghalaya Complete Information
9 फरवरी 2018
रात तक हमारा इरादा चेरापूंजी पहुँचने का था। वैसे तो चेरापूंजी यहाँ से लगभग 80 किलोमीटर दूर है, लेकिन हमने एक लंबे रास्ते से जाने का इरादा किया। डौकी पुल पार करने के दो किलोमीटर बाद यह मुख्य सड़क तो सीधी चली जाती है और एक सड़क बाएँ जाती है, जो रिवाई होते हुए आगे इसी मुख्य सड़क में मिल जाती है। रिवाई के पास ही मावलिननोंग गाँव है, जो एशिया का सबसे साफ-सुथरा गाँव माना जाता है। इसके आसपास भी कुछ दर्शनीय स्थान हैं। उन्हें देखते हुए हम चेरापूंजी जाएँगे।
तो रिवाई का यह रास्ता बांग्लादेश सीमा के एकदम साथ-साथ चलता है। रास्ता तो पहाड़ पर है, लेकिन बीस-तीस मीटर नीचे ही पहाड़ समाप्‍त हो जाता है और मैदान शुरू हो जाता है। मैदान पूरी तरह बांग्लादेश में है और पहाड़ भारत में। अर्थात् हम अंतर्राष्ट्रीय सीमा से केवल बीस-तीस मीटर दूर ही चल रहे थे।
यहीं सड़क से जरा-सा नीचे सोंग्रामपुंजी जलप्रपात भी है। चूँकि जलप्रपात एकदम सीमा पर है, तो बांग्लादेशी खूब आते हैं यहाँ। इस जलप्रपात की गिनती बांग्लादेश के प्रमुख प्रपातों में होती है।
और थोड़ा आगे चलने पर बोरहिल प्रपात मिला। एकाध बूंद ही पानी टपक रहा था इस समय तो, लेकिन मानसून में जबरदस्त लगता होगा। इस प्रपात का भी निचला सिरा बांग्लादेश में है, तो अवश्य ही नीचे बांग्लादेशी यात्री भी खूब आते होंगे।
कैसा अद्‍भुत अनुभव होता होगा! प्रपात का ऊपरी सिरा भारत में और निचला सिरा बांग्लादेश में। हमें मानसून में आने का बहाना मिल गया।

Monday, October 1, 2018

मेघालय यात्रा - डौकी में भारत-बांग्लादेश सीमा पर रोचक अनुभव

India Bangladesh Border near Dawki Tamabil Meghalaya
9 फरवरी 2018
सुबह-सुबह ही वो नाववाला आ गया, जो कल हमें यहाँ छोड़कर गया था। आज वह हमें उमगोट नदी में नौका विहार कराएगा। हमें वैसे तो नौका विहार में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन यह नदी इतनी प्रसिद्ध हो चुकी है कि नौका विहार का मन करने लगा। जब भी आप कभी इंटरनेट पर ऐसा कोई फोटो देखें, जिसमें इतना पारदर्शी पानी हो कि नाव हवा में चलती दिखती हो, तो बहुत ज्यादा संभावना है कि वह यही नदी होगी। लेकिन ऐसा फोटो लेने की भी एक तकनीक है। वो यह कि धूप निकली हो और नाव की परछाई नाव से बिल्कुल अलग होकर नदी की तली में दिख रही हो। साथ ही हवा एकदम शांत हो और पानी पर लहरें न बन रही हों।
“बांग्लादेश चलेंगे सर?” अचानक नाववाले ने ऐसी बात कह दी, जो अप्रत्याशित थी।
“क्या? बांग्लादेश?”
“हाँ जी, उधर झाल-मूड़ी खाकर आएँगे।”

Thursday, September 27, 2018

मेघालय यात्रा - डौकी में पारदर्शी पानी वाली नदी में नौकाविहार

8 फरवरी 2018
सबसे पहले पहुँचे उमगोट नदी के पुल पर। उमगोट नदी अपने पारदर्शी पानी के लिए प्रसिद्ध है। हम भी इसी के लालच में यहाँ आए थे, ताकि पारदर्शी पानी पर चलती नावों के फोटो ले सकें और बाद में अपने मित्रों में प्रचारित करें कि यहाँ नावें हवा में चलती हैं।
“बोटिंग करनी है जी?” पुल के पास ही एक लड़के ने पूछा।
“नहीं, लेकिन यह बताओ कि यहाँ होटल कहाँ हैं?”
और कुछ ही देर में हम एक नाव में बैठे थे और उमगोट की धारा के विपरीत जा रहे थे। हमारा सारा सामान भी हमारे साथ ही था, सिवाय मोटरसाइकिल के। मोटरसाइकिल उस लड़के के घर पर खड़ी थी, जो यहाँ से थोड़ा ऊपर था। लड़के ने अपने घर से इशारा करके बताया था - “वो बांग्लादेश है।”
“वो मतलब? कहाँ?”
मुझे पता तो था कि सारा मैदानी इलाका बांग्लादेश है, लेकिन जमीन भारत से बांग्लादेश में कब बदल जाती है, यह देखने की उत्सुकता थी।

Monday, September 24, 2018

मेघालय यात्रा - जोवाई से डौकी की सड़क और क्रांग शुरी जलप्रपात

Krang Shuri Waterfall Meghalaya
8 फरवरी 2018
जोवाई से डौकी जाने के लिए जिलाधिकारी कार्यालय के सामने से दाहिने मुड़ना था, लेकिन यहाँ बड़ी भीड़ थी। मेघालय में चुनावों की घोषणा हो चुकी थी और नामांकन आदि चल रहे थे। उसी के मद्‍देनजर शायद यहाँ भीड़ हो। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि हमें दाहिने डौकी की ओर जाता रास्ता नहीं दिखा और हम सीधे ही चलते रहे। हालाँकि भीड़ एकदम शांत थी और शोर-शराबा भी नहीं था।
आगे निकलकर एक महिला से रास्ते की दिशा में इशारा करके पूछा - “डौकी?”
उन्होंने अच्छी तरह नहीं सुना, लेकिन रुक गईं। मैंने फिर पूछा - “यह रास्ता डौकी जाता है?”
“इधर डौकी नाम की कोई जगह नहीं है।” उन्होंने टूटी-फूटी हिंदी-अंग्रेजी में कहा।
हमें नहीं पता था, ये लोग ‘डौकी’ को क्या कहते हैं। मैंने तो अंग्रेजी वर्तनी पढ़कर अपनी सुविधानुसार ‘डौकी’ उच्चारण करना शुरू कर दिया था।
“डावकी?”
“नहीं मालूम।”
“डाकी?”, “डकी?”, “डेकी?”, “डूकी?”, “डबकी?” हर संभावित उच्चारण बोल डाला, लेकिन उन्हें समझ नहीं आया। आखिरकार गूगल मैप का सहारा लेना पड़ा। तब पता चला कि हम दूसरे रास्ते पर आ गए हैं।

Thursday, September 20, 2018

मेघालय यात्रा - नरतियंग दुर्गा मंदिर और मोनोलिथ

Nartiang Meghalaya
8 फरवरी 2018
हम योजना बनाने में नहीं, बल्कि तैयारी करने में विश्वास करते हैं। इस यात्रा के लिए हमने खूब तैयारियाँ की थीं। चूँकि हमारी यह यात्रा मोटरसाइकिल से होने वाली थी, तो मेघालय में सड़कों की बहुत सारी जानकारियाँ हमने हासिल कर ली थीं। गूगल मैप हमारा प्रमुख हथियार था और मैं इसके प्रयोग में सिद्धहस्त था। भारत के प्रत्येक जिले की अपनी वेबसाइट है। इन वेबसाइटों पर उस जिले के कुछ उन स्थानों की जानकारी अवश्य होती है, जिन्हें पर्यटन स्थल कहा जा सकता है।
मेघालय में शिलोंग और चेरापूंजी ही प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हैं। इनके आसपास सौ-पचास किलोमीटर के दायरे में भी कुछ स्थान लोकप्रिय होने लगे हैं। लेकिन मेघालय 350 किलोमीटर लंबाई और 100 किलोमीटर चौड़ाई में फैला है। इसमें 11 जिले भी हैं। सबसे पूरब में जयंतिया पहाड़ियों में दो जिले, बीच में खासी पहाड़ियों में चार जिले और पश्चिम में गारो पहाड़ियों में पाँच जिले हैं।

आप अगर एक साधारण यात्री की तरह कुछ सीमित दिनों के लिए मेघालय या किसी भी राज्य में जा रहे हैं और लोकप्रिय पर्यटन स्थानों से हटकर कुछ देखना चाहते हैं, तो जिलों की वेबसाइटें आपको अपने-अपने जिलों के कुछ स्थानों के बारे में बता देंगी। कुछ थोड़ा-सा काम गूगल मैप कर देगा और बाकी काम आपको करना होगा। हमने भी ऐसा ही किया था।

Monday, September 17, 2018

मेघालय यात्रा - गुवाहाटी से जोवाई

Motorcycle Riding in Meghalaya
6 फरवरी 2018 यानी पूर्वोत्तर से लौटने के ढाई महीने बाद ही हम फिर से पूर्वोत्तर जा रहे थे। मोटरसाइकिल वहीं खड़ी थी और तेजपाल जी पता नहीं उसे कितना चला रहे होंगे। हालाँकि हम चाहते थे कि वे इसे खूब चलाएँ, लेकिन हमें पता था कि ढाई महीनों में यह ढाई किलोमीटर भी नहीं चली होगी। मशीनें भी इंसानों की ही तरह होती हैं। काम नहीं होगा, तो आलसी हो जाएँगी और बाद में उनसे काम लेना मुश्किल हो जाएगा। कभी बैटरी का बहाना बनाएगी, तो कभी कुछ। इसलिए दीप्ति दो दिन पहले चली गई, ताकि अगर जरूरी हो तो वह बैटरी बदलवा ले या अगला पहिया बदलवा ले या सर्विस ही करा ले।
दीप्ति ट्रेन से गई। ट्रेन चौबीस घंटे विलंब से गुवाहाटी पहुँची। इससे पहले दीप्ति ने कभी भी इतनी लंबी ट्रेन-यात्रा अकेले नहीं की थी। वह बोर हो गई।
उधर 6 फरवरी को मैंने जेट एयरवेज की फ्लाइट पकड़ी। और जिस समय आसमान में मेरे सामने नाश्ता परोसा जा रहा था, मैं समझ गया कि यात्रा बहुत मजेदार होने वाली है।

Tuesday, September 11, 2018

ग्रुप यात्रा: नेलांग यात्रा और गंगोत्री भ्रमण

25 जून 2018
कल शाम की बात है...
“देखो भाई जी, हमें कल सुबह नेलांग जाना है और वापसी में आप हमें गंगोत्री ड्रोप करोगे। पैसे कितने लगेंगे?”
“सर जी, धराली से नेलांग का 4000 रुपये का रेट है।”
“लेकिन उत्तरकाशी से उत्तरकाशी तो 3500 रुपये ही लगते हैं।”
“नहीं सर जी, उत्तरकाशी से उत्तरकाशी 6000 रुपये लगते हैं।”
“अच्छा?”
“हाँ जी... और आपको गंगोत्री भी ड्रोप करना है, तो इसका मतलब है कि गाड़ी ज्यादा चलेगी। इसके और ज्यादा पैसे लगेंगे।”
“अच्छा?” इस बार मैंने आँखें भी दिखाईं।
“लेकिन... चलिए, कोई बात नहीं। मैं एडजस्ट कर लूंगा। आपको 4000 रुपये में ही नेलांग घुमाकर गंगोत्री छोड़ दूंगा।”
“अच्छा?”

Saturday, September 8, 2018

धराली सातताल ट्रैक, गुफा और झौपड़ी में बचा-कुचा भोजन

ये पराँठे बच गए हैं... इन्हें कौन खाएगा?... लाओ, मुझे दो...

24 जून 2018
कल किसी ने पूछा था - सुबह कितने बजे चलना है?
अगर सुबह सवेरे पाँच बजे मौसम खराब हुआ, तो छह बजे तक निकल पड़ेंगे और अगर मौसम साफ हुआ, तो आराम से निकलेंगे।
क्यों? ऐसा क्यों?
क्योंकि सुबह मौसम खराब रहा, तो दोपहर से पहले ही बारिश होने के चांस हैं। ऊपर सातताल पर सिर ढकने के लिए कुछ भी नहीं है।
तो इसीलिए आज मुझे भी पाँच बजे उठकर बाहर झाँकना पड़ा। मौसम साफ था, तो लंबी तानकर फिर सो गया।
...
आप सभी ने पराँठे खा लिए ना? हमने ऊपर सातताल में झील किनारे बैठकर खाने को कुछ पराँठे पैक भी करा लिए हैं और स्वाद बनाने को छोटी-मोटी और भी चीजें रख ली हैं। अभी दस बजे हैं। धूप तेज निकली है। कोई भी आधी बाजू के कपड़े नहीं पहनेगा, अन्यथा धूप में हाथ जल जाएगा। संजय जी, आप बिटिया को फुल बाजू के कपड़े पहनाइए। क्या कहा? फुल बाजू के कपड़े नहीं हैं? तो तौलिया ले लीजिए और इसके कंधे पर डाल दीजिए। हाथ पर धूप नहीं पड़नी चाहिए।
और अब सभी लोग आगे-आगे चलो। मैं पीछे रहूँगा। बहुत आगे मत निकल जाना। निकल जाओ, तो थोड़ी-थोड़ी देर में हमारी प्रतीक्षा करना। सभी साथ ही रहने चाहिए। यह सीधी पगडंडी जा रही है। जिधर भी यह मुड़ेगी, हमें भी उधर ही मुड़ लेना है।

Friday, August 31, 2018

गंगनानी में नहाना, ड्राइवर से अनबन और मार्कंडेय मंदिर

पता नहीं आपको पता है या नहीं, लेकिन पता होना चाहिए। दीप्ति ने इस साल कुछ यात्राएँ आयोजित करने की योजना बनाई है। इन्हीं के अंतर्गत वह जनवरी में रैथल और मार्च में जंजैहली की यात्रा करा चुकी है। और जून में योजना बनाई धराली, सात ताल, नेलांग और गंगोत्री की। उसकी ये यात्राएँ हमारी नियमित यात्राओं के उलट बेहद आसान होती हैं और हर आयुवर्ग के लिए सही हैं। लेकिन उसका फोकस एक पॉइंट पर है - हम अपने मित्रों को हमेशा अनसुनी, अनजानी जगहों पर ले जाया करेंगे और उन्हें घूमने का मतलब समझाया करेंगे।
कहने का अर्थ यह है कि अगर आप वाकई घूमना चाहते हैं, प्रकृति के सानिध्य में रहना पसंद करते हैं, शहरी पर्यटन स्थलों की भीड़ से दूर कहीं एकांत में जाना चाहते हैं, तो ये यात्राएँ आपके लिए हैं। मात्र एक बार इनमें से किसी भी यात्रा पर जाकर आपको पता चलेगा कि शिमला, मसूरी के अलावा भी घूमा जा सकता है। अनजान, अनसुने स्थानों पर भी उतनी ही आसानी से जाया जा सकता है, जितना आसान नैनीताल जाना है। और इन अनजाने स्थानों पर जाकर आप अगर आनंदित नहीं हुए, तो समझिए कि आप शिमला, मसूरी के लिए ही बने हैं; प्रकृति के बीच जाने के लिए नहीं बने। आप सौ वर्ग मीटर के पार्क में झूला झूलने के लिए ही बने हैं; सैकड़ों वर्ग किलोमीटर के जंगल में स्वच्छंद घूमने के लिए नहीं बने।
और आप होटलों में मेन्यू देखकर खाने का ऑर्डर देने के लिए ही बने हैं, कहीं जंगल में किसी घर में बचा-कुचा खाना खाने के लिए नहीं।
अब आप सोचेंगे कि बचा-कुचा खाना? भला कोई कहीं बचा-कुचा खाना कैसे खा सकता है? तो आप इस पोस्ट को पूरा पढ़े बिना मत हटना। हम इस पोस्ट के आखिर में फिर से यही बात दोहराएंगे।

Wednesday, August 29, 2018

धराली से दिल्ली वाया थत्यूड़


13 जून 2018
आज तो सुबह-सुबह ही उठ गए। उठना ही पड़ता। अन्यथा बहुत मुश्किल होती। एक सप्ताह से हम पहाड़ों में घूम रहे थे, आज आखिरी दिन था और कल दिल्ली पहुँचने के लिए आज हमें पहाड़ों से बाहर निकलना ही पड़ेगा।
होटल का दो दिनों का हिसाब करने बैठे तो पैसे कम पड़ गए। यह आँचल होटल अर्जुन नेगी का है। लेकिन उसने इसके खान-पान का ठेका किसी और को दे रखा है। इसके सामने वाले बड़े होटल के खान-पान का ठेका स्वयं ले रखा है। सामने वाले होटल के सामने खाली जगह बहुत सारी है और इसमें कमरे भी ज्यादा हैं, इसलिए प्रतिद्वंदी होने के बावजूद भी अर्जुन ने इसके खान-पान का ठेका ले लिया। दोनों हाथों में लड्डू।
हमारी अर्जुन से अच्छी जान-पहचान हो गई थी। दो दिनों तक खाना-पीना हमने आँचल होटल में ही किया था, यानी इसके पैसे हमें अर्जुन को नहीं देने थे, बल्कि किसी और को देने थे। यही पैसे कम पड़ गए। फिलहाल पैसे न हमारे पास थे और न सुमित के पास। अर्जुन से बात की और उसने सब मामला सुलझा दिया - “अगली बार आओगे, तब दे देना।”
सुबह पौने सात बजे मोटरसाइकिलें स्टार्ट हो गईं और उत्तरकाशी की तरफ दौड़ने लगीं। डेढ़ घंटा लगा गंगनानी पहुँचने में।
“नहाते हुए चलेंगे।” मैंने घोषणा की और गर्म पानी के कुंड में जा उतरा। बड़ी देर तक नहाते रहे। लेकिन एक बात भूल गए, जिसने मुझे शाम तक परेशान किए रखा।

Monday, August 27, 2018

मुखबा-हर्षिल यात्रा


12 जून 2018
धराली के एकदम सामने मुखबा दिखता है - भागीरथी के इस तरफ धराली, उस तरफ मुखबा। मुखबा गंगाजी का शीतकालीन निवास है। आप जानते ही होंगे कि उत्तराखंड के चारों धामों के कपाट शीतकाल में बंद रहते हैं। तब इनकी डोली मुख्य मंदिरों से चलकर नीचे दूसरे मंदिरों में लाई जाती है और वहीं पूजा होती है। गंगाजी की डोली भी गंगोत्री से मुखबा आ जाती है। मुखबा में भी गंगोत्री मंदिर की तर्ज पर एक मंदिर है। यह मंदिर धराली से भी दिखता है।
पैदल भी जा सकते थे, ज्यादा दूर नहीं है, लेकिन मोटरसाइकिलों से ही जाना उचित समझा। हर्षिल होते हुए मुखबा पहुँच गए। हर्षिल से मुखबा की सड़क पक्की है, लेकिन बहुत तेज चढ़ाई है।
मंदिर में लकड़ी का काम चल रहा था और बिहारी मजदूर जी-जान से लगे हुए थे। कुछ बच्चे कपड़े की गेंद से कैचम-कैच खेल रहे थे। गेंद मजदूरों के पास पहुँच जाती, तो मुँह में गुटखा दबाए मजदूर उन्हें भगा देते। हालाँकि गेंद बच्चों को मिल जाती, बच्चे धीरे-धीरे खेलने लगते, लेकिन अगले एक मिनट में ही वे पूरे रोमांच पर पहुँच जाते और गेंद फिर से मजदूरों के पास जा पहुँचती।
क्या? क्या बोले आप?
जी हाँ, मैंने पूछा था... मजदूर सीतामढ़ी के थे।

Friday, August 24, 2018

धराली सातताल ट्रैकिंग

Dharali Sattal Trek Gangotri All Information

12 जून 2018
मैं जब भी धराली के पास सातताल के बारे में कहीं पढ़ता था, तो गूगल मैप पर जरूर देखता था, लेकिन कभी मिला नहीं। धराली के ऊपर के पहाड़ों में, अगल के पहाड़ों में, बगल के पहाड़ों में, सामने के पहाड़ों में जूम कर-करके देखा करता, लेकिन कभी नहीं दिखा। इस तरह यकीन हो गया कि धराली के पास सातताल है ही नहीं। यूँ ही किसी वेबसाइट ने झूठमूठ का लिख दिया और बाकी वेबसाइटों ने उसे ही कॉपी-पेस्ट कर लिया।
फिर एक दिन नफेराम यादव से मुलाकात हुई। उन्होंने कहा - “हाँ, उधर सातताल झीलें हैं।”
“झीलें? मतलब कई झीलें हैं?”
“हाँ।”
“लगता है आपने भी वे ही वेबसाइटें पढ़ी हैं, जो मैंने पढ़ी हैं। भाई, उधर कोई सातताल-वातताल नहीं है। अगर होती, तो सैटेलाइट से तो दिख ही जाती। फिर आप कह रहे हो कि कई झीलें हैं, तो एकाध तो दिखनी ही चाहिए थी।”
“आओ चलो, तुम्हें दिखा ही दूँ।”
उन्होंने गूगल अर्थ खोला। धराली और...
“ये लो। यह रही एक झील।”
“हाँ भाई, कसम से, यह तो झील ही है।”
“अब ये लो, दूसरी झील।”

Monday, August 20, 2018

बाइक यात्रा: गिनोटी से उत्तरकाशी, गंगनानी, धराली और गंगोत्री


10 जून 2018
गिनोटी से सवा नौ बजे चले। हम हमेशा प्रोमिस करते, लेकिन उठते-उठते सूरज आसमान में चढ़ जाता और हम अगले दिन के लिए फिर से प्रतिज्ञा कर लेते - “कल तो सुबह-सुबह ही निकलेंगे।”
गिनोटी से थोड़ा ही आगे ब्रह्मखाल है। इसके नाम के साथ ‘खाल’ लगा होने के कारण मैं जन्म से लेकर कल तक यही सोचता आ रहा था कि धरासू बैंड और बडकोट के बीच में ब्रह्मखाल ही वो दर्रा है, जो भागीरथी घाटी और यमुना घाटी को जोड़ता है। लेकिन कभी इसकी पड़ताल नहीं की। गूगल मैप पर सैंकड़ों बार इस सड़क को देखा, लेकिन मन में स्थाई रूप से ब्रह्मखाल ही अंकित हो गया था। कल पता चला कि वो स्थान राडी टॉप है।
सुमित की बुलेट का असर हमारी डिस्कवर पर भी पड़ रहा था। यह भी बीमारू जैसा बर्ताव कर रही थी। बार-बार पंचर हो जाता। पुराने पंचर ही लीक होने लगते। टायर ट्यूबलेस हैं और पंचर किट हमेशा हमारे पास रहती है, इसलिए कभी हम खुद पंचर बना लेते, तो कभी पचास रुपये देकर बनवा लेते, तो कभी चालीस-पचास किलोमीटर बिना हवा भी चला लेते।
लेकिन ब्रह्मखाल तक अगले पहिये की बम-बम हो गई। पुराना पंचर जिंदा हो उठा और पिचके टायर के साथ मोड़ों पर संतुलन बनाना मुश्किल होने लगा। इरादा था उत्तरकाशी पहुँचकर इसे बदलवाने का, लेकिन अभी उत्तरकाशी बहुत दूर है।
“भाई जी, इसमें डबल ‘वो’ लगानी पड़ेगी, सौ रुपये लगेंगे।”
“लगा दे।”

Friday, August 17, 2018

बाइक यात्रा: टाइगर फाल - लाखामंडल - बडकोट - गिनोटी


9 जून 2018
रात हंगामा होने के कारण आधी रात के बाद ही सोए थे और देर तक सोए रहे। दस बजे उठे। हिमालय में यात्राएँ करने का एक लाभ भी है - नहाने से छुटकारा मिल जाता है।
बारिश हो रही थी। रेनकोट पहनकर हम बारिश में ही चल देते, लेकिन बिजलियाँ भी गिर रही थीं। और उसी दिशा में गिर रही थीं, जिधर हमें जाना था, यानी लाखामंडल वाली सड़क के आसपास। सुमित बारिश में ही चल देने को बड़ा उतावला था, शायद उसने कभी इन जानलेवा बिजलियों का सामना नहीं किया। सामना तो मैंने भी नहीं किया है, लेकिन डर लगता है तो लगता है।
आलू के पराँठे खाने के बाद पचास रुपये का डिसकाउंट मिल गया। रात मैंने जो हुड़दंग की वीडियो बनाई थीं, वे आज सभी ने देखी। कौन ग्रामीण सड़क पर कितनी जोर से लठ पटक रहा था और उससे उत्पन्न हुई आवाज से उत्साहित होकर शराबियों के खिलाफ बोल रहा था, उसे देखकर और सुनकर सब बड़े हँसे। और एक-दूसरे की टांग-खिंचाई भी की। आखिर में तय हुआ कि हम इन वीडियो को सार्वजनिक नहीं करेंगे और आधी रात को होटल से भगाए जाने से आहत होकर वकील साहब अगर कोई कार्यवाही करते हैं, तब ये वीडियो काम आएँगी।
न वकील साहब ने कार्यवाही करी, न वीडियो काम आईं।
तो इसलिए पचास रुपये का डिसकाउंट मिला।

Monday, August 13, 2018

टाइगर फाल और शराबियों का ‘एंजोय’


8 जून 2018
सुमित ने तार लगाकर अपनी बुलेट स्टार्ट की। अब जब भी इसे वह इस तरह स्टार्ट करता, हम खूब हँसते।
“भाई जी, एक बात बताओ। त्यूणी वाली रोड कैसी है?”
“एकदम खराब है जी।”
“कहाँ से कहाँ तक खराब है?”
“बस यहीं से खराब स्टार्ट हो जाती है और 15 किलोमीटर तक खराब ही है।”
हमें यही सुनना था और हम चकराता की ओर चल पड़े। अगर त्यूणी वाली सड़क अच्छी हालत में होती, तो हम आज हनोल और वहाँ का चीड़ का जंगल देखते हुए पुरोला जाते। आपको अगर वाकई चीड़ के अनछुए जंगल देखने हैं तो त्यूणी से पुरोला की यात्रा कीजिए। धरती पर जन्म लेना सफल न हो जाए, तो कहना! और अगर देवदार देखना है, तो लोखंडी है ही।
लोखंडी से त्यूणी की ओर ढलान है। कल विकासनगर में उदय झा साहब ने बता ही दिया था कि यह ढलान काफी तेज है और पथरीला कच्चा रास्ता और कीचड़ मोटरसाइकिल के लिए समस्या पैदा करेगा। फिर हमारा जाना भी कोई बेहद जरूरी तो था नहीं। क्यों कीचड़ में गिरने का रिस्क उठाएँ? टाइगर फाल ही चलो। आखिर में जाना तो गंगोत्री है, चाहे पुरोला से जाओ या लाखामंडल से।
चकराता न जाकर टाइगर फाल वाली सड़क पर मुड़ गए। जून का महीना था और टूरिस्टों से यह सड़क भरी पड़ी थी।

Saturday, August 11, 2018

मोइला डांडा, बुग्याल और बुधेर गुफा


8 जून 2018

नाम रोहन राणा। इस होटल के मालिक का नाम। शानदार व्यक्तित्व। रौबीली मूँछें। स्थानीय निवासी।
“भाई जी, आज हमें बुधेर केव जाना है।”
“बुधेर केव? मतलब मोइला डांडा?”
“मतलब?”
“मतलब उसे हम मोइला डांडा कहते हैं।”
मुझे यह जानकारी नहीं थी। अभी तक वो जगह मेरी नजरों में बुधेर केव ही थी, लेकिन अब इसे मैं मोइला डांडा कहूँगा। यह एक ‘डांडा’ है, इतना तो मुझे पता था, लेकिन इसका नाम मोइला है, यह नहीं पता था।
“भाई जी, हम 12 बजे तक आ जाएँगे और तभी चेक-आउट करेंगे।”
“नहीं भाई जी। आज होटल की कम्पलीट बुकिंग है। गुजराती लोगों ने इसे बुक किया हुआ है। अभी चेक-आउट कर देंगे, तो अच्छा रहेगा।
सारा सामान हमने नीचे रेस्टोरेंट में रख दिया और बिस्कुट, नमकीन, पानी लेकर मोइला डांडे की ओर बढ़ चले।
लोखंडी से तीन किलोमीटर तक कच्चा मोटर रास्ता है, जो फोरेस्ट रेस्ट हाउस के पास समाप्त हो जाता है। चौकीदार ने बताया कि इस रेस्ट हाउस की बुकिंग कालसी से होती है। यहाँ तक आने का रास्ता देवदार के घने जंगल से होकर है। वैसे यह जंगल देवदार का ही है या किसी और का, इसमें मुझे डाउट है। क्योंकि मेरा जैव-वनस्पति ज्ञान शून्य है। चीड़ और देवदार की पहचान मैं कर लेता हूँ, लेकिन चीड़ जैसे दिखने वाले अन्य पेड़ भी होते हैं और देवदार जैसे दिखने वाले भी। इसलिए इन ‘उप-चीड़ों’ और ‘उप-देवदारों’ में हमेशा डाउट रहता है। फिर भी यह चीड़-प्रजाति के पेड़ों का जंगल नहीं था। चीड़ का जंगल सूखा-सूखा होता है और उसमें केवल चीड़ ही पनपता है। वह किसी अन्य को नहीं पनपने देता। जबकि देवदार प्रजाति का जंगल ‘अतिथि देवो भवः’ का पालन करता दिखता है और इसके नीचे बाकी सब पेड़ और झाड़ियाँ जमकर पनपते हैं।
तो यह देवदार प्रजाति का जंगल था। हम कहेंगे कि देवदार का जंगल था। देवदार के जंगल में पलक भी झपकाने का मन नहीं करता, कहीं कोई नजारा ‘मिस’ न हो जाए।

Monday, August 6, 2018

विकासनगर-लखवाड़-चकराता-लोखंडी बाइक यात्रा


7 जून 2018

“क्या!!!"
“हाँ, मैं सच कह रहा हूँ।”
“टाइगर फाल से भी जबरदस्त जलप्रपात!”
“हाँ, यकीन न हो, तो शिव भाई से पूछ लो।”
और शिव सरहदी ने भी पुष्टि कर दी - “हाँ, उदय जी सही कह रहे हैं। उसकी ज्यादा लोगों को जानकारी नहीं है। लोकल लोगों को जानकारी है, तो हम वहाँ अक्सर दारू पीने चले जाते हैं।”
रास्ता हमने समझ लिया और कल्पना करने लगे टाइगर फाल से भी जबरदस्त झरने की। अगर ऐसा हुआ तो कमाल हो जाएगा। लोगों को जब मेरे माध्यम से इसका पता चलेगा तो बड़ा नाम होगा। अखबार में भेजूंगा। टी.वी. पर भेजूंगा। टाइगर फाल क्या कम जबरदस्त है! लेकिन यह तो उससे भी जबरदस्त होगा।
“नाम क्या है इसका?”
“नाम कुछ नहीं है।”

Thursday, August 2, 2018

मोटरसाइकिल यात्रा: सुकेती फॉसिल पार्क, नाहन

जून का तपता महीना था और हमने सोच रखा था कि 2500 मीटर से ऊपर ही कहीं जाना है। मई-जून में घूमने के लिए सर्वोत्तम स्थान 2500 मीटर से ऊपर ही होते हैं। और इसमें चकराता के आगे वह स्थान एकदम फिट बैठता है, जहाँ से त्यूनी की उतराई शुरू हो जाती है। इस स्थान का नाम हमें नहीं पता था, लेकिन गूगल मैप पर देवबन लिखा था, तो हम इसे भी देवबन ही कहने लगे। इसके पास ही 2700 मीटर की ऊँचाई पर एक बुग्याल है और इस बुग्याल के पास एक गुफा भी है - बुधेर गुफा। बस, यही हमें देखना था।
उधर इंदौर से सुमित शर्मा अपनी बुलेट पर चल दिया था। वह 5 जून की शाम को चला और अगले दिन दोपहर बाद दिल्ली पहुँचा। पूरा राजस्थान उसने अंधेरे में पार किया, क्योंकि लगातार धूलभरी आँधी चल रही थी और वह दिन में इसका सामना नहीं करना चाहता था। लेकिन उसे क्या पता था कि इन आँधियों ने दिल्ली का भी रास्ता देख रखा है। दिल्ली पूरी तरह इनसे त्रस्त थी।
जब मैं ऑफिस से लौटा तो सुमित बेसुध पड़ा सो रहा था। एक टांग दीवार पर इस तरह टिकी थी कि अगर वह जगा होता तो कोशिश करने पर भी इस स्टाइल में नहीं लेट सकता था। उसे रात मैंने सलाह भी दी थी कि चित्तौड़गढ़, अजमेर या जयपुर कहीं भी वातानुकूलित कमरा लेकर आठ-दस घंटे की नींद लेकर ही आगे बढ़ना, लेकिन उसने वही पिटा-पिटाया जवाब दोहरा दिया - “घुमक्कड़ी कम खर्चे में करनी चाहिए।”
“लेकिन मोटरसाइकिल चलाते समय कभी भी नींद से समझौता नहीं करना चाहिए। यह जीवन-मरण का सवाल है।”

Monday, July 30, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर” - काजीरंगा नेशनल पार्क

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17 नवंबर 2017
चाउमीन खाकर हम कोहोरा फोरेस्ट ऑफिस के बाहर बैठकर काजीरंगा और कर्बी आंगलोंग के बारे में तमाम तरह की सूचनाएँ पढ़ने में व्यस्त थे, तभी तीन आदमी और आए। यात्री ही लग रहे थे। आते ही पूछा – “क्या आप लोग भी काजीरंगा जाओगे?”
मैंने रूखा-सूखा-सा जवाब दिया – “हाँ, जाएँगे।”
बोले – “हम भी जाएँगे।”
मैंने जेब से मोबाइल निकाला और इस पर नजरें गड़ाकर कहा – “हाँ, ठीक है। जाओ। जाना चाहिए।”
बोले – “तो एक काम करते हैं। हम भी तीन और आप भी तीन। मिलकर एक ही सफारी बुक कर लेते हैं। पैसे बच जाएँगे।”
और जैसे ही सुनाई पड़ा “पैसे बच जाएँगे”; तुरंत मोबाइल जेब में रखा और सारा रूखा-सूखा-पन त्यागकर सम्मान की मुद्रा में आ गया – “अरे वाह सर, यह तो बहुत बढ़िया बात रहेगी। मजा आ जाएगा। आप लोग कहाँ से आए हैं?”
“इंदौर, मध्य प्रदेश से।”

Thursday, July 26, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर” - माजुली से काजीरंगा की यात्रा

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17 नवंबर 2017
आज शाम तक हमें गुवाहाटी पहुँचना है। कल हमारी दिल्ली की फ्लाइट है। बीच में काजीरंगा नेशनल पार्क पड़ेगा। देखते हुए चलेंगे। उधर ब्रह्मपुत्र पार करके कुछ ही दूर गोलाघाट में एक मित्र कपिल चौधरी रेलवे में नौकरी करते हैं। कल ही वे उत्तराखंड से घूमकर आए थे। आज जैसे ही उन्हें पता चला कि हम माजुली में हैं और काजीरंगा देखते हुए जाएँगे तो हमारे साथ ही काजीरंगा घूमने का निश्चय कर लिया। तो हम इधर से चल पड़े, वे उधर से चल पड़े।
फिर से ब्रह्मपुत्र नाव से पार करनी पड़ेगी। कमलाबाड़ी घाट। बड़ी चहल-पहल थी। ढाबे वाले झाडू वगैरा लगा रहे थे। पहली नाव सात बजे चलेगी। वह पहले उधर से आएगी, तब इधर से जाएगी। समय-सारणी लगी थी। ज्यादातर लोग दैनिक यात्री लग रहे थे। कोई चाय पी रहा था, कोई आराम से बे-खबर बैठा था। बहुत सारी मोटरसाइकिलें भी उधर जाने वाली थीं।
जैसे ही उधर से नाव आई और मोटरसाइकिलों का रेला नाव पर चढ़ने लगा तो हमें लगने लगा कि कहीं जगह कम न पड़ जाए और हमारी मोटरसाइकिल यहीं न छूट जाए। लेकिन नाववालों का प्रबंधन देखकर दाँतों तले उंगली दबानी पड़ गई। पचास-साठ मोटरसाइकिलें तो नाव की छत पर ही आ गईं। छत पर ऐसा इंतजाम किया गया था कि मोटरसाइकिलें फिसलकर ब्रह्मपुत्र में न गिर पड़ें। और जब नाव चलने लगी तो इसमें मोटरसाइकिलों के अलावा चार गाड़ियाँ, ढेरों साइकिलें, नीचे यात्री, ऊपर छत पर भी यात्री और मोटरसाइकिलों पर भी यात्री। और किराया नाम-मात्र का – बीस-पच्चीस रुपये।

Monday, July 23, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर” - बोगीबील पुल और माजुली तक की यात्रा

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16 नवंबर 2017
डिब्रुगढ़ से बोगीबील का रास्ता इतना सुनसान था कि हमें एक स्थानीय से पूछना पड़ा। लेकिन जब ब्रह्मपुत्र के किनारे पहुँचे, तो ब्रह्मपुत्र की विशालता और इस पर बन रहे पुल को देखकर आश्चर्यचकित रह गए। यहाँ आने का एक उद्देश्य यह पुल देखना भी था। 2002 में यह पुल बनना शुरू हुआ था, लेकिन अभी तक भी पूरा नहीं हुआ है। फिलहाल पूरे पूर्वोत्तर में सड़क और रेल बनाने का काम जोर-शोर से चल रहा है, तो उम्मीद है कि एक साल के भीतर यह पुल भी चालू हो जाएगा। चालू होने के बाद लगभग 5 किलोमीटर लंबा यह पुल देश में सबसे लंबा सड़क-सह-रेल पुल होगा। इधर डिब्रुगढ़ और उधर धेमाजी रेल मार्ग से जुड़ जाएँगे। पुल के दोनों किनारों तक रेल की पटरियाँ बिछ चुकी हैं, स्टेशन भी तैयार हो चुके हैं और पुल निर्माण की सारी सामग्री रेल के माध्यम से ही आती है। पुल बनते ही इस पर ट्रेन चलने में कोई समय नहीं लगेगा।
“घाट किधर है?”
“उधर।”

Thursday, July 19, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर” - ढोला-सदिया पुल - 9 किलोमीटर लंबा पुल

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15 नवंबर 2017
सदिया शहर पहले सूतिया राज्य की राजधानी था। यह लोहित और दिबांग के संगम पर बसा हुआ था। एक बार भयानक बाढ़ आई और पूरा शहर समाप्‍त हो गया। उस पुराने शहर के अवशेष अब कहीं नहीं मिलते। या शायद कहीं एकाध अवशेष बचे हों। लेकिन इस स्थान को अभी भी सदिया ही कहते हैं। असम का यही छोटा-सा इलाका है, जो लोहित के उत्‍तर में स्थित है। एक तरफ लोहित और एक तरफ दिबांग व सियांग नदियाँ। बाकी तरफ अरुणाचल, जहाँ के लिए असम वालों को भी इनर लाइन परमिट लेना होता है। इनर लाइन परमिट के लिए भी लोहित पार करके डिब्रुगढ़ जाना पड़ता था। कुल मिलाकर असम के इस क्षेत्र के लोग इस छोटे-से इलाके में ‘बंद’ थे। बरसात में बाढ़ आने पर और भी बंद हो जाते होंगे।
लेकिन अब यहाँ 9 किलोमीटर से भी लंबा पुल बन गया है। भारत का सबसे लंबा सड़क पुल। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका उद्‍घाटन किया था। सदिया और सदिया के परे अरुणाचल देखने की उतनी इच्छा नहीं थी, जितनी इस पुल को देखने और इस पर मोटरसाइकिल चलाने की थी। आज वो इच्छा पूरी हो रही थी।