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फूलों की घाटी

16 जुलाई 2017
आज का दिन तो बड़ा ही शानदार रहा। कैसे शानदार रहा? बताऊंगा धीरे-धीरे। बताता-बताता ही बताऊंगा।
रात 2 बजे आँख खुली। बाहर बूंदों की आवाज़ आ रही थी। बारिश हो रही थी। सोचा कि सुबह तक मौसम अच्छा हो जाएगा। सो गया। फिर 6 बजे आँख खुली। बारिश अभी भी हो रही थी। उठकर दरवाजा खोलकर देखा। बादल और रिमझिम बारिश। इसके बावजूद भी यात्रियों का आना-जाना। कुछ यात्री नीचे गोविंदघाट भी जा रहे थे और कुछ ऊपर हेमकुंड भी जाने वाले थे। हमें किसी भी तरह की जल्दी नही थी। कल ही सोच लिया था कि बारिश में कहीं भी नही जाएंगे। न फूलों की घाटी और न गोविंदघाट। वापस दरवाजा लगाया और सो गया।
आठ बजे आँख खुली। उतनी ही बारिश थी, जितनी दो घंटे पहले थी। लेकिन इस बार मैं नीचे चला गया और एक बाल्टी गर्म पानी को कह आया। साथ ही यह भी कह दिया कि आज भी हम यहीं रुकेंगे। होटल मालिक बड़ी ही विचित्र प्रकृति का है। आप कुछ भी कहें, वह आपका उत्साह ही बढ़ाएगा। मसलन आप बारिश में हेमकुंड जाना चाह रहे हैं, वह आपको जाने को कहेगा। और बारिश की वजह से नहीं जाना चाह रहे हैं, तो आपसे रुक जाने को कह देगा। तो मुझसे भी उसने कह दिया कि बारिश में नहीं जाना चाहिए।




नहाने के बाद फिर से रज़ाई में घुस जाने के अलावा कोई चारा नहीं था। गहरी नींद तो नहीं आयी। और आप जानते ही हैं कि हल्की नींद में जो सपने आते हैं, वे उठने के बाद भी याद रहते हैं। तो मुझे भी सपना आया और याद रह गया। किसी विदेशी जासूसी फ़िल्म जैसा सपना था। एक कुत्ते को एक लड़की से प्यार हो गया। वह लड़की आती-जाती उसे प्यार से पुचकार देती थी, लेकिन कुत्ता सीरियस हो गया। इत्तेफाक से वो कुत्ता बड़ा प्रभावशाली था और पुलिस भी उसका कहा मानती थी। जिस कालोनी में लड़की अपने माता-पिता के साथ रहती थी, उससे बाहर निकलने का एक ही द्वार था, जिस पर कुत्ते के स्वामिभक्त चौकीदार और पुलिसवाले ड्यूटी देते थे।
तो इतने प्रभावशाली कुत्ते को लड़की से प्यार हो गया और अब वो शादी का दबाव डालने लगा। लड़की के घरवाले परेशान। अब इनमे मैं पता नहीं कहाँ से टपक पड़ा। दोनों के बीच सुलह करवाने की कोशिश की - “देख भाई, तू है कुत्ता। तू कितने भी जतन कर ले, तेरी और लड़की की शादी नहीं हो सकती। इसलिए बेहतर है कि ज़िद छोड़ दे। तू भी खुश रह और उन्हें भी खुश रहने दे।” लेकिन वो नहीं माना। मैं लड़की के घर पहुँचा और कहा कि अब तो एक ही चारा है। यह कालोनी छोड़ दो। मैं ट्रक लाया हूँ। सारा सामान उसमे डालकर कालोनी से बाहर निकल पड़ो। उन्होंने ऐसा ही किया। इसकी भनक कुत्ते को मिल गयी। द्वार पर पहरा बढ़ा दिया। अब सामान से भरा वो ट्रक एक सूटकेस में बदल गया। मैने सूटकेस उठाया और उस परिवार को कुछ सुझाव देता हुआ मुख्य द्वार की ओर चल दिया। कुत्ते को सब पता था। वो जानता था कि इसी सूटकेस में सबकुछ है। यह सूटकेस कालोनी से बाहर नहीं निकलना चाहिए। लेकिन मैं उसे बाहर निकालने में कामयाब रहा। कुत्ते ने पुलिस पीछे लगा दी। मैं एक बस अड्डे पर पहुँचा और भीड़ में बस में बैठे एक यात्री का वैसा ही सूटकेस उठाकर बाहर निकल आया। अपना सूटकेस बस में ही छोड़ दिया। अब तक वो परिवार भी बस अड्डे पर आ चुका था। मैंने इशारों में उन्हें उसी बस में चढ़ जाने को कह दिया। पुलिस मेरे पीछे भागती रही और मैं नकली सूटकेस लेकर उन्हें उलझाए रहा। जब बस चल पड़ी, तो मैंने पुलिस के सामने हार मानने का अभिनय किया। पुलिस उस सूटकेस को लेकर कुत्ते के पास चली गयी। मैं दौड़कर बस में चढ़ गया।
लेकिन नकली सूटकेस की सच्चाई कुत्ते को पता चलनी ही थी। बस एक नहर के पास से गुजर रही थी तो किसी ने आकर कहा कि बस से उतर जाओ। कुत्ते के आदमी पीछा कर रहे हैं। हम चारों फटाक से बस से उतरकर नहर के किनारे झाड़ियों में छुप गए। उन आदमियों को इस बात का पता चल गया। उन्होंने झाड़ियों में गोलियाँ भी चलायीं, लेकिन किसी को लगी नहीं। वे वापस चले गए।
बड़ी देर तक हम सभी वहीं बैठे रहे। फिर एक बूढ़ा आदमी आया। उसने लड़की की माँ को एक काला चश्मा दिया और बताया कि इसे हमेशा लगाए रखना। इससे तुम्हें यह पता चल जाया करेगा कि कुत्ते के आदमी आपके आसपास कितने घंटों बाद आएंगे। किसी स्थान पर कुत्ते के आदमी हैं या नहीं; कितनी देर बाद आएंगे और कितनी देर पहले वे यहाँ थे; सब तुम्हें पता चल जाएगा। फिर हम चारों को अपने ट्रक में बैठाकर चल दिया। बताने लगा कि फलां स्थान पर उसके मित्र का फार्म हाउस है। बहुत बड़ा है। वहाँ तुम्हे काम भी मिल जाएगा और ठिकाना भी। लेकिन जब सभी फार्म हाउस के पास पहुंचे तो महिला ने यह कहकर चौंका दिया कि कुत्ते के आदमी दो घंटे बाद यहाँ आने वाले हैं। इससे पहले कि इस नई समस्या का समाधान होता, मेरी आँख खुल गयी।
...
11 बजे थे और अब बारिश की आवाज़ नही आ रही थी। दीप्ति को जगाया। सपना सुनाया। उसने कहा - “जल्दी से फिर सो जा। फिर क्या हुआ, उठने के बाद ज़रूर बताना।” मैने बात मोड़ दी - “कुछ खा-पी आते हैं। बता, क्या खाएगी।” बिस्तर पर पड़े-पड़े खाने के बारे में एक राय नहीं बनी तो ऐसे ही बाजार में घूम आने की तय हो गयी। लेकिन जैसे ही दरवाजा खोलकर बाहर देखा, मैं खुशी से चिल्ला उठा - “ओये, फूलों की घाटी चलते हैं। मौसम साफ है।”
अगले कुछ सेकंडों में बैग में रेनकोट रख लिये, पानी की बोतल रख ली, बिस्कुट का पैकेट रख लिया, जैकेट रख ली और दरवाजा बंद करके ताला भी मार दिया। आलू के एक-एक पराँठे खाकर बारह बजे फूलों की घाटी की ओर चल दिये। खच्चर घोड़े वाले हमें हेमकुंड तक ले जाने के ऑफर दे रहे थे। होटल वाले सस्ते कमरों का लालच दे रहे थे। हालाँकि हम जानते थे कि सस्ते कमरे 500 रुपये से शुरू होते हैं और हम 400 वाले में ठहरे थे।
आसमान में बहुत ज्यादा बादल नही थे और धूप भी निकली थी, जब हम सवा बारह बजे चेकपोस्ट पर पहुँचे। चूँकि फूलों की घाटी एक नेशनल पार्क भी है और विश्व विरासत स्थल भी। इसलिए चेकपोस्ट होनी ही थी। चौकीदार ने मना कर दिया - “बारह बजे के बाद यहाँ एंट्री नहीं होती।”
“लेकिन भाई जी, सुबह से बारिश हो रही थी। बारिश में कैसे हम एंट्री करते? अब मौसम साफ हुआ है तो हम चले आये।”
“नही जी, नियम है कि बारह बजे के बाद एंट्री नही होनी। आपको सुबह सात बजे ही आ जाना चाहिए था। पाँच बजे तक आपको पार्क से बाहर निकल ही जाना है। इसलिए इस थोड़े से समय मे आप क्या देख लोगे?”
“उसकी चिंता आप मत करो। आप हमें एंट्री करने दो। पाँच बजे से पहले हम बाहर निकल जाएंगे। अभी मौसम साफ है। साफ मौसम में हमें फूलों की घाटी देखने दो।”
“नहीं भाई जी, आप नही जानते। यहाँ का मौसम सेकंडों और मिनटों में बदला करता है। अभी धूप है। क्या पता दो मिनट बाद ही बारिश हो जाये। और आगे रास्ता इतना खतरनाक है कि आप संभल ही नही पाओगे।”
“दो मिनट छोड़िए। मैं जानता हूँ और आप भी जानते हैं कि अगले पाँच घंटों तक बारिश नहीं होने वाली। हम दोनों नियमित और अनुभवी ट्रैकर्स हैं। एवरेस्ट तक जा चुके हैं। कौन-से रास्ते खतरनाक होते हैं और कौन-से खतरनाक नही होते, हम अच्छी तरह जानते हैं। और फूलों की घाटी का यह रास्ता तो खतरनाक नही है।”
“अच्छा तो ठीक है। आप इतनी रिक्वेस्ट कर रहे हैं तो आपको जाने देता हूँ। लेकिन 3 बजे आप वापस मुड़ जाना और 5 बजे तक यहाँ लौट आना।”
एवरेस्ट बड़े काम आती है ऐसे मामलों में।
150-150 रुपये प्रवेश शुल्क लगा। 500 रुपये कूड़ा न फैलाने की सुरक्षा राशि ली। बैग में प्लास्टिक का कितना सामान है, उसकी गिनती की और जाने दिया। हमने भी उन्हें बड़े धन्यवाद दिए।
हमारे पास 5 घंटे थे। एक घंटा तो ऊपर चढ़ने में लगेगा, दो घंटे तक घाटी में जितनी अंदर तक जा सकते हैं, जाएंगे और बाकी दो घंटे लौटने में लगाएंगे।
हमारे साथ एक नेपाली भी चल रहा था। उसके पास बास्केट थी। मतलब कंडी। पार्क में कोई यदि चलने में असमर्थ होगा, तो उसे ले आएगा। “मेरी भी 150 रुपये की पर्ची कटी है। यह मेरे लिए एक सट्टा है। कोई यात्री मिल गया तो वसूल हो जाएंगे। और यदि कोई नही मिला तो 150 रुपये अपनी जेब से जाएंगे।” नेपाली ने कहा। गौरतलब है कि पार्क में घोड़े खच्चर प्रतिबंधित हैं।




घांघरिया 3100 मीटर पर है और फूलों की घाटी 3500 मीटर से शुरू होती है। इसलिए आपको पहले 400 मीटर चढ़ना पड़ता है। यह चढ़ाई बड़ी ही तेज है और आपका दम निकाल देती है। लेकिन जैसे-जैसे ऊपर चढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे घाटी की खूबसूरती सामने आती जाती है।
पार्क में प्रवेश करते ही एक मानचित्र लगा था। मैं इसे देखने लगा। यह देखकर हैरान हुआ कि पार्क के भीतर से एक रास्ता हनुमान चट्टी भी जाता है। हनुमान चट्टी जोशीमठ-बद्रीनाथ मार्ग पर है। बीच में 4400 मीटर ऊँचा बामनधुरा दर्रा पार करना पड़ेगा। और गूगल मैप के टैरेन मोड़ में देखने पर यह ज्यादा खतरनाक भी नहीं लग रहा। 1980 में इसे नेशनल पार्क बनाने के बाद यहाँ भेड-बकरियाँ चराने पर प्रतिबंध लगा दिया। उससे पहले बामनधुरा के रास्ते ही गड़रिये राशन-पानी लाने सड़क मार्ग तक आया करते होंगे। लेकिन अब कोई नहीं जाता। पार्क में प्रवेश करते समय आपका नाम लिखा जाता है और आपको शाम तक हर हाल में उसी मार्ग से बाहर भी निकलना होता है। तो इसका अर्थ हुआ कि यदि आपको फूलों की घाटी से हनुमानचट्टी जाना है तो किसी वन अधिकारी से अनुमति लानी पड़ेगी। शायद जोशीमठ से या शायद देहरादून से।
हमारा तो कोई वन अधिकारी मित्र भी नहीं है, अन्यथा बामनधुरा पार करने का बड़ा मन है। और यदि ऐसे ही कभी किसी अधिकारी के कार्यालय में चले गये तो नौकरशाही हमें चौदह चक्कर कटवाकर खाली हाथ वापस भेज देगी।
3500 मीटर से घाटी शुरू होती है, तो आपको लगभग 400 मीटर ऊपर चढ़ना होता है। यह रास्ता जंगल का है। 3500 मीटर पहुँचने के बाद ही जंगल समाप्त होता है और बुग्याल क्षेत्र आरंभ होता है। तो इस जंगल में भोजपत्र भी बहुतायत में है।
पुष्पावती नदी घाटी के बीचोंबीच से होकर बहती है। असल में यह पुष्पावती घाटी ही है। 1931 में अंग्रेज पर्वतारोही फ्रैंक स्मिथ ने इस स्थान की यात्रा की थी और लौटकर ‘फूलों की घाटी’ नामक पुस्तक लिखी थी। तभी से पुष्पावती घाटी का नाम फूलों की घाटी पड़ गया। घाटी उत्तर में 5500 से 6000 मीटर ऊँचे पर्वतों से घिरी है। पूर्व में 8-10 किलोमीटर चलने पर एक ग्लेशियर है, जहाँ से पुष्पावती निकलती है। और दक्षिण में एक धार है, जो घाटी को हेमकुंड़ साहिब से अलग करती है। फूलों की घाटी में खड़े होकर अगर इस धार की ओर देखें तो लगता है कि हेमकुंड़ जाने के लिये यह रास्ता वर्तमान प्रचलित रास्ते से ज्यादा सुगम है। हालाँकि कोई रास्ता नहीं है, लेकिन पहाड़ का ढाल काफी कम है। दीप्ति ने तो शर्त भी लगा ली कि गुरू गोविंद सिंह जी फूलों की घाटी से होकर ही हेमकुंड़ गये होंगे।
मैं कल्पना करने लगा कि 1980 से पहले यहाँ भेड़-बकरियाँ चरा करती होंगी। यह पूरी घाटी गुलज़ार रहा करती होगी। भेड़ें-बकरियाँ में-में करती रहती होंगी। भूटिया कुत्ते इनकी तेंदुओं से रखवाली करते होंगे। गड़रियों की झौंपड़ियाँ रहा करती होंगी। लेकिन ‘भेड़ें फूलों को कुचल देती हैं’ कहकर इन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। वैसे भी जहाँ भी कहीं नेशनल पार्क बनता है, सबसे पहले चरागाहों पर रोक लगायी जाती है। जो कि निहायत गलत प्रवृत्ति है।
एक बात बताता चलूँ कि भेड़ें जितने फूलों को कुचलती हैं, इनके कारण उससे ज्यादा फूल पैदा भी होते हैं। भ्यूंडार और पुलना के बूढ़े बताते हैं कि 1980 के बाद फूलों की घाटी में फूलों की पैदावार बहुत ज्यादा घट गयी है। पहले भेड़ों के कारण हर फूल का परागण होता था, जबकि अब केवल हवा और कीटों के द्वारा ही परागण होता है। प्रतिबंध लगाने के बाद भेडे न होने से कीट भी कम हो गये हैं, तो घाटी में परागण की समस्या बनी हुई है। एक समय ऐसा आयेगा, जब फूलों की घाटी में फूल नहीं होंगे।
इसे नियंत्रित चरागाह बनाया जा सकता था।
“तो अब भेड़ों को कहाँ चराते हो?”
“काकभुशुंडी ताल की तरफ।”
...
लेकिन फूलों की घाटी बड़ी खूबसूरत जगह है। हिमालय में और भी घाटियाँ हैं, जहाँ खूब फूल होते हैं। लेकिन इसकी बात ही अलग है। हिमालय में और भी बहुत सारे बुग्याल हैं, लेकिन यह एक अलग ही तरह का बुग्याल है। बाकी बुग्याल पहाड़ की धार के ऊपर स्थित होते हैं, यह नीचे घाटी में स्थित है। बामनधुरा से जो जलधारा आती है, उसे पार करते ही असली फूलों की घाटी आरंभ हो जाती है। यहाँ एक गुफा भी है, जो बारिश में यात्रियों के काम आती है। पत्थरों पर किसी ने लिख भी रखा है - फूलों की घाटी प्रारंभ। असली घाटी यहीं से आरंभ होती है। बड़ी दूर तक सीधी सपाट घाटी है इसके बाद। 8-10 किलोमीटर तक। पगडंडी बनी है। चलते जाओ, चलते जाओ।
लेकिन हम ज्यादा दूर नहीं जा सके। तीन बजे जहाँ भी थे, वापस मुड़ लिये। सुबह ही आना चाहिये था। 150 रुपये में तीन दिनों की पर्ची बनती है। तीन दिनों तक आते रहना चाहिये। लेकिन शुरू में ही 400 मीटर की चढ़ाई भारी पड़ती है। अगली बार आख़िर तक जायेंगे। और हो सका तो बामनधुरा पार करके हनुमानचट्टी भी।
वापस मुड़ गये। बहुत सारे फूल खिले थे। और बहुत सारे अभी खिले भी नहीं थे। ये पंद्रह दिन बाद खिलेंगे। इसका अर्थ है कि हम पंद्रह दिन पहले आ गये। ब्रह्मकमल भी नहीं खिला था अभी। वैसे हमें मिला भी नहीं। ज्यादा ऊँचाईयों पर होता है। ‘ब्लू पॉपी’ खूब मिला। दीप्ति को कई फूलों की पहचान है। उसने मुझे ब्लू पॉपी की भी पहचान करा दी।
ऐसा लगा जैसे पूरी घाटी में हम ही रह गये हों। कोई भी नहीं दिख रहा। पीछे दूर-दूर तक भी कोई नहीं। धीरे-धीरे चलते हुए उतरने लगे। बादल आ गये और बूँदें भी पड़ गयीं। पुष्पावती पुल के पास नदी भयानक गर्जना करती है।
ठीक पाँच बजकर पाँच मिनट पर हम पार्क के द्वार पर थे। द्वारपाल ने बताया - “अभी भी एक विदेशी आदमी पार्क में है। जब तक वो नही आ जाता, हम यहीं रहँगे। लेकिन विदेशियों की दो बातें खास हैं - एक तो वे समय पर लौटते हैं और दूसरे, वे कूड़ा नही फैलाते। भारतीय इन दोनों बातों का ध्यान नही रखते।”
मन में आया मुँह छुपा लूँ कहीं। बात एकदम ठीक कही थी उसने। लोगों की आदत में कूड़ा फेंकना इस कदर समा गया है कि कूड़ा फेंकते समय उन्हें पता ही नहीं चलता कि गंदगी कर दी। पानी और कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलें तो बड़े आइटम हैं, कुछ लोग इन्हें फेंकने से बचने भी लगे हैं; लेकिन टॉफी-चॉकलेट के रैपर, सिगरेट की डिब्बियाँ आदि को शान से सिर ऊँचा करके फेंका जाता है।... नहीं, दूसरों को देखने की आवश्यकता नहीं है। आप स्वयं को ही देखिये। अरे नहीं, हमें मत देखिये। ट्रैकिंग के बाद दिल्ली आते हैं तो हमारे बैगों की जेबों में टॉफियों के रैपर भरे मिलते हैं।
हम तो फूलों की घाटी में पड़ी एक बोतल उठा लाये थे। उसके कई फायदे होते हैं - नंबर एक; प्रवेश करते समय आपके पास प्लास्टिक का कितना सामान है, इसकी गिनती होती है और सुरक्षा राशि भी जमा होती है। तो अगर भूलचूक से कोई सामान खो जाये, पहाड़ से गिर जाये या हवा में उड़ जाये तो सुरक्षा राशि का नुकसान न हो, इसलिये थोड़ा कूड़ा उठा लाना समझदारी कहलाता है। इसे स्वार्थयुक्त समझदारी कहते हैं। नंबर दो; सफाई हो जाती है। दस लोग अगर प्लास्टिक के दस टुकड़े भी लायेंगे तो हिमालय का भला होगा। और इन दस लोगों की ट्रेनिंग भी हो जायेगी कि कबाड़ फेंकना नहीं है। ये कागजी बातें हैं, ऐसा कभी होता नहीं है। नंबर तीन; ये बातें वापस लौटकर फेसबुक पर, ब्लॉग पर वाहवाही बटोरने के काम आती हैं; जैसा कि इस समय मैं कर रहा हूँ।
और आख़िर में; लौटकर उसी होटल में पनीर डोसे खाये, जिसमें कल खाये थे। एक-एक गिलास दूध भी मारा और एक-एक गुलाब जामुन भी।


सुबह के समय घांघरिया में बारिश

रास्ता फूलों की घाटी का


भोजपत्र











ब्लू पॉपी

नेपाली नागरिक व पॉर्टर


















1. चलो फूलों की घाटी!
2. कार्तिक स्वामी मंदिर
3. गोविंदघाट से घांघरिया ट्रैकिंग
4. यात्रा श्री हेमकुंड साहिब की
5. फूलों की घाटी
6. फूलों की घाटी के कुछ फोटो व जानकारी
7. फूलों की घाटी से वापसी और प्रेम फ़कीरा
8. ऋषिकेश से दिल्ली काँवड़ियों के साथ-साथ




Comments

  1. बड़े अजीब सपने देखते हो...
    कहानी गोलमाल फ़िल्म के डायरेक्टर को भी बताई जा सकती है...
    ����

    ��������

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  2. फूलोंकी घाटी में फुल कम मिले

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 32वीं पुण्यतिथि - संजीव कुमार - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  4. aap ke hisaab se kin dates mein jana sab se badiya rahega jo sare phool khile mil jaye??

    Photo bhut kam hain phoolo ki ghati k agr or hain to upload kar dijiye... hum jeso ko darshan karne ka mauka mil jayega aap k photo ke duawara

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  5. Mai June me Gaya tha
    Par phool nahi mile the. Sachmuch swarg Hai ye jagah

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  6. Today saw you in dainik jagran.as a nature lover aged 67 only, you are one of the best blogger for me.
    Alas I would have knownyou about 20/30 years back.

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  7. Sir Aap bahot acha likhte he maine aapke sare blog padhe he
    Sir aap ko train ke naye rut par ghumna bhi aacha lagta hai to aap jab kabhi Maharashtra mai aaye to milna jarur

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  8. Sir mein aapke sabhi blog padhe he
    Aap aacha likhte he
    Kabhi Maharashtra mai aaye to milna jarur

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  9. Sir mein aapke sabhi blog padhe he
    Aap aacha likhte he
    Kabhi Maharashtra mai aaye to milna jarur

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46 रेलवे स्टेशन हैं दिल्ली में

एक बार मैं गोरखपुर से लखनऊ जा रहा था। ट्रेन थी वैशाली एक्सप्रेस, जनरल डिब्बा। जाहिर है कि ज्यादातर यात्री बिहारी ही थे। उतनी भीड नहीं थी, जितनी अक्सर होती है। मैं ऊपर वाली बर्थ पर बैठ गया। नीचे कुछ यात्री बैठे थे जो दिल्ली जा रहे थे। ये लोग मजदूर थे और दिल्ली एयरपोर्ट के आसपास काम करते थे। इनके साथ कुछ ऐसे भी थे, जो दिल्ली जाकर मजदूर कम्पनी में नये नये भर्ती होने वाले थे। तभी एक ने पूछा कि दिल्ली में कितने रेलवे स्टेशन हैं। दूसरे ने कहा कि एक। तीसरा बोला कि नहीं, तीन हैं, नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली और निजामुद्दीन। तभी चौथे की आवाज आई कि सराय रोहिल्ला भी तो है। यह बात करीब चार साढे चार साल पुरानी है, उस समय आनन्द विहार की पहचान नहीं थी। आनन्द विहार टर्मिनल तो बाद में बना। उनकी गिनती किसी तरह पांच तक पहुंच गई। इस गिनती को मैं आगे बढा सकता था लेकिन आदतन चुप रहा।

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इन पुस्तकों का परिचय यह है कि इन्हें जिम कार्बेट ने लिखा है। और जिम कार्बेट का परिचय देने की अक्ल मुझमें नहीं। उनकी तारीफ करने में मैं असमर्थ हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि उनकी तारीफ करने में कहीं कोई भूल-चूक न हो जाए। जो भी शब्द उनके लिये प्रयुक्त करूंगा, वे अपर्याप्त होंगे। बस, यह समझ लीजिए कि लिखते समय वे आपके सामने अपना कलेजा निकालकर रख देते हैं। आप उनका लेखन नहीं, सीधे हृदय पढ़ते हैं। लेखन में तो भूल-चूक हो जाती है, हृदय में कोई भूल-चूक नहीं हो सकती। आप उनकी किताबें पढ़िए। कोई भी किताब। वे बचपन से ही जंगलों में रहे हैं। आदमी से ज्यादा जानवरों को जानते थे। उनकी भाषा-बोली समझते थे। कोई जानवर या पक्षी बोल रहा है तो क्या कह रहा है, चल रहा है तो क्या कह रहा है; वे सब समझते थे। वे नरभक्षी तेंदुए से आतंकित जंगल में खुले में एक पेड़ के नीचे सो जाते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि इस पेड़ पर लंगूर हैं और जब तक लंगूर चुप रहेंगे, इसका अर्थ होगा कि तेंदुआ आसपास कहीं नहीं है। कभी वे जंगल में भैंसों के एक खुले बाड़े में भैंसों के बीच में ही सो जाते, कि अगर नरभक्षी आएगा तो भैंसे अपने-आप जगा देंगी।