Monday, February 27, 2017

अंडमान यात्रा - दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर वाया कोलकाता

संक्षेप में इस यात्रा को लिखेंगे। काम का बहुत दबाव है और समय की भारी कमी।
प्रत्येक सरकारी कर्मचारी को देश घूमने के लिये सरकार खर्चा देती है। इसे एल.टी.सी. कहते हैं। इसे लेने के इतने सारे नियम होते हैं कि किसी के लिये सभी नियम याद रख पाना संभव नहीं होता। फिर कुछ नियम ऐसे भी हैं जो समय-समय पर बदलते रहते हैं या आगे कुछ समय के लिये विस्तारित होते रहते हैं। मैं एल.टी.सी. के नियम ज्यादा नहीं जानता। वैसे भी चार साल में एक बार या दो बार इस सुविधा का लाभ उठा सकते हैं। अपना चार साल में पचास बार बाहर जाने का काम है। एक बार खर्चा सरकार दे देगी, तो उनचास बार अपनी जेब से ही सब खर्चा करना होता है। तो सरकार द्वारा दी जाने वाली इस सुविधा को मैं अक्सर भूल जाता हूँ।
एल.टी.सी. का एक मास्टर सर्कुलर है अपने यहाँ। मैंने इसे ही पढ़ लिया और इसी के अनुसार टिकट बुकिंग कर ली। यह सर्कुलर कहता है कि अंडमान जाने के लिये आपको दिल्ली से पहले कोलकाता ट्रेन से जाना पड़ेगा और उसके बाद हवाई जहाज से। बाद में ... वापस लौटकर पता चला कि एक अस्थायी नियम भी चल रहा है जिसके अनुसार हम दिल्ली से सीधे पोर्ट ब्लेयर की फ्लाइट भी ले सकते हैं। लेकिन पहले मुझे इस नियम का पता नहीं था, इसलिये कोलकाता तक ट्रेन में बर्थ बुक कर ली और उसके बाद फ्लाइट।

Thursday, February 23, 2017

उमेश पांडेय की चोपता तुंगनाथ यात्रा - भाग दो

तीसरा दिन:
अपने अलार्म के कारण हम सुबह 5 बजे उठ गए। ठंड़ बहुत थी इसलिए ढाबे वाले से गरम पानी लेकर नहाया। फटाफट तैयार हो कर कमरे से बाहर निकले और ॐ नमः शिवाय बोल कर मंदिर की ओर प्रस्थान किया। यात्रा शुरुआत में तो ज्यादा मुश्किल नहीं थी, पर मेरे लिए थी। इसका कारण था मेरा 90 किलो का भारी शरीर। देबाशीष वैसे तो कोई नशा नहीं करते, पर उन्होंने सिगरेट जलायी। समझ नहीं आ रहा था कि ये सिगरेट पीने के लिए जलायी थी या सिर्फ फोटो के लिए। यात्रा की शुरुआत में घना जंगल है। सुबह 5:30 बजे निकलने के कारण अँधेरा भी था। इसलिए मन में भय था कि किसी भालू जी के दर्शन हो गए तो? पर ऐसा नहीं हुआ।
थोड़ी देर में ही उजाला हो गया। 1 किलोमीटर जाने पर एक चाय की दुकान मिली जिसे एक वृद्ध महिला चला रही थी। वहाँ नाश्ता किया। वहीं एक लाल शरबत की बोतल देखी । पूछने पर पता चला कि यह बुरांश का शरबत है। बुरांश उत्तराखंड़ में पाया जाने वाला फूल है । इसे राजकीय पुष्प का दर्जा भी प्राप्त है। अगर आप मार्च - अप्रैल के महीने में उत्तराखंड़ आये तो बुरांश के लाल फूल बिखरे हुए मिलेंगे।

Monday, February 20, 2017

उमेश पांडेय की चोपता तुंगनाथ यात्रा - भाग एक

मित्र उमेश पांडेय अपनी चोपता तुंगनाथ की यात्रा हम सबके साथ साझा कर रहे हैं। कुछ मामूली करेक्शन के बाद मैंने उनकी संपूर्ण पोस्ट को ज्यों का त्यों प्रकाशित किया है। यह उनका पहला लेख है और अच्छा लिखा है। आप भी आनंद लीजिये।
मानव शुरू से ही घुमक्कड़ प्रजाति का प्राणी रहा है। आदि काल से ही मानव ने नए-नए स्थानों की खोज की है। इन्हीं खोजों के दौरान कई नगरों का निर्माण भी हुआ। उनमे से अधिकांश ने अपने रहने का ठिकाना बना लिया और कुछ आज भी खानाबदोशों की तरह घूम रहे हैं।
मेरी घूमने-फिरने में रुचि हमेशा से ही रही है। हमेशा प्रयास रहता है कि जैसे ही समय मिले किसी स्थान की यात्रा पर निकल जाया जाये। लेकिन कभी छुट्टी तो कभी पैसों की तंगी के कारण कम ही जा पाता हूँ। मई 2016 में चम्बा और टिहरी बांध की यात्रा की थी। उसके बारे में कभी बाद में लिखूँगा।
पिछले एक वर्ष से नीरज जी का ब्लॉग ‘मुसाफिर हूँ यारों’ फॉलो कर रहा हूँ। बहुत अच्छा लिखते हैं। ब्लॉग पर ही इनके यात्रा संस्मरण ‘लद्दाख की पैदल यात्राएँ’ जो कि एक किताब है, के बारे में पता चला और ऑर्डर कर दी। यात्रा के विचार से तो मन घूम ही रहा था, किताब पढ़ते ही घुमक्कड़ी का भूत जाग उठा। 18 सितंबर का दिन था, जब तुंगनाथ यात्रा योजना बना ली और यात्रा का दिन निर्धारित किया 29 सितंबर से 2 अक्टूबर 2016। इन चार दिनों में 2 साप्ताहिक अवकाश, 1 कैजुअल लीव और बाकी का एक दिन हाफ डे।

Thursday, February 16, 2017

बरसूड़ी - एक गढ़वाली गाँव

9 जनवरी, दिन सोमवार, रात नौ बजे के आसपास अचानक पता चला कि बीनू कुकरेती के साथ ललित शर्मा, अजय और धर्मवीर माथुर उसके गाँव बरसूड़ी जा रहे हैं। उस समय मैं नाइट ड्यूटी जाने की तैयारी कर रहा था और नहाने ही वाला था। हालाँकि मुझे बीनू और ललित जी की इस यात्रा का पहले से पता था, लेकिन अब एकदम मेरा भी जाने का मन बन गया। आज नाइट करूँगा, तो कल मंगलवार पूरे दिन फ्री रहूँगा और परसों बुधवार मेरा साप्ताहिक अवकाश रहता है। एक भी छुट्टी नहीं लेनी पड़ेगी।
उधर शिमला समेत पूरे पश्चिमी हिमालय में भारी बर्फ़बारी हो रही थी। ऐसे में हमारा भी शिमला जाने का मन बनने लगा था। लेकिन कुछ ही दिन बाद होने वाली अंडमान यात्रा के मद्देनज़र शिमला जाना रद्द कर दिया। अब जब अचानक दीप्ति से बरसूड़ी चलने के बारे में बताया तो वह खुश हो गयी।
उधर बीनू, ललित जी और माथुर साहब कश्मीरी गेट से कोटद्वार वाली बस में बैठ चुके थे। मोहननगर से अजय भी इसी बस को पकड़ेगा। जब मैंने अजय को फोन किया तो वह निकलने ही वाला था। सुबह कार से चलने के मेरे आग्रह को उसने तुरंत मान लिया और इसकी सूचना बाकियों को भी दे दी।

Monday, February 13, 2017

बाइक यात्रा: रामदेवरा - बीकानेर - राजगढ़ - दिल्ली

21 दिसंबर 2016
हमारी आज की योजना थी कि पहले फलोदी के पास खींचण गाँव जायेंगे और वहाँ प्रवासी पक्षियों को देखेंगे। खींचण के निवासी इन पक्षियों को मेहमान की तरह मानते हैं और उसी तरह इनकी देखभाल करते हैं। उसके बाद रात होने तक बीकानेर पहुँचेंगे और कुलवंत जी के यहाँ रुकेंगे। कल देशनोक में करणी माता का मंदिर देखेंगे, जिसे चूहों का मंदिर भी कहा जाता है। परसों यानी 23 तारीख़ को दिल्ली पहुँचकर ड्यूटी जॉइन कर लूँगा।
लेकिन इस कार्यक्रम में परिवर्तन करना पड़ा। कारण था कि 24 और 25 दिसंबर को झाँसी के पास ओरछा में एक घुमक्कड़ सम्मेलन होना था। इनमें बहुत सारे मेरे मित्र थे और इनमें भी कई तो सपरिवार आने वाले थे। मेरा दिल्ली से झाँसी जाने का आरक्षण नहीं था, लेकिन झाँसी से दिल्ली वापस आने का आरक्षण था और झाँसी में रेलवे विश्राम गृह में एक कमरा भी बुक था। हालाँकि आयोजकों ने ओरछा में भी कमरों की व्यवस्था कर रखी थी, लेकिन ये हमारे बजट से बाहर थे। तो इस तरह मैं 23 की दोपहर तक दिल्ली पहुँचता, लगातार 16 घंटों की ड्यूटी करता और ओरछा के लिये निकल जाता। एक लंबी बाइक यात्रा के तुरंत बाद इतनी लंबी ड्यूटी करना, वो भी रात में, बेहद मुश्किल कार्य है। यही सब सोचकर तय किया कि एक दिन पहले ही दिल्ली पहुँचना ठीक रहेगा। खींचण जाना रद्द कर दिया।

Thursday, February 9, 2017

वुड़ फॉसिल पार्क, आकल, जैसलमेर

20 दिसंबर 2012
हम तनोट में थे। सुबह उठे तो मंदिर में आरती समाप्त होने वाली थी। जाकर एक बार फिर दर्शन किये और प्रसाद लिया। कैंटीन में चाय पी और निकल पड़े - अपने दिल्ली वापसी के सफ़र पर। तनोट से निकलते ही घंटियाली माता का मंदिर है। रेत का ऊँचा धोरा भी है। अच्छी लोकेशन पर है यह मंदिर। इसकी भी देखरेख बी.एस.एफ. ही करती है। इसलिये फोटो लेने पर कोई रोक नहीं।
सड़क दो-लेन की है, बेहद शानदार बनी है। पिछली बार जब मैं साइकिल से आया था, तो यह सिंगल थी और इसे दोहरा बनाने का काम चल रहा था।
रास्ते में रणाऊ गाँव आता है। यह भी रेत के टीलों से घिरा है और इसकी स्थिति भी फोटोग्राफी के लिये शानदार है। कहते हैं कि यहाँ कुछ फिल्मों की भी शूटिंग हो चुकी है।

Monday, February 6, 2017

जैसलमेर से तनोट - एक नये रास्ते से

19 दिसंबर 2016
आज हम यात्रा करेंगे जैसलमेर से तनोट तक, लेकिन परंपरागत रास्ते से नहीं बल्कि निहायत नये और अनछुए रास्ते से।
जैसलमेर-सम रोड़ पर जहाँ से लोद्रवा की सड़क अलग होती है, वहाँ कुछ दूरियाँ लिखी थीं। इनमें प्रमुख था आसूतार 94 किलोमीटर। हमारी योजना इसी सड़क पर आसूतार, घोटारू, लोंगेवाला होते हुए तनोट जाने की थी। मैं सैटेलाइट से पहले ही इस सड़क की स्थिति देख चुका था। यह पूरी सड़क पक्की बनी है। इंटरनेट पर इसका कोई भी यात्रा-वृत्तांत नहीं मिलता।
लोद्रवा से आगे छत्रैल है और फिर कुछड़ी है। कुछड़ी में एक टी-पॉइंट है - बाये सड़क सम जाती है और दाहिने आसूतार। अगर कल हम सम रुकते, तो शायद सीधे इधर ही आते। हम दाहिने मुड़ गये।
थोड़ा आगे हाबुर गाँव है। यहाँ से सीधी सड़क जैसलमेर-तनोट रोड़ में मोकल के पास जाकर मिल जाती है और बायें जाने वाली सड़क आसूतार जाती है। यहाँ से हम भी आसूतार का पीछा करते-करते बायें मुड़ गये।
दो-लेन की यह सड़क सीमा सड़क संगठन ने बनायी है और बेहद शानदार बनी है। राजस्थान के इस सुदूर इलाके में जरा भी यातायात नहीं है। कभी-कभार कोई जीप आ जाती, जिससे स्थानीय निवासी आना-जाना करते हैं। बस कोई नहीं दिखी।

Thursday, February 2, 2017

लोद्रवा - थार में एक जैन तीर्थ


19 दिसंबर 2016
आज ज्यादा कुछ नहीं लिखेंगे। कुछ फोटो हैं, वे देख लेना और थोड़ा-सा लिख भी देता हूँ, इसे पढ़ लेना। काफ़ी रहेगा।
याद तो आपको होगा ही कि कल सुमित सम चला गया था और अपना टैंट लगाकर सोया था। हम दोनों जैसलमेर आ गये थे और एक गंदे-से होटल में अच्छी नींद ली। सुबह सुमित से व्हाट्स-एप पर बातचीत हुई, हमने अपनी लोकेशन उसे शेयर कर दी और कुछ ही देर में दरवाजे पर खटखटाहट हुई। सुमित आ गया था।