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2016 की यात्राओं का लेखा-जोखा

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यह साल बड़ा ही उलट-पुलट भरा रहा। जहाँ एवरेस्ट बेस कैंप जैसी बड़ी और यादगार यात्रा हुई, वहीं मणिमहेश परिक्रमा जैसी हिला देने वाली यात्रा भी हुई। इस वर्ष बाकी वर्षों के मुकाबले ऑफिस से सबसे ज्यादा छुट्टियाँ लीं और संख्यात्मक दृष्टि से सबसे कम यात्राएँ हुईं। केवल नौ बार बाहर जाना हुआ, जिनमें छह बड़ी यात्राएँ थीं और तीन छोटी। बड़ी यात्राएँ मलतब एक सप्ताह या उससे ज्यादा। इस बार न छुटपुट यात्राएँ हुईं और न ही उतनी ट्रेनयात्राएँ। जबकि दो-दिनी, तीन-दिनी छोटी यात्राएँ भी कई बार बड़ी यात्रा से ज्यादा अच्छे फल प्रदान कर जाती हैं।  ज्यादा न लिखते हुए मुख्य विषय पर आते हैं:

चोपता से दिल्ली बाइक यात्रा

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3 नवंबर 2016 सुबह नौ बजे जब मैं कमरे से बाहर निकला और बाइक के पास गया तो होश उड़ गये। इसकी और अन्य बाइकों की सीटों पर पाला जमा हुआ था। मतलब बर्फ़ की एक परत जमी थी। हाथ से नहीं हटी, नाखून से भी नहीं खुरची जा सकी। बमुश्किल लकड़ी व टूटे हुए प्लास्टिक के एक टुकड़े से इसे हटाया। पास में ही कुछ बंगाली ऊपर तुंगनाथ जाने की तैयारी कर रहे थे। आठ-दस साल का एक लड़का मेरे पास आया - ‘क्या यह बर्फ़ है?’ मैंने कहा - ‘हाँ।’ सुनते ही उसने बाकी बच्चों को बुला लिया - इधर आओ सभी, बर्फ़ देखो। मुझे इसी बात का डर था। मैं शाम के समय ही चोपता आना चाहता था और शाम के समय ही यहाँ से जाना चाहता था। कल तुंगनाथ से लौटने में विलंब हो गया था, तो यहीं रुकना पड़ा। अब रास्ते में ब्लैक आइस मिलेगी। मुझे बड़ा डर लगता है ब्लैक आइस से।