Tuesday, December 15, 2015

श्योपुर कलां से ग्वालियर नैरो गेज ट्रेन यात्रा

   ग्वालियर और श्योपुर कलां से बीच 2 फीट गेज की यह रेलवे लाइन 200 किलोमीटर लम्बी है और विश्व की सबसे लम्बी नैरो गेज की लाइन है। लेकिन इसके बनने की कहानी बडी ही दिलचस्प है। ग्वालियर के महाराजा थे माधव राव जी। कहते हैं कि उन्होंने एक बार इंग्लैण्ड से टॉय ट्रेन मंगवाई। राजा थे तो यह टॉय ट्रेन कोई छोटी-मोटी तो होगी नही। बडी बिल्कुल असली ट्रेन थी लेकिन 2 फीट गेज की पटरियों पर चलती थी। इंजन था और छह सात डिब्बे थे। आधे किलोमीटर लम्बी पटरियां भी मंगाई गईं और किले के अन्दर ही बिछा दी गईं। लेकिन दिक्कत ये हो गई कि जब तक इंजन स्पीड पकडता, तब तक पटरियां ही खत्म हो जातीं। तो महाराजा ने और पटरियां मंगाईं और किले में ही करीब दो किलोमीटर लम्बा नेटवर्क बना दिया और अपनी निजी ट्रेन का आनन्द लेने लगे।
   फिर ऐसा हुआ कि यह भी महाराजा को कम लगने लगा। किले में इतनी जगह नहीं थी कि इससे भी ज्यादा पटरियां बिछाई जायें। तय हुआ कि किले से बाहर पटरियां बिछाते हैं। बात किले के अन्दर थी तो अन्दर की बात थी लेकिन बाहर ऐसा करना थोडा मुश्किल था क्योंकि उस समय रेलवे लाइन बिछाना केवल अंग्रेजों का ही कार्य था, भारतीयों का नहीं। अभी तक तो यह महाराजा की ‘टॉय ट्रेन’ थी लेकिन अब इसे ‘रेलवे’ बनना पडेगा। फिर पता नहीं महाराजा ने अंग्रेजों को क्या पढाया, क्या सिखाया; किले से बाहर लाइन बिछाने की अनुमति मिल गई। सबसे पहले इसे ग्वालियर के पास मुरार तक बनाया गया। वर्तमान में मुरार की लाइन को शहर में सडकें बनाने आदि के लिये बन्द करके हटा दिया है।

Friday, December 11, 2015

सवाई माधोपुर-जोधपुर-बिलाडा-पुष्कर ट्रेन यात्रा

   ज्यादातर मित्र मेरी पैसेंजर ट्रेन यात्राओं को पसन्द नहीं करते। यह नापसन्दगी पिछले साल खूब सुनने को मिली, इसलिये ट्रेन यात्राओं के वृत्तान्त प्रकाशित करने बन्द कर रखे थे। पिछले साल का जो वृत्तान्त प्रकाशित किया था, वो था मुगलसराय से गोमो, गोमो से हावडा और पटना से बक्सर पैसेंजर ट्रेन यात्राएं। इसके अगले ही सप्ताह भारत के इसी हिस्से में मैं फिर गया था और गोमो से खडगपुर, खडगपुर से टाटानगर, बिलासपुर होते हुए गोंदिया, चाम्पा से गेवरा रोड और बिलासपुर से कटनी तक का मार्ग देख लिया था। रतनगढ-बीकानेर-फलोदी मार्ग भी देखा और पठानकोट-अमृतसर, जालन्धर-पठानकोट-जम्मू-तवी-श्री माता वैष्णों देवी कटडा, दिल्ली-फर्रूखनगर, जोधपुर-भिलडी, पाटन-महेसाना-वीरमगाम-राजकोट, अहमदाबाद-आबू रोड मार्गों पर रेल यात्राएं कीं और रास्ते में आने वाले सभी स्टेशनों के बोर्डों के फोटो भी लिये। मुझे स्टेशन बोर्ड के फोटो संग्रह करने का शौक है। पिछले दिनों भिण्ड-ग्वालियर-गुना मार्ग देखा जिसका वृत्तान्त प्रकाशित किया जा चुका है। अब के बाद ऐसी ट्रेन यात्राओं के वृत्तान्त भी छपा करेंगे। ताजातरीन यात्रा का वृत्तान्त आज पढिये।
   यात्रा शुरू हुई थी 13 अक्टूबर 2015 को। निजामुद्दीन से कोटा जनशताब्दी एक्सप्रेस चलती है। इसमें अपनी बुकिंग थी। मेरी खिडकी वाली सीट पर एक परिवार बैठा था। मैं गया तो वे मुझे अपनी खिडकी से दूर वाली पर बैठने को कहने लगे लेकिन चूंकि मुझे सोना था, इसलिये मुझे जिद करनी पडी। उन्हें अवश्य बुरा लगा होगा।

Wednesday, December 9, 2015

जोशीमठ-पौडी-कोटद्वार-दिल्ली

30 सितम्बर 2015
आज हमें दिल्ली के लिये चल देना था। सुबह सात बजे ही निकल पडे। एक घण्टे में पीपलकोटी पहुंचे। पूर्व दिशा में पहाड होने के कारण धूप हम तक नहीं पहुंच पा रही थी, इसलिये रास्ते भर ठण्ड लगी। पीपलकोटी में बस अड्डे के पास ताजी बनी पकौडियां देखकर रुक गये। यहां धूप थी। पकौडियां, चाय और गुनगुनी धूप; तीनों के सम्मिश्रण से आनन्द आ गया। आधे घण्टे में यहां से चले तो नौ बजे चमोली पहुंचे, दस बजे कर्णप्रयाग। यहां 15 मिनट रुके, आराम किया। वातावरण में गर्मी बढने लगी थी। रास्ता अलकनन्दा के साथ साथ है और ज्यादा ऊंचाई पर भी नहीं है। इसलिये गर्मी लगती है।
गौचर रुके। यहां से बाल मिठाई ली। हम दोनों को यह मिठाई बेहद पसन्द है लेकिन चूंकि यह कुमाऊं की मिठाई है इसलिये लगता है गढवाल वाले इसे बनाना नहीं जानते। कुछ दिन पहले कर्णप्रयाग से ली थी, वो पिघल गई थी और सभी मिठाईयां एक बडा लड्डू बन गई थीं। आज ली तो यह भी खराब थी। इसका पता दिल्ली आकर चला। खैर, गौचर में दुकान वाले से कुछ बातें कीं। आपको पता नहीं याद हो या न हो; कुछ साल पहले जब देश में कांग्रेस की सरकार थी, तो सोनिया और राहुल गांधी आदि गौचर आये थे और ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन का शिलान्यास किया था। इसी के बारे में पता करना था कि कुछ काम भी चल रहा है या नहीं। दुकान वाले ने बताया कि वे लोग तो यहां पिकनिक मनाने आये थे। ऊपर हवाई अड्डे परिसर में ही ‘शिलान्यास’ जैसा कुछ आयोजित हुआ, फीता जैसा कुछ काटा और बात खत्म हो गई।

Monday, December 7, 2015

बद्रीनाथ यात्रा

29 सितम्बर 2015
   आपको याद होगा कि हम बद्रीनाथ नहीं जाना चाहते थे क्योंकि बद्रीनाथ के साथ साथ वसुधारा, सतोपंथ, हेमकुण्ड और फूलों की घाटी को हम एक साथ देखते और पूरे आठ-दस दिनों के लिये आते। लेकिन कल करण के बद्रीनाथ प्रेम के कारण हमें भी आना पडा। हमारे पास बद्रीनाथ में बिताने को केवल एक ही दिन था। जोशीमठ से लगभग 50 किमी दूर है बद्रीनाथ। हमने जोशीमठ में ही सामान छोडकर रात होने तक वापस यहीं आ जाने का विचार किया ताकि कल वापस दिल्ली के लिये निकला जा सके और उजाले में अधिकतम दूरी तय की जा सके।
   तो नहा-धोकर और गोभी के परांठे का नाश्ता करके साढे दस बजे बद्रीनाथ के लिये निकल पडे। शुरूआती दस किलोमीटर यानी अलकनन्दा पुल तक उतराई है, उसके बाद चढाई है। अलकनन्दा पुल के पास ही विष्णु प्रयाग है जहां अलकनन्दा में धौलीगंगा आकर मिलती है। धौलीगंगा घाटी बडी ही विलक्षण है। 1962 से पहले कैलाश मानसरोवर जाने का एक रास्ता यहां से भी था। वह रास्ता धौलीगंगा घाटी में ऊपर चढता था और नीति दर्रा पार करके यात्री तिब्बत में प्रवेश करते थे। अब तो नीति दर्रा इतना दुर्गम हो गया है कि कोई आम भारतीय भी वहां नहीं जा सकता। ऐसी घटनाओं का असर वहां के रहन-सहन पर भी पडता है। कैलाश मार्ग पर स्थित होने के कारण पहले धौलीगंगा घाटी में खूब चहल-पहल होती होगी, लेकिन अब कौन वहां जायेगा और क्यों जायेगा? हां, उधर जोशीमठ से निकलते ही तपोवन है और भविष्य बद्री है। इसके साथ ही ट्रेकिंग के शौकीनों के लिये नन्दा देवी बेस कैम्प और चांगबांग ग्लेशियर भी आकर्षण के केन्द्र हैं।

Friday, December 4, 2015

अनुसुईया से जोशीमठ

28 सितम्बर 2015
सुबह उठे तो पैर बुरी तरह अकडे थे। करण तो चलने में बिल्कुल असमर्थ ही हो गया था। इसका कारण था कि कल हमने तेज ढाल का कई किलोमीटर का रास्ता तय किया था। कल हम कई घण्टों तक उतरते ही रहे थे, इसलिये पैरों की दुर्गति होनी ही थी। आज के लिये कल तय किया था कि पहले अत्रि मुनि आश्रम जायेंगे, फिर वापस मण्डल। अत्रि मुनि आश्रम जाकर वापस अनुसुईया आना पडता, इसलिये किसी की भी वहां जाने की हिम्मत नहीं हुई।
आलू के परांठे बनवा लिये। साथ ही उसने थोडा सा पानी भी छौंक दिया। जी हां, पानी। प्याज टमाटर को बारीक काटकर पहले फ्राई किया, फिर उसमें दो-तीन गिलास पानी डाल दिया और उबलने दिया। फिर इसे चखकर देखा तो मजा आ गया। था तो यह पानी ही लेकिन इसका स्वाद किसी दाल या आलू की सब्जी को भी पीछे छोड रहा था।

Wednesday, December 2, 2015

रुद्रनाथ यात्रा- पंचगंगा से अनुसुईया

27 सितम्बर 2015
   सवा ग्यारह बजे पंचगंगा से चल दिये। यहीं से मण्डल का रास्ता अलग हो जाता है। पहले नेवला पास (30.494732°, 79.325688°) तक की थोडी सी चढाई है। यह पास बिल्कुल सामने दिखाई दे रहा था। हमें आधा घण्टा लगा यहां तक पहुंचने में। पंचगंगा 3660 मीटर की ऊंचाई पर है और नेवला पास 3780 मीटर पर। कल हमने पितरधार पार किया था। इसी धार के कुछ आगे नेवला पास है। यानी पितरधार और नेवला पास एक ही रिज पर स्थित हैं। यह एक पतली सी रिज है। पंचगंगा की तरफ ढाल कम है जबकि दूसरी तरफ भयानक ढाल है। रोंगटे खडे हो जाते हैं। बादल आने लगे थे इसलिये अनुसुईया की तरफ कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। धीरे-धीरे सभी बंगाली भी यहीं आ गये।
   बडा ही तेज ढलान है, कई बार तो डर भी लगता है। हालांकि पगडण्डी अच्छी बनी है लेकिन आसपास अगर नजर दौडाएं तो पाताललोक नजर आता है। फिर अगर बादल आ जायें तो ऐसा लगता है जैसे हम शून्य में टंगे हुए हैं। वास्तव में बडा ही रोमांचक अनुभव था।