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Showing posts from November, 2014

चित्रधारा प्रपात, छत्तीसगढ

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इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 19 जुलाई 2014 आज हमें चित्रकोट जलप्रपात देखने जाना था। सुनील जी के बडे भाई यहां जगदलपुर में रहते हैं तो हमें उम्मीद थी कि यहां से हमें कुछ न कुछ साधन मिल ही जायेगा। घर पर वैसे तो मोटरसाइकिल और कार दोनों थीं लेकिन मौसम को देखते हुए मैं कार को ज्यादा वरीयता दे रहा था। लेकिन सुनील जी के भतीजे साहब कार देने में आनाकानी करने लगे। अपनी चीज आखिर अपनी होती है। उन्हें अच्छी तरह पता है कि सुनील जी एक बेहतरीन ड्राइवर हैं, स्वयं उससे भी ज्यादा सुरक्षित तरीके से गाडी चलाते हैं, कई बार रायपुर से जगदलपुर कार से आ भी चुके हैं लेकिन फिर भी उसे कहीं न कहीं सन्देह था। मैंने सुनील जी के कान में फुसफुसाकर कहा भी कि जैसे भी हो सके, कार ले लो। बारिश के मौसम में उससे बेहतरीन कुछ और नहीं है। दो दिन की बात है बस। सुनील जी ने समझा दिया कि भले ही मैं कितना ही अच्छा ड्राइवर क्यों न होऊं लेकिन इनके लिये अच्छा ड्राइवर नहीं हूं।

किरन्दुल ट्रेन-2 (अरकू से जगदलपुर)

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । आज तो हमें जी भरकर सोना था। ग्यारह बजे ट्रेन थी, कोई चिन्ता नहीं थी। बाहर बारिश हो रही थी इसलिये अरकू घाटी में कहीं नहीं जा सकते थे। दस बजे के आसपास होटल छोड दिया। स्टेशन के पास ही सडक पर एक ढाबा था जहां दस दस रुपये में खूब सारी पूरी-सब्जी मिल रही थी। दक्षिण भारत में आपको अगर पूरी सब्जी मिल जाये तो समझिये आप खुशकिस्मत हैं। वो भी लगभग फ्री में। दस-दस रुपये तो फ्री ही होता है। हम दोनों ने बीस-बीस की खाईं और पेट में सांस लेने की भी जगह नहीं बची। बहुत दूर तक हम, ओडिशा तक हम बिना सांस लिये ही गये। आज ट्रेन पन्द्रह मिनट की देरी से चल रही थी। हमारे पास पहले से ही किरन्दुल तक का आरक्षित टिकट था। कौन जानता था कि भविष्य में हमारी क्या योजना बनेगी, इसलिये सुनील जी ने अरकू से सीधे किरन्दुल तक का टिकट ही बनवा लिया था। हालांकि आज हम जगदलपुर उतरेंगे। जगदलपुर से किरन्दुल का रेलमार्ग फिर कभी। फिर कभी मतलब दो दिन बाद।

अरकू घाटी

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । बोरा गुफाएं देखकर जब हम अरकू पहुंचे तो शाम हो चुकी थी, धीरे धीरे अन्धेरा होने लगा था। हम थक भी गये थे लेकिन सुनील जी ने कहा कि कल अगर अरकू घूमेंगे तो दोबारा ऑटो करना पडेगा, इससे तो अच्छा है कि आज उतने ही पैसों में इसी ऑटो वाले को साथ रखें। बात तो ठीक थी। फिर कल दोपहर ग्यारह बजे ट्रेन थी, हम सोकर ही नौ बजे उठेंगे, इसलिये इस घाटी में ज्यादा दूर नहीं जा सकेंगे। जब तक देखने लायक उजाला है, फोटो खींचने लायक उजाला है, अरकू ही देख लिया जाये। सबसे पहले पहुंचे जनजातीय संग्रहालय में। यहां आदिवासियों के जो पुतले बने थे, उनके क्रियाकलाप थे, सब बिल्कुल जीवन्त थे। लेकिन यहां फोटो खींचने की मनाही थी। इन पुतलों ने वास्तव में मन मोह लिया। बाहर से फोटो खींचकर यहां से बाहर निकल गये।

चापाराई प्रपात और कॉफी के बागान

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । बोरा गुफाओं से करीब चार किलोमीटर दूर कतिकी जलप्रपात है। वहां जाने वाला रास्ता बहुत ऊबड-खाबड है इसलिये ऑटो जा नहीं सकता था। हमें चार पहियों की कोई टैक्सी करनी पडती। उसके पैसे अलग से लगते, हमने इरादा त्याग दिया। लेकिन जब एक गांव में ऑटो वाले ने मुख्य सडक से उतरकर बाईं ओर मोडा, तो हम समझ गये कि यहां भी कुछ है। यह चापाराई जलप्रपात है। यह सडक एक डैड एण्ड पर खत्म होती है। हमें पैदल करीब सौ मीटर नीचे उतरना पडा और प्रपात हमारे सामने था। यह कोई ज्यादा लम्बा चौडा ऊंचा प्रपात नहीं था। फिर भी अच्छा लग रहा था। भीड नहीं थी और सबसे अच्छी बात कि यहां बस हमीं थे। कुछ और भी लोग थे लेकिन हमारे जाते ही वे वहां से चले गये। चारों तरफ बिल्कुल ग्रामीण वातावरण, खेत और जंगल। ऐसे में अगर यहां प्रपात न होता, बस जलधारा ही होती, तब भी अच्छा ही लगता।

बोर्रा गुहलू यानी बोरा गुफाएं

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 17 जुलाई 2014 की दोपहर बारह बजे तक हम अरकू पहुंच गये थे। अब हमें सबसे पहले बोरा गुफाएं देखने जाना था, हालांकि अभी कुछ ही देर पहले हम ट्रेन से वहीं से होकर आये थे लेकिन इस बात को आप जानते ही हैं कि हमने ऐसा क्यों किया? विशाखापट्टनम से किरन्दुल तक का पूरा रेलमार्ग देखने के लिये। अरकू घाटी में सबसे प्रसिद्ध बोरा गुफाएं ही हैं, इसलिये उन्हें देखना जरूरी था। एक कमरा लिया और सारा सामान उसमें पटककर, 800 रुपये में एक ऑटो लेकर बोरा की ओर चल पडे। वैसे तो बसें भी चलती हैं लेकिन वे बोरा गुफाओं तक नहीं जातीं। जाती भी होंगी तो हमें इंतजार करना पडता। मुख्य अरकू-विशाखापट्टनम सडक से बोरा गुफाएं आठ-दस किलोमीटर हटकर हैं। अरकू से गुफाओं की दूरी लगभग 30 किलोमीटर है। हमने सोचा कि ऑटो वाला इस पहाडी मार्ग पर कम से कम दो घण्टे एक तरफ के लगायेगा, लेकिन पट्ठे ने ऐसा ऑटो चलाया, ऐसा ऑटो चलाया कि हमारी रूह कांप उठी। पौन घण्टे में ही बोरा जाकर लगा दिया जबकि रास्ते में एक व्यू पॉइण्ट पर दस मिनट रुके भी थे। मैं उससे बार-बार कहता रहा कि भाई, हमें कोई जल्दी

डायरी के पन्ने-25

ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं। इनसे आपकी धार्मिक और सामाजिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। कृपया अपने विवेक से पढें। 1. दो धर्म... एक ही समय उत्पन्न हुए... एक ही स्थान से। एक पश्चिम में फैलता चला गया, एक पूर्व में। दोनों की विचारधाराएं समान। एक ईश्वर को मानने वाले, मूर्ति-पूजा न करने वाले। कट्टर। दोनों ने तत्कालीन स्थापित धर्मों को नुकसान पहुंचाया, कुचला, मारामारी की और अपना वजूद बढाते चले गये। आज... दो हजार साल बाद... दोनों में फर्क साफ दिखता है। एक बहुत आगे निकल गया है और दूसरा आज भी वही दो हजार साल पुरानी जिन्दगी जी रहा है। दोनों धर्मों के पचास से भी ज्यादा देश हैं। एक ने देशों की सीमाएं तोड दी हैं और वसुधैव कुटुम्बकम को पुनर्जीवित करने की सफल कोशिश कर रहा है, दूसरा रोज नई-नई सीमाएं बनाता जा रहा है। एक ही देश के अन्दर कई देश बन चुके हैं और सभी एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं।

किरन्दुल लाइन-1 (विशाखापट्टनम से अरकू)

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । इतना तो आप जानते ही हैं कि हावडा-चेन्नई के बीच में विशाखापट्टनम स्थित है। विशाखापट्टनम से जब ट्रेन से हावडा की तरफ चलते हैं तो शीघ्र ही एक स्टेशन आता है- कोत्तवलसा जंक्शन। यहां लोकल ट्रेनें रुकती हैं। ज्यादातर एक्सप्रेस व सुपरफास्ट ट्रेनें यहां नहीं रुकतीं। कोत्तवलसा एक जंक्शन इसलिये है कि यहां से एक लाइन किरन्दुल जाती है। हम आज इसी किरन्दुल वाली लाइन पर यात्रा करेंगे। कोत्तवलसा और किरन्दुल को जोडने के कारण इसे के-के लाइन भी कहते हैं। 1959 में जब भिलाई स्टील प्लांट शुरू हुआ तो उसके लिये दल्ली राजहरा से लौह अयस्क आ जाता था। भिलाई से दल्ली राजहरा तक रेलवे लाइन बनाई गई थी उस समय। शीघ्र ही इस प्लांट की क्षमता में वृद्धि करने की कोशिश हुई तो और ज्यादा लौह अयस्क की आवश्यकता थी। इस आवश्यकता को बस्तर में स्थित बैलाडीला की खानें पूरा कर सकती थीं लेकिन उस समय वहां पहुंचना ही लगभग असम्भव था। भीषण जंगल और पर्वतीय इलाके के कारण। तब पहली बार यहां रेलवे लाइन बिछाने की योजना बनी। इसे सीधे भिलाई से न जोडने का कारण शायद यह रहा होगा कि विशाखा

विशाखापट्टनम- चिडियाघर और कैलाशगिरी

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । मुझे विशाखापटनम में जो सबसे अच्छी जगह लगी, वो थी चिडियाघर। मेरी इच्छा नहीं थी जाने की, लेकिन सुनील जी के आग्रह पर चला गया। पन्द्रह-बीस मिनट का लक्ष्य लेकर चले थे, लग गये दो घण्टे। बाहर आने का मन ही नहीं किया। बाकी कहानी फोटो अपने आप बता देंगे। पांच बजे यहां से निकले तो कैलाशगिरी पहुंचे। जैसा कि नाम से ही विदित हो रहा है, यह एक पहाडी है। विशाखापटनम शहरी विकास प्राधिकरण ने इसे एक शानदार पिकनिक स्थल के तौर पर विकसित किया है। ऊपर जाने के लिये रोपवे भी है। यहां से विशाखापटनम का विहंगम नजारा दिखता है। रामकृष्ण बीच दिखता है और उसके परे बन्दरगाह। इसकी भी कहानी फोटो बतायेंगे। यहां एक टॉय ट्रेन भी चलती है जो कैलाशगिरी का चक्कर लगाती है। हालांकि हमने इसमें यात्रा नहीं की।

विशाखापटनम- सिम्हाचलम और ऋषिकोण्डा बीच

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 16 जुलाई 2014 की सुबह आठ बजे ट्रेन विशाखापट्टनम पहुंची। यहां भी बारिश हो रही थी और मौसम काफी अच्छा हो गया था। सबसे पहले स्टेशन के पास एक कमरा लिया और फिर विशाखापट्टनम घूमने के लिये एक ऑटो कर लिया जो हमें शाम तक सिम्हाचलम व बाकी स्थान दिखायेगा। ऑटो वाले ने अपने साले को भी अपने साथ ले लिया। वह सबसे पीछे, पीछे की तरफ मुंह करके बैठा। पहले तो हमने सोचा कि यह कोई सवारी है, जो आगे कहीं उतर जायेगी लेकिन जब वह नहीं उतरा तो हमने पूछ लिया। वे दोनों हिन्दी उतनी अच्छी नहीं जानते थे और हम तेलगू नहीं जानते थे, फिर भी उन दोनों से मजाक करते रहे, खासकर उनके जीजा-साले के रिश्ते पर। बताया जाता है कि यहां विष्णु के नृसिंह अवतार का निवास है। यह वही नृसिंह है जिसने अपने भक्त प्रह्लाद की उसके जालिम पिता से रक्षा की थी।

अरकू-बस्तर यात्रा- दिल्ली से रायपुर

14 जुलाई 2014 वैसे तो जब भी मुझे निजामुद्दीन जाना होता है तो मैं अपने यहां से एक घण्टे पहले निकलता हूं। लेकिन आज देर हो गई। फिर भी एक जानकार के लिये पौन घण्टे में शास्त्री पार्क से निजामुद्दीन पहुंचना कोई मुश्किल नहीं है। भला हो राष्ट्रमण्डल खेलों का कि कश्मीरी गेट से इन्द्रप्रस्थ तक यमुना के किनारे किनारे नई सडक बन गई अन्यथा राजघाट की लालबत्ती पर ही बीस-पच्चीस मिनट लग जाते। अब कश्मीरी गेट से काले खां तक कोई भी लालबत्ती नहीं है। बस एक बार कश्मीरी गेट से चलती है और सीधे काले खां जाकर ही रुकती है। ट्रेन चलने से दस मिनट पहले मैं निजामुद्दीन पहुंच चुका था। मेरी बर्थ कन्फर्म नहीं हुई थी लेकिन आरएसी मिल गई थी। यानी एक ही बर्थ पर दो आदमी बैठेंगे। जब टिकट बुक किया था तो वेटिंग थी। वेटिंग टिकट लेना सट्टा खेलने के बराबर होता है। जीत गये तो जीत गये और हार गये तो हार गये। इस तरह आरएसी सीट मेरे लिये जीत के ही बराबर थी। टीटीई ईमानदार निकला तो क्या पता कि मथुरा-आगरा तक पक्की बर्थ भी मिल जाये।

मथुरा-जयपुर-सवाई माधोपुर-आगरा पैसेंजर ट्रेन यात्रा

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4 अगस्त 2014 जैसा कि आप जानते हैं कि मुझे नई नई लाइनों पर पैसेंजर ट्रेनों में घूमने का शौक है। और अब तो एक लक्ष्य और बना लिया है भारत भर के सभी रेलवे स्टेशनों के फोटो खींचना। तो सभी स्टेशनों के फोटो उन्हीं ट्रेनों में बैठकर खींचे जा सकते हैं जो सभी स्टेशनों पर रुकती हों यानी पैसेंजर व लोकल ट्रेनें। कुछ लाइनें मुख्य लाइनें कही जाती हैं। ये ज्यादातर विद्युतीकृत हैं और इन पर शताब्दी व राजधानी ट्रेनों सहित अन्य ट्रेनों का बहुत ज्यादा ट्रैफिक रहता है। इनके बीच में जगह जगह लिंक लाइनें भी होती हैं जो मुख्य लाइन के कुछ स्टेशनों को आपस में जोडती हैं। इन लिंक लाइनों पर उतना ट्रैफिक नहीं होता। इसी तरह की तीन मुख्य लाइनें हैं- दिल्ली- आगरा लाइन जो आगे भोपाल की तरफ चली जाती है, मथुरा-कोटा लाइन जो आगे रतलाम व वडोदरा की ओर जाती है और दिल्ली- जयपुर लाइन जो आगे अहमदाबाद की ओर जाती है। इन लाइनों पर मैंने पैसेंजर ट्रेनों में यात्रा कर रखी है। इनके बीच में कुछ लिंक लाइनें भी हैं जो अभी तक मुझसे बची हुई थीं। ये लाइनें हैं मथुरा-अलवर, जयपुर-सवाई माधोपुर और बयाना-आगरा किला। इन सभी लाइनों पर पैसेंजर ट्रेनों म

पटना से दिल्ली ट्रेन यात्रा

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 4 सितम्बर 2014 की सुबह सुबह उजाला होने से पहले मैंने पटना स्टेशन पर कदम रखा। हालांकि पहले भी एक बार पटना से होकर गुजर चुका हूं लेकिन तब रात होने के कारण नीचे नहीं उतरा था। आज मुझे पटना से मुगलसराय तक लोकल ट्रेन से यात्रा करनी है। इधर आने से पहले एक मित्र ने बताया था कि स्टेशन के सामने ही महावीर जी यानी हनुमान जी का बडा भव्य मन्दिर है। वहां के लड्डू बडे स्वादिष्ट होते हैं। एक बार लेकर चखना जरूर। अब जब मैं यहां आ गया तो लड्डू लेना तो बनता था, लेकिन मैंने नहीं लिये। हालांकि मन्दिर वास्तव में भव्य है। सीधे मुगलसराय का पैसेंजर का टिकट ले लिया। बक्सर में ट्रेन बदलनी पडेगी। पटना से बक्सर के लिये पहली लोकल सुबह पांच बजकर चालीस मिनट पर चलती है। लेकिन यह सभी स्टेशनों पर नहीं रुकती। फिर पांच से छह बजे तक उजाला भी नहीं होता, इसलिये इसे छोड दिया। अगली ट्रेन सात चालीस पर है। यह ग्यारह बजकर पांच मिनट पर बक्सर पहुंचेगी और वहां से मुगलसराय की लोकल साढे ग्यारह बजे है। पटना-बक्सर लोकल का नम्बर 63227 है जबकि बक्सर-मुगलसराय का नम्बर 63229 है। इ

डायरी के पन्ने-24

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ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं। इनसे आपकी धार्मिक और सामाजिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। कृपया अपने विवेक से पढें। 1.  दो फिल्में देखीं- ‘हैदर’ और ‘मैरीकॉम’। दोनों में वैसे तो कोई साम्य नहीं है, बिल्कुल अलग-अलग कहानी है और अलग अलग ही पृष्ठभूमि। लेकिन एक बात समान है। दोनों ही उन राज्यों से सम्बन्धित हैं जहां भारत विरोध होता रहता है। दोनों ही राज्यों में सेना को हटाने की मांग होती रहती है। हालांकि पिछले कुछ समय से दोनों ही जगह शान्ति है लेकिन फिर भी देशविरोधी गतिविधियां होती रहती हैं। लेकिन मैं कुछ और कहना चाहता हूं। ‘हैदर’ के निर्माताओं ने पहले हाफ में जमकर सेना के अत्याचार दिखाए हैं। कुछ मित्रों का कहना है कि जो भी दिखाया है, वो सही है। लेकिन मेरा कहना है कि यह एक बहुत लम्बे घटनाक्रम का एक छोटा सा हिस्सा है। हालांकि सेना ने वहां अवश्य ज्यादातियां की हैं, नागरिकों पर अवश्य बेवजह के जुल्म हुए हैं लेकिन उसकी दूसरी कई वजहें थीं। वे वजहें भी फिल्म में दिखाई जानी थीं। दूसरी बात कि अगर दूसरी वजहें नहीं दिखा सकते थे समय की कमी आदि के कारण तो सेना के अत्याचार भी नहीं दिखाने च