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Showing posts from February, 2014

मिज़ोरम में प्रवेश

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । दिनांक था 24 जनवरी 2014 और मैं था सिल्चर में। सुबह साढे छह बजे ही आंख खुल गई हालांकि अलार्म सात बजे का लगाया था। मच्छरदानी की वजह से एक भी मच्छर ने नहीं काटा, अन्यथा रात जिस तरह का मौसम था और मच्छरों के दो-तीन सेनापति अन्धेरा होने की प्रतीक्षा कर रहे थे, उससे मेरी खैर नहीं थी। अपनी तरफ से काफी जल्दी की, फिर भी निकलते-निकलते पौने आठ बज गये। ट्रैवल एजेंसी के ऑफिस में घुसने ही वाला था, उनका फोन भी आ गया। दो सौ रुपये में साइकिल की बात हुई। मैं राजी था। कल जगन्नाथ ट्रैवल्स ने तीन सौ रुपये मांगे थे। इस मामले में जितना मोलभाव हो जाये, उतना ही अपना फायदा है। साइकिल को सूमो की छत पर अन्य बैगों के साथ बांधने में काफी परेशानी हुई। साढे आठ बजे मिज़ोरम के लिये प्रस्थान कर गये। सूमो में मेरे अलावा तीन बिहारी, दो बंगाली व पांच मिज़ो थे। सभी मिज़ो हिन्दी भी जानते थे।

बराक घाटी एक्सप्रेस

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । यह भारत की कुछ बेहद खूबसूरत रेलवे लाइनों में से एक है। आज के समय में यह लाइन असोम के लामडिंग से शुरू होकर बदरपुर जंक्शन तक जाती है। बदरपुर से आगे यह त्रिपुरा की राजधानी अगरतला चली जाती है और एक लाइन सिल्चर जाती है। अगरतला तक यह पिछले दो-तीन सालों से ही है, लेकिन सिल्चर तक काफी पहले से है। इसलिये इसे लामडिंग-सिल्चर रेलवे लाइन भी कहते हैं। यह लाइन मीटर गेज है। मुझे आज लामडिंग से शुरू करके सिल्चर पहुंचना है। लामडिंग से सिल्चर के लिये दिनभर में दो ही ट्रेनें चलती हैं- कछार एक्सप्रेस और बराक घाटी एक्सप्रेस। कछार एक्सप्रेस एक रात्रि ट्रेन है जबकि बराक घाटी एक्सप्रेस दिन में चलती है और हर स्टेशन पर रुकती भी है। इनके अलावा एक ट्रेन लामडिंग से अगरतला के लिये भी चलती है। दक्षिणी असोम को कछार कहते हैं। इनमें दो जिले प्रमुख हैं- कछार और नॉर्थ कछार हिल्स। कछार जिले का मुख्यालय सिल्चर में है और नॉर्थ कछार हिल्स जिले का मुख्यालय हाफलंग में। यह ट्रेन हाफलंग से होकर गुजरती है। इसी तरह कछार में एक मुख्य नदी है- बराक। सिल्चर बराक नदी के किनारे

दिल्ली से लामडिंग- राजधानी एक्सप्रेस से

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 20 जनवरी 2014 कल सुबह साढे नौ बजे नई दिल्ली से जब मैं डिब्रुगढ राजधानी में बैठ जाऊंगा, तभी मेरी मिज़ोरम यात्रा आरम्भ हो जायेगी। इतने दिन से यात्रा की योजना बनाने के बावजूद भी मैं अभी तक पूरी तरह तैयारी नहीं कर सका। चूंकि आज की पूरी रात अपनी है, इसलिये मैं निश्चिन्त था। रात दस बजे तक बैग तैयार हो चुका था। स्लीपिंग बैग, टैंट और पम्प साइकिल के पास रखे जा चुके थे। जब आखिर में जरूरी कागजात देखने लगा तो एक कागज नहीं मिला। यह गुम कागज हमारे पथ का दूरी-ऊंचाई नक्शा था जिसके बिना यात्रा बेहद कठिन हो जाती। पुनः गूगल मैप से देखकर बारीकी से यह नक्शा बनाना आरम्भ कर दिया। मिज़ोरम काफी उतार-चढाव वाला राज्य है इसलिये हर पांच पांच दस दस किलोमीटर के आंकडे लेने पड रहे थे। जब यह काम खत्म हुआ तो दो बज चुके थे। अब अगर सोऊंगा तो सुबह पता नहीं कितने बजे उठूंगा। इसलिये न सोने का फैसला कर लिया। सुबह जब बिस्तर से उठा तो देखा कि वो गुम कागज पलंग के नीचे पडा था। खुशी भी मिली और स्वयं पर गुस्सा भी आया।

मिज़ोरम की ओर

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पूर्वोत्तर भारत अर्थात? कुछ लोग पूर्वोत्तर भी घूमने जाते हैं। उनके लिये पूर्वोत्तर का अर्थ होता है दार्जीलिंग और सिक्किम। आखिर सिक्किम की गिनती पूर्वोत्तर में होती है तो सही बात है कि सिक्किम घूमे तो पूर्वोत्तर भी घूम लिये। ज्यादा हुआ तो मेघालय चले गये, चेरापूंजी और शिलांग। इससे भी ज्यादा हुआ तो तवांग चले गये अरुणाचल में, काजीरंगा चले गये असोम में। और बात अगर हद तक पहुंची तो इक्के दुक्के कभी कभार इम्फाल भी चले जाते हैं मणिपुर में। लोकटक झील है वहां जो बिल्कुल विलक्षण है। घुमन्तुओं के लिये पूर्वोत्तर की यही सीमा है। मिज़ोरम कोई नहीं जाता। क्योंकि यह पूर्वोत्तर के पार की धरती है, पूर्वोत्तर के उस तरफ की धरती है। जिस तरह लद्दाख है हिमालय पार की धरती। जिसमें हिमालय चढने और उसे पार करने का हौंसला होता है, वही लद्दाख जा पाता है। ठीक इसी तरह जिसमें पूर्वोत्तर जाने और उसे भी पार करने का हौंसला होता है, वही मिज़ोरम जा पाता है। पूर्वोत्तर बडी बदनाम जगह है। वहां उग्रवादी रहते हैं जो कश्मीर के आतंकवादियों से भी ज्यादा खूंखार होते हैं। कश्मीर के आतंकवादी तो केवल सुरक्षाबलों को ही मारते हैं, पूर्वोत्त

कश्मीर से दिल्ली

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 8 जनवरी 2014 की दोपहर पौने एक बजे ट्रेन बनिहाल पहुंच गई। पौने आठ बजे ऊधमपुर से नई दिल्ली के लिये सम्पर्क क्रान्ति चलती है जिसमें मेरा वेटिंग आरक्षण है। इस तरह मेरे हाथ में पूरे सात घण्टे थे। कल ऊधमपुर से यहां आने में पांच घण्टे लगे थे। लेकिन आज मौसम खराब है, बनिहाल में बर्फबारी हो रही है, आगे पटनी टॉप में भी समस्या हो सकती है। अगर रातभर वहां बर्फबारी होती रही हो तो रास्ता भी बन्द हो सकता है। इस तरह बनिहाल उतरते ही मेरी प्राथमिकता किसी भी ऊधमपुर या जम्मू वाली गाडी में बैठ जाने की थी। सामने राजमार्ग पर अन्तहीन जाम भी दिख रहा था, जो मेरी चिन्ता को और बढा रहा था। सुबह से कुछ भी नहीं खाया था। यहां थोडी सी पकौडी और चाय ली गई। फिर देखा कि जम्मू के लिये न तो कोई सूमो है और न ही कोई बस। समय मेरे पास था नहीं इसलिये फटाफट रामबन वाली बस में बैठ गया। आगे रास्ता खुला होगा तो रामबन से बहुत बसें मिल जायेंगीं। सीट पर बैठा ही था कि एक सूमो पर निगाह गई। ड्राइवर ऊपर सामान बांध रहा था। मैंने तेज आवाज में उससे पूछा तो उसने ऊधमपुर कहा। अब मैं क्यो

कश्मीर रेलवे

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । सात जनवरी 2014 की दोपहर बाद तीन बजे थे जब मैं बनिहाल रेलवे स्टेशन जाने वाले मोड पर बस से उतरा। मेरे साथ कुछ यात्री और भी थे जो ट्रेन से श्रीनगर जाना चाहते थे। राष्ट्रीय राजमार्ग से स्टेशन करीब दो सौ मीटर दूर है और सामने दिखाई देता है। ऊधमपुर से यहां आने में पांच घण्टे लग गये थे। वैसे तो आज की योजनानुसार दो बजे वाली ट्रेन पकडनी थी लेकिन रास्ते में मिलने वाले जामों ने सारी योजना ध्वस्त कर दी। अब अगली ट्रेन पांच बजे है यानी दो घण्टे मुझे बनिहाल स्टेशन पर ही बिताने पडेंगे। मुझे नये नये रूटों पर पैसेंजर ट्रेनों में यात्रा करने का शौक है। पिछले साल जब लद्दाख से श्रीनगर आया था तो तब भी इस लाइन पर यात्रा करने का समय था लेकिन इच्छा थी कि यहां केवल तभी यात्रा करूंगा जब बर्फ पडी हो अर्थात सर्दियों में। भारत में यही एकमात्र ब्रॉडगेज लाइन है जो बर्फीले इलाकों से गुजरती है। इसी वजह से तब जून में इस लाइन पर यात्रा नहीं की। अब जबकि लगातार कश्मीर में बर्फबारी की खबरें आ रही थीं, जम्मू-श्रीनगर मार्ग भी बर्फ के कारण कई दिनों तक बन्द हो गया था।

दिल्ली से कश्मीर

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उस दिन मैं सायंकालीन ड्यूटी पर था दोपहर बाद दो बजे से रात दस बजे तक। शाम के छह बजे थे, खान साहब अपने ऑफिस का ताला मारकर जाने की तैयारी में थे। तभी प्रशान्त का फोन आया- नीरज भाई, कश्मीर चलें? हममें हमेशा इसी तरह बिना किसी औपचारिकता के बात होती है। मैंने थोडी देर बाद बात करने को कह दिया। खान साहब जब जाने लगे तो मैंने उन्हें रोककर कहा- सर, मुझे आठ तारीख की छुट्टी लेनी है। वे ठिठक गये। ड्यूटी-पत्र खोलकर देखा, अपने रिकार्ड में मेरी छुट्टी लगा ली। मुझे छुट्टी मिलने का भरोसा तो था लेकिन इस तरीके से इतनी जल्दी नहीं। फिर प्रशान्त को फोन किया- हां भाई, बता। बोला कि कश्मीर चलते हैं। वहां बर्फ पड रही है, रेल में घूमेंगे। वह ट्रेनों में घूमने का शौकीन है और उसे पता है कि मैं अभी तक कश्मीर रेल में नहीं घूमा हूं। इसलिये रुका हुआ हूं कि जब बर्फ पडेगी तब घूमूंगा। आखिर भारत में ऐसी लाइनें हैं ही कितनी? कालका शिमला लाइन है जहां कभी कभार ही बर्फबारी होती है। दार्जीलिंग हिमालयन रेलवे है। ये दोनों नैरो गेज हैं। जबकि कश्मीर रेल ब्रॉड गेज है। कोई भी अन्य ब्रॉड गेज लाइन बर्फबारी वाले इलाके से नहीं गुजरती।