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2014 की घुमक्कडी का लेखा-जोखा

यात्राओं के लिहाज से यह साल बिल्कुल भी शानदार नहीं रहा। एक के बाद एक बिगडते समीकरण, यात्राओं को बीच में छोडना; मतलब जो नहीं होना चाहिये था, वो सब हुआ। कुछ बडी यात्राएं जरूर हुईं लेकिन एकाध को छोडकर लगभग सभी में कुछ न कुछ गडबड होती रही। कई बार ऐसा लगा... बल्कि अब भी ऐसा लग रहा है कि इस साल जो भी यात्राएं कीं, सभी जबरदस्ती की गई यात्राएं थीं। चलिये, पहले बात करते हैं उन यात्राओं की जिनका वृत्तान्त प्रकाशित हुआ। 1. कश्मीर रेलवे साल के शुरू में ही जब सुना कि कश्मीर में भारी बर्फबारी हो रही है तो यहां की ट्रेन में यात्रा करने का मन हो गया। यहां ब्रॉड गेज है और भारत की एकमात्र ऐसी ब्रॉडगेज की लाइन है जहां बर्फ पडती है। जब शून्य से नीचे के तापमान में कश्मीर गया तो दूर तक फैली बर्फ में ट्रेन को गुजरते देखना बेहद सुखद एहसास था।

पदुम-दारचा ट्रेक- अनमो से चा

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इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । आपको याद होगा कि हम अनमो पहुंच गये थे। पदुम-दारचा ट्रेक आजकल अनमो से शुरू होता है। वास्तव में यह ट्रेक अब अपनी अन्तिम सांसे गिन रहा है। जल्दी ही यह ‘पदुम-दारचा सडक’ बनने वाला है। पदुम की तरफ से चलें तो अनमो से आगे तक सडक बन गई है और अगर दारचा की तरफ से देखें तो लगभग शिंगो-ला तक सडक बन गई है। मुख्य समस्या अनमो से आठ-दस किलोमीटर आगे तक ही है। फिर शिंगो-ला तक चौडी घाटी है, कच्ची मिट्टी है। सडक और तेजी से बनेगी। एक बार सडक बन गई तो ट्रेक का औचित्य समाप्त। इसी तरह पदुम को निम्मू से भी जोडने का काम चल रहा है। निम्मू वो जगह है जहां जांस्कर नदी सिन्धु नदी में मिलती है। पदुम से काफी आगे तक सडक बन चुकी है और उधर निम्मू से भी बहुत आगे तक सडक बन गई है। बीच में थोडा सा काम बाकी है। सुप्रसिद्ध चादर ट्रेक इसी पदुम-निम्मू के बीच में होता है। निम्मू से चलें तो चिलिंग से आगे तक सडक बन गई है। जहां सडक समाप्त होती है, वहीं से चादर ट्रेक शुरू हो जाता है। जब यह सडक पूरी बन जायेगी तो चादर ट्रेक पर भी असर पडेगा। उधर पदुम और कारगिल पहले से ही जुडे

जांस्कर यात्रा- रांगडुम से अनमो

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इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । अगले दिन सुबह साढे तीन बजे ही ड्राइवर ने आवाज लगा दी। कसम से इस समय उठने का बिल्कुल भी मन नहीं था। सर्दी में रजाई छोडने का क्षण मेरे लिये बडा दुखदाई होता है। लेकिन उठना तो था ही। चार बजते बजते यहां से निकल चुके थे। अभी भी रात काफी थी। पांच बजे जाकर कहीं उजाला होना शुरू होगा। आगे चलकर सूरू का पाट अत्यधिक चौडा हो गया और सडक छोडकर ड्राइवर ने गाडी सीधे पत्थरों में घुसा दी। ऊबड-खाबड रास्ता अभी तक था, ऊबड खाबड अभी भी है तो कुछ भी फर्क पता नहीं चला। पत्थरों से कुछ देर में पुनः सडक पर आ गये। कुछ ही आगे एक जगह गाडी रोक दी। यहां एक सन्तरी खडा था। यह असल में रांगडुम गोम्पा था। बडा प्रसिद्ध गोम्पा है यह। इसी के पास एक चेकपोस्ट है। यह पता नहीं सेना की चेकपोस्ट है या बीएसएफ की या किसी और बल की। पुलिस की तो नहीं है। ड्राइवर ने रजिस्टर में एण्ट्री की। हम सन्तरी को देखकर हैरान थे। आंखों में नींद का नामोनिशान तक नहीं था। जबकि यहां न कोई पाकिस्तान की सीमा है, न किसी चीन की। यहां ट्रैफिक भी बिल्कुल नहीं था। आखिरी गाडी कल दिन रहते ही गुजरी होगी

खूबसूरत सूरू घाटी

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इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । कल ही पता चल गया था कि पदुम तक कोई बस नहीं जाती बल्कि सुबह सुबह सूमो चलती हैं। कारगिल से पदुम की दूरी लगभग ढाई सौ किलोमीटर है और शेयर्ड सूमो में प्रति यात्री डेढ हजार रुपये किराया लगता है। हमारे पास भी अब डेढ हजार देकर सूमो में जाने के अलावा कोई चारा नहीं था लेकिन सुबह सोते रह गये और जितनी गाडियां पदुम जानी थीं, सभी जा चुकी थीं। विधान और प्रकाश जी सूमो स्टैण्ट की तरफ चले गये और मैं कमरे पर ही रुका रहा। इस दौरान मैं नहा भी लिया। कारगिल में बिल्कुल भी सर्दी नहीं थी, रात हम पंखा चलाकर सोये थे। जब दोनों आये तो बताया कि अब हमें टैक्सी ही करनी पडेगी जो नौ हजार की पडेगी। इसका अर्थ था तीन-तीन हजार प्रति व्यक्ति। विधान ने सबसे पहले विरोध किया। उसे अभी भी यकीन नहीं था कि अब कोई भी शेयर्ड गाडी नहीं मिलेगी। खैर, बाहर निकले। पता चला कि शाम चार बजे के आसपास एक बस परकाचिक तक जायेगी। मैंने तुरन्त नक्शा खोलकर देखा। परकाचिक तो आधी दूरी पर भी नहीं है। उसके बाद? परकाचिक तक पहुंचते पहुंचते रात हो जायेगी। बहुत ही छोटा सा गांव होगा दो-चार घरों का

जांस्कर यात्रा- दिल्ली से कारगिल

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तैयारी अगस्त में भारत में मानसून पूरे जोरों पर होता है। हिमालय में तो यह काल बनकर बरसता है। मानसून में घुमक्कडी के लिये सर्वोत्तम स्थान दक्षिणी प्रायद्वीप माना जाता है लेकिन एक जगह ऐसी भी है जहां बेफिक्र होकर मानसून में घूमने जाया जा सकता है। वो जगह है लद्दाख। लद्दाख मूलतः एक मरुस्थल है लेकिन अत्यधिक ऊंचाई पर होने के कारण यहां ठण्ड पडती है। हिमालय के पार का भूभाग होने के कारण यहां बारिश नहीं पडती- न गर्मियों में और न सर्दियों में। मानसून हो या पश्चिमी विक्षोभ; हिमालय सबकुछ रोक लेता है और लद्दाख तक कुछ भी नहीं पहुंचता। जो बहुत थोडी सी नमी पहुंचती भी है वो नगण्य होती है। जांस्कर भी राजनैतिक रूप से लद्दाख का ही हिस्सा है और कारगिल जिले में स्थित है। जांस्कर का मुख्य स्थान पदुम है। अगर आप जम्मू कश्मीर राज्य का मानचित्र देखेंगे तो पायेंगे कि हिमाचल प्रदेश की सीमा पदुम के काफी नजदीक है। पदुम जाने के लिये केवल एक ही सडक है और वो कारगिल से है। बाकी दिशाओं में आने-जाने के लिये अपने पैरों व खच्चरों का ही सहारा होता है। चूंकि जांस्कर की ज्यादातर आबादी बौद्ध है इसलिये इनका सिन्धु घाटी में स्थित

डायरी के पन्ने-27

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नोट: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं। 1. आज की चर्चा आरम्भ करते हैं गूगल मैप मेकर  से। पिछली बार आपको बताया था कि गूगल मैप को कोई भी एडिट कर सकता है- मैं भी और आप भी। कुछ लोग अपने को बडा भयंकर जानकार समझते हैं। जिन्होंने कभी सोचा तक नहीं कि गूगल मैप को एडिट कैसे किया जाता है, वे एडिटर को दस बातें समझा सकते हैं। मुझे भी कुछ लोगों ने इसी तरह की बातें बताईं। मसलन आप गूगल को सुझाव भेजोगे कि यह रास्ता या यह गांव इस स्थान पर स्थित है। गूगल अपनी टीम को उस स्थान पर देखने भेजेगा कि वाकई वो रास्ता या गांव वहां है या नहीं। जब गूगल की टीम उस स्थान का सर्वे कर लेगी, तब आपका सुझाव गूगल मैप में प्रकाशित होना शुरू हो जायेगा। यह केवल अफवाह है। ऐसा कुछ नहीं है।

ओशो चर्चा

हमारे यहां एक त्यागी जी हैं। वैसे तो बडे बुद्धिमान, ज्ञानी हैं; उम्र भी काफी है लेकिन सब दिखावटी। एक दिन ओशो की चर्चा चल पडी। बाकी कोई बोले इससे पहले ही त्यागी जी बोल पडे- ओशो जैसा मादर... आदमी नहीं हुआ कभी। एक नम्बर का अय्याश आदमी। उसके लिये रोज दुनियाभर से कुंवाई लडकियां मंगाई जाती थीं। मैंने पूछा- त्यागी जी, आपने कहां पढा ये सब? कभी पढा है ओशो साहित्य या सुने हैं कभी उसके प्रवचन? तुरन्त एक गाली निकली मुंह से- मैं क्यों पढूंगा ऐसे आदमी को? तो फिर आपको कैसे पता कि वो अय्याश था? या बस अपने जैसों से ही सुनी-सुनाई बातें नमक-मिर्च लगाकर बता रहे हो? चर्चा आगे बढे, इससे पहले बता दूं कि मैं ओशो का अनुयायी नहीं हूं। न मैं उसकी पूजा करता हूं और न ही किसी ओशो आश्रम में जाता हूं। जाने की इच्छा भी नहीं है। लेकिन जब उसे पढता हूं तो लगता है कि उसने जो भी प्रवचन दिये, सब खास मेरे ही लिये दिये हैं।

जगदलपुर से दिल्ली वापस

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इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । जगदलपुर से रायपुर की बसों की कोई कमी नहीं है। हालांकि छत्तीसगढ में राज्य परिवहन निगम जैसी कोई चीज नहीं है। सभी बसें प्राइवेट ऑपरेटरों की ही चलती हैं। उत्तर भारत में भी चलती हैं प्राइवेट ऑपरेटरों की लम्बी दूरी की बसें लेकिन उनका अनुभव बहुत कडवा होता है। पहली बात उनका चलने का कोई समय नहीं होता, जब बस भरेगी उसके एक घण्टे बाद चलेगी। दूसरा... क्या दूसरा? सभी निगेटिव पॉइण्ट हैं। मैंने कई बार भुगत रखा है उन्हें। लेकिन यहां ऐसा नहीं है। सभी बसों की समय सारणी निर्धारित है और बसें उसी के अनुसार ही चलती हैं। लम्बी दूरी की बसें स्लीपर हैं जिनमें नीचे एक कतार बैठने की हैं और बाकी ऊपर सोने व लेटने के लिये। किराये में कोई अन्तर नहीं है, जितना सीट का किराया है, उतना ही बर्थ का। बस में चढो, अपनी पसन्दीदा या खाली जगह पर बैठो या लेटो। जब बस चलेगी तो कंडक्टर आयेगा और आपसे किराया ले लेगा। जगदलपुर से रायपुर 300 किलोमीटर है और इस दूरी का किराया था 240 रुपये। मैं तो हैरान था ही कि इतना सस्ता; सुनील जी भी हैरान थे कि पिछली बार जब जगदलपुर आये थे तो

तीरथगढ जलप्रपात

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इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । बारह बजे के आसपास जगदलपुर से तीरथगढ के लिये चल पडे। इस बार हम चार थे। मेरे और सुनील जी के अलावा उनके भतीजे शनि, ममेरे भाई मनीष दुबे और भानजे प्रशान्त भी साथ हो लिये। लेकिन ये तो कुल पांच हो गये। चलो, पांच ही सही। शनि ने अपनी कार उठा ली। बारिश में भीगने का खतरा टला। कुछ दूर तक दन्तेवाडा वाली सडक पर चलना होता है, फिर एक रास्ता बायें सुकमा, कोंटा की ओर जाता है। इसी पर चल दिये। मुडते ही वही रेलवे लाइन पार करनी पडी जिससे अभी कुछ देर पहले मैं किरन्दुल से आया था। थोडा ही आगे चलकर कुख्यात जीरम घाटी शुरू हो जाती है जो तकरीबन चालीस किलोमीटर तक फैली है। पिछले साल नक्सलियों ने जोरदार आक्रमण करके 28 कांग्रेसी नेताओं को मौत के घाट उतार दिया था। देश हैरान रह गया था इस आक्रमण को देखकर। यह पूरा इलाका पहाडी है और घना जंगल है। तीरथगढ जलप्रपात और कुटुमसर की गुफाएं इसी घाटी में स्थित हैं।

किरन्दुल रेलवे- किरन्दुल से जगदलपुर

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इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । अब बारी थी बारसूर के बाद पहले दन्तेवाडा जाने की और फिर किरन्दुल जाने की। बारसूर से दन्तेवाडा की दूरी 40 किलोमीटर है और दन्तेवाडा से किरन्दुल भी लगभग इतनी ही दूरी पर स्थित है। बारसूर से बीस किलोमीटर दूर गीदम पडता है जहां से जगदलपुर और बीजापुर की सडकें मिलती हैं। गीदम से दन्तेवाडा वाली सडक बहुत खराब हालत में थी। इसकी मरम्मत का काम चल रहा था, ऊपर से लगातार होती बारिश। पूरे बीस किलोमीटर कीचड में चलना पडा। गीदम में बीआरओ की सडक देखकर हैरान रह गया। मैं तो सोचता था कि देश के सीमावर्ती इलाकों में ही सीमा सडक संगठन है लेकिन यहां देश के बीचोंबीच बीआरओ को देखकर आश्चर्य तो होता ही है। दन्तेवाडा में दन्तेश्वरी मन्दिर है जो एक शक्तिपीठ है। दन्तेवाडा आयें और इस मन्दिर को देखे बिना निकल जायें, असम्भव था। मन्दिर में केवल धोती बांध कर ही प्रवेश किया जा सकता है। यहां लिखा भी था कि पैंट या पायजामा पहनकर प्रवेश न करें। हालांकि मैंने हाफ पैंट पहन रखी थी, इसी के ऊपर वहीं अलमारी में रखी धोती लपेट ली।

बारसूर

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इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । चित्रकोट से बारसूर की सीधी दूरी 45 किलोमीटर है। वास्तव में इस रास्ते से हम शंकित थे। अगर आप दक्षिण छत्तीसगढ यानी बस्तर का नक्शा देखें तो चार स्थान एक चतुर्भुज का निर्माण करते हैं- जगदलपुर, चित्रकोट, बारसूर और गीदम। इनमें चित्रकोट से जगदलपुर, जगदलपुर से गीदम और गीदम से बारसूर तक शानदार सडक बनी है। इतनी जानकारी मुझे यात्रा पर चलने से पहले ही हो गई थी। जब सुनील जी से रायपुर में मिला तो उन्होंने चित्रकोट-बारसूर सीधी सडक पर सन्देह व्यक्त किया था। हम जगदलपुर पहुंच गये, फिर भी इस रास्ते की शंका बनी रही। कुछ दिन पहले तरुण भाई बस्तर घूमने आये थे। उनसे बात की तो पता चला कि वे भी बारसूर से पहले गीदम गये, फिर जगदलपुर और फिर चित्रकोट। आखिरकार सन्देह सुनील जी के भतीजे ने दूर किया। उन्होंने बताया कि एक सडक है जो सीधे चित्रकोट को बारसूर से जोडती है जो तकरीबन पचास किलोमीटर की है। लेकिन साथ ही हिदायत भी दी कि उस रास्ते से न जाओ तो अच्छा। क्योंकि एक तो वह सडक बहुत खराब हालत में है और फिर वो घोर नक्सली इलाका है।

चित्रकोट जलप्रपात- अथाह जलराशि

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इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । चित्रधारा से निकले तो सीधे चित्रकोट जाकर ही रुके। जगदलपुर से ही हम इन्द्रावती नदी के लगभग समान्तर चले आ रहे थे। चित्रकोट से करीब दो तीन किलोमीटर पहले से यह नदी दिखने भी लगती है। मानसून का शुरूआती चरण होने के बावजूद भी इसमें खूब पानी था। इस जलप्रपात को भारत का नियाग्रा भी कहा जाता है। और वास्तव में है भी ऐसा ही। प्रामाणिक आंकडे तो मुझे नहीं पता लेकिन मानसून में इसकी चौडाई बहुत ज्यादा बढ जाती है। अभी मानसून ढंग से शुरू भी नहीं हुआ था और इसकी चौडाई और जलराशि देख-देखकर आंखें फटी जा रही थीं। हालांकि पानी बिल्कुल गन्दला था- बारिश के कारण। मोटरसाइकिल एक तरफ खडी की। सामने ही छत्तीसगढ पर्यटन का विश्रामगृह था। विश्रामगृह के ज्यादातर कमरों की खिडकियों से यह विशाल जलराशि करीब सौ फीट की ऊंचाई से नीचे गिरती दिखती है। मोटरसाइकिल खडी करके हम प्रपात के पास चले गये। जितना पास जाते, उतने ही रोंगटे खडे होने लगते। कभी नहीं सोचा था कि इतना पानी भी कहीं गिर सकता है। जहां हम खडे थे, कुछ दिन बाद पानी यहां तक भी आ जायेगा और प्रपात की चौडाई और भी बढ

डायरी के पन्ने- 26

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ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं। इनसे आपकी धार्मिक और सामाजिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। कृपया अपने विवेक से पढें। 1. आज की शुरूआत करते हैं जितेन्द्र सिंह से। शिमला में रहते हैं। पता नहीं फेसबुक पर हम कब मित्र बन गये। एक दिन अचानक उनके एक फोटो पर निगाह पडी। बडा ही जानदार फोटो था। फिर तो और भी फोटो देखे। एक वेबसाइट भी है। हालांकि हमारी कभी बात नहीं हुई, कभी चैट भी नहीं हुई। फोटो डीएसएलआर से ही खींचे गये हैं, बाद में कुछ एडिटिंग भी हुई है। चाहता हूं कि आप भी अपनी फोटोग्राफी निखारने के लिये उनके फोटो देखें और उनके जैसा कैप्चर करने की कोशिश करें। इसी तरह एक और फोटोग्राफर हैं तरुण सुहाग । दिल्ली में ही रहते हैं और ज्यादातर वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी करते हैं खासकर बर्ड्स फोटोग्राफी।

चित्रधारा प्रपात, छत्तीसगढ

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इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 19 जुलाई 2014 आज हमें चित्रकोट जलप्रपात देखने जाना था। सुनील जी के बडे भाई यहां जगदलपुर में रहते हैं तो हमें उम्मीद थी कि यहां से हमें कुछ न कुछ साधन मिल ही जायेगा। घर पर वैसे तो मोटरसाइकिल और कार दोनों थीं लेकिन मौसम को देखते हुए मैं कार को ज्यादा वरीयता दे रहा था। लेकिन सुनील जी के भतीजे साहब कार देने में आनाकानी करने लगे। अपनी चीज आखिर अपनी होती है। उन्हें अच्छी तरह पता है कि सुनील जी एक बेहतरीन ड्राइवर हैं, स्वयं उससे भी ज्यादा सुरक्षित तरीके से गाडी चलाते हैं, कई बार रायपुर से जगदलपुर कार से आ भी चुके हैं लेकिन फिर भी उसे कहीं न कहीं सन्देह था। मैंने सुनील जी के कान में फुसफुसाकर कहा भी कि जैसे भी हो सके, कार ले लो। बारिश के मौसम में उससे बेहतरीन कुछ और नहीं है। दो दिन की बात है बस। सुनील जी ने समझा दिया कि भले ही मैं कितना ही अच्छा ड्राइवर क्यों न होऊं लेकिन इनके लिये अच्छा ड्राइवर नहीं हूं।

किरन्दुल ट्रेन-2 (अरकू से जगदलपुर)

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । आज तो हमें जी भरकर सोना था। ग्यारह बजे ट्रेन थी, कोई चिन्ता नहीं थी। बाहर बारिश हो रही थी इसलिये अरकू घाटी में कहीं नहीं जा सकते थे। दस बजे के आसपास होटल छोड दिया। स्टेशन के पास ही सडक पर एक ढाबा था जहां दस दस रुपये में खूब सारी पूरी-सब्जी मिल रही थी। दक्षिण भारत में आपको अगर पूरी सब्जी मिल जाये तो समझिये आप खुशकिस्मत हैं। वो भी लगभग फ्री में। दस-दस रुपये तो फ्री ही होता है। हम दोनों ने बीस-बीस की खाईं और पेट में सांस लेने की भी जगह नहीं बची। बहुत दूर तक हम, ओडिशा तक हम बिना सांस लिये ही गये। आज ट्रेन पन्द्रह मिनट की देरी से चल रही थी। हमारे पास पहले से ही किरन्दुल तक का आरक्षित टिकट था। कौन जानता था कि भविष्य में हमारी क्या योजना बनेगी, इसलिये सुनील जी ने अरकू से सीधे किरन्दुल तक का टिकट ही बनवा लिया था। हालांकि आज हम जगदलपुर उतरेंगे। जगदलपुर से किरन्दुल का रेलमार्ग फिर कभी। फिर कभी मतलब दो दिन बाद।

अरकू घाटी

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । बोरा गुफाएं देखकर जब हम अरकू पहुंचे तो शाम हो चुकी थी, धीरे धीरे अन्धेरा होने लगा था। हम थक भी गये थे लेकिन सुनील जी ने कहा कि कल अगर अरकू घूमेंगे तो दोबारा ऑटो करना पडेगा, इससे तो अच्छा है कि आज उतने ही पैसों में इसी ऑटो वाले को साथ रखें। बात तो ठीक थी। फिर कल दोपहर ग्यारह बजे ट्रेन थी, हम सोकर ही नौ बजे उठेंगे, इसलिये इस घाटी में ज्यादा दूर नहीं जा सकेंगे। जब तक देखने लायक उजाला है, फोटो खींचने लायक उजाला है, अरकू ही देख लिया जाये। सबसे पहले पहुंचे जनजातीय संग्रहालय में। यहां आदिवासियों के जो पुतले बने थे, उनके क्रियाकलाप थे, सब बिल्कुल जीवन्त थे। लेकिन यहां फोटो खींचने की मनाही थी। इन पुतलों ने वास्तव में मन मोह लिया। बाहर से फोटो खींचकर यहां से बाहर निकल गये।

चापाराई प्रपात और कॉफी के बागान

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । बोरा गुफाओं से करीब चार किलोमीटर दूर कतिकी जलप्रपात है। वहां जाने वाला रास्ता बहुत ऊबड-खाबड है इसलिये ऑटो जा नहीं सकता था। हमें चार पहियों की कोई टैक्सी करनी पडती। उसके पैसे अलग से लगते, हमने इरादा त्याग दिया। लेकिन जब एक गांव में ऑटो वाले ने मुख्य सडक से उतरकर बाईं ओर मोडा, तो हम समझ गये कि यहां भी कुछ है। यह चापाराई जलप्रपात है। यह सडक एक डैड एण्ड पर खत्म होती है। हमें पैदल करीब सौ मीटर नीचे उतरना पडा और प्रपात हमारे सामने था। यह कोई ज्यादा लम्बा चौडा ऊंचा प्रपात नहीं था। फिर भी अच्छा लग रहा था। भीड नहीं थी और सबसे अच्छी बात कि यहां बस हमीं थे। कुछ और भी लोग थे लेकिन हमारे जाते ही वे वहां से चले गये। चारों तरफ बिल्कुल ग्रामीण वातावरण, खेत और जंगल। ऐसे में अगर यहां प्रपात न होता, बस जलधारा ही होती, तब भी अच्छा ही लगता।

बोर्रा गुहलू यानी बोरा गुफाएं

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 17 जुलाई 2014 की दोपहर बारह बजे तक हम अरकू पहुंच गये थे। अब हमें सबसे पहले बोरा गुफाएं देखने जाना था, हालांकि अभी कुछ ही देर पहले हम ट्रेन से वहीं से होकर आये थे लेकिन इस बात को आप जानते ही हैं कि हमने ऐसा क्यों किया? विशाखापट्टनम से किरन्दुल तक का पूरा रेलमार्ग देखने के लिये। अरकू घाटी में सबसे प्रसिद्ध बोरा गुफाएं ही हैं, इसलिये उन्हें देखना जरूरी था। एक कमरा लिया और सारा सामान उसमें पटककर, 800 रुपये में एक ऑटो लेकर बोरा की ओर चल पडे। वैसे तो बसें भी चलती हैं लेकिन वे बोरा गुफाओं तक नहीं जातीं। जाती भी होंगी तो हमें इंतजार करना पडता। मुख्य अरकू-विशाखापट्टनम सडक से बोरा गुफाएं आठ-दस किलोमीटर हटकर हैं। अरकू से गुफाओं की दूरी लगभग 30 किलोमीटर है। हमने सोचा कि ऑटो वाला इस पहाडी मार्ग पर कम से कम दो घण्टे एक तरफ के लगायेगा, लेकिन पट्ठे ने ऐसा ऑटो चलाया, ऐसा ऑटो चलाया कि हमारी रूह कांप उठी। पौन घण्टे में ही बोरा जाकर लगा दिया जबकि रास्ते में एक व्यू पॉइण्ट पर दस मिनट रुके भी थे। मैं उससे बार-बार कहता रहा कि भाई, हमें कोई जल्दी

डायरी के पन्ने-25

ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं। इनसे आपकी धार्मिक और सामाजिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। कृपया अपने विवेक से पढें। 1. दो धर्म... एक ही समय उत्पन्न हुए... एक ही स्थान से। एक पश्चिम में फैलता चला गया, एक पूर्व में। दोनों की विचारधाराएं समान। एक ईश्वर को मानने वाले, मूर्ति-पूजा न करने वाले। कट्टर। दोनों ने तत्कालीन स्थापित धर्मों को नुकसान पहुंचाया, कुचला, मारामारी की और अपना वजूद बढाते चले गये। आज... दो हजार साल बाद... दोनों में फर्क साफ दिखता है। एक बहुत आगे निकल गया है और दूसरा आज भी वही दो हजार साल पुरानी जिन्दगी जी रहा है। दोनों धर्मों के पचास से भी ज्यादा देश हैं। एक ने देशों की सीमाएं तोड दी हैं और वसुधैव कुटुम्बकम को पुनर्जीवित करने की सफल कोशिश कर रहा है, दूसरा रोज नई-नई सीमाएं बनाता जा रहा है। एक ही देश के अन्दर कई देश बन चुके हैं और सभी एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं।

किरन्दुल लाइन-1 (विशाखापट्टनम से अरकू)

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । इतना तो आप जानते ही हैं कि हावडा-चेन्नई के बीच में विशाखापट्टनम स्थित है। विशाखापट्टनम से जब ट्रेन से हावडा की तरफ चलते हैं तो शीघ्र ही एक स्टेशन आता है- कोत्तवलसा जंक्शन। यहां लोकल ट्रेनें रुकती हैं। ज्यादातर एक्सप्रेस व सुपरफास्ट ट्रेनें यहां नहीं रुकतीं। कोत्तवलसा एक जंक्शन इसलिये है कि यहां से एक लाइन किरन्दुल जाती है। हम आज इसी किरन्दुल वाली लाइन पर यात्रा करेंगे। कोत्तवलसा और किरन्दुल को जोडने के कारण इसे के-के लाइन भी कहते हैं। 1959 में जब भिलाई स्टील प्लांट शुरू हुआ तो उसके लिये दल्ली राजहरा से लौह अयस्क आ जाता था। भिलाई से दल्ली राजहरा तक रेलवे लाइन बनाई गई थी उस समय। शीघ्र ही इस प्लांट की क्षमता में वृद्धि करने की कोशिश हुई तो और ज्यादा लौह अयस्क की आवश्यकता थी। इस आवश्यकता को बस्तर में स्थित बैलाडीला की खानें पूरा कर सकती थीं लेकिन उस समय वहां पहुंचना ही लगभग असम्भव था। भीषण जंगल और पर्वतीय इलाके के कारण। तब पहली बार यहां रेलवे लाइन बिछाने की योजना बनी। इसे सीधे भिलाई से न जोडने का कारण शायद यह रहा होगा कि विशाखा

विशाखापट्टनम- चिडियाघर और कैलाशगिरी

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । मुझे विशाखापटनम में जो सबसे अच्छी जगह लगी, वो थी चिडियाघर। मेरी इच्छा नहीं थी जाने की, लेकिन सुनील जी के आग्रह पर चला गया। पन्द्रह-बीस मिनट का लक्ष्य लेकर चले थे, लग गये दो घण्टे। बाहर आने का मन ही नहीं किया। बाकी कहानी फोटो अपने आप बता देंगे। पांच बजे यहां से निकले तो कैलाशगिरी पहुंचे। जैसा कि नाम से ही विदित हो रहा है, यह एक पहाडी है। विशाखापटनम शहरी विकास प्राधिकरण ने इसे एक शानदार पिकनिक स्थल के तौर पर विकसित किया है। ऊपर जाने के लिये रोपवे भी है। यहां से विशाखापटनम का विहंगम नजारा दिखता है। रामकृष्ण बीच दिखता है और उसके परे बन्दरगाह। इसकी भी कहानी फोटो बतायेंगे। यहां एक टॉय ट्रेन भी चलती है जो कैलाशगिरी का चक्कर लगाती है। हालांकि हमने इसमें यात्रा नहीं की।

विशाखापटनम- सिम्हाचलम और ऋषिकोण्डा बीच

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 16 जुलाई 2014 की सुबह आठ बजे ट्रेन विशाखापट्टनम पहुंची। यहां भी बारिश हो रही थी और मौसम काफी अच्छा हो गया था। सबसे पहले स्टेशन के पास एक कमरा लिया और फिर विशाखापट्टनम घूमने के लिये एक ऑटो कर लिया जो हमें शाम तक सिम्हाचलम व बाकी स्थान दिखायेगा। ऑटो वाले ने अपने साले को भी अपने साथ ले लिया। वह सबसे पीछे, पीछे की तरफ मुंह करके बैठा। पहले तो हमने सोचा कि यह कोई सवारी है, जो आगे कहीं उतर जायेगी लेकिन जब वह नहीं उतरा तो हमने पूछ लिया। वे दोनों हिन्दी उतनी अच्छी नहीं जानते थे और हम तेलगू नहीं जानते थे, फिर भी उन दोनों से मजाक करते रहे, खासकर उनके जीजा-साले के रिश्ते पर। बताया जाता है कि यहां विष्णु के नृसिंह अवतार का निवास है। यह वही नृसिंह है जिसने अपने भक्त प्रह्लाद की उसके जालिम पिता से रक्षा की थी।

अरकू-बस्तर यात्रा- दिल्ली से रायपुर

14 जुलाई 2014 वैसे तो जब भी मुझे निजामुद्दीन जाना होता है तो मैं अपने यहां से एक घण्टे पहले निकलता हूं। लेकिन आज देर हो गई। फिर भी एक जानकार के लिये पौन घण्टे में शास्त्री पार्क से निजामुद्दीन पहुंचना कोई मुश्किल नहीं है। भला हो राष्ट्रमण्डल खेलों का कि कश्मीरी गेट से इन्द्रप्रस्थ तक यमुना के किनारे किनारे नई सडक बन गई अन्यथा राजघाट की लालबत्ती पर ही बीस-पच्चीस मिनट लग जाते। अब कश्मीरी गेट से काले खां तक कोई भी लालबत्ती नहीं है। बस एक बार कश्मीरी गेट से चलती है और सीधे काले खां जाकर ही रुकती है। ट्रेन चलने से दस मिनट पहले मैं निजामुद्दीन पहुंच चुका था। मेरी बर्थ कन्फर्म नहीं हुई थी लेकिन आरएसी मिल गई थी। यानी एक ही बर्थ पर दो आदमी बैठेंगे। जब टिकट बुक किया था तो वेटिंग थी। वेटिंग टिकट लेना सट्टा खेलने के बराबर होता है। जीत गये तो जीत गये और हार गये तो हार गये। इस तरह आरएसी सीट मेरे लिये जीत के ही बराबर थी। टीटीई ईमानदार निकला तो क्या पता कि मथुरा-आगरा तक पक्की बर्थ भी मिल जाये।

मथुरा-जयपुर-सवाई माधोपुर-आगरा पैसेंजर ट्रेन यात्रा

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4 अगस्त 2014 जैसा कि आप जानते हैं कि मुझे नई नई लाइनों पर पैसेंजर ट्रेनों में घूमने का शौक है। और अब तो एक लक्ष्य और बना लिया है भारत भर के सभी रेलवे स्टेशनों के फोटो खींचना। तो सभी स्टेशनों के फोटो उन्हीं ट्रेनों में बैठकर खींचे जा सकते हैं जो सभी स्टेशनों पर रुकती हों यानी पैसेंजर व लोकल ट्रेनें। कुछ लाइनें मुख्य लाइनें कही जाती हैं। ये ज्यादातर विद्युतीकृत हैं और इन पर शताब्दी व राजधानी ट्रेनों सहित अन्य ट्रेनों का बहुत ज्यादा ट्रैफिक रहता है। इनके बीच में जगह जगह लिंक लाइनें भी होती हैं जो मुख्य लाइन के कुछ स्टेशनों को आपस में जोडती हैं। इन लिंक लाइनों पर उतना ट्रैफिक नहीं होता। इसी तरह की तीन मुख्य लाइनें हैं- दिल्ली- आगरा लाइन जो आगे भोपाल की तरफ चली जाती है, मथुरा-कोटा लाइन जो आगे रतलाम व वडोदरा की ओर जाती है और दिल्ली- जयपुर लाइन जो आगे अहमदाबाद की ओर जाती है। इन लाइनों पर मैंने पैसेंजर ट्रेनों में यात्रा कर रखी है। इनके बीच में कुछ लिंक लाइनें भी हैं जो अभी तक मुझसे बची हुई थीं। ये लाइनें हैं मथुरा-अलवर, जयपुर-सवाई माधोपुर और बयाना-आगरा किला। इन सभी लाइनों पर पैसेंजर ट्रेनों म

पटना से दिल्ली ट्रेन यात्रा

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 4 सितम्बर 2014 की सुबह सुबह उजाला होने से पहले मैंने पटना स्टेशन पर कदम रखा। हालांकि पहले भी एक बार पटना से होकर गुजर चुका हूं लेकिन तब रात होने के कारण नीचे नहीं उतरा था। आज मुझे पटना से मुगलसराय तक लोकल ट्रेन से यात्रा करनी है। इधर आने से पहले एक मित्र ने बताया था कि स्टेशन के सामने ही महावीर जी यानी हनुमान जी का बडा भव्य मन्दिर है। वहां के लड्डू बडे स्वादिष्ट होते हैं। एक बार लेकर चखना जरूर। अब जब मैं यहां आ गया तो लड्डू लेना तो बनता था, लेकिन मैंने नहीं लिये। हालांकि मन्दिर वास्तव में भव्य है। सीधे मुगलसराय का पैसेंजर का टिकट ले लिया। बक्सर में ट्रेन बदलनी पडेगी। पटना से बक्सर के लिये पहली लोकल सुबह पांच बजकर चालीस मिनट पर चलती है। लेकिन यह सभी स्टेशनों पर नहीं रुकती। फिर पांच से छह बजे तक उजाला भी नहीं होता, इसलिये इसे छोड दिया। अगली ट्रेन सात चालीस पर है। यह ग्यारह बजकर पांच मिनट पर बक्सर पहुंचेगी और वहां से मुगलसराय की लोकल साढे ग्यारह बजे है। पटना-बक्सर लोकल का नम्बर 63227 है जबकि बक्सर-मुगलसराय का नम्बर 63229 है। इ

डायरी के पन्ने-24

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ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं। इनसे आपकी धार्मिक और सामाजिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। कृपया अपने विवेक से पढें। 1.  दो फिल्में देखीं- ‘हैदर’ और ‘मैरीकॉम’। दोनों में वैसे तो कोई साम्य नहीं है, बिल्कुल अलग-अलग कहानी है और अलग अलग ही पृष्ठभूमि। लेकिन एक बात समान है। दोनों ही उन राज्यों से सम्बन्धित हैं जहां भारत विरोध होता रहता है। दोनों ही राज्यों में सेना को हटाने की मांग होती रहती है। हालांकि पिछले कुछ समय से दोनों ही जगह शान्ति है लेकिन फिर भी देशविरोधी गतिविधियां होती रहती हैं। लेकिन मैं कुछ और कहना चाहता हूं। ‘हैदर’ के निर्माताओं ने पहले हाफ में जमकर सेना के अत्याचार दिखाए हैं। कुछ मित्रों का कहना है कि जो भी दिखाया है, वो सही है। लेकिन मेरा कहना है कि यह एक बहुत लम्बे घटनाक्रम का एक छोटा सा हिस्सा है। हालांकि सेना ने वहां अवश्य ज्यादातियां की हैं, नागरिकों पर अवश्य बेवजह के जुल्म हुए हैं लेकिन उसकी दूसरी कई वजहें थीं। वे वजहें भी फिल्म में दिखाई जानी थीं। दूसरी बात कि अगर दूसरी वजहें नहीं दिखा सकते थे समय की कमी आदि के कारण तो सेना के अत्याचार भी नहीं दिखाने च

गोमो से हावडा लोकल ट्रेन यात्रा

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । यह गोमो से आसनसोल जाने वाली एक मेमू ट्रेन थी जो आसनसोल में पांच मिनट रुककर बर्द्धमान के लिये चल देती है। बर्द्धमान से हावडा जाने के लिये थोडी-थोडी देर में लोकल ट्रेनें हैं जो कॉर्ड व मेन दोनों लाइनों से जाती रहती हैं। मैंने गोमो से ही सीधे हावडा का पैसेंजर का टिकट ले लिया। पूरे 300 किलोमीटर है। सुबह सवा सात बजे ट्रेन चल पडी। गोमो से निकलकर रामकुण्डा हाल्ट था जहां यह ट्रेन नहीं रुकती। शायद कोई भी ट्रेन नहीं रुकती। पहले रुकती होगी कभी। इसके बाद मतारी, नीचीतपुर हाल्ट, तेतुलमारी, भूली हाल्ट और फिर धनबाद आता है। आठ बजकर दस मिनट पर धनबाद पहुंच गये। गोमो से यहां तक ट्रेन बिल्कुल खचाखच भरी थी। सुबह का समय और धनबाद जैसी जगह; भला ट्रेन क्यों न भरे? धनबाद में खाली हो गई और फिर नये सिरे से भर गई हालांकि इस बार उतनी भीड नहीं थी।

मुगलसराय से गोमो पैसेंजर ट्रेन यात्रा

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दिल्ली से मुगलसराय 1 सितम्बर 2014, सोमवार सितम्बर की पहली तारीख को मेरी नंदन कानन एक्सप्रेस छूट गई। सुबह साढे छह बजे नई दिल्ली से ट्रेन थी और मुझे ऑफिस में ही सवा छह बज गये थे। फिर नई दिल्ली जाने की कोशिश भी नहीं की और सीधा कमरे पर आ गया। इस बार मुझे मुगलसराय से हावडा को अपने पैसेंजर ट्रेन के नक्शे में जोडना था। ऐसा करने से दिल्ली और हावडा भी जुड जाते। दिल्ली-मुम्बई पहले ही जुडे हुए हैं। पहले भी हावडा की तरफ जाने की कोशिश की थी लेकिन पीछे हटना पडता था। इसका कारण था कि भारत के इस हिस्से में ट्रेनें बहुत लेट हो जाती हैं। चूंकि स्टेशनों के फोटो भी खींचने पडते थे, इसलिये सफर दिन में ही कर सकता था। इस तरह मुगलसराय से पहले दिन चलकर गोमो तक जा सकता था और दूसरे दिन हावडा तक। हावडा से वापस दिल्ली आने के लिये वैसे तो बहुत ट्रेनें हैं लेकिन शाम को ऐसी कोई ट्रेन नहीं थी जिससे मैं अगले दिन दोपहर दो बजे से पहले दिल्ली आ सकूं। थी भी तो कोई भरोसे की नहीं थी सिवाय राजधानी के। राजधानी ट्रेनें बहुत महंगी होती हैं, इसलिये मैं इन्हें ज्यादा पसन्द नहीं करता।

मलाणा- नशेडियों का गांव

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । मलाणा समुद्र तल से 2685 मीटर की ऊंचाई पर बसा एक काफी बडा गांव है। यहां आने से पहले मैं इसकी बडी इज्जत करता था लेकिन अब मेरे विचार पूरी तरह बदल गये हैं। मलाणा के बारे में प्रसिद्ध है कि यहां प्राचीन काल से ही प्रजातन्त्र चलता आ रहा है। कहते हैं कि जब सिकन्दर भारत से वापस जाने लगा तो उसके सैनिक लम्बे समय से युद्ध करते-करते थक चुके थे। सिकन्दर के मरने पर या मरने से पहले कुछ सैनिक इधर आ गये और यहीं बस गये। इनकी भाषा भी आसपास के अन्य गांवों से बिल्कुल अलग है। एक और कथा है कि जमलू ऋषि ने इस गांव की स्थापना की और रहन-सहन के नियम-कायदे बनाये। प्रजातन्त्र भी इन्हीं के द्वारा बनाया गया है। आप गूगल पर Malana या मलाणा या मलाना ढूंढो, आपको जितने भी लेख मिलेंगे, इस गांव की तारीफ करते हुए ही मिलेंगे। लेकिन मैं यहां की तारीफ कतई नहीं करूंगा। इसमें हिमालयी तहजीब बिल्कुल भी नहीं है। कश्मीर जो सुलग रहा है, वहां आप कश्मीरी आतंकवादियों से मिलोगे तो भी आपको मेहमान नवाजी देखने को मिलेगी लेकिन हिमाचल के कुल्लू जिले के इस दुर्गम गांव में मेहमान नवा

चन्द्रखनी दर्रा- बेपनाह खूबसूरती

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । अगले दिन यानी 19 जून को सुबह आठ बजे चल पडे। आज जहां हम रुके थे, यहां हमें कल ही आ जाना था और आज दर्रा पार करके मलाणा गांव में रुकना था लेकिन हम पूरे एक दिन की देरी से चल रहे थे। इसका मतलब था कि आज शाम तक हमें दर्रा पार करके मलाणा होते हुए जरी पहुंच जाना है। जरी से कुल्लू की बस मिलेगी और कुल्लू से दिल्ली की। अब चढाई ज्यादा नहीं थी। दर्रा सामने दिख रहा था। वे दम्पत्ति भी हमारे साथ ही चल रहे थे। कुछ आगे जाने पर थोडी बर्फ भी मिली। अक्सर जून के दिनों में 3600 मीटर की किसी भी ऊंचाई पर बर्फ नहीं होती। चन्द्रखनी दर्रा 3640 मीटर की ऊंचाई पर है जहां हम दस बजे पहुंचे। मलाणा घाटी की तरफ देखा तो अत्यधिक ढलान ने होश उडा दिये। चन्द्रखनी दर्रा बेहद खूबसूरत दर्रा है। यह एक काफी लम्बा और अपेक्षाकृत कम चौडा मैदान है। जून में जब बर्फ पिघल जाती है तो फूल खिलने लगते हैं। जमीन पर ये रंग-बिरंगे फूल और चारों ओर बर्फीली चोटियां... सोचिये कैसा लगता होगा? और हां, आज मौसम बिल्कुल साफ था। जितनी दूर तक निगाह जा सकती थी, जा रही थी। धूप में हाथ फैलाकर घास

चन्द्रखनी दर्रे के और नजदीक

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । अगले दिन यानी 18 जून को सात बजे आंख खुली। रात बारिश हुई थी। मेरे टैंट में सुरेन्द्र भी सोया हुआ था। बोला कि बारिश हो रही है, टैंट में पानी तो नहीं घुसेगा। मैंने समझाया कि बेफिक्र रहो, पानी बिल्कुल नहीं घुसेगा। सुबह बारिश तो नहीं थी लेकिन मौसम खराब था। कल के कुछ परांठे रखे थे लेकिन उन्हें बाद के लिये रखे रखा और अब बिस्कुट खाकर पानी पी लिया। सुनने में तो आ रहा था कि दर्रे के पास खाने की एक दुकान है लेकिन हम इस बात पर यकीन नहीं कर सकते थे। मैंने पहले भी बताया था कि इस मैदान से कुछ ऊपर गुज्जरों का डेरा था। घने पेडों के बीच होने के कारण वह न तो कल दिख रहा था और न ही आज। हां, आवाजें खूब आ रही थीं। अभी तक हमारा सामना गद्दियों से नहीं हुआ था लेकिन उम्मीद थी कि गद्दी जरूर मिलेंगे। आखिर हिमाचल की पहचान खासकर कांगडा, चम्बा व कुल्लू की पहचान गद्दी ही तो हैं। गुज्जर व गद्दी में फर्क यह है कि गुज्जर गाय-भैंस पालते हैं जबकि गद्दी भेड-बकरियां। गुज्जर ज्यादातर मुसलमान होते हैं और गद्दी हिन्दू। ये गुज्जर पश्चिमी उत्तर प्रदेश व राजस्थान वाली

डायरी के पन्ने-23

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ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं। इनसे आपकी धार्मिक और सामाजिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। कृपया अपने विवेक से पढें। 1. 27 जून को जब ‘ आसमानी बिजली के कुछ फोटो ’ प्रकाशित किये तो उस समय सबकुछ इतना अच्छा चल रहा था कि मैं सोच भी नहीं सकता था कि तीन महीनों तक ब्लॉग बन्द हो जायेगा। अगली पोस्ट 1 जुलाई को डायरी के पन्ने प्रकाशित होनी थी। यह ‘डायरी के पन्ने’ ही एकमात्र ऐसी श्रंखला है जिसमें मुझे एक दिन पहले ही पोस्ट लिखनी, संशोधित करनी, ब्लॉग पर लगानी व सजानी पडती है। भले ही मैं दूसरे कार्यों में कितना भी व्यस्त रहूं, लेकिन निर्धारित तिथियों पर ‘डायरी के पन्ने’ प्रकाशित होने ही हैं। 30 जून को भी कुछ ऐसा ही हुआ। पिछले पन्द्रह दिनों में मैंने डायरी का एक शब्द भी नहीं लिखा था। बस कुछ शीर्षक लिख लिये थे, जिन पर आगामी डायरी में चर्चा करनी थी। 30 तारीख को मैं उन शीर्षकों को विस्तृत रूप देने में लग गया। मैं प्रत्येक लेख पहले माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में लिखता हूं, बाद में ब्लॉग पर लगा देता हूं। उस दिन, रात होते होते 6700 शब्द लिखे जा चुके थे। काफी बडी व मनोरंजक डायरी होने वाली थी।

चन्द्रखनी ट्रेक- पहली रात

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । अच्छी खासी चढाई थी। जितना आसान मैंने सोच रखा था, यह उतनी आसान थी नहीं। फिर थोडी-थोडी देर बाद कोई न कोई आता-जाता मिल जाता। पगडण्डी भी पर्याप्त चौडी थी। चारों तरफ घोर जंगल तो था ही। निःसन्देह यह भालुओं का जंगल था। लेकिन हम चार थे, इसलिये मुझे डर बिल्कुल नहीं लग रहा था। जंगल में वास्तविक से ज्यादा मानसिक डर होता है। आधे-पौने घण्टे चलने के बाद घास का एक छोटा सा मैदान मिला। चारों अपने बैग फेंककर इसमें पसर गये। सभी पसीने से लथपथ थे। मैं भी बहुत थका हुआ था। मन था कि यहीं पर टैंट लगाकर आज रुक जायें। लेकिन आज की हमारी योजना चन्द्रखनी के ज्यादा से ज्यादा नजदीक जाकर रुकने की थी ताकि कल हम दोपहर बादल होने से पहले-पहले ऊपर पहुंच जायें व चारों तरफ के नजारों का आनन्द ले सकें। अभी हम 2230 मीटर पर थे। अभी दिन भी था तो जी कडा करके आगे बढना ही पडेगा।

चन्द्रखनी ट्रेक- रूमसू गांव

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । अशोक व मधुर को शक था कि हम ठीक रास्ते पर जा रहे हैं। या फिर सर्वसुलभ जिज्ञासा होती है सामने वाले से हर बात पूछने की। हालांकि मैंने हर जानकारी जुटा रखी थी। उसी के अनुसार योजना बनाई थी कि आज दर्रे के जितना नजदीक जा सकते हैं, जायेंगे। कल दर्रा पार करके मलाणा गांव में रुकेंगे और परसों मलाणा से जरी होते हुए कुल्लू जायेंगे और फिर दिल्ली। रोरिक आर्ट गैलरी 1850 मीटर की ऊंचाई पर है। चन्द्रखनी 3640 मीटर पर। दूरी कितनी है ये तो पता नहीं लेकिन इस बात से दूरी का अन्दाजा लगाया जा सकता है कि आमतौर पर हम जैसे लोग इस दूरी को एक दिन में तय नहीं करते। दो दिन लगाते हैं। इससे 18-20 किलोमीटर होने का अन्दाजा लगाया जा सकता है। 18 किलोमीटर में या 20 किलोमीटर में 1850 से 3640 मीटर तक चढना कठिन नहीं कहा जा सकता। यानी चन्द्रखनी की ट्रैकिंग कठिन नहीं है।

रोरिक आर्ट गैलरी, नग्गर

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । नग्गर का जिक्र हो और रोरिक आर्ट गैलरी का जिक्र न हो, असम्भव है। असल में रोरिक ने ही नग्गर को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दी है। निकोलस रोरिक एक रूसी चित्रकार था। उसकी जीवनी पढने से पता चलता है कि एक चित्रकार होने के साथ-साथ वह एक भयंकर घुमक्कड भी था। 1917 की रूसी क्रान्ति के समय उसने रूस छोड दिया और इधर-उधर घूमता हुआ अमेरिका चला गया। वहां से वह भारत आया लेकिन नग्गर तब भी उसकी लिस्ट में नहीं था। पंजाब से शुरू करके वह कश्मीर गया और फिर लद्दाख, कराकोरम, खोतान, काशगर होते हुए तिब्बत में प्रवेश किया। तिब्बत में उन दिनों विदेशियों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध था। वहां किसी को मार डालना फूंक मारने के बराबर था। रोरिक भी मरते-मरते बचा और भयंकर परिस्थितियों का सामना करते हुए उसने सिक्किम के रास्ते भारत में पुनः प्रवेश किया और नग्गर जाकर बस गये। एक रूसी होने के नाते अंग्रेज सरकार निश्चित ही उससे बडी चौकस रहती होगी।

चन्द्रखनी दर्रे की ओर- दिल्ली से नग्गर

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इस यात्रा पर चलने से पहले इसका परिचय दे दूं। यह दर्रा हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में है। जैसा कि हर दर्रे के साथ होता है कि ये किन्हीं दो नदी घाटियों को जोडने का काम करते हैं, तो चन्द्रखनी भी अपवाद नहीं है। यह ब्यास घाटी और मलाणा घाटी को जोडता है। मलाणा नाला या चाहें तो इसे मलाणा नदी भी कह सकते हैं, आगे चलकर जरी के पास पार्वती नदी में मिल जाता है और पार्वती भी आगे भून्तर में ब्यास में मिल जाती है। इसकी ऊंचाई समुद्र तल से 3640 मीटर है। बहुत दिन से बल्कि कई सालों से मेरी यहां जाने की इच्छा थी। काफी समय पहले जब बिजली महादेव और मणिकर्ण गया था तब भी एक बार इस दर्रे को लांघने का इरादा बन चुका था। अच्छा किया कि तब इसकी तरफ कदम नहीं बढाये। बाद में दुनियादारी की, ट्रेकिंग की ज्यादा जानकारी होने लगी तो पता चला कि चन्द्रखनी के लिये एक रात कहीं रास्ते में बितानी पडती है। उस जगह रुकने को छत मिल जायेगी या नहीं, इसी दुविधा में रहा। खाने पीने की मुझे कोई ज्यादा परेशानी नहीं थी, बस छत चाहिये थी। तभी एक दिन पता चला कि रास्ते में कहीं एक गुफा है, जहां स्लीपिंग बैग के सहारे रात गुजारी जा सकती है। लेकि

आसमानी बिजली के कुछ फोटो

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बरसात में जब बिजली चमकती है तो सेकंड के सौवें हिस्से में सबकुछ हो जाता है। पता नहीं लोगबाग इतनी फुर्ती से इनके फोटो कैसे खींच लेते हैं? मैंने भी कोशिश की लेकिन जब तक क्लिक करता, तब तक दो सेकंड बीत जाते। कडकती बिजली के लिये तो दो सेकंड बहुत ज्यादा होते हैं। मुझे हमेशा अन्धेरी रात ही दिखाई देती। इलाज निकला। कैमरे को ट्राइपॉड पर वीडियो मोड में लगाकर छोड दिया और अन्दर जाकर डिनर करने लगा। वापस आया तो करीब बीस मिनट की वीडियो हाथ लग चुकी थी। इसमें बहुत बढिया बिजली कडकती व गिरती भी कैद हो गई। दो-तीन बार ऐसा किया। आखिरकार उन वीडियो से कुछ फोटो हाथ लगे हैं, क्वालिटी बेशक उतनी अच्छी नहीं है लेकिन बिजली अच्छी लग रही है।

चूडधार की जानकारी व नक्शा

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चूडधार की यात्रा कथा तो पढ ही ली होगी। ट्रेकिंग पर जाते हुए मैं जीपीएस से कुछ डाटा अपने पास नोट करता हुआ चलता हूं। यह अक्षांस, देशान्तर व ऊंचाई होती है ताकि बाद में इससे दूरी-ऊंचाई नक्शा बनाया जा सके। आज ज्यादा कुछ नहीं है, बस यही डाटा है। अक्षांस व देशान्तर पृथ्वी पर हमारी सटीक स्थिति बताते हैं। मैं हर दस-दस पन्द्रह-पन्द्रह मिनट बाद अपनी स्थिति नोट कर लेता था। अपने पास जीपीएस युक्त साधारण सा मोबाइल है जिसमें मैं अपना यात्रा-पथ रिकार्ड नहीं कर सकता। हर बार रुककर एक कागज पर यह सब नोट करना होता था। इससे पता नहीं चलता कि दो बिन्दुओं के बीच में कितनी दूरी तय की। बाद में गूगल मैप पर देखा तो उसने भी बताने से मना कर दिया। कहने लगा कि जहां सडक बनी है, केवल वहीं की दूरी बताऊंगा। अब गूगल मैप को कैसे समझाऊं कि सडक तो चूडधार के आसपास भी नहीं फटकती। हां, गूगल अर्थ बता सकता है लेकिन अपने नन्हे से लैपटॉप में यह कभी इंस्टाल नहीं हो पाया।

कांगडा रेल यात्रा- जोगिन्दर नगर से ज्वालामुखी रोड तक

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । चला था मिलन ग्लेशियर के लिये, पहुंच गया चूडधार और उसके बाद कमरुनाग। अभी भी मेरे पास एक दिन और शेष था। सुरेन्द्र के पास भी एक दिन था। एक बार तो मन में आया भी कि दिल्ली वापस चलते हैं, एक दिन घर पर ही बिता लेंगे। फिर याद आया कि मैंने अभी तक कांगडा रेलवे पर जोगिन्दर नगर से बैजनाथ पपरोला के बीच यात्रा नहीं की है। तकरीबन पांच साल पहले मैंने इस लाइन पर पठानकोट से बैजनाथ पपरोला तक यात्रा की थी। उस समय मुझे पता नहीं था कि हिमाचल में रात को भी बसें चलती हैं। पता होता तो मैं उसी दिन जोगिन्दर नगर तक नाप डालता। जोगिन्दर नगर को मैं कोई छोटा-मोटा गांव समझता था। रात रुकने के लिये कोई कमरा मिलने में सन्देह था।

कमरुनाग से वापस रोहांडा

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 13 मई 2014, मंगलवार आज हमें कमरुनाग से शिकारी देवी जाना था जिसकी दूरी स्थानीय निवासी 18 किलोमीटर बताते हैं। रास्ता ऊपर पहाडी धार से होकर ही जाता है, तो ज्यादा उतराई-चढाई का सामना नहीं करना पडेगा। आंख खुली तो बाहर टप-टप की आवाज सुनकर पता चल गया कि बारिश हो रही है। हिमालय की ऊंचाईयों पर अक्सर दोपहर बाद मौसम खराब हो जाता है, फिर एक झडी लगती है और उसके बाद मौसम खुल जाता है। सुबह मौसम बिल्कुल साफ-सुथरा मिलता है। लेकिन आज ऐसा नहीं था। मैं सबसे आखिर में उठने वालों में हूं, सचिन ही पहले उठा और बाहर झांक आया। बताया कि बारिश हो रही है। इसका अर्थ है कि पूरी रात बूंदाबांदी होती रही थी और अभी भी खुलना मुश्किल है। ऐसे में हम शिकारी देवी नहीं जा सकते थे क्योंकि सचिन व सुरेन्द्र के पास रेनकोट नहीं थे। फिर वो रास्ता ऊपर धार से होकर ही है जहां मामूली हवा भी बडी तेज व ठण्डी लगती है।

रोहांडा से कमरुनाग

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 12 मई 2014, सोमवार बताते हैं, पांच हजार साल पहले कोई रतन यक्ष था। उसने भगवान विष्णु को गुरू मानकर स्वयं ही प्रचण्ड युद्धकला सीख ली थी। उसे जब पता चला कि महाभारत का युद्ध होने वाला है, तो उसने भी युद्ध में जाने की ठानी। लेकिन वह चूंकि प्रचण्ड योद्धा था, उसने तय किया कि जो भी पक्ष कमजोर होगा, वह उसकी तरफ से लडेगा। यह बात जब कृष्ण को पता चली तो वह चिन्तित हो उठे क्योंकि इस युद्ध में कौरव ही हारने वाले थे और रतन के कारण इसमें बडी समस्या आ सकती थी। कृष्ण एक साधु का रूप धारण करके उसके पास गये और उसके आने का कारण पूछा। सबकुछ जानने के बाद उन्होंने उसकी परीक्षा लेनी चाही, रतन राजी हो गया। कृष्ण ने कहा कि एक ही तीर से इस पीपल से सभी पत्ते बेध दो। इसी दौरान कृष्ण ने नजर बचाकर कुछ पत्ते अपने पैरों के नीचे छुपा दिये। जब रतन ने सभी पत्ते बेध दिये तो कृष्ण ने देखा कि उनके पैरों के नीचे रखे पत्ते भी बिंधे पडे हैं, तो वे उसकी युद्धकला को मान गये। जब उन्होंने उसके गुरू के बारे में पूछा तो यक्ष ने भगवान विष्णु का नाम लिया। चूंकि कृष्ण स्वयं व

डायरी के पन्ने- 22

ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं। इनसे आपकी धार्मिक और सामाजिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। कृपया अपने विवेक से पढें। 1. 2 जून 2014, सोमवार, तेलंगाना राज्य बन गया। मैं नये राज्यों का समर्थक हूं। कुछ राज्य मेरी भी लिस्ट में हैं, जो बनने चाहिये। इनमें सबसे ऊपर है हरित प्रदेश। यूपी के धुर पश्चिम से लेकर धुर पूर्व तक मैं गया हूं, अन्तर साफ दिखाई पडता है। मुरादाबाद से आगरा तक एक लाइन खींचो... ह्म्म्म... चलो, बरेली को भी जोड लेते हैं। रुहेलखण्ड पर एहसान कर देते हैं। तो जी, बरेली से आगरा तक एक लाइन खींचो। इसके पश्चिम का इलाका यानी पश्चिमी उत्तर प्रदेश को हरित प्रदेश कहा जायेगा। यहां नहरों का घना जाल बिछा हुआ है, जमीन उपजाऊ है, समृद्धि भी है। शीघ्र ही यह हरियाणा और पंजाब से टक्कर लेने लगेगा। मुख्य फसल गन्ना है जो समृद्धि की फसल होती है। फिर एक बात और, अक्सर यूपी-बिहार को एक माना जाता है और इनकी संस्कृति भी एक ही मानी जाती है। लेकिन इस हरित प्रदेश की संस्कृति उस यूपी-बिहार वाली संस्कृति से बिल्कुल अलग है। जमीन-आसमान का फर्क है। उस यूपी-बिहार में जहां अपनी जमीन छोडकर पलायन करने

रोहांडा में बारिश

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 11 मई 2014, रविवार सुन्दरनगर में हमें ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी पडी। करसोग की बस आ गई। यह हमीरपुर से आई थी और यहां पौन घण्टा रुकेगी। बस के स्टाफ को खाना खाना था। ग्यारह बजे बस चल पडी। सुन्दरनगर से रोहांडा लगभग 40 किलोमीटर है। पूरा रास्ता चढाई भरा है। सुन्दरनगर समुद्र तल से जहां 850 मीटर की ऊंचाई पर है, वही रोहांडा 2140 मीटर पर। रोहांडा से ही कमरुनाग का पैदल रास्ता शुरू होता है। वहां से कमरुनाग करीब 6 किलोमीटर दूर है। हमें आज ही कमरुनाग के लिये चल पडना है। रात्रि विश्राम वहीं करेंगे। लेकिन जैसा हम सोचते हैं, अक्सर वैसा नहीं होता। जैसे जैसे रोहांडा की ओर बढते जा रहे थे, मौसम खराब होने लगा और आखिरकार बारिश भी शुरू हो गई। जब दो-ढाई घण्टे बाद रोहांडा पहुंचे, बारिश हो रही थी और तापमान काफी गिर गया था। इतना गिर गया कि बस से उतरते ही तीनों को गर्म कपडे पहनने पड गये।

तराहां से सुन्दरनगर तक- एक रोमांचक यात्रा

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 10 मई 2014, शनिवार पहले कल की बात बताता हूं। कल शाम जब मैं चूडधार से तराहां आया था तो बहुत थका हुआ था। इसका कारण था कि कल ज्यादातर रास्ता जंगल से तय किया था और मैं अपनी हैसियत से बहुत ज्यादा तेज चला था। नीचे उतरने में पूरे शरीर पर झटके लगते हैं। इसलिये जब रात सोने लगा तो पैर के नाखून से सिर के बाल तक हर अंग दर्द कर रहा था। इस दर्द के कारण रात भर अच्छी नींद भी नहीं आई। रही सही कसर उन पडोसियों ने पूरी कर दी जो उसी कमरे में दूसरे बिस्तरों पर सो रहे थे। उनके खर्राटे इतने जोरदार थे कि कई बार तो रोंगटे खडे हो जाते।

भंगायणी माता मन्दिर, हरिपुरधार

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इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 10 मई 2014 हरिपुरधार के बारे में सबसे पहले दैनिक जागरण के यात्रा पृष्ठ पर पढा था। तभी से यहां जाने की प्रबल इच्छा थी। आज जब मैं तराहां में था और मुझे नोहराधार व कहीं भी जाने के लिये हरिपुरधार होकर ही जाना पडेगा तो वो इच्छा फिर जाग उठी। सोच लिया कि कुछ समय के लिये यहां जरूर उतरूंगा। तराहां से हरिपुरधार की दूरी 21 किलोमीटर है। यहां देखने के लिये मुख्य एक ही स्थान है- भंगायणी माता का मन्दिर जो हरिपुरधार से दो किलोमीटर पहले है। बस ने ठीक मन्दिर के सामने उतार दिया। कुछ और यात्री भी यहां उतरे। कंडक्टर ने मुझे एक रुपया दिया कि ये लो, मेरी तरफ से मन्दिर में चढा देना। इससे पता चलता है कि माता का यहां कितना प्रभाव है।

चूडधार यात्रा- वापसी तराहां के रास्ते

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इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 9 मई 2014, शुक्रवार आज के इस वृत्तान्त का शीर्षक होना चाहिये था- नमाज बख्शवाने गये थे, रोजे गले पड गये। चूडधार शिखर के नीचे जहां मन्दिर और धर्मशाला बने हैं, वहीं एक दुकान में मैं परांठे खाने बैठ गया; आलू के परांठे मिल गये थे। बिल्कुल घटिया परांठे थे। अगर पहले ही पता होता तो एक खाकर ही तौबा कर लेता। जब तक घटियापन का पता चला, तब तक दूसरा परांठा भी बन चुका था। तो बातों ही बातों में मैंने जिक्र कर दिया कि यहां से नीचे जाने के कौन कौन से रास्ते हैं। बोला कि एक तो ‘त्रां’ वाला है और एक ‘स्रां’ वाला। बाद में पता चला कि ये क्रमशः तराहां और सराहां हैं। मेरा स्लीपिंग बैग चूंकि नोहराधार में रखा था, उसे लेना जरूरी था इसलिये मुझे इनमें से तराहां वाला रास्ता चुनना पडा। तराहां से नोहराधार की बसें मिल जाती हैं।

चूडधार यात्रा- 2

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इस यात्रा-वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 9 मई 2014, शुक्रवार आलू के परांठे खाने की इच्छा थी लेकिन इस समय यहां आलू न होने के कारण यह पूरी न हो सकी। इसलिये सादे परांठों से ही काम चलाना पडा। अभी हवा नहीं चल रही थी और मौसम भी साफ था लेकिन हो सकता है कि कुछ समय बाद हवा भी चलने लगे और मौसम भी बिगडने लगे। निकलने से पहले चेहरे पर थोडी सी क्रीम लगा ली। ट्रैकिंग पोल जो अभी तक बैग में ही था, अब बाहर निकाल लिया। आज मुझे बर्फ में एक लम्बा सफर तय करना है। साढे आठ बजे चल पडा। तीसरी से चूडधार की दूरी छह किलोमीटर है लेकिन खतरनाक रास्ता होने के कारण मैं इसे चार घण्टे में पार कर लेने की सोच रहा था। तीन घण्टे वापस आने में लगेंगे। यानी शाम चार बजे तक यहां लौट आऊंगा। नोहराधार से कल यहां तक आने में पांच घण्टे लगे थे, तीन घण्टे में यहां से नोहराधार जा सकता हूं। इसलिये आज रात को नोहराधार में ही रुकने की कोशिश करूंगा।

डायरी के पन्ने- 21

ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं। इनसे आपकी धार्मिक और सामाजिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। कृपया अपने विवेक से पढें। 1. पिछले दिनों घर में पिताजी और धीरज के बीच मतभेद हो गया। दोनों गांव में ही थे। मेरी हर दूसरे-तीसरे दिन फोन पर बात हो जाती थी। पहले भी मतभेद हुए हैं। लेकिन दोनों में से कोई भी मुझे इसकी भनक नहीं लगने देता। इस बार भनक लग गई। पिताजी से पूछा तो उन्होंने नकार दिया कि नहीं, सबकुछ ठीक है। धीरज ने भी ऐसा ही कहा। लेकिन दोनों के लहजे से साफ पता चल रहा था कि कुछ गडबड है। आखिरकार बात सामने आ ही गई।

चूडधार यात्रा-1

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इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 7 मई 2014, बुधवार चण्डीगढ स्टेशन के प्रतीक्षालय में जब नहा रहा था तभी बाडमेर-कालका एक्सप्रेस आ गई। मैंने कालका तक का टिकट ले रखा था। फटाफट नहाया और ट्रेन में जा बैठा। ट्रेन यहां काफी देर तक रुकी रही थी। हालांकि आज हिमाचल में लोकसभा के चुनाव थे, फिर भी मैंने सोच रखा था कि चूडधार तो जाना ही है। अगर उत्तराखण्ड की तरह यहां भी बसों का टोटा रहा तो सोलन तक जाने के लिये ट्रेन थी ही। हिमाचल में यात्रा करने का एक लाभ ये भी है कि यहां के पहाडों में बहुत दूर दूर तक दूसरे राज्यों की सरकारी बसें भी जाती हैं। उत्तराखण्ड में ऐसा नहीं है। अगर हिमाचल परिवहन की बसें बन्द मिली तो हरियाणा, पंजाब और चण्डीगढ परिवहन की बसें भी नियमित रूप से शिमला और आगे तक जाती हैं।

कहां मिलम, कहां झांसी और कहां चूडधार?

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बडे जोर-शोर से तैयारियां हो रही थी मिलम ग्लेशियर जाने की। काफी समय पहले वहां जाने की योजना बन चुकी थी, पर्याप्त होमवर्क भी कर चुका था। इसके अलावा मिलम और मुन्स्यारी के रास्ते में या थोडा-बहुत इधर उधर हटकर कुछ और स्थानों की भी जानकारी ले ली थी जैसे कि नन्दा देवी ईस्ट बेस कैम्प और नामिक ग्लेशियर। मेरा दिल्ली से सोमवार की सुबह निकलना होता है। हल्द्वानी जल्दी से जल्दी पहुंचने के लिये आनन्द विहार से शताब्दी एक्सप्रेस एक उत्तम ट्रेन है। पहले इसके स्थान पर एक एसी ट्रेन चला करती थी, उसमें थर्ड एसी के डिब्बे होते थे, आराम से सोने के लिये बर्थ मिल जाया करती थी और शताब्दी से सस्ती भी होती थी। अब इसे शताब्दी का दर्जा दे दिया है जिससे कुमाऊं वालों को भी यह कहने का मौका मिल गया है कि उनके पास भी शताब्दी है। हालांकि यह भारत की सबसे घटिया शताब्दियों में से एक है।

लद्दाख साइकिल यात्रा के लिये कुछ सुझाव

अभी पिछले दिनों निरंजन वेलणकर साहब से मेल पर बात हुई- लद्दाख साइकिल यात्रा के बारे में। पेश है वह वार्तालाप ज्यों का त्यों: निरंजन वेलणकर: घुमक्कडी जिन्दाबाद नीरज जी! आपको प्रेमपूर्वक और आदरपूर्वक प्रणाम! हर सुबह आपकी गाथा पढ़ने के लिए आपकी साईट पर जाता हूं। वाकई आप बहुत बढिया लिख रहे हैं- बहुत बढिया आपने किया है। आपके लेखन में जो अभिवृत्ति (attitude) है, वो भी काफ़ी ऊँची है। आप कई सारी बातों को सम्मिलित कर यथार्थ दृश्य प्रस्तुत करते हैं। शब्द पर्याप्त नही है और आपको निरंतर अपनी तारीफ सुनते हुए अजीब सा भी‌ लगता होगा, इसलिए रुकता हूं। आपसे कुछ मार्गदर्शन चाहिए था। लद्दाख साईकिल यात्रा के बारे में। मेरी साईकिल 5500 रू. मे ली हुई 18 गियर की एक सामान्य साईकिल है। क्रॉस बाईक की। जुलाई से अब तक कुल 1380 किलोमीटर चलाया है। दो शतक और तेरह अर्धशतक है। थोडी बार कुछ छोटी- मोटी पहाडी पर भी चलाई है। स्तर 3 और स्तर 2 के घाट/चढाईयों पर भी चलाया है। इसमें आपकी राय चाहिए थी।

लाल किला, दिल्ली- एक फोटोयात्रा

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पिछले दिनों लालकिला जाना हुआ। इसके बारे में इतना कुछ लिखा जा चुका है कि मेरा लिखने का मन नहीं है। कुछ फोटो हैं, जो आपको पसन्द आयेंगे। एक बात बताना चाहूंगा। मैं शास्त्री पार्क में रहता हूं। जिस जगह हमारे क्वार्टर हैं, वे यमुना के इतने नजदीक हैं कि कभी कभी लगता है कि कहीं ये इसके डूब क्षेत्र में तो नहीं हैं। उधर यमुना के दूसरी तरफ बिल्कुल मिलकर ही लालकिले की बाहरी दीवार है। दोनों स्थानों को डेढ सौ साल पुराना लोहे का ऐतिहासिक पुल जोडता है। इसी पुल से पहली बार दिल्ली में रेल आई थी। यह रेलवे लाइन पुल पार करके लालकिले के अन्दर से गुजरती है। पर्यटकों को उधर जाने की अनुमति नहीं है, इसलिये किले में घूमते समय यह दिखाई भी नहीं देती। लेकिन जब ट्रेन से जाते हैं तो साफ पता चल जाता है।

वडोदरा से रतलाम पैसेंजर ट्रेन यात्रा

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इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 20 फरवरी थी और दिन था बृहस्पतिवार। वडोदरा से सुबह सवा सात बजे कोटा पैसेंजर चलती है। इसे स्थानीय तौर पर पार्सल पैसेंजर भी कहते हैं। मुझे अपने पैसेंजर नक्शे में रतलाम से वडोदरा को जोडना था। दिल्ली से रतलाम तक मैंने कई टुकडों में पैसेंजर यात्रा कर रखी है। दिन शामगढ में छिपेगा तो टिकट शामगढ तक का ले लिया। कोटा से निजामुद्दीन तक का मेरा आरक्षण मेवाड एक्सप्रेस में था। शामगढ से कोटा तक इंटरसिटी से जाऊंगा। पार्सल पैसेंजर प्लेटफार्म नम्बर पांच पर खडी थी। प्लेटफार्म चार से सात बजकर पांच मिनट पर वडोदरा-भिलाड एक्सप्रेस (19114) रवाना हो गई। प्लेटफार्म एक पर भुज-बान्द्रा एक्सप्रेस (19116) थी। साढे सात बजे यानी पन्द्रह मिनट की देरी से पार्सल पैसेंजर रवाना हुई। प्लेटफार्म से निकलते ही गाडी रुक गई। वडोदरा इतना बडा स्टेशन है कि यहां कई ‘आउटर’ हैं। असल में अहमदाबाद की तरफ से डबल डेकर आ रही थी, इसलिये इस ट्रेन को रुकना पडा। डबल डेकर चली गई, उसके बाद जयपुर-बान्द्रा (12980) गई, तब यह आगे बढी। इसी दौरान उदयपुर-बान्द्रा (22902) निकली। यहां तक गाडी

सूरत से मुम्बई पैसेंजर ट्रेन यात्रा

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इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । सूरत एक व्यस्त स्टेशन है। सात बजे जब मैं होटल से निकलकर स्टेशन पहुंचा, तब भी यहां कई ट्रेनें खडी थीं। आज 19 फरवरी थी और दिन था बुधवार। सबसे पहले निगाह पडी प्लेटफार्म नम्बर एक पर खडी पुरी-अजमेर एक्सप्रेस (18421) पर जो बिल्कुल ठीक समय पर चल रही थी। फिर प्लेटफार्म दो पर भुज-बान्द्रा कच्छ एक्सप्रेस (19132) आ गई। प्लेटफार्म तीन पर मुम्बई-अहमदाबाद पैसेंजर (59441) तो चार पर भुसावल पैसेंजर (59075)। मुम्बई-अहमदाबाद पैसेंजर में कुछ डिब्बे नन्दुरबार वाले भी लगे होते हैं। उन्हें इस ट्रेन से हटाकर भुसावल पैसेंजर में जोड दिया जायेगा। प्लेटफार्म दो से कच्छ एक्सप्रेस के जाने के बाद जयपुर-यशवन्तपुर गरीब रथ स्पेशल (06512) आ गई। सबसे आखिर में प्लेटफार्म तीन पर अपनी बोरीबली पैसेंजर (59440) आई। यह ट्रेन अहमदाबाद से आती है। मैंने वसई रोड तक का टिकट ले लिया। बीस मिनट की देरी से ट्रेन रवाना हुई। सूरत से अगला स्टेशन उधना जंक्शन है। यहां से एक लाइन भुसावल जाती है। जब पैसेंजर उधना से चली तो भुसावल की तरफ से श्रमिक एक्सप्रेस (19052) आती दिखी। श्रमिक ए

वीरमगाम से सूरत पैसेंजर ट्रेन यात्रा

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मिज़ोरम यात्रा के दौरान जब मैं और सचिन अलग अलग हुए तो अपना टैंट मैंने सचिन को दे दिया था ताकि जरुरत पडने पर काम आ सके। सचिन ने मुम्बई से आइजॉल की यात्रा वायुयान से की थी और वह वापस भी वायु मार्ग से ही जायेगा। उसके पास पहले ही फ्री लिमिट से ज्यादा सामान था इसलिये साढे तीन किलो के टैंट को मुम्बई ले जाने के लिये एक हजार रुपये मैंने सचिन को दे दिये थे। आखिर टैंट न होने से मेरा फायदा भी तो था, मुझे चम्फाई से दिल्ली तक साढे तीन किलो कम सामान ढोना पडा। अब वह टैंट दिल्ली वापस लाना था। आज के दौर में मुम्बई और दिल्ली जैसे महानगरों में सामान पहुंचाने के लिये द्रुतगामी साधन मौजूद हैं लेकिन मैंने इसे स्वयं लाने का फैसला किया। मेरा मकसद पैसेंजर ट्रेन यात्रा करना भी था। गुजरात में मैंने केवल राजकोट से ओखा और अहमदाबाद से उदयपुर मार्ग पर ही पैसेंजर यात्रा कर रखी है। इस बार अहमदाबाद को मुम्बई से जोडना था, साथ ही रतलाम को वडोदरा से भी। फाइनल कार्यक्रम इस प्रकार बना- पहले दिन वीरमगाम से सूरत, दूसरे दिन सूरत से वसई रोड और दिवा तथा तीसरे दिन वडोदरा से शामगढ।

गुवाहाटी से दिल्ली- एक भयंकर यात्रा

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इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । अगले दिन सुबह साढे पांच बजे ही गुवाहाटी स्टेशन पहुंच गया। यहां से छह बजे लामडिंग पैसेंजर चलती है। लामडिंग यहां से 180 किलोमीटर दूर है। आज का काम लामडिंग तक जाकर शाम तक वापस लौटना था। स्टेशन पहुंचा तो धीरे का झटका जोर से लगा। ट्रेन पांच घण्टे की देरी से रवाना होगी। इस ट्रेन को लामडिंग पहुंचने में छह घण्टे लगते हैं। कब यह लामडिंग पहुंचेगी और कब मैं वापस आऊंगा? नहीं, अब इस ट्रेन की सवारी नहीं करूंगा। सात बजे चलने वाली बंगाईगांव पैसेंजर से बंगाईगांव जाता हूं। देखा यह ट्रेन सही समय पर रवाना होगी। एक बात समझ नहीं आई। असोम में कोहरा नहीं पडता। कम से कम वे ट्रेनें तो ठीक समय पर चल सकती हैं जो असोम से बाहर नहीं जातीं। लामडिंग पैसेंजर ऐसी ही गाडी है। रात को यह ट्रेन लीडो इण्टरसिटी बनकर चलती है तो दिन में लामडिंग पैसेंजर। यानी लीडो इण्टरसिटी भी इतनी ही देर से चल रही होगी।

डायरी के पन्ने-20

मित्रों के आग्रह पर डायरी के पन्नों का प्रकाशन पुनः आरम्भ किया जा रहा है। ध्यान दें : डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं। ये आपकी धार्मिक और सामाजिक भावनाओं को आहत कर सकते हैं। कृपया अपने विवेक से पढें। 1.  पप्पू ने नौकरी बदली है। पहले वह गुडगांव में कार्यरत था, अब गाजियाबाद में काम करेगा।  पप्पू कॉलेज टाइम में मेरा जूनियर था और हम करीब छह महीनों तक साथ-साथ रहे थे। मैंने जब गांव छोडा, बाहर किराये के कमरे पर रहना शुरू किया तो शुरूआत पप्पू के ही साथ हुई। उसी से मैंने खाना बनाना सीखा। तब मैं फाइनल ईयर में था। पेपर होने के बाद हम दोनों अलग हो गये। मैंने नौकरी की तो उसने बी-टेक की। बी-टेक के बाद वह गुडगांव में मामूली वेतन पर काम कर रहा था। मुझसे कम से कम पांच साल बडा है। कभी-कभार बात हो जाती थी। अब जब वह गाजियाबाद आ गया तो उसे मैं याद आया। कुछ दिन हमारे यहां से ऑफिस जाया करेगा, तब तक वहीं आसपास कोई ठिकाना ढूंढ लेगा।

मिज़ोरम से वापसी- चम्फाई से गुवाहाटी

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 29 जनवरी 2014 मिज़ोरम साइकिल यात्रा का सत्यानाश हो चुका था। अब दिल्ली वापस लौटने का फैसला कर चुका था। अगर सबकुछ ठीक-ठाक चलता तो मेरे 12 फरवरी को मिज़ोरम से कोलकाता तक फ्लाइट और उसके बाद दिल्ली तक दूरोन्तो में टिकट बुक थे। रात दोनों टिकट रद्द कर दिये। अब 1 फरवरी को पूर्वोत्तर सम्पर्क क्रान्ति में वेटिंग टिकट बुक किया। इस यात्रा का मुख्य आकर्षण बर्मा स्थित रीह-दिल झील देखना था। वहां केवल भारतीय नागरिक ही जा सकते हैं। किसी वीजा-पासपोर्ट की आवश्यकता नहीं होती। सीमा पर निर्धारित मामूली शुल्क देकर एक दिन के लिये बर्मा में घूमने का आज्ञापत्र मिल जाता है। बडा उत्साह था अपने इस पडोसी देश को देखने का। लेकिन अब मानसिकता ऐसी थी कि कहीं भी जाने का मन नहीं था। एक तरह से मैं सदमे में था।

मिज़ोरम साइकिल यात्रा- खावजॉल से चम्फाई

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 28 जनवरी 2014 सचिन ने आवाज लगाई, तब आंख खुली। रात बेहद शानदार नींद आई थी, इसलिये थोडा इधर उधर देखना पडा कि हम हैं कहां। हम खावजॉल में एक घर में थे। सचिन कभी का उठ चुका था और उसने अपना स्लीपिंग बैग बांधकर पैक भी कर लिया था। जब मैं उठा, तो घर की मालकिन ने वहीं चूल्हा रखकर एक कप चाय बनाई और मुझे दी। सचिन जब उठा था, तब उसके लिये बनाई थी। साढे सात बजे यहां से चल पडे। कुछ आगे ही एक तिराहा था जहां से सीधी सडक ईस्ट लुंगदार जा रही थी और बायें वाली सडक चम्फाई। लुंगदार वाली सडक पर एक गांव है- बाइते। हम चम्फाई से आगे बर्मा सीमा के अन्दर बनी रीह दिल झील देखकर खावबुंग जायेंगे और वहां से बाइते और फिर आगे ईस्ट लुंगदार और फिर और भी आगे।

मिज़ोरम साइकिल यात्रा- तुईवॉल से खावजॉल

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 27 जनवरी, 2014 हम तुईवॉल नदी के किनारे बने एक मन्दिर में टैंट लगा कर रात रुके थे। साढे सात बजे सोकर उठे। बाहर झांककर देखा तो अदभुत नजारा दिखा। नीचे नदी घाटी में बादल थे जबकि ऊपर बादल नहीं थे। पहाडियों का ऊपरी हिस्सा आसमान में तैरता सा दिख रहा था। मुझे लगा कि यह नजारा अभी कुछ देर तक बना रहेगा। लेकिन जब तक टैंट उखाडा, तब तक सभी बादल हट चुके थे। जैसे जैसे नीचे घाटी में धूप पसरती जा रही थी, बादल भी समाप्त होते जा रहे थे। मुझे नहाये हुए चार दिन हो चुके थे। कभी सिल्चर में ही नहाया था। सचिन को भी तीन दिन हो चुके थे। जहां मुझे सर्दी बिल्कुल नहीं लग रही थी, वही सचिन ठण्ड से कांप रहा था। सचिन ठहरा मुम्बई वाला। वहां बस दो ही मौसम होते हैं- गर्मी और बरसात। ठण्ड का उन्हें तब पता चलता है जब वे मुम्बई छोडकर उत्तर की ओर बढते हैं। जबकि मैं था दिल्लीवाला। हम जहां भयंकर गर्मी झेलते हैं, वहीं कडाके की ठण्ड भी झेलनी होती है। इसलिये मेरे लिये मिज़ोरम का यह मौसम खुशनुमा था। फिर भी नहाने की इच्छा उसकी भी थी।

मिज़ोरम साइकिल यात्रा- तमदिल झील

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 26 जनवरी 2014 यानी गणतन्त्र दिवस... इसी दिन के मद्देनजर हमने मिज़ोरम यात्रा का कार्यक्रम बनाया था। इच्छा थी यह देखने की कि देश की मुख्यधारा से सैंकडों किलोमीटर दूर मिज़ोरम में गणतन्त्र दिवस पर क्या होता है। होने को यहां हमें तिरंगे के दर्शन की भी उम्मीद नहीं थी क्योंकि इस बार गणतन्त्र दिवस रविवार को था। रविवार को मुख्यभूमि पर भी कोई उल्लास नहीं होता। देश की राजधानी के आस-पास भी कोई रविवार को स्कूल या कार्यालय नहीं जाना चाहता। खूब देखा है कि ऐसे में ज्यादातर तो गणतन्त्र दिवस एक दिन पहले मना लिया जाता है, कभी-कभार अगले दिन भी मनाया जाता है। हम स्वयं भी रविवार को स्कूल जाना पसन्द नहीं करते थे। फिर मिज़ोरम ईसाई प्रधान है। यहां रविवार का दूसरा ही अर्थ है। रविवार अर्थात पूर्ण छुट्टी, पूर्ण बन्दी। यह धार्मिक दिन है और इस दिन सभी लोग चर्च जाते हैं। इसलिये मुझे मिज़ोरम में तिरंगा दिखने की कोई उम्मीद नहीं थी। तीसरी बात, हमारे आसपास कोई बडा शहर नहीं था। बडा क्या, छोटा भी नहीं था। आठ किलोमीटर आगे कीफांग गांव है। गांव में क्या गणतन्त्र दिवस

मिज़ोरम साइकिल यात्रा- आइजॉल से कीफांग

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 25 जनवरी 2014 की सुबह थी और हम थे मिज़ोरम की राजधानी आइजॉल में। आज हमें साइकिल यात्रा आरम्भ कर देनी थी और हमारा आज का लक्ष्य था 75 किलोमीटर दूर सैतुअल में रुकने का। दूरी-ऊंचाई मानचित्र के अनुसार हमें आइजॉल (1100 मीटर) से 20 किलोमीटर दूर तुईरियाल (200 मीटर) तक नीचे उतरना था, फिर सेलिंग (800 मीटर) तक ऊपर, फिर 300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित और 15 किलोमीटर दूर एक पुल तक नीचे व आखिर में कीफांग (1100 मीटर) तक 20 किलोमीटर की चढाई पर साइकिल चलानी थी। कीफांग से सैतुअल 3 किलोमीटर आगे है। सैतुअल में टूरिस्ट लॉज है जहां हमारी रुकने की योजना है। अच्छी तरह पेट भरकर और काफी मात्रा में बिस्कुट आदि लेकर हम चल पडे। हम रात को जिस होटल में रुके थे, वह आइजॉल से बाहर एयरपोर्ट रोड पर था। वैसे तो हमें राजधानी भी देखनी चाहिये थी लेकिन मिज़ो जनजीवन को देखने का सर्वोत्तम तरीका गांवों का भ्रमण ही है। साइकिल यात्रा में हम जमकर ग्राम्य भ्रमण करने वाले हैं।

मिज़ोरम में प्रवेश

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । दिनांक था 24 जनवरी 2014 और मैं था सिल्चर में। सुबह साढे छह बजे ही आंख खुल गई हालांकि अलार्म सात बजे का लगाया था। मच्छरदानी की वजह से एक भी मच्छर ने नहीं काटा, अन्यथा रात जिस तरह का मौसम था और मच्छरों के दो-तीन सेनापति अन्धेरा होने की प्रतीक्षा कर रहे थे, उससे मेरी खैर नहीं थी। अपनी तरफ से काफी जल्दी की, फिर भी निकलते-निकलते पौने आठ बज गये। ट्रैवल एजेंसी के ऑफिस में घुसने ही वाला था, उनका फोन भी आ गया। दो सौ रुपये में साइकिल की बात हुई। मैं राजी था। कल जगन्नाथ ट्रैवल्स ने तीन सौ रुपये मांगे थे। इस मामले में जितना मोलभाव हो जाये, उतना ही अपना फायदा है। साइकिल को सूमो की छत पर अन्य बैगों के साथ बांधने में काफी परेशानी हुई। साढे आठ बजे मिज़ोरम के लिये प्रस्थान कर गये। सूमो में मेरे अलावा तीन बिहारी, दो बंगाली व पांच मिज़ो थे। सभी मिज़ो हिन्दी भी जानते थे।

बराक घाटी एक्सप्रेस

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । यह भारत की कुछ बेहद खूबसूरत रेलवे लाइनों में से एक है। आज के समय में यह लाइन असोम के लामडिंग से शुरू होकर बदरपुर जंक्शन तक जाती है। बदरपुर से आगे यह त्रिपुरा की राजधानी अगरतला चली जाती है और एक लाइन सिल्चर जाती है। अगरतला तक यह पिछले दो-तीन सालों से ही है, लेकिन सिल्चर तक काफी पहले से है। इसलिये इसे लामडिंग-सिल्चर रेलवे लाइन भी कहते हैं। यह लाइन मीटर गेज है। मुझे आज लामडिंग से शुरू करके सिल्चर पहुंचना है। लामडिंग से सिल्चर के लिये दिनभर में दो ही ट्रेनें चलती हैं- कछार एक्सप्रेस और बराक घाटी एक्सप्रेस। कछार एक्सप्रेस एक रात्रि ट्रेन है जबकि बराक घाटी एक्सप्रेस दिन में चलती है और हर स्टेशन पर रुकती भी है। इनके अलावा एक ट्रेन लामडिंग से अगरतला के लिये भी चलती है। दक्षिणी असोम को कछार कहते हैं। इनमें दो जिले प्रमुख हैं- कछार और नॉर्थ कछार हिल्स। कछार जिले का मुख्यालय सिल्चर में है और नॉर्थ कछार हिल्स जिले का मुख्यालय हाफलंग में। यह ट्रेन हाफलंग से होकर गुजरती है। इसी तरह कछार में एक मुख्य नदी है- बराक। सिल्चर बराक नदी के किनारे

दिल्ली से लामडिंग- राजधानी एक्सप्रेस से

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 20 जनवरी 2014 कल सुबह साढे नौ बजे नई दिल्ली से जब मैं डिब्रुगढ राजधानी में बैठ जाऊंगा, तभी मेरी मिज़ोरम यात्रा आरम्भ हो जायेगी। इतने दिन से यात्रा की योजना बनाने के बावजूद भी मैं अभी तक पूरी तरह तैयारी नहीं कर सका। चूंकि आज की पूरी रात अपनी है, इसलिये मैं निश्चिन्त था। रात दस बजे तक बैग तैयार हो चुका था। स्लीपिंग बैग, टैंट और पम्प साइकिल के पास रखे जा चुके थे। जब आखिर में जरूरी कागजात देखने लगा तो एक कागज नहीं मिला। यह गुम कागज हमारे पथ का दूरी-ऊंचाई नक्शा था जिसके बिना यात्रा बेहद कठिन हो जाती। पुनः गूगल मैप से देखकर बारीकी से यह नक्शा बनाना आरम्भ कर दिया। मिज़ोरम काफी उतार-चढाव वाला राज्य है इसलिये हर पांच पांच दस दस किलोमीटर के आंकडे लेने पड रहे थे। जब यह काम खत्म हुआ तो दो बज चुके थे। अब अगर सोऊंगा तो सुबह पता नहीं कितने बजे उठूंगा। इसलिये न सोने का फैसला कर लिया। सुबह जब बिस्तर से उठा तो देखा कि वो गुम कागज पलंग के नीचे पडा था। खुशी भी मिली और स्वयं पर गुस्सा भी आया।

मिज़ोरम की ओर

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पूर्वोत्तर भारत अर्थात? कुछ लोग पूर्वोत्तर भी घूमने जाते हैं। उनके लिये पूर्वोत्तर का अर्थ होता है दार्जीलिंग और सिक्किम। आखिर सिक्किम की गिनती पूर्वोत्तर में होती है तो सही बात है कि सिक्किम घूमे तो पूर्वोत्तर भी घूम लिये। ज्यादा हुआ तो मेघालय चले गये, चेरापूंजी और शिलांग। इससे भी ज्यादा हुआ तो तवांग चले गये अरुणाचल में, काजीरंगा चले गये असोम में। और बात अगर हद तक पहुंची तो इक्के दुक्के कभी कभार इम्फाल भी चले जाते हैं मणिपुर में। लोकटक झील है वहां जो बिल्कुल विलक्षण है। घुमन्तुओं के लिये पूर्वोत्तर की यही सीमा है। मिज़ोरम कोई नहीं जाता। क्योंकि यह पूर्वोत्तर के पार की धरती है, पूर्वोत्तर के उस तरफ की धरती है। जिस तरह लद्दाख है हिमालय पार की धरती। जिसमें हिमालय चढने और उसे पार करने का हौंसला होता है, वही लद्दाख जा पाता है। ठीक इसी तरह जिसमें पूर्वोत्तर जाने और उसे भी पार करने का हौंसला होता है, वही मिज़ोरम जा पाता है। पूर्वोत्तर बडी बदनाम जगह है। वहां उग्रवादी रहते हैं जो कश्मीर के आतंकवादियों से भी ज्यादा खूंखार होते हैं। कश्मीर के आतंकवादी तो केवल सुरक्षाबलों को ही मारते हैं, पूर्वोत्त

कश्मीर से दिल्ली

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 8 जनवरी 2014 की दोपहर पौने एक बजे ट्रेन बनिहाल पहुंच गई। पौने आठ बजे ऊधमपुर से नई दिल्ली के लिये सम्पर्क क्रान्ति चलती है जिसमें मेरा वेटिंग आरक्षण है। इस तरह मेरे हाथ में पूरे सात घण्टे थे। कल ऊधमपुर से यहां आने में पांच घण्टे लगे थे। लेकिन आज मौसम खराब है, बनिहाल में बर्फबारी हो रही है, आगे पटनी टॉप में भी समस्या हो सकती है। अगर रातभर वहां बर्फबारी होती रही हो तो रास्ता भी बन्द हो सकता है। इस तरह बनिहाल उतरते ही मेरी प्राथमिकता किसी भी ऊधमपुर या जम्मू वाली गाडी में बैठ जाने की थी। सामने राजमार्ग पर अन्तहीन जाम भी दिख रहा था, जो मेरी चिन्ता को और बढा रहा था। सुबह से कुछ भी नहीं खाया था। यहां थोडी सी पकौडी और चाय ली गई। फिर देखा कि जम्मू के लिये न तो कोई सूमो है और न ही कोई बस। समय मेरे पास था नहीं इसलिये फटाफट रामबन वाली बस में बैठ गया। आगे रास्ता खुला होगा तो रामबन से बहुत बसें मिल जायेंगीं। सीट पर बैठा ही था कि एक सूमो पर निगाह गई। ड्राइवर ऊपर सामान बांध रहा था। मैंने तेज आवाज में उससे पूछा तो उसने ऊधमपुर कहा। अब मैं क्यो

कश्मीर रेलवे

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । सात जनवरी 2014 की दोपहर बाद तीन बजे थे जब मैं बनिहाल रेलवे स्टेशन जाने वाले मोड पर बस से उतरा। मेरे साथ कुछ यात्री और भी थे जो ट्रेन से श्रीनगर जाना चाहते थे। राष्ट्रीय राजमार्ग से स्टेशन करीब दो सौ मीटर दूर है और सामने दिखाई देता है। ऊधमपुर से यहां आने में पांच घण्टे लग गये थे। वैसे तो आज की योजनानुसार दो बजे वाली ट्रेन पकडनी थी लेकिन रास्ते में मिलने वाले जामों ने सारी योजना ध्वस्त कर दी। अब अगली ट्रेन पांच बजे है यानी दो घण्टे मुझे बनिहाल स्टेशन पर ही बिताने पडेंगे। मुझे नये नये रूटों पर पैसेंजर ट्रेनों में यात्रा करने का शौक है। पिछले साल जब लद्दाख से श्रीनगर आया था तो तब भी इस लाइन पर यात्रा करने का समय था लेकिन इच्छा थी कि यहां केवल तभी यात्रा करूंगा जब बर्फ पडी हो अर्थात सर्दियों में। भारत में यही एकमात्र ब्रॉडगेज लाइन है जो बर्फीले इलाकों से गुजरती है। इसी वजह से तब जून में इस लाइन पर यात्रा नहीं की। अब जबकि लगातार कश्मीर में बर्फबारी की खबरें आ रही थीं, जम्मू-श्रीनगर मार्ग भी बर्फ के कारण कई दिनों तक बन्द हो गया था।

दिल्ली से कश्मीर

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उस दिन मैं सायंकालीन ड्यूटी पर था दोपहर बाद दो बजे से रात दस बजे तक। शाम के छह बजे थे, खान साहब अपने ऑफिस का ताला मारकर जाने की तैयारी में थे। तभी प्रशान्त का फोन आया- नीरज भाई, कश्मीर चलें? हममें हमेशा इसी तरह बिना किसी औपचारिकता के बात होती है। मैंने थोडी देर बाद बात करने को कह दिया। खान साहब जब जाने लगे तो मैंने उन्हें रोककर कहा- सर, मुझे आठ तारीख की छुट्टी लेनी है। वे ठिठक गये। ड्यूटी-पत्र खोलकर देखा, अपने रिकार्ड में मेरी छुट्टी लगा ली। मुझे छुट्टी मिलने का भरोसा तो था लेकिन इस तरीके से इतनी जल्दी नहीं। फिर प्रशान्त को फोन किया- हां भाई, बता। बोला कि कश्मीर चलते हैं। वहां बर्फ पड रही है, रेल में घूमेंगे। वह ट्रेनों में घूमने का शौकीन है और उसे पता है कि मैं अभी तक कश्मीर रेल में नहीं घूमा हूं। इसलिये रुका हुआ हूं कि जब बर्फ पडेगी तब घूमूंगा। आखिर भारत में ऐसी लाइनें हैं ही कितनी? कालका शिमला लाइन है जहां कभी कभार ही बर्फबारी होती है। दार्जीलिंग हिमालयन रेलवे है। ये दोनों नैरो गेज हैं। जबकि कश्मीर रेल ब्रॉड गेज है। कोई भी अन्य ब्रॉड गेज लाइन बर्फबारी वाले इलाके से नहीं गुजरती।

जैसलमेर में दो घण्टे

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । तीन बजे मैं जैसलमेर पहुंचा। संजय बेसब्री से मेरा इंतजार कर रहा था। वह नटवर का फेसबुक मित्र है। मुझसे पहचान तब हुई जब उसे पता चला कि नटवर और मैं साथ साथ यात्रा करेंगे। पिछले दिनों ही वह मेरा भी फेसबुक मित्र बना। उसने मेरा ब्लॉग नहीं पढा है, केवल फेसबुक पृष्ठ ही देखा है। मेरे हर फोटो को लाइक करता था। मैं कई दिनों तक बडा परेशान रहा जब जमकर लाइक के नॉटिफिकेशन आते रहे और सभी के लिये संजय ही जिम्मेदार था। मैं अक्सर लाइक को पसन्द नहीं करता हूं। ब्लॉग न पढने की वजह से उसे मेरे बारे में कुछ भी नहीं पता था। मेरा असली चरित्र मेरे ब्लॉग में है, फेसबुक पर नहीं। सवा पांच बजे यानी लगभग दो घण्टे बाद मेरी ट्रेन है। इन दो घण्टों में मैं जैसलमेर न तो घूम सकता था और न ही घूमना चाहता था। मेरी इच्छा कुछ खा-पीकर स्टेशन जाकर आराम करने की थी। फिर साइकिल भी पार्सल में बुक करानी थी।

थार साइकिल यात्रा- लोंगेवाला से जैसलमेर

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 27 दिसम्बर 2013 सैनिकों की बैरक में भरपेट खा-पीकर दोपहर बाद दो बजे मैं रामगढ के लिये निकल पडा। रामगढ यहां से 43 किलोमीटर है। फौजियों ने बता दिया था कि इसमें से आधा रास्ता ऊंचे नीचे धोरों से भरा पडा है जबकि आखिरी आधा समतल है। अर्थात मुझे रामगढ पहुंचने में चार घण्टे लगेंगे। यहां से निकलते ही एक गांव आता है- कालीभर। मुझे गुजरते देख कुछ लडके अपनी अपनी बकरियों को छोडकर स्टॉप स्टॉप चिल्लाते हुए दौडे लेकिन मैं नहीं रुका। रुककर करना भी क्या था? एक तो वे मुझे विदेशी समझ रहे थे। अपनी अंग्रेजी परखते। जल्दी ही उन्हें पता चल जाता कि हिन्दुस्तानी ही हूं तो वे साइकिल देखने लगते और चलाने की भी फरमाइश करते, पैसे पूछते, मुझे झूठ बोलना पडता। गांव पार हुआ तो चार पांच बुजुर्ग बैठे थे, उन्होंने हाथ उठाकर रुकने का इशारा किया, मैं रुक गया। औपचारिक पूछाताछी करने के बाद उन्होंने पूछा कि खाना खा लिया क्या? मैंने कहा कि हां, खा लिया। बोले कि कहां खाया? लोंगेवाला में। लोंगेवाला में तो खाना मिलता ही नहीं। फौजियों की बैरक में खा लिया था। कहने लगे कि अगर न

लोंगेवाला- एक गौरवशाली युद्धक्षेत्र

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । लोंगेवाला- एक निर्णायक और ऐतिहासिक युद्ध का गवाह। 1971 की दिसम्बर में जैसलमेर स्थित वायुसेना को सूचना मिली कि पाकिस्तान ने युद्ध छेड दिया है और उसकी सेनाएं टैंकों से लैस होकर भारतीय क्षेत्र में घुस चुकी हैं। वह 3 और 4 दिसम्बर की दरम्यानी रात थी। पूर्व में बंगाल में अपनी जबरदस्त हार से खिन्न होकर पाकिस्तानियों ने सोचा कि अगर भारत के पश्चिमी क्षेत्र के कुछ हिस्से पर कब्जा कर लिया जाये तो वे भारत पर कुछ दबाव बना सकते हैं। चूंकि उनके देश का एक बडा हिस्सा उनके हाथ से फिसल रहा था, इसलिये वे कुछ भी कर सकते थे। उन्होंने जैसलमेर पर कब्जा करने की रणनीति बनाई। उस समय भारत का भी सारा ध्यान पूर्व में ही था, पश्चिम में नाममात्र की सेना थी। जब पता चला कि पाकिस्तान ने आक्रमण कर दिया है तो कमान मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी के हाथों में थी। उन्होंने ऊपर से सहायता मांगी। चूंकि यह रात का समय था, जवाब मिला कि या तो वहीं डटे रहकर दुश्मन को रोके रखो या रामगढ भाग आओ। चांदपुरी ने भागने की बजाय वही डटे रहने का निर्णय लिया। सहायता कम से कम छह घण्टे बाद म

थार साइकिल यात्रा- तनोट से लोंगेवाला

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 26 दिसम्बर 2012 की सुबह आराम से सोकर उठे। वैसे तो जल्दी ही उठ जाने की सोच रखी थी लेकिन ठण्ड ही इतनी थी कि जल्दी उठना असम्भव था। असली ठण्ड बाहर थी। यहां धर्मशाला में तो कुछ भी नहीं लग रही थी। तापमान अवश्य शून्य से नीचे रहा होगा। आज का लक्ष्य लोंगेवाला होते हुए असूतार पहुंच जाने का था जिसकी दूरी लगभग 80 किलोमीटर है। ऐसा करने पर कल हम सम पहुंच सकते हैं। दस बजे तक तो वैसे भी अच्छी धूप निकल जाती है। कोहरा भी नहीं था, फिर भी ठण्ड काफी थी। माता के दर्शन करके कैण्टीन में जमकर चाय पकौडी खाकर और कुछ अपने साथ बैग में रखकर हम चल पडे। आज हमें रास्ते भर कुछ भी खाने को नहीं मिलने वाला। जो भी अपने साथ होगा, उसी से पेट भरना होगा। तनोट से लोंगेवाला वाली सडक पर निकलते ही सामना बडे ऊंचे धोरे से होता है। यह एक गंजा धोरा है, इस पर झाडियां भी नहीं हैं। हमें बताया गया कि कल के मुकाबले हमें आज ज्यादा ऊंचे धोरों का सामना करना पडेगा। इन सब बातों के मद्देनजर हमने चलने की स्पीड दस किलोमीटर प्रति घण्टा रखने का लक्ष्य रखा जिसे हमने पूरा भी किया क्योंकि धो

तनोट

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । अक्टूबर 1965 में एक युद्ध हुआ था- भारत और पाकिस्तान के मध्य। यह युद्ध देश की पश्चिमी सीमाओं पर भी लडा गया था। राजस्थान में जैसलमेर से लगभग सौ किलोमीटर दूर पाकिस्तानी सेना भारतीय सीमा में घुसकर आक्रमण कर रही थी। उन्होंने सादेवाला और किशनगढ नामक सीमाक्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था और उनका अगला लक्ष्य तनोट नामक स्थान पर अधिकार करने का था। तनोट किशनगढ और सादेवाला के बीच में था जिसका अर्थ था कि इस स्थान पर दोनों तरफ से आक्रमण होगा। जबरदस्त आक्रमण हुआ। पाकिस्तान की तरफ से 3000 से भी ज्यादा गोले दागे गये। साधारण परिस्थियों में यह छोटा सा स्थान तबाह हो जाना चाहिये था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। परिस्थितियां साधारण नहीं थीं, असाधारण थीं। कोई न कोई शक्ति थी, जो काम कर रही थी। ज्यादातर गोले फटे ही नहीं और जो फटे भी उन्होंने कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। विश्वास किया जाता है कि तनोट माता के प्रताप से ऐसा हुआ। बाद में जब भारतीय सेना हावी हो गई, उन्होंने जवाबी आक्रमण किया जिससे पाकिस्तानी सेना को भयंकर नुकसान हुआ और वे पीछे लौट गये। 1971 में भी ऐसा ही

थार साइकिल यात्रा- सानू से तनोट

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 25 दिसम्बर 2013, जब आधी दुनिया क्रिसमस मनाने की खुशी से सराबोर थी, हम पश्चिमी राजस्थान के एक छोटे से गांव में सडक किनारे एक छप्पर के नीचे सोये पडे थे। यहां से 45 किलोमीटर दूर जैसलमेर है और लगभग इतना ही सम है जहां लोग क्रिसमस और नये साल की छुट्टियां मनाने बडी संख्या में आते हैं। आज वहां उत्सव का माहौल बन रहा होगा और इधर हम भूखे प्यासे पडे हैं। आठ बजे जब काफी सूरज निकल गया, तब हम उठे। दुकान वाला दुकान बन्द करके जा चुका था। ताला लटका था। हमने कल पांच कप चाय पी थी- कम से कम पच्चीस रुपये की थी। हमें टैंट उखाडते देख कुछ ग्रामीण आकर इकट्ठे हो गये। उन्होंने सूखी झाडियां एकत्र करके आग जला ली। उन्होंने बताया कि यह दुकान केवल रात को ही खुली रहती है, दिन में वह सोने घर चला जाता है। घर हालांकि इसी गांव में था, हम आसानी से जा सकते थे। जब हमने उसके घर का पता पूछा तो ग्रामीणों ने बताया कि वह ऐसा अक्सर करता रहता है। लोगों को फ्री में चाय पिला देता है। वैसे भी अब वह सो गया होगा, उठाना ठीक नहीं। ऐसा सुनकर हमने उसके घर जाने का विचार त्याग दिया।

थार साइकिल यात्रा: जैसलमेर से सानू

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । ट्रेन डेढ घण्टे की देरी से जैसलमेर पहुंची। पोखरण तक यह ठीक समय पर चल रही थी लेकिन उसके बाद हर स्टेशन पर बडी देर देर तक रुकी। एक बार जैसलमेर-जोधपुर पैसेंजर क्रॉस हुई, इसके बाद जैसलमेर-लालगढ एक्सप्रेस, फिर एक और, फिर एक भी नहीं, बस ऐसे ही खडी रही। नटवर का फोन आता रहा- कहां पहुंचा? पोखरण। कुछ देर बाद फिर पूछा। कहां पहुंचा? ओडानिया... लाठी... चांदण। और आखिरकार जब जैसलमेर की सूचना दी तो बोला कि जल्दी बाहर निकल, मैं स्टेशन के बाहर प्रतीक्षा कर रहा हूं। पार्सल वालों ने साइकिल को पार्सल डिब्बे से बाहर निकाला। बेचारी लगभग खाली डिब्बे में गिरी पडी थी। दिल्ली से जोधपुर तक यह एक मोटरसाइकिल के ऊपर चढकर आई थी, अगल बगल में बडे बडे पैकेट थे, कहीं नहीं गिरी। एक हस्ताक्षर किया और साइकिल मेरे हवाले कर दी गई। उडती उडती निगाह डाली, कहीं कोई कमी नहीं दिखी। बाकी चलाने पर पता चलेगा। बाहर निकला। दोनों तरह के नजारे थे- शान्त भी और हलचली भी। दोनों ही नजारे होटल वालों ने बना रखे थे। सस्ते होटल वाले यात्रियों को घेर-घेर कर पकड रहे थे। इधर से उधर धकिया र

थार साइकिल यात्रा का आरम्भ

जब लद्दाख गया था ना साइकिल लेकर, तो सोच लिया था कि यह आखिरी साइकिल यात्रा है। इसके बाद कोई साइकिल नहीं चलानी। हालांकि पहले भी ज्यादा साइकिल नहीं चलाई थी। फिर भी जब सपने पूरे होते हैं, तो उन्हें जीने में जो आनन्द है वो अगले सपने बुनने में नहीं है। बस, यही सोच रखा था कि एक सपना पूरा हुआ, इसी को जीते रहेंगे और आनन्दित होते रहेंगे। लेकिन यह सपना जैसे जैसे पुराना पडता गया, आनन्द भी कम होता गया। फिर से नये सपने बुनने की आवश्यकता महसूस होने लगी ताकि उसे पूरा करने के बाद नया आनन्द मिले। थार साइकिल यात्रा की यही पृष्ठभूमि है। इसी कारण राजस्थान के धुर पश्चिम में रेत में साइकिल चलाने की इच्छा जगी। समय खूब था अपने पास। कोई यात्रा किये हुए अरसा बीत चुका था, उसका वृत्तान्त भी लिखकर और प्रकाशित करके समाप्त कर दिया था। बिल्कुल खाली, समय ही समय। तो इस यात्रा की अपनी तरफ से अच्छी तैयारी कर ली थी। गूगल अर्थ पर नजरें गडा-गडाकर देख लिया था रेत में जितने भी रास्ते हैं, उनमें अच्छी सडकें कितनी हैं। एक तो ऊंटगाडी वाला रास्ता होता है, कच्चा होता है, रेतीला होता है, साइकिल नहीं चल सकती। इसके लिये पक्की सडक चाह

रेलयात्रा सूची: 2014

2005-2007   |   2008   |   2009   |   2010   |   2011   |   2012   |   2013   |   2014   |   2015   |   2016   |   2017  |  2018  |  2019 क्रम सं कहां से कहां तक ट्रेन नं ट्रेन नाम दूरी (किमी) कुल दूरी दिनांक श्रेणी गेज 1 नई दिल्ली लुधियाना 12497 शान-ए-पंजाब एक्स 312 106558 06/01/2014 सेकण्ड सीटिंग ब्रॉड 2 लुधियाना लोहियां खास 74969 लुधियाना- लोहियां खास डीएमयू 77 106635 06/01/2014 साधारण ब्रॉड 3 लोहियां खास मल्लांवाला खास 74937 जालंधर- फिरोजपुर डीएमयू 42 106677 06/01/2014 साधारण ब्रॉड 4 मल्लांवाला खास जम्मू तवी 19225 भटिंडा- जम्मू तवी एक्स 378 107055 06/01/2014 शयनयान ब्रॉड 5 जम्मू तवी ऊधमपुर 12445 उत्तर सम्पर्क क्रान्ति एक्स 53 107108 07/01/2014 साधारण ब्रॉड 6 बनिहाल श्रीनगर 74629 बनिहाल- बारामूला डीएमयू 80 107188 07/01/2014 साधारण ब्रॉड 7 श्रीनगर बारामूला 74625 बनिहाल- बारामूला डीएमयू 58 107246 08/01/2014 साधारण ब्रॉड 8 बारामूला बनिहाल 74628 बारामूला- बनिहाल डीएमयू 138 107384 08/01/2014 साधारण ब्रॉड 9 जम्मू तवी दिल्ली आजादपुर 09022 जम्मू तवी- बान्द्रा स्पेशल 569 107953