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Showing posts from September, 2013

दूधसागर जलप्रपात

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 8 अगस्त 2013 की सुबह हम गोवा में थे। स्टेशन के पास ही एक कमरा ले रखा था। आज का पूरा दिन गोवा के नाम था। लेकिन मैंने सोच रखा था कि गोवा नहीं घूमूंगा। गोवा से मेरा पहला परिचय बडा ही भयानक हुआ जब मोटरसाइकिल टैक्सी वालों ने हमसे कल कहा था कि जेब में पैसे नहीं हैं तो गोवा घूमने क्यों आये? पैसे निकालो और मनपसन्द कमरा लो। तभी मन बना लिया था कि गोवा नहीं घूमना है। जहां पैसे का खेल होता हो, वहां मेरा दम घुटता है। प्रशान्त और कमल ने एक टूर बुक कर लिया। वे आज पूरे दिन टूर वालों की बस में घूमेंगे, मैं यहीं होटल में पडा रहूंगा। वैसे भी बाहर धूप बहुत तेज है। धूप में निकलते ही जलन हो रही है। जब वे चले गये तो ध्यान आया कि अगर इसी तरह चलता रहा हो मैं मडगांव-वास्को रेल लाइन पर नही घूम सकूंगा। आज मौका है। जेब में नेट है, नेट पर समय सारणी है। मडगांव से वास्को के लिये सवा एक बजे पैसेंजर जाती है। उससे वास्को जाकर वापस लौट आऊंगा। आज के लिये इतना काफी। अभी ग्यारह बजे हैं।

कोंकण रेलवे

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 8 अगस्त की सुबह सुबह कल्याण उतरे हम तीनों। यहां से हमें दिवा जाना था जहां से मडगांव की पैसेंजर मिलेगी। हल्की हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। प्रशान्त और कमल को यह कहकर चल दिया कि तुम पता करो धीमी लोकल किस प्लेटफार्म पर मिलेगी, मैं टिकट लेकर आता हूं। टिकट काउण्टर पर बैठी महिला से मैंने सिन्धुदुर्ग के तीन टिकट मांगे। उसने खटर पटर की, फिर कहने लगी कि सिन्धुदुर्ग का टिकट तो नहीं मिलेगा। उससे अगला स्टेशन कौन सा है? मैंने कहा सावन्तवाडी। तुरन्त मिल गये पैसेंजर के तीन टिकट। दूरी 600 किलोमीटर से भी ज्यादा। सुबह सवेरे जबकि दिन निकलना तो दूर, ढंग से उजाला भी नहीं हुआ था, लोकल में भीड बिल्कुल नहीं थी। आराम से सीटें मिल गई। पन्द्रह मिनट का भी सफर नहीं है कल्याण से दिवा का। सबसे आखिर वाले प्लेटफार्म पर नीले डिब्बों और डीजल इंजन लगी हमारी गाडी तैयार खडी थी। गाडी में उम्मीद से ज्यादा भीड थी। फिर भी तीनों को सीटें मिल गईं, वो भी मेरे पसन्दीदा डिब्बे में- सबसे पीछे वाले में। मैं पैसेंजर ट्रेन यात्राओं में सबसे पीछे वाले डिब्बे में ही बैठना पसन्द

जामनेर-पाचोरा नैरो गेज ट्रेन यात्रा

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । अजन्ता से निकलने में थोडी देर हो गई। साढे तीन बजे तक पहुर पहुंचना आवश्यक था ताकि जामनेर वाली नैरो गेज की ट्रेन पकड सकें। फिर वहां से पुनः पहुर होते हुए ही पाचोरा तक इस ट्रेन से यात्रा करनी थी। महाराष्ट्र परिवहन की बस से लेणी मोड से पहुर पहुंचने में देर ही कितनी लगती है? मैंने सुबह देख लिया था कि पहुर में तिराहे से कुछ ही दूर रेलवे फाटक है जहां से स्टेशन भी दिख रहा था। पैदल चल पडे। प्रशान्त के लिये पैदल चलना थोडा मुश्किल था, इसलिये वह सबसे पीछे पीछे आया। जब मैं फाटक पर पहुंचा तो ट्रेन के आने का समय हो गया था और फाटक भी लगने लगा था। मैंने दौड लगाई और जामनेर के तीन टिकट ले लिये। ठीक चार बजे गाडी जामनेर पहुंच गई। अब इसे यहां से पांच बजे वापस चल देना है पाचोरा के लिये। हमें भूख लगी थी। अजन्ता से निकलते समय सोचा था कि पहुर में कुछ खायेंगे लेकिन गाडी के चक्कर में नहीं खा सके। इधर जामनेर स्टेशन भी इतने सन्नाटे में है कि दूर दूर तक कुछ नहीं दिखा। स्टेशन पर भेलपूरी मिली। भला जरा सी भेलपूरी से क्या होता?

डायरी के पन्ने- 13

[डायरी के पन्ने हर महीने की पहली व सोलह तारीख को छपते हैं।] 2 सितम्बर 2013, सोमवार 1. पंजाब यात्रा रद्द कर दी। असल में हमारे यहां से कई सहकर्मी छुट्टी जा रहे हैं। ऐसे में मैं कभी भी छुट्टियां नहीं लिया करता। अजीत साहब से मना करना पडा। उनसे न मिल पाने का मलाल है। 2. प्रशान्त दिल्ली आया। वह जोधपुर का रहने वाला है और पिछले दिनों हम गोवा गये थे। वह ट्रेनों का बडा शौकीन है और सात लाख किलोमीटर ट्रेन यात्रा कर चुका है। उसका लक्ष्य जल्द से जल्द बारह लाख किलोमीटर करने का है। इधर मैं तो एक लाख में ही खुश हो रहा हूं। आज उसे अपनी किसी रिश्तेदारी में सुभाष नगर रुकना था लेकिन मेरे आग्रह पर हमारे ही यहां रुक गया।

अजन्ता गुफाएं

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6 अगस्त 2013 दिन मंगलवार था जब मैं नई दिल्ली स्टेशन से झेलम एक्सप्रेस में बैठा। गाडी पौने दो घण्टे लेट थी। रास्ते में फरीदाबाद से कमल भी आने वाला था। यह दस दिनों का कार्यक्रम असल में एक ट्रेन यात्रा ही था। इसमें मुख्य रूप से पश्चिमी घाट की पहाडियों के दोनों ओर फैली रेलवे लाइनों पर यात्रा करनी थी। आरम्भ में इस यात्रा में मैं और प्रशान्त ही थे। कमल बाद में आया। कमल और मेरी मुलाकात पहली बार जब हुई, तभी अन्दाजा हो गया कि कमल के लिये यह यात्रा अच्छी नहीं हो सकती। कमल ने बताया था कि वह ज्यादातर कम्पनी के काम से ही घूमा है और उसमें भी ज्यादातर राजधानी एक्सप्रेस से। ऐसे में कैसे वह कई कई दिनों तक पैसेंजर ट्रेनों में बैठा रह सकता था? इसलिये उसकी मुश्किलों को कुछ कम करते हुए अपनी यात्रा में से मिराज से बिरूर तक की पैसेंजर यात्रा रद्द कर दी। उसके स्थान पर एक दिन गोवा को दे देंगे या फिर मालवन जायेंगे।

लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । अभी पिछले दिनों लद्दाख साइकिल यात्रा का पूरा वृत्तान्त प्रकाशित हुआ। इसमें 19 दिन साइकिल चलाई और कुल 952 किलोमीटर की दूरी तय की। सच कहूं तो जिस समय मैं साइकिल खरीद रहा था, उस समय दिमाग में बस यही था कि इससे लद्दाख जाना है। मैं शारीरिक रूप से कमजोर और सुस्त इंसान हूं लेकिन मानसिक रूप से पूर्ण स्वस्थ। साइकिल खरीदते ही सबसे पहले गया नीलकण्ठ महादेव। ऋषिकेश से नीलकण्ठ तक सडक मार्ग से चढाई ज्यादा नहीं है, फिर भी जान निकाल दी इसने। इससे पहली बार एहसास हुआ कि बेटा, लद्दाख उतना आसान नहीं होने वाला। यहां एक हजार मीटर पर साइकिल नहीं चढाई जा रही, वहां पांच हजार मीटर भी पार करना पडेगा। वापस आकर निराशा में डूब गया कि पन्द्रह हजार की साइकिल बेकार चली जायेगी। एक योजना बनानी आवश्यक थी। दूसरों के यात्रा वृत्तान्त पढे, दूरी और समय के हिसाब से गणनाएं की। लेकिन वो गणना किस काम की, जहां अनुभव न हो। साइकिल यात्रा का पहला अनुभव मिट्टी में मिल गया। यह किसी काम नहीं आया। भला 600-700 मीटर की ऊंचाई पर साइकिल चलाना 4000-5000 मीटर पर चलाने की बराबरी कर

लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 24 जून 2013 कल जब मैं साइकिल से तेजी से लालचौक की तरफ बढ रहा था, तो इधर उधर होटलों पर भी निगाह मारता चल रहा था। शेख लॉज दिखा। मैं यहां रुककर मोलभाव करना चाहता था लेकिन तभी होटल के सामने खडे एक कर्मचारी ने मुझे देख लिया। उसने मुझसे रुकने को कहा, शायद इसीलिये मैं रुका नहीं। चलता रहा। आधा किलोमीटर आगे ही गया था कि वही कर्मचारी मोटरसाइकिल पर आया और होटल चलने को कहने लगा। जाना पडा। मैंने पहले ही उससे कह दिया था कि मुझे सबसे सस्ता कमरा चाहिये। फिर भी उसने आठ सौ वाला कमरा दिखाया। मैंने दाम पूछते ही मना कर दिया। फिर दिखाया सात सौ वाला। इसमें अटैच बाथरूम नहीं था। मैं पांच सौ तक के लिये तैयार था लेकिन वह कमरा छह सौ का मिल गया। जब खाना खाने नीचे रेस्टॉरेण्ट में बैठा था, तो खाने में विलम्ब होता देख मैंने कहा कि ऊपर कमरे में पहुंचा देना। उसी कर्मचारी ने मुझे ऐसे देखा जैसे अजनबी को देख रहा हो। पूछने लगा कि कौन से कमरे में। मैंने बता दिया तो उसकी आंखें आश्चर्यचकित लग रही थीं। बोला कि आप वही हो ना, जो साइकिल से लद्दाख से आये हैं। आप तो नहान

डायरी के पन्ने- 12

[डायरी के पन्ने हर महीने की पहली व सोलह तारीख को छपते हैं।] 18 अगस्त 2013, रविवार 1. पिछले दो तीन दिनों से अमित का परिवार आया हुआ है। साथ में दो सालियां भी हैं। जमकर मन लग रहा था कि आज उनके जाने का फरमान आ गया। हर एक से पूछा कि अगली बार कब आओगी, किसी ने ढंग का उत्तर नहीं दिया। साढे दस वाली ट्रेन से वे चले गये। 2. अमन साहब का फोन आया कि वे दिल्ली आ चुके हैं और कल हमारे यहां आयेंगे। अमन बोकारो के रहने वाले हैं और हमारी फोन पर हर दूसरे तीसरे दिन हालचाल पूछने के बहाने बातचीत होती रहती है। आज मेरी नाइट ड्यूटी है, तो कल पूरे दिन खाली रहूंगा। कह दिया कि पूरे दिन किसी भी समय आ धमको।