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Showing posts from July, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकी-ला से व्हिस्की नाला

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 12 जून 2013 सुबह आठ बजे आंख खुली। बाहर कुछ आवाजें सुनाई पडीं। दो मोटरसाइकिलें व दो कारें रुकी थीं और यात्री हमारे टैण्ट के पास आकर फोटो खींच रहे थे। हमने टैण्ट रात बिल्कुल आपातकाल में लगाया था। पीछे 34 किलोमीटर दूर सरचू व आगे 11 किलोमीटर दूर व्हिस्की नाले पर ही आदमियों का निवास था। ऐसे सुनसान वीराने में हमारा यह टैण्ट आने-जाने वालों के लिये आकर्षण का केन्द्र था। ये लोग रोहतक के थे। मैंने चलने से पहले गूगल मैप से रास्ते की दूरी व ऊंचाईयां नोट कर ली थीं। नकी-ला की स्थिति लिखने में भूल हो गई। मैंने लिखा- गाटा लूप (4600 मीटर) के दो किलोमीटर आगे 4740 मीटर की ऊंचाई पर नकी-ला है। इसके बाद नोट किया- नकी-ला से 19 किलोमीटर आगे 5060 मीटर की ऊंचाई पर लाचुलुंग-ला है। इस डाटा से यह पता नहीं चलता कि नकी-ला पार करने के बाद थोडी बहुत उतराई है या सीधे लाचुलुंग-ला की चढाई शुरू हो जाती है।

लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकी-ला

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 11 जून 2013 साढे आठ बजे आंख खुली। सचिन कभी का जग चुका था। आज बडा लम्बा रास्ता तय करना है। कम से कम पांग तक तो जाना ही पडेगा जो यहां से 78 किलोमीटर दूर है। सरचू व पांग के बीच में खाने ठहरने को कुछ नहीं। साथ ही दो दर्रे भी पार करने हैं। ज्यादातर रास्ता चढाई भरा है। और ज्यादा पूछताछ की तो पता चला कि व्हिस्की नाले पर रहने खाने को मिल जायेगा। व्हिस्की नाला यानी लगभग 50 किलोमीटर दूर। हमें आज व्हिस्की नाले तक पहुंचना भी मुश्किल लगा। इसलिये भरपेट खाना खाने के बाद आलू के छह परांठे पैक करा लिये। दस बजे यहां से चले। कल सोचा था कि आज पूरा दिन सरचू में विश्राम करेंगे, इसलिये उठने में देर कर दी। फिर आज जब उठ गये तो चलने का मन बन गया। सरचू हिमाचल प्रदेश में है लेकिन यहां से निकलकर जल्द ही जम्मू कश्मीर शुरू हो जाता है। जम्मू कश्मीर में भी लद्दाख। वैसे भौगोलिक रूप से लद्दाख बारालाचा-ला पार करते ही आरम्भ हो जाता है लेकिन राजनैतिक रूप से यहां से आरम्भ होता है। वास्तव मे सरचू से करीब सात-आठ किलोमीटर आगे एक पुल है- ट्विंग ट्विंग पुल, वही हिमाचल

लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 10 जून 2013 सुबह साढे पांच बजे आंख खुल गई। मेरठ से आया कुनबा जब जाने की तैयारी करने लगा तो शोर हुआ। मैं भी जग गया। तम्बू से बाहर निकला, सामने सचिन खडा था। पता चला वो भी बहुत थका है। वह कल जिस्पा में रुका था, गेमूर से 5-6 किलोमीटर आगे। एक ही दिन में 1000 मीटर चढने से उसकी भी हालत ज्यादा अच्छी नहीं थी। यहां से सूरजताल 13 किलोमीटर व बारालाचा 16 किलोमीटर है। यानी 16 किलोमीटर तक हमें ऊपर चढना है। नाश्ता करके साढे सात बजे निकल पडे। आज 47 किलोमीटर दूर सरचू पहुंचना है। यहां से निकलते ही चढाई शुरू हो गई, हालांकि ज्यादा तीव्र चढाई नहीं थी। सडक भी अच्छी है। कुछ आगे चलकर एक नाला पार करना पडा। इसमें काफी पानी था लेकिन ज्यादा फैला होने के कारण उतना तेज बहाव नहीं था। पार करने के बाद काफी देर तक अपने पैर ढूंढते रहे।

लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 9 जून 2013 गेमूर मनाली से 133 किलोमीटर दूर है। सात बजे आंख खुली। गांव के बीचोंबीच एक नाला है, बडा तेज बहाव है। कुछ नीचे इसी के किनारे सार्वजनिक शौचालय है। नाले के पानी का कुछ हिस्सा शौचालय में भी जाता है। बडी सावधानी से गया, फिर भी बर्फीले ठण्डे पानी में पैर भीग गये। साइकिल धूल धूसरित हो गई थी। पुनः नाले का लाभ उठाया, दस मिनट में चकाचक। यहीं नाश्ता किया। नौ बजे निकल पडा। आज का लक्ष्य 36 किलोमीटर दूर जिंगजिंगबार है। सचिन रात पता नहीं कहां रुका था, लेकिन आज वो जिंगजिंगबार में मिलेगा। गेमूर से जिस्पा 5 किलोमीटर दूर है। सडक अच्छी बनी है, ढलान भी है। पौन घण्टा लगा। जिस्पा में होटलों की कोई कमी नहीं है। अगर कल गेमूर में रुकने का इंतजाम न मिलता तो मैं जिस्पा ही रुकता।

लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 8 जून 2013 साढे आठ बजे आंख खुली। और अपने आप नहीं खुल गई। सचिन ने झिंझोडा, आवाज दी, तब जाकर उठा। वो हेलमेट लगाकर जाने के लिये तैयार खडा था। मैंने उसे कल ही बता दिया था कि भरपूर नींद लूंगा, इसीलिये उसने जल्दी उठकर मुझे नहीं उठाया। मेरी आंख खुलते ही उसने मेरी योजना पूछी। मैं भला क्या योजना बनाता? कल योजना बनाई थी भरपूर सोने की और अभी मेरी नींद पूरी नहीं हुई है। पता नहीं कब पूरी हो, तुम चले जाओ। मैं उठकर जहां तक भी पहुंच सकूंगा, पहुंच जाऊंगा। आज रात भले ही केलांग या जिस्पा में रहूं लेकिन कल जिंगजिंगबार में रात गुजारूंगा। उधर सचिन का इरादा आज जिस्पा या दारचा में रुककर अगली रात जिंगजिंगबार में रुकने का था। जिंगजिंगबार बारालाचा-ला का सबसे नजदीकी मानव गतिविधि स्थान है। आज तो पता नहीं हम मिलें या न मिलें, लेकिन कल जिंगजिंगबार में अवश्य मिलेंगे। सचिन के जाने के बाद मैं फिर सो गया। साढे ग्यारह बजे आंख खुली। असल में पिछली दो रातें स्लीपिंग बैग में गुजारी थीं, उनसे पहली रात दिल्ली से मनाली बस में और उससे भी पहले चार नाइट ड्यूटी। नाइट ड्य

लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 7 जून 2013, स्थान मढी पांच बजे आंख खुली। सोच रखा था कि आज जितनी जल्दी हो सके, निकल जाना है। बाद में रोहतांग जाने वाली गाडियों का जबरदस्त रेला हमें चलने में समस्या पैदा करेगा। फिर भी निकलते निकलते साढे छह बज गये। सचिन को साइकिल का अच्छा अभ्यास है, वो आगे निकल गया। कुछ आगे चलकर खराब सडक मिली। इस पर कीचड ही कीचड था। जहां तक हो सका, साइकिल पर बैठकर ही चला। बाद में नीचे भी उतरना पडा और पैदल चला। पीछे से गाडियों का काफिला आगे निकलता ही जा रहा था, वे ठहरे जल्दबाज जैसे कि रोहतांग भाग जायेगा, कीचड के छींटे मुझ पर और साइकिल पर भी बहुत पडे। मढी समुद्र तल से 3300 मीटर की ऊंचाई पर है और रोहतांग 3900 मीटर पर, दोनों की दूरी है सोलह किलोमीटर। शुरू में सडक लूप बनाकर ऊपर चढती है। जिस तरह आगे सरचू के पास गाटा लूप हैं, उसी तरह इनका भी कुछ नाम होना चाहिये था जैसे कि मढी लूप। साढे आठ बजे चाय की गाडी मिली। यहां संकरी सडक की वजह से जाम भी लगा था। पन्द्रह मिनट बाद यहां से चल पडा।

डायरी के पन्ने- 9

1 जुलाई, दिन सोमवार 1. कल दैनिक जागरण के यात्रा पेज पर अपना लेख छपा- चादर ट्रेक वाला। मार्च में भेजा था, तब से प्रतीक्षा थी कि अब छपे अब छपे। पूरे पेज पर बिना कांट-छांट के छापा गया। यह थी अच्छी बात। बुरी लगने वाली बात थी कि केवल दिल्ली में ही छपा। यूपी में नहीं छपा। बाकी कहां छपा कहां नहीं, पता नहीं। 2. प्रभात खबर में 26 मई को मेरा एक यात्रा सम्बन्धी लेख छपा था। उसके ऐवज में आज 1500 रुपये का चेक और उससे भी शानदार उस पृष्ठ की एक प्रति मिली। जब कभी लेख छपा था तो मुझे देर से पता चला और मैं अखबार नहीं खरीद सका था। मेरी निराशा जब बोकारो के मित्र अमन को पता चली तो उन्होंने अपने यहां से वह पृष्ठ भेज दिया। पृष्ठ मुझ तक पहुंचता, मैं साइकिल उठाकर लद्दाख के लिये निकल चुका था। लौटने पर उन्होंने पुनः इसे भेजा। तब से प्रतीक्षा जारी थी। आज जब कोरियर आया तो सबसे पहले अमन का ही ख्याल आया कि उन्होंने भेजा होगा। लेकिन चेक देखकर यह ख्याल गडबडा गया। तुरन्त अमन को फोन करके चेक के बारे में पूछा। उन्होंने कहा कि उन्होंने तो कोई चेक नहीं भेजा। बाद में लिफाफे पर निगाह गई जहां प्रभात खबर की मोहर लगी थी तो प

लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 6 जून 2013, स्थान-गुलाबा पांच बजे अलार्म बजा लेकिन उठा सात बजे। बाहर निकला तो एक गाय अभी भी टैण्ट से सटकर बैठी थी। टैण्ट पर पतला गोबर भी कर रखा था, पानी से धो दिया। सामान समेटने, बांधने व साइकिल पर चढाने में साढे आठ बज गये। जब आगे के लिये चला तो आठ बजकर पचास मिनट हो गये थे। आज सामान बांधने में एक परिवर्तन किया। टैण्ट को हैण्डल पर बांध दिया, हैण्डल के नीचे। इसके दो फायदे हुए, एक तो पीछे वजन कम हो गया और अगले पहिये पर भी कुछ वजन आ गया। अब गड्ढों व ऊबड-खाबड रास्तों पर चलने में अगला पहिया उठेगा नहीं। पीछे कैरियर के ऊपर बैग बांधा व बराबर में डिस्क ब्रेक के कुछ ऊपर कैरियर से ही स्लीपिंग बैग लटका दिया। हवा भरने का पम्प स्लीपिंग बैग से ही बंधा था। कल कुछ दूर चलते ही सारा सामान असन्तुलित हो गया था व एक तरफ झुक गया था। अब सबकुछ सन्तुलित लग रहा है। बाकी कुछ दूर चलने पर पता चल जायेगा।

लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 5 जून 2013 सुबह पाँच बजे बस मंड़ी पहुँची। ज्यादा देर न रुककर फिर चल पड़ी। औट के पास जलोड़ी जोत जाने वाला भोपाल से आने वाला साइकिलिस्ट उतर गया। भुंतर में सारपास वाले उतर गये। सारपास ट्रेक कसोल से शुरू होता है। जो जाये कुल्लू, बन जाये उल्लू। कंडक्टर ने सभी सवारियाँ उतार दीं। बोला यह बस आगे नहीं जायेगी। दूसरी बस में बैठा दिया। मुझे कोई परेशानी नहीं थी, लेकिन एक बस से साइकिल उतारकर दूसरी बस पर चढ़ाना श्रमसाध्य कार्य था। आठ बजे मनाली पहुँचे। अच्छी धूप, अच्छा मौसम, सैलानियों की भीड़। साथ ही होटल वालों की भी। बस से उतरा नहीं कि होटल वालों ने घेर लिया। साइकिल का पहले निरीक्षण किया। फिर सारा सामान बांध दिया। बांधने के लिये पर्याप्त सुतली लाया था। पीछे कैरियर पर ही बांधा - बैग भी, टैंट भी और स्लीपिंग बैग भी। यह बड़ा पेचीदा काम था और किसी आपातकाल में आसानी से खोला भी नहीं जा सकता था। इसका बाद में नुकसान भी उठाना पड़ा। कपड़े वही पहने रखे, जो दिल्ली से पहनकर आया था, हाफ़ पैंट व टी-शर्ट। मनाली लगभग 2000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। अच्छी धूप न

लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 4 जून 2013 साइकिल उठाने का पक्का निश्चय कर रखा था। सोच लिया था कि लद्दाख जाऊँगा, वो भी श्रीनगर के रास्ते। मनाली के रास्ते वापसी का विचार था। सारी तैयारियाँ श्रीनगर के हिसाब से हो रही थीं। सबकुछ तय था कि कब-कब कहाँ-कहाँ पहुँचना है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों व हिमालय पार में साइकिल चलाने का कोई अनुभव नहीं था, तो इस गणना की कोई महत्ता नहीं रह गयी थी। जैसे कि साइकिल यात्रा के पहले ही दिन श्रीनगर से सोनमर्ग जाने की योजना थी। यह दूरी 85 किलोमीटर है और लगातार चढ़ाई है। नहीं कह सकता था कि ऐसा कर सकूँगा, फिर भी योजना बनी। दिल्ली से सीधे श्रीनगर के लिये दोपहर एक बजे बस चलती है। यह अगले दिन दोपहर बाद दो बजे श्रीनगर पहुँच जाती है। इस बस की छत पर रेलिंग नहीं लगी होती, इसलिये साइकिल खोलकर एक बोरे में बांधकर ले जाना तय हुआ। दूसरा विकल्प था जम्मू तक ट्रेन से, उसके बाद बस या जीप। दिल्ली से जम्मू के लिये सुबह मालवा एक्सप्रेस निकलती है। इसका समय नई दिल्ली से साढ़े पाँच बजे है। कभी-कभी लेट भी हो जाती है। बस यात्रा की बजाय ट्रेन यात्रा ज्यादा सुवि

लद्दाख साइकिल यात्रा का आगाज़

दृश्य एक: ‘‘हेलो, यू आर फ्रॉम?” “दिल्ली।” “व्हेयर आर यू गोइंग?” “लद्दाख।” “ओ माई गॉड़! बाइ साइकिल?” “मैं बहुत अच्छी हिंदी बोल सकता हूँ। अगर आप भी हिंदी में बोल सकते हैं तो मुझसे हिन्दी में बात कीजिये। अगर आप हिंदी नहीं बोल सकते तो क्षमा कीजिये, मैं आपकी भाषा नहीं समझ सकता।” यह रोहतांग घूमने जा रहे कुछ आश्चर्यचकित पर्यटकों से बातचीत का अंश है। दृश्य दो: “भाई, रुकना जरा। हमें बड़े जोर की प्यास लगी है। यहाँ बर्फ़ तो बहुत है, लेकिन पानी नहीं है। अपनी परेशानी तो देखी जाये लेकिन बच्चों की परेशानी नहीं देखी जाती। तुम्हारे पास अगर पानी हो तो प्लीज़ दे दो। बस, एक-एक घूँट ही पीयेंगे।” “हाँ, मेरे पास एक बोतल पानी है। आप पूरी बोतल खाली कर दो। एक घूँट का कोई चक्कर नहीं है। आगे मुझे नीचे ही उतरना है, बहुत पानी मिलेगा रास्ते में। दस मिनट बाद ही दोबारा भर लूँगा।” यह रोहतांग पर बर्फ़ में मस्ती कर रहे एक बड़े-से परिवार से बातचीत के अंश हैं।