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Showing posts from January, 2013

मेरा नौकरीपेशा जीवन-2

मेरा नौकरीपेशा जीवन-1 मैं और रोहित ट्रेन से दोपहर होने तक कुरुक्षेत्र पहुंचे। यहां एक प्लेसमेंट एजेंसी है जिसके मैसेज हमारे मोबाइल पर अक्सर आते रहते थे। जब उनके यहां पहुंचे तो उनके वचन सुनकर पैरों तले से जमीन हिल पडी। बोले कि दो सौ रुपये रजिस्ट्रेशन फीस है और आधी सैलरी भी एडवांस में लेंगे। बताया गया कि उस कम्पनी में आपको पांच हजार मिलेंगे, इसलिये ढाई हजार रुपये आपको अग्रिम जमा कराने होंगे। हमने मना कर दिया कि हम आपसे बात करके ही यहां आये हैं, आपने दो सौ रुपये रजिस्ट्रेशन फीस की ही बात की थी, आपको ढाई हजार रुपये के बारे में भी बताना चाहिये था। खैर, आखिरकार इस शर्त के साथ हमें उन्होंने इंटरव्यू लेटर दे दिया कि आप कम्पनी में भर्ती होते ही ढाई ढाई हजार रुपये का भुगतान कर दोगे। अगले दिन दोनों सीधे गुडगांव पहुंचे। यह सोना ग्रुप की सोना सोमिक नाम की एक कम्पनी थी जिसकी मालिक करिश्मा कपूर हैं। इसमें लिखित तो नहीं हुआ लेकिन तीन बार इंटरव्यू हुए। कुल तीन जने वहां पहुंचे थे, तीनों को भर्ती कर लिया गया। और अगले दिन से ही कार्यभार संभालने को कहा जिसे हमने आसानी से दो दिन बाद करवा लिया ताकि ग

मेरा नौकरीपेशा जीवन-1

कुछ समय के लिये घुमक्कडी से फुरसत मिली तो आज याद कर रहा हूं अपने नौकरीपेशा जीवन के बारे में। कितना उतार-चढाव भरा रहा वो समय! बल्कि उतार ही ज्यादा कहना चाहिये। जून 2007 में मैकेनिकल से डिप्लोमा करने के बाद मैं इंजीनियर कहलाने का अधिकारी हो गया- जूनियर इंजीनियर। मई में जब प्रैक्टिकल हो रहे थे, तभी से कई कम्पनियां ताजे ताजे इंजिनियरों को लेने कॉलेज आने लगी। गाजियाबाद की प्रतिष्ठित श्रीराम पिस्टन की शर्त होती है कि इंजिनियर ने इण्टर भी कर रखी हो। इस मामले में मैं दसवीं पास होने की वजह से उसका इंटरव्यू नहीं दे पाया था। लेकिन इसका फायदा यह हुआ कि वे सबसे पहले आये और टॉपर्स को छांट-छांटकर ले गये। अब मुझे टॉपर्स से कम्पटीशन नहीं करना था। फिर आई दो और कम्पनियां- नोयडा से डेकी इलेक्ट्रोनिक्स और कानपुर से लोहिया स्टारलिंगर लिमिटेड। कानपुर वाले बल्कि आये नहीं, उन्होंने कॉलेज में न्योता भेज दिया कि दस लडके इधर भेज दो, हम नापतौल करेंगे और एक को ही रखेंगे। दस लडकों में मेरा भी नाम था। मेरठ से कानपुर जाने के लिये सभी के साथ साथ मैंने भी संगम एक्सप्रेस से रिजर्वेशन करा लिया।

एक साइकिल यात्रा- जयपुर- किशनगढ- पुष्कर- साम्भर- जयपुर

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । नवम्बर 2012 में की गई इस यात्रा की सम्पूर्ण जानकारी पहले लिखी जा चुकी है। यह भी बताया जा चुका है कि किस तरह अचानक कच्छ दर्शन को छोडकर राजस्थान के इस इलाके में आना हुआ। पुष्कर , साम्भर लेक , शाकुम्भरी माता , भानगढ , नीलकण्ठ महादेव और अजबगढ के वृत्तान्त भी लिखे जा चुके हैं। आज देखिये सम्पूर्ण साइकिल यात्रा का वृत्तान्त: 21 नवम्बर की सुबह जयपुर से निकला तो दिमाग में बूंदी था। साइकिल चलाने का अनुभव नहीं था, इसलिये मालूम भी नहीं था कि एक दिन में कितना चला लूंगा। फिर भी प्रथम-दृष्ट्या 100 किलोमीटर रोजाना का लक्ष्य रखा गया। बूंदी जाने के लिये जयपुर से इतनी दूरी पर टोंक पडता है, इसलिये आज का विश्राम टोंक में करना तय हुआ। लेकिन विधि को टोंक और बूंदी मंजूर नहीं था, तभी तो कुछ दूर चलते ही साइकिल अजमेर की तरफ मोड दी- पुष्कर का मेला देखेंगे। अजमेर जयपुर से करीब 130 किलोमीटर दूर है। आज अन्धेरा होने तक अजमेर पहुंचना था। ताजा-ताजा शौक था, थकान नहीं हुई थी, इसलिये ले लिया ऐसा निर्णय।

रेलयात्रा सूची: 2013

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