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Showing posts from March, 2010

चण्डीगढ की शान – सुखना झील

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पिछली बार हमने आपको चण्डीगढ के रॉक गार्डन में घुमाया था। इसके पास में ही है सुखना झील। पास में मतलब एक डेढ किलोमीटर दूर। मैं तो पैदल ही चला गया था। चण्डीगढ की यही तो बात अच्छी लगती है। एक तो चौडी-चौडी सडकें हैं, अभी ट्रैफिक भी ज्यादा नहीं है, फिर सडकों के किनारे चौडे-चौडे फुटपाथ, छायादार पेड; पैदल चलने में मजा आ जाता है। मेरी हालत तो आपको पता ही है। पूरी रात जगा रहा, नाइट शिफ्ट की थी, फिर चार-साढे चार घण्टे का जनरल डिब्बे में सफर करके चण्डीगढ पहुंचा, यहां घण्टे भर लाइन में खडा होकर कालका मेल से वापसी का रिजर्वेशन कराया, फिर रॉक गार्डन में पैदल ही घूमता रहा, अब वहां से यहां सुखना तक भी पैदल घिसटन। दोपहर बाद का टाइम तो रॉक गार्डन में ही हो गया था। मेरी जगह खुद को रखकर देखो, अब तक तो कहने लगते कि छोडो सुखना-वुखना, कोई होटल ढूंढते और सो जाते। रखकर देखो तो सही, थोडी बहुत थकान महसूस हो ही जायेगी। मुझे भी उस समय बहुत भयंकर थकावट हो रही थी।

आज हमारा घर देखिये

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यह पोस्ट अपने तय समय से कुछ विलम्ब से छप रही है। क्योंकि नीचे दिये गये ज्यादातर फोटू होली पर खींचे गये थे। उस समय खेतों में बहार आयी हुई थी, सरसों मस्ती मार रही थी। अब तो सरसों अपने पकने के दौर में चल रही है। लेकिन फिर भी देर से ही सही। मेरे गांव का नाम है- दबथुवा। यह मेरठ जिले में सरधना और शामली जाने वाली सडक पर स्थित है। मुझे दिल्ली से अपने गांव जाने में कम से कम तीन घण्टे लगते हैं। नजदीकी रेलवे स्टेशन मेरठ छावनी है। दबथुवा काफी बडा गांव है। यह जाट बहुल है। हमारा घर पंघाल पट्टी में है, पंघाल पट्टी मतलब पंघाल गोत्र वाले जाट। अपन भी पंघाल हैं। हमारा घर मुख्य सडक से काफी हटकर गांव के बाहरी इलाके में है, खेतों के पास। घर के सामने और बायें, दो तरफ खेत हैं। आजकल गन्ना और गेहूं की खेती हो रही है। गन्ना धीरे-धीरे कट रहा है, एक महीने बाद गेहूं भी कटने लगेगा। गन्ने वाले खेतों में दोबारा गन्ना ही बो दिया जायेगा, गेहूं वाले खेतों में ज्वार या धान बोये जायेंगे। पूरे सालभर यही चक्र चलता रहता है।

रॉक गार्डन, चण्डीगढ

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चण्डीगढ जाना तो कई बार हुआ; शिमला गया, तो चण्डीगढ; धर्मशाला गया, तो चण्डीगढ; सोलन गया, तो चण्डीगढ; एकाध बार ऐसे-वैसे भी चला गया था। लेकिन चण्डीगढ ही नहीं देख पाया। इस बार पक्का मूड बना लिया चण्डीगढ जाने का। अपनी नौकरी भी तो ऐसी है कि तीन शिफ्ट की ड्यूटी लगती है, लेकिन मजेदार ये है कि रात की शिफ्ट पहली शिफ्ट मानी जाती है। इसके बाद पूरे दिन खाली। तो जी, हुआ ये था कि चौदह मार्च को अपनी रात की ही ड्यूटी थी; पन्द्रह मार्च, सोमवार को मेरा साप्ताहिक अवकाश था। मंगलवार को शाम की ड्यूटी थी, दोपहर बाद दो बजे से। मेरे पास थे दो दिन और दो रातें। इनका बंटवारा मैने इस प्रकार किया कि इतवार को सुबह छह बजे तक ड्यूटी करके, हिमालयन क्वीन पकडके, दस-ग्यारह बजे तक चण्डीगढ पहुंचा जाये। दोपहर से शाम तक चण्डीगढ में घूम-घाम के फिर एक रात का सफर किया जाये और अगले दिन किसी नयी जगह पर पहुंचा जाये।

गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब

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यह गुरुद्वारा उत्तराखण्ड राज्य के ऊधमसिंहनगर जिले में स्थित है। जिले के बिल्कुल बीच में है जिला मुख्यालय और प्रमुख नगर रुद्रपुर। यहां से एक सडक किच्छा, सितारगंज होते हुए खटीमा और आगे टनकपुर जाती है। सितारगंज और खटीमा के बीच में है नानकमत्ता। मैं जब खटीमा निवासी डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ’मयंक’ जी के यहां गया तो पहले तो एक चक्कर प्रसिद्ध शक्तिपीठ पूर्णागिरी का लगाया। फिर शास्त्री जी के साथ उन्ही की कार में बैठकर नानकमत्ता गया। शास्त्री जी तो इसी इलाके के रहने वाले हैं, उन्हे पूरी जानकारी है। इसलिये उन्होने एक पोस्ट भी लिख दी है नानकमत्ता के बारे में। अब मेरा काम आसान हो गया, फटाफट शास्त्री जी से उनकी पोस्ट का इस्तेमाल करने की आज्ञा ली। अब नानकमत्ता की पूरी कहानी उन्ही की जुबानी-

बुखार में होली

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आज बहुत दिन बाद लिखने बैठा हूँ। अब स्वास्थ्य ठीक है। असल में हुआ ये था कि होली की छुट्टियों में अल्मोडा की तरफ कहीं जाने का इरादा था। लेकिन ऐन टाइम पर बुखार चढ गया। बुखार से पहले नाक बही, खांसी हुई। नाक ठीक हो गयी, बुखार ठीक हो गया। खांसी अब भी है। जब भी थोडी-थोडी देर बाद याद आता है, खूं-खूं खांसना शुरू कर देता हूँ। डॉक्टर नामक प्राणी से सख्त ऐतराज है। जिस तरह जाडे के बाद गर्मी आती ही है, उसी तरह बसन्त के मौसम में ये बीमारियां भी होती ही हैं। डॉक्टर के पास जाओगे तो एक तो बुखार की वजह से खाने-पीने को मन नहीं करता, फिर वो दुनिया भर का परहेज बता देता है। मोटे-मोटे गोले दे देता है कि ये सुबह, ये दोपहर, ये शाम, ये ताजे पानी से, ये दूध से, ये चाय से, ये खाने से पहले, ये खाने के बाद, ये आधे घण्टे पहले, ये बाद में, ये उठने से पहले, ये सोने के बाद, ये एक चम्मच, कडवी हो तो दो चम्मच; और हां, सबसे पहले इंजेक्शन। खैर, होली पर घर पहुँचा। बुखार से तपता लाल और मुस्कराता चेहरा देखते ही घरवाले समझ गये कि अगले को बुखार है। डॉक्टर के पास जाने से बचने के लिये मुस्कराने की कोशिश कर रहा है। वाकई उस समय थ