Monday, August 20, 2018

बाइक यात्रा: गिनोटी से उत्तरकाशी, गंगनानी, धराली और गंगोत्री

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

10 जून 2018
गिनोटी से सवा नौ बजे चले। हम हमेशा प्रोमिस करते, लेकिन उठते-उठते सूरज आसमान में चढ़ जाता और हम अगले दिन के लिए फिर से प्रतिज्ञा कर लेते - “कल तो सुबह-सुबह ही निकलेंगे।”
गिनोटी से थोड़ा ही आगे ब्रह्मखाल है। इसके नाम के साथ ‘खाल’ लगा होने के कारण मैं जन्म से लेकर कल तक यही सोचता आ रहा था कि धरासू बैंड और बडकोट के बीच में ब्रह्मखाल ही वो दर्रा है, जो भागीरथी घाटी और यमुना घाटी को जोड़ता है। लेकिन कभी इसकी पड़ताल नहीं की। गूगल मैप पर सैंकड़ों बार इस सड़क को देखा, लेकिन मन में स्थाई रूप से ब्रह्मखाल ही अंकित हो गया था। कल पता चला कि वो स्थान राडी टॉप है।
सुमित की बुलेट का असर हमारी डिस्कवर पर भी पड़ रहा था। यह भी बीमारू जैसा बर्ताव कर रही थी। बार-बार पंचर हो जाता। पुराने पंचर ही लीक होने लगते। टायर ट्यूबलेस हैं और पंचर किट हमेशा हमारे पास रहती है, इसलिए कभी हम खुद पंचर बना लेते, तो कभी पचास रुपये देकर बनवा लेते, तो कभी चालीस-पचास किलोमीटर बिना हवा भी चला लेते।
लेकिन ब्रह्मखाल तक अगले पहिये की बम-बम हो गई। पुराना पंचर जिंदा हो उठा और पिचके टायर के साथ मोड़ों पर संतुलन बनाना मुश्किल होने लगा। इरादा था उत्तरकाशी पहुँचकर इसे बदलवाने का, लेकिन अभी उत्तरकाशी बहुत दूर है।
“भाई जी, इसमें डबल ‘वो’ लगानी पड़ेगी, सौ रुपये लगेंगे।”
“लगा दे।”

यहाँ से एक सड़क बनगाँव जा रही थी। बनगाँव से आगे यही पंतवाड़ी चली जाती है और नैनबाग में यमुनोत्री रोड में मिल जाती है। लेकिन बताते हैं कि ब्रह्मखाल और बनगाँव के बीच यह खराब है।
धरासू बैंड - दीप्ति की मनपसंद जगह। उसे यहाँ एक खास ‘अनहाइजेनिक’ दुकान के राजमा-चावल बेहद पसंद हैं। इधर से उधर जाना हो या उधर से इधर आना हो, हमें यहाँ रुकना ही है। सुमित ने भी भरपेट खाना खाया, लेकिन मैंने भूख लगने के बावजूद भी यहाँ कुछ नहीं खाया।
क्यों?
उत्तरकाशी में तिलक सोनी ने अपना रेस्टॉरेंट खोला है - बस अड्डे से सौ-पचास मीटर गंगोत्री की ओर चलते ही। टी.एफ.सी. - दा फूड कैफे। साथ में संदीप गोस्वामी जी भी। तिलक सोनी मूलतः राजस्थान के रहने वाले हैं और पिछले कई वर्षों से यहीं उत्तरकाशी में रहते हैं। अविवाहित हैं। उत्तरकाशी के पर्यटन के विकास में उन्होंने जबरदस्त योगदान दिया है। अगर उत्तरकाशी में रहने वाला कोई व्यक्ति तिलक को नहीं जानता, तो समझिए कि वह उत्तरकाशी में रहता ही नहीं है।
और मेरे लिए यह बड़े सम्मान की बात है। चकाचक साफ-सुथरे रेस्टॉरेंट में वे हमें किचन तक ले गए। एक-एक बात समझाई।
“नीरज बाबू, जब हमने इस जगह को लिया था तो यह इतनी गंदी थी कि इसमें भैंस भी नहीं रह सकती थी। बड़ी मेहनत की। ... कच्चा सामान बाहर से ही मंगाना पड़ता है, क्योंकि हमारा मेन्यू इतना यूनीक है कि इसका सामान उत्तरकाशी में नहीं मिलता। अब शाम के समय यहाँ पैर रखने की जगह नहीं होती और जिले के डी.एम., एस.डी.एम., एस.पी. यहाँ आते रहते हैं।”
यह सुनते ही मुझे भी खुद वी.आई.पी. जैसी फीलिंग आई। इतनी बड़ी हस्ती अगर आपको आगे बढ़कर ‘अब यह देखो, इधर देखो’ कह-कहकर एक-एक कोना दिखाने लगेगी, तो आपको वी.आई.पी. वाली फीलिंग आनी ही है।
“असल में हमें एक ऑफिस की आवश्यकता थी। अभी तक हमने जो भी किया, वो अपने रेजीडेंट से किया। एक ऑफिस जरूरी था। संदीप जी शानदार कुक हैं। हम दोनों ने इसे बनाया। उनकी कुकिंग का काम भी चल पड़ा, मेरे लिए ऑफिस का इंतजाम भी हो गया।”
“ये सभी लड़के यहीं के स्थानीय हैं। अब तो ये भी पास्ता और बर्गर सब बनाने में एक्सपर्ट हो गए हैं। अगर ये आगे चलकर अपना कुछ खोलना चाहेंगे, तो हम इनकी पूरी मदद करेंगे।”
एक छोटी-सी लाइब्रेरी भी है, जहाँ बैठकर आप किताबें पढ़ सकते हैं। इस लाइब्रेरी में मेरी चारों किताबें भी उपलब्ध हैं।
और पास्ता खाने में मैं भूल गया कि मोटरसाइकिल का टायर भी बदलवाना है। बारिश के आसार होने लगे थे और हमें कम से कम गंगनानी तक तो पहुँचना ही था।
मनेरी के आसपास कहीं बूंदाबांदी में अगले मडगार्ड में हल्की-हल्की खट-खट की आवाज आने लगी। तुरंत मोटरसाइकिल रोकी। ब्रह्मखाल में जो डबल पंचर लगवाया था, वह बाहर निकलने लगा था। वही मडगार्ड पर टकरा रहा था। एक दुकान से कैंची लेकर उस फालतू टुकड़े को काट दिया। आगे बढ़े।
उत्तरकाशी में टायर न बदलवाने का पछतावा होने लगा। अब यह पंचर इतना बड़ा हो चुका था कि इसे संभालना नामुमकिन ही था। यह जानते हुए भी कि अब कहीं भी ट्यूबलेस टायर नहीं मिलेगा, एक पंचर की दुकान पर रुककर पूछताछ की। उसने वही उत्तर दिया, जो हमें पता था - “नहीं है।”
और चमत्कारिक रूप से गंगोत्री की ओर से एक रंग-बिरंगी कार आती दिखी। तेज बूंदाबांदी हो रही थी और हमने रेनकोट पहन रखे थे। हाथ लहराकर इस कार को रुकवाया। उसका ड्राइवर बाहर निकला और खुशी से ओतप्रोत होकर हम दोनों लिपट गए।
ये प्रेम फकीरा थे।
बाकी मुझे कुछ भी नहीं कहना। मैं उस शक्ति के आगे नतमस्तक हो गया, जिसके वशीभूत होकर हम यहाँ सबकुछ जानते हुए भी टायर बदलवाने के लिए रुके। अन्यथा हम बारिश में चलते ही जाते और कार बगल से निकल जाती। मैं उस कार को भले ही पहचान जाता, लेकिन फकीरा से मिलने ऐसे मौसम में उसका पीछा नहीं करता।
और न मुझे फकीरा की यात्रा का पता था, न ही फकीरा को मेरी यात्रा का।

गंगनानी में गरम पानी के कुंड के एकदम सामने ही 600 रुपये का कमरा मिल गया। और यह कहने की आवश्यकता नहीं कि 600 के कमरे काफी शानदार होते हैं।
गंगनानी गंगोत्री मार्ग पर स्थित है। जून के महीने में यहाँ अच्छी भीड़ रहती है, लेकिन यहाँ कम ही लोग रुकते हैं। यहाँ गर्म पानी के सोते हैं, जिन्हें बड़े-बड़े कुंडों में एकत्र करके नहाने की व्यवस्था की गई है। महिलाओं, पुरुषों के लिए अलग-अलग कुंड हैं।
हिमालय की ठंड भरी ऊँचाइयों पर चारों धामों समेत कई स्थानों पर गर्म पानी के सोते पाए जाते हैं। इनमें नहाना बड़ा ही अलौकिक अनुभव होता है।
“क्या आज हम लोग नहाएँगे?”
“हाँ, आज नहाएँगे।”
दो घंटे बाद...
“हम कब नहाएँगे?”
“नहाएँगे, आज ही।”
रात दस बजे...
“कब?”
“बस, चलते हैं।”
सुबह आठ बजे...
“अब तो चलें?”
“हाँ, चलो।”
सुबह दस बजे...
“???”
“...”
लेकिन पानी बहुत गर्म था। पैर डाले, बाहर निकाल लिए। फिर डाले, फिर बाहर निकाल लिए। अरे जल थोड़े ही जाएँगे... सोचकर जी कड़ा करके पैर डाल ही लिए। कुछ देर में सामान्य लगने लगा। फिर थोड़ा और भीतर गए, बाहर आ गए, भीतर गए, बाहर आ गए। और एक घंटे बाद पहली डुबकी लगी। इस दौरान बहुत-से लोगों को उनके साथियों ने धक्का दे दिया था और वे पकौड़े की तरह तले जाने की फीलिंग लिए बदला लेने की जुगत करने लगे थे। मैं भी इसी वजह से सुमित से नब्बे डिग्री के कोण पर पाँच मीटर दूर बैठा था।
सुक्खी टॉप पहुँचते-पहुँचते जितनी बर्फीली चोटियाँ दिखती हैं, मोटरसाइकिल का अगला टायर भी उतना ही फ्लैट होने लगा। आगे झाला में कोई मैकेनिक नहीं दिखा। 15-20 की स्पीड से चलते हुए हर्षिल की सीमा में पहुँचे, तो वहाँ से धराली जाने का सुझाव मिला।
आखिरकार धराली जाकर टायर की समस्या का स्थायी समाधान हो गया। इसमें ट्यूब डलवा दी।

कल जब हम उत्तरकाशी थे, तो तिलक सोनी ने कहा था - “मुझे हर्षिल कभी भी ‘अपीलिंग’ नहीं लगा। हमेशा धराली पसंद आता है।”
और हमें भी धराली ही पसंद आया। तिलक भाई के कहे अनुसार अर्जुन नेगी के आँचल होटल में 600 रुपये का कमरा मिल गया। और आपको पता ही है कि 600 के कमरे शानदार होते हैं। इसमें बालकनी थी और एकदम सामने मुखबा गाँव दिख रहा था।
वैसे तो हम गंगोत्री जाकर भी रुक सकते थे, लेकिन अगले दो दिनों के लिए हमें हर्षिल-धराली क्षेत्र में ही घूमना है, तो धराली को ही बेस बना लिया। इस क्षेत्र में कई स्थान दर्शनीय हैं, लेकिन ज्यादातर लोग केवल गंगोत्री के लिए इधर आते हैं और गंगोत्री घूमकर लौट जाते हैं।
यहाँ गंगोत्री के अलावा भी बहुत कुछ है।
लेकिन इस बात में कोई दो-राय नहीं कि गंगोत्री के बिना इधर की यात्रा अधूरी है। सो दोपहर बाद हम भी गंगोत्री के लिए चल दिए। वहाँ जाकर क्या किया, क्या खाया, क्या पिया; यह सब लिखने की आवश्यकता नहीं।
लेकिन गंगोत्री में एक बड़ा ही दिलचस्प मार्मिक वाकया हुआ। हम घाट पर खड़े थे और कुछ श्रद्धालु भागीरथी के अत्यधिक शीतल जल में स्नान कर रहे थे। इन्हीं में एक महिला घाट पर झुककर उंगलियाँ भिगोकर अपने ऊपर छींटे मार रही थीं। उनका झोला जोकि पुराने कपड़ों से सिला हुआ था, उनके पीछे रखा था। भक्ति से ओतप्रोत होकर गंगाजी को प्रणाम करके वे उठीं और बिना झोला उठाए तेजी से भीड़ में गुम हो गईं। झोला एकदम मेरे सामने रखा हुआ था।
क्या होगा इस झोले में?
उस महिला के जीवन-भर की कमाई। वे बहुत सारे अन्य लोगों के साथ तीर्थयात्रा पर आई होंगी। पचास के आसपास उम्र रही होगी। पता नहीं किस राज्य से हैं, लेकिन गरीब ग्रामीण पृष्ठभूमि से ही हैं। पता नहीं परिजनों ने कितनी बार कहने के बाद उन्हें यहाँ आने दिया होगा! पता नहीं कितने पैसे उनके पास होंगे! लेकिन जो भी पैसे होंगे, सभी इस झोले में ही होंगे! शाम हो चुकी है, वे आज गंगोत्री ही रुकेंगी। उनके पास और भी सामान होगा, जिसे उन्होंने कमरे में रख दिया होगा, केवल कीमती सामान रखकर यह झोला ही अपने साथ लाई होंगी।
अब इस झोले का क्या करूँ? मैं तो भूल गया था, लेकिन दीप्ति ने बताया कि उन्होंने सिर पर लाल शॉल लपेटा हुआ था। हम इधर-उधर देखने लगे। लाल शॉल लपेटे एक महिला कुछ दूर दिखाई पड़ीं और भीड़ में गुम हो गईं। हम झोला उठाकर उस दिशा में नहीं जा सकते थे। हम उधर उन्हें ढूँढ़ते रहेंगे और इस दौरान अगर वे झोला ढूँढ़ती हुई यहाँ आ गईं तो?
तो क्या पुलिस को सौंप दें?
या पंडे पुजारियों को सौंप दें?
लेकिन इन दोनों में से कोई भी भरोसेमंद नहीं है। कोई पुलिसकर्मी हो या पंडा - झोला मिलते ही अपने पास रख लेगा और कभी भी इसे लौटाने की कोशिश नहीं करेगा।
तो क्या किया जाए?
हम यहीं खड़े रहेंगे, जब तक कि वह महिला इसे ढूँढ़ती हुई यहाँ नहीं आ जाती। प्रबल संभावना यही है कि वे आज गंगोत्री ही रुकेंगी, इसलिए उन्हें शीघ्र ही झोले के खो जाने का पता चल जाएगा और वे इसे ढूँढ़ने की जी-तोड़ कोशिश करेंगी। वे हर उस मंदिर में जाएंगी, हर उस जगह पर जाएंगी, जहाँ-जहाँ वे झोला लेकर जा चुकी थीं। वे यहाँ जरूर आएंगी।
और अगर नहीं आईं तो?
तब हम इसकी तलाशी लेंगे। इसमें कुछ न कुछ ऐसा जरूर मिलेगा, जिससे हम उनके पास तक पहुँच सकें। हो सकता है कोई नाम-पता लिखी हुई पर्ची ही रखी हो। या हो सकता है कि कोई मोबाइल ही रखा हो।
पंद्रह मिनट बाद...
सिर पर लाल शॉल लपेटे एक महिला घबराई हुई तेजी से आईं और दीप्ति से लिपट गईं। उनकी आँखों में आँसू थे। इस झोले के बिना कोई उन्हें खाने के लिए भी नहीं पूछने वाला था। और भविष्य में उन्हें कभी भी तीर्थयात्रा करने की अनुमति नहीं मिलने वाली थी।
दोस्तों, ऐसे क्षण फोटो खींचने, सेल्फी लेने और उन्हें सोशल मीडिया पर अपलोड करने के नहीं होते। ये बेहद भावुक क्षण होते हैं। इन्हें केवल महसूस किया जाता है।


(शायद) ब्रह्मखाल से दूरियाँ


उत्तरकाशी में तिलक सोनी और संदीप गोस्वामी जी को किताब भेंट कर दी...

भाई, बाइक थोड़ी बीमार है... इस पर अपना हाथ फेर दो...
ये लो...

अचानक रंग-बिरंगी कार में काले कपड़े पहले प्रेम फकीरा प्रकट हो गए...

गंगनानी पुल से भागीरथी का दृश्य

गंगनानी में उत्तर भारतीय चटोरापन...

गंगनानी में दक्षिण भारतीय चटोरापन...




सुक्खी टॉप से दक्षिण का नजारा

सुक्खी टॉप से उत्तर का नजारा

सुक्खी टॉप

सुक्खी टॉप


भागीरथी और धूमधारकंडी से आने वाली नदी का मिलन... धूमधारकंडी पास के उस तरफ हर की दून है...


धराली में 600 रुपये का कमरा... मई-जून के अलावा यह 200-300 का मिल जाता है...

उधर शिवजी भगवान जटाओं से गंगाजी को अवतरित कर रहे हैं और इधर डॉक्टर भगवान लस्सीगंगा ग्रहण कर रहे हैं...



यही वो झोला था...

गंगोत्री में गंगा मंदिर से भी ज्यादा दर्शनीय सूर्यकुंड है...



सूर्यकुंड से थोड़ा ही नीचे गौरीकुंड है... यहाँ भागीरथी बेहद संकरी गुफाओं से होकर बहती है... इसके ऊपर की चट्टानों को पैदल पार किया जा सकता है...

और हर्षिल-धराली की शाम...



पहाड़ों पर इंडिकेटर भी देना चाहिए...

और होरन भी बजाना चाहिए...

धराली में एक प्राचीन मंदिर...

धराली से दिखता भागीरथी के उस पार मुखबा गाँव... 

धराली
और अब कुछ फोटो सुमित के कैमरे से...






उत्तरकाशी तिलक सोनी के यहाँ पास्ता...

गंगनानी में गर्म पानी का कुंड



8 comments:

  1. हमेशा की तरह लाजवाब लेकिन बहुत जल्दी जल्दी

    ReplyDelete
    Replies
    1. हमारे वाली ट्रिप चलेगी धीरे धीरे संजय जी🤣🤣

      Delete
  2. मर जावां(में)😁😁😁पढ़ पढ़ के

    ReplyDelete
  3. शानदार भाई जी
    आपकी यात्राओं के क्या कहने👌👌सुमित भाई के अलावा आपके लेख पढ़ कर ओर भी महत्वपूर्ण जानकारियां मिली

    ReplyDelete
  4. गजब की यात्रा । भाई लेकिन कुछ जल्दीबाज़ी सी लगी , जैसे प्रेम फकीरा की मुलाकात अधूरी छोड़कर आगे बढ़ गए । सभी फ़ोटो आकर्षक है ।

    ReplyDelete

  5. Likhma Ram Jyani
    वाह नीरज जी, सितम्बर के बाद इस क्षैत्र के लिए सबसे अच्छा समय कौन सा रहेगा और सामान्य मौसम कैसा रहेगा। शानदार लेखनी और फोटो के लिए आभार।

    ReplyDelete
  6. बहुत सुंदर यात्रा विवरण। 24 मई को मैं भी गंगोत्री गया था परंतु सूर्यकुंड और गौरीकुंड के विषय मे कोई जानकारी नही तो देख नही पाया।गंगनानी में जरुर स्नान किया। इसकी अनुभूति ही अलग है।

    ReplyDelete