Friday, December 1, 2017

तीसरी किताब: पैडल पैडल

आज हम बतायेंगे कि मेरी तीसरी किताब ‘पैडल पैडल’ की क्या हिस्ट्री रही और यह कैसे अस्तित्व में आयी।
पहली किताब छपी थी अप्रैल 2016 में, नाम था ‘लद्दाख में पैदल यात्राएँ’। उसी समय सोच लिया था और बहुत सारे मित्रों की भी इच्छा थी कि लद्दाख साइकिल यात्रा को भी पुस्तकाकार बनाना चाहिये। लद्दाख में साइकिल चलाना वाकई एक विशिष्ट अनुभव होता है और इसकी किताब भी अवश्य प्रकाशित होनी चाहिये। लेकिन जून 2016 में एवरेस्ट बेसकैंप की ट्रैकिंग कर ली और वहाँ से लौटकर उसके अनुभवों को लिखने में लग गया। वह मार्च 2017 में पूरी हुई और हिंदयुग्म प्रकाशन को भेज दी। मैं चाहता था कि अप्रैल में ही एवरेस्ट वाली किताब आ जाये, लेकिन तय हुआ कि यह किताब जुलाई 2017 में आयेगी।
अब मैं लगभग खाली था। ‘लद्दाख साइकिल यात्रा’ फिर से याद आयी। यह यात्रा पहले ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुकी थी। इसके शब्द गिने - लगभग 30000 मिले। इतने शब्दों में 200 पृष्ठों की किताब नहीं बन सकती। इसका अर्थ है कि शब्द बढ़ाने पड़ेंगे। और ऐसे कहने से ही शब्द नहीं बढ़ते। वो वृत्तांत चार साल पहले लिखा था। अब तक मेरी लेखन शैली में भी कुछ परिवर्तन आ चुका था। यह परिवर्तन पाठकों को महसूस नहीं होना चाहिये। ऐसा करते-करते अप्रैल भी निकल गया और मई, जून, जुलाई भी।
आख़िरकार साइकिल यात्रा का लेखन पूरा हुआ और भूमिका, प्रस्तावना सब लिख दी। और अगस्त में तय किया कि इसे मैं स्वयं प्रकाशित करूंगा। आई.एस.बी.एन. का ऑनलाइन आवेदन करने बैठा, तो पता चला कि कवर पेज भी अपलोड़ करना पड़ेगा और कुल पृष्ठ-संख्या भी दिखानी पड़ेगी। इस काम की जिम्मेदारी ली - सुरेंद्र सिंह रावत ने; एकदम फ्री में। शर्त थी कि उसका नाम भी किताब में कहीं लिखना पड़ेगा। और इसके लिये सुरेंद्र से मिलने का समय भी ले लिया। वह इसका कवर पेज भी डिजाइन कर देगा और बाकी डिजाइनिंग भी कर देगा, ताकि पृष्ठ-संख्या जानी जा सके।
और जैसे ही इतने काम की जानकारी फेसबुक पर साझा की, तो इस पर निगाह पड़ी - अंजुमन प्रकाशन की। वे फ्री में इसे प्रकाशित करना चाहते थे, लेकिन मैं स्वयं ही प्रकाशन की ज़िद पकड़े रहा। और आख़िरकार उन्होंने मुझे सहमत कर ही लिया। साथ ही मेरी पहली किताब ‘लद्दाख में पैदल यात्राएँ’ को भी प्रकाशित करने की जिम्मेदारी उन्होंने ले ली - प्रकाशकीय खर्च से। मैंने शर्त रखी - “साब जी, दो महीने में किताबें आ जानी चाहियें।” बोले - “आ जायेंगी।”
दो दिनों के भीतर दोनों किताबों के कवर पेज डिजाइन हो गये। साइकिल यात्रा का नाम रखा गया - ‘पैडल पैडल’। इसके लिये फेसबुक पर मित्रों से नाम सुझाये गये थे और रणविजय सिंह द्वारा सुझाये गये ‘पैडल पैडल’ को ही प्रकाशक ने ठीक समझा। उधर ‘लद्दाख में पैदल यात्राएँ’ का भी दूसरा नाम रखा गया - ‘सुनो लद्दाख!’...
‘लद्दाख में पैदल यात्राएँ’ और ‘सुनो लद्दाख!’ में एक शब्द भी इधर-उधर नहीं है, केवल दो-चार फोटो का ही फ़र्क है।
हालाँकि मैं पिछले अनुभव से जानता था कि किताब में रंगीन फोटो लगवाने आसान नहीं हैं। फिर भी इसके बारे में अंजुमन प्रकाशन से बात की। उन्होंने भी बताया कि ऐसा करना न तो ठीक है और न ही किफ़ायती। मैं ज़िद पर अड़ गया, तो उनका उत्तर सुनकर अपनी ज़िद एकदम पीछे खींच ली - “नीरज जी, अगर ऐसी ही बात है तो ठीक है। लेकिन आठ रंगीन पेजों के लिये आपको इतने पैसे देने होंगे और सोलह पेजों के लिये इतने।”
“ना ना... आपको किसने कहा रंगीन पेज लगाने को? अब हम बेचारे गरीब लोग मज़ाक भी नहीं कर सकते क्या? ब्लैक एंड व्हाइट ही छपने दो जी। आख़िर हमें ब्लॉग भी तो चलाना है।”
दोनों किताबें सितंबर में ही आ जाने वाली थीं, लेकिन इसी दौरान अंजुमन प्रकाशन ने एक नया उपक्रम बनाया - रेडग्रैब बुक्स। यह प्रकाशकों का अंदरूनी मामला होता है ऐसा करना, तो हम इसकी कोई चर्चा नहीं करेंगे। इस चक्कर में दोनों किताबें दो महीने लेट हो गयीं।
जब नवंबर में ‘पैडल पैडल’ और ‘सुनो लद्दाख!’ का आना पक्का हो गया, तो ठीक इसी दौरान हिंदयुग्म प्रकाशन ने ‘हमसफ़र एवरेस्ट’ भी लांच कर दी। हालाँकि कोई भी प्रकाशक नहीं चाहेगा कि उसके लेखक की कोई दूसरी किताब दूसरे प्रकाशन से उसी दौरान प्रकाशित हो, लेकिन अंजुमन प्रकाशन (अब रेडग्रैब बुक्स) ने इसे ज़ाहिर नहीं होने दिया। मेरे लिये तो यह जश्न मनाने का समय था कि एक ही साथ तीन किताबें लांच हुईं। ‘हमसफ़र एवरेस्ट’ के कुछ दिन बाद लांच होने के कारण ‘पैडल पैडल’ और ‘सुनो लद्दाख!’ हालाँकि उतना ध्यान नहीं खींच सकीं। लेकिन जल्द ही ये भी यात्रा-वृत्तांत विधा में अच्छा नाम कमायेंगी।
‘पैडल पैडल’ के कवर फोटो में सचिन गाँवकर अपनी साइकिल पर बारालाचा-ला की ओर बढ़ता दिख रहा है और ‘सुनो लद्दाख!’ के कवर फोटो में मैं स्पीति में किब्बर के पास खड़ा हूँ, पृष्ठभूमि में चीचम गाँव दिख रहा है, फोटो सुमित शर्मा ने लिया है।




1. पुस्तक: पैडल पैडल
लेखक: नीरज मुसाफ़िर
प्रकाशक: रेडग्रैब बुक्स
आई.एस.बी.एन.: 978-93-87390-02-7
पृष्ठ: 192
अधिकतम मूल्य: 175 रुपये (पेपरबैक)



2. पुस्तक: सुनो लद्दाख!
लेखक: नीरज मुसाफ़िर
प्रकाशक: रेडग्रैब बुक्स
आई.एस.बी.एन.: 978-93-87390-01-0
पृष्ठ: 208
अधिकतम मूल्य: 175 रुपये (पेपरबैक)

11 comments:

  1. यह 'किताब मैने बुक कि है ... नीरज तूम्हारे यात्रा वृत्तात मे मुझे पसंदीदा लडाख वाला वृत्तात है ... इस लिये मैं 'किताब कि बेसब्री से इंतजार कर रहा हू

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  2. Amazon ने 15-12-17 तक दोनों पुस्तकों को पहुंचाने का वादा तो किया है जी।

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  3. किताब को गूगल प्ले स्टोर पर भी उपलब्द करा दो भाई साहब

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  4. बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएं !

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  5. हमसफ़र एवरेस्ट की तरह ये दोनों भी बेस्ट सेलर हो यही शुभकामनाए

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  6. Congratulations Neeraj Ji. I have been reading your travelogues and often guided by your writings. I have visited some of the places after reading your stories too. I am very happy that you have come out with these books. In my opinion your possess all the traits that a traveller should have like honesty, perseverance, humility, patience and above all curiosity. I wish you all the best again and may you travel more and more. Good Luck dear.

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  7. आप को इन सभी काम के लिए निश्चय ही बहुत तपस्या करनी पड़ी होगी। खैर पुस्तक देख कर दुख और परेशानियाँ खुशी में बदल जाती हैं।

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  8. नीरज मुबारक हो

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  9. भाई किंडल पर भी उपलब्ध कराओ। जैसे innerline pass हुई है

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  10. बहुत बहुत बधाई नीरज भाई

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  11. जहा तक मुझे याद पड़ता है नीरज भाई
    ये साईकल यात्रा को किताब का रूप देने का आईडिया सबसे पहले मैने ही दिया था
    ये बात और हे कि अब आप मानो नही मेरी बात
    फिर भी
    ये सबसे बेहतरीन किताब रहेगी

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