Monday, August 28, 2017

पंचचूली बेस कैंप यात्रा - दुकतू

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10 जून 2017
उत्तराखंड़ के इस इलाके को दारमा घाटी कहते हैं। इसका उत्तरी सिरा तिब्बत की सीमा से मिला है। पश्चिम में रालम धुरा पार करके रालम घाटी में जाया जा सकता है। 1962 से पहले इस इलाके का तिब्बत के साथ बहुत व्यापार होता था, लेकिन अब यह बंद है।
हम बाइक से सामान भी नहीं उतार पाये कि एक आदमी ने हमें घेर लिया - “भाई जी, पंचचूली बेस कैंप जाओगे?”
“हाँ जी।”
“तो कल मैं आपको ले जाऊँगा। अब तो जाना ठीक नहीं। दो-तीन घंटे में हो जायेगा।”
“पैसे कितने लोगे?”

Monday, August 21, 2017

पंचचूली बेस कैंप यात्रा - धारचूला से दुकतू

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10 जून 2017
धारचूला से तवाघाट की सड़क बहुत अच्छी बनी है। 19 किलोमीटर का यह रास्ता काली नदी के साथ-साथ ही है। बीच में एक और स्थान पर झूला पुल मिला। पुल के द्वार पर सशस्त्र सीमा बल का पहरा था।
कल तक मेरे पास जो जानकारी थी, उसके अनुसार सड़क केवल सोबला तक ही बनी है। उसके बाद पैदल चलना था। लेकिन कल जीप वालों ने बता दिया कि दुकतू तक जीपें जा सकती हैं, तो बड़ी राहत मिली। दुकतू तो पंचचूली के एकदम नीचे है। कुछ ही घंटों में दुकतू से बेसकैंप घूमकर लौटा जा सकता है। लेकिन यह भी बताया कि कुछ बड़े नाले भी हैं। हमारे मोबाइल में भले ही नेटवर्क न आ रहा हो, लेकिन चलते समय मैंने इस इलाके का गूगल मैप लोड़ कर लिया था। उसका ‘टैरेन मोड़’ अब मेरे सामने था। इससे अंदाज़ा लगाते देर नहीं लगी कि कहाँ-कहाँ हमें कितने-कितने बड़े नाले मिलेंगे। सबसे बड़ा नाला तो सोबला के पास ही मिलेगा। तो अगर हम इसे पार नहीं कर सके, तो सोबला में बाइक खड़ी कर देंगे और पैदल चल पड़ेंगे। फिर भी मैंने यह पता करने की कोशिश की कि जिन ख़तरनाक नालों की बात सभी लोग कर रहे हैं, वे हैं कहाँ। लेकिन पता नहीं चल सका।

Monday, August 14, 2017

पंचचूली बेस कैंप यात्रा - धारचूला

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9 जून 2017
थल समुद्र तल से लगभग 900 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। अच्छा-खासा कस्बा है। कुमाऊँ के ऐसे कस्बों में भी ठीक-ठाक चहल-पहल देखने को मिलती है। गढ़वाल और कुमाऊँ में मुझे यही अंतर देखने को मिला। कुमाऊँ ज्यादा जीवंत है।
थल से निकलते ही एक तिराहा है। सीधी सड़क मुनस्यारी चली जाती है और दाहिने मुड़कर डीडीहाट। हम दाहिने मुड़ गये। हमें धारचूला जाना था। अगर सबकुछ ठीक रहा तो वापसी में मुनस्यारी से आयेंगे।
डीडीहाट लगभग 1700 मीटर की ऊँचाई पर है, तो 25 किलोमीटर के इस रास्ते में चढ़ाई ही रहती है। सारा रास्ता पहाड़ के उत्तरी ढलान पर है, इसलिये घने जंगलों वाला है। वर्षावन। यहाँ चीड़ नहीं है। अगर कहीं है भी तो दूसरे अनगिनत प्रजाति के पेड़-पौधों के बीच में दुबका-सिकुड़ा-सा। जून होने के बावजूद भी यहाँ बेहतरीन हरियाली थी। अन्यथा हिमालय में मानसून के दौरान ही हरियाली आनी शुरू होती है। बाइक की स्पीड़ और कम कर ली, ताकि इस हरियाली का भरपूर आनंद लेते रहें। दो-तीन स्थानों पर नाले भी मिले, जिनका पानी सड़क पर आ गया था। कीचड़ भी मिली। रात बारिश हुई थी, तो पहाड़ से छोटे-छोटे पत्थर पानी के साथ सड़क पर आ गये थे। ये पत्थर अभी भी ऐसे ही पड़े थे। बारिश में हिमालय में ऐसा होता है।

Monday, August 7, 2017

पंचचूली बेस कैंप यात्रा: दिल्ली से थल

7 जून, 2017
ज़िंदगी एक बार फ़िर मेहरबान हो गयी और हमें मौका दे दिया हिमालय की ऊँचाईयों पर जाने का। कुमाऊँ हिमालय की ऊँचाईयों पर मैं कभी नहीं गया था, सिवाय कई साल पहले पिंड़ारी और कफ़नी ग्लेशियर की यात्राओं के। इस बार मिलम ग्लेशियर का इरादा बना तो दो सप्ताह की छुट्टियाँ मंज़ूर नहीं हुईं। मंज़ूरी मिली एक सप्ताह की और इतने में मिलम का भ्रमण नहीं हो सकता था। तो इस तरह पंचचूली बेस कैंप जाने पर मोहर लगी।
चार जून को बिलासपुर, छत्तीसगढ़ से सुनील पांडेय जी बाइक पर लद्दाख के लिये निकले। उस दिन वे जबलपुर रुके। पाँच को मध्य प्रदेश की गर्मी ने उनकी हालत ख़राब कर दी और वे वापस लौटते-लौटते बचे। ओरछा रुके। छह तारीख़ की आधी रात को वे दिल्ली आये। उधर हमारी योजना रात के दो-तीन बजे निकल जाने की थी, ताकि हम भी दिन की गर्मी से निज़ात पा सकें। लेकिन सुनील जी के मद्देनज़र हम भी रुक गये। ऊपर से इंद्रदेव मेहरबान हो गये और अगले दिन भीषण गर्मी की संभावना समाप्त हो गयी।