Monday, February 13, 2017

बाइक यात्रा: रामदेवरा - बीकानेर - राजगढ़ - दिल्ली

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें
21 दिसंबर 2016
हमारी आज की योजना थी कि पहले फलोदी के पास खींचण गाँव जायेंगे और वहाँ प्रवासी पक्षियों को देखेंगे। खींचण के निवासी इन पक्षियों को मेहमान की तरह मानते हैं और उसी तरह इनकी देखभाल करते हैं। उसके बाद रात होने तक बीकानेर पहुँचेंगे और कुलवंत जी के यहाँ रुकेंगे। कल देशनोक में करणी माता का मंदिर देखेंगे, जिसे चूहों का मंदिर भी कहा जाता है। परसों यानी 23 तारीख़ को दिल्ली पहुँचकर ड्यूटी जॉइन कर लूँगा।
लेकिन इस कार्यक्रम में परिवर्तन करना पड़ा। कारण था कि 24 और 25 दिसंबर को झाँसी के पास ओरछा में एक घुमक्कड़ सम्मेलन होना था। इनमें बहुत सारे मेरे मित्र थे और इनमें भी कई तो सपरिवार आने वाले थे। मेरा दिल्ली से झाँसी जाने का आरक्षण नहीं था, लेकिन झाँसी से दिल्ली वापस आने का आरक्षण था और झाँसी में रेलवे विश्राम गृह में एक कमरा भी बुक था। हालाँकि आयोजकों ने ओरछा में भी कमरों की व्यवस्था कर रखी थी, लेकिन ये हमारे बजट से बाहर थे। तो इस तरह मैं 23 की दोपहर तक दिल्ली पहुँचता, लगातार 16 घंटों की ड्यूटी करता और ओरछा के लिये निकल जाता। एक लंबी बाइक यात्रा के तुरंत बाद इतनी लंबी ड्यूटी करना, वो भी रात में, बेहद मुश्किल कार्य है। यही सब सोचकर तय किया कि एक दिन पहले ही दिल्ली पहुँचना ठीक रहेगा। खींचण जाना रद्द कर दिया।



रामदेव जी के दर्शन किये। निःसंदेह रामदेवरा राजस्थान का सबसे बड़ा तीर्थ है। थार के बीचोंबीच स्थित इस तीर्थ के दर्शनों के लिये राजस्थान ही नहीं, बल्कि हरियाणा, मध्य प्रदेश और गुजरात तक से लाखों श्रद्धालु आते हैं। इस समय बिलकुल भी भीड़ नहीं थी, आराम से दर्शन हो गये।
रामदेवरा से फलोदी की सड़क अच्छी बनी है। घंटे भर में ही पहुँच गये। सीधे स्टेशन के सामने पहुँचे और चाय के साथ मिर्ची-बड़ों का नाश्ता किया। अब हमें मिर्ची-बड़े अच्छे लगने लगे थे और हम कहीं भी इनका मौका नहीं चूकने वाले थे।
सीधे बीकानेर की ओर दौड़ लगा दी। बीच में एक तिराहा मिला, जहाँ से एक सड़क बरसलपुर, रणजीतपुरा, गौडू जा रही थी। ये स्थान निश्चित ही पाकिस्तान सीमा के पास होंगे।
बीकानेर रोड़ को चार-लेन बनाने का काम चल रहा है। इसलिये ख़राब सड़क और बार-बार आते डायवर्जन के कारण स्पीड़ नहीं मिल सकी। सवा एक बजे बीकानेर पहुँचे। कुलवंत सिंह इंतज़ार करते मिले। घर चलने का आमंत्रण दिया, तो हम मना नहीं कर सके। लालगढ़ स्टेशन के पास उनका घर है। हालाँकि यह समय भोजन का था, लेकिन हमने कुलवंत को यह कहकर मना कर दिया कि हमें अभी बहुत बाइक चलानी है और पेट भरने के बाद नींद आ जायेगी। कुलवंत मान गये।
देशनोक में करणी माता के दर्शन करके सुमित को हमसे अलग हो जाना था। हम दिल्ली की ओर चले जाते और वो अजमेर की तरफ़। एक सप्ताह से उसका क्लिनिक बंद था और वह अब ओरछा नहीं जाना चाहता था। जब कुलवंत ने हमें अपने कंप्यूटर पर कुछ काम करने का प्रस्ताव दिया तो सबसे पहले यही दिमाग में आया कि फोटो की अदला-बदली कर लेते हैं। सुमित के कुछ फोटो हमने खींचे थे और हमारे कुछ फोटो सुमित ने। लेकिन मैंने यह कहकर मना कर दिया कि तीन दिन बाद ओरछा में ही हम यह काम करेंगे। साथ ही हमने सुमित को यह कहकर ओरछा जाने के लिये मना लिया कि हमारी थार यात्रा एक दिन पहले समाप्त हो रही है, इस एक दिन को ओरछा में लगाओ।
कुलवंत असल में पंजाबी हैं। ये लोग पगड़ी भी बाँधते हैं। आपस में पंजाबी में ही बात करते हैं। किसी जमाने में काम के सिलसिले में बीकानेर में आकर बस गये। उधर दीप्ति भी लगभग ऐसी ही है। इनका भी परिवार पता नहीं विभाजन के समय या कब पंजाब से आकर अमरोहा में बसा। ये लोग भी आपस में पंजाबी में ही बात करते हैं और परिवार के कुछ सदस्य पगड़ी भी बाँधते हैं। कुलवंत की बहन और पत्नी से बात करने में दीप्ति का मन इतना रमा कि बाद में मुझसे बोली - “आज से बीकानेर में भी तेरी ससुराल हो गयी।”
बीकानेर से निकलने में तीन बज गये। हिसाब लगाया - जल्दी करेंगे तो चार बजे तक देशनोक से निपट लेंगे, फिर घंटे भर बाद अंधेरा होने लगेगा। आज हम दिल्ली से 200-250 किलोमीटर दूर रुकना चाहते थे, ताकि कल दोपहर तक दिल्ली पहुँच सकें। यानी आज हमें कम से कम सीकर या झुंझनूं या राजगढ़ तक तो पहुँचना ही पड़ेगा। ये सभी स्थान यहाँ से लगभग 250 किलोमीटर दूर हैं। अंधेरे में हमें कम से कम 150 किलोमीटर बाइक चलानी पड़ेगी। सडक की हालत का पता नहीं। शेखावाटी की ख़राब सड़कों की मैंने बड़ी चर्चा सुन रखी थी।
बीकानेर बाईपास के पास बाइक रोकी। सुमित को अलविदा कह दिया - सुमित, तू सीधा चला जा। करणी माता के दर्शन अवश्य करना और हमारी तरफ़ से ‘सॉरी’ कहना। एक-दो फोटो खींचे और हम अलग हो गये।
करणी माता के दर्शन होते-होते रह गये।
बीकानेर से रतनगढ़ होते हुए सीकर तक की सड़क बेहद शानदार बनी है। सीकर के रास्ते दिल्ली जाना काफ़ी लंबा पड़ता है। सबसे छोटा रास्ता राजगढ़ वाला है। हम श्रीडूंगरगढ़ से ही राजगढ़ की ओर मुड़ गये। सरदारशहर तक उजाला था। इसके बाद अंधेरा हो गया। अंधेरे में इस दो-लेन की सड़क पर चलना बहुत मुश्किल रहा। सड़क भी उतनी अच्छी नहीं है। 60 किलोमीटर दूर तारानगर में अगर हमें होटल मिल जाता, तो हम रुक जाते। फिर सोचा कि 30 किलोमीटर आगे राजगढ़ में तो होटल मिलेगा ही। नहीं भी मिलेगा, तब भी हम स्टेशन पर सो जायेंगे।
तभी याद आया कि अपना एक सहकर्मी रमेश भी राजगढ़ का ही रहने वाला है। संयोग से आज वह यहीं अपने घर पर था। स्टेशन से चार किलोमीटर दूर उसका गाँव है। रात नौ बजे उसके घर पहुँचे तो चूरमे की थाली और दूध के डोल हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे।
अगले दिन यानी 22 दिसंबर को सुबह पौने नौ बजे दिल्ली के लिये चल दिये। 30 किलोमीटर दूर बहल है। इन 30 किलोमीटर में 10 किलोमीटर ही अच्छी सड़क है, अन्यथा बहुत खराब रास्ता है। बहल हरियाणा में आता है। उम्मीद थी कि बहल के बाद अच्छी सड़क मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इससे भी 45 किलोमीटर आगे लोहानी तक खराब ही सड़क मिली। लोहानी से भिवानी 10-12 किलोमीटर है और बेहद शानदार सड़क है। भिवानी से दिल्ली तक तो शानदार है ही।
कुल मिलाकर ढाई बजे दिल्ली पहुँचा। इस पूरी यात्रा में 2810 किलोमीटर बाइक चली।
...
ओरछा फिर भी नहीं जाना हुआ। पता चला कि 25 दिसंबर को कई सहकर्मियों ने छुट्टी ले रखी है। मैं अभी-अभी एक सप्ताह की छुट्टी काटकर आया था और अगले महीने जनवरी में 10 दिनों की छुट्टी लेनी है अंडमान जाने के लिये। ज़िद करता, गुस्सा करता, शोर-शराबा करता; तो 25 तारीख़ की छुट्टी मिल भी जाती, लेकिन ऐसे में बॉस की नाराज़गी भी भुगतनी पड़ती और अंडमान यात्रा पर ग्रहण भी लग सकता था।
जिन ख़ास मित्रों के लिये मैं ओरछा जाना चाहता था, वे आज जब कहते हैं कि तू ओरछा आ सकता था - जानबूझकर नहीं आया - तो दुख होता है।
खैर, यह थी हमारी थार बाइक यात्रा। शुरू में योजना थी कि 2500 किलोमीटर से ज्यादा नहीं चलेंगे, लेकिन समाप्त होते-होते 2800 किलोमीटर की यात्रा हो गयी। इससे रोज भागमभाग जैसी स्थिति बनी रही। लेकिन थार के उन कोनों में हम गये, जहाँ अमूमन कोई नहीं जाता।

रामदेवरा

रामदेवरा में दस-दस रुपये लेकर जूतों की रखवाली करता बच्चा...

रामदेवरा राजस्थान समेत पश्चिमी भारत का सबसे बड़ा तीर्थ है।



फलोदी के मिर्ची-बड़े विद चाय

फलोदी-बीकानेर सड़क


श्रीडूंगरगढ़ से दूरियाँ



और यह है म्हारी दिल्ली...




आपको कौन-सा फोटो सबसे अच्छा लगा? अवश्य बताएँ।

यह पोस्ट लिखने, एडिट करने और अपलोड़ करने में लगा कुल समय - 2 घंटे 30 मिनट





थार बाइक यात्रा के सभी लेख:
1. थार बाइक यात्रा - भागमभाग
2. थार बाइक यात्रा - एकलिंगजी, हल्दीघाटी और जोधपुर
3. थार बाइक यात्रा: जोधपुर से बाड़मेर और नाकोड़ा जी
4. किराडू मंदिर - थार की शान
5. थार के सुदूर इलाकों में : किराडू - मुनाबाव - म्याजलार
6. खुड़ी - जैसलमेर का उभरता पर्यटक स्थल
7. राष्ट्रीय मरु उद्यान - डेजर्ट नेशनल पार्क
8. धनाना: सम से आगे की दुनिया
9. धनाना में ऊँट-सवारी
10. कुलधरा: एक वीरान भुतहा गाँव
11. लोद्रवा - थार में एक जैन तीर्थ
12. जैसलमेर से तनोट - एक नये रास्ते से
13. वुड़ फॉसिल पार्क, आकल, जैसलमेर
14. बाइक यात्रा: रामदेवरा - बीकानेर - राजगढ़ - दिल्ली


11 comments:

  1. Mandir se jute chori hona kuchh ascharyajanak ha na?


    Mehandipur Balaji Mandir se mere jute chori hona gaye the January 2014 me.

    ReplyDelete
    Replies
    1. भीड़ में ऐसा हो जाता है...

      Delete
  2. इस भागमभाग वाली यात्रा की तरह आपकी पोस्ट भी भागमभाग होती जा रही है । रामदेवरा के बारे में थोड़ा विस्तार से बताते तो अच्छा रहता । शुक्रिया सुमित जी को ओरछा आने को तैयार करने के लिए । अभी आपका ओरछा आना उधार ही है ।

    ReplyDelete
    Replies
    1. भागमभाग की ज़रूरी है...

      Delete
  3. इस भागमभाग वाली यात्रा की तरह आपकी पोस्ट भी भागमभाग होती जा रही है । रामदेवरा के बारे में थोड़ा विस्तार से बताते तो अच्छा रहता । शुक्रिया सुमित जी को ओरछा आने को तैयार करने के लिए । अभी आपका ओरछा आना उधार ही है ।

    ReplyDelete
  4. रामदेवरा से ही हमारा वापसी का सफ़र शुरू हो गया था।
    यहाँ रात को पनीर हंगामा वाला सहभोज यादगार रहा।
    बीकानेर के बाद तुम्हारे दिल और दिमाग़ मे भी हंगामा चल रहा था,और बीकानेर से निकलते ही तुमने अलविदा कह ही दिया,इसके लिए मे बिल्कुल भी तैयार नहीं था...
    पुरे सप्ताह साथ थे,अब में अकेला था,करणी माता मंदिर मे अकेले सेल्फ़ी लेना,अकेले घुमना अजीब लग रहा था...
    रात 9 बजे पुष्कर पहुँच गया था,इंदौर अभी भी करीब 500 किलोमीटर दूर था,जिसमें पूरा दिन लगना था,इसीलिए अगले दिन तसल्ली से पुष्कर के घाट,ब्रह्म मंदिर और सावित्री मंदिर घुमा,और फिर इंदौर वापसी के लिए निकल पड़ा...
    22 दिसंबर की रात इंदौर पहुँच कर,23 की रात फिर से ओरछा का सफ़र शुरू हो गया...
    तुम्हारा ओरछा ना आना कई मित्रो के साथ मेरे लिये भी निराशाजनक था।

    ReplyDelete
    Replies
    1. जिस तरह मेरे ओरछा न आने पर कई मित्रों ने मुँह फुला लिया है, उससे यही प्रतीत हो रहा है कि सही हुआ... कि ओरछा नहीं गया...

      Delete
  5. बहुत ही रोचक, 10 नंबर वाली फ़ोटो बहुत ही शानदार है

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद मिश्रा जी...

      Delete
  6. 3, 5, 6 नं. फ़ोटो अच्छे आये हैं। आप से बहुत बातें करनी थी बहुत कुछ जानना था पर आप थोडा जल्दी और थके हुए भी थे तो मैने ज्यादा सवाल जवाब नहीं किये। किसी दिन ट्रैक पर चलेंगे तो वो कमी भी पूरी हो जायेगी। लेख हमेशा की तरह उम्दा, फोटो ग्राफी में अभी बहुत गुंजाइश है।

    ReplyDelete
  7. आप जो राजसमन्द से होकर गुजरे
    वही का में रहने वाला हूँ
    वैसे करीब महीने भर पहले से ही ब्लॉग पढ़ने का चस्का लगा है...दिमागी गुमक्कड़ हु...शायद भविष्य में आअपकी तरह घूमूंगा
    आअपकी तरह थार घूम चुका हूं 2015 में
    पर आपके जैसे घूमना सम्भव नही हुआ

    ReplyDelete