Monday, October 16, 2017

कार्तिक स्वामी मंदिर

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13 जुलाई 2017
रुद्रप्रयाग में दही समोसे खा रहे थे तो प्लान बदल गया। अब हम पोखरी वाले रास्ते से जाएंगे। उधर दो स्थान दर्शनीय हैं। और दोनों के ही नाम मैं भूल गया था। बाइक उधर ही मोड़ दी। अलकनन्दा पार करके दाहिने मुड़ गए। चढ़ाई शुरू हो गयी। मोबाइल ख़राब था और नक्शा सामानों में कहीं गहरे दबा हुआ था। जगह का नाम याद नहीं आया। कहीं लिखा भी नहीं मिला और किसी से पूछ भी नहीं सकते। बाद में ध्यान आया कि एक जगह तो कोटेश्वर महादेव थी। रुद्रप्रयाग के नज़दीक ही अलकनन्दा के किनारे। कितनी नज़दीक? पता नहीं। कितनी दूर? पता नहीं।
हम चलते रहे। ऊँचाई बढ़ती रही और अलकनंदा गहरी होती चली गयी। दूरियाँ लिखी आ रही थीं - चोपता, पोखरी, गोपेश्वर इतने-इतने किलोमीटर। लेकिन उस मंदिर का जिक्र नही आया। सोच लिया कि पोखरी पहुँचकर पूछूँगा किसी से। शायद पोखरी के बाद है वो मंदिर।

Monday, October 9, 2017

चलो फूलों की घाटी!

12 जुलाई 2017
थक गए। और थकान होगी ही। नींद भी आएगी। सुबह तीन बजे के उठे हुए और साढ़े चार के चले हुए। अब शाम छह बजे श्रीनगर पहुँचे। कमरा लिया। दीप्ति तो गीले कपड़े धोने और सुखाने में व्यस्त हो गयी, मैं खर्राटे लेने में। मुझे कोई होश नहीं कि दीप्ति ने कितना काम किया। सात बजे कपड़ों से फुरसत पाकर उसने मुझे जगाया, “चलो, कुछ खा आएँ।” मैंने नींद में बुदबुदा दिया, “मुझे कुछ नहीं खाना। तू खा आ।” वह अकेली कपड़े तो धो सकती है, लेकिन खाना नहीं खा सकती। एक घंटे और सोने दिया। फिर तो उठा ही दिया। इडली उपलब्ध हो तो यह उसका प्रिय भोजन है। उंगलियाँ सानकर ही खाती है। मुझे भी इडली अच्छी लगती है, लेकिन अगर पनीर का भी विकल्प हो, तो मैं पनीर लेना पसंद करूँगा।
रास्ते मे बहुत सारे लंगर लगे मिले थे। सरदारों वाले लंगर। हेमकुंड साहिब के तीर्थयात्रियों के लिए। स्प्लेंडर पर दो-दो तीन-तीन सरदार। पगड़ी वालों को तो हेलमेट की ज़रूरत नहीं, लेकिन बिना पगड़ी वाले भी बिना हेलमेट लगाये। सब मोटरसाइकिलों पर एक डंडा बंधा हुआ और डंडे पर नीला झंडा। वाहेगुरु दा खालसा। हम सभी लंगरों को नज़रअंदाज़ करते आ रहे थे, लेकिन एक जगह रुकना पड़ गया - कीर्तिनगर के पास। एक बूढ़े सरदारजी पीला झंडा पकड़े हुए बाइक के सामने ही अड़ गये। यहीं महाराष्ट्र की एक स्कार्पियो भी खड़ी थी। हमने इस गाड़ी को कई बार पीछे छोडा था और उन्होंने भी कई बार हमें पीछे छोड़ा था। वे खड़े दिखे तो हम भी रुक गए। हालाँकि बातचीत कुछ नहीं हुई। वे अब तक लंगर जीम चुके थे। हमारे रुकते ही चले गए।

Friday, October 6, 2017

पंचचूली बेसकैंप यात्रा की वीडियो

यात्रा के दौरान हम छोटी-छोटी वीडियो भी बनाते चलते हैं... और लौटकर कैमरे से लैपटॉप में कॉपी-पेस्ट कर देते हैं... और भूल जाते हैं... कभी-कभार इनकी याद आती है तो दो-दो, चार-चार वीडियो को जोड़कर या बिना जोड़े ही समय-समय पर आपको फेसबुक पेज और यूट्यूब के माध्यम से दिखा भी देते हैं... इन वीडियो की गुणवत्ता तो ख़राब ही रहती है, लेकिन आप चूँकि लाइक करते हैं, वाहवाही करते हैं; तो मुझे लगता है कि उतनी ख़राब भी नहीं होतीं... तो पंचचूली यात्रा की ऐसी ही सभी वीडियो को आपके सामने पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ... आपने शायद यूट्यूब वाली वीडियो न देखी हों, क्योंकि मैंने इनका प्रचार नहीं किया... फेसबुक पेज वाली तो निश्चित ही देख रखी होंगी...
इन्हें देखने के बाद या न देखने के बाद आप फेसबुक पेज को लाइक करना न भूलें... और यूट्यूब चैनल को भी सब्सक्राइब अवश्य करें... बड़ी मुश्किल से अपने ही यूट्यूब चैनल का लिंक मिला है... यूट्यूब वीडियो में आपको विज्ञापन भी दिखेंगे, तो यह मत समझ लेना कि धनवर्षा हो रही होगी... अभी 136 सब्सक्राइबर्स हैं... एक-दो दिन में फेसबुक के माध्यम से बताऊँगा कि इस पोस्ट की वजह से कितने सब्सक्राइबर्स बढ़े...

Wednesday, October 4, 2017

288 रेलवे स्टेशन हैं मुंबई और हावड़ा के बीच में

पिछले दिनों मैंने महाराष्ट्र में कुछ रेलमार्गों पर पैसेंजर ट्रेनों में यात्रा की थी। उनमें से अकोला से नागपुर का रेलमार्ग भी शामिल था। इस पर यात्रा करने के साथ ही मेरे पैसेंजर नक्शे में मुंबई और हावड़ा भी जुड़ गये। यानी मैं मुंबई-हावड़ा संपूर्ण रेलमार्ग पर पैसेंजर ट्रेनों में यात्रा कर चुका हूँ। ये यात्राएँ कई चरणों और कई वर्षों में हुईं। 
1. छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस मुंबई से भुसावल (20 फरवरी, 2012)
2. भुसावल से अकोला (18 फरवरी 2012)
3. अकोला से बडनेरा (26 अगस्त 2017)
4. बडनेरा से नागपुर (23 अगस्त 2017)
5. नागपुर से गोंदिया (5 अक्टूबर 2008)
6. गोंदिया से बिलासपुर (11 सितंबर 2014)
7. बिलासपुर से झारसुगुड़ा (25 अगस्त 2011)
8. झारसुगुड़ा से टाटानगर (10 सितंबर 2014)
9. टाटानगर से खड़गपुर (9 सितंबर 2014)
10. खड़गपुर से हावड़ा (22 अगस्त 2011)

Monday, October 2, 2017

जागेश्वर और वृद्ध जागेश्वर की यात्रा

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15 जून 2017
दन्या से जागेश्वर जाने में भला कितनी देर लगती है? आप ‘ट्यण-म्यण बाट, हिटो माठूँ-माठ’ पढ़ते-पढ़ते जागेश्वर पहुँच जाते हैं। कुमाऊँनी में लिखी इन बातों का अर्थ हमें नहीं पता। शायद ‘ट्यण-म्यण बाट’ का अर्थ होता होगा - टेढ़े-मेढ़े रास्ते। बाकी पता नहीं। सोच रहा हूँ कि अगर इसे मेरठी में लिखा जाये तो “ऐंड़े बेंड़े रस्ते” लिखा जायेगा। जिस दिन ‘हिटो माठूँ-माठ’ का अर्थ पता चल जायेगा, उस दिन उसे भी मेरठी में अनुवादित कर दूँगा।
मुख्य मार्ग से जब जागेश्वर के लिये मुड़े तो देवदार का जंगल आरंभ हो गया। एक होता है चीड़ का जंगल और दूसरा होता है देवदार का जंगल। चीड़ का जंगल भी निःसंदेह खूबसूरत होता है, लेकिन देवदार की बात ही कुछ और है।

Thursday, September 28, 2017

पुस्तक-चर्चा: पिघलेगी बर्फ

पुस्तक मेले में घूम रहे थे तो भारतीय ज्ञानपीठ के यहाँ एक कोने में पचास परसेंट वाली किताबों का ढेर लगा था। उनमें ‘पिघलेगी बर्फ’ को इसलिये उठा लिया क्योंकि एक तो यह 75 रुपये की मिल गयी और दूसरे इसका नाम कश्मीर से संबंधित लग रहा था। लेकिन चूँकि यह उपन्यास था, इसलिये सबसे पहले इसे नहीं पढ़ा। पहले यात्रा-वृत्तांत पढ़ता, फिर कभी इसे देखता - ऐसी योजना थी।
उन्हीं दिनों दीप्ति ने इसे पढ़ लिया - “नीरज, तुझे भी यह किताब सबसे पहले पढ़नी चाहिये, क्योंकि यह दिखावे का ही उपन्यास है। यात्रा-वृत्तांत ही अधिक है।” 
तो जब इसे पढ़ा तो बड़ी देर तक जड़वत हो गया। ये क्या पढ़ लिया मैंने! कबाड़ में हीरा मिल गया! बिना किसी भूमिका और बिना किसी चैप्टर के ही किताब आरंभ हो जाती है। या तो पहला पेज और पहला ही पैराग्राफ - या फिर आख़िरी पेज और आख़िरी पैराग्राफ।

Monday, September 25, 2017

पाताल भुवनेश्वर की यात्रा

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13 जून 2017
हम मुन्स्यारी में थे और सोते ही रहे, सोते ही रहे। बारह बजे उठे। आधी रात के समय यहाँ बड़ी चहल-पहल मची थी। गाड़ी भरकर पर्यटक आये थे। उनकी गाड़ी कहीं ख़राब हो गयी थी तो लेट हो गये। और उन्होंने जो ऊधम मचाया, उसका नतीज़ा यह हुआ कि हम दोपहर बारह बजे तक सोते रहे। उठे तो आसमान में बादल थे और बर्फ़ीली चोटियों का ‘ब’ भी नहीं दिख रहा था। आज हमें मुन्स्यारी के आसपास ही घूम-घामकर वापसी के लिये चल देना था और थल के आसपास कहीं रुकना था। अब साफ़ मौसम नहीं था तो मुन्स्यारी घूमने का इरादा त्याग दिया और वापस चल दिये।
बड़े दिनों से इच्छा थी मुन्स्यारी देखने की। वो इच्छा तो पूरी हो गयी, लेकिन घूम नहीं पाये। इच्छा कहीं न कहीं अधूरी भी रह गयी। इसे पूरा करने फिर कभी आयेंगे।

Thursday, September 21, 2017

पुस्तक-चर्चा: चुटकी भर नमक, मीलों लंबी बागड़

पुस्तक मेले में घूमते हुए एक पुस्तक दिखायी पड़ी - चुटकी भर नमक, मीलों लंबी बागड़। कवर पेज पर भारत का पुराना-सा नक्शा भी छपा था, तो जिज्ञासावश उठाकर देखने लगा। और खरीद भी ली।
ब्रिटिश राज में नमक पर कर लगा करता था। बंगाल रेजीडेंसी में यह सर्वाधिक था - साल में आम जनता की लगभग दो महीने की आमदनी के बराबर। तो बंबई रेजीडेंसी व राजपूताना की तरफ से इसकी तस्करी होने लगी। इस तस्करी को रोकने के लिये अंग्रेजों ने 1500 मील अर्थात 2400 किलोमीटर लंबी एक बाड़ बनवायी। यह बाड़ इतनी जबरदस्त थी कि कोई इंसान, जानवर इसे पार नहीं कर सकता था। यह बाड़ मिट्टी और कँटीली झाड़ियों की बनायी गयी। बीच-बीच में द्वार बने थे। केवल द्वारों से होकर ही इसे पार करना होता था - वो भी सघन तलाशी के बाद।

Monday, September 18, 2017

बाइक यात्रा: नारायण आश्रम से मुन्स्यारी

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12 जून 2017
ग्यारह बजे नारायण आश्रम से चल दिये। आज मुन्स्यारी पहुँचना था, जो यहाँ से करीब 150 किलोमीटर दूर है। कल रात के समय हम यहाँ आये थे। अब दिन के उजाले में पता चल रहा था कि यह रास्ता कितना खूबसूरत है। ख़राब तो है, लेकिन खूबसूरत भी उतना ही है। शुरू में जंगल है, फिर थानीधार के बाद विकट खड़े पहाड़ हैं। थानीधार पांगु के पास है। धारचूला से पांगू तक नियमित जीपें चलती हैं। थानीधार से पूरब में थोड़ा ऊपर नारायण आश्रम का बड़ा ही शानदार दृश्य दिखता है।
यहाँ एक सूचना-पट्ट लगा था - तवाघाट से थानीधार मोटर-मार्ग का निर्माण। और यह मार्ग 14 किलोमीटर लंबा होने वाला था। हमें नहीं पता था कि यह पूरा बन गया या नहीं। तो हम इसी पर चल दिये। अगर पूरा बन गया होगा, तो 10-12 किलोमीटर कम चलना पड़ेगा और अगर पूरा नहीं बना होगा तो वापस यहीं लौट आयेंगे। जरा ही आगे एक गाँव में पता चल गया कि यह मार्ग अभी पूरा नहीं बना है, तो वापस उसी रास्ते लौट आये।

Monday, September 11, 2017

नारायण स्वामी आश्रम

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11 जून 2017
अभी ढाई ही बजे थे और हमें बताया गया कि दुकतू से जल्द से जल्द निकल जाओ, अन्यथा यह अनिश्चित समय तक सड़क मार्ग से कट जायेगा। सी.पी.डब्लू.डी. सड़क की खुदाई कर रहा था, इसलिये सड़क बंद होने वाली थी। हमें याद आया कि वहाँ सड़क थी ही नहीं, जीप वालों ने इधर-उधर से निकालकर आना-जाना शुरू कर दिया था। अब वे लोग जब पहाड़ खोदेंगे तो जीप वालों की वह लीक भी बंद हो जायेगी और कोई भी दुकतू न तो आ सकेगा और न ही जा सकेगा। हम दुकतू में एक दिन और रुकना चाहते थे, लेकिन अनिश्चित समय के लिये फँसना नहीं चाहते थे।
सामान बाँधा और निकल पड़े। लेकिन हम यह देखकर हैरान रह गये कि उन्होंने खुदाई शुरू कर दी थी। गुस्सा भी आया कि बताने के बावज़ूद भी दस मिनट हमारी प्रतीक्षा नहीं की इन्होंने। लीक बंद हो चुकी थी। लेकिन एक संभावना नज़र आ रही थी। यहाँ पहाड़ ज्यादा विकट नहीं था और सड़क के बराबर में खेत थे। हम खेतों-खेत जा सकते थे।

Wednesday, September 6, 2017

पुस्तक चर्चा: पाकिस्तान में वक्त से मुलाकात


श्याम विमल द्वारा लिखित यह पुस्तक उनका एक यात्रा-संस्मरण है। लेखक का जन्म 1931 में मुलतान के शुजाबाद कस्बे में हुआ था। जब ये 16 बरस के थे, तब देश का बँटवारा हो गया और इन्हें सपरिवार अपनी जन्मभूमि छोड़कर भारत आना पड़ा। 75 साल की उम्र में ये अपनी जन्मभूमि देखने पाकिस्तान गये - 2005 में और अगले ही साल पुनः 2006 में। वहाँ जो इन्होंने देखा, महसूस किया; सब पुस्तक में लिख दिया। अपने बचपन को जीते रहे। एक-एक स्थान की, एक-एक गली की, एक-एक पडोसी की, एक-एक नाम की इन्हें याद थी और खुलकर सबके बारे में लिखा।
और कमाल की बात यह थी कि इनके पुश्तैनी घर में अब मुहाज़िर लोग रह रहे थे। यानी भारत छोड़कर गये हुए मुसलमान। अधिकांश भिवानी व हाँसी के आसपास के मुसलमान।
पूछने पर बताया गया कि जब वे मुहाजिर होकर इस घर में रहने आये थे तो यह घर लुटा-पिटा उन्हें मिला था। चौखटों के कपाट भी उखाड़ लिये गये थे। शायद वे स्थानीय या आसपास के गाँवों के मुसलमान रहे होंगे, जो बलवे के दिनों में लूटपाट करने आये होंगे।
मुझे स्मरण है कि हम तो इस घर को भरा-पूरा छोड़ आये थे। इसी घर में बड़े भाई की शादी में मिले दहेज का सामान भी रखा गया था। हम सभी मुलतान शहर में फँसे रह गये थे और अंततः वहीं से रिफ्यूजियों की स्पेशल ट्रेन से हिंदुस्तान चले आये थे।
आगे लिखते हैं:
किस क्रूर हृदय ने महान देश को तोड़ने का उपक्रम रचा? किसने भाई-भाई समान सदियों से एकत्र रह रहे हिंदू-मुसलमानों में फूट के बीज बोये? किसने देश बँटवारे की नींव में मट्ठा डाला? किसने संप्रदाय शब्द को गंदी राजनीति के कीचड़ में लथपथ कर बदरंग किया? - ये सवाल बार-बार उठाने वाली घटनाएँ आम आदमी को हिला देती हैं।
देश विभाजन के मुद्दे पर यह पुस्तक पठनीय है।

पाकिस्तान में वक्त से मुलाकात
इसके प्रकाशक हैं - आर्य प्रकाशन मंडल, गाँधीनगर, दिल्ली।
आई.एस.बी.एन. : 978-81-89982-96-6
प्रथम संस्करण: 2013
कुल पृष्ठ: 168
मूल्य: 300 रुपये (हार्ड कवर)

Monday, September 4, 2017

पंचचूली बेस कैंप ट्रैक

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11 जून 2017
आप कभी कुमाऊँ गये होंगे मतलब नैनीताल, रानीखेत, मुक्तेश्वर, कौसानी, चौकोड़ी, मुन्स्यारी... तो आपने हिमालय की बर्फीली चोटियों के भी दर्शन किये होंगे। आपको इन चोटियों के नाम तो नहीं पता होंगे, तो इनके नाम जानने की उत्सुकता भी ज़रूर रही होगी। आप किसी स्थानीय से इनके नाम पूछते होंगे तो मुझे यकीन है कि वो नंदादेवी से भी पहले आपको पंचचूली चोटियों के बारे में बताता होगा - “वे पाँच चोटियाँ, जो एकदम पास-पास हैं, पंचचूली हैं।” आप इनके फोटो खींचते होंगे और सोने से पहले भूल भी जाते होंगे।
लेकिन अब नहीं भूलेंगे। क्योंकि आप पढ़ रहे हैं इन्हीं पंचचूली के बेस कैंप जाने का यात्रा-वृत्तांत सचित्र। जहाँ से भी आपने पंचचूली देखी हैं, कल्पना कीजिये आप वहीं खड़े हैं और इन चोटियों को निहार रहे हैं। उधर त्रिशूल है, फिर नंदादेवी है और इनके दाहिने पंचचूली की पाँच चोटियाँ हैं। कर ली कल्पना? तो अब आपको बता दूँ कि हम पंचचूली के भी उस पार खड़े हैं। आपको बताया जाता होगा कि हिमालय के पार तिब्बत है, लेकिन ऐसा नहीं है। हिमालय के पार भी बड़ी दूर तक भारतीय इलाका है। हम भी उसी इलाके में खड़े हैं। आपके और हमारे बीच में पंचचूली की 6300 मीटर से 6800 मीटर ऊँची ये पाँच चोटियाँ हैं।

Monday, August 28, 2017

पंचचूली बेस कैंप यात्रा - दुकतू

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10 जून 2017
उत्तराखंड़ के इस इलाके को दारमा घाटी कहते हैं। इसका उत्तरी सिरा तिब्बत की सीमा से मिला है। पश्चिम में रालम धुरा पार करके रालम घाटी में जाया जा सकता है। 1962 से पहले इस इलाके का तिब्बत के साथ बहुत व्यापार होता था, लेकिन अब यह बंद है।
हम बाइक से सामान भी नहीं उतार पाये कि एक आदमी ने हमें घेर लिया - “भाई जी, पंचचूली बेस कैंप जाओगे?”
“हाँ जी।”
“तो कल मैं आपको ले जाऊँगा। अब तो जाना ठीक नहीं। दो-तीन घंटे में हो जायेगा।”
“पैसे कितने लोगे?”

Monday, August 21, 2017

पंचचूली बेस कैंप यात्रा - धारचूला से दुकतू

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10 जून 2017
धारचूला से तवाघाट की सड़क बहुत अच्छी बनी है। 19 किलोमीटर का यह रास्ता काली नदी के साथ-साथ ही है। बीच में एक और स्थान पर झूला पुल मिला। पुल के द्वार पर सशस्त्र सीमा बल का पहरा था।
कल तक मेरे पास जो जानकारी थी, उसके अनुसार सड़क केवल सोबला तक ही बनी है। उसके बाद पैदल चलना था। लेकिन कल जीप वालों ने बता दिया कि दुकतू तक जीपें जा सकती हैं, तो बड़ी राहत मिली। दुकतू तो पंचचूली के एकदम नीचे है। कुछ ही घंटों में दुकतू से बेसकैंप घूमकर लौटा जा सकता है। लेकिन यह भी बताया कि कुछ बड़े नाले भी हैं। हमारे मोबाइल में भले ही नेटवर्क न आ रहा हो, लेकिन चलते समय मैंने इस इलाके का गूगल मैप लोड़ कर लिया था। उसका ‘टैरेन मोड़’ अब मेरे सामने था। इससे अंदाज़ा लगाते देर नहीं लगी कि कहाँ-कहाँ हमें कितने-कितने बड़े नाले मिलेंगे। सबसे बड़ा नाला तो सोबला के पास ही मिलेगा। तो अगर हम इसे पार नहीं कर सके, तो सोबला में बाइक खड़ी कर देंगे और पैदल चल पड़ेंगे। फिर भी मैंने यह पता करने की कोशिश की कि जिन ख़तरनाक नालों की बात सभी लोग कर रहे हैं, वे हैं कहाँ। लेकिन पता नहीं चल सका।

Monday, August 14, 2017

पंचचूली बेस कैंप यात्रा - धारचूला

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9 जून 2017
थल समुद्र तल से लगभग 900 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। अच्छा-खासा कस्बा है। कुमाऊँ के ऐसे कस्बों में भी ठीक-ठाक चहल-पहल देखने को मिलती है। गढ़वाल और कुमाऊँ में मुझे यही अंतर देखने को मिला। कुमाऊँ ज्यादा जीवंत है।
थल से निकलते ही एक तिराहा है। सीधी सड़क मुनस्यारी चली जाती है और दाहिने मुड़कर डीडीहाट। हम दाहिने मुड़ गये। हमें धारचूला जाना था। अगर सबकुछ ठीक रहा तो वापसी में मुनस्यारी से आयेंगे।
डीडीहाट लगभग 1700 मीटर की ऊँचाई पर है, तो 25 किलोमीटर के इस रास्ते में चढ़ाई ही रहती है। सारा रास्ता पहाड़ के उत्तरी ढलान पर है, इसलिये घने जंगलों वाला है। वर्षावन। यहाँ चीड़ नहीं है। अगर कहीं है भी तो दूसरे अनगिनत प्रजाति के पेड़-पौधों के बीच में दुबका-सिकुड़ा-सा। जून होने के बावजूद भी यहाँ बेहतरीन हरियाली थी। अन्यथा हिमालय में मानसून के दौरान ही हरियाली आनी शुरू होती है। बाइक की स्पीड़ और कम कर ली, ताकि इस हरियाली का भरपूर आनंद लेते रहें। दो-तीन स्थानों पर नाले भी मिले, जिनका पानी सड़क पर आ गया था। कीचड़ भी मिली। रात बारिश हुई थी, तो पहाड़ से छोटे-छोटे पत्थर पानी के साथ सड़क पर आ गये थे। ये पत्थर अभी भी ऐसे ही पड़े थे। बारिश में हिमालय में ऐसा होता है।

Monday, August 7, 2017

पंचचूली बेस कैंप यात्रा: दिल्ली से थल

7 जून, 2017
ज़िंदगी एक बार फ़िर मेहरबान हो गयी और हमें मौका दे दिया हिमालय की ऊँचाईयों पर जाने का। कुमाऊँ हिमालय की ऊँचाईयों पर मैं कभी नहीं गया था, सिवाय कई साल पहले पिंड़ारी और कफ़नी ग्लेशियर की यात्राओं के। इस बार मिलम ग्लेशियर का इरादा बना तो दो सप्ताह की छुट्टियाँ मंज़ूर नहीं हुईं। मंज़ूरी मिली एक सप्ताह की और इतने में मिलम का भ्रमण नहीं हो सकता था। तो इस तरह पंचचूली बेस कैंप जाने पर मोहर लगी।
चार जून को बिलासपुर, छत्तीसगढ़ से सुनील पांडेय जी बाइक पर लद्दाख के लिये निकले। उस दिन वे जबलपुर रुके। पाँच को मध्य प्रदेश की गर्मी ने उनकी हालत ख़राब कर दी और वे वापस लौटते-लौटते बचे। ओरछा रुके। छह तारीख़ की आधी रात को वे दिल्ली आये। उधर हमारी योजना रात के दो-तीन बजे निकल जाने की थी, ताकि हम भी दिन की गर्मी से निज़ात पा सकें। लेकिन सुनील जी के मद्देनज़र हम भी रुक गये। ऊपर से इंद्रदेव मेहरबान हो गये और अगले दिन भीषण गर्मी की संभावना समाप्त हो गयी।

Monday, July 10, 2017

पुस्तक चर्चा: “तिब्बत तिब्बत” और “एक रोमांचक सोवियत रूस यात्रा”

पिछले दिनों दो पुस्तकें पढ़ने को मिलीं। इन दोनों के बारे में मैं अलग-अलग लिखने वाला था, लेकिन एक कारण से एक साथ लिख रहा हूँ। पहले चर्चा करते हैं ‘तिब्बत तिब्बत’ की।
इसके लेखक पैट्रिक फ्रैंच हैं, जो कि मूल रूप से ब्रिटिश हैं। हिंदी अनुवाद भारत पाण्डेय ने किया है - बेहतरीन उच्च कोटि का अनुवाद। लेखक की तिब्बत और अंतर्राष्ट्रीय मामलों में गहरी रुचि साफ़ झलकती है। वे भारत में मैक्लोड़गंज में तिब्बतियों से काफ़ी हद तक जुड़े हुए भी हैं और उनके साथ काफ़ी समय व्यतीत किया है। 1986 में उन्होंने पर्यटक बनकर तिब्बत की यात्रा की थी। तो यह पुस्तक मूलतः एक यात्रा-वृत्तांत ही है, लेकिन इसमें तिब्बत और चीन के साथ संबंधों पर सबकुछ लिखा गया है। कहीं भी लेखक भटकता हुआ महसूस नहीं हुआ। उन्होंने तिब्बत की यात्रा अकेले की और दूर-दराज़ में तिब्बतियों के साथ भी काफ़ी समय बिताया, जो तिब्बत में एक बहुत बड़ी बात थी। ऐसा होना आज भी बड़ी बात है।
कुल चौबीस अध्याय हैं। शुरूआती अध्यायों में तिब्बत और निर्वासित तिब्बतियों से परिचय कराया गया है। लेखक चीन पहुँच जाता है और अपनी यात्रा भी आरंभ करता है। हम छठें अध्याय से चर्चा आरंभ करेंगे:

Thursday, July 6, 2017

‘कुमारहट्टी से जानकीचट्टी’ यात्रा की वीड़ियो

पिछले दिनों हमारी “कुमारहट्टी से जानकीचट्टी” यात्रा-श्रंखला प्रकाशित हुई। इस दौरान फ़ेसबुक पेज पर कुछ वीड़ियो भी अपलोड़ कीं। उन्हीं वीड़ियो को यहाँ ब्लॉग पर भी प्रकाशित किया जा रहा है। यदि आपने फेसबुक पेज पर वीड़ियो न देखी हों, तो यहाँ देख सकते हैं।














इस यात्रा के सभी भाग:
1. बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी
2. बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी - भाग दो
3. बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी - भाग तीन (त्यूणी और हनोल)
4. बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी - भाग चार (हनोल से पुरोला)
5. बाइक यात्रा: पुरोला से खरसाली
6. बाइक यात्रा: खरसाली से दिल्ली
7. ‘कुमारहट्टी से जानकीचट्टी’ यात्रा की वीडियो

Monday, July 3, 2017

बाइक यात्रा: खरसाली से दिल्ली

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21 मई 2017
कल ही तय हो गया था कि मैं और नरेंद्र आज सुबह-सवेरे पाँच बजे यमुनोत्री जायेंगे और रणविजय यहीं रहेगा। लेकिन पाँच कब बज गये, किसी को भी पता नहीं चला। छह बजे तक आँखें तो तीनों की खुल गयीं, लेकिन उठा कोई नहीं। सात भी बज गये और रणविजय व नरेंद्र फ्रेश होकर फिर से रज़ाईयों में दब गये। तीनों एक-दूसरे को ‘उठो भई’ कहते रहे और समय कटता रहा।
अचानक मुझे महसूस हुआ कि कमरे में मैं अकेला हूँ। बाकी दोनों चुप हो गये - एकदम चुप। मैंने कुछ देर तक ‘नरेंद्र उठ, रणविजय उठ’ कहा, लेकिन कोई आहट नहीं हुई। मुझे कुछ अटपटा लगा। मामला क्या है? ये दोनों सो तो नहीं गये। ना, सवाल ही नहीं उठता। मैं सो सकता हूँ, लेकिन अब ये दोनों नहीं सो सकते। इसका मतलब मुझसे मज़ाक कर रहे हैं। इनकी ऐसी की तैसी! पूरी ताकत लगाकर रणविजय की रज़ाई में घुटना मारा, लेकिन यह क्या! घुटना रणविजय की रज़ाई पार करता हुआ नरेंद्र की रज़ाई तक पहुँच गया। किसी को भी नहीं लगा।

Monday, June 26, 2017

बाइक यात्रा: पुरोला से खरसाली

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20 मई 2017
पुरोला से सुबह साढ़े आठ बजे चल दिये। बाज़ार में चहल-पहल थी। देहरादून की बस भी खड़ी थी। कुछ ही आगे नौगाँव है। यमुना किनारे बसा हुआ। यमुना नदी पार करते ही हम नौगाँव में थे।
नौगाँव समुद्र तल से लगभग 1100 मीटर ऊपर है, इसलिये खूब गर्मी थी। नहाने का मन था, लेकिन नहीं नहाये।
नौगाँव पार करते ही एक रेस्टॉरेंट पर रुक गये।
“क्या खाओगे भाई जी?”

Monday, June 19, 2017

बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी - भाग चार (हनोल से पुरोला)

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19 मई 2017
हनोल से निकलते ही चीड़ का जंगल आरंभ हो गया और बगल में टोंस नदी। आनंदमय कर देने वाला वातावरण।
पाँच-छह किलोमीटर आगे एक स्थान है - चीड़ समाधि।
पता नहीं यह एशिया का सबसे ऊँचा पेड़ था या दुनिया का, लेकिन बहुत ऊँचा था। 60 मीटर से भी ज्यादा ऊँचा। 2007 में तूफ़ान के कारण यह टूटकर गिर पड़ा। इसकी आयु लगभग 220 वर्ष थी। पर्यावरण और वन मंत्रालय ने इसे ‘महावृक्ष’ घोषित किया हुआ था। अब जब यह टूट गया तो इसकी समाधि बना दी गयी। इसे जमीन में तो नहीं दफ़नाया, लेकिन इसे काटकर इसके सभी टुकड़ों को यहाँ संग्रहीत करके और सुरक्षित करके रखा हुआ है।
चीड़ की एक कमी होती है कि यह किसी दूसरी वनस्पति को नहीं पनपने देता, लेकिन इसकी यही कमी इसकी खूबी भी होती है। सीधे खड़े ऊँचे-ऊँचे चीड़ के पेड़ एक अलग ही दृश्य उपस्थित करते हैं। हम ऐसे ही जंगल में थे।
आनंदमग्न।

Monday, June 12, 2017

बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी - भाग तीन (त्यूणी और हनोल)

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19 मई 2017
तो हम उठे आराम से। बड़े आराम से। रात बारिश हुई थी तो मौसम सुहावना हो गया था, अन्यथा त्यूणी 900 मीटर की ऊँचाई पर बसा है, खूब गर्म रहता है। मानसून और सर्दियों में आने लायक जगह है त्यूणी। रणविजय ने कहा - “गुरूदेव, त्यूणी मुझे पसंद आ गया। गर्मी छोड़कर यहाँ कभी भी आया जा सकता है। 300 रुपये का शानदार कमरा और स्वादिष्ट भोजन और दो नदियों का संगम... इंसान को और क्या चाहिये ज़िंदगी में? बच्चों को लेकर आऊँगा अगली बार।”
इंसान ‘अगली बार’ कह तो देता है, लेकिन ‘अगली बार’ आसानी से आता नहीं।
तो अब हमारे सामने प्रश्न था - आगे कहाँ जाएँ? अभी हमारे हाथ में तीन दिन और थे। एक ने कहा - “चकराता चलो।” मैंने ऑब्जेक्शन किया - “तीन दिन चकराता में? अभी तो टाइगर फाल में भी पानी रो-रो कर आ रहा होगा।”

Monday, June 5, 2017

बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी - भाग दो

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18 मई 2017
हम सुबह ही उठ गये। मतलब इतनी सुबह भी नहीं। फ्रेश होने गये तो एहसास होने लगा कि 500 रुपये का कमरा लेकर ठगे गये। चार-पाँच कमरों का एक साझा टॉयलेट ही था। उसमें भी इतनी गंदगी कि मामला नीचे उतरने की बजाय वापस ऊपर चढ़ गया। होटल मालिक हालाँकि अब नशे में तो नहीं था, लेकिन आँखें टुल्ल ही थीं। वह पूरे दिन शायद पीता ही रहता हो।
सैंज समुद्र तल से लगभग 1400 मीटर की ऊँचाई पर है। जब छैला तिराहे पर पहुँचा तो मैं आगे था। मुझसे आगे एक बस थी, जिसे ठियोग की तरफ़ जाना था। तिराहे पर वह एक ही फेरे में नहीं मुड़ सकी तो ड्राइवर उसे बैक करके दोबारा मोड़ने लगा। इतने में रणविजय और नरेंद्र तेजी से पीछे से आये और ठियोग की तरफ़ मुड़कर चल दिये। मैं जोर से चीखा - “ओये।” लेकिन दोनों में से किसी पर कुछ भी असर नहीं हुआ।
फोन किया - “वापस आओ।”
आज्ञाकारी शिष्यों की तरह दोनों लौट आये।

Thursday, June 1, 2017

बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी

इस यात्रा को क्या नाम दूँ? समझ नहीं पा रहा। निकले तो चांशल पास के लिये थे, लेकिन नहीं जा सके, इसलिये चांशल यात्रा भी कहना ठीक नहीं। फिर दिशा बदलकर उत्तराखंड़ में चले गये, फिर भी उत्तराखंड़ यात्रा कहना ठीक नहीं। तो काफ़ी मशक्कत के बाद इसे यह नाम दिया है - कुमारहट्टी से जानकीचट्टी की यात्रा।
उत्तरकाशी यात्रा में मेरे सहयात्री थे रणविजय सिंह। यह हमारी एक साथ पहली यात्रा थी। बहुत अच्छी बनी हम दोनों में। इसी से प्रेरित होकर अगली यात्रा के लिये भी सबसे पहले रणविजय को ही टोका - “एक आसान ट्रैक पर चलते हैं 16 से 20 मई, बाइक लेकर।”
रणविजय - “भई वाह, बस बजट का थोड़ा-सा अंदाज़ा और बता दो।”
“हम खर्चा करते ही नहीं। बाइक का तेल और 2000 और जोड़ लो। 1000-1200 किलोमीटर बाइक चलेगी।”
रणविजय - “फ़िर तो ठीक है। चलेंगे।”
...
कुछ दिन बाद...
मैं - “एक मित्र पीछे बैठकर जाना चाहते हैं। मैं तो बैठाऊँगा नहीं। क्या तुम बैठा लोगे?”

Monday, May 29, 2017

वीडियो: छत्तीसगढ़ में नैरोगेज ट्रेन यात्रा

पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में की गयी नैरोगेज ट्रेन यात्रा की छोटी-छोटी वीडियो जो जोड़ने और एडिट करने का यह प्रयास किया है। उतना प्रभावशाली तो नहीं है, लेकिन ठीक-ठाक ही है। मैं वीडियो एडिटिंग के क्षेत्र में नया हूँ ना... इसलिये। जब लगातार एडिटिंग करनी शुरू कर दूँगा, तो आपको ‘स्टनिंग’ वीडियो देखने को मिला करेंगी...
याद रखना इस बात को...

Thursday, May 25, 2017

छत्तीसगढ़ में नैरोगेज ट्रेन यात्रा

29 अप्रैल 2017 को अचानक ख़बर मिली कि छत्तीसगढ़ की एकमात्र नैरोगेज रेलवे लाइन और भी छोटी होने जा रही है। किसी ज़माने में रायपुर जंक्शन से ट्रेनें आरंभ होती थीं, लेकिन पिछले कई सालों से तेलीबांधा से ट्रेनें चल रही हैं। रायपुर जंक्शन और तेलीबांधा के बीच में रायपुर सिटी स्टेशन था, जहाँ अब कोई ट्रेन नहीं जाती।
तो ख़बर मिली कि 1 मई से यानी परसों से ये ट्रेनें तेलीबांधा की बजाय केन्द्री से चला करेंगी। यानी तेलीबांधा से केन्द्री तक की रेलवे लाइन बंद हो जायेगी और इनके बीच में पड़ने वाले माना और भटगाँव स्टेशन भी बंद हो जायेंगे। मैं इसलिये भी बेचैन हो गया कि रायपुर से केन्द्री तक इस लाइन का गेज परिवर्तन नहीं किया जायेगा। इसके बजाय रायपुर से मन्दिर हसौद और नया रायपुर होते हुए नयी ब्रॉड़गेज लाइन केन्द्री तक बनायी जा रही है। केन्द्री से आगे धमतरी और राजिम तक गेज परिवर्तन किया जायेगा। केन्द्री तक का यह नैरोगेज का मार्ग रायपुर प्रशासन को सौंप दिया जायेगा, जहाँ हाईवे बनाया जायेगा।
अब जबकि केन्द्री तक नैरोगेज की यह लाइन बंद हो ही जायेगी, तो कभी भी इस पर हाईवे बनाने का काम आरंभ हो सकता है। यानी रायपुर सिटी, तेलीबांधा, माना और भटगाँव स्टेशन हमेशा के लिये समाप्त हो जायेंगे। मुझे उनके फोटो लेने की उत्कंठा हो गयी और 3 मई 2017 को मैं दिल्ली से निकल पड़ा। हालाँकि ट्रेन बंद हो चुकी थी, इसलिये मोटरसाइकिल से या किसी भी तरीके से बंद हो चुके स्टेशनों तक जाऊँगा और उनके फोटो लूँगा।

Monday, May 22, 2017

धनबाद-राँची पैसेंजर रेलयात्रा


पिछले दिनों अचानक दिल्ली के दैनिक भास्कर में ख़बर आने लगी कि झारखंड़ में एक रेलवे लाइन बंद होने जा रही है, तो मन बेचैन हो उठा। इससे पहले कि यह लाइन बंद हो, इस पर यात्रा कर लेनी चाहिये। यह लाइन थी डी.सी. लाइन अर्थात धनबाद-चंद्रपुरा लाइन। यह रेलवे लाइन ब्रॉड़गेज है। इसका अर्थ है कि इसे गेज परिवर्तन के लिये बंद नहीं किया जायेगा। यह स्थायी रूप से बंद हो जायेगी।
झरिया कोलफ़ील्ड़ का नाम आपने सुना होगा। धनबाद के आसपास का इलाका कोयलांचल कहलाता है। पूरे देश का कितना कोयला यहाँ निकलता है, यह तो नहीं पता, लेकिन देश की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने में इस इलाके का अहम योगदान है। इधर आप जाओगे, आपको हर तरफ़ कोयला ही कोयला दिखेगा। कोयले की भरी हुई मालगाड़ियाँ अपनी बारी का इंतज़ार करती दिखेंगी। इसलिये यहाँ रेलवे लाइनों का जाल बिछा हुआ है। कुछ पर यात्री गाड़ियाँ भी चलती हैं, लेकिन वर्चस्व मालगाड़ियों का ही है।

Friday, May 19, 2017

वीडियो - हुसैनीवाला में बैसाखी मेला और साल में एक दिन चलने वाली ट्रेन

मैं इस वीड़ियो को उतना शानदार तो नहीं बना पाया, लेकिन फिर भी ठीक ही है। पंजाब के फ़िरोज़पुर जिले में पाकिस्तान सीमा के एकदम नज़दीक स्थित है हुसैनीवाला। आज़ादी से पहले यहाँ से होकर ट्रेनें लाहौर जाया करती थीं। लेकिन अब केवल साल में एक ही दिन ट्रेन चलती है। फ़िरोज़पुर छावनी से हुसैनीवाला तक। बैसाखी वाले दिन। इस दिन यहाँ भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव के समाधि-स्थल पर मेला लगता है। उसके उपलक्ष्य में रेलवे ट्रेन चलाता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु जाते हैं। सतलुज नदी पार करके समाधि-स्थल पहुँचकर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
इसके अलावा यहाँ सतलुज पर बने रेल के पुल के अवशेष भी आकर्षण के केंद्र हैं।

Thursday, May 18, 2017

हुसैनीवाला में बैसाखी मेला और रेलवे

हुसैनीवाला की कहानी कहाँ से शुरू करूँ? अभी तक मैं यही मानता आ रहा था कि यहाँ साल में केवल एक ही दिन ट्रेन चलती है, लेकिन जैसे-जैसे मैं इसके बारे में पढ़ता जा रहा हूँ, नये-नये पन्ने खुलते जा रहे हैं। फिर भी कहीं से तो शुरूआत करनी पड़ेगी।
इसकी कहानी जानने के लिये हमें जाना पड़ेगा 1931 में। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को लाहौर षड़यंत्र केस व अन्य कई मामलों में गिरफ़्तार करके फाँसी की सज़ा घोषित की जा चुकी थी। तय था कि 24 मार्च को इन्हें लाहौर जेल में फाँसी दे दी जायेगी। लेकिन उधर जनसाधारण में देशभक्ति की भावना भी भरी हुई थी और अंग्रेजों को डर था कि शायद भीड़ बेकाबू न हो जाये। तो उन्होंने एक दिन पहले ही इन तीनों को फाँसी दे दी - 23 मार्च की शाम सात बजे। जेल के पिछवाड़े की दीवार तोड़ी गयी और गुपचुप इनके शरीर को हुसैनीवाला में सतलुज किनारे लाकर जला दिया गया। रात में जब ग्रामीणों ने इधर अर्थी जलती देखी, तो संदेह हुआ। ग्रामीण पहुँचे तो अंग्रेज लाशों को अधजली छोड़कर ही भाग गये। लाशों को पहचान तो लिया ही गया था। इसके बाद ग्रामीणों ने पूर्ण विधान से इनका क्रिया-कर्म किया। आज उसी स्थान पर समाधि स्थल बना हुआ है। प्रत्येक वर्ष बैसाखी वाले दिन यानी 13 अप्रैल को यहाँ मेला लगता है।
भारत-पाकिस्तान की सीमा एकदम बगल से होकर गुज़रती है। जिस पुल से हम सतलुज नदी पार करते हैं, उसके पश्चिम में पाकिस्तान ही है। यहीं नदी पर बैराज भी है। एक नहर भी निकाली गयी है। नदी बैराज और पुल के नीचे से गुजरते ही पाकिस्तान में चली जाती है।

Monday, May 15, 2017

उत्तरकाशी में रणविजय सिंह की फोटोग्राफी

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पिछले दिनों जब रणविजय सिंह के साथ उत्तरकाशी और रैथल जाना हुआ, तो एक नयी बात पता चली। रणविजय ने बताया कि मुझसे प्रेरित होकर उन्होंने फोटोग्राफी आरंभ की थी। मुझसे प्रेरित होकर कैसे? बताता हूँ। 
बहुत पहले ‘डायरी के पन्नों’ में यदा-कदा मैं फोटोग्राफी के टिप्स भी बता दिया करता था। वहीं से इन्होंने कुछ टिप्स सीखे। आज हालत यह है कि ‘गुरू गुड़ ही रह गया, चेला चीनी हो गया’। बहुत अच्छी फोटोग्राफी है रणविजय की। इनकी फेसबुक वॉल पर इनके शानदार फोटो देखे जा सकते हैं। साधारण दृश्यों को असाधारण बनाना रणविजय से सीखा जा सकता है। तो इसी बात से प्रेरित होकर मैंने उनसे उनके उत्तरकाशी के फोटो मंगाये। मैंने कहा था कि गिने-चुने सर्वोत्तम फोटो ही भेजो, लेकिन उन्होंने 50-60 फोटो भेज दिये। तो इन्हीं में से कुछ चुनिंदा फोटो आज प्रकाशित कर रहा हूँ। 

Monday, May 8, 2017

उत्तरकाशी में रैथल गाँव का भ्रमण

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6 अप्रैल 2017,
पंकज कुशवाल जी रैथल के रहने वाले हैं, तो उन्होंने हमें रैथल जाने के लिये प्रेरित किया। रैथल के ऊपर दयारा बुग्याल है। तो ज़ाहिर है कि दयारा का एक रास्ता रैथल से भी जाता है। दयारा बहुत बड़ा बुग्याल है और इसके नीचे कई गाँव हैं। सबसे प्रसिद्ध है बरसू। रैथल भी प्रसिद्ध होने लगा है। और भी गाँव होंगे, जहाँ से दयारा का रास्ता जाता है, लेकिन उतने प्रसिद्ध नहीं।
आज हमें रैथल ही रुकना था, तो सोचा कि क्यों न भटवाड़ी से 15 किलोमीटर आगे गंगनानी में गर्म पानी में नहाकर आया जाये। हमें नहाये कई दिन हो गये थे। इस बहाने नहा भी लेंगे और नया अनुभव भी मिलेगा। तो जब भटवाड़ी की ओर जा रहे थे तो रास्ते में और भी दूरियाँ लिखी दिखायी पड़ीं। इनमें जिस स्थान ने हमारा सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया, वो था हरसिल - गंगनानी से 30 किलोमीटर आगे। हम दोनों का मन ललचा गया और हम ख्वाब देखने लगे हरसिल में चारों ओर बर्फ़ीले पहाड़ों के बीच बैठकर चाय और आलू की पकौड़ियाँ खाने के। कार में ही बैठे बैठे हमने गंगोत्री तक जाने के सपने देख लिये। अप्रैल में - कपाट खुलने से भी पहले - गंगोत्री। रणविजय ने कहा कि हमने आज पंकज जी को रैथल का वचन दे रखा है। मैंने कहा - वचन तोड़ने में एक फोन भर करना होता है।

Thursday, May 4, 2017

उत्तरकाशी भ्रमण: पंकज कुशवाल, तिलक सोनी और चौरंगीखाल

4 अप्रैल, 2017
आज की हमारी फ्लाइट की बुकिंग थी दिल्ली से बागडोगरा की। पिछले साल सस्ती फ्लाइट का एक डिस्काउंट ऑफ़र आया था। तब बिना ज्यादा सोचे-समझे मैंने अपनी और दीप्ति की बुकिंग कर ली। सोचा कि अप्रैल में सिक्किम घूमेंगे और गोईचा-ला ट्रैक करेंगे। सिक्किम बुराँश की विभिन्न प्रजातियों के लिये प्रसिद्ध है और बुराँश के खिलने का समय भी अप्रैल ही होता है। लेकिन पिछले एक महीने से दीप्ति अपनी एक ट्रेनिंग में इस कदर व्यस्त है कि उसका इस यात्रा पर जाना रद्द हो गया।
लेकिन फ्लाइट तो नॉन-रिफंडेबल थी। तब विचार बना कि न्यूजलपाईगुड़ी से शुरू करके गुवाहाटी, तिनसुकिया और मुरकंगसेलेक तक रेलयात्रा कर लूँगा। वैसे भी असोम में मौसम अच्छा था। जबकि शेष भारत में गर्मी का प्रकोप शुरू हो चुका था। तो रेल के माध्यम से असोम घूमना बुरा नहीं होता। सारी योजना बना ली। कब कहाँ से कौन-सी ट्रेन पकड़नी है, कहाँ रुकना है आदि।
लेकिन ऐन टाइम पर साहब लोग धोखा दे गये। छुट्टियाँ नहीं मिलीं। मैं छुट्टियों के मामले में ऑफिस में ज़िद नहीं करता हूँ। इस बार नहीं मिलीं, कोई बात नहीं। अगली बार इनसे भी ज्यादा मिल जायेंगी। तो इस तरह पूर्वोत्तर जाना रह गया।

Monday, May 1, 2017

आंबलियासन से विजापुर मीटरगेज रेलबस यात्रा

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19 मार्च, 2017
मैं महेसाणा स्टेशन पर था - “विजापुर का टिकट देना।” 
क्लर्क ने दो बार कन्फर्म किया - “बीजापुर? बीजापुर?” 
नहीं विजापुर। वी जे एफ। तब उसे कम्प्यूटर में विजापुर स्टेशन मिला और 15 रुपये का टिकट दे दिया।
अंदाज़ा हो गया कि इस मार्ग पर भीड़ नहीं मिलने वाली।
प्लेटफार्म एक पर पहुँचा तो डी.एम.यू. कहीं भी नहीं दिखी। प्लेटफार्म एक खाली था, दो पर वीरमगाम पैसेंजर खड़ी थी। फिर एक मालगाड़ी खड़ी थी। क्या पता उसके उस तरफ डी.एम.यू. खड़ी हो। मैं सीढ़ियों की और बढ़ने लगा। बहुत सारे लोग पैदल पटरियाँ पार कर रहे थे, लेकिन जिस तरह हेलमेट ज़रूरी है, उसी तरह स्टेशन पर सीढियाँ।

Thursday, April 27, 2017

गुजरात मीटरगेज ट्रेन यात्रा: बोटाद से गांधीग्राम

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18 मार्च 2017
पहले तो योजना थी कि आज पूरे दिन भावनगर में रुकूँगा और विमलेश जी जहाँ ले जायेंगे, जाऊँगा। उन्होंने मेरे लिये बड़ी-बड़ी योजनाएँ बना रखी थीं और रेलवे के कारखाने में मेरे एक लेक्चर की भी प्लानिंग थी। लेकिन जब मुझे पता चला कि आंबलियासन से विजापुर वाली मीटरगेज की लाइन चालू है और उस पर रेलबस भी चलती है, तो मेरा मन बदल गया। अगर इस बार उस लाइन पर यात्रा नहीं की तो पता नहीं कब इधर आना हो और कौन जाने तब तक वो लाइन बंद भी हो जाये। विजापुर से आदरज मोटी, कलोल से महेसाणा और अहमदाबाद से खेड़ब्रह्म वाली लाइनें पहले ही बंद हो चुकी हैं। गेज परिवर्तन का कार्य जोरों पर चल रहा है।
यही बात विमलेश जी को बतायी तो वे इसके लिये तुरंत राज़ी हो गये। तय हुआ कि आज बोटाद से अहमदाबाद तक यात्रा करूँगा और कल आंबलियासन से विजापुर। बोटाद से अहमदाबाद जाने के लिये दो बजे वाली ट्रेन पकडूँगा और यहाँ भावनगर से बोटाद के लिये साढ़े ग्यारह वाली। यानी आज साढ़े ग्यारह बजे तक हमारे पास समय रहेगा विमलेश जी के कारखाने में घूमने का। बाइक उठायी और निकल पड़े।

Monday, April 24, 2017

गुजरात मीटरगेज ट्रेन यात्रा: जूनागढ़ से देलवाड़ा

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17 मार्च 2017
रात अच्छी नींद आयी। एक चूहे ने एक बार आसपास चहलकदमी की, एक दो डरावने सपने आये: फिर भी सब ठीक रहा। इतने बड़े रेस्ट हाउस में मैं अकेला ही था। भूतों के अस्तित्व को मैं मानता हूँ। रेलवे लाइन के किनारे बने इस सुनसान रेस्ट हाउस में भूत रहते होंगे, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। धन्यवाद भूतों, मुझे शांति से सोने देने के लिए।
जूनागढ़ से ट्रेन ठीक समय पर चल दी। भीड़ बिल्कुल नहीं थी। जैसे ही शहर से बाहर निकले, गिरनार पर्वत दिखायी पड़ने लगा। काफ़ी ऊँचा पर्वत है और जूनागढ़ के साथ-साथ गुजरात का भी बहुत बड़ा धार्मिक आस्था का केंद्र है। दूर से ही नमस्कार किया - भविष्य में दीप्ति के साथ आने का वादा करके।
वीसावदर में हमारी ट्रेन पहुँचने के बाद खिजडिया-जूनागढ़ पैसेंजर आ गयी। लग रहा था कि अब हमारी ट्रेन खाली हो जाएगी, लेकिन खिजडिया ट्रेन के आधे से ज्यादा यात्री इसमें चढ़ गए। सभी सीटें भर गयीं और कुछ यात्री खड़े भी रहे। मैं कल इस मार्ग पर यात्रा कर चुका था, इसलिए मेरे काम पर इस भीड़ का उतना प्रभाव नहीं पड़ा।

Thursday, April 20, 2017

गिर फोरेस्ट रेलवे: ढसा से वेरावल

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दो घंटे ढसा में खड़ी रहकर यही ट्रेन अब वेरावल के लिये चल दी। ढसा से ब्रॉड़गेज की एक लाइन भावनगर जाती है और एक महुवा। ट्रेन चली तो एक कंटेनर ट्रेन महुवा की ओर जाती दिखी। धीरे-धीरे मीटरगेज की ट्रेन सरक रही थी, थोड़ी ही दूरी पर य्यै लंबी कंटेनर ट्रेन। बड़ा शानदार दृश्य था यह। मैं इसमें इतना खो गया कि फोटो लेना भी याद नहीं रहा। हालाँकि एक-दो फोटो जाती-जाती के ले ज़रूर लिये।
अमरेली स्टेशन पर एक सूचना-पट्ट लगा हुआ था, जिस पर पीली बैकग्राउंड में काले अक्षरों में ताज़ा ही लिखा हुआ था - आरक्षण चार्ट। मैं चौंक गया। अरे, यह क्या लिख दिया इन्होने? अमरेली में आरक्षण चार्ट? गिनी चुनी दो तीन पैसेंजर ट्रेनें आती हैं - जनरल डिब्बों वाली। जिसने भी यह काम करवाया है, उसने बीस रूपये का काम कराके हज़ार का बिल बनाया होगा।
फेसबुक पेज पर एक लाइव वीडियो चला दी। यार लोग खुश हो गए। पूछने लगे कहाँ का है, कहाँ का है। उनसे अगर बता देता कि अमरेली का है तो कोई भी यह पता लगाने की ज़हमत नहीं उठाता कि अमरेली है कहाँ। उल्टा मुझसे ही पूछते।

Monday, April 17, 2017

गुजरात मीटरगेज रेल यात्रा: जेतलसर से ढसा

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अंधा क्या माँगे? मुझे ट्रेन में जो बर्थ सबसे ज्यादा पसंद है, वो है अपर बर्थ। आप अपने बैग से कई सामान अपने इर्द गिर्द फैला सकते हैं और चोरी होने व गिरने का डर भी नहीं। मोबाइल को कान के पास रख रकते हैं, कोने में पानी की बोतल, मोबाइल के पास बैटरी बैंक, थोड़ा नीचे कैमरा, केले या अंगूर। यह उन्मुक्तता किसी दूसरी बर्थ पर नहीं मिलती। वरीयता क्रम में इसके बाद मिड़ल बर्थ, लोअर बर्थ, साइड़ अपर और साइड़ लोअर। साइड़ लोअर भले ही पाँचवे नंबर पर हो, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि यह मुझे पाँचवे नंबर पर पसंद है। बल्कि यह बर्थ मुझे सबसे ज्यादा नापसंद है।
और आज जब चार्ट बना तो आर.ए.सी. क्लियर होने के बाद मुझे मिली 39 नंबर की बर्थ - साइड़ लोअर। मैं इस पर जाकर दो अन्य लोगों के बीच जगह बनाता हुआ बैठ गया और इंतज़ार करने लगा कि कोई आये और मुझसे किसी भी बर्थ के बदले बदली कर ले। ज्यादा देर प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी और आठ मुसलमानों के दल के एक सदस्य ने जैसे ही अपनी कहानी सुनानी शुरू की, मैंने तपाक से कहा - “हाँ, बदल लूँगा। कौन-सी बर्थ पर जाना है?” उन्होंने कहा - “22 नंबर पर।” सेकंड का हजारवाँ हिस्सा भी नहीं लगा, गणना करने में कि 22 नंबर वाली बर्थ अपर बर्थ होती है - मेरी पसंद में पहले स्थान पर। उन्होंने मुझे चार बार उसी मीठे गुजराती लहजे में शुकिया कहा, मैंने भी अपने लहजे में दो बार धन्यवाद कह दिया।

Thursday, April 13, 2017

गुजरात मीटरगेज रेल यात्रा: अहमदाबाद से रणुंज

14 मार्च 2017
जब से मेरठ-सहारनपुर रेलवे लाइन बिजली वाली हुई है और इस पर बिजली वाले इंजन, बिजली वाली ट्रेनें चलने लगी हैं, गोल्डन टेम्पल मेल में डीजल इंजन लगना बंद हो गया है। निजामुद्दीन में इंजनों की अदला-बदली होती थी, तो यहाँ इस ट्रेन के लिए तीस मिनट का ठहराव निर्धारित था, लेकिन अब इसे घटाकर पंद्रह मिनट कर दिया गया है। पहले यह सात बजकर पैंतीस पर निजामुद्दीन से चलती थी, जबकि अब सात बीस पर ही चल देती है। सात बजे मेरी नाईट ड्यूटी समाप्त होती है, तो इन बीस मिनटों में निजामुद्दीन कैसे पहुँचा, यह बात केवल मैं और धीरज ही जानते हैं। धीरज बाइक लेकर वापस चला गया, मैं निजामुद्दीन रह गया। जब फुट ओवर ब्रिज पर तेजी से प्लेटफार्म नंबर एक की और जा रहा था, तो एक गाड़ी की सीटी बजने लगी थी और वह गाड़ी थी - गोल्डन टेम्पल मेल।

Monday, April 10, 2017

एक विचित्र रेल-यात्रा

7 मार्च 2017
आला हज़रत एक्सप्रेस को इज़्ज़तदार ट्रेन नहीं माना जाता। भुज और बरेली के बीच चलने वाली इस ट्रेन का ज्यादा समय राजस्थान में गुज़रता है। आप किसी राजस्थानी से, ख़ासकर इसके मार्ग में आने वाले राजस्थानी से पूछिए इसके बारे में। वह इसे थकी हुई और बेकार ट्रेन बताएगा। और यह बेकार इस मायने में है कि इसमें भीड़ बहुत होती है। इतनी भीड़ कि सामान्य और शयनयान डिब्बों में ज्यादा अंतर नहीं होता।
ट्रेन आधा घंटा लेट थी और जब मैं पुरानी दिल्ली के छह नंबर प्लेटफार्म पर सीढ़ियों से उतर रहा था तो ट्रेन भी धीरे-धीरे चल रही थी। पता चलना मुश्किल था कि ट्रेन आ रही है या आने के बाद चल चुकी है। लेकिन इस थकी हुई ट्रेन की थकी हुई सवारियों का दरवाजों पर खड़े होना ही कह रहा था कि ट्रेन अभी-अभी आयी है। प्लेटफार्म पर भी काफी भीड़ थी और रुकने से पहले ही उतरने वालों और चढ़ने वालों का संघर्ष शुरू हो गया। 
जब सब शांत हो गया तो मैं डिब्बे में चढ़ा - एस चार में। सैंतीस नंबर वाली शायिका मेरी थी। यह मध्य शायिका होती है और दिन में किसी काम की नहीं होती। मैं इस बात को जानता था और किसी भी बहस के लिए तैयार नहीं था। अपने कूपे में बारह लोगों को बैठे देख चुपचाप अपने लिए जगह बनायी और सिकुड़कर बैठ गया। ऊपर वाली बर्थों पर लोग सोये हुए थे। नीचे वाले बैठे-बैठे ऊँघ रहे थे।

Thursday, April 6, 2017

अंडमान यात्रा की कुछ वीडियो

अंडमान यात्रा की छोटी-छोटी वीडियो पिछले दिनों फेसबुक पेज पर प्रकाशित की गयी थीं। उन्हें ही यहाँ इकट्ठा प्रकाशित कर दिया है। यदि आपने ये वीडियो पहले देख ली हों, तो अब देखने की आवश्यकता नहीं हैं। क्यों अपना डाटा खर्च करना? नहीं देखी हों तो आप देख सकते हैं।


Monday, April 3, 2017

वंडूर बीच भ्रमण

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23 जनवरी 2017
आज हमारी अंडमान यात्रा का आख़िरी दिन था और दिन का भी आख़िरी वक़्त चल रहा था। हम सीधे पहुँचे वंडूर बीच पर। पोर्ट ब्लेयर से यहाँ तक बहुत सारी बसें भी चलती हैं। एक जगह लिखा था - महात्मा गाँधी मरीन नेशनल पार्क में स्वागत है। आप इधर के नक्शे को देखेंगे तो पायेंगे कि यहाँ छोटे-छोटे कई द्वीप हैं। ये सभी द्वीप निर्जन हैं और सामुद्रिक पारिस्थितिकी में महत्वपूर्ण हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध है जॉली ब्वाय द्वीप। जॉली ब्वाय की बोट यहीं वंडूर से चलती है। हमारे पास समय की कमी थी, इसलिये वहाँ नहीं गये।
वंडूर बीच के पास ही लोहाबैरक क्रोकोडायल सेंचुरी है। जगह-जगह चेतावनी भी लिखी थी कि यहाँ तक मगरमच्छ आ जाते हैं, इसलिये सावधान रहें।
भीड़ बिल्कुल नहीं थी। जितने पर्यटक थे, लगभग उतने ही कुत्ते भी थे। एक बहुत बड़ा ठूँठ पड़ा था, जो यात्रियों के लिये फोटो-पॉइंट था। हमारे लिये भी।

Thursday, March 30, 2017

अंडमान में बाइक यात्रा: माउंट हैरियट नेशनल पार्क

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23 जनवरी, 2017
तो हम बंबू-फ्लैट पहुँच गये। बढ़िया रोचक नाम है - बंबू-फ्लैट। यहाँ से चाथम बहुत नज़दीक है और नियमित बोट चलती हैं। हम बोट में रखकर भी बाइक को इधर ला सकते थे, लेकिन अंडमान की सड़कों को भी नापना चाहते थे। बंबू-फ्लैट से थोड़ा आगे एक तिराहा है, जहाँ से एक रास्ता नोर्थ-बे जाता है। रास्ता टूटा-फूटा था, लेकिन शायद बाइक तो चली ही जाती होगी। हम कुछ दिन पहले नोर्थ-बे जा चुके थे, तो आज वहाँ जाने की आवश्यकता नहीं थी।
25-25 रुपये की हमारी और 20 रुपये की बाइक की पर्ची कटी। आख़िरी दो-तीन किलोमीटर तक चढ़ाई बड़ी जोरदार है, लेकिन सड़क अच्छी बनी है। रास्ता - ऑफ़ कोर्स - घने जंगल से होकर गुज़रता है। फिर एक जगह पार्किंग है और बाइक यहीं खड़ी करके हम आगे चल दिये।

Monday, March 27, 2017

अंडमान में बाइक यात्रा: चाथम आरा मशीन

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23 जनवरी, 2017
आज जो सबसे पहला काम किया, वो था किराये पर बाइक लेना। अबरडीन बाज़ार में एक दुकान से बाइक मिल गयी - 500 रुपये प्रतिदिन किराया और 2000 रुपये सुरक्षा-राशि, जो बाइक लौटाने पर वापस कर दी जायेगी।
हमारे मोबाइल में नेट नहीं चल रहा था, इसलिये गूगल मैप लोड़ नहीं हो पाया। मेरी इच्छा बाइक से माउंट हैरियट जाने की थी। हैरियट के लिये पहले अंडमान ट्रंक रोड़ पर चलना होता है, वही सड़क जो डिगलीपुर जाती है। फिर कहीं से दाहिने मुड़कर बड़ी लंबी दूरी तय करके हैरियट जाना होता है। लेकिन नक्शे के अभाव में हम पहुँच गये चाथम। अब जब चाथम पहुँच ही गये तो यहाँ की आरा मिल भी देख लें। मैं एक मैकेनिकल इंजीनियर हूँ। इस तरह की पता नहीं कितनी मिलों की विजिट कर रखी है, इसलिये यह मेरे लिये एक उत्पादन इकाई से ज्यादा कुछ नहीं थी, लेकिन आजकल यह एक पर्यटक स्थल है।
एक बुढ़िया पुल से पहले चौराहे पर स्टूल पर डिब्बा रखकर इडली बेच रही थी। हमें चाहिये सस्ता भोजन और यहाँ से सस्ता कहीं नहीं मिल सकता था। दो प्लेट इडली ले ली। लेकिन दोनों प्लेटों में कम से कम दस बाल निकले। हमने बाल छोड़ दिये और इडली खा ली। और करते भी क्या? इडली थोड़े ही छोड़ते?

Thursday, March 23, 2017

हैवलॉक द्वीप - गोविंदनगर बीच और वापस पॉर्ट ब्लेयर

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22 जनवरी, 2017
‘पानो इको रिसॉर्ट’ में हम ठहरे थे। यह गोविंदनगर बीच के बिल्कुल बगल में है। अच्छा बना हुआ है।
हैवलॉक से हमें आज शाम को निकलना था, लेकिन बोट की बुकिंग न मिल पाने के कारण सुबह वाली बोट में ही बुकिंग करनी पड़ी थी। इस तरह हैवलॉक जैसे खूबसूरत स्थान को देखने के लिये हमारे पास चौबीस घंटे भी नहीं थे। कल राधानगर बीच देख लिया, आज बगल में मौज़ूद गोविंदनगर को देख लेते हैं।
हम नहाने की तैयारी के साथ गये थे, लेकिन जब कोरल चट्टानें देखीं तो नहाने का इरादा त्याग दिया। पानी एकदम शांत था। बड़ी दूर तक पानी में गहराई भी नहीं थी। इक्का-दुक्का पर्यटक ही थे। उनमें भी कई स्कूबा डाइविंग के लिये जाने वाले थे। हमें इस तरह की ‘एक्टिविटी’ रास नहीं आतीं। परसों स्नॉरकलिंग कर ली, बहुत हो गया।

Monday, March 20, 2017

राधानगर बीच @ हैवलॉक द्वीप

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21 जनवरी 2017
वही जहाज जिससे हम कल नील द्वीप आये थे, हमें आज हैवलॉक ले जायेगा। आज सुबह साढ़े सात बजे यह पॉर्ट ब्लेयर से चलेगा और साढ़े नौ बजे नील आ जायेगा। आधे घंटे बाद हैवलॉक के लिये प्रस्थान कर जायेगा।
यहाँ सुबह जल्दी हो जाती है, लेकिन अपनी आदत वही आठ-नौ बजे सोकर उठने की है। होटल का चेक-आउट समय साढ़े सात बजे था। मुझसे पहले दीप्ति उठ गयी। चमत्कार! कहने लगी कि उठ, समुद्र तट पर चलकर नहाते हैं। मैंने मना कर दिया। वह आराम से बिना गुस्सा किये चली गयी। महा चमत्कार!!
जल्दी ही वापस लौट आयी - बिना नहाये। बताया कि यह कोरल तट है। नहाना बहुत मुश्किल है। कोरल तटों पर चोट बड़ी आसानी से लगती है और लगती भी ऐसी है कि खून निकल आता है।

Thursday, March 16, 2017

नील द्वीप: भरतपुर बीच और लक्ष्मणपुर बीच

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20 जनवरी 2017
नैचुरल ब्रिज से पैदल मुख्य बाज़ार तक आने में थक गये। गर्मी भी थी और उमस भी। बाज़ार से भरतपुर बीच आधा किलोमीटर दूर है। पहुँच गये। लेटने की जगह मिल गयी और मैं सो गया।
नील द्वीप पर भरतपुर, सीतापुर, लक्ष्मणपुर और रामनगर सब बीच हैं।
मुझे समुद्र तटों का कोई अनुभव नहीं है। न ही यह पता कि फलाँ बीच ख़ूबसूरत है और फलाँ नहीं है। सभी तट एक-जैसे लगते हैं। मुझे न किसी बीच की विशेषता पता है और न ही वहाँ की ख़ूबियाँ। यही बात आपको इन यात्रा-वृत्तांतों में भी दिख रही होगी। अंडमान यात्रा को मैं पूरे अधिकार से नहीं लिख पा रहा हूँ। दिल पहाड़ों और ट्रेनों में ही बसता है ना।
दो घंटे सो लेने के बाद बड़ा अच्छा लगने लगा। यहाँ भीड़ नहीं थी, लेकिन चहल-पहल थी। कुछ दुकानें थीं, जहाँ केवल एजेंट लोग बैठे थे - समुद्री गतिविधियाँ कराने के लिये। बीच तो रेतीला और साफ़-सुथरा था, लेकिन आगे समुद्र में कोरल थे। इसलिये स्कूबा डाइविंग का अच्छा काम हो रहा था। हाई स्पीड़ वाटर स्कूटर वाला लड़कियों को सैर करा रहा था और तब तक समुद्र में कलाबाजियाँ कराता रहता, जब तक कि लड़की की चीख न निकल जाये।

Monday, March 13, 2017

नील द्वीप में प्राकृतिक पुल के नज़ारे

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20 जनवरी 2017
फोनिक्स-बे जेट्टी - हाँ यही नाम है इस जेट्टी का गूगल मैप में। नील और हैवलॉक जाने वाली बोट यहीं से चलती हैं। हमारी आज की नील द्वीप जाने की बुकिंग थी। सुबह सात बजे जहाज को चलना था, हम साढ़े छह बजे ही पहुँच गये। सुरक्षा-जाँच और चेक-इन के बाद वातानुकूलित जहाज में अपनी-अपनी सीटों पर जा बैठे।
दो घंटे की यह यात्रा थी। समुद्र अशांत था - शायद यह शांत ही कभी-कभार होता होगा। बड़ी-बड़ी लहरें आ रही थीं। भारी-भरकम जहाज को भी अच्छी तरह हिला देतीं। जी.पी.एस. चलाकर जहाज की गति नापी। यह बीस किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चल रहा था। वैसे समुद्री दूरियों को ‘नॉटिकल मील’ में नापते हैं, लेकिन मुझे किलोमीटर ही समझ आता है।
इससे पहले कि हमें समुद्री बीमारी होती और उल्टी आती, हमने मोबाइलों में अपने-अपने पसंदीदा गेम खेलने शुरू कर दिये। मैंने अपने गेम में न जाने कितनी लंबी रेलवे लाइन बिछाकर इस पर ट्रेनें चलायीं और दीप्ति ने ‘सबवे सर्फ़र’ में न जाने कितनी ट्रेनों में टक्कर मारी। इस जहाज पर डेक पर जाने की मनाही थी।

Thursday, March 9, 2017

नॉर्थ-बे बीच: कोरल देखने का उपयुक्त स्थान

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डेढ़ घंटा रॉस द्वीप पर घूमने के बाद हम वापस जेट्टी पहुँच गये। समय की पाबंदी का उदाहरण देखिये - हमारी बोट नंदिनी जेट्टी पर लगायी जा रही थी। अब यह हमें नॉर्थ-बे ले जायेगी।
इसे नॉर्थ-बे आइलैंड़ भी कहा जाता है, लेकिन मैं इसे ‘आइलैंड़’ नहीं कहूँगा। वैसे तो पूरा अंडमान-निकोबार ही द्वीप-समूहों से बना है। पोर्ट ब्लेयर भी एक द्वीप ही है - बहुत बड़ा द्वीप - इसका नाम है दक्षिणी अंडमान। तो यह जो नॉर्थ-बे है ना, यह पोर्ट ब्लेयर वाले मुख्य द्वीप का ही हिस्सा है। यह रॉस आइलैंड़ की तरह अलग से कोई द्वीप नहीं है। इसलिये इसे नॉर्थ-बे द्वीप कहना गलत है। यह दक्षिणी अंडमान द्वीप का एक हिस्सा है और समुद्री-तट होने के कारण इसे ‘नॉर्थ-बे बीच’ कहना ज्यादा उपयुक्त है, ‘नॉर्थ-बे आइलैंड़’ नहीं।
समुद्र में बड़ी उथल-पुथल थी। लहरें नाव को ऊपर उठा देतीं और फिर धड़ाम से नीचे पटक देतीं। इससे इतना पानी छलकता कि नाव के भीतर भी आ जाता।

Monday, March 6, 2017

रॉस द्वीप - ऐसे खंड़हर जहाँ पेड़ों का कब्ज़ा है

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19 जनवरी, 2017
कल जब हम सेलूलर जेल से लौट रहे थे, तो ‘अंडमान वाटर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स’ दिखायी दिया। यही अबरडीन जेट्टी भी है। जेट्टी मतलब ‘बोट-अड्डा’। यहाँ से रॉस द्वीप और नॉर्थ-बे के लिये बोट चलती हैं। चूँकि ये दोनों स्थान पास ही हैं और यहाँ से दिखायी भी देते हैं, इसलिये किसी भी तरह की एड़वांस बुकिंग की आवश्यकता नहीं।
सरकारी बोट भी चलती होगी, जो प्राइवेट से सस्ती होती होगी। लेकिन हमने प्राइवेट बोट चुनी। दोनों स्थानों पर आने-जाने का इनका किराया 550 रुपये प्रति व्यक्ति था। प्रत्येक बोट का अपना एक नाम होता है। हमें जो बोट मिली, उसका नाम था नंदिनी। यही बोट हमें पहले रॉस द्वीप ले जायेगी, फिर नॉर्थ-बे ले जायेगी और आख़िर में वापस अबरडीन जेट्टी भी लायेगी। रॉस द्वीप पर डेढ़ घंटा रुकना था और नॉर्थ-बे पर ढाई घंटे।

Thursday, March 2, 2017

अंडमान यात्रा: सेलूलर जेल के फोटो

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18 जनवरी, 2017
तो ऐसा हुआ कि हम पोर्ट ब्लेयर उतर गये - हवाई जहाज से। मरीन रोड़ पर एक होटल में एक कमरा बुक था ही। 100 रुपये में एक ऑटो वाला तैयार हो गया चलने को। वैसे यहाँ बसें भी खूब चलती हैं, जो दस-दस रुपये में आपको एयरपोर्ट से अबरडीन बाज़ार या मरीन रोड़ पहुँचा देती हैं। मुख्य लोकल बस अड्डा इन दोनों स्थानों के बीच में है।
तो हमें इस बात का उस समय पता नहीं था। प्रत्येक अंडमानी की तरह यह ऑटोवाला भी बहुत अच्छा था। चलते-चलते ही हमारा कार्यक्रम पूछा और आज ही नील व हैवलॉक आने-जाने के टिकट बुक करा लेने की सलाह दे दी। प्राइवेट जहाज वालों के ऑफिस में ले गया और थोड़ी ही देर में हमारे पोर्ट ब्लेयर से नील, नील से हैवलॉक और हैवलॉक से पोर्ट ब्लेयर के जहाजों में बुकिंग हो गयी। वैसे हमारे पास सरकारी जहाज से आने-जाने का भी विकल्प था, लेकिन सुना है कि सरकारी और प्राइवेट के किराये में ज्यादा अंतर नहीं होता, तो हमने प्राइवेट में ही बुकिंग कर ली। टिकटों की मारामारी का आलम यह था कि पाँच दिन पहले भी हैवलॉक से पोर्ट ब्लेयर आने के लिये हमें अपने इच्छित समय वाले जहाज में खाली सीट नहीं मिली।

Monday, February 27, 2017

अंडमान यात्रा - दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर

संक्षेप में इस यात्रा को लिखेंगे। काम का बहुत दबाव है और समय की भारी कमी।
प्रत्येक सरकारी कर्मचारी को देश घूमने के लिये सरकार खर्चा देती है। इसे एल.टी.सी. कहते हैं। इसे लेने के इतने सारे नियम होते हैं कि किसी के लिये सभी नियम याद रख पाना संभव नहीं होता। फिर कुछ नियम ऐसे भी हैं जो समय-समय पर बदलते रहते हैं या आगे कुछ समय के लिये विस्तारित होते रहते हैं। मैं एल.टी.सी. के नियम ज्यादा नहीं जानता। वैसे भी चार साल में एक बार या दो बार इस सुविधा का लाभ उठा सकते हैं। अपना चार साल में पचास बार बाहर जाने का काम है। एक बार खर्चा सरकार दे देगी, तो उनचास बार अपनी जेब से ही सब खर्चा करना होता है। तो सरकार द्वारा दी जाने वाली इस सुविधा को मैं अक्सर भूल जाता हूँ।
एल.टी.सी. का एक मास्टर सर्कुलर है अपने यहाँ। मैंने इसे ही पढ़ लिया और इसी के अनुसार टिकट बुकिंग कर ली। यह सर्कुलर कहता है कि अंडमान जाने के लिये आपको दिल्ली से पहले कोलकाता ट्रेन से जाना पड़ेगा और उसके बाद हवाई जहाज से। बाद में ... वापस लौटकर पता चला कि एक अस्थायी नियम भी चल रहा है जिसके अनुसार हम दिल्ली से सीधे पोर्ट ब्लेयर की फ्लाइट भी ले सकते हैं। लेकिन पहले मुझे इस नियम का पता नहीं था, इसलिये कोलकाता तक ट्रेन में बर्थ बुक कर ली और उसके बाद फ्लाइट।



पहले तो सियालदाह दूरंतो में बर्थ बुक की, लेकिन जब वह अठारह-बीस घंटे तक लेट चलने लगी, तो जी घबरा गया। फिर कालका-हावड़ा मेल में बुकिंग कर ली। हावड़ा मेल में मार्जिन ज्यादा था, इसलिये लेट होने की सूरत में फ्लाइट छूटने की संभावना कम थी।
तो 16 जनवरी 2017 की सुबह सात बजे हम पुरानी दिल्ली स्टेशन पर हावड़ा मेल में बैठ गये। सेकंड़ ए.सी. में। अच्छी लगी सेकंड़ ए.सी. श्रेणी। पहली बार सफ़र किया। भीड़भाड़ नहीं। सहयात्री एक बंगाली परिवार था। भला परिवार था। मैंने उन्हें मोबाइल चार्ज करने को अपना बैटरी बैंक दे दिया और मुझे लैपटॉप चार्ज करने के लिये अपने कूपे का चार्जिंग पॉइंट मिल गया। चौबीस घंटे से भी ज्यादा लैपटॉप चार्जिंग पर लगा रहा, लेकिन बंगालियों ने कुछ नहीं कहा।
इलाहाबाद डिवीजन के बारे में कुछ नहीं कहूँगा। इस अकेली डिवीजन ने पूरी भारतीय रेल को बदनाम कर रखा है। मुझे नहीं पता कि केवल इस डिवीजन में ऐसी कौन-सी समस्या है कि दिल्ली से चलने के बाद मुगलसराय तक ट्रेन आठ-दस घंटे लेट होनी ही होनी है।
दूसरे मार्गों की ट्रेनें जैसे श्रीधाम एक्सप्रेस या गोंड़वाना एक्सप्रेस अगर लेट चल रही है, तो उसके कुछ वाज़िब कारण होते हैं, लेकिन इस मार्ग की ट्रेनें अगर लेट हैं तो इस डिवीजन की ख़राब कार्य-प्रणाली के अलावा कोई और कारण नहीं होता।
दिल्ली से सही समय पर चलकर ट्रेन छह घंटे लेट मुगलसराय पहुँची। मुगलसराय में सभी ट्रेनों को इलाहाबाद डिवीजन से छुटकारा मिल जाता है। फिर हावड़ा तक यह छह घंटे ही लेट रही। सुबह आठ बजे हावड़ा पहुँचने थे, दोपहर दो बजे पहुँचे। कल सुबह की फ्लाइट है।
सीधे पहुँचे किसन बाहेती जी की दुकान पर - चाँदनी चौक। कोलकाता में भी चाँदनी चौक है। और हू-ब-हू दिल्ली के चाँदनी चौक जैसा। लेकिन हम उनके लिये ऐसे मनहूस साबित हुए कि हमारे पहुँचते ही उनके बड़े ससुर का निधन हो गया। हमारे लिये आवश्यक निर्देश देकर वे अपनी ससुराल चले गये।
पता नहीं कोलकाता वालों के लिये मेट्रो कितनी ज़रूरी है, लेकिन हमें केवल दीप्ति के लिये इसमें यात्रा करनी थी। टोकन लो और कोई चेकिंग नहीं - सीधे मेट्रो में जा चढ़ो। जमीन के अंदर गैर-वातानुकूलित मेट्रो। किसन जी के अनुसार - “आपका नसीब अच्छा है, तो ए.सी. वाली मेट्रो भी मिल सकती है।” लेकिन हमारा नसीब अच्छा नहीं था।
कमाल की बात है कि कोलकाता की दूसरी मेट्रो लाइनों को भी भारतीय रेल ही बना रही है। भारतीय रेल ने दिल्ली मेट्रो को भी स्वयं संचालित करने की पूरी तैयारी कर रखी थी, लेकिन श्रीधरन साहब ने ऐसा नहीं होने दिया। भारतीय रेल को लग रहा था कि दिल्ली मेट्रो उसके बिना असफल हो जायेगी और तब यहाँ अपनी ई.एम.यू. चलायेंगे। इसके लिये दिल्ली में शाहदरा स्टेशन पर भारतीय रेल और मेट्रो को जोड़ती हुई एक लिंक लाइन भी है।
तो किसन जी के सुझाव के अनुसार हम पहुँचे विक्टोरिया मेमोरियल। पाँच बजे के बाद यहाँ प्रवेश नहीं मिलता और हम इसमें प्रवेश करने वाले आख़िरी यात्री थे। टिकट क्लर्क ने खटाक से खिड़की बंद की और हमारे पीछे खड़े कई यात्रियों को निराशा हाथ लगी। लेकिन हम भी इसके अंदर नहीं जा सके। केवल गार्डन में ही घूमे। जब तक गार्डन और बाहरी साज-सज्जा की चकाचौंध से आँखें हटतीं, मेमोरियल को खाली करने का हुक्म आ गया।
कुछ देर मैदान में बैठे। यह बहुत बड़ा मैदान है। इसके बराबर में ‘मैदान’ मेट्रो स्टेशन भी है। हम उत्तर भारतीयों को खाली ‘मैदान’ शब्द की आदत नहीं होती। कुछ न कुछ जुड़ना चाहिये; जैसे रामलीला मैदान, गाँधी मैदान। मैदान के उस तरफ़ कहीं हुगली नदी बहती है। लेकिन मेरी चप्पलों ने अब तक पैरों को काफ़ी नुकसान पहुँचा दिया था, इस कारण हुगली घाट की तरफ़ नहीं जा सके। ये वहीं चप्पलें थीं जो कुछ समय पहले मैंने इंदौर से सुमित डाक्टर से ली थीं। अंडमान में काफ़ी पैदल घूमना है, इसलिये दूसरी चप्पलें लेनी पड़ेंगी। आज ही यह काम भी कर लिया। और सुमित वाली इन ‘अत्याचारी’ चप्पलों को टॉयलेट चप्पल बना दिया।
एसप्लानेड़ पहुँचे। पता नहीं बंगाली लोग इसकी सही वर्तनी कैसे करते होंगे? मैं तो अभी तक इसे इसप्लानाड़े बोलता हूँ। यहाँ एक बस अड्ड़ा है। ज्यादा बड़ा तो मुझे नहीं लगा, लेकिन हो सकता है कि बहुत बड़ा हो और मुझे न दिखा हो। अंधेरा हो गया था। यहाँ से हमें एयरपोर्ट जाने वाली बस पकड़नी थी और रास्ते में जोड़ा मंदिर उतरकर किसन जी के घर जाना था।
यहीं बस-अड्ड़े पर भूटान की एक बस खड़ी थी। यह भूटान नंबर की सरकारी बस थी और इस पर थिंपू या किसी और शहर की बजाय ‘भूटान’ लिखा था। यह बस थिंपू ही जाती होगी। हमारी दिल्ली से भी पाकिस्तान और नेपाल के लिये सरकारी बसें चलती हैं, लेकिन वे किसी बस-अड्ड़े से न चलकर अलग-अलग स्थानों से चलती हैं। इस तरह कश्मीरी गेट का बस-अड्ड़ा अंतर्राज्यीय ही रह गया, इधर कोलकाता में एसप्लानेड़ का बस-अड्ड़ा अंतर्राष्ट्रीय बस अड्ड़ा हो गया।
कोलकाता में ट्रैफ़िक के क्या कहने! डेढ़ घंटे में नौ किलोमीटर दूरी तय की।
आठ बजे तक किसन जी के यहाँ पहुँच गये। नहाये-धोये और खाना खाया। आधी रात के समय किसन जी वापस लौटे।
अगले दिन यानी 18 जनवरी को टैक्सी से एयरपोर्ट पहुँच गये। काफ़ी सारा सामान किसन जी के यहाँ छोड़ दिया। दीप्ति का यह पहला मौका था हवाई जहाज में बैठने का। पहले आईड़ी चेक, फिर चेक-इन और फिर सिक्योरिटी चेक - पंद्रह मिनट भी नहीं लगे और हम हवाई जहाज में बैठने के अधिकारी हो चुके थे।
कोलकाता से पोर्ट ब्लेयर पहुँचने में दो घंटे लगते हैं। दीप्ति ने खिड़की वाली सीट ले ली। मैंने पूछा - “कितनी देर तक जगी रहेगी?”
“ना, मैं सोऊँगी ही नहीं।”
“आच्छ्या जी, अगर आधा घंटा भी जाग ली, तो बड़ी बात होगी।”
“नहीं, असंभव। मैं बहुत रोमांचित हूँ। खिड़की से नज़र हटाऊँगी ही नहीं।”
“देख लेंगे।”
“देख लेना।”
विमान रन-वे की तरफ़ जब ‘टैक्सी’ हो रहा था, तो दीप्ति ने कहा - “मुझे डर-सा लग रहा है। जब विमान उड़ेगा, तो मेरी चीख भी निकल सकती है।”
“आँख बंद कर लेना। अगर चीख निकल पड़ी तो कहीं ऐसा न हो कि ये लोग दोबारा लैंड़िंग कराकर तुझे अस्पताल भेज दें।”
खैर, विमान ने गति पकड़ी, जमीन छोड़ी और आसमान में उड़ गया। लोग, घर, खेत सब छोटे होते चले गये। फिर समुद्र आ गया, फिर बादल आ गये और नीचे दिखना बंद। नीचे अगर कुछ दिख भी जाता तो सिवाय नीले पानी के अलावा कुछ नहीं। बीस मिनट में ही दीप्ति बोल पड़ी - “धत्त तेरे की। यह होती है विमान यात्रा? इतनी बोरिंग। अब डेढ़ घंटा कैसे कटेगा?”
और वह सो गयी।
आसमान में हवाएँ बड़ी तेज चल रही थीं। इतनी तेज कि विमान ट्रेन की तरह झटके लेने लगा। एयर-होस्टेसों ने चाय-स्नैक्स बेचना बंद कर दिया और यात्रियों को सीट-बैल्ट बाँधने का आदेश दे दिया और स्वयं भी सीट बैल्ट लगाकर बैठ गयीं। उड़ने से पहले इन्होंने सुरक्षा-उपाय भी बताये थे कि यदि विमान को समुद्र पर उतारना पड़ गया तो सभी सीटों के नीचे लाइफ-जैकेट हैं। इन्हें पहनकर आपातकालीन द्वारों से बाहर आना है। मैं भी विमान-यात्रा का इतना बड़ा अनुभवी नहीं हूँ। मुझे भी डर-सा लगने लगा। मलेशिया के उस विमान की याद आने लगी, जो पिछले साल समुद्र में डूब गया था और न कोई जिंदा बचा और न ही कोई उसका सुराग मिला। उसमें भी तो प्रत्येक सीट के नीचे लाइफ-जैकेट रही होंगी।
विमान बादलों के भीतर से होता हुआ जब कुछ नीचे आया तो अंडमान के द्वीप दिखने लगे। फिर और नीचे आया, और नीचे आया और लैंड़िंग के लिये रनवे पर दौड़ लगा दी।
अंडमान की धरती पर कदम रखा तो बूँदाबाँदी हो रही थी। गर्मी तो ज्यादा नहीं थी, लेकिन उमस चरम पर थी।



विक्टोरिया मेमोरियल





कोलकाता भूटान बस
किसन जी के यहाँ रात्रि-भोज

कोलकाता हवाई अड्ड़ा

बादल और समुद्र

जॉली ब्वाय आईलैंड़

जॉली ब्वाय आईलैंड़

मरीन नेशनल पार्क के द्वीप

मरीन नेशनल पार्क के द्वीप





यह पोस्ट लिखने, फोटो एडिट करने और प्रकाशित करने में लगा कुल समय: 2 घंटे 5 मिनट






1. अंडमान यात्रा - दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर
2. अंडमान यात्रा: सेलूलर जेल के फोटो
3. रॉस द्वीप - ऐसे खंड़हर जहाँ पेड़ों का कब्ज़ा है
4. नॉर्थ-बे बीच: कोरल देखने का उपयुक्त स्थान
5. नील द्वीप में प्राकृतिक पुल के नज़ारे
6. नील द्वीप: भरतपुर बीच और लक्ष्मणपुर बीच
7. राधानगर बीच @ हैवलॉक द्वीप
8. हैवलॉक द्वीप - गोविंदनगर बीच और वापस पॉर्ट ब्लेयर
9. अंडमान में बाइक यात्रा: चाथम आरा मशीन
10. अंडमान में बाइक यात्रा: माउंट हैरियट नेशनल पार्क
11. वंडूर बीच भ्रमण
12. अंडमान यात्रा की कुछ वीडियो

Thursday, February 23, 2017

उमेश पांडेय की चोपता तुंगनाथ यात्रा - भाग दो

उमेश पांडेय जी की चोपता-तुंगनाथ यात्रा का पहला भाग पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें

तीसरा दिन:
अपने अलार्म के कारण हम सुबह 5 बजे उठ गए। ठंड़ बहुत थी इसलिए ढाबे वाले से गरम पानी लेकर नहाया। फटाफट तैयार हो कर कमरे से बाहर निकले और ॐ नमः शिवाय बोल कर मंदिर की ओर प्रस्थान किया। यात्रा शुरुआत में तो ज्यादा मुश्किल नहीं थी, पर मेरे लिए थी। इसका कारण था मेरा 90 किलो का भारी शरीर। देबाशीष वैसे तो कोई नशा नहीं करते, पर उन्होंने सिगरेट जलायी। समझ नहीं आ रहा था कि ये सिगरेट पीने के लिए जलायी थी या सिर्फ फोटो के लिए। यात्रा की शुरुआत में घना जंगल है। सुबह 5:30 बजे निकलने के कारण अँधेरा भी था। इसलिए मन में भय था कि किसी भालू जी के दर्शन हो गए तो? पर ऐसा नहीं हुआ।
थोड़ी देर में ही उजाला हो गया। 1 किलोमीटर जाने पर एक चाय की दुकान मिली जिसे एक वृद्ध महिला चला रही थी। वहाँ नाश्ता किया। वहीं एक लाल शरबत की बोतल देखी । पूछने पर पता चला कि यह बुरांश का शरबत है। बुरांश उत्तराखंड़ में पाया जाने वाला फूल है । इसे राजकीय पुष्प का दर्जा भी प्राप्त है। अगर आप मार्च - अप्रैल के महीने में उत्तराखंड़ आये तो बुरांश के लाल फूल बिखरे हुए मिलेंगे।

Monday, February 20, 2017

उमेश पांडेय की चोपता तुंगनाथ यात्रा - भाग एक

मित्र उमेश पांडेय अपनी चोपता तुंगनाथ की यात्रा हम सबके साथ साझा कर रहे हैं। कुछ मामूली करेक्शन के बाद मैंने उनकी संपूर्ण पोस्ट को ज्यों का त्यों प्रकाशित किया है। यह उनका पहला लेख है और अच्छा लिखा है। आप भी आनंद लीजिये।
मानव शुरू से ही घुमक्कड़ प्रजाति का प्राणी रहा है। आदि काल से ही मानव ने नए-नए स्थानों की खोज की है। इन्हीं खोजों के दौरान कई नगरों का निर्माण भी हुआ। उनमे से अधिकांश ने अपने रहने का ठिकाना बना लिया और कुछ आज भी खानाबदोशों की तरह घूम रहे हैं।
मेरी घूमने-फिरने में रुचि हमेशा से ही रही है। हमेशा प्रयास रहता है कि जैसे ही समय मिले किसी स्थान की यात्रा पर निकल जाया जाये। लेकिन कभी छुट्टी तो कभी पैसों की तंगी के कारण कम ही जा पाता हूँ। मई 2016 में चम्बा और टिहरी बांध की यात्रा की थी। उसके बारे में कभी बाद में लिखूँगा।
पिछले एक वर्ष से नीरज जी का ब्लॉग ‘मुसाफिर हूँ यारों’ फॉलो कर रहा हूँ। बहुत अच्छा लिखते हैं। ब्लॉग पर ही इनके यात्रा संस्मरण ‘लद्दाख की पैदल यात्राएँ’ जो कि एक किताब है, के बारे में पता चला और ऑर्डर कर दी। यात्रा के विचार से तो मन घूम ही रहा था, किताब पढ़ते ही घुमक्कड़ी का भूत जाग उठा। 18 सितंबर का दिन था, जब तुंगनाथ यात्रा योजना बना ली और यात्रा का दिन निर्धारित किया 29 सितंबर से 2 अक्टूबर 2016। इन चार दिनों में 2 साप्ताहिक अवकाश, 1 कैजुअल लीव और बाकी का एक दिन हाफ डे।

Thursday, February 16, 2017

बरसूड़ी - एक गढ़वाली गाँव

9 जनवरी, दिन सोमवार, रात नौ बजे के आसपास अचानक पता चला कि बीनू कुकरेती के साथ ललित शर्मा, अजय और धर्मवीर माथुर उसके गाँव बरसूड़ी जा रहे हैं। उस समय मैं नाइट ड्यूटी जाने की तैयारी कर रहा था और नहाने ही वाला था। हालाँकि मुझे बीनू और ललित जी की इस यात्रा का पहले से पता था, लेकिन अब एकदम मेरा भी जाने का मन बन गया। आज नाइट करूँगा, तो कल मंगलवार पूरे दिन फ्री रहूँगा और परसों बुधवार मेरा साप्ताहिक अवकाश रहता है। एक भी छुट्टी नहीं लेनी पड़ेगी।
उधर शिमला समेत पूरे पश्चिमी हिमालय में भारी बर्फ़बारी हो रही थी। ऐसे में हमारा भी शिमला जाने का मन बनने लगा था। लेकिन कुछ ही दिन बाद होने वाली अंडमान यात्रा के मद्देनज़र शिमला जाना रद्द कर दिया। अब जब अचानक दीप्ति से बरसूड़ी चलने के बारे में बताया तो वह खुश हो गयी।
उधर बीनू, ललित जी और माथुर साहब कश्मीरी गेट से कोटद्वार वाली बस में बैठ चुके थे। मोहननगर से अजय भी इसी बस को पकड़ेगा। जब मैंने अजय को फोन किया तो वह निकलने ही वाला था। सुबह कार से चलने के मेरे आग्रह को उसने तुरंत मान लिया और इसकी सूचना बाकियों को भी दे दी।

Monday, February 13, 2017

बाइक यात्रा: रामदेवरा - बीकानेर - राजगढ़ - दिल्ली

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21 दिसंबर 2016
हमारी आज की योजना थी कि पहले फलोदी के पास खींचण गाँव जायेंगे और वहाँ प्रवासी पक्षियों को देखेंगे। खींचण के निवासी इन पक्षियों को मेहमान की तरह मानते हैं और उसी तरह इनकी देखभाल करते हैं। उसके बाद रात होने तक बीकानेर पहुँचेंगे और कुलवंत जी के यहाँ रुकेंगे। कल देशनोक में करणी माता का मंदिर देखेंगे, जिसे चूहों का मंदिर भी कहा जाता है। परसों यानी 23 तारीख़ को दिल्ली पहुँचकर ड्यूटी जॉइन कर लूँगा।
लेकिन इस कार्यक्रम में परिवर्तन करना पड़ा। कारण था कि 24 और 25 दिसंबर को झाँसी के पास ओरछा में एक घुमक्कड़ सम्मेलन होना था। इनमें बहुत सारे मेरे मित्र थे और इनमें भी कई तो सपरिवार आने वाले थे। मेरा दिल्ली से झाँसी जाने का आरक्षण नहीं था, लेकिन झाँसी से दिल्ली वापस आने का आरक्षण था और झाँसी में रेलवे विश्राम गृह में एक कमरा भी बुक था। हालाँकि आयोजकों ने ओरछा में भी कमरों की व्यवस्था कर रखी थी, लेकिन ये हमारे बजट से बाहर थे। तो इस तरह मैं 23 की दोपहर तक दिल्ली पहुँचता, लगातार 16 घंटों की ड्यूटी करता और ओरछा के लिये निकल जाता। एक लंबी बाइक यात्रा के तुरंत बाद इतनी लंबी ड्यूटी करना, वो भी रात में, बेहद मुश्किल कार्य है। यही सब सोचकर तय किया कि एक दिन पहले ही दिल्ली पहुँचना ठीक रहेगा। खींचण जाना रद्द कर दिया।

Saturday, February 11, 2017

थार बाइक यात्रा: वीडियो-6

आज की वीड़ियो... वही अपनी थार में बाइक राइड़िंग की... अच्छा लगता है ऐसी सड़कों पर बाइक चलाना...


Friday, February 10, 2017

थार बाइक यात्रा: वीडियो-5

थार मरुस्थल में खुद को धूप से बचाने का भेड़ों का यह व्यवहार हमें पसंद आया:

Thursday, February 9, 2017

वुड़ फॉसिल पार्क, आकल, जैसलमेर

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20 दिसंबर 2012
हम तनोट में थे। सुबह उठे तो मंदिर में आरती समाप्त होने वाली थी। जाकर एक बार फिर दर्शन किये और प्रसाद लिया। कैंटीन में चाय पी और निकल पड़े - अपने दिल्ली वापसी के सफ़र पर। तनोट से निकलते ही घंटियाली माता का मंदिर है। रेत का ऊँचा धोरा भी है। अच्छी लोकेशन पर है यह मंदिर। इसकी भी देखरेख बी.एस.एफ. ही करती है। इसलिये फोटो लेने पर कोई रोक नहीं।
सड़क दो-लेन की है, बेहद शानदार बनी है। पिछली बार जब मैं साइकिल से आया था, तो यह सिंगल थी और इसे दोहरा बनाने का काम चल रहा था।
रास्ते में रणाऊ गाँव आता है। यह भी रेत के टीलों से घिरा है और इसकी स्थिति भी फोटोग्राफी के लिये शानदार है। कहते हैं कि यहाँ कुछ फिल्मों की भी शूटिंग हो चुकी है।

Wednesday, February 8, 2017

थार बाइक यात्रा: वीडियो-4

म्याजलार सड़क पर रेत के टीले के बीच से निकलती सड़क पर बाइक चलाने की वीड़ियो:


Monday, February 6, 2017

जैसलमेर से तनोट - एक नये रास्ते से

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19 दिसंबर 2016
आज हम यात्रा करेंगे जैसलमेर से तनोट तक, लेकिन परंपरागत रास्ते से नहीं बल्कि निहायत नये और अनछुए रास्ते से।
जैसलमेर-सम रोड़ पर जहाँ से लोद्रवा की सड़क अलग होती है, वहाँ कुछ दूरियाँ लिखी थीं। इनमें प्रमुख था आसूतार 94 किलोमीटर। हमारी योजना इसी सड़क पर आसूतार, घोटारू, लोंगेवाला होते हुए तनोट जाने की थी। मैं सैटेलाइट से पहले ही इस सड़क की स्थिति देख चुका था। यह पूरी सड़क पक्की बनी है। इंटरनेट पर इसका कोई भी यात्रा-वृत्तांत नहीं मिलता।
लोद्रवा से आगे छत्रैल है और फिर कुछड़ी है। कुछड़ी में एक टी-पॉइंट है - बाये सड़क सम जाती है और दाहिने आसूतार। अगर कल हम सम रुकते, तो शायद सीधे इधर ही आते। हम दाहिने मुड़ गये।
थोड़ा आगे हाबुर गाँव है। यहाँ से सीधी सड़क जैसलमेर-तनोट रोड़ में मोकल के पास जाकर मिल जाती है और बायें जाने वाली सड़क आसूतार जाती है। यहाँ से हम भी आसूतार का पीछा करते-करते बायें मुड़ गये।
दो-लेन की यह सड़क सीमा सड़क संगठन ने बनायी है और बेहद शानदार बनी है। राजस्थान के इस सुदूर इलाके में जरा भी यातायात नहीं है। कभी-कभार कोई जीप आ जाती, जिससे स्थानीय निवासी आना-जाना करते हैं। बस कोई नहीं दिखी।