Monday, December 4, 2017

नागपुर-अमरावती पैसेंजर ट्रेन यात्रा

22 अगस्त 2017
मैं केरल एक्स में हूँ, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि केरल जा रहा हूँ। सुबह चार बजे नागपुर उतरूँगा और पैसेंजर ट्रेन यात्रा आरंभ कर दूँगा। कल क्या करना है, यह तो कल की बात है। तो आज क्यों लिखने लगा? बात ये है कि बीना अभी दूर है और मुझे भूख लगी है। आज पहली बार ऑनलाइन खाना बुक किया। असल में मैंने ग्वालियर से ही खाना बुक करना शुरू कर दिया था, लेकिन मोबाइल को पता चल गया कि अगला खाने की फ़िराक में है। नेट बंद हो गया। सिर्फ टू-जी चल रहा था, वो भी एक के.बी.पी.एस. से भी कम पर। झक मारकर मोबाइल को साइड में रख दिया और नीचे बैठी हिंदू व जैन महिलाओं की बातें सुनने लगा। पता चला कि सोनागिर एक जैन तीर्थ है और जैन साधु यहाँ चातुर्मास करते हैं। कहीं पहाड़ी की ओर इशारा किया और दोनों ने हाथ भी जोड़े।
हाँ, हाथ जोड़ने से याद आया। सुबह सात बजे जब मैं ऑफिस से घर पहुँचा तो देखा कि दीप्ति जगी हुई है। इतनी सुबह वह कभी नहीं जगती। मैं आश्चर्यचकित तो था ही, इतने में संसार का दूसरा आश्चर्य भी घटित हो गया। बोली - “आज हनुमान मंदिर चलेंगे दोनों।” कमरे में गया तो उसने दीया भी जला रखा था और अगरबत्ती भी। मैं समझ गया कि सपना देख रहा हूँ। अभी मैं घर पहुँचा ही नहीं हूँ और ऑफिस में ही लुढ़क गया हूँ। सपने में यह सब दिख रहा है।

Friday, December 1, 2017

तीसरी किताब: पैडल पैडल

आज हम बतायेंगे कि मेरी तीसरी किताब ‘पैडल पैडल’ की क्या हिस्ट्री रही और यह कैसे अस्तित्व में आयी।
पहली किताब छपी थी अप्रैल 2016 में, नाम था ‘लद्दाख में पैदल यात्राएँ’। उसी समय सोच लिया था और बहुत सारे मित्रों की भी इच्छा थी कि लद्दाख साइकिल यात्रा को भी पुस्तकाकार बनाना चाहिये। लद्दाख में साइकिल चलाना वाकई एक विशिष्ट अनुभव होता है और इसकी किताब भी अवश्य प्रकाशित होनी चाहिये। लेकिन जून 2016 में एवरेस्ट बेसकैंप की ट्रैकिंग कर ली और वहाँ से लौटकर उसके अनुभवों को लिखने में लग गया। वह मार्च 2017 में पूरी हुई और हिंदयुग्म प्रकाशन को भेज दी। मैं चाहता था कि अप्रैल में ही एवरेस्ट वाली किताब आ जाये, लेकिन तय हुआ कि यह किताब जुलाई 2017 में आयेगी।
अब मैं लगभग खाली था। ‘लद्दाख साइकिल यात्रा’ फिर से याद आयी। यह यात्रा पहले ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुकी थी। इसके शब्द गिने - लगभग 30000 मिले। इतने शब्दों में 200 पृष्ठों की किताब नहीं बन सकती। इसका अर्थ है कि शब्द बढ़ाने पड़ेंगे। और ऐसे कहने से ही शब्द नहीं बढ़ते। वो वृत्तांत चार साल पहले लिखा था। अब तक मेरी लेखन शैली में भी कुछ परिवर्तन आ चुका था। यह परिवर्तन पाठकों को महसूस नहीं होना चाहिये। ऐसा करते-करते अप्रैल भी निकल गया और मई, जून, जुलाई भी।

Monday, November 27, 2017

ऋषिकेश से दिल्ली काँवड़ियों के साथ-साथ

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19 जुलाई 2017
आज का पूरा दिन हमारे पास था और हमें दिल्ली पहुँचने की कोई जल्दी नहीं थी। मैंने सोच लिया था कि आज अपनी काँवड़ यात्रा के दिनों को पूरी तरह जीऊँगा। मैं चार बार हरिद्वार से मेरठ और एक बार हरिद्वार से पुरा महादेव तक पैदल काँवड़ ला चुका हूँ। तो मैं भावनात्मक रूप से इस यात्रा से जुड़ा हुआ हूँ। आप अगर कभी भी काँवड़ नहीं लाये हैं तो समझ लीजिये कि इस यात्रा की खामियों और खूबियों को मैं आपसे बेहतर जानता हूँ। आज का समय न्यूज चैनलों का है और वे बदमाशों को काँवड़ियों का नाम देकर आपको दिखा देते हैं और आप मान लेते हैं कि काँवड़िये बदमाश होते हैं। मेरे लिये केवल पैदल और साइकिल यात्री ही काँवड़िये हैं; बाकी बाइक वाले, डाक काँवड़ वाले केवल उत्पाती लोग हैं। और इन्हीं लोगों के कारण पवित्र काँवड़ यात्रा अपमानित होती है। चूँकि हम भी बाइक पर ही थे, इसलिये इस श्रेणी में हम भी आसानी से आ सकते हैं, लेकिन हमारा काँवड़ यात्रा से कोई संबंध नहीं था। न हम गंगाजल लिये थे, न हमें किसी शिवमंदिर में जाना था और न ही हम अपनी यात्राओं के लिये सावन के मोहताज़ थे। हमारी बाइक पर साइलेंसर भी लगा था, सिर पर हेलमेट भी था और बाइक के कागज भी पूरे थे। तो हम शरीफ़ इंसान थे। यदि हम हेलमेट न भी लगाते, तब भी दिल्ली तक कोई हमें रोकने-टोकने वाला नहीं था, क्योंकि इतनी भीड़ में पुलिस केवल हालात पर नज़र रखे थी, किसी को रोक नहीं रही थी।

Saturday, November 25, 2017

पुस्तक-चर्चा: पग पग सनीचर

एक व्हाट्सएप घुमक्कड़ी ग्रुप है। और जैसा कि व्हाट्सएप के सभी ग्रुपों में होता है, इसमें भी देशभर के कुछ घुमक्कड़ मिलकर एक-दूसरे की टांग-खिंचाई में तल्लीन रहते थे। किसी जमाने में मैं भी इस ग्रुप का सदस्य था और दूसरों की खूब टांग खींचा करता था और जब दूसरा कोई मेरी खिंचाई कर देता, तो मैं ग्रुप छोड़कर भाग जाता था। तो ऐसे ही यह ग्रुप चल रहा था। चूँकि इसके सदस्य देशभर में रहते हैं तो कोई कहीं भी घूमने जाता, कंपनी मिल ही जाती थी।
फिर इस ग्रुप में प्रवेश हुआ ललित शर्मा जी का। और उन्होंने नारा दिया - “कुछ अलग-सा करते हैं।” और अलग-सा करते-करते यह किताब बन गयी - पग पग सनीचर। इसमें उस ग्रुप के तीस सदस्यों के यात्रा-वृत्तांत व यात्रा-लेख हैं। यह संग्रह इसलिये भी खास है, क्योंकि दो-तीन लेखक ही इससे पहले ब्लॉग या समाचार-पत्रों में नियमित लिखते थे। बाकी ज्यादातर ने कभी भी सीरियसली नहीं लिखा। और इस किताब में सभी ने वाकई सीरियसली लिखा है। उम्मीद है कि इसके सभी लेखक आगे भी इसी तरह लिखते रहेंगे और हमें भविष्य में बहुत सारे यात्रा-वृत्तांत पढ़ने को मिलेंगे।

Wednesday, November 22, 2017

मेरी दूसरी किताब: हमसफ़र एवरेस्ट

 जून 2016 में एवरेस्ट बेसकैंप की यात्रा से लौटने के बाद बारी थी इसके अनुभवों को लिखने की। अमूमन मैं यात्रा से लौटने के बाद उस यात्रा के वृत्तांत को ब्लॉग पर लिख देता हूँ, लेकिन इस बार ऐसा नहीं किया। इरादा था कि इसे पहले किताब के रूप में प्रकाशित करेंगे।
लिखने का काम मार्च 2017 तक पूरा हुआ। अब बारी थी प्रकाशक ढूँढ़ने की। सबसे पहले याद आये हिंदयुग्म के संस्थापक शैलेश भारतवासी जी। पिछले साल जब मैं ‘लद्दाख में पैदल यात्राएँ’ लिख चुका था, तब भी शैलेश जी से ही संपर्क किया था। तब हिंदयुग्म नया-नया शुरू हुआ था और बुक पब्लिशिंग में ज्यादा आगे भी नहीं था। तब उन्होंने कहा था - “नीरज, अभी हमारा मार्केट बहुत छोटा-सा है। अच्छा होगा कि तुम किसी बड़े प्रकाशक से किताब प्रकाशित कराओ।” और ‘लद्दाख में पैदल यात्राएँ’ दस हज़ार रुपये देकर सेल्फ पब्लिश करानी पड़ी थी।
तो इस बार भी शैलेश जी से ही सबसे पहले संपर्क किया। अब तक हिंदयुग्म एक बड़ा प्रकाशक बन चुका था और बाज़ार में अच्छी पकड़ भी हो चुकी थी। इनकी कई किताबें तो बिक्री के रिकार्ड तोड़ रही थीं।

Monday, November 20, 2017

फूलों की घाटी से वापसी और प्रेम फ़कीरा

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17 जुलाई 2017
आज का दिन कहने को तो इस यात्रा का आख़िरी दिन था, लेकिन छुट्टियाँ अभी भी दो दिनों की बाकी थीं। तो सोचने लगे कि क्या किया जाये? एक दिन और कहाँ लगाया जाये? इसी सोच-विचार में मुझे उर्गम और कल्पेश्वर याद आये। दीप्ति से कहा - “चल, आज तुझे एक रमणीक स्थान पर ले चलता हूँ।”
पेट भरकर नौ बजे के आसपास घांघरिया से वापस चल दिये। मौसम एकदम साफ था।
कुछ सरदार घांघरिया की तरफ जा रहे थे। आपस में बात कर रहे थे - “हिमालय परबत इदरे ही है क्या?” दूसरे ने उत्तर दिया - “नहीं, मनाल्ली की तरफ है। इदर केवल हेमकुंड़ जी हैं।”

Monday, November 13, 2017

फूलों की घाटी के कुछ फोटो व जानकारी

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फूलों की घाटी है ही इतनी खूबसूरत जगह कि मन नहीं भरता। आज कुछ और फोटो देखिये, लेकिन इससे पहले थोड़ा-बहुत पढ़ना भी पड़ेगा:
बहुत सारे मित्र फूलों की घाटी के विषय में पूछताछ करते हैं। असल में अगस्त वहाँ जाने का सर्वोत्तम समय है। तो अगर आप भी अगस्त के महीने में फूलों की घाटी जाने का मन बना रहे हैं, तो यह आपका सर्वश्रेष्ठ निर्णय है। लेकिन अगस्त में नहीं जा पाये, तब भी कोई बात नहीं। सितंबर में ब्रह्मकमल के लिये जा सकते हैं। और जुलाई भी अच्छा समय है। बाकी समय अच्छा नहीं कहा जा सकता। तो कुछ बातें और भी बता देना उचित समझता हूँ:
1. जोशीमठ-बद्रीनाथ मार्ग पर जोशीमठ से 20 किलोमीटर आगे और बद्रीनाथ से 30 किलोमीटर पीछे गोविंदघाट है। यहाँ से फूलों की घाटी का रास्ता जाता है। हरिद्वार और ऋषिकेश से गोविंदघाट तक बेहतरीन दो-लेन की सड़क बनी है। दूरी, समय और जाने के साधन के बारे में आप स्वयं निर्णय कर लेना।

Thursday, November 9, 2017

पुस्तक-चर्चा: बादलों में बारूद

मज़ा आ गया। किताब का नाम देखने से ऐसा लग रहा है, जैसे कश्मीर का ज़िक्र हो। आप कवर पेज पलटोगे, लिखा मिलेगा - यात्रा-वृत्तांत। लेकिन अभी तक मुझे यही लग रहा था कि कश्मीर का यात्रा-वृत्तांत ही होगा। लेकिन जैसे ही ‘पुस्तक के बारे में’ पढ़ा, तो मज़ा आ गया। इसमें तो झारखंड़ के जंगलों से लेकर लद्दाख और सुंदरवन तक के नाम लिखे हैं।

पहले सभी यात्राओं का थोड़ा-थोड़ा परिचय करा दूँ:
1. जंगलों की ओर
झारखंड़ में छत्तीसगढ़ सीमा के एकदम पास गुमला जिले में बिशुनपुर के पास जंगलों की यात्रा का वर्णन है।

Monday, November 6, 2017

फूलों की घाटी

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16 जुलाई 2017
आज का दिन तो बड़ा ही शानदार रहा। कैसे शानदार रहा? बताऊंगा धीरे-धीरे। बताता-बताता ही बताऊंगा।
रात 2 बजे आँख खुली। बाहर बूंदों की आवाज़ आ रही थी। बारिश हो रही थी। सोचा कि सुबह तक मौसम अच्छा हो जाएगा। सो गया। फिर 6 बजे आँख खुली। बारिश अभी भी हो रही थी। उठकर दरवाजा खोलकर देखा। बादल और रिमझिम बारिश। इसके बावजूद भी यात्रियों का आना-जाना। कुछ यात्री नीचे गोविंदघाट भी जा रहे थे और कुछ ऊपर हेमकुंड भी जाने वाले थे। हमें किसी भी तरह की जल्दी नही थी। कल ही सोच लिया था कि बारिश में कहीं भी नही जाएंगे। न फूलों की घाटी और न गोविंदघाट। वापस दरवाजा लगाया और सो गया।
आठ बजे आँख खुली। उतनी ही बारिश थी, जितनी दो घंटे पहले थी। लेकिन इस बार मैं नीचे चला गया और एक बाल्टी गर्म पानी को कह आया। साथ ही यह भी कह दिया कि आज भी हम यहीं रुकेंगे। होटल मालिक बड़ी ही विचित्र प्रकृति का है। आप कुछ भी कहें, वह आपका उत्साह ही बढ़ाएगा। मसलन आप बारिश में हेमकुंड जाना चाह रहे हैं, वह आपको जाने को कहेगा। और बारिश की वजह से नहीं जाना चाह रहे हैं, तो आपसे रुक जाने को कह देगा। तो मुझसे भी उसने कह दिया कि बारिश में नहीं जाना चाहिए।

Thursday, November 2, 2017

ट्रेन में बाइक कैसे बुक करें?

अक्सर हमें ट्रेनों में बाइक की बुकिंग करने की आवश्यकता पड़ती है। इस बार मुझे भी पड़ी तो कुछ जानकारियाँ इंटरनेट के माध्यम से जुटायीं। पता चला कि टंकी एकदम खाली होनी चाहिये और बाइक पैक होनी चाहिये - अंग्रेजी में ‘गनी बैग’ कहते हैं और हिंदी में टाट। तो तमाम तरह की परेशानियों के बाद आज आख़िरकार मैं भी अपनी बाइक ट्रेन में बुक करने में सफल रहा। अपना अनुभव और जानकारी आपको भी शेयर कर रहा हूँ। हमारे सामने मुख्य परेशानी यही होती है कि हमें चीजों की जानकारी नहीं होती।
ट्रेनों में दो तरह से बाइक बुक की जा सकती है: लगेज के तौर पर और पार्सल के तौर पर।
पहले बात करते हैं लगेज के तौर पर बाइक बुक करने का क्या प्रोसीजर है। इसमें आपके पास ट्रेन का आरक्षित टिकट होना चाहिये। यदि आपने रेलवे काउंटर से टिकट लिया है, तब तो वेटिंग टिकट भी चल जायेगा। और अगर आपके पास ऑनलाइन टिकट है, तब या तो कन्फर्म टिकट होना चाहिये या आर.ए.सी.। यानी जब आप स्वयं यात्रा कर रहे हों, और बाइक भी उसी ट्रेन में ले जाना चाहते हों, तो आरक्षित टिकट तो होना ही चाहिये। इसके अलावा बाइक की आर.सी. व आपका कोई पहचान-पत्र भी ज़रूरी है। मतलब इनकी मूल प्रति के साथ फोटोकॉपी भी। इसके अलावा बाइक आपके ही नाम पर होनी चाहिये।
ट्रेन के प्रस्थान समय से पर्याप्त समय पहले आप अपने प्रस्थान स्टेशन के पार्सल कार्यालय पहुँचिये। बाइक को पैक कराईये। आपका चेहरा देखते ही पार्सल कार्यालय के बाहर जमा दलाल आपको पहचान लेंगे। आप उनसे अपनी बाइक को पैक करा सकते हैं। नई दिल्ली पर इस काम के 150-200 रुपये लगते हैं। मोलभाव करने पर शायद कुछ कम हो जायें। टंकी में अगर थोड़ा-बहुत पेट्रोल भी होगा, उसे ये लोग अपने-आप निकाल देंगे। आप पेट्रोल और पैकिंग की तरफ़ से निश्चिंत रहिये। लेकिन दलाल आपको इतने तर्क देंगे कि आप विचलित हो जायेंगे और इनके चक्कर में भी आ जायेंगे। लेकिन आप सीधे पार्सल कार्यालय से एक फॉर्म लेकर इसे भरिये। अपने पहचान-पत्र व आर.सी. की फोटोकॉपी लगाकर कार्यालय में जमा कर दीजिये। आपसे पी.एन.आर. पूछा जायेगा, निर्धारित राशि ली जायेगी और आपको रसीद थमा दी जायेगी। इसका मतलब आपकी बाइक बुक हो गयी।
लेकिन बाइक बुक होने का अर्थ यह नहीं है कि जिस ट्रेन में आप यात्रा करने वाले हैं, बाइक भी उसी ट्रेन में भेजी जायेगी। प्रत्येक ट्रेन में लगेज के अमूमन दो डिब्बे होते हैं - एक सबसे आगे और दूसरा सबसे पीछे। एक डिब्बे में अधिकतम दो बाइकें ही लादी जा सकती हैं। यानी एक ट्रेन में अधिकतम चार बाइकें। यहाँ मुझे थोड़ा संदेह है। या तो एक डिब्बे में दो बाइकें जा सकती हैं या पूरी ट्रेन में दो बाइकें। चाहे कुछ भी हो, इसका अर्थ यह है कि अगर पहले ही पर्याप्त बाइकें इस ट्रेन के लिये बुक हो चुकी हैं, तो आपकी बाइक को इस ट्रेन से नहीं भेजा जायेगा। मुझे बताया गया कि कई बार तो बुकिंग इतनी ज्यादा हो जाती हैं कि नई दिल्ली पर एक-एक महीने बाद बाइकों को ट्रेन में चढ़ाने का नंबर आता है।
अब आते हैं दूसरे तरीके पर - बाइक को पार्सल में बुक करने का क्या प्रोसीजर है। इसमें आपके पास टिकट होना आवश्यक नहीं है। सीधे पार्सल कार्यालय जाइये। बाइक की पैकिंग कराईये। फॉर्म भरिये, आर.सी. और अपने पहचान-पत्र की फोटोकॉपी लगाईये। निर्धारित शुल्क अदा कीजिये और बाइक बुक हो गयी। प्रोसीजर तो दोनों का लगभग एक-सा ही है। लेकिन आप आगे पढ़ेंगे तो लगेज व पार्सल में अंतर पता चल जायेगा।
आगे बढ़ने से पहले एक बात और बता दूँ। कोई ट्रेन दिल्ली से हावड़ा जा रही है। इसमें दिल्ली से हावड़ा के लिये दो बाइक लोड़ कर दी गयीं। यानी अब इस ट्रेन में और ज्यादा बाइकें नहीं चढ़ायी जा सकतीं। आप अगर कानपुर से अपनी बाइक की बुकिंग करेंगे तो पता नहीं हावड़ा पहुँचने में कितना समय लग जायेगा। इलाहाबाद से बुक करेंगे, तब भी पता नहीं। क्योंकि लगेज वाला डिब्बा पीछे से ही पूरा भरा आ रहा है। नंबर दो बात - यदि आपने हावड़ा जा रही ट्रेन में अपनी बाइक पटना तक ही बुक की, तो शायद इसे पटना में न उतारा जाये। धनबाद तक बुक की है तो शायद धनबाद में न उतारा जाये। क्योंकि ट्रेन का ठहराव 5 मिनट का है, और इतने समय में लगेज वाले डिब्बे का केवल दरवाजा ही खुलता है। तो काफी संभावना है कि आपकी बाइक आगे कहीं उतारी जायेगी और दूसरी किसी ट्रेन से या लोकल ट्रेन से वापस धनबाद लायी जायेगी। इसलिये बेहतर है कि बाइकों की बुकिंग हमेशा एंड-टू-एंड ही करें। भले ही आपको अपनी योजना में कुछ फेरबदल ही क्यों न करना पड़े। आपको बाइक पटना ले जानी है तो हावड़ा जाने वाली या गुवाहाटी जाने वाली किसी भी ट्रेन में बुकिंग न करें, केवल पटना तक जाने वाली ट्रेन में ही बुकिंग करें।
मुझे भी अपनी बाइक ले जाने से पहले इतनी ही जानकारी थी। आप इंटरनेट पर सर्च करेंगे तो यही जानकारी मिलेगी। मेरा दिल्ली से गुवाहाटी का हवाई टिकट बुक है - 7 नवंबर 2017 का। आज थी 1 नवंबर 2017। यानी मैं गुवाहाटी तक ट्रेन से नहीं जाऊंगा। तो योजना बनायी कि बाइक को नई दिल्ली से डिब्रूगढ़ तक भेजते हैं। डिब्रूगढ़ तक केवल तीन ही ट्रेनें हैं - राजधानी, ब्रह्मपुत्र मेल और अवध असम। अवध असम पीछे से आती है, इसलिये इससे बाइक भेजना मैंने सोचा तक नहीं। बची राजधानी और ब्रह्मपुत्र मेल। ब्रह्मपुत्र मेल के मुकाबले राजधानी में बाइक भेजना 25 प्रतिशत महंगा पड़ता है, लेकिन मैंने राजधानी से ही फाइनल किया। ब्रह्मपुत्र मेल बहुत ज्यादा स्टेशनों पर रुकती है। बहुत ज्यादा सामान चढ़ाया भी जायेगा और बहुत ज्यादा सामान उतारा भी जायेगा। इससे बाइक को नुकसान पहुँच सकता है। दूसरी बात, भूलवश बाइक को बीच में किसी स्टेशन पर उतारा भी जा सकता है। बाद में भूल-सुधार करके अगले दिन या चार दिन बाद भेज देंगे। इसके विपरीत राजधानी कम स्टेशनों पर रुकती है। महंगा सामान ही इससे ट्रांसफर किया जाता है, तो बाइक भली प्रकार डिब्रूगढ़ पहुँच जायेगी।
हमें हमेशा हर परिस्थिति के लिये तैयार रहना चाहिये। दूसरों को दोष देने से बेहतर है परिस्थिति को स्वीकार करना।
...
एक घनिष्ठ मित्र के माध्यम से नई दिल्ली पार्सल कार्यालय में जान-पहचान हो गयी। पार्सल कार्यालय जाते ही बाइक पैक हो गयी। इसी में हमने टंकी पर चिपकाया जाने वाला टैंक बैग और हवा भरने वाला पंप भी पैक कर दिया। साथ ही पंचर किट व ज़रूरी टूल भी। हेलमेट भी पैक करने का मन था, लेकिन मना कर दिया गया।
लेकिन सभी काम हमारे चाहने भर से नहीं हुआ करते। हमारे सामने भी एक समस्या आ गयी। बात ये है कि दिल्ली एन.सी.आर. में पार्सल की बुकिंग रेलवे नहीं करता, केवल लगेज की ही बुकिंग करता है। पार्सल और लगेज क्या होता है, वो आपको बता ही चुका हूँ। हमें अपनी बाइक पार्सल में ही बुक करनी थी। यहाँ से देशभर के लिये बहुत ज्यादा सामान बुक होता है, तो रेलवे ने पार्सल बुकिंग को लीज़ पर दे रखा है। इसके लिये रेलवे टेंडर निकालता है। जो ठेकेदार सबसे ज्यादा बोली लगाता है, उसे ही ठेका मिलता है। कई बार तो केवल एक डिब्बे का ठेका डेढ़ लाख रुपये तक लग जाता है।
मैंने पूछा - “डेढ़ लाख रुपये वार्षिक या मासिक?”
उत्तर मिला - “दैनिक।”
मेरी आँखें फटी रह गयीं। डेढ़ लाख रुपये एक डिब्बे का एक दिन का ठेका! अमूमन दो डिब्बे होते हैं - एक डिब्बा ठेकेदार को दे दिया जाता है और दूसरे डिब्बे में रेलवे स्वयं लगेज बुकिंग करता है। ज़ाहिर है कि ठेकेदार के रेट रेलवे के रेट से ज्यादा ही होंगे। यानी लगेज बुकिंग के मुकाबले पार्सल बुकिंग महंगी पड़ती है। यह नियम दिल्ली एन.सी.आर. में है, देश के दूसरे हिस्सों में कहीं है, कहीं नहीं है।
“तो जी, हम आपकी बाइक की बुकिंग नहीं कर सकते। एक बार ठेकेदार से बात करके उसके रेट पता कर लेते हैं।”
कुछ ही देर में ठेकेदार के रेट आ गये - नई दिल्ली से डिब्रूगढ़ तक राजधानी एक्सप्रेस में - दस हज़ार रुपये।
हमारे रेलवे वाले मित्र ने ठेकेदार से पूछा - “यार, तुम स्टाफ की बाइक को भी इसी रेट पर ही भेजोगे? कुछ तो डिस्काउंट दो यार।”
ठेकदार ने बताया - “साब, डेढ़ लाख रुपये की लीज़ है और हमारे पास माल की लाइन लगी पड़ी है। दस हज़ार से पंद्रह हज़ार तो कर सकता हूँ, लेकिन कम नहीं कर सकता।”
सन्नाटा।
अब क्या करें? क्या कहा आपने? कोई रास्ता ही नहीं है?
जनाब, दो रास्ते थे मेरे सामने उस समय। आप इस समय उस इंसान को पढ़ रहे हैं, जिसने अपनी ज़िंदगी समाधान-प्रधान बना रखी है, समस्या-प्रधान नहीं।
मोबाइल में फटाफट अंगूठा घुमाया। कुछ टाइप किया और एंटर मार दिया। संपर्क क्रांति, 200+ वेटिंग, 755 रुपये। सामने ही एक चार्ट था जिसमें विभिन्न स्थानों पर सामान भेजने की स्टैंडर्ड रेट-लिस्ट लगी थी। गुवाहाटी के रेट थे 2700 रुपये। 2700 में 755 जोड़ दिये - 3455 रुपये। 3500 मान लेते हैं।
“पार्किंग शुल्क कितना है?”
“10 रुपये घंटा।”
“यानी एक दिन के 240 रुपये और चार दिनों के 960 रुपये। 1000 मान लेते हैं। मैं अभी काउंटर से जाकर आज की संपर्क क्रांति का वेटिंग टिकट बनवाकर लाता हूँ। परसों यानी 3 तारीख़ को बाइक गुवाहाटी पहुँच जायेगी। हम 7 को पहुँचेंगे। गुवाहाटी में चार दिनों के 1000 रुपये पार्किंग शुल्क दे देंगे। कुल मिलाकर 4500 रुपये में बाइक गुवाहाटी पहुँच जायेगी।”
सन्नाटा।
दूसरा रास्ता था - बाइक नहीं ले जानी। तब क्या करते, वो बाद में सोचते।
“लेकिन आपको तो डिब्रूगढ़ भेजनी थी।”
“अब डिब्रूगढ़ तो भेजना संभव नहीं है। गुवाहाटी से ही काम चला लेंगे।”
“हाँ, यह भी ठीक है। लेकिन एक मिनट रुको। तब तो मैं संपर्क क्रांति के ठेकेदार से बात करके देखता हूँ।”
और बात बन गयी। ठेकेदार ने कहा - “साब, हम आपसे भी पैसे लेंगे क्या? जो मन करे, दे देना।”
2500 रुपये दे दिये।
“लेकिन संपर्क क्रांति तो 5 तारीख को भी है। बाइक को 5 वाली ट्रेन में ही चढ़ा देंगे, 7 को पहुँच जायेगी। क्यों 1000 रुपये पार्किंग शुल्क देना?”
“भूल तो नहीं जाओगे? ट्रेन में कहीं पहले से ही दो बाइक लद गयीं तो?”
“अरे नहीं, ऐसा नहीं होगा।”
और 5 तारीख़ की रसीद मिल गयी। 5 को बाइक पूर्वोत्तर संपर्क क्रांति में लाद दी जायेगी। यह 7 को गुवाहाटी पहुँचेगी। उसी दिन हम भी पहुँच जायेंगे और हाथोंहाथ बाइक छुड़ा लेंगे।
...
हम डेढ़ घंटे तक यहाँ बैठे रहे। इस दौरान बहुत-से यात्री आये, जिन्हें बाइक भेजनी थी। एक एक्स-सर्विसमैन थे। वे बंगलुरू से आये थे और पठानकोट जाना था। अपने बेटे की बाइक भी उनके साथ थी। बंगलुरू से पठानकोट की एक भी सीधी ट्रेन नहीं है, तो उस बाइक की बुकिंग नहीं हो सकी। बंगलुरू से नई दिल्ली तक की बुकिंग हो गयी और अब नई दिल्ली से पठानकोट के लिये उन्हें दोबारा बुकिंग करानी थी। लेकिन उनके पास ट्रेन का टिकट नहीं था। रही होगी कोई बात। ज़ाहिर है कि उन्हें भी बाइक की बुकिंग पार्सल में करानी पड़ेगी। और आप जान ही गये हैं कि नई दिल्ली से किसी भी ट्रेन में पार्सल बुकिंग नहीं होती।
“लेकिन मेरे बेटे ने बंगलुरू से नई दिल्ली तक इसे पार्सल में ही भेजा है। वहाँ तो यह आराम से हो गयी। और बेटे ने ही बताया था कि नई दिल्ली से भी इसी तरह हो जायेगी।”
“आपके बेटे ने ठीक किया था और आपको भी ठीक ही बताया है। लेकिन दिल्ली एन.सी.आर. में रेलवे पार्सल बुकिंग नहीं करता। आपको एजेंट के माध्यम से ही करना पड़ेगा।”
“यार, आप भी अज़ीब बात करते हो। एक ही विभाग है और अलग-अलग स्थानों के लिये अलग-अलग नियम।”
“सर, हम मज़बूर हैं। नहीं कर सकते।”
अब मैं बीच में बोल पड़ा - “सर, आप पठानकोट का सबसे सस्ता टिकट बुक कर लो। उसे यहाँ लाकर दिखा देना, आपका काम हो जायेगा।”
“हाँ जी, तब आपका काम हो जायेगा।”
उन्होंने बंगलुरू अपने बेटे से बात की, फिर क्लर्क से बात की, फिर बेटे से बात की और आख़िरकार वेटिंग टिकट लेने बुकिंग विंडो की तरफ चले गये।
...
एक आदमी ने आज ही नयी बाइक खरीदी थी और उसे लखनऊ भेजना था।
“आर.सी. दिखाओ।”
“सर, आज ही ली है। इसकी आर.सी. अभी नहीं बनी।”
“टेंपरेरी आर.सी. बन जाती है। अगर एजेंसी ने नहीं बनायी तो आपको बनवानी चाहिये थी। हम बिना आर.सी. के नहीं भेज सकते।”
“सर, देख लो। कुछ ले-दे कर काम बन जाये तो।”
“अरे, भगाओ इस आदमी को यहाँ से। नहीं होगा तेरा काम।”
...
एक आदमी और आया।
“टिकट है?”
“हाँ जी।”
“आर.सी. दिखाओ।”
“ये लो जी।”
“आई.डी. दिखाओ।”
“ये लो जी।”
“ये तो अलग-अलग नाम हैं। ये तुम्हारे क्या लगते हैं?”
“दोस्त हैं जी। उसकी बाइक को मैं ले जा रहा हूँ।”
“नहीं जा सकती। आप केवल अपनी ही बाइक ले जा सकते हो या ब्लड रिलेशन की। दोस्त की बाइक नहीं ले जा सकते।”
“दोस्त ने यह शपथ-पत्र भी दिया है।”
“दिखाओ।”
एक एप्लीकेशन निकालकर आगे कर दी। जिसमें उसके दोस्त ने कुछ लिखा था। मैंने ज्यादा ताक-झाँक नहीं की।
“हाँ, ठीक है। लोगबाग चोरी की बाइक न ले जा पायें, इसलिये ऐसा नियम है। अब आपने शपथ-पत्र दे दिया है तो अब आपका काम हो जायेगा। लाओ, टिकट लाओ।”
“ये लो जी।”
“लेकिन यह तो चार तारीख़ का है। चौबीस घंटे पहले ही बुकिंग होती है। आप तीन को आना या फिर चार को आना, ट्रेन चलने से कम से कम दो घंटे पहले।”
“आज ही कर दो सर। नहीं तो परसों फिर चक्कर लगाना पड़ेगा।”
“उधर देखो। कहीं जगह दिख रही है क्या? यह सब आज ही बुक हुआ सामान है। अगर हम कई दिन पहले ही बुकिंग करने लगेंगे तो हमारे पास इतनी जगह नहीं है कि इतना सामान रख सकें। आप तीन या चार को ही आना।”
...
और भी बुकिंग वाले आये, सबका वर्णन करना ठीक नहीं। जो ज्ञान आज मिला, वो आपके साथ बाँट दिया। अभी तक हमने डिब्रूगढ़ से बाइक यात्रा आरंभ करने की योजना बनायी थी, अब गुवाहाटी से यात्रा आरंभ होगी। योजना दोबारा बनानी पड़ेगी। अब अपने पथ में माज़ुली और काज़ीरंगा भी जोड़े जा सकते हैं। वापसी में जैसा भी मौका होगा, वैसी ही बुकिंग कर देंगे। डिब्रूगढ़ से भी बुकिंग कर देंगे, या फिर गुवाहाटी से भी। रेलवे पार्सल में बुक कर देगा तो ठीक, अन्यथा 755 रुपये का वेटिंग टिकट लेकर लगेज में रखवा देंगे। यह दिल्ली कभी भी आये, हमें कोई चिंता नहीं।
...
इस मामले में आपकी कोई जिज्ञासा हो, अवश्य पूछिये। मुझे पता होगा, ज़रूर बताऊंगा।

Monday, October 30, 2017

यात्रा श्री हेमकुंड साहिब की

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15 जुलाई 2017
सुबह उठे तो मौसम ख़राब मिला। निश्चय करते देर नहीं लगी कि आज फूलों की घाटी जाना स्थगित। क्या पता कल सुबह ठीक मौसम हो जाये। तो कल फूलों की घाटी जाएंगे। आज हेमकुंड साहिब चलते हैं। कल भी मौसम ख़राब रहा तो परसों जायेंगे। यह यात्रा मुख्यतः फूलों की घाटी की यात्रा है, जल्दी कुछ भी नहीं है। तो हम केवल साफ मौसम में ही घाटी देखेंगे। वैसे जुलाई तक मानसून पूरे देश में कब्जा जमा चुका होता है, तो साफ मौसम की उम्मीद करना कुछ ज्यादा ही था, लेकिन हिमालय में अक्सर मौसम साफ ही रहता है। दोपहर बाद बरस जाये तो उसे खराब मौसम नहीं कहते। सुबह ही बरसता मिले तो खराब कहा जायेगा। अभी खराब मौसम था।
इंतज़ार करते रहे। इसका यह अर्थ न लगाया जाये कि हमने बालकनी में कुर्सियाँ डाल लीं और चाय की चुस्कियों के साथ बारिश देखते रहे। इंतज़ार करने का अर्थ होता है रजाईयों में घुसे रहना और जगे-जगे सोना व सोते-सोते जगना। नींद आ गयी तो आँख कुछ मिनटों में भी खुल सकती है और कुछ घंटों में भी। हाँ, एक बार बाहर झाँककर अवश्य देख लिया था। सिख यात्री नीचे गोविंदघाट से आने शुरू हो गये थे। सुबह कब चले होंगे वे? और हो सकता है कि इनमें से कुछ आज ही हेमकुंड भी पहुँच जायें। ज्यादातर यात्री नीचे लौटने की तैयारियों में थे। घोड़ों, खच्चरों व कंडी वालों से मोलभाव कर रहे थे। बारिश में ही।

Friday, October 27, 2017

पुस्तक चर्चा: आख़िरी चट्टान तक

पता नहीं किस कक्षा में मोहन राकेश का एक यात्रा-वृत्तांत था - आख़िरी चट्टान। उस समय तो इसे पढ़ने और प्रश्नों के उत्तर देने के अंक मिलते थे, इसलिये कभी भी यह अच्छा नहीं लगा, लेकिन आज जब यह पूरी किताब पढ़ी तो आनंद आ गया।
आनंददायक यात्रा-वृत्तांत वे होते हैं, जिनमें गतिशीलता भी होती है और रोचकता भी होती है। ‘आख़िरी चट्टान तक’ ठीक इसी तरह की एक किताब है। लेखक ज्यादा देर कहीं ठहरता नहीं है। फटाफट एक वाकया सुनाता है और आगे बढ़ जाता है। गतिशीलता बरकरार रहती है। यात्रा सन 1952 के आख़िरी सप्ताह और 1953 के पहले सप्ताह में की गयी है। भारत नया-नया आज़ाद हुआ और गोवा भी भारत का हिस्सा नहीं था। लेखक ने उस दौरान गोवा की भी यात्रा की। तब दूधसागर जलप्रपात के नीचे से होकर मीटरगेज की ट्रेन भारत से गोवा जाया करती थी। भारत का आख़िरी स्टेशन था केसलरॉक और गोवा का पहला स्टेशन था कुलेम। दोनों ही स्टेशनों पर गाड़ी दो-दो घंटे रुका करती थी - कस्टम जाँच के लिये।

Monday, October 23, 2017

गोविंदघाट से घांघरिया ट्रैकिंग

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14 जुलाई 2017
सुबह चमोली से चलकर पीपलकोटी बस अड्डे पर रुके। पिछली बार भी यहीं रुककर पकौड़ियाँ खायी थीं। अक्सर ऐसा होता है। आपको एक बार एक जगह एक चीज अच्छी लगे तो चाहे आप दस साल बाद आएँ, आप उसे याद भी रखेंगे और दोहराना भी चाहेंगे।
चमोली से पीपलकोटी की सड़क बड़ी खराब है। बी.आर.ओ. पूरे रास्ते काम कर रहा है और इनका काम कभी खत्म नही होगा। हालाँकि पीपलकोटी से जोशीमठ और आगे गोविंदघाट तक बहुत अच्छी सड़क है।
हमें नहीं पता था कि गोविंदघाट से अलकनंदा के पार भी सड़क है और बाइक जा सकती है। एक जगह पार्किंग में बाइक खड़ी भी कर दी थी, पर्ची कटने ही वाली थी कि दीप्ति की निगाह नदी के उस पार घांघरिया जाने वाले रास्ते पर आती-जाती बाइकों और गाड़ियों पर पड़ी। इस बारे में पार्किंग वाले से बात की तो उसने इस अंदाज़ में उत्तर दिया कि मुझे लगने लगा कि अगर हम वहाँ बाइक ले गए तो पछतायेंगे। वो तो भला हो दीप्ति का कि हम यहाँ से बाइक लेकर चल दिये।

Friday, October 20, 2017

पुस्तक-चर्चा: हिमाचल के शिखरों में रोमांचक सफर

इस पुस्तक की तारीफ़ कैसे करूँ, कुछ समझ नहीं पा रहा। यात्रा-वृत्तांत विधा का यह एक हीरा है। आपको यदि यात्रा-वृत्तांत पसंद हैं, तो यह पुस्तक आपके पास होनी ही चाहिये। लेखक कुल्लू-निवासी डॉ. सूरत ठाकुर आपको हिमाचल के अप्रचलित स्थानों पर ट्रैकिंग कराते हैं। ऐसे स्थान कि आज इंटरनेट के जमाने में भी ढूंढ़े से नहीं मिलेंगे।

चलिये, प्रत्येक चैप्टर का आपको परिचय करा देते हैं:
1. भृगुतुंग से मलाणा
यात्रा अगस्त 1983 में की। इन्होंने अपनी यात्रा मनाली से गुलाबा बस से और उसके बाद पैदल शुरू की। गुलाबा से दशौर झील, भृगु झील, वशिष्ठ, मनाली, नग्गर, चंद्रखणी जोत और मलाणा। रास्ते में पड़ने वाले सभी गाँवों, स्थानों का अच्छा वर्णन।

Monday, October 16, 2017

कार्तिक स्वामी मंदिर

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13 जुलाई 2017
रुद्रप्रयाग में दही समोसे खा रहे थे तो प्लान बदल गया। अब हम पोखरी वाले रास्ते से जाएंगे। उधर दो स्थान दर्शनीय हैं। और दोनों के ही नाम मैं भूल गया था। बाइक उधर ही मोड़ दी। अलकनन्दा पार करके दाहिने मुड़ गए। चढ़ाई शुरू हो गयी। मोबाइल ख़राब था और नक्शा सामानों में कहीं गहरे दबा हुआ था। जगह का नाम याद नहीं आया। कहीं लिखा भी नहीं मिला और किसी से पूछ भी नहीं सकते। बाद में ध्यान आया कि एक जगह तो कोटेश्वर महादेव थी। रुद्रप्रयाग के नज़दीक ही अलकनन्दा के किनारे। कितनी नज़दीक? पता नहीं। कितनी दूर? पता नहीं।
हम चलते रहे। ऊँचाई बढ़ती रही और अलकनंदा गहरी होती चली गयी। दूरियाँ लिखी आ रही थीं - चोपता, पोखरी, गोपेश्वर इतने-इतने किलोमीटर। लेकिन उस मंदिर का जिक्र नही आया। सोच लिया कि पोखरी पहुँचकर पूछूँगा किसी से। शायद पोखरी के बाद है वो मंदिर।

Monday, October 9, 2017

चलो फूलों की घाटी!

12 जुलाई 2017
थक गए। और थकान होगी ही। नींद भी आएगी। सुबह तीन बजे के उठे हुए और साढ़े चार के चले हुए। अब शाम छह बजे श्रीनगर पहुँचे। कमरा लिया। दीप्ति तो गीले कपड़े धोने और सुखाने में व्यस्त हो गयी, मैं खर्राटे लेने में। मुझे कोई होश नहीं कि दीप्ति ने कितना काम किया। सात बजे कपड़ों से फुरसत पाकर उसने मुझे जगाया, “चलो, कुछ खा आएँ।” मैंने नींद में बुदबुदा दिया, “मुझे कुछ नहीं खाना। तू खा आ।” वह अकेली कपड़े तो धो सकती है, लेकिन खाना नहीं खा सकती। एक घंटे और सोने दिया। फिर तो उठा ही दिया। इडली उपलब्ध हो तो यह उसका प्रिय भोजन है। उंगलियाँ सानकर ही खाती है। मुझे भी इडली अच्छी लगती है, लेकिन अगर पनीर का भी विकल्प हो, तो मैं पनीर लेना पसंद करूँगा।
रास्ते मे बहुत सारे लंगर लगे मिले थे। सरदारों वाले लंगर। हेमकुंड साहिब के तीर्थयात्रियों के लिए। स्प्लेंडर पर दो-दो तीन-तीन सरदार। पगड़ी वालों को तो हेलमेट की ज़रूरत नहीं, लेकिन बिना पगड़ी वाले भी बिना हेलमेट लगाये। सब मोटरसाइकिलों पर एक डंडा बंधा हुआ और डंडे पर नीला झंडा। वाहेगुरु दा खालसा। हम सभी लंगरों को नज़रअंदाज़ करते आ रहे थे, लेकिन एक जगह रुकना पड़ गया - कीर्तिनगर के पास। एक बूढ़े सरदारजी पीला झंडा पकड़े हुए बाइक के सामने ही अड़ गये। यहीं महाराष्ट्र की एक स्कार्पियो भी खड़ी थी। हमने इस गाड़ी को कई बार पीछे छोडा था और उन्होंने भी कई बार हमें पीछे छोड़ा था। वे खड़े दिखे तो हम भी रुक गए। हालाँकि बातचीत कुछ नहीं हुई। वे अब तक लंगर जीम चुके थे। हमारे रुकते ही चले गए।

Friday, October 6, 2017

पंचचूली बेसकैंप यात्रा की वीडियो

यात्रा के दौरान हम छोटी-छोटी वीडियो भी बनाते चलते हैं... और लौटकर कैमरे से लैपटॉप में कॉपी-पेस्ट कर देते हैं... और भूल जाते हैं... कभी-कभार इनकी याद आती है तो दो-दो, चार-चार वीडियो को जोड़कर या बिना जोड़े ही समय-समय पर आपको फेसबुक पेज और यूट्यूब के माध्यम से दिखा भी देते हैं... इन वीडियो की गुणवत्ता तो ख़राब ही रहती है, लेकिन आप चूँकि लाइक करते हैं, वाहवाही करते हैं; तो मुझे लगता है कि उतनी ख़राब भी नहीं होतीं... तो पंचचूली यात्रा की ऐसी ही सभी वीडियो को आपके सामने पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ... आपने शायद यूट्यूब वाली वीडियो न देखी हों, क्योंकि मैंने इनका प्रचार नहीं किया... फेसबुक पेज वाली तो निश्चित ही देख रखी होंगी...
इन्हें देखने के बाद या न देखने के बाद आप फेसबुक पेज को लाइक करना न भूलें... और यूट्यूब चैनल को भी सब्सक्राइब अवश्य करें... बड़ी मुश्किल से अपने ही यूट्यूब चैनल का लिंक मिला है... यूट्यूब वीडियो में आपको विज्ञापन भी दिखेंगे, तो यह मत समझ लेना कि धनवर्षा हो रही होगी... अभी 136 सब्सक्राइबर्स हैं... एक-दो दिन में फेसबुक के माध्यम से बताऊँगा कि इस पोस्ट की वजह से कितने सब्सक्राइबर्स बढ़े...

Wednesday, October 4, 2017

288 रेलवे स्टेशन हैं मुंबई और हावड़ा के बीच में

पिछले दिनों मैंने महाराष्ट्र में कुछ रेलमार्गों पर पैसेंजर ट्रेनों में यात्रा की थी। उनमें से अकोला से नागपुर का रेलमार्ग भी शामिल था। इस पर यात्रा करने के साथ ही मेरे पैसेंजर नक्शे में मुंबई और हावड़ा भी जुड़ गये। यानी मैं मुंबई-हावड़ा संपूर्ण रेलमार्ग पर पैसेंजर ट्रेनों में यात्रा कर चुका हूँ। ये यात्राएँ कई चरणों और कई वर्षों में हुईं। 
1. छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस मुंबई से भुसावल (20 फरवरी, 2012)
2. भुसावल से अकोला (18 फरवरी 2012)
3. अकोला से बडनेरा (26 अगस्त 2017)
4. बडनेरा से नागपुर (23 अगस्त 2017)
5. नागपुर से गोंदिया (5 अक्टूबर 2008)
6. गोंदिया से बिलासपुर (11 सितंबर 2014)
7. बिलासपुर से झारसुगुड़ा (25 अगस्त 2011)
8. झारसुगुड़ा से टाटानगर (10 सितंबर 2014)
9. टाटानगर से खड़गपुर (9 सितंबर 2014)
10. खड़गपुर से हावड़ा (22 अगस्त 2011)

Monday, October 2, 2017

जागेश्वर और वृद्ध जागेश्वर की यात्रा

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15 जून 2017
दन्या से जागेश्वर जाने में भला कितनी देर लगती है? आप ‘ट्यण-म्यण बाट, हिटो माठूँ-माठ’ पढ़ते-पढ़ते जागेश्वर पहुँच जाते हैं। कुमाऊँनी में लिखी इन बातों का अर्थ हमें नहीं पता। शायद ‘ट्यण-म्यण बाट’ का अर्थ होता होगा - टेढ़े-मेढ़े रास्ते। बाकी पता नहीं। सोच रहा हूँ कि अगर इसे मेरठी में लिखा जाये तो “ऐंड़े बेंड़े रस्ते” लिखा जायेगा। जिस दिन ‘हिटो माठूँ-माठ’ का अर्थ पता चल जायेगा, उस दिन उसे भी मेरठी में अनुवादित कर दूँगा।
मुख्य मार्ग से जब जागेश्वर के लिये मुड़े तो देवदार का जंगल आरंभ हो गया। एक होता है चीड़ का जंगल और दूसरा होता है देवदार का जंगल। चीड़ का जंगल भी निःसंदेह खूबसूरत होता है, लेकिन देवदार की बात ही कुछ और है।

Thursday, September 28, 2017

पुस्तक-चर्चा: पिघलेगी बर्फ

पुस्तक मेले में घूम रहे थे तो भारतीय ज्ञानपीठ के यहाँ एक कोने में पचास परसेंट वाली किताबों का ढेर लगा था। उनमें ‘पिघलेगी बर्फ’ को इसलिये उठा लिया क्योंकि एक तो यह 75 रुपये की मिल गयी और दूसरे इसका नाम कश्मीर से संबंधित लग रहा था। लेकिन चूँकि यह उपन्यास था, इसलिये सबसे पहले इसे नहीं पढ़ा। पहले यात्रा-वृत्तांत पढ़ता, फिर कभी इसे देखता - ऐसी योजना थी।
उन्हीं दिनों दीप्ति ने इसे पढ़ लिया - “नीरज, तुझे भी यह किताब सबसे पहले पढ़नी चाहिये, क्योंकि यह दिखावे का ही उपन्यास है। यात्रा-वृत्तांत ही अधिक है।” 
तो जब इसे पढ़ा तो बड़ी देर तक जड़वत हो गया। ये क्या पढ़ लिया मैंने! कबाड़ में हीरा मिल गया! बिना किसी भूमिका और बिना किसी चैप्टर के ही किताब आरंभ हो जाती है। या तो पहला पेज और पहला ही पैराग्राफ - या फिर आख़िरी पेज और आख़िरी पैराग्राफ।

Monday, September 25, 2017

पाताल भुवनेश्वर की यात्रा

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13 जून 2017
हम मुन्स्यारी में थे और सोते ही रहे, सोते ही रहे। बारह बजे उठे। आधी रात के समय यहाँ बड़ी चहल-पहल मची थी। गाड़ी भरकर पर्यटक आये थे। उनकी गाड़ी कहीं ख़राब हो गयी थी तो लेट हो गये। और उन्होंने जो ऊधम मचाया, उसका नतीज़ा यह हुआ कि हम दोपहर बारह बजे तक सोते रहे। उठे तो आसमान में बादल थे और बर्फ़ीली चोटियों का ‘ब’ भी नहीं दिख रहा था। आज हमें मुन्स्यारी के आसपास ही घूम-घामकर वापसी के लिये चल देना था और थल के आसपास कहीं रुकना था। अब साफ़ मौसम नहीं था तो मुन्स्यारी घूमने का इरादा त्याग दिया और वापस चल दिये।
बड़े दिनों से इच्छा थी मुन्स्यारी देखने की। वो इच्छा तो पूरी हो गयी, लेकिन घूम नहीं पाये। इच्छा कहीं न कहीं अधूरी भी रह गयी। इसे पूरा करने फिर कभी आयेंगे।

Thursday, September 21, 2017

पुस्तक-चर्चा: चुटकी भर नमक, मीलों लंबी बागड़

पुस्तक मेले में घूमते हुए एक पुस्तक दिखायी पड़ी - चुटकी भर नमक, मीलों लंबी बागड़। कवर पेज पर भारत का पुराना-सा नक्शा भी छपा था, तो जिज्ञासावश उठाकर देखने लगा। और खरीद भी ली।
ब्रिटिश राज में नमक पर कर लगा करता था। बंगाल रेजीडेंसी में यह सर्वाधिक था - साल में आम जनता की लगभग दो महीने की आमदनी के बराबर। तो बंबई रेजीडेंसी व राजपूताना की तरफ से इसकी तस्करी होने लगी। इस तस्करी को रोकने के लिये अंग्रेजों ने 1500 मील अर्थात 2400 किलोमीटर लंबी एक बाड़ बनवायी। यह बाड़ इतनी जबरदस्त थी कि कोई इंसान, जानवर इसे पार नहीं कर सकता था। यह बाड़ मिट्टी और कँटीली झाड़ियों की बनायी गयी। बीच-बीच में द्वार बने थे। केवल द्वारों से होकर ही इसे पार करना होता था - वो भी सघन तलाशी के बाद।

Monday, September 18, 2017

बाइक यात्रा: नारायण आश्रम से मुन्स्यारी

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12 जून 2017
ग्यारह बजे नारायण आश्रम से चल दिये। आज मुन्स्यारी पहुँचना था, जो यहाँ से करीब 150 किलोमीटर दूर है। कल रात के समय हम यहाँ आये थे। अब दिन के उजाले में पता चल रहा था कि यह रास्ता कितना खूबसूरत है। ख़राब तो है, लेकिन खूबसूरत भी उतना ही है। शुरू में जंगल है, फिर थानीधार के बाद विकट खड़े पहाड़ हैं। थानीधार पांगु के पास है। धारचूला से पांगू तक नियमित जीपें चलती हैं। थानीधार से पूरब में थोड़ा ऊपर नारायण आश्रम का बड़ा ही शानदार दृश्य दिखता है।
यहाँ एक सूचना-पट्ट लगा था - तवाघाट से थानीधार मोटर-मार्ग का निर्माण। और यह मार्ग 14 किलोमीटर लंबा होने वाला था। हमें नहीं पता था कि यह पूरा बन गया या नहीं। तो हम इसी पर चल दिये। अगर पूरा बन गया होगा, तो 10-12 किलोमीटर कम चलना पड़ेगा और अगर पूरा नहीं बना होगा तो वापस यहीं लौट आयेंगे। जरा ही आगे एक गाँव में पता चल गया कि यह मार्ग अभी पूरा नहीं बना है, तो वापस उसी रास्ते लौट आये।

Monday, September 11, 2017

नारायण स्वामी आश्रम

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11 जून 2017
अभी ढाई ही बजे थे और हमें बताया गया कि दुकतू से जल्द से जल्द निकल जाओ, अन्यथा यह अनिश्चित समय तक सड़क मार्ग से कट जायेगा। सी.पी.डब्लू.डी. सड़क की खुदाई कर रहा था, इसलिये सड़क बंद होने वाली थी। हमें याद आया कि वहाँ सड़क थी ही नहीं, जीप वालों ने इधर-उधर से निकालकर आना-जाना शुरू कर दिया था। अब वे लोग जब पहाड़ खोदेंगे तो जीप वालों की वह लीक भी बंद हो जायेगी और कोई भी दुकतू न तो आ सकेगा और न ही जा सकेगा। हम दुकतू में एक दिन और रुकना चाहते थे, लेकिन अनिश्चित समय के लिये फँसना नहीं चाहते थे।
सामान बाँधा और निकल पड़े। लेकिन हम यह देखकर हैरान रह गये कि उन्होंने खुदाई शुरू कर दी थी। गुस्सा भी आया कि बताने के बावज़ूद भी दस मिनट हमारी प्रतीक्षा नहीं की इन्होंने। लीक बंद हो चुकी थी। लेकिन एक संभावना नज़र आ रही थी। यहाँ पहाड़ ज्यादा विकट नहीं था और सड़क के बराबर में खेत थे। हम खेतों-खेत जा सकते थे।

Wednesday, September 6, 2017

पुस्तक चर्चा: पाकिस्तान में वक्त से मुलाकात


श्याम विमल द्वारा लिखित यह पुस्तक उनका एक यात्रा-संस्मरण है। लेखक का जन्म 1931 में मुलतान के शुजाबाद कस्बे में हुआ था। जब ये 16 बरस के थे, तब देश का बँटवारा हो गया और इन्हें सपरिवार अपनी जन्मभूमि छोड़कर भारत आना पड़ा। 75 साल की उम्र में ये अपनी जन्मभूमि देखने पाकिस्तान गये - 2005 में और अगले ही साल पुनः 2006 में। वहाँ जो इन्होंने देखा, महसूस किया; सब पुस्तक में लिख दिया। अपने बचपन को जीते रहे। एक-एक स्थान की, एक-एक गली की, एक-एक पडोसी की, एक-एक नाम की इन्हें याद थी और खुलकर सबके बारे में लिखा।
और कमाल की बात यह थी कि इनके पुश्तैनी घर में अब मुहाज़िर लोग रह रहे थे। यानी भारत छोड़कर गये हुए मुसलमान। अधिकांश भिवानी व हाँसी के आसपास के मुसलमान।
पूछने पर बताया गया कि जब वे मुहाजिर होकर इस घर में रहने आये थे तो यह घर लुटा-पिटा उन्हें मिला था। चौखटों के कपाट भी उखाड़ लिये गये थे। शायद वे स्थानीय या आसपास के गाँवों के मुसलमान रहे होंगे, जो बलवे के दिनों में लूटपाट करने आये होंगे।
मुझे स्मरण है कि हम तो इस घर को भरा-पूरा छोड़ आये थे। इसी घर में बड़े भाई की शादी में मिले दहेज का सामान भी रखा गया था। हम सभी मुलतान शहर में फँसे रह गये थे और अंततः वहीं से रिफ्यूजियों की स्पेशल ट्रेन से हिंदुस्तान चले आये थे।
आगे लिखते हैं:
किस क्रूर हृदय ने महान देश को तोड़ने का उपक्रम रचा? किसने भाई-भाई समान सदियों से एकत्र रह रहे हिंदू-मुसलमानों में फूट के बीज बोये? किसने देश बँटवारे की नींव में मट्ठा डाला? किसने संप्रदाय शब्द को गंदी राजनीति के कीचड़ में लथपथ कर बदरंग किया? - ये सवाल बार-बार उठाने वाली घटनाएँ आम आदमी को हिला देती हैं।
देश विभाजन के मुद्दे पर यह पुस्तक पठनीय है।

पाकिस्तान में वक्त से मुलाकात
इसके प्रकाशक हैं - आर्य प्रकाशन मंडल, गाँधीनगर, दिल्ली।
आई.एस.बी.एन. : 978-81-89982-96-6
प्रथम संस्करण: 2013
कुल पृष्ठ: 168
मूल्य: 300 रुपये (हार्ड कवर)

Monday, September 4, 2017

पंचचूली बेस कैंप ट्रैक

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11 जून 2017
आप कभी कुमाऊँ गये होंगे मतलब नैनीताल, रानीखेत, मुक्तेश्वर, कौसानी, चौकोड़ी, मुन्स्यारी... तो आपने हिमालय की बर्फीली चोटियों के भी दर्शन किये होंगे। आपको इन चोटियों के नाम तो नहीं पता होंगे, तो इनके नाम जानने की उत्सुकता भी ज़रूर रही होगी। आप किसी स्थानीय से इनके नाम पूछते होंगे तो मुझे यकीन है कि वो नंदादेवी से भी पहले आपको पंचचूली चोटियों के बारे में बताता होगा - “वे पाँच चोटियाँ, जो एकदम पास-पास हैं, पंचचूली हैं।” आप इनके फोटो खींचते होंगे और सोने से पहले भूल भी जाते होंगे।
लेकिन अब नहीं भूलेंगे। क्योंकि आप पढ़ रहे हैं इन्हीं पंचचूली के बेस कैंप जाने का यात्रा-वृत्तांत सचित्र। जहाँ से भी आपने पंचचूली देखी हैं, कल्पना कीजिये आप वहीं खड़े हैं और इन चोटियों को निहार रहे हैं। उधर त्रिशूल है, फिर नंदादेवी है और इनके दाहिने पंचचूली की पाँच चोटियाँ हैं। कर ली कल्पना? तो अब आपको बता दूँ कि हम पंचचूली के भी उस पार खड़े हैं। आपको बताया जाता होगा कि हिमालय के पार तिब्बत है, लेकिन ऐसा नहीं है। हिमालय के पार भी बड़ी दूर तक भारतीय इलाका है। हम भी उसी इलाके में खड़े हैं। आपके और हमारे बीच में पंचचूली की 6300 मीटर से 6800 मीटर ऊँची ये पाँच चोटियाँ हैं।

Monday, August 28, 2017

पंचचूली बेस कैंप यात्रा - दुकतू

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10 जून 2017
उत्तराखंड़ के इस इलाके को दारमा घाटी कहते हैं। इसका उत्तरी सिरा तिब्बत की सीमा से मिला है। पश्चिम में रालम धुरा पार करके रालम घाटी में जाया जा सकता है। 1962 से पहले इस इलाके का तिब्बत के साथ बहुत व्यापार होता था, लेकिन अब यह बंद है।
हम बाइक से सामान भी नहीं उतार पाये कि एक आदमी ने हमें घेर लिया - “भाई जी, पंचचूली बेस कैंप जाओगे?”
“हाँ जी।”
“तो कल मैं आपको ले जाऊँगा। अब तो जाना ठीक नहीं। दो-तीन घंटे में हो जायेगा।”
“पैसे कितने लोगे?”

Monday, August 21, 2017

पंचचूली बेस कैंप यात्रा - धारचूला से दुकतू

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10 जून 2017
धारचूला से तवाघाट की सड़क बहुत अच्छी बनी है। 19 किलोमीटर का यह रास्ता काली नदी के साथ-साथ ही है। बीच में एक और स्थान पर झूला पुल मिला। पुल के द्वार पर सशस्त्र सीमा बल का पहरा था।
कल तक मेरे पास जो जानकारी थी, उसके अनुसार सड़क केवल सोबला तक ही बनी है। उसके बाद पैदल चलना था। लेकिन कल जीप वालों ने बता दिया कि दुकतू तक जीपें जा सकती हैं, तो बड़ी राहत मिली। दुकतू तो पंचचूली के एकदम नीचे है। कुछ ही घंटों में दुकतू से बेसकैंप घूमकर लौटा जा सकता है। लेकिन यह भी बताया कि कुछ बड़े नाले भी हैं। हमारे मोबाइल में भले ही नेटवर्क न आ रहा हो, लेकिन चलते समय मैंने इस इलाके का गूगल मैप लोड़ कर लिया था। उसका ‘टैरेन मोड़’ अब मेरे सामने था। इससे अंदाज़ा लगाते देर नहीं लगी कि कहाँ-कहाँ हमें कितने-कितने बड़े नाले मिलेंगे। सबसे बड़ा नाला तो सोबला के पास ही मिलेगा। तो अगर हम इसे पार नहीं कर सके, तो सोबला में बाइक खड़ी कर देंगे और पैदल चल पड़ेंगे। फिर भी मैंने यह पता करने की कोशिश की कि जिन ख़तरनाक नालों की बात सभी लोग कर रहे हैं, वे हैं कहाँ। लेकिन पता नहीं चल सका।

Monday, August 14, 2017

पंचचूली बेस कैंप यात्रा - धारचूला

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9 जून 2017
थल समुद्र तल से लगभग 900 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। अच्छा-खासा कस्बा है। कुमाऊँ के ऐसे कस्बों में भी ठीक-ठाक चहल-पहल देखने को मिलती है। गढ़वाल और कुमाऊँ में मुझे यही अंतर देखने को मिला। कुमाऊँ ज्यादा जीवंत है।
थल से निकलते ही एक तिराहा है। सीधी सड़क मुनस्यारी चली जाती है और दाहिने मुड़कर डीडीहाट। हम दाहिने मुड़ गये। हमें धारचूला जाना था। अगर सबकुछ ठीक रहा तो वापसी में मुनस्यारी से आयेंगे।
डीडीहाट लगभग 1700 मीटर की ऊँचाई पर है, तो 25 किलोमीटर के इस रास्ते में चढ़ाई ही रहती है। सारा रास्ता पहाड़ के उत्तरी ढलान पर है, इसलिये घने जंगलों वाला है। वर्षावन। यहाँ चीड़ नहीं है। अगर कहीं है भी तो दूसरे अनगिनत प्रजाति के पेड़-पौधों के बीच में दुबका-सिकुड़ा-सा। जून होने के बावजूद भी यहाँ बेहतरीन हरियाली थी। अन्यथा हिमालय में मानसून के दौरान ही हरियाली आनी शुरू होती है। बाइक की स्पीड़ और कम कर ली, ताकि इस हरियाली का भरपूर आनंद लेते रहें। दो-तीन स्थानों पर नाले भी मिले, जिनका पानी सड़क पर आ गया था। कीचड़ भी मिली। रात बारिश हुई थी, तो पहाड़ से छोटे-छोटे पत्थर पानी के साथ सड़क पर आ गये थे। ये पत्थर अभी भी ऐसे ही पड़े थे। बारिश में हिमालय में ऐसा होता है।

Monday, August 7, 2017

पंचचूली बेस कैंप यात्रा: दिल्ली से थल

7 जून, 2017
ज़िंदगी एक बार फ़िर मेहरबान हो गयी और हमें मौका दे दिया हिमालय की ऊँचाईयों पर जाने का। कुमाऊँ हिमालय की ऊँचाईयों पर मैं कभी नहीं गया था, सिवाय कई साल पहले पिंड़ारी और कफ़नी ग्लेशियर की यात्राओं के। इस बार मिलम ग्लेशियर का इरादा बना तो दो सप्ताह की छुट्टियाँ मंज़ूर नहीं हुईं। मंज़ूरी मिली एक सप्ताह की और इतने में मिलम का भ्रमण नहीं हो सकता था। तो इस तरह पंचचूली बेस कैंप जाने पर मोहर लगी।
चार जून को बिलासपुर, छत्तीसगढ़ से सुनील पांडेय जी बाइक पर लद्दाख के लिये निकले। उस दिन वे जबलपुर रुके। पाँच को मध्य प्रदेश की गर्मी ने उनकी हालत ख़राब कर दी और वे वापस लौटते-लौटते बचे। ओरछा रुके। छह तारीख़ की आधी रात को वे दिल्ली आये। उधर हमारी योजना रात के दो-तीन बजे निकल जाने की थी, ताकि हम भी दिन की गर्मी से निज़ात पा सकें। लेकिन सुनील जी के मद्देनज़र हम भी रुक गये। ऊपर से इंद्रदेव मेहरबान हो गये और अगले दिन भीषण गर्मी की संभावना समाप्त हो गयी।

Monday, July 10, 2017

पुस्तक चर्चा: “तिब्बत तिब्बत” और “एक रोमांचक सोवियत रूस यात्रा”

पिछले दिनों दो पुस्तकें पढ़ने को मिलीं। इन दोनों के बारे में मैं अलग-अलग लिखने वाला था, लेकिन एक कारण से एक साथ लिख रहा हूँ। पहले चर्चा करते हैं ‘तिब्बत तिब्बत’ की।
इसके लेखक पैट्रिक फ्रैंच हैं, जो कि मूल रूप से ब्रिटिश हैं। हिंदी अनुवाद भारत पाण्डेय ने किया है - बेहतरीन उच्च कोटि का अनुवाद। लेखक की तिब्बत और अंतर्राष्ट्रीय मामलों में गहरी रुचि साफ़ झलकती है। वे भारत में मैक्लोड़गंज में तिब्बतियों से काफ़ी हद तक जुड़े हुए भी हैं और उनके साथ काफ़ी समय व्यतीत किया है। 1986 में उन्होंने पर्यटक बनकर तिब्बत की यात्रा की थी। तो यह पुस्तक मूलतः एक यात्रा-वृत्तांत ही है, लेकिन इसमें तिब्बत और चीन के साथ संबंधों पर सबकुछ लिखा गया है। कहीं भी लेखक भटकता हुआ महसूस नहीं हुआ। उन्होंने तिब्बत की यात्रा अकेले की और दूर-दराज़ में तिब्बतियों के साथ भी काफ़ी समय बिताया, जो तिब्बत में एक बहुत बड़ी बात थी। ऐसा होना आज भी बड़ी बात है।
कुल चौबीस अध्याय हैं। शुरूआती अध्यायों में तिब्बत और निर्वासित तिब्बतियों से परिचय कराया गया है। लेखक चीन पहुँच जाता है और अपनी यात्रा भी आरंभ करता है। हम छठें अध्याय से चर्चा आरंभ करेंगे:

Thursday, July 6, 2017

‘कुमारहट्टी से जानकीचट्टी’ यात्रा की वीड़ियो

पिछले दिनों हमारी “कुमारहट्टी से जानकीचट्टी” यात्रा-श्रंखला प्रकाशित हुई। इस दौरान फ़ेसबुक पेज पर कुछ वीड़ियो भी अपलोड़ कीं। उन्हीं वीड़ियो को यहाँ ब्लॉग पर भी प्रकाशित किया जा रहा है। यदि आपने फेसबुक पेज पर वीड़ियो न देखी हों, तो यहाँ देख सकते हैं।














इस यात्रा के सभी भाग:
1. बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी
2. बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी - भाग दो
3. बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी - भाग तीन (त्यूणी और हनोल)
4. बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी - भाग चार (हनोल से पुरोला)
5. बाइक यात्रा: पुरोला से खरसाली
6. बाइक यात्रा: खरसाली से दिल्ली
7. ‘कुमारहट्टी से जानकीचट्टी’ यात्रा की वीडियो

Monday, July 3, 2017

बाइक यात्रा: खरसाली से दिल्ली

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21 मई 2017
कल ही तय हो गया था कि मैं और नरेंद्र आज सुबह-सवेरे पाँच बजे यमुनोत्री जायेंगे और रणविजय यहीं रहेगा। लेकिन पाँच कब बज गये, किसी को भी पता नहीं चला। छह बजे तक आँखें तो तीनों की खुल गयीं, लेकिन उठा कोई नहीं। सात भी बज गये और रणविजय व नरेंद्र फ्रेश होकर फिर से रज़ाईयों में दब गये। तीनों एक-दूसरे को ‘उठो भई’ कहते रहे और समय कटता रहा।
अचानक मुझे महसूस हुआ कि कमरे में मैं अकेला हूँ। बाकी दोनों चुप हो गये - एकदम चुप। मैंने कुछ देर तक ‘नरेंद्र उठ, रणविजय उठ’ कहा, लेकिन कोई आहट नहीं हुई। मुझे कुछ अटपटा लगा। मामला क्या है? ये दोनों सो तो नहीं गये। ना, सवाल ही नहीं उठता। मैं सो सकता हूँ, लेकिन अब ये दोनों नहीं सो सकते। इसका मतलब मुझसे मज़ाक कर रहे हैं। इनकी ऐसी की तैसी! पूरी ताकत लगाकर रणविजय की रज़ाई में घुटना मारा, लेकिन यह क्या! घुटना रणविजय की रज़ाई पार करता हुआ नरेंद्र की रज़ाई तक पहुँच गया। किसी को भी नहीं लगा।

Monday, June 26, 2017

बाइक यात्रा: पुरोला से खरसाली

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20 मई 2017
पुरोला से सुबह साढ़े आठ बजे चल दिये। बाज़ार में चहल-पहल थी। देहरादून की बस भी खड़ी थी। कुछ ही आगे नौगाँव है। यमुना किनारे बसा हुआ। यमुना नदी पार करते ही हम नौगाँव में थे।
नौगाँव समुद्र तल से लगभग 1100 मीटर ऊपर है, इसलिये खूब गर्मी थी। नहाने का मन था, लेकिन नहीं नहाये।
नौगाँव पार करते ही एक रेस्टॉरेंट पर रुक गये।
“क्या खाओगे भाई जी?”

Monday, June 19, 2017

बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी - भाग चार (हनोल से पुरोला)

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19 मई 2017
हनोल से निकलते ही चीड़ का जंगल आरंभ हो गया और बगल में टोंस नदी। आनंदमय कर देने वाला वातावरण।
पाँच-छह किलोमीटर आगे एक स्थान है - चीड़ समाधि।
पता नहीं यह एशिया का सबसे ऊँचा पेड़ था या दुनिया का, लेकिन बहुत ऊँचा था। 60 मीटर से भी ज्यादा ऊँचा। 2007 में तूफ़ान के कारण यह टूटकर गिर पड़ा। इसकी आयु लगभग 220 वर्ष थी। पर्यावरण और वन मंत्रालय ने इसे ‘महावृक्ष’ घोषित किया हुआ था। अब जब यह टूट गया तो इसकी समाधि बना दी गयी। इसे जमीन में तो नहीं दफ़नाया, लेकिन इसे काटकर इसके सभी टुकड़ों को यहाँ संग्रहीत करके और सुरक्षित करके रखा हुआ है।
चीड़ की एक कमी होती है कि यह किसी दूसरी वनस्पति को नहीं पनपने देता, लेकिन इसकी यही कमी इसकी खूबी भी होती है। सीधे खड़े ऊँचे-ऊँचे चीड़ के पेड़ एक अलग ही दृश्य उपस्थित करते हैं। हम ऐसे ही जंगल में थे।
आनंदमग्न।

Monday, June 12, 2017

बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी - भाग तीन (त्यूणी और हनोल)

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19 मई 2017
तो हम उठे आराम से। बड़े आराम से। रात बारिश हुई थी तो मौसम सुहावना हो गया था, अन्यथा त्यूणी 900 मीटर की ऊँचाई पर बसा है, खूब गर्म रहता है। मानसून और सर्दियों में आने लायक जगह है त्यूणी। रणविजय ने कहा - “गुरूदेव, त्यूणी मुझे पसंद आ गया। गर्मी छोड़कर यहाँ कभी भी आया जा सकता है। 300 रुपये का शानदार कमरा और स्वादिष्ट भोजन और दो नदियों का संगम... इंसान को और क्या चाहिये ज़िंदगी में? बच्चों को लेकर आऊँगा अगली बार।”
इंसान ‘अगली बार’ कह तो देता है, लेकिन ‘अगली बार’ आसानी से आता नहीं।
तो अब हमारे सामने प्रश्न था - आगे कहाँ जाएँ? अभी हमारे हाथ में तीन दिन और थे। एक ने कहा - “चकराता चलो।” मैंने ऑब्जेक्शन किया - “तीन दिन चकराता में? अभी तो टाइगर फाल में भी पानी रो-रो कर आ रहा होगा।”

Monday, June 5, 2017

बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी - भाग दो

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18 मई 2017
हम सुबह ही उठ गये। मतलब इतनी सुबह भी नहीं। फ्रेश होने गये तो एहसास होने लगा कि 500 रुपये का कमरा लेकर ठगे गये। चार-पाँच कमरों का एक साझा टॉयलेट ही था। उसमें भी इतनी गंदगी कि मामला नीचे उतरने की बजाय वापस ऊपर चढ़ गया। होटल मालिक हालाँकि अब नशे में तो नहीं था, लेकिन आँखें टुल्ल ही थीं। वह पूरे दिन शायद पीता ही रहता हो।
सैंज समुद्र तल से लगभग 1400 मीटर की ऊँचाई पर है। जब छैला तिराहे पर पहुँचा तो मैं आगे था। मुझसे आगे एक बस थी, जिसे ठियोग की तरफ़ जाना था। तिराहे पर वह एक ही फेरे में नहीं मुड़ सकी तो ड्राइवर उसे बैक करके दोबारा मोड़ने लगा। इतने में रणविजय और नरेंद्र तेजी से पीछे से आये और ठियोग की तरफ़ मुड़कर चल दिये। मैं जोर से चीखा - “ओये।” लेकिन दोनों में से किसी पर कुछ भी असर नहीं हुआ।
फोन किया - “वापस आओ।”
आज्ञाकारी शिष्यों की तरह दोनों लौट आये।

Thursday, June 1, 2017

बाइक यात्रा: कुमारहट्टी से जानकीचट्टी

इस यात्रा को क्या नाम दूँ? समझ नहीं पा रहा। निकले तो चांशल पास के लिये थे, लेकिन नहीं जा सके, इसलिये चांशल यात्रा भी कहना ठीक नहीं। फिर दिशा बदलकर उत्तराखंड़ में चले गये, फिर भी उत्तराखंड़ यात्रा कहना ठीक नहीं। तो काफ़ी मशक्कत के बाद इसे यह नाम दिया है - कुमारहट्टी से जानकीचट्टी की यात्रा।
उत्तरकाशी यात्रा में मेरे सहयात्री थे रणविजय सिंह। यह हमारी एक साथ पहली यात्रा थी। बहुत अच्छी बनी हम दोनों में। इसी से प्रेरित होकर अगली यात्रा के लिये भी सबसे पहले रणविजय को ही टोका - “एक आसान ट्रैक पर चलते हैं 16 से 20 मई, बाइक लेकर।”
रणविजय - “भई वाह, बस बजट का थोड़ा-सा अंदाज़ा और बता दो।”
“हम खर्चा करते ही नहीं। बाइक का तेल और 2000 और जोड़ लो। 1000-1200 किलोमीटर बाइक चलेगी।”
रणविजय - “फ़िर तो ठीक है। चलेंगे।”
...
कुछ दिन बाद...
मैं - “एक मित्र पीछे बैठकर जाना चाहते हैं। मैं तो बैठाऊँगा नहीं। क्या तुम बैठा लोगे?”

Monday, May 29, 2017

वीडियो: छत्तीसगढ़ में नैरोगेज ट्रेन यात्रा

पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में की गयी नैरोगेज ट्रेन यात्रा की छोटी-छोटी वीडियो जो जोड़ने और एडिट करने का यह प्रयास किया है। उतना प्रभावशाली तो नहीं है, लेकिन ठीक-ठाक ही है। मैं वीडियो एडिटिंग के क्षेत्र में नया हूँ ना... इसलिये। जब लगातार एडिटिंग करनी शुरू कर दूँगा, तो आपको ‘स्टनिंग’ वीडियो देखने को मिला करेंगी...
याद रखना इस बात को...

Thursday, May 25, 2017

छत्तीसगढ़ में नैरोगेज ट्रेन यात्रा

29 अप्रैल 2017 को अचानक ख़बर मिली कि छत्तीसगढ़ की एकमात्र नैरोगेज रेलवे लाइन और भी छोटी होने जा रही है। किसी ज़माने में रायपुर जंक्शन से ट्रेनें आरंभ होती थीं, लेकिन पिछले कई सालों से तेलीबांधा से ट्रेनें चल रही हैं। रायपुर जंक्शन और तेलीबांधा के बीच में रायपुर सिटी स्टेशन था, जहाँ अब कोई ट्रेन नहीं जाती।
तो ख़बर मिली कि 1 मई से यानी परसों से ये ट्रेनें तेलीबांधा की बजाय केन्द्री से चला करेंगी। यानी तेलीबांधा से केन्द्री तक की रेलवे लाइन बंद हो जायेगी और इनके बीच में पड़ने वाले माना और भटगाँव स्टेशन भी बंद हो जायेंगे। मैं इसलिये भी बेचैन हो गया कि रायपुर से केन्द्री तक इस लाइन का गेज परिवर्तन नहीं किया जायेगा। इसके बजाय रायपुर से मन्दिर हसौद और नया रायपुर होते हुए नयी ब्रॉड़गेज लाइन केन्द्री तक बनायी जा रही है। केन्द्री से आगे धमतरी और राजिम तक गेज परिवर्तन किया जायेगा। केन्द्री तक का यह नैरोगेज का मार्ग रायपुर प्रशासन को सौंप दिया जायेगा, जहाँ हाईवे बनाया जायेगा।
अब जबकि केन्द्री तक नैरोगेज की यह लाइन बंद हो ही जायेगी, तो कभी भी इस पर हाईवे बनाने का काम आरंभ हो सकता है। यानी रायपुर सिटी, तेलीबांधा, माना और भटगाँव स्टेशन हमेशा के लिये समाप्त हो जायेंगे। मुझे उनके फोटो लेने की उत्कंठा हो गयी और 3 मई 2017 को मैं दिल्ली से निकल पड़ा। हालाँकि ट्रेन बंद हो चुकी थी, इसलिये मोटरसाइकिल से या किसी भी तरीके से बंद हो चुके स्टेशनों तक जाऊँगा और उनके फोटो लूँगा।

Monday, May 22, 2017

धनबाद-राँची पैसेंजर रेलयात्रा


पिछले दिनों अचानक दिल्ली के दैनिक भास्कर में ख़बर आने लगी कि झारखंड़ में एक रेलवे लाइन बंद होने जा रही है, तो मन बेचैन हो उठा। इससे पहले कि यह लाइन बंद हो, इस पर यात्रा कर लेनी चाहिये। यह लाइन थी डी.सी. लाइन अर्थात धनबाद-चंद्रपुरा लाइन। यह रेलवे लाइन ब्रॉड़गेज है। इसका अर्थ है कि इसे गेज परिवर्तन के लिये बंद नहीं किया जायेगा। यह स्थायी रूप से बंद हो जायेगी।
झरिया कोलफ़ील्ड़ का नाम आपने सुना होगा। धनबाद के आसपास का इलाका कोयलांचल कहलाता है। पूरे देश का कितना कोयला यहाँ निकलता है, यह तो नहीं पता, लेकिन देश की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने में इस इलाके का अहम योगदान है। इधर आप जाओगे, आपको हर तरफ़ कोयला ही कोयला दिखेगा। कोयले की भरी हुई मालगाड़ियाँ अपनी बारी का इंतज़ार करती दिखेंगी। इसलिये यहाँ रेलवे लाइनों का जाल बिछा हुआ है। कुछ पर यात्री गाड़ियाँ भी चलती हैं, लेकिन वर्चस्व मालगाड़ियों का ही है।

Friday, May 19, 2017

वीडियो - हुसैनीवाला में बैसाखी मेला और साल में एक दिन चलने वाली ट्रेन

मैं इस वीड़ियो को उतना शानदार तो नहीं बना पाया, लेकिन फिर भी ठीक ही है। पंजाब के फ़िरोज़पुर जिले में पाकिस्तान सीमा के एकदम नज़दीक स्थित है हुसैनीवाला। आज़ादी से पहले यहाँ से होकर ट्रेनें लाहौर जाया करती थीं। लेकिन अब केवल साल में एक ही दिन ट्रेन चलती है। फ़िरोज़पुर छावनी से हुसैनीवाला तक। बैसाखी वाले दिन। इस दिन यहाँ भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव के समाधि-स्थल पर मेला लगता है। उसके उपलक्ष्य में रेलवे ट्रेन चलाता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु जाते हैं। सतलुज नदी पार करके समाधि-स्थल पहुँचकर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
इसके अलावा यहाँ सतलुज पर बने रेल के पुल के अवशेष भी आकर्षण के केंद्र हैं।

Thursday, May 18, 2017

हुसैनीवाला में बैसाखी मेला और रेलवे

हुसैनीवाला की कहानी कहाँ से शुरू करूँ? अभी तक मैं यही मानता आ रहा था कि यहाँ साल में केवल एक ही दिन ट्रेन चलती है, लेकिन जैसे-जैसे मैं इसके बारे में पढ़ता जा रहा हूँ, नये-नये पन्ने खुलते जा रहे हैं। फिर भी कहीं से तो शुरूआत करनी पड़ेगी।
इसकी कहानी जानने के लिये हमें जाना पड़ेगा 1931 में। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को लाहौर षड़यंत्र केस व अन्य कई मामलों में गिरफ़्तार करके फाँसी की सज़ा घोषित की जा चुकी थी। तय था कि 24 मार्च को इन्हें लाहौर जेल में फाँसी दे दी जायेगी। लेकिन उधर जनसाधारण में देशभक्ति की भावना भी भरी हुई थी और अंग्रेजों को डर था कि शायद भीड़ बेकाबू न हो जाये। तो उन्होंने एक दिन पहले ही इन तीनों को फाँसी दे दी - 23 मार्च की शाम सात बजे। जेल के पिछवाड़े की दीवार तोड़ी गयी और गुपचुप इनके शरीर को हुसैनीवाला में सतलुज किनारे लाकर जला दिया गया। रात में जब ग्रामीणों ने इधर अर्थी जलती देखी, तो संदेह हुआ। ग्रामीण पहुँचे तो अंग्रेज लाशों को अधजली छोड़कर ही भाग गये। लाशों को पहचान तो लिया ही गया था। इसके बाद ग्रामीणों ने पूर्ण विधान से इनका क्रिया-कर्म किया। आज उसी स्थान पर समाधि स्थल बना हुआ है। प्रत्येक वर्ष बैसाखी वाले दिन यानी 13 अप्रैल को यहाँ मेला लगता है।
भारत-पाकिस्तान की सीमा एकदम बगल से होकर गुज़रती है। जिस पुल से हम सतलुज नदी पार करते हैं, उसके पश्चिम में पाकिस्तान ही है। यहीं नदी पर बैराज भी है। एक नहर भी निकाली गयी है। नदी बैराज और पुल के नीचे से गुजरते ही पाकिस्तान में चली जाती है।

Monday, May 15, 2017

उत्तरकाशी में रणविजय सिंह की फोटोग्राफी

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पिछले दिनों जब रणविजय सिंह के साथ उत्तरकाशी और रैथल जाना हुआ, तो एक नयी बात पता चली। रणविजय ने बताया कि मुझसे प्रेरित होकर उन्होंने फोटोग्राफी आरंभ की थी। मुझसे प्रेरित होकर कैसे? बताता हूँ। 
बहुत पहले ‘डायरी के पन्नों’ में यदा-कदा मैं फोटोग्राफी के टिप्स भी बता दिया करता था। वहीं से इन्होंने कुछ टिप्स सीखे। आज हालत यह है कि ‘गुरू गुड़ ही रह गया, चेला चीनी हो गया’। बहुत अच्छी फोटोग्राफी है रणविजय की। इनकी फेसबुक वॉल पर इनके शानदार फोटो देखे जा सकते हैं। साधारण दृश्यों को असाधारण बनाना रणविजय से सीखा जा सकता है। तो इसी बात से प्रेरित होकर मैंने उनसे उनके उत्तरकाशी के फोटो मंगाये। मैंने कहा था कि गिने-चुने सर्वोत्तम फोटो ही भेजो, लेकिन उन्होंने 50-60 फोटो भेज दिये। तो इन्हीं में से कुछ चुनिंदा फोटो आज प्रकाशित कर रहा हूँ। 

Monday, May 8, 2017

उत्तरकाशी में रैथल गाँव का भ्रमण

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6 अप्रैल 2017,
पंकज कुशवाल जी रैथल के रहने वाले हैं, तो उन्होंने हमें रैथल जाने के लिये प्रेरित किया। रैथल के ऊपर दयारा बुग्याल है। तो ज़ाहिर है कि दयारा का एक रास्ता रैथल से भी जाता है। दयारा बहुत बड़ा बुग्याल है और इसके नीचे कई गाँव हैं। सबसे प्रसिद्ध है बरसू। रैथल भी प्रसिद्ध होने लगा है। और भी गाँव होंगे, जहाँ से दयारा का रास्ता जाता है, लेकिन उतने प्रसिद्ध नहीं।
आज हमें रैथल ही रुकना था, तो सोचा कि क्यों न भटवाड़ी से 15 किलोमीटर आगे गंगनानी में गर्म पानी में नहाकर आया जाये। हमें नहाये कई दिन हो गये थे। इस बहाने नहा भी लेंगे और नया अनुभव भी मिलेगा। तो जब भटवाड़ी की ओर जा रहे थे तो रास्ते में और भी दूरियाँ लिखी दिखायी पड़ीं। इनमें जिस स्थान ने हमारा सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया, वो था हरसिल - गंगनानी से 30 किलोमीटर आगे। हम दोनों का मन ललचा गया और हम ख्वाब देखने लगे हरसिल में चारों ओर बर्फ़ीले पहाड़ों के बीच बैठकर चाय और आलू की पकौड़ियाँ खाने के। कार में ही बैठे बैठे हमने गंगोत्री तक जाने के सपने देख लिये। अप्रैल में - कपाट खुलने से भी पहले - गंगोत्री। रणविजय ने कहा कि हमने आज पंकज जी को रैथल का वचन दे रखा है। मैंने कहा - वचन तोड़ने में एक फोन भर करना होता है।

Thursday, May 4, 2017

उत्तरकाशी भ्रमण: पंकज कुशवाल, तिलक सोनी और चौरंगीखाल

4 अप्रैल, 2017
आज की हमारी फ्लाइट की बुकिंग थी दिल्ली से बागडोगरा की। पिछले साल सस्ती फ्लाइट का एक डिस्काउंट ऑफ़र आया था। तब बिना ज्यादा सोचे-समझे मैंने अपनी और दीप्ति की बुकिंग कर ली। सोचा कि अप्रैल में सिक्किम घूमेंगे और गोईचा-ला ट्रैक करेंगे। सिक्किम बुराँश की विभिन्न प्रजातियों के लिये प्रसिद्ध है और बुराँश के खिलने का समय भी अप्रैल ही होता है। लेकिन पिछले एक महीने से दीप्ति अपनी एक ट्रेनिंग में इस कदर व्यस्त है कि उसका इस यात्रा पर जाना रद्द हो गया।
लेकिन फ्लाइट तो नॉन-रिफंडेबल थी। तब विचार बना कि न्यूजलपाईगुड़ी से शुरू करके गुवाहाटी, तिनसुकिया और मुरकंगसेलेक तक रेलयात्रा कर लूँगा। वैसे भी असोम में मौसम अच्छा था। जबकि शेष भारत में गर्मी का प्रकोप शुरू हो चुका था। तो रेल के माध्यम से असोम घूमना बुरा नहीं होता। सारी योजना बना ली। कब कहाँ से कौन-सी ट्रेन पकड़नी है, कहाँ रुकना है आदि।
लेकिन ऐन टाइम पर साहब लोग धोखा दे गये। छुट्टियाँ नहीं मिलीं। मैं छुट्टियों के मामले में ऑफिस में ज़िद नहीं करता हूँ। इस बार नहीं मिलीं, कोई बात नहीं। अगली बार इनसे भी ज्यादा मिल जायेंगी। तो इस तरह पूर्वोत्तर जाना रह गया।

Monday, May 1, 2017

आंबलियासन से विजापुर मीटरगेज रेलबस यात्रा

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19 मार्च, 2017
मैं महेसाणा स्टेशन पर था - “विजापुर का टिकट देना।” 
क्लर्क ने दो बार कन्फर्म किया - “बीजापुर? बीजापुर?” 
नहीं विजापुर। वी जे एफ। तब उसे कम्प्यूटर में विजापुर स्टेशन मिला और 15 रुपये का टिकट दे दिया।
अंदाज़ा हो गया कि इस मार्ग पर भीड़ नहीं मिलने वाली।
प्लेटफार्म एक पर पहुँचा तो डी.एम.यू. कहीं भी नहीं दिखी। प्लेटफार्म एक खाली था, दो पर वीरमगाम पैसेंजर खड़ी थी। फिर एक मालगाड़ी खड़ी थी। क्या पता उसके उस तरफ डी.एम.यू. खड़ी हो। मैं सीढ़ियों की और बढ़ने लगा। बहुत सारे लोग पैदल पटरियाँ पार कर रहे थे, लेकिन जिस तरह हेलमेट ज़रूरी है, उसी तरह स्टेशन पर सीढियाँ।

Thursday, April 27, 2017

गुजरात मीटरगेज ट्रेन यात्रा: बोटाद से गांधीग्राम

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18 मार्च 2017
पहले तो योजना थी कि आज पूरे दिन भावनगर में रुकूँगा और विमलेश जी जहाँ ले जायेंगे, जाऊँगा। उन्होंने मेरे लिये बड़ी-बड़ी योजनाएँ बना रखी थीं और रेलवे के कारखाने में मेरे एक लेक्चर की भी प्लानिंग थी। लेकिन जब मुझे पता चला कि आंबलियासन से विजापुर वाली मीटरगेज की लाइन चालू है और उस पर रेलबस भी चलती है, तो मेरा मन बदल गया। अगर इस बार उस लाइन पर यात्रा नहीं की तो पता नहीं कब इधर आना हो और कौन जाने तब तक वो लाइन बंद भी हो जाये। विजापुर से आदरज मोटी, कलोल से महेसाणा और अहमदाबाद से खेड़ब्रह्म वाली लाइनें पहले ही बंद हो चुकी हैं। गेज परिवर्तन का कार्य जोरों पर चल रहा है।
यही बात विमलेश जी को बतायी तो वे इसके लिये तुरंत राज़ी हो गये। तय हुआ कि आज बोटाद से अहमदाबाद तक यात्रा करूँगा और कल आंबलियासन से विजापुर। बोटाद से अहमदाबाद जाने के लिये दो बजे वाली ट्रेन पकडूँगा और यहाँ भावनगर से बोटाद के लिये साढ़े ग्यारह वाली। यानी आज साढ़े ग्यारह बजे तक हमारे पास समय रहेगा विमलेश जी के कारखाने में घूमने का। बाइक उठायी और निकल पड़े।

Monday, April 24, 2017

गुजरात मीटरगेज ट्रेन यात्रा: जूनागढ़ से देलवाड़ा

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17 मार्च 2017
रात अच्छी नींद आयी। एक चूहे ने एक बार आसपास चहलकदमी की, एक दो डरावने सपने आये: फिर भी सब ठीक रहा। इतने बड़े रेस्ट हाउस में मैं अकेला ही था। भूतों के अस्तित्व को मैं मानता हूँ। रेलवे लाइन के किनारे बने इस सुनसान रेस्ट हाउस में भूत रहते होंगे, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। धन्यवाद भूतों, मुझे शांति से सोने देने के लिए।
जूनागढ़ से ट्रेन ठीक समय पर चल दी। भीड़ बिल्कुल नहीं थी। जैसे ही शहर से बाहर निकले, गिरनार पर्वत दिखायी पड़ने लगा। काफ़ी ऊँचा पर्वत है और जूनागढ़ के साथ-साथ गुजरात का भी बहुत बड़ा धार्मिक आस्था का केंद्र है। दूर से ही नमस्कार किया - भविष्य में दीप्ति के साथ आने का वादा करके।
वीसावदर में हमारी ट्रेन पहुँचने के बाद खिजडिया-जूनागढ़ पैसेंजर आ गयी। लग रहा था कि अब हमारी ट्रेन खाली हो जाएगी, लेकिन खिजडिया ट्रेन के आधे से ज्यादा यात्री इसमें चढ़ गए। सभी सीटें भर गयीं और कुछ यात्री खड़े भी रहे। मैं कल इस मार्ग पर यात्रा कर चुका था, इसलिए मेरे काम पर इस भीड़ का उतना प्रभाव नहीं पड़ा।

Thursday, April 20, 2017

गिर फोरेस्ट रेलवे: ढसा से वेरावल

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दो घंटे ढसा में खड़ी रहकर यही ट्रेन अब वेरावल के लिये चल दी। ढसा से ब्रॉड़गेज की एक लाइन भावनगर जाती है और एक महुवा। ट्रेन चली तो एक कंटेनर ट्रेन महुवा की ओर जाती दिखी। धीरे-धीरे मीटरगेज की ट्रेन सरक रही थी, थोड़ी ही दूरी पर य्यै लंबी कंटेनर ट्रेन। बड़ा शानदार दृश्य था यह। मैं इसमें इतना खो गया कि फोटो लेना भी याद नहीं रहा। हालाँकि एक-दो फोटो जाती-जाती के ले ज़रूर लिये।
अमरेली स्टेशन पर एक सूचना-पट्ट लगा हुआ था, जिस पर पीली बैकग्राउंड में काले अक्षरों में ताज़ा ही लिखा हुआ था - आरक्षण चार्ट। मैं चौंक गया। अरे, यह क्या लिख दिया इन्होने? अमरेली में आरक्षण चार्ट? गिनी चुनी दो तीन पैसेंजर ट्रेनें आती हैं - जनरल डिब्बों वाली। जिसने भी यह काम करवाया है, उसने बीस रूपये का काम कराके हज़ार का बिल बनाया होगा।
फेसबुक पेज पर एक लाइव वीडियो चला दी। यार लोग खुश हो गए। पूछने लगे कहाँ का है, कहाँ का है। उनसे अगर बता देता कि अमरेली का है तो कोई भी यह पता लगाने की ज़हमत नहीं उठाता कि अमरेली है कहाँ। उल्टा मुझसे ही पूछते।

Monday, April 17, 2017

गुजरात मीटरगेज रेल यात्रा: जेतलसर से ढसा

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अंधा क्या माँगे? मुझे ट्रेन में जो बर्थ सबसे ज्यादा पसंद है, वो है अपर बर्थ। आप अपने बैग से कई सामान अपने इर्द गिर्द फैला सकते हैं और चोरी होने व गिरने का डर भी नहीं। मोबाइल को कान के पास रख रकते हैं, कोने में पानी की बोतल, मोबाइल के पास बैटरी बैंक, थोड़ा नीचे कैमरा, केले या अंगूर। यह उन्मुक्तता किसी दूसरी बर्थ पर नहीं मिलती। वरीयता क्रम में इसके बाद मिड़ल बर्थ, लोअर बर्थ, साइड़ अपर और साइड़ लोअर। साइड़ लोअर भले ही पाँचवे नंबर पर हो, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि यह मुझे पाँचवे नंबर पर पसंद है। बल्कि यह बर्थ मुझे सबसे ज्यादा नापसंद है।
और आज जब चार्ट बना तो आर.ए.सी. क्लियर होने के बाद मुझे मिली 39 नंबर की बर्थ - साइड़ लोअर। मैं इस पर जाकर दो अन्य लोगों के बीच जगह बनाता हुआ बैठ गया और इंतज़ार करने लगा कि कोई आये और मुझसे किसी भी बर्थ के बदले बदली कर ले। ज्यादा देर प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी और आठ मुसलमानों के दल के एक सदस्य ने जैसे ही अपनी कहानी सुनानी शुरू की, मैंने तपाक से कहा - “हाँ, बदल लूँगा। कौन-सी बर्थ पर जाना है?” उन्होंने कहा - “22 नंबर पर।” सेकंड का हजारवाँ हिस्सा भी नहीं लगा, गणना करने में कि 22 नंबर वाली बर्थ अपर बर्थ होती है - मेरी पसंद में पहले स्थान पर। उन्होंने मुझे चार बार उसी मीठे गुजराती लहजे में शुकिया कहा, मैंने भी अपने लहजे में दो बार धन्यवाद कह दिया।

Thursday, April 13, 2017

गुजरात मीटरगेज रेल यात्रा: अहमदाबाद से रणुंज

14 मार्च 2017
जब से मेरठ-सहारनपुर रेलवे लाइन बिजली वाली हुई है और इस पर बिजली वाले इंजन, बिजली वाली ट्रेनें चलने लगी हैं, गोल्डन टेम्पल मेल में डीजल इंजन लगना बंद हो गया है। निजामुद्दीन में इंजनों की अदला-बदली होती थी, तो यहाँ इस ट्रेन के लिए तीस मिनट का ठहराव निर्धारित था, लेकिन अब इसे घटाकर पंद्रह मिनट कर दिया गया है। पहले यह सात बजकर पैंतीस पर निजामुद्दीन से चलती थी, जबकि अब सात बीस पर ही चल देती है। सात बजे मेरी नाईट ड्यूटी समाप्त होती है, तो इन बीस मिनटों में निजामुद्दीन कैसे पहुँचा, यह बात केवल मैं और धीरज ही जानते हैं। धीरज बाइक लेकर वापस चला गया, मैं निजामुद्दीन रह गया। जब फुट ओवर ब्रिज पर तेजी से प्लेटफार्म नंबर एक की और जा रहा था, तो एक गाड़ी की सीटी बजने लगी थी और वह गाड़ी थी - गोल्डन टेम्पल मेल।

Monday, April 10, 2017

एक विचित्र रेल-यात्रा

7 मार्च 2017
आला हज़रत एक्सप्रेस को इज़्ज़तदार ट्रेन नहीं माना जाता। भुज और बरेली के बीच चलने वाली इस ट्रेन का ज्यादा समय राजस्थान में गुज़रता है। आप किसी राजस्थानी से, ख़ासकर इसके मार्ग में आने वाले राजस्थानी से पूछिए इसके बारे में। वह इसे थकी हुई और बेकार ट्रेन बताएगा। और यह बेकार इस मायने में है कि इसमें भीड़ बहुत होती है। इतनी भीड़ कि सामान्य और शयनयान डिब्बों में ज्यादा अंतर नहीं होता।
ट्रेन आधा घंटा लेट थी और जब मैं पुरानी दिल्ली के छह नंबर प्लेटफार्म पर सीढ़ियों से उतर रहा था तो ट्रेन भी धीरे-धीरे चल रही थी। पता चलना मुश्किल था कि ट्रेन आ रही है या आने के बाद चल चुकी है। लेकिन इस थकी हुई ट्रेन की थकी हुई सवारियों का दरवाजों पर खड़े होना ही कह रहा था कि ट्रेन अभी-अभी आयी है। प्लेटफार्म पर भी काफी भीड़ थी और रुकने से पहले ही उतरने वालों और चढ़ने वालों का संघर्ष शुरू हो गया। 
जब सब शांत हो गया तो मैं डिब्बे में चढ़ा - एस चार में। सैंतीस नंबर वाली शायिका मेरी थी। यह मध्य शायिका होती है और दिन में किसी काम की नहीं होती। मैं इस बात को जानता था और किसी भी बहस के लिए तैयार नहीं था। अपने कूपे में बारह लोगों को बैठे देख चुपचाप अपने लिए जगह बनायी और सिकुड़कर बैठ गया। ऊपर वाली बर्थों पर लोग सोये हुए थे। नीचे वाले बैठे-बैठे ऊँघ रहे थे।

Thursday, April 6, 2017

अंडमान यात्रा की कुछ वीडियो

अंडमान यात्रा की छोटी-छोटी वीडियो पिछले दिनों फेसबुक पेज पर प्रकाशित की गयी थीं। उन्हें ही यहाँ इकट्ठा प्रकाशित कर दिया है। यदि आपने ये वीडियो पहले देख ली हों, तो अब देखने की आवश्यकता नहीं हैं। क्यों अपना डाटा खर्च करना? नहीं देखी हों तो आप देख सकते हैं।


Monday, April 3, 2017

वंडूर बीच भ्रमण

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23 जनवरी 2017
आज हमारी अंडमान यात्रा का आख़िरी दिन था और दिन का भी आख़िरी वक़्त चल रहा था। हम सीधे पहुँचे वंडूर बीच पर। पोर्ट ब्लेयर से यहाँ तक बहुत सारी बसें भी चलती हैं। एक जगह लिखा था - महात्मा गाँधी मरीन नेशनल पार्क में स्वागत है। आप इधर के नक्शे को देखेंगे तो पायेंगे कि यहाँ छोटे-छोटे कई द्वीप हैं। ये सभी द्वीप निर्जन हैं और सामुद्रिक पारिस्थितिकी में महत्वपूर्ण हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध है जॉली ब्वाय द्वीप। जॉली ब्वाय की बोट यहीं वंडूर से चलती है। हमारे पास समय की कमी थी, इसलिये वहाँ नहीं गये।
वंडूर बीच के पास ही लोहाबैरक क्रोकोडायल सेंचुरी है। जगह-जगह चेतावनी भी लिखी थी कि यहाँ तक मगरमच्छ आ जाते हैं, इसलिये सावधान रहें।
भीड़ बिल्कुल नहीं थी। जितने पर्यटक थे, लगभग उतने ही कुत्ते भी थे। एक बहुत बड़ा ठूँठ पड़ा था, जो यात्रियों के लिये फोटो-पॉइंट था। हमारे लिये भी।

Thursday, March 30, 2017

अंडमान में बाइक यात्रा: माउंट हैरियट नेशनल पार्क

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23 जनवरी, 2017
तो हम बंबू-फ्लैट पहुँच गये। बढ़िया रोचक नाम है - बंबू-फ्लैट। यहाँ से चाथम बहुत नज़दीक है और नियमित बोट चलती हैं। हम बोट में रखकर भी बाइक को इधर ला सकते थे, लेकिन अंडमान की सड़कों को भी नापना चाहते थे। बंबू-फ्लैट से थोड़ा आगे एक तिराहा है, जहाँ से एक रास्ता नोर्थ-बे जाता है। रास्ता टूटा-फूटा था, लेकिन शायद बाइक तो चली ही जाती होगी। हम कुछ दिन पहले नोर्थ-बे जा चुके थे, तो आज वहाँ जाने की आवश्यकता नहीं थी।
25-25 रुपये की हमारी और 20 रुपये की बाइक की पर्ची कटी। आख़िरी दो-तीन किलोमीटर तक चढ़ाई बड़ी जोरदार है, लेकिन सड़क अच्छी बनी है। रास्ता - ऑफ़ कोर्स - घने जंगल से होकर गुज़रता है। फिर एक जगह पार्किंग है और बाइक यहीं खड़ी करके हम आगे चल दिये।

Monday, March 27, 2017

अंडमान में बाइक यात्रा: चाथम आरा मशीन

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23 जनवरी, 2017
आज जो सबसे पहला काम किया, वो था किराये पर बाइक लेना। अबरडीन बाज़ार में एक दुकान से बाइक मिल गयी - 500 रुपये प्रतिदिन किराया और 2000 रुपये सुरक्षा-राशि, जो बाइक लौटाने पर वापस कर दी जायेगी।
हमारे मोबाइल में नेट नहीं चल रहा था, इसलिये गूगल मैप लोड़ नहीं हो पाया। मेरी इच्छा बाइक से माउंट हैरियट जाने की थी। हैरियट के लिये पहले अंडमान ट्रंक रोड़ पर चलना होता है, वही सड़क जो डिगलीपुर जाती है। फिर कहीं से दाहिने मुड़कर बड़ी लंबी दूरी तय करके हैरियट जाना होता है। लेकिन नक्शे के अभाव में हम पहुँच गये चाथम। अब जब चाथम पहुँच ही गये तो यहाँ की आरा मिल भी देख लें। मैं एक मैकेनिकल इंजीनियर हूँ। इस तरह की पता नहीं कितनी मिलों की विजिट कर रखी है, इसलिये यह मेरे लिये एक उत्पादन इकाई से ज्यादा कुछ नहीं थी, लेकिन आजकल यह एक पर्यटक स्थल है।
एक बुढ़िया पुल से पहले चौराहे पर स्टूल पर डिब्बा रखकर इडली बेच रही थी। हमें चाहिये सस्ता भोजन और यहाँ से सस्ता कहीं नहीं मिल सकता था। दो प्लेट इडली ले ली। लेकिन दोनों प्लेटों में कम से कम दस बाल निकले। हमने बाल छोड़ दिये और इडली खा ली। और करते भी क्या? इडली थोड़े ही छोड़ते?

Thursday, March 23, 2017

हैवलॉक द्वीप - गोविंदनगर बीच और वापस पॉर्ट ब्लेयर

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22 जनवरी, 2017
‘पानो इको रिसॉर्ट’ में हम ठहरे थे। यह गोविंदनगर बीच के बिल्कुल बगल में है। अच्छा बना हुआ है।
हैवलॉक से हमें आज शाम को निकलना था, लेकिन बोट की बुकिंग न मिल पाने के कारण सुबह वाली बोट में ही बुकिंग करनी पड़ी थी। इस तरह हैवलॉक जैसे खूबसूरत स्थान को देखने के लिये हमारे पास चौबीस घंटे भी नहीं थे। कल राधानगर बीच देख लिया, आज बगल में मौज़ूद गोविंदनगर को देख लेते हैं।
हम नहाने की तैयारी के साथ गये थे, लेकिन जब कोरल चट्टानें देखीं तो नहाने का इरादा त्याग दिया। पानी एकदम शांत था। बड़ी दूर तक पानी में गहराई भी नहीं थी। इक्का-दुक्का पर्यटक ही थे। उनमें भी कई स्कूबा डाइविंग के लिये जाने वाले थे। हमें इस तरह की ‘एक्टिविटी’ रास नहीं आतीं। परसों स्नॉरकलिंग कर ली, बहुत हो गया।

Monday, March 20, 2017

राधानगर बीच @ हैवलॉक द्वीप

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21 जनवरी 2017
वही जहाज जिससे हम कल नील द्वीप आये थे, हमें आज हैवलॉक ले जायेगा। आज सुबह साढ़े सात बजे यह पॉर्ट ब्लेयर से चलेगा और साढ़े नौ बजे नील आ जायेगा। आधे घंटे बाद हैवलॉक के लिये प्रस्थान कर जायेगा।
यहाँ सुबह जल्दी हो जाती है, लेकिन अपनी आदत वही आठ-नौ बजे सोकर उठने की है। होटल का चेक-आउट समय साढ़े सात बजे था। मुझसे पहले दीप्ति उठ गयी। चमत्कार! कहने लगी कि उठ, समुद्र तट पर चलकर नहाते हैं। मैंने मना कर दिया। वह आराम से बिना गुस्सा किये चली गयी। महा चमत्कार!!
जल्दी ही वापस लौट आयी - बिना नहाये। बताया कि यह कोरल तट है। नहाना बहुत मुश्किल है। कोरल तटों पर चोट बड़ी आसानी से लगती है और लगती भी ऐसी है कि खून निकल आता है।

Thursday, March 16, 2017

नील द्वीप: भरतपुर बीच और लक्ष्मणपुर बीच

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20 जनवरी 2017
नैचुरल ब्रिज से पैदल मुख्य बाज़ार तक आने में थक गये। गर्मी भी थी और उमस भी। बाज़ार से भरतपुर बीच आधा किलोमीटर दूर है। पहुँच गये। लेटने की जगह मिल गयी और मैं सो गया।
नील द्वीप पर भरतपुर, सीतापुर, लक्ष्मणपुर और रामनगर सब बीच हैं।
मुझे समुद्र तटों का कोई अनुभव नहीं है। न ही यह पता कि फलाँ बीच ख़ूबसूरत है और फलाँ नहीं है। सभी तट एक-जैसे लगते हैं। मुझे न किसी बीच की विशेषता पता है और न ही वहाँ की ख़ूबियाँ। यही बात आपको इन यात्रा-वृत्तांतों में भी दिख रही होगी। अंडमान यात्रा को मैं पूरे अधिकार से नहीं लिख पा रहा हूँ। दिल पहाड़ों और ट्रेनों में ही बसता है ना।
दो घंटे सो लेने के बाद बड़ा अच्छा लगने लगा। यहाँ भीड़ नहीं थी, लेकिन चहल-पहल थी। कुछ दुकानें थीं, जहाँ केवल एजेंट लोग बैठे थे - समुद्री गतिविधियाँ कराने के लिये। बीच तो रेतीला और साफ़-सुथरा था, लेकिन आगे समुद्र में कोरल थे। इसलिये स्कूबा डाइविंग का अच्छा काम हो रहा था। हाई स्पीड़ वाटर स्कूटर वाला लड़कियों को सैर करा रहा था और तब तक समुद्र में कलाबाजियाँ कराता रहता, जब तक कि लड़की की चीख न निकल जाये।

Monday, March 13, 2017

नील द्वीप में प्राकृतिक पुल के नज़ारे

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20 जनवरी 2017
फोनिक्स-बे जेट्टी - हाँ यही नाम है इस जेट्टी का गूगल मैप में। नील और हैवलॉक जाने वाली बोट यहीं से चलती हैं। हमारी आज की नील द्वीप जाने की बुकिंग थी। सुबह सात बजे जहाज को चलना था, हम साढ़े छह बजे ही पहुँच गये। सुरक्षा-जाँच और चेक-इन के बाद वातानुकूलित जहाज में अपनी-अपनी सीटों पर जा बैठे।
दो घंटे की यह यात्रा थी। समुद्र अशांत था - शायद यह शांत ही कभी-कभार होता होगा। बड़ी-बड़ी लहरें आ रही थीं। भारी-भरकम जहाज को भी अच्छी तरह हिला देतीं। जी.पी.एस. चलाकर जहाज की गति नापी। यह बीस किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चल रहा था। वैसे समुद्री दूरियों को ‘नॉटिकल मील’ में नापते हैं, लेकिन मुझे किलोमीटर ही समझ आता है।
इससे पहले कि हमें समुद्री बीमारी होती और उल्टी आती, हमने मोबाइलों में अपने-अपने पसंदीदा गेम खेलने शुरू कर दिये। मैंने अपने गेम में न जाने कितनी लंबी रेलवे लाइन बिछाकर इस पर ट्रेनें चलायीं और दीप्ति ने ‘सबवे सर्फ़र’ में न जाने कितनी ट्रेनों में टक्कर मारी। इस जहाज पर डेक पर जाने की मनाही थी।

Thursday, March 9, 2017

नॉर्थ-बे बीच: कोरल देखने का उपयुक्त स्थान

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डेढ़ घंटा रॉस द्वीप पर घूमने के बाद हम वापस जेट्टी पहुँच गये। समय की पाबंदी का उदाहरण देखिये - हमारी बोट नंदिनी जेट्टी पर लगायी जा रही थी। अब यह हमें नॉर्थ-बे ले जायेगी।
इसे नॉर्थ-बे आइलैंड़ भी कहा जाता है, लेकिन मैं इसे ‘आइलैंड़’ नहीं कहूँगा। वैसे तो पूरा अंडमान-निकोबार ही द्वीप-समूहों से बना है। पोर्ट ब्लेयर भी एक द्वीप ही है - बहुत बड़ा द्वीप - इसका नाम है दक्षिणी अंडमान। तो यह जो नॉर्थ-बे है ना, यह पोर्ट ब्लेयर वाले मुख्य द्वीप का ही हिस्सा है। यह रॉस आइलैंड़ की तरह अलग से कोई द्वीप नहीं है। इसलिये इसे नॉर्थ-बे द्वीप कहना गलत है। यह दक्षिणी अंडमान द्वीप का एक हिस्सा है और समुद्री-तट होने के कारण इसे ‘नॉर्थ-बे बीच’ कहना ज्यादा उपयुक्त है, ‘नॉर्थ-बे आइलैंड़’ नहीं।
समुद्र में बड़ी उथल-पुथल थी। लहरें नाव को ऊपर उठा देतीं और फिर धड़ाम से नीचे पटक देतीं। इससे इतना पानी छलकता कि नाव के भीतर भी आ जाता।

Monday, March 6, 2017

रॉस द्वीप - ऐसे खंड़हर जहाँ पेड़ों का कब्ज़ा है

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19 जनवरी, 2017
कल जब हम सेलूलर जेल से लौट रहे थे, तो ‘अंडमान वाटर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स’ दिखायी दिया। यही अबरडीन जेट्टी भी है। जेट्टी मतलब ‘बोट-अड्डा’। यहाँ से रॉस द्वीप और नॉर्थ-बे के लिये बोट चलती हैं। चूँकि ये दोनों स्थान पास ही हैं और यहाँ से दिखायी भी देते हैं, इसलिये किसी भी तरह की एड़वांस बुकिंग की आवश्यकता नहीं।
सरकारी बोट भी चलती होगी, जो प्राइवेट से सस्ती होती होगी। लेकिन हमने प्राइवेट बोट चुनी। दोनों स्थानों पर आने-जाने का इनका किराया 550 रुपये प्रति व्यक्ति था। प्रत्येक बोट का अपना एक नाम होता है। हमें जो बोट मिली, उसका नाम था नंदिनी। यही बोट हमें पहले रॉस द्वीप ले जायेगी, फिर नॉर्थ-बे ले जायेगी और आख़िर में वापस अबरडीन जेट्टी भी लायेगी। रॉस द्वीप पर डेढ़ घंटा रुकना था और नॉर्थ-बे पर ढाई घंटे।