Monday, October 10, 2016

खंड़वा से बीड़ ट्रेन यात्रा

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हमें खंड़वा से बीड़ जाना था। वैसे तो बीड़ नामक एक जिला महाराष्ट्र में भी है। महाराष्ट्र वाले बीड़ में अभी रेल नहीं पहुँची है, काम चल रहा है। लेकिन हमें महाराष्ट्र वाले बीड़ नहीं जाना था।
नर्मदा पर जब इंदिरा सागर बाँध बना, तो हरसूद शहर और उसके आसपास की रेलवे लाइन को भी डूब क्षेत्र में आ जाना था। यह मुम्बई-इटारसी वाली रेलवे लाइन ही थी - ब्रॉड़ गेज डबल ट्रैक इलेक्ट्रिफाइड़। तो रेलवे लाइन का दोबारा एलाइनमेंट किया गया। बाँध के दक्षिण में कुछ ज्यादा चक्कर लगाकर - तलवड़िया से खिरकिया तक। नये मार्ग से ट्रेनें चलने लगीं और पुराने मार्ग का काफी हिस्सा बाँध में डूब गया। फिर भी तलवड़िया से बीड़ तक का पुराना मार्ग डूबने से बचा रह गया। बीड़ में एक पावर प्लांट भी है, जिसके कारण वहाँ नियमित रूप से मालगाड़ियाँ चलती हैं। खंड़वा से बीड़ तक दिन में तीन जोड़ी पैसेंजर ट्रेनें भी चलती हैं - रविवार छोड़कर। बीड़ से छह-सात किलोमीटर आगे रेल की पटरियाँ पानी में डूब जाती हैं। सैटेलाइट से इन्हें डूबते हुए और फिर उस तरफ निकलते हुए स्पष्ट देखा जा सकता है।

Friday, October 7, 2016

मीटरगेज ट्रेन यात्रा: महू-खंड़वा

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29 सितंबर 2016
सुबह साढ़े पाँच बजे इंदौर रेलवे स्टेशन पर मैं और सुमित बुलेट पर पहुँचे। बाइक पार्किंग में खड़ी की और सामने बस अड्ड़े पर जाकर महू वाली बस के कंडक्टर से पूछा, तो बताया कि सात बजे बस महू पहुँचेगी। क्या फायदा? तब तक तो हमारी ट्रेन छूट चुकी होगी। पुनः बाइक उठायी और धड़-धड़ करते हुए महू की ओर दौड़ लगा दी।
खंड़वा जाने वाली मीटरगेज की ट्रेन सामने खड़ी थी - एकदम खाली। सुमित इसके सामने खड़ा होकर ‘सेल्फी’ लेने लगा, तो मैंने टोका - ज़ुरमाना भरना पड़ जायेगा। छह चालीस पर ट्रेन चली तो हम आदतानुसार सबसे पीछे वाले ‘पुरुष डिब्बे’ में जा चढ़े। अंदर ट्रेन में पन्नी में अख़बार में लिपटा कुछ टंगा था। ऐसा लगता था कि पराँठे हैं। हम बिना कुछ खाये आये थे, भूखे थे। सुमित ने कहा - नीरज, माल टंगा है कुछ। मैंने कहा - देख, गर्म है क्या? गर्म हों, तो निपटा देते हैं। हाथ लगाकर देखा - ठंड़े पड़े थे। छोड़ दिये।

Monday, October 3, 2016

पैसेंजर ट्रेन-यात्रा: गुना-उज्जैन-नागदा-इंदौर

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27 सितंबर, 2016
स्थान: अनंत पेट
गाड़ी एक घंटे से भी ज्यादा विलंब से चल रही थी। ग्वालियर में कुछ नहीं खा पाया। ऊपर लेटा रहा और जब तक पता चलता कि यह ग्वालियर है, तब तक देर हो चुकी थी। तेज भूख लगी थी। अब अच्छी-खासी चलती गाड़ी को अनंत पेट पर रोक दिया। दो ट्रेनें पास हुईं, तब इसे पास मिला।
अनंत पेट... पता नहीं इनमें से भूखे कितने हैं? मुझे तो एक पेट का ही पता है। इससे अच्छा तो थोड़ा आगे डबरा में रोक देते। कम से कम खाने को कुछ तो मिल जाता। वैसे यह कितनी मजेदार बात है - अनंत पेट में भूखे रहे और ‘डबरे’ में भोजन मिल जाता। है ना?
खैर, झाँसी में टूट पड़ना है खाने पर। इधर ट्रेन में भी कुछ नहीं। चौबीस घंटे चिल्लाते रहने वाले किसी वेंड़र की कोई आवाजाही नहीं। अच्छा है। ऐसी ही शांतिपूर्ण होनी चाहिये रेलयात्रा।