Friday, July 29, 2016

गढवाल में बाइक यात्रा

इसी साल फरवरी में हमारी योजना शिमला जाने की बनी। उम्मीद थी कि इन दिनों तक बर्फ पड जायेगी और हम छोटी ट्रेन में बर्फीले रास्तों का सफर तय करेंगे। साथ चलने वालों में नागटिब्बा यात्रा के साथी नरेंद्र, उसकी घरवाली पूनम और ग्वालियर से प्रशांत जी तैयार हुए। शिमला में रिटायरिंग रूम भी ऑनलाइन बुक कर लिये थे।
एक दिन पहले प्रशांत जी ने आने में असमर्थता जता दी। उनके यहां एक देहांत हो गया था। लेकिन कमाल की बात यह रही कि 15 फरवरी की दोपहर 12:10 बजे कालका से चलने वाली छोटी ट्रेन का चार्ट 13 फरवरी को ही बन गया था। इस वजह से प्रशांत जी का आरक्षण भी रद्द नहीं हो सका। हाँ, शिमला में रिटायरिंग रूम अवश्य रद्द कर दिया था।
मैं 15 की सुबह नाइट ड्यूटी करके आया। 07:40 बजे नई दिल्ली से शताब्दी में आरक्षण था। नरेंद्र और पूनम कल ही हमारे यहां आ गये थे। नहा-धोकर बिना नाश्ता किये जब घर से निकले तो 07:10 बज चुके थे। सुबह के समय मेट्रो भी देर-देर में आती है। जब नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन से बाहर निकले तो 07:40 हो चुके थे। कालका शताब्दी के लेट होने की संभावना तो थी ही नहीं। जब लंबी लाइन की सुरक्षा जांच के बाद पैदल-पार-पथ से एक के बाद एक प्लेटफार्म पार करते हुए प्लेटफार्म नंबर 2 पर पहुंचे, तो 07:50 हो गये थे और दूर शताब्दी जाती हुई दिख रही थी। कोई और ट्रेन होती, तो शायद उतना दुख न होता; लेकिन शताब्दी के छूट जाने का बहुत दुख हुआ। ऊपर से भागदौड और भीड में निशा व पूनम किसी दूसरे पैदल-पार-पथ पर जा चढीं और हम कुछ देर के लिये अलग हो गये। मैं और नरेंद्र साथ थे। चूंकि ट्रेन हमें जाती हुई दिख रही थी, तो हमें लगा कि कहीं वे दोनों ट्रेन में न चढ गई हों। यही निशा और पूनम को भी लगा। तीसरी हताशा की बात थी कि न निशा के पास फोन था और न ही पूनम के पास। अब वे ही किसी के मोबाइल से हमें फोन करेंगी और हम इंतजार करते हुए खाली पडी एक बेंच पर बैठ गये।

Monday, July 4, 2016

खम्भात-आणंद-गोधरा पैसेंजर ट्रेन यात्रा

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15 मार्च 2016
जब आणंद के उस 100 रुपये वाले आलीशान कमरे में मैं गहरी नींद में सोया हुआ था तो विमलेश जी का फोन आया- उठ जाओ। चार बज गये। वैसे मैंने अलार्म भी लगा रखा था लेकिन अलार्म से अक्सर मेरी आंख नहीं खुला करती। विमलेश जी गजब इंसान हैं कि चार बजे उठ गये, केवल मुझे जगाने को। अगर मैं नींद में उनका फोन न उठाता, तो मुझे यकीन है कि स्टेशन स्टाफ आ जाता मुझे जगाने।
04:55 बजे खम्भात की ट्रेन थी। आणंद-खम्भात के बीच में सभी डेमू ट्रेनें ही चलती हैं, विद्युतीकृत मार्ग नहीं है। खम्भात के नाम पर ही खम्भात की खाडी नाम पडा। खम्भात के पास साबरमती नदी समुद्र में गिरती है। ब्रिटिश काल में इसे कैम्बे कहा जाता था, जिसकी वजह से खम्भात स्टेशन का कोड आज भी CBY है।