Wednesday, June 29, 2016

यात्रा पुस्तक चर्चा

पिछले दिनों कुछ यात्रा पुस्तकें पढने को मिलीं। इनके बारे में संक्षेप में लिख रहा हूं:

1. कर विजय हर शिखर (प्रथम संस्करण, 2016)
लेखिका: प्रेमलता अग्रवाल
प्रकाशक: प्रभात पेपरबैक्स
ISBN: 978-93-5186-574-2



दार्जीलिंग में मारवाडी परिवार में जन्मीं प्रेमलता अग्रवाल का विवाह जमशेदपुर में हुआ। संयुक्त परिवार था और उन्हें पारिवारिक दायित्वों का कडाई से पालन करना होता था। कभी घुमक्कडी या पर्वतारोहण जैसी इच्छा मन में पनपी ही नहीं। समय का चक्र चलता रहा और दो बेटियां भी हो गईं। इसके आगे प्रेमलता जी लिखती हैं:
“मैं अपनी बेटियों को हर खुशी देना चाहती थी। उनकी हर जरूरत का ख्याल रखती। मैं तो जीवन में कुछ न कर सकी, लेकिन बेटियों को पढा-लिखाकर अपने पैरों पर खडा करना है, यही सोचती थी।”
जमशेदपुर टाटा स्टील द्वारा विकसित किया गया है। उनकी दोनों बेटियां इसी टाटा स्टील के स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में टेनिस खेलने जाया करती थीं। प्रेमलता जी पर उन्हें लाने - ले जाने की जिम्मेदारी थी। दो घण्टे तक उन्हें वहीं बैठे रहना होता। समय बर्बाद होता है - यह सोचकर इन्होंने वहीं फिटनेस सेंटर जॉइन कर लिया। अपनी फिटनेस के प्रति ये पहले से ही जागरुक थीं।
फिर एक दिन सुप्रसिद्ध पर्वतारोही हरीश कपाडिया जी आये और उन्होंने सबको एक छोटी सी फिल्म दिखाई। यह फिल्म एडवेंचर कोर्स से सम्बन्धित थी। इस फिल्म ने प्रेमलता जी को यह सोचने के लिये प्रेरित किया कि अपनी बेटियों को भी यह कोर्स कराना है। इसी सिलसिले में उनकी मुलाकात सुप्रसिद्ध महिला पर्वतारोही बचेन्द्री पाल जी से हुई। शायद आप जानते होंगे कि टाटा स्टील का अपना एक एडवेंचर संस्थान है, जिसकी अध्यक्ष बचेन्द्री पाल हैं। प्रेमलता जी जब बचेन्द्री जी से मिली तो अपनी बेटियों को पर्वतारोहण सिखाने के बारे में पूछताछ करने लगीं। बातों-बातों में बचेन्द्री जी ने कह दिया-
“बेटियां तो ठीक हैं, लेकिन इसे तो आप भी कर सकती हैं।”
और यह थी प्रेमलता अग्रवाल की पद्मश्री प्रेमलता अग्रवाल बनने की शुरूआत।
यह आसान नहीं था। दो जवान बेटियों की मां, जिसने परिवार के अलावा और कुछ कभी नहीं सोचा, बटियों के लिये पूछताछ करने गई थी। हालांकि ससुराल वालों ने भरपूर साथ दिया। लेकिन पहले दिन उन्होंने कैसे हिम्मत की होगी ट्रैकसूट पहनकर ससुर के सामने खडे होने की?
“जहां पहले मैं कई तरह के डरों से घिरी रहती थी; जैसे असफलता का डर, लोग क्या कहेंगे, कहीं परिवार वाले नाराज तो नहीं हो जायेंगे, समाज का डर। कुछ करने से पहले ही मैं इन डरों से खुद को घिरा हुआ पाती थी और इसी डर की वजह से कुछ बोल नहीं पाती थी। अब मैं महसूस कर रही थी कि ये सभी डर मेरे खुद के पैदा किये हुए थे।”
“मैंने देखा है कि अक्सर लोग समय की दुहाई देते हैं कि हम फलां काम नहीं कर पा रहे हैं। समय ही नहीं मिल रहा है। लेकिन मैं मानती हूं कि समय तो चुराना पडता है। मैं तो एक हाउस वाइफ हूं, उसके बाद भी इतना कुछ कर सकी। इसलिये कि मैंने सबसे पहले अपने टाइम मैनेजमेंट को ठीक किया। समय बिल्कुल भी बर्बाद नहीं किया, बल्कि समय का सदुपयोग किया।”
15 दिन का एडवेंचर कोर्स होता है नेहरू पर्वतारोहण संस्थान उत्तरकाशी में। प्रेमलता जी अपनी दोनों बेटियों के साथ वहां गईं और उत्कृष्ट ग्रेड लेकर लौटीं। इसके बाद बेसिक माउण्टेनियरिंग कोर्स किया। फिर एडवांस कोर्स और फिर एक दिन दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट पर जा चढीं। यह कारनामा करने वाली वे देश की सबसे अधिक उम्र की महिला बनीं।
लेकिन वे यहीं नहीं रुकीं। इसके बाद उन्होंने ‘सेवन समिट’ भी किया। यानी सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों पर चढने का कारनामा। ऐसा करने वाली वे दूसरी भारतीय और पहली भारतीय महिला बनीं।
इतना सब करने के बाद पद्मश्री तो बनता ही है। 176 पन्नों की पुस्तक में यह सारी कहानी विस्तार से लिखी है। कुछ रंगीन चित्र भी हैं, जो पुस्तक में चार चांद लगाते हैं। पुस्तक की भूमिका बचेन्द्री पाल ने ही लिखी है, जो किसी भी लेखक के लिये बडे सम्मान की बात है।

2. चाय, चाय - ऐसे स्टेशन जो पडाव तो हैं लेकिन मंज़िल नहीं
लेखक: बिश्वनाथ घोष
अनुवाद: शुचिता मीतल
प्रकाशक: ट्रैंकेबार प्रेस, यात्रा बुक्स के सहयोग से, 2016
ISBN: 978-93-85724-75-6
मूल्य: 250 रुपये (पेपरबैक)
पृष्ठ: 262
यह पुस्तक बिल्कुल ही एक नई तरह की यात्रा और नये तरह के नज़रिये के साथ लिखी गई है। बहुत सारे ऐसे रेलवे स्टेशन हैं जो हैं तो बहुत बडे-बडे - रेलवे के लिये उनका बहुत ज्यादा महत्व है, जैसे मुगलसराय, इटारसी आदि। लेकिन हम कभी यहां नहीं उतरते। उतरते भी हैं तो केवल ट्रेन बदलने के लिये। घूमने के लिये तो कभी नहीं। लेखक ने ऐसे ही स्टेशनों को अपना पडाव बनाया है। जहां हम दो घण्टे भी रुकना नहीं चाहते, वहां लेखक दो-दो, तीन-तीन दिन तक रुका और उसकी गलियों की खाक छानी।
घोष साहब पेशे से पत्रकार हैं। इसलिये लिखने में किसी भी तरह की कंजूसी नहीं दिखाई। आप सुबह के तीन बजे मुगलसराय उतरते हैं, आपको पता है कि यह अपराधियों का गढ है, ऐसे में आपकी जो भी मनोदशा होगी, वो पुस्तक में पढने को मिलेगा। जिन स्टेशनों और शहरों-कस्बों का इसमें वर्णन हैं, वे हैं - मुगलसराय, झांसी, इटारसी, गुंटाकल, अरक्कोणम, जोलारपेट्टई और शोरानूर। ये सारे शहर रेलवे के लिहाज़ से बहुत बड़े जंक्शन हैं। झांसी को छोडकर कोई भी पर्यटन मानचित्र में नहीं है। आपको अगर कहा जाये कि इटारसी या गुंटाकल में तीन दिन रुकना है और लोगों से बातचीत करनी है, ज्यादा से ज्यादा जानकारी इकट्ठी करनी है और ज्यादा से ज्यादा अनुभव हासिल करना है, तो आप नहीं रुक पायेंगे। मैं भी तीन घण्टे से ज्यादा नहीं रुक पाऊंगा और लोगों से बातचीत तो कतई नहीं कर पाऊंगा। एक सिगरेट की दुकान पर रुके, सिगरेट पीते-पीते शहर का इतिहास-भूगोल तो जाना ही, साथ ही उसके घर-परिवार की भी जानकारी हासिल कर ली। चलते-चलते यह भी पूछ लिया कि इसके बारे में और ज्यादा जानकारी कौन दे सकता है। और इसी तरह एक से दूसरे के पास, फिर तीसरे से मिलते-मिलाते इन्होंने अपना समय इन शहरों में कैसे काटा, यह पढना बहुत दिलचस्प है।
दो बातें जो मुझे अच्छी नहीं लगीं, उनमें पहली है कि लेखक को शराब की बडी बुरी लत है। यह लत कई बार तो इतनी बढ जाती है कि सुबह ही पीना शुरू कर देते हैं। दूसरी बात कि नियमित रेलयात्री होने के बावज़ूद भी और रेलवे स्टेशनों पर पुस्तक लिखने की योजना के बावज़ूद भी लेखक एक-दो घण्टे की रेलयात्रा को साधारण डिब्बे में करना पसन्द नहीं करते। फिर भी ये सब लेखक की अपनी कमियां - या खूबियां - हैं, पुस्तक में कोई कमी नहीं है। आप स्वयं को लेखक के साथ-साथ चलता हुआ देखते हैं। कई बातें आपको ‘इरीटेट’ भी कर सकती हैं, लेकिन फिर भी आप स्वयं को लेखक के साथ साथ चलता हुआ पाते हैं।
अनुवादिका शुचिता मीतल ने बहुत अच्छा अनुवाद किया है लेकिन कई बार केवल शब्दों का अनुवाद करके हिन्दी को बोझिल बना दिया है। कुछ चीजें अंग्रेजी में एक तरह से लिखी जाती हैं, लेकिन हिन्दी में उसी तरह से नहीं लिखी जा सकतीं। उसके लिये थोडी सी ‘कॉमन सेंस’ चाहिये। इसमें आपको शब्द भी बदलने पडेंगे। जो शब्द अंग्रेजी में लिखा है, ठीक उसका अनुवाद कई बार हिन्दी पढना अच्छा नहीं लगता। ऐसे में अपनी तरफ से भी कोई शब्द जोडना पडता है। बावज़ूद इसके, अनुवाद अच्छा है।



लेखक: ऋषि राज
प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन
ISBN: 978-93-5186-204-8
मूल्य: 250 रुपये (हार्डकवर)
पृष्ठ: 152


ऋषि राज जी पहले रेलवे में उच्चाधिकारी थे और अब दिल्ली मेट्रो में। रेलवे में रहने के दौरान उन्होंने पूरा भारत घूम डाला। इस पुस्तक में उन्होंने अपने उन्हीं अनुभवों को साझा किया है। लद्दाख से लेकर कन्याकुमारी तक और तवांग से लेकर द्वारका तक की यात्राएं इसमें शामिल हैं। वृत्तान्त ज्यादा विस्तृत नहीं हैं और न ही स्थापित लेखकों जैसे बोरियत भरे। लेखक का अपना स्टाइल है लिखने का और अपनी गति से वृत्तान्त आगे बढते हैं। कई बार तो एक वृत्तान्त के अन्दर पुराना कोई वृत्तान्त भी पढने को मिल जाता है। एक दृष्टा के रूप में उन्होंने ये सभी वृत्तान्त लिखे हैं। गम्भीरता का कहीं नामोनिशान नहीं, हल्का फुल्का हास्य-विनोद हमेशा साथ चलता है-
“मैं खाने का बहुत शौकीन हूं और मेरी सेहत देखकर इसका अन्दाजा भी तुरन्त ही लगाया जा सकता है।”
“तभी सहसा बर्फ के दर्शन शुरू हो गये। थोडी बर्फ, फिर और, फिर और ज्यादा, फिर तो कहना ही क्या, हम बर्फ से मालामाल हो गये।”
“जब भी कोई मुझसे यह पूछता है कि आपका इतना घूमना कैसे सम्भव हो पाता है, तो मैं यही बोलता हूं कि घूमने के लिये समय नहीं, बल्कि जज्बे और नीयत की जरूरत होती है।”
कहते हैं-
“दिल्ली हिन्दुस्तान में एक ऐसा शहर है, जहां से ज्यादा से ज्यादा बारह घण्टों में आप अपनी मनचाही जगह पहुंच सकते हैं। बर्फ देखने का मन है तो रोहतांग पास, रेगिस्तान देखना है तो जैसलमेर, समुद्र देखने का मन है तो वापी, जहां से दमन का समुद्र सिर्फ 12 किमी दूर है। ये सभी स्थान दिल्ली से 12-14 घण्टे दूर हैं।”
पुस्तक में कुछ तथ्यों की गलती जरूर है, जैसे कि- “औली जोशीमठ जिले में है।” इसके बावजूद भी पुस्तक पठनीय है। ऋषि राज जी की तीसरी पुस्तक भी शीघ्र ही आने वाली है, जो देशभक्ति से सम्बन्धित स्थानों के बारे में होगी।


9 comments:

  1. Bahut achcha laga neeraj bhai book review padhkar....

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  2. बहुत अच्छे नीरज भाई आज कल पुस्तकों की समीक्षा भी लिखने लगे.
    वास्तव मे अति उत्तम..

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  3. neeraj pustak smiksha achi bat hai.ishi bahane acchi pustko ki jankari mil jati hai.annuradh beniwal ji ki likhi pustak,"aazadi mera brand" jiska jikar aapne ek lekh ke doran kiya tha. maine voh pustak turant mangwai aur padi bahut achi lagi.mujhe pustak padne ki aadat shuru se hi hai.uper likhi jo pasand aayegi us ko bhi order karunga. achhi pustko ki jankari ke liye sadhuvad.

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  4. नीरज जी का एक नया रूप और वह भी पुस्तक समीक्षक के रूप में । यह मजेदार समीक्षा है तथा किसी वरिष्ठ समीक्षक की समीक्षा जैसी लग रही है । बहुत बढ़िया ।

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  5. नीरजजी आप कमाल का लिखते हैं |

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  6. पुस्तक समीक्षा पढ़कर आनंद आ गया।
    बहुत खूब...!! नीरज भाई।

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  7. बहुत अच्छे नीरज भाई आज कल पुस्तकों की समीक्षा भी लिखने लगे.
    वास्तव मे अति उत्तम..

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  8. Nice story. The Kedarnath temple, dating back to the 8th century, nestles in the shadow of this great mountain.

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  9. नीरज एक बार तुने कहा था " आजादी मेरा ब्रांड " लेखिका अनुराधा बेनीवाल यह तो पढी ही इसके साथ Amazon online Shopping की बहुत अधिक Discount पर १- आजादी मेरा ब्रांड 99/-, मम्मा की डायरी -अनुराग चौधरी @55/-, मसाला चाय-द्विव्य प्रकाश दुबे @63/-,मुसाफिर कैफे -द्विव्य प्रकाश दुबे @97/-,तीन रोज इश्क- पूजा उपाध्याय @87/- कुल्फी ओर केपशि कम्म@75/-,नमकसुवादनुसार@63/- बहुत अच्छी लगी पढने मे ओर सस्ती भी मिल गयी सारी पुस्तकें केवल 549/- ओर डिलिवरी फि्री , सुझाव के लिए धन्यवाद नीरज


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