Friday, July 31, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 10 (शिरशिरला-खालसी)

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13 जून 2015
सवा दो बजे हम शिरशिरला पहुंच गये थे। यह स्थान समुद्र तल से 4800 मीटर ऊपर है। यहां से फोतोकसर दिख तो नहीं रहा था लेकिन अन्दाजा था कि कम से कम दस किलोमीटर तो होगा ही। रास्ता ढलान वाला है, फिर भी स्पीड में कोई बढोत्तरी नहीं होगी। हम औसतन दस किलोमीटर प्रति घण्टे की रफ्तार से यहां तक आये थे। फिर भी मान लो आधा घण्टा ही लगेगा। यानी हम तीन बजे तक फोतोकसर पहुंच जायेंगे। भूख लगी थी, खाना भी खाना होगा और गोम्पा भी देखना होगा। जल्दी करेंगे फिर भी चार साढे चार बज जाने हैं। पांच बजे तक वापस शिरशिरला आयेंगे। वापसी में दो घण्टे हनुपट्टा के और फिर कम से कम दो घण्टे ही मेन रोड तक पहुंचने के लगेंगे। यानी वापस खालसी पहुंचने में नौ बज जायेंगे। वैसे तो आज ही लेह पहुंचने का इरादा था जोकि खालसी से 100 किलोमीटर आगे है। हमारा सारा कार्यक्रम बिगड रहा है और हम लेट भी हो रहे हैं।

Tuesday, July 28, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 9 (खालसी-हनुपट्टा-शिरशिरला)

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13 जून 2015
नौ बजकर पचास मिनट हो गये थे जब हम खालसी से निकले। इससे पहले आठ बजे के आसपास हम उठ भी गये थे। कल 200 किलोमीटर बाइक चलाई थी, बहुत थकान हो गई थी। पहाडों में संकरे रास्तों पर 200 किलोमीटर भी बहुत ज्यादा हो जाते हैं। आज हमारे सामने दो विकल्प थे- एक, आज ही लेह जायें और चुशुल, हनले का परमिट लेकर खारदुंग-ला पार कर लें। दूसरा, आज फोतोकसर गोम्पा जायें और रात तक लेह पहुंच जायें। कल रविवार है, परमिट नहीं मिलेगा। इसलिये कल खारदुंग-ला पार जाकर नुब्रा घाटी देख लें और मंगलवार को वापसी में चुशुल, हनले का परमिट ले लें। पहले विकल्प में हमें फोतोकसर देखने को नहीं मिल रहा है लेकिन दूसरे में फोतोकसर भी मिल रहा है और बाकी सबकुछ भी। इसलिये दूसरा विकल्प चुना।
आलू के परांठे खाते समय होटल वाले ने पक्का कर दिया कि फोतोकसर तक बाइक चली जायेगी।

Friday, July 24, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा-8 (बटालिक-खालसी)

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12 जून 2015
सिन्धु यहां बहुत गहरी घाटी में बहती है। पहाड बिल्कुल सीधे खडे हैं। ऐसे इलाके दुर्गम होते हैं। लेकिन इसके बावजूद भी यहां कुछ बसावट है, कुछ गांव हैं। इनमें जो लोग निवास करते हैं, वे स्वयं को शुद्ध आर्य बताते हैं। इसीलिये धा और हनुथांग व अन्य गांव प्रसिद्ध हैं। वैसे तो हिमाचल के मलाणा निवासी भी स्वयं को आर्य कहते हैं लेकिन उनमें बहुत सी गन्दगी पनप गई है। यहां वो गन्दगी नहीं है। मेरी इच्छा इसी तरह के किसी गांव में रुकने की थी। लद्दाख के ज्यादातर गांवों में होम-स्टे की सुविधा मिलती है, रुकने की ज्यादा समस्या नहीं आती।
लेकिन हम चलते रहे। शाम का समय था और सूरज की किरणें अब नीचे नहीं आ रही थीं। अन्धेरा होने से पहले ही रुक जाना ठीक था। लेकिन धा गांव कब निकल गया, पता ही नहीं चला। एक निर्जन पुल के पास साइनबोर्ड अवश्य लगा था जिस पर मोटे मोटे अक्षरों में अंग्रेजी में लिखा था- धा। हो सकता है कि गांव सडक से कुछ ऊपर हो। हम इसे छोडकर आगे बढ गये। धा के बाद एक गांव और मिला। यहां एक होम-स्टे का बोर्ड भी लगा था लेकिन हम इसे भी छोडकर आगे चल दिये।

Wednesday, July 22, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 7 (द्रास-कारगिल-बटालिक)

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12 जून 2015, शुक्रवार
सुबह आराम से सोकर उठे। कल जोजी-ला ने थका दिया था। बिजली नहीं थी, इसलिये गर्म पानी नहीं मिला और ठण्डा पानी बेहद ठण्डा था, इसलिये नहाने से बच गये।
आज इस यात्रा का दूसरा ‘ऑफरोड’ करना था। पहला ऑफरोड बटोट में किया था जब मुख्य रास्ते को छोडकर किश्तवाड की तरफ मुड गये थे। द्रास से एक रास्ता सीधे सांकू जाता है। कारगिल से जब पदुम की तरफ चलते हैं तो रास्ते में सांकू आता है। लेकिन एक रास्ता द्रास से भी है। इस रास्ते में अम्बा-ला दर्रा पडता है। योजना थी कि अम्बा-ला पार करके सांकू और फिर कारगिल जायेंगे, उसके बाद जैसा होगा देखा जायेगा।
लेकिन बाइक में पेट्रोल कम था। द्रास में कोई पेट्रोल पम्प नहीं है। अब पेट्रोल पम्प कारगिल में ही मिलेगा यानी साठ किलोमीटर दूर। ये साठ किलोमीटर ढलान है, इसलिये आसानी से बाइक कारगिल पहुंच जायेगी। अगर बाइक में पेट्रोल होता तो हम सांकू ही जाते। यहां से अम्बा-ला की ओर जाती सडक दिख रही थी। ऊपर काफी बर्फ भी थी। पूछताछ की तो पता चला कि अम्बा-ला अभी खुला नहीं है, बर्फ के कारण बन्द है। कम पेट्रोल का जितना दुख हुआ था, सब खत्म हो गया। अब मुख्य रास्ते से ही कारगिल जायेंगे।

Monday, July 20, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 6 (श्रीनगर-सोनमर्ग-जोजीला-द्रास)

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11 जून 2015
सुबह साढे सात बजे उठे। मेरा मोबाइल तो बन्द ही था और कोठारी साहब का पोस्ट-पेड नम्बर हमारे पास नहीं था। पता नहीं वे कहां होंगे? मैं होटल के रिसेप्शन पर गया। उसे अपनी सारी बात बताई। उससे मोबाइल मांगा ताकि अपना सिम उसमें डाल लूं। मुझे उम्मीद थी की कोठारी साहब लगातार फोन कर रहे होंगे। पन्द्रह मिनट भी सिम चालू रहेगा तो फोन आने की बहुत प्रबल सम्भावना थी। लेकिन उसने मना कर दिया। मैंने फिर उसका फोन ही मांगा ताकि नेट चला सकूं और कोठारी साहब को सन्देश भेज सकूं। काफी ना-नुकुर के बाद उसने दो मिनट के लिये अपना मोबाइल मुझे दे दिया।
बस, यही एक गडबड हो गई। होटल वाले का व्यवहार उतना अच्छा नहीं था और मुझे उससे प्रार्थना करनी पड रही थी। यह मेरे स्वभाव के विपरीत था। अब जब उसने अपना मोबाइल मुझे दे दिया तो मैं चाहता था कि जल्द से जल्द अपना काम करके उसे मोबाइल लौटा दूं। इसी जल्दबाजी में मैंने फेसबुक खोला और कोठारी साहब को सन्देश भेजा- ‘सर, नौ साढे नौ बजे डलगेट पर मिलो। आज द्रास रुकेंगे।’ जैसे ही मैसेज गया, मैंने लॉग आउट करके मोबाइल वापस कर दिया। इसी जल्दबाजी में मैं यह देखना भूल गया कि कोठारी साहब मुझे एक मैसेज पहले ही भेज चुके थे- ‘नीरज, कहां हो तुम? तुम्हारा मोबाइल नहीं लग रहा है। मैं घण्टाघर के पास सनातन यात्री निवास में कमरा नम्बर 307 में रुका हुआ हूं।’ अपना सन्देश भेजने के चक्कर में उनका यह सन्देश मैं नहीं देख सका। अन्यथा सीधा सनातन यात्री निवास में ही चला जाता।

Wednesday, July 15, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा-5 (पारना-सिंथन टॉप-श्रीनगर)

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10 जून 2015
सात बजे सोकर उठे। हम चाहते तो बडी आसानी से गर्म पानी उपलब्ध हो जाता लेकिन हमने नहीं चाहा। नहाने से बच गये। ताजा पानी बेहद ठण्डा था।
जहां हमने टैंट लगाया था, वहां बल्ब नहीं जल रहा था। रात पुजारीजी ने बहुत कोशिश कर ली लेकिन सफल नहीं हुए। अब हमने उसे देखा। पाया कि तार बहुत पुराना हो चुका था और एक जगह हमें लगा कि वहां से टूट गया है। वहां एक जोड था और उसे पन्नी से बांधा हुआ था। उसे ठीक करने की जिम्मेदारी मैंने ली। वहीं रखे एक ड्रम पर चढकर तार ठीक किया लेकिन फिर भी बल्ब नहीं जला। बल्ब खराब है- यह सोचकर उसे भी बदला, फिर भी नहीं जला। और गौर की तो पाया कि बल्ब का होल्डर अन्दर से टूटा है। उसे उसी समय बदलना उपयुक्त नहीं लगा और बिजली मरम्मत का काम जैसा था, वैसा ही छोड दिया।

Wednesday, July 8, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा-4 (बटोट-डोडा-किश्तवाड-पारना)

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9 जून 2015
हम बटोट में थे। बटोट से एक रास्ता तो सीधे रामबन, बनिहाल होते हुए श्रीनगर जाता ही है, एक दूसरा रास्ता डोडा, किश्तवाड भी जाता है। किश्तवाड से सिंथन टॉप होते हुए एक सडक श्रीनगर भी गई है। बटोट से मुख्य रास्ते से श्रीनगर डल गेट लगभग 170 किलोमीटर है जबकि किश्तवाड होते हुए यह दूरी 315 किलोमीटर है।
जम्मू क्षेत्र से कश्मीर जाने के लिये तीन रास्ते हैं- पहला तो यही मुख्य रास्ता जम्मू-श्रीनगर हाईवे, दूसरा है मुगल रोड और तीसरा है किश्तवाड-अनन्तनाग मार्ग। शुरू से ही मेरी इच्छा मुख्य राजमार्ग से जाने की नहीं थी। पहले योजना मुगल रोड से जाने की थी लेकिन कल हुए बुद्धि परिवर्तन से मुगल रोड का विकल्प समाप्त हो गया। कल हम बटोट आकर रुक गये। सोचने-विचारने के लिये पूरी रात थी। मुख्य राजमार्ग से जाने का फायदा यह था कि हम आज ही श्रीनगर पहुंच सकते हैं और उससे आगे सोनामार्ग तक भी जा सकते हैं। किश्तवाड वाले रास्ते से आज ही श्रीनगर नहीं पहुंचा जा सकता। अर्णव ने सुझाव दिया था कि बटोट से सुबह चार-पांच बजे निकल पडो ताकि ट्रैफिक बढने से पहले जवाहर सुरंग पार कर सको। अर्णव को भी हमने किश्तवाड के बारे में नहीं बताया था।

Monday, July 6, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 3 (जम्मू से बटोट)

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8 जून 2015
आज का दिन बहुत खराब बीता और बहुत अच्छा भी। पहले अच्छाई। कोठारी साहब की बाइक स्टार्ट होने में परेशानी कर रही थी और कुछ इंडीकेटर भी ठीक काम नहीं कर रहे थे। मुझे लगा बैटरी में समस्या है। इसे ठीक कराना जरूरी था क्योंकि आगे ऊंचाईयों पर ठण्ड में यह काम करना बन्द भी कर सकती है।
चलिये, आगे की कहानी शुरू से शुरू करते हैं।
छह बजे मेरी आंख खुल गई थी हालांकि अलार्म 7 बजे का लगाया था। अभी तक निशा भी सो रही थी और कोठारी साहब भी। यह बडी अच्छी बात है कि कोठारी जी भी पक्के सोतडू हैं। उनके ऐसा होने से इतना तो पक्का हो गया कि इस यात्रा में मुझे कभी कोई नहीं उठायेगा। निशा भी इसी श्रेणी की जीव है। अगर उसे न उठाया जाये तो वह दस बजे तक भी नहीं उठने वाली।

Thursday, July 2, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 2 (दिल्ली से जम्मू)

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यात्रा आरम्भ करने से पहले एक और बात कर लेते हैं। परभणी, महाराष्ट्र के रहने वाले निरंजन साहब पिछले दो सालों से साइकिल से लद्दाख जाने की तैयारियां कर रहे थे। लगातार मेरे सम्पर्क में रहते थे। उन्होंने खूब शारीरिक तैयारियां की। पश्चिमी घाट की पहाडियों पर फुर्र से कई-कई किलोमीटर साइकिल चढा देते थे। पिछले साल तो वे नहीं जा सके लेकिन इस बार निकल पडे। ट्रेन, बस और सूमो में यात्रा करते-करते श्रीनगर पहुंचे और अगले ही दिन कारगिल पहुंच गये। कहा कि कारगिल से साइकिल यात्रा शुरू करेंगे।

खैर, निरंजन साहब आराम से तीन दिनों में लेह पहुंच गये। यह जून का पहला सप्ताह था। रोहतांग तभी खुला ही था, तंगलंग-ला और बाकी दर्रे तो खुले ही रहते हैं। बारालाचा-ला बन्द था। लिहाजा लेह-मनाली सडक भी बन्द थी। पन्द्रह जून के आसपास खुलने की सम्भावना थी। उनका मुम्बई वापसी का आरक्षण अम्बाला छावनी से 19 जून की शाम को था। इसका अर्थ था कि उनके पास 18 जून की शाम तक मनाली पहुंचने का समय था। मैंने मनाली से लेह साइकिल यात्रा चौदह दिनों में पूरी की थी। मुझे पहाडों पर साइकिल चलाने का अभ्यास नहीं था। फिर मनाली लगभग 2000 मीटर पर है, लेह लगभग 3500 मीटर पर है। मैं 2000 से 3500 मीटर पर गया था, जबकि निरंजन साहब को 3500 मीटर से 2000 मीटर पर आना था, उन्हें पहाडों पर साइकिल चलाने का अनुभव भी था। इसलिये उन्हें यह यात्रा करने में एक सप्ताह ही लगता या फिर ज्यादा से ज्यादा दस दिन। उनके पास अभी भी पन्द्रह दिन थे यानी कम से कम पांच दिन ज्यादा।