Friday, January 16, 2015

शिंगो-ला से दिल्ली वापस

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अगले दिन यानी 18 अगस्त को सुबह आठ बजे सोकर उठा। चाय पी, कुछ बिस्कुट खाये और जैम के साथ लद्दाखी रोटी भी। हालांकि अब मैं हिमाचल में था, लाहौल में था लेकिन यह लद्दाख से ज्यादा भिन्न नहीं है। साढे आठ बजे यहां से चल पडा।
आज मुझे अपने बाकी दोनों साथियों से मिलना है। पुरने में जब हम अलग हुए थे, तब यही तय हुआ था कि हम चार दिन बाद दारचा में मिलेंगे। सुबह वे लेह से चले होंगे, मैं यहां से चलूंगा। देखते हैं कौन पहले दारचा पहुंचता है?
लामाजी द्वारा बनवाई जा रही सडक लगभग शिंगो-ला तक पहुंच चुकी है। वह सडक यहां से बस कुछ ही ऊपर थी। नीचे पगडण्डी थी। मुझे अभी भी इतनी थकान थी कि मैं करीब सौ मीटर ऊपर सडक पर नहीं जाना चाहता था। लेकिन इसका भी अपना नुकसान था। ऊपर सडक बनी तो मलबा नीचे तक आ गया था। उससे पगडण्डी भी प्रभावित हुई थी, इसलिये चलने में समस्या आ रही थी। एक बार हिम्मत करके ऊपर सडक तक पहुंच गया और बाकी पैदल यात्रा मजे में कटी।

इसे सडक तो कतई नहीं कह सकते। जेसीबी मशीन से पत्थर हटा दिये थे लेकिन इससे वो चिकनापन नहीं आया था कि इस पर आसानी से गाडियां चलाई जा सकें। वो काम बाद में होता रहेगा लेकिन यह इतना तो बन ही गया था कि इस पर मोटरसाइकिलें व सूमो वगैरा चल सकें। जांस्करी तो अपने यहां सडक बन जाने की भयंकर प्रतीक्षा कर रहे हैं। हालांकि पदुम की तरफ से और इधर दारचा की तरफ से सीमा सडक संगठन अपना काम कर रहा है लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। जांस्करियों का कहना है कि पिछले चार साल से ये लोग एक ही जगह पर काम कर रहे हैं, आगे नहीं बढ रहे। हालांकि बीआरओ के पास पैसे की कोई तंगी नहीं है, संसाधनों की कोई कमी नहीं है लेकिन फिर भी ये सडक को आगे नहीं बढा रहे। इसका कारण यह भी हो सकता है कि यह रक्षा सडक नहीं है।
जब अति हो गई तो एक लामा ने यह काम संभाला। पूरे जांस्कर व लाहौल में लामाजी श्रद्धा के पात्र बने हुए हैं। उनका नाम छुल्तिम छोसजोर है। रास्ते में वे मिले भी, फोटो के लिये कहने पर फोटो भी खिंचवाया। वे चाहते हैं कि नीचे मैदान में इस काम की जानकारी पहुंचे और कुछ सहायता भी मिल जाये तो अच्छा। हालांकि सीमा सडक संगठन भी उनकी खूब मदद कर रहा है। आखिर वे बीआरओ का ही काम आसान कर रहे हैं। उनकी बनाई सडक पर पीछे-पीछे बीआरओ भी फिनिशिंग करता हुआ आगे बढ रहा है। उन्होंने बताया कि उनका लक्ष्य अक्टूबर में बर्फ पडने से पहले इस सडक को शिंगो-ला पार कराके करग्याक तक पहुंचा देने का है, जबकि बीआरओ का लक्ष्य चुमिक नाकपो तक फिनिशिंग कर देने का है। गौरतलब है कि करग्याक और उससे भी आगे तेंगजे तक चौडी घाटी है जहां सडक बनानी अपेक्षाकृत आसान है। तेंगजे से पुरने तक खडे पहाड हैं जहां लामाजी की जेसीबी काम नहीं आने वाली। क्या पता इसी सीजन में बीआरओ की पदुम वाली सडक पुरने तक आ जाये? तीन-चार किलोमीटर पहले ‘चा’ तक तो पहुंच गई है।
जांस्कर बडी बेसब्री से एक अदद सडक का इन्तजार कर रहा है।
रास्ते में करग्याक के एक सज्जन मिले। उन्हें मनाली जाना था। उन्होंने बताया कि आज बहुत सारे बच्चे आ रहे हैं, वे सब मनाली अपने स्कूलों में जायेंगे। मुझे याद आया कि जब हम पुरने में थे तो तेनजिंग थारपा ने बताया कि वह 18 तारीख को मनाली के लिये निकल जायेगा। इन सब बच्चों को लेने मनाली से गाडियां आई हैं। क्या पता मेरा भी जुगाड किसी गाडी में हो जाये!
साढे बारह बजे जांस्कर सुमडो पहुंच गया। सुमडो का अर्थ होता है दो नदियों का संगम। जांस्कर सुमडो यानी ऐसा संगम जहां से जांस्कर के लिये रास्ता जाता है। जाहिर है कि यह नाम लाहौलियों ने रखा है। यहां शिंगो-ला से आती धारा एक दूसरी धारा में मिलती है और आगे दारचा में भागा नदी में मिलने चल देती है। जांस्कर सुमडो काफी बडा मैदान जैसा है। यहां तक सडक बहुत पहले की बनी हुई है। यहां बीआरओ का एक कैम्प भी है। मुझे उम्मीद थी कि दारचा तक जाने के लिये बीआरओ की कोई गाडी भी मिल सकती है। मेरा लक्ष्य जल्दी से जल्दी दारचा पहुंच जाने का था। पता नहीं कब विधान और प्रकाश जी दारचा पहुंच जायें। वहां फोन नेटवर्क भी नहीं है इसलिये अगर हम ज्यादा आगे पीछे हो गये तो परेशानी हो सकती है।
दारचा की तरफ से आठ सूमो आईं और बच्चों को लेने शिंगो-ला की तरफ चली गईं। अब इतना तो निश्चित था कि मैं आज दारचा जरूर पहुंच जाऊंगा। बीआरओ से पता किया तो उनकी कोई गाडी अब दारचा नहीं जा रही थी। यहां मेरे अलावा कुछ लोग और भी थे जो दारचा जाने वाले थे। कुछ देर में जब नौवीं सूमो आई तो सभी ने उसे रोककर तय कर लिया कि वो हमें पहले दारचा छोड दे, फिर बच्चों को लेने चला जाये। यहां से दारचा आधे घण्टे की दूरी पर स्थित है। 1000 रुपये में गाडी तय हो गई, आठ यात्री इसमें बैठ गये, सभी के 125-125 रुपये लगे। चार बजे मैं दारचा में था।
पिछले साल साइकिल से लद्दाख जाते समय मैं दारचा से होकर गया था। मनाली-लेह सडक यहीं से होकर गुजरती है। यहां ठहरने और खाने-पीने की कोई कमी नहीं है। एक दुकान में चावल व मोमो थे, मैंने मोमो खाये। कोल्ड ड्रिंक के साथ मोमो खाकर तृप्त हो गया। दो दिनों से बेस्वाद थुपका ही खाना पड रहा था। प्रकाश जी और विधान नहीं मिले। फोन नेटवर्क न होने की वजह से पता भी नहीं चला कि वे कहां हैं। आखिरकार केलोंग जाने का फैसला कर लिया।
केलोंग की तरफ से एक बस आई जो दारचा से आगे एक गांव तक जाती है। शीघ्र ही वह उस गांव तक जाकर वापस आ गई और उसमें बैठकर मैं केलोंग पहुंच गया। पता चला कि अब मनाली के लिये कोई बस नहीं है। हां, जब मैं दारचा में ही था, तो वे बच्चों वाली सूमो आईं लेकिन उनमें बैठने की बिल्कुल भी जगह नहीं थी। जगह होती तो मैं मनाली के लिये कूच कर जाता। मैं बहुत थका हुआ था, अब बस जल्द से जल्द दिल्ली पहुंचने की जल्दी थी।
केलोंग में फोन नेटवर्क है। विधान को किया तो घण्टी बज गई। मैं खुश हो गया कि वे दोनों भी केलोंग में ही हैं। अभी कुछ ही समय पहले लेह-दिल्ली बस केलोंग आई थी। यह बस रात भर के लिये केलोंग रुकती है। इसकी जांच-पडताल होती है और सुबह यह दिल्ली के लिये चल देती है, शाम तक मनाली पहुंचती है और अगली सुबह दिल्ली। लेह से यह सुबह पांच बजे चलती है। मुझे लगा कि वे दोनों इसी बस से आये होंगे। अब जब विधान की घण्टी बजी तो सबसे पहले यही लगा कि वे भी केलोंग में ही हैं।
बात हुई तो पता चला कि वे मनाली में हैं और उन्होंने दिल्ली के टिकट बुक भी कर लिये हैं। एक बार तो गुस्सा आया कि आज दारचा में मिलने की बात हुई थी लेकिन शीघ्र ही सम्भल गया। मेरा बस चलता तो मैं भी मनाली ही चला जाता और बिना रुके दिल्ली भी जा पहुंचता। मैं थका हुआ हूं तो वे भी थके हुए हैं। इससे ज्यादा फर्क नहीं पडता कि वे बस में यात्रा कर रहे हैं और मैं पैदल। लद्दाख है ही ऐसी जगह कि आपको थकान होनी ही होनी है।
वे दोनों कल सुबह दिल्ली पहुंच जायेंगे और मैं कल सुबह केलोंग से निकलूंगा और चौबीस घण्टे बाद दिल्ली पहुंचूंगा। मैंने उन्हें घरवालों का फोन नम्बर दे दिया ताकि वे शास्त्री पार्क पहुंचकर आराम कर सकें। प्रकाश जी की फ्लाइट दिल्ली से परसों है, विधान ने भी परसों तक की छुट्टी ले रखी है इसलिये वे मेरी प्रतीक्षा कर लेंगे।
बस अड्डे के पास ही एक कमरा ले लिया। और सबसे बढिया बात रही कि यहां मुझे अपने पसन्दीदा आलू के परांठे मिल गये। कभी आप ऐसी स्थिति में रहो, कई दिन तक थुपका खाते रहो और आखिर में आपको अपना मनपसन्द भोजन मिले तो उस क्षण को महसूस करना। इतनी खुशी और तृप्ति मिलेगी कि...
सुबह चार बजे केलोंग-हरिद्वार बस चलती है। मैंने इसमें रात को ही मनाली का आरक्षण करा लिया था। सुबह जब बस अड्डे पर पहुंचा तो देखा कि पूरी बस भरी पडी है। मुझे लग रहा था कि कौन इतनी सुबह जाता होगा जबकि कुछ ही देर बाद लेह-दिल्ली बस निकलती है? और सभी यात्री मनाली जाने वाले ही थे। इस बस का ऑनलाइन आरक्षण नहीं होता।
रास्ते में एक बडी भीषण समस्या आ गई। लेकिन हिमाचल परिवहन ने बडी कुशलता से इसे काफी हद तक सुलझा भी लिया। तांदी से आगे सडक चौडीकरण का काम चल रहा था। उन्होंने चट्टान में ब्लास्ट किया तो तकरीबन सौ मीटर की सडक पर मलबा ही मलबा फैल गया। आवागमन रुक गया। भले ही उन्होंने ब्लास्ट करके एक चट्टान तोड दी हो लेकिन फिर भी सडक पर बडे विशाल पत्थर फैले हुए थे। इन्हें हटाने में कम से कम पूरा दिन तो लगना ही था। यानी कम से कम चौबीस घण्टे के लिये यह सडक बन्द हो गई। इधर की गाडियां इधर और उधर की गाडियां उधर।
परिवहन विभाग के पास इस बात की पूरी जानकारी थी। इस बारे में सभी यात्रियों को पहले ही बता दिया था। हमारी बस उस स्थान पर जाकर रुकी, सभी सवारियां उतरकर पैदल ही मलबे वाले क्षेत्र के पार हुईं और उधर दूसरी बस तैयार खडी थी। हालांकि हमें कोई परेशानी नहीं हुई लेकिन सभी यात्री ऐसे खुशनसीब नहीं थे। हिमाचल परिवहन की बीसियों बसें वहां एक किलोमीटर लम्बे जाम में फंसी खडी थीं। उनकी सवारियां भी बसों में ही थीं। सभी सोये पडे थे। दिल्ली-लेह बस जिसे शाम ही केलोंग पहुंच जाना था, वह भी इसी जाम में खडी थी। जो मोटरसाइकिलों से लेह जा रहे थे, जिनके पास टैंट थे, उन्होंने सडक पर ही टैंट लगा लिये थे। अनगिनत कारें थीं और ट्रक भी। और अभी भी सडक से मलबा हटने में पूरा दिन तो लगेगा ही।
मंगलवार होने की वजह से रोहतांग पर कोई नहीं था। मंगलवार को रोहतांग आम पर्यटकों के लिये बन्द रहता है। लाहौल, लद्दाख व स्पीति जाने वाली गाडियां आती-जाती रहती हैं। यह भी अच्छा ही था क्योंकि रोहतांग के भीषण जाम से मैं परिचित हूं। ग्यारह बजे तक मनाली पहुंच गये।
यहां पहुंचकर सबसे पहला काम किया वोल्वो बस में सीट बुक करना। हालांकि सबसे पीछे वाली सीट मिली, मैंने यही बुक करा ली। साधारण बस में 500 रुपये लगते हैं, वोल्वो में 900 लगे; रात भर की यात्रा है, आराम भी जरूरी है, यही सबकुछ सोचकर मैंने वोल्वो से आने का फैसला किया।
उधर विधान और प्रकाश जी की हालत भी मेरे जैसी ही थी। वे भी शीघ्र से शीघ्र से अपने घर पहुंच जाना चाहते थे। जैसा कि कल तय हुआ था कि हम तीनों फिर मिलेंगे, अब वैसा नहीं हो सका। विधान ट्रेन से जयपुर चला गया और प्रकाश जी ने अपनी एक दिन बाद की फ्लाइट का टिकट रद्द करा दिया। ध्यान नहीं कि वे ट्रेन से गये या आज की फ्लाइट से।
इस यात्रा में मेरा दिल्ली से दिल्ली कुल खर्च लगभग 15000 रुपये आया। इसमें दिल्ली से श्रीनगर फ्लाइट के 4000 रुपये, श्रीनगर से कारगिल प्रति व्यक्ति 2000 रुपये, कारगिल से पदुम प्रति व्यक्ति 3000 रुपये और पदुम से अनमो प्रति व्यक्ति लगभग 700 रुपये भी शामिल हैं। मेरे पास पूरे खर्च की पूरी लिस्ट है, आप चाहें तो मैं इसे भी सार्वजनिक कर सकता हूं। ऐसी यात्राओं पर स्लीपिंग बैग बहुत काम आता है। हालांकि टैंट ले जाने का ज्यादा फायदा नहीं मिला।
लद्दाख व जांस्कर में ट्रैकिंग करना आसान नहीं होता। तेज धूप व तूफानी हवाएं ही आपकी सारी ऊर्जा को निचोड लेती हैं। इन सबके बावजूद भी सभी ट्रैकर्स की इच्छा होती है कि लद्दाख में ट्रैकिंग जरूर करें। फिर चाहे वो चादर ट्रेक हो या मारखा घाटी ट्रेक या स्नो लेपर्ड ट्रेक या कोई दूसरा ट्रेक। मौका मिलते ही ट्रैकर लद्दाख में ट्रैकिंग करने जाते हैं।
लेकिन सभी सफल कहां हो पाते है?



रात यहीं पर रुका था।


गौर कीजिये। यह लामाजी की जेसीबी द्वारा बनाई गई सडक है। जब पहली बार सडक बनाने के लिये पत्थर हटाये जाते हैं तो ऐसी ही दिखती है। बाद में फिनिशिंग होती रहती है।


पीछे-पीछे बीआरओ इसकी फिनिशिंग करता आ रहा है।

यही हैं वे लामा- छुल्तिम छोसजोर।






जांस्कर सुमडो

जांस्कर सुमडो





पदुम दारचा ट्रेक
1. जांस्कर यात्रा- दिल्ली से कारगिल
2. खूबसूरत सूरू घाटी
3. जांस्कर यात्रा- रांगडुम से अनमो
4. पदुम दारचा ट्रेक- अनमो से चा
5. फुकताल गोम्पा की ओर
6. अदभुत फुकताल गोम्पा
7. पदुम दारचा ट्रेक- पुरने से तेंगजे
8. पदुम दारचा ट्रेक- तेंगजे से करग्याक और गोम्बोरंजन
9. गोम्बोरंजन से शिंगो-ला पार
10. शिंगो-ला से दिल्ली वापस
11. जांस्कर यात्रा का कुल खर्च

24 comments:

  1. अद्भुत लेख..... अद्भुत चित्र ....

    इन जगहों के बारे में हमने पहले कभी नहीं सुना.....आपके साथ यात्रा का आनंद उठा लिया....

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी...

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  2. chalo der aaye durusat aaye maja aa gya dost

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    1. देर नहीं आये... बिल्कुल समय पर आये। धन्यवाद आपका।

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  3. jat ji .. total kharch batiya .. plzz

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    1. टोटल खर्च 15000 रुपये।

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  4. नीरज भाई बहुत ही शानदार यात्रा वृतांत व फोटो,लामा जी का काम भी सहारनीय है..

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    1. धन्यवाद सचिन भाई...

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    1. धन्यवाद बडोला साहब...

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  6. acha trip tha, Baspa valley kab jaoge

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  7. Good description, nice photos. Thanks for share with us.

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    1. धन्यवाद शर्मा जी...

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  8. Thankyou sir , sher with us , nice photo kachch yatra ka intajar rahega .
    umesh joshi

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    1. धन्यवाद जोशी साहब...

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  9. Replies
    1. धन्यवाद अशोक भाई...

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  10. बहुत बढ़िया नीरज भाई

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    1. बहुत बढिया संजय भाई...

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  11. एवेरेस्ट को छूने का समय आ गया है नीरज जी

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    1. एवरेस्ट की कोई इच्छा नहीं है।

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