Wednesday, January 14, 2015

गोम्बोरंजन से शिंगो-ला पार

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आज तारीख थी 17 अगस्त 2014
आपको ध्यान होगा कि मैं पवित्र गोम्बोरंजन पर्वत के नीचे एक अकेले कमरे में सो गया था। रात में एकाध बार आंख भी खुली थी लेकिन मैं चूंकि सुरक्षित स्थान पर था, इसलिये कोई डर नहीं लगा। हां, एकान्त में होने का एक अजीब सा डर तो होता ही है।
साढे सात बजे आंख खुली। कुछ बिस्कुट खाये, पानी पीया, बिस्तर समेटा और सवा आठ बजे तक निकल पडा। अब ऊंचाई बढने लगी थी और रास्ता भी ऊबड खाबड होने लगा था। जिस स्थान पर मैं सोया था, वो जगह समुद्र तल से 4250 मीटर पर थी, अब जल्दी ही 4400 मीटर भी पार हो गया। वैसे तो अभी भी बडी चौडी घाटी सामने थी लेकिन इसमें छोटी छोटी कई धाराओं के कारण रास्ता बिल्कुल किनारे से था जहां बडे-बडे पत्थरों की भरमार थी।
सामने बहुत दूर खच्चरों का एक बडा दल इस घाटी को पार कर रहा था। कैमरे को पूरा जूम करके देखा तो पता चला कि उन पर कुछ राशन लदा है और कुछ लोग पैदल भी चल रहे हैं। निश्चित ही वह एक ट्रेकिंग ग्रुप होगा जो आज लाखांग में रुका होगा। आज शिंगो-ला पार कर लेगा।

लाखांग मुझे दिख नहीं रहा था लेकिन उस ग्रुप के कारण अन्दाजा हो गया कि यह अब ज्यादा दूर भी नहीं है। इतना तो निश्चित है कि वह ग्रुप मेरे रुकने के स्थान से आज नहीं गुजरा है।
दस बजे मैं लाखांग पहुंच गया। यह कोई गांव नहीं है। शिंगो-ला से कुछ पहले समुद्र तल से 4470 मीटर की ऊंचाई पर एक ढाबा है जहां रात रुक सकते हैं और खाना भी मिल जाता है। ढाबेवाले ने बताया कि तत्काल चाहिये तो मैगी मिलेगी तथा प्रतीक्षा कर सकते हैं तो रोटी मिल जायेगी। जब रोटी मिल रही है तो भला मैं मैगी क्यों खाने लगा? वह रोटी बनाने की तैयारी करने लगा और मैं रजाईयों के ढेर पर पडकर सो गया। आधे घण्टे बाद जब रोटी बन गई तो उसने ही मुझे जगाया।
इसी दौरान करग्याक की तरफ से दो लामा भी आ गये। उन्हें मनाली जाना है। जांस्कर के इस हिस्से का जितना आवागमन हिमाचल में है, उतना अपने जम्मू कश्मीर राज्य में नहीं है। शिंगो-ला के उस तरफ तक सडक बन गई है। ये लोग फोन करके मनाली से टैक्सी मंगा लेते हैं। सुबह घर से निकलते हैं, दोपहर बाद तक शिंगो-ला पार कर लेते है और रात तक मनाली पहुंच जाते हैं। फिर जिसे जम्मू जाना होता है, वो जम्मू की बस पकड लेता है; जिसे दिल्ली जाना होता है वो दिल्ली की।
ग्यारह बजे यहां से चल पडा। एक बहुत चौडा नदी-पट पार किया। यह कम से कम एक किलोमीटर चौडा रहा होगा। इसे पार करके चढाई शुरू हो गई। आगे भी चढाई जारी रही, कभी तीखी, कभी कम। मेरी बार-बार सांस फूल रही थी। चलना मुश्किल हो रहा था। और फिर तूफानी हवा।
लेकिन इन सबके बावजूद नजारों में कोई कमी नहीं आई। हल्की-हल्की घास उगी हुई थी। पत्थरों पर जगह जगह फ्यांग बैठे धूप का आनन्द ले रहे थे। उस पार याकों का एक बडा झुण्ड चरने में व्यस्त था। याक अक्सर आक्रामक होते हैं। अगर वे इसी तरफ होते तो शायक मुझे देखकर भी आक्रामक हो सकते थे।
5000 मीटर की ऊंचाई बहुत ज्यादा होती है। मैंने कहीं पढा है कि इससे ज्यादा ऊंचाई पर शरीर एक्लीमेटाइज नहीं हो सकता। इतनी ऊंचाई पर स्थित किसी दर्रे को पार करना और भी मुश्किल बात होती है। लेकिन इन सबके बावजूद शिंगो-ला बहुत आसान है। अभी तक मुझे कोई परेशानी नहीं आई थी। लेकिन इतनी आसानी से दर्रे पार नहीं हुआ करते।
शिंगो-ला से निकली जलधारा रास्ते में आ गई। मैं लगभग 4800 मीटर की ऊंचाई पर रहा होऊंगा। दर्रा अभी भी 200 मीटर ऊपर था। यह ऊंचाई ज्यादा नहीं होती। लेकिन यहां इस जलधारा में जितना पानी था, उससे ही पता चल रहा था कि पानी और भी कहीं दूर से आ रहा है। यह इतना था कि इसे पार करना बहुत मुश्किल था। बहाव भयंकर तेज। जैसी धारा कल पार की थी, उससे भी ज्यादा बहाव और ज्यादा तेजी। कुछ आगे बर्फ भी दिख रही थी। यह असल में बर्फ का पुल था। लेकिन मेरे और इस पुल के बीच में करीब दस मीटर की खडी चट्टान थी जिसे मैं किसी भी हालत में पार नहीं कर सकता था। धारा ही पार करनी पडेगी।
दम पहले ही फूला हुआ था, अब पैर भी कांपने लगे। मैं इसे बिल्कुल पार नहीं कर सकता था। जूते उतारकर इसमें घुसकर पार हुआ जा सकता था लेकिन ऐसी ठण्ड में भीगना कौन चाहता था? कुछ दूर धारा के साथ साथ नीचे उतरना पडा। इस तलाश में कि कहीं पार होने लायक रास्ता मिल जाये। लेकिन मुसीबत यह थी कि जितना अब नीचे उतरूंगा, उस पार जाकर उतना ही ऊपर चढना पडेगा। यहां पहले से ही सांस फूली जा रही है। और जब आखिरकार काफी नीचे जाकर भी पार होने लायक जगह नहीं मिली तो साहस बटोरकर छलांग लगा दी। छलांग सफल रही, हालांकि एक जूते में पानी भर गया।
जैसे जैसे दर्रा नजदीक आता जा रहा था, धारा का रहस्य भी खुलता जा रहा था। रहस्य यही था कि दर्रे के इतना नजदीक होने पर भी इसमें इतना पानी क्यों है? असल में यह क्षेत्र बहुत बडा ग्लेशियर है। यह ग्लेशियर कालान्तर में पत्थरों के नीचे दबता चला गया लेकिन कहीं कहीं इसकी सपाट ऊर्ध्वाधर दीवारें दिख जाती हैं जिससे पता चलता है कि हम ग्लेशियर पर चल रहे हैं। मैं यही सोच रहा हूं कि जब यहां सडक बनेगी तो ग्लेशियर के ऊपर से कैसे निकलेगी? जरूर इस ग्लेशियर को छोडना पडेगा। कोई ऐसा स्थान ढूंढना पडेगा, जहां ग्लेशियर नहीं है। और वो स्थान शिंगो-ला तो कतई नहीं होगा। दर्रे से कुछ हटकर ही सडक बनानी पडेगी।
सवा चार बजे जब मैं 4960 मीटर की ऊंचाई पर था, पहली बार कुछ दूर झण्डियां दिखाई पडीं। मैं खुशी से झूम उठा। बाद में दर्रे पर पहुंचकर भी उतनी खुशी नहीं मिली, जितनी अब मिली। कारण था कि कई घण्टों से लग रहा था कि वो सामने दर्रा है, वो सामने दर्रा है लेकिन दर्रा आया ही नहीं। अब झण्डियों ने नगाडा बजा दिया कि वो सामने दर्रा है।
यह आखिरी आधा किलोमीटर बिना पगडण्डी के ही तय करना पडा। कोई पगडण्डी ही नहीं थी। बस झण्डियों को देखकर ही आगे बढना था। और आखिरी के बीस मीटर बिल्कुल सीधी दीवार सी थी। इस पर चढने में ही आधा घण्टा लग गया। बुरी तरह सांस फूल रही थी। एक कदम चलता, दो मिनट रुकता।
आखिरकार पांच बजे मैं शिंगो-ला पर था। इसकी ऊंचाई मैंने 5025 मीटर नोट की। बौद्ध इलाका होने के कारण तिब्बती भाषा में पत्थरों पर प्रार्थनाएं लिखी थीं और झण्डियां लगी थीं। यह दर्रा जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश राज्य की सीमा भी है। अब मैं हिमाचल में प्रवेश कर जाऊंगा।
आप जो भी इन पंक्तियों को पढ रहे हैं, बहुत कम या नगण्य ही अभी तक 5000 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचे हैं। और मुझे गर्व है कि मैं तीन बार इस ऊंचाई तक जा चुका हूं। दो बार पैदल और एक बार साइकिल से।
दर्रे की हिमाचल साइड में एक छोटी सी झील भी है। इस झील में ग्लेशियर से आकर पानी जमा होता है और आगे चला जाता है जो आखिरकार दारचा में भागा में मिल जाता है। इधर कुछ दूर तक तो लगभग समतल रास्ता ही है। फिर अचानक पाताल लोक दिखाई देता है और शुरू होती है अन्धी उतराई। उस तरफ बडे विशाल ग्लेशियर दिख रहे थे जो समय की मार से काले पडने लगे थे। शिंगो-ला से आती धारा भी यहां बडा ऊंचा झरना बनाती होगी। अगर ग्लेशियर न होते तो वो झरना दिखता भी। कुछ ही कदम पहले मैं इस धारा के बराबर में था और अब यह बहुत दूर ग्लेशियर के नीचे से ‘गौ-मुख’ की तरह बाहर आती दिखती है।
पांच बजे शिंगो-ला पर था और बडी जल्दी छह भी बज गये। अब तेजी से दिन छिपने लगेगा और अन्धेरा हो जायेगा। मुझे जल्दी से जल्दी किसी ठिकाने पर पहुंचना है। सारा रास्ता अब उतराई का था इसलिये चलने में तेजी आई।
कुछ दूर एक जेसीबी मशीन पहाड खोदकर सडक बनाने में लगी थी। पहाड यहां कच्चा है और ज्यादातर मिट्टी व बजरी का बना है। घाटी भी काफी चौडी है इसलिये जेसीबी आसानी से बजरी व मिट्टी को हटाती जाती है और रास्ता बनता जाता है। असल में इस सडक को एक लामा बनवा रहे हैं। प्रोजेक्ट तो यह सीमा सडक संगठन का है लेकिन उनके काम की सुस्ती को देखकर लामाजी ने इसे पूरा करने का बीडा उठाया। अपने खर्चे से पंजाब से यह जेसीबी मशीन खरीदकर लाये और हो गये शुरू। इन्हें देखकर अब सीमा सडक संगठन ने भी तेजी दिखाई है। लामाजी के चर्चे पूरे जांस्कर में हैं। उनका लक्ष्य अक्टूबर में बर्फ पडने तक इस सडक को करग्याक गांव तक ले जाने का है।
सात बजे एक टैण्ट कालोनी में पहुंचा। यह वही ग्रुप था जिसे मैंने सुबह लाखांग से चलते देखा था। इसे देखते ही बडा खुश हुआ कि अब यहीं रुकना है। लेकिन जब पता चला कि यह प्राइवेट ग्रुप है, सार्वजनिक दुकान नहीं है तो उदास भी हो गया। ग्रुप के गाइड ने बताया कि दस मिनट और आगे चलोगे तो लोकल लोगों की दुकानें मिल जायेंगीं, जहां खाना भी मिलेगा। मैं दस मिनट के लालच में आगे बढ गया।
लेकिन तेरा सत्यानाश हो, दस मिनट की जगह एक घण्टा लग गया। साढे सात के बाद अन्धेरा हो गया। पत्थरों के बीच पगडण्डी नहीं दिख रही थी इसलिये हैड लाइट निकालनी पडी। सामने दूर-दूर तक कोई प्रकाश भी नहीं दिख रहा था जिससे पता चलता कि कितनी दूर दुकानें हैं। मैं आगे बढता रहा और उसे गालियां देता रहा।
पूरे हिमालय में तेंदुओं की भरमार है और भालुओं की भी। हालांकि मेरी जानकारी के अनुसार यहां भालू नहीं हैं लेकिन क्या पता मैं गलत होऊं? ये जानवर रात को बाहर निकलते हैं। मैं यही मनाता चल रहा था कि कोई जानवर न मिल जाये। अचानक बहुत नजदीक ही एक बडा काला जीव दिखा। मेरी धडकन नहीं रुकी, बस इतनी कसर रह गई। सिर पर हैड लाइट बंधी थी तो जितना प्रकाश उससे निकलकर सामने रास्ते पर पड रहा था, उतना तो साफ-साफ दिख रहा था। अगल-बगल का कुछ नहीं दिख रहा था। उस जीव का एहसास तब हुआ, जब वो बिल्कुल बगल में आ गया। उसे देखते ही मैं लगभग निर्जीव सा हो गया और बैठ गया।
प्रकाश उसकी तरफ किया तो गधा निकला। पट्ठा मजे से घास चर रहा था। उसे क्या पता कि उसे देखकर मेरी क्या गति हुई?
खैर, आठ बजे एक ठिकाने पर पहुंचा। बडी बुरी हालत थी। सीधा एक तम्बू में घुस गया। वहां पहले से ही पांच छह स्थानीय लोग बैठे थे। मैंने चाय के लिये कह दिया। चाय तो यहां बडी सुलभ चीज है और हर समय तैयार रहती है। मैं ढंग से बैठा भी नहीं था कि चाय हाजिर हो गई। मैंने बता दिया कि आज यहीं रुकूंगा। वह जगह पहले से ही फुल थी। तम्बू वाले ने कहा कि कम्बल नहीं हैं। मैंने कहा कोई बात नहीं, मेरे पास स्लीपिंग बैग हैं। टैण्ट लगाने का बिल्कुल भी दम नहीं बचा था।
यहां भी थुपका मिला। लेकिन मैं दो कटोरे थुपका गटक गया। इच्छा तो नहीं थी लेकिन पेट में कुछ जाना जरूरी था।
बाद में पता चला कि इस जगह का नाम चुमिक नाकपो है। इसका अर्थ होता है काला चश्मा। चश्मा यानी पानी का सोता जहां से काला पानी निकलता हो। लेकिन ऐसा है नहीं- कोई काला पानी नहीं निकलता, बल्कि साफ ही पानी निकलता है। समुद्र तल से ऊंचाई 4570 मीटर थी।

गोम्बोरंजन पर्वत के नीचे जहां मैं सोकर उठा था।



यही लाखांग है। नीले-पीले तिरपाल दिख रहे हैं, वह दुकान है।



इस पर लिखा है- SAVE: Shingo-La, Zanskar, Himalaya, India, Mother Earth.


फ्यांग







अब शिंगो-ला नजदीक है।


इन्हीं दरारों से पता चलता है कि यह ग्लेशियर है।

बर्फ के ऊपर कालान्तर में पत्थर आ जाते हैं जिससे बर्फ ढक जाती है। 



शिंगो-ला से लिया गया फोटो। बीच में गोम्बोरंजन पर्वत दिख रहा है जिसके नीचे मैं रात रुका था।

शिंगो-ला 5000 मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर स्थित एक ऐसा दर्रा है जिसे पार करना आसान है।

शिंगो-ला की झील











लामाजी की जेसीबी मशीन रास्ता बनाती हुई




शिंगो-ला की स्थिति। नक्शे को छोटा व बडा किया जा सकता है।




अगला भाग: शिंगो-ला से दिल्ली वापस

पदुम दारचा ट्रेक
1. जांस्कर यात्रा- दिल्ली से कारगिल
2. खूबसूरत सूरू घाटी
3. जांस्कर यात्रा- रांगडुम से अनमो
4. पदुम दारचा ट्रेक- अनमो से चा
5. फुकताल गोम्पा की ओर
6. अदभुत फुकताल गोम्पा
7. पदुम दारचा ट्रेक- पुरने से तेंगजे
8. पदुम दारचा ट्रेक- तेंगजे से करग्याक और गोम्बोरंजन
9. गोम्बोरंजन से शिंगो-ला पार
10. शिंगो-ला से दिल्ली वापस
11. जांस्कर यात्रा का कुल खर्च

23 comments:

  1. रात का समय, सुनसान रास्ता और अकेलापन ऐसे में गधा भी भालू या तेंदुआ नज़र आ सकता है.!
    खैर हमेशा की तरह शानदार फोटो, यात्रा अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रही है.!
    बहुत बढ़िया नीरज भाई..!

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    1. धन्यवाद पंवार साहब...

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  2. घुमक्कड़ी का शानदार नमूना। फोटोग्राफ्स हमेशा की तरह लाजवाब।
    आपने ये तो बताया ही नहीं की रोटी कैसी थी। मोटी या पतली।

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    1. रोटी ठीक ही थी। कश्मीर जैसी पतली भी नहीं थी और आम लद्दाखी जैसी मोटी भी नहीं थी।

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  3. यार बडे साहसी व्यक्ति हो,अकेले ही निकल जातेहो.

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    1. हां त्यागी जी, ऐसे ही हैं हम तो...

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  4. yeh sab aap hi kar sakte ho bnai ham to aap ko dekh ke hi kush ho jaate hai

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    1. ह्म्म्म्म. सही बात।

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  5. Shingo la k baad himachal me apka swagat hai :)

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  6. बहुत बढ़िया नीरज भाई.

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    1. धन्यवाद शर्मा जी...

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  7. आप के साहसिक यात्रा और जानदार फोटो का कोई जबाब नहीं है।बाकी रेल्वे यात्रा के बाद भविष्य मे एवरेस्ट पर्वत पर चढ़ने का प्लान भी रखिएगा ।

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    1. नहीं नहीं... एवरेस्ट का न कोई प्लान है और न ही कोई इच्छा।

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  8. बहुत बढ़िया नीरज भाई.

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  9. बहुत गजब। आपको यात्राओं के लिए शक्ति मिलती रहे, यही कामना है। संस्‍मरण कब लिखते हैं। वहीं यात्रा के दौरान कहीं ठहरने पर या यात्रा से लौटकर दिल्‍ली आकर, इतना बताने का कष्‍ट करेंगे, जिज्ञासा है।

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    1. विकेश जी नीरज जी यात्रा वृतांत दिल्ली आकर ही लिखते है..

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    2. नहीं, ठहरने के दौरान ताकत ही नहीं बचती कि संस्मरण लिखूं। हमेशा वापस दिल्ली आकर ही सबकुछ लिखता हूं।

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  10. जानदार फोटो नीरज भाई

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    1. धन्यवाद संजय भाई...

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  11. शानदार , रोमांचक यात्रा.... शानदार फोटो...

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी...

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  12. मैंने याक शिमला और खज्जियार में देखे है वो बहुत गुस्से वाले होते है -- एक - बात जरूर है नीरज ,तुम साथियो के साथ ज्यादा कम्फर्ट महसूस करते हो की अकेले ,मेरे ख्याल से तो तुमको इस खूबसूरत जगह पर साथियो के साथ ही आना चाहिए

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