Tuesday, December 15, 2015

श्योपुर कलां से ग्वालियर नैरो गेज ट्रेन यात्रा

   ग्वालियर और श्योपुर कलां से बीच 2 फीट गेज की यह रेलवे लाइन 200 किलोमीटर लम्बी है और विश्व की सबसे लम्बी नैरो गेज की लाइन है। लेकिन इसके बनने की कहानी बडी ही दिलचस्प है। ग्वालियर के महाराजा थे माधव राव जी। कहते हैं कि उन्होंने एक बार इंग्लैण्ड से टॉय ट्रेन मंगवाई। राजा थे तो यह टॉय ट्रेन कोई छोटी-मोटी तो होगी नही। बडी बिल्कुल असली ट्रेन थी लेकिन 2 फीट गेज की पटरियों पर चलती थी। इंजन था और छह सात डिब्बे थे। आधे किलोमीटर लम्बी पटरियां भी मंगाई गईं और किले के अन्दर ही बिछा दी गईं। लेकिन दिक्कत ये हो गई कि जब तक इंजन स्पीड पकडता, तब तक पटरियां ही खत्म हो जातीं। तो महाराजा ने और पटरियां मंगाईं और किले में ही करीब दो किलोमीटर लम्बा नेटवर्क बना दिया और अपनी निजी ट्रेन का आनन्द लेने लगे।
   फिर ऐसा हुआ कि यह भी महाराजा को कम लगने लगा। किले में इतनी जगह नहीं थी कि इससे भी ज्यादा पटरियां बिछाई जायें। तय हुआ कि किले से बाहर पटरियां बिछाते हैं। बात किले के अन्दर थी तो अन्दर की बात थी लेकिन बाहर ऐसा करना थोडा मुश्किल था क्योंकि उस समय रेलवे लाइन बिछाना केवल अंग्रेजों का ही कार्य था, भारतीयों का नहीं। अभी तक तो यह महाराजा की ‘टॉय ट्रेन’ थी लेकिन अब इसे ‘रेलवे’ बनना पडेगा। फिर पता नहीं महाराजा ने अंग्रेजों को क्या पढाया, क्या सिखाया; किले से बाहर लाइन बिछाने की अनुमति मिल गई। सबसे पहले इसे ग्वालियर के पास मुरार तक बनाया गया। वर्तमान में मुरार की लाइन को शहर में सडकें बनाने आदि के लिये बन्द करके हटा दिया है।

Friday, December 11, 2015

सवाई माधोपुर-जोधपुर-बिलाडा-पुष्कर ट्रेन यात्रा

   ज्यादातर मित्र मेरी पैसेंजर ट्रेन यात्राओं को पसन्द नहीं करते। यह नापसन्दगी पिछले साल खूब सुनने को मिली, इसलिये ट्रेन यात्राओं के वृत्तान्त प्रकाशित करने बन्द कर रखे थे। पिछले साल का जो वृत्तान्त प्रकाशित किया था, वो था मुगलसराय से गोमो, गोमो से हावडा और पटना से बक्सर पैसेंजर ट्रेन यात्राएं। इसके अगले ही सप्ताह भारत के इसी हिस्से में मैं फिर गया था और गोमो से खडगपुर, खडगपुर से टाटानगर, बिलासपुर होते हुए गोंदिया, चाम्पा से गेवरा रोड और बिलासपुर से कटनी तक का मार्ग देख लिया था। रतनगढ-बीकानेर-फलोदी मार्ग भी देखा और पठानकोट-अमृतसर, जालन्धर-पठानकोट-जम्मू-तवी-श्री माता वैष्णों देवी कटडा, दिल्ली-फर्रूखनगर, जोधपुर-भिलडी, पाटन-महेसाना-वीरमगाम-राजकोट, अहमदाबाद-आबू रोड मार्गों पर रेल यात्राएं कीं और रास्ते में आने वाले सभी स्टेशनों के बोर्डों के फोटो भी लिये। मुझे स्टेशन बोर्ड के फोटो संग्रह करने का शौक है। पिछले दिनों भिण्ड-ग्वालियर-गुना मार्ग देखा जिसका वृत्तान्त प्रकाशित किया जा चुका है। अब के बाद ऐसी ट्रेन यात्राओं के वृत्तान्त भी छपा करेंगे। ताजातरीन यात्रा का वृत्तान्त आज पढिये।
   यात्रा शुरू हुई थी 13 अक्टूबर 2015 को। निजामुद्दीन से कोटा जनशताब्दी एक्सप्रेस चलती है। इसमें अपनी बुकिंग थी। मेरी खिडकी वाली सीट पर एक परिवार बैठा था। मैं गया तो वे मुझे अपनी खिडकी से दूर वाली पर बैठने को कहने लगे लेकिन चूंकि मुझे सोना था, इसलिये मुझे जिद करनी पडी। उन्हें अवश्य बुरा लगा होगा।

Wednesday, December 9, 2015

जोशीमठ-पौडी-कोटद्वार-दिल्ली

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30 सितम्बर 2015
आज हमें दिल्ली के लिये चल देना था। सुबह सात बजे ही निकल पडे। एक घण्टे में पीपलकोटी पहुंचे। पूर्व दिशा में पहाड होने के कारण धूप हम तक नहीं पहुंच पा रही थी, इसलिये रास्ते भर ठण्ड लगी। पीपलकोटी में बस अड्डे के पास ताजी बनी पकौडियां देखकर रुक गये। यहां धूप थी। पकौडियां, चाय और गुनगुनी धूप; तीनों के सम्मिश्रण से आनन्द आ गया। आधे घण्टे में यहां से चले तो नौ बजे चमोली पहुंचे, दस बजे कर्णप्रयाग। यहां 15 मिनट रुके, आराम किया। वातावरण में गर्मी बढने लगी थी। रास्ता अलकनन्दा के साथ साथ है और ज्यादा ऊंचाई पर भी नहीं है। इसलिये गर्मी लगती है।
गौचर रुके। यहां से बाल मिठाई ली। हम दोनों को यह मिठाई बेहद पसन्द है लेकिन चूंकि यह कुमाऊं की मिठाई है इसलिये लगता है गढवाल वाले इसे बनाना नहीं जानते। कुछ दिन पहले कर्णप्रयाग से ली थी, वो पिघल गई थी और सभी मिठाईयां एक बडा लड्डू बन गई थीं। आज ली तो यह भी खराब थी। इसका पता दिल्ली आकर चला। खैर, गौचर में दुकान वाले से कुछ बातें कीं। आपको पता नहीं याद हो या न हो; कुछ साल पहले जब देश में कांग्रेस की सरकार थी, तो सोनिया और राहुल गांधी आदि गौचर आये थे और ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन का शिलान्यास किया था। इसी के बारे में पता करना था कि कुछ काम भी चल रहा है या नहीं। दुकान वाले ने बताया कि वे लोग तो यहां पिकनिक मनाने आये थे। ऊपर हवाई अड्डे परिसर में ही ‘शिलान्यास’ जैसा कुछ आयोजित हुआ, फीता जैसा कुछ काटा और बात खत्म हो गई।

Monday, December 7, 2015

बद्रीनाथ यात्रा

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29 सितम्बर 2015
   आपको याद होगा कि हम बद्रीनाथ नहीं जाना चाहते थे क्योंकि बद्रीनाथ के साथ साथ वसुधारा, सतोपंथ, हेमकुण्ड और फूलों की घाटी को हम एक साथ देखते और पूरे आठ-दस दिनों के लिये आते। लेकिन कल करण के बद्रीनाथ प्रेम के कारण हमें भी आना पडा। हमारे पास बद्रीनाथ में बिताने को केवल एक ही दिन था। जोशीमठ से लगभग 50 किमी दूर है बद्रीनाथ। हमने जोशीमठ में ही सामान छोडकर रात होने तक वापस यहीं आ जाने का विचार किया ताकि कल वापस दिल्ली के लिये निकला जा सके और उजाले में अधिकतम दूरी तय की जा सके।
   तो नहा-धोकर और गोभी के परांठे का नाश्ता करके साढे दस बजे बद्रीनाथ के लिये निकल पडे। शुरूआती दस किलोमीटर यानी अलकनन्दा पुल तक उतराई है, उसके बाद चढाई है। अलकनन्दा पुल के पास ही विष्णु प्रयाग है जहां अलकनन्दा में धौलीगंगा आकर मिलती है। धौलीगंगा घाटी बडी ही विलक्षण है। 1962 से पहले कैलाश मानसरोवर जाने का एक रास्ता यहां से भी था। वह रास्ता धौलीगंगा घाटी में ऊपर चढता था और नीति दर्रा पार करके यात्री तिब्बत में प्रवेश करते थे। अब तो नीति दर्रा इतना दुर्गम हो गया है कि कोई आम भारतीय भी वहां नहीं जा सकता। ऐसी घटनाओं का असर वहां के रहन-सहन पर भी पडता है। कैलाश मार्ग पर स्थित होने के कारण पहले धौलीगंगा घाटी में खूब चहल-पहल होती होगी, लेकिन अब कौन वहां जायेगा और क्यों जायेगा? हां, उधर जोशीमठ से निकलते ही तपोवन है और भविष्य बद्री है। इसके साथ ही ट्रेकिंग के शौकीनों के लिये नन्दा देवी बेस कैम्प और चांगबांग ग्लेशियर भी आकर्षण के केन्द्र हैं।

Friday, December 4, 2015

अनुसुईया से जोशीमठ

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28 सितम्बर 2015
सुबह उठे तो पैर बुरी तरह अकडे थे। करण तो चलने में बिल्कुल असमर्थ ही हो गया था। इसका कारण था कि कल हमने तेज ढाल का कई किलोमीटर का रास्ता तय किया था। कल हम कई घण्टों तक उतरते ही रहे थे, इसलिये पैरों की दुर्गति होनी ही थी। आज के लिये कल तय किया था कि पहले अत्रि मुनि आश्रम जायेंगे, फिर वापस मण्डल। अत्रि मुनि आश्रम जाकर वापस अनुसुईया आना पडता, इसलिये किसी की भी वहां जाने की हिम्मत नहीं हुई।
आलू के परांठे बनवा लिये। साथ ही उसने थोडा सा पानी भी छौंक दिया। जी हां, पानी। प्याज टमाटर को बारीक काटकर पहले फ्राई किया, फिर उसमें दो-तीन गिलास पानी डाल दिया और उबलने दिया। फिर इसे चखकर देखा तो मजा आ गया। था तो यह पानी ही लेकिन इसका स्वाद किसी दाल या आलू की सब्जी को भी पीछे छोड रहा था।

Wednesday, December 2, 2015

रुद्रनाथ यात्रा- पंचगंगा से अनुसुईया

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27 सितम्बर 2015
   सवा ग्यारह बजे पंचगंगा से चल दिये। यहीं से मण्डल का रास्ता अलग हो जाता है। पहले नेवला पास (30.494732°, 79.325688°) तक की थोडी सी चढाई है। यह पास बिल्कुल सामने दिखाई दे रहा था। हमें आधा घण्टा लगा यहां तक पहुंचने में। पंचगंगा 3660 मीटर की ऊंचाई पर है और नेवला पास 3780 मीटर पर। कल हमने पितरधार पार किया था। इसी धार के कुछ आगे नेवला पास है। यानी पितरधार और नेवला पास एक ही रिज पर स्थित हैं। यह एक पतली सी रिज है। पंचगंगा की तरफ ढाल कम है जबकि दूसरी तरफ भयानक ढाल है। रोंगटे खडे हो जाते हैं। बादल आने लगे थे इसलिये अनुसुईया की तरफ कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। धीरे-धीरे सभी बंगाली भी यहीं आ गये।
   बडा ही तेज ढलान है, कई बार तो डर भी लगता है। हालांकि पगडण्डी अच्छी बनी है लेकिन आसपास अगर नजर दौडाएं तो पाताललोक नजर आता है। फिर अगर बादल आ जायें तो ऐसा लगता है जैसे हम शून्य में टंगे हुए हैं। वास्तव में बडा ही रोमांचक अनुभव था।

Monday, November 30, 2015

रुद्रनाथ यात्रा- पंचगंगा-रुद्रनाथ-पंचगंगा

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27 सितम्बर 2015
   सुबह छह बजे उठे और चाय-बिस्कुट खाकर रुद्रनाथ की ओर चल दिये। रुद्रनाथ यहां से तीन किलोमीटर दूर है। पंचगंगा समुद्र तल से 3660 मीटर पर है जबकि रुद्रनाथ 3510 मीटर पर। जाहिर है कि ढलान है। पंचगंगा ही वो स्थान है जहां मण्डल से आने वाला रास्ता भी मिल जाता है। हमें चूंकि अनुसुईया और मण्डल के रास्ते वापस जाना था, इसलिये रुद्रनाथ जाकर पंचगंगा आना ही पडता, इसलिये अपना सारा सामान यहीं रख दिया। पानी की एक बोतल, ट्रेकिंग पोल लेकर ही चले। अच्छी धूप निकली थी, रेनकोट की कोई आवश्यकता नहीं थी।
   करीब एक किलोमीटर बाद लोहे के सरिये को ऐसे ही मोडकर एक द्वार बना रखा है। यहां से रुद्रनाथ के प्रथम दर्शन होते हैं। बडा ही मनोहारी इलाका है यह। दूर दूर तक फैले बुग्याल, कोई जंगल नहीं। हम वृक्ष-रेखा से ऊपर जो थे। रुद्रनाथ के पीछे के पहाडों पर बादल थे, अन्यथा पता नहीं कौन-कौन सी चोटियां दिखतीं।

Friday, November 27, 2015

रुद्रनाथ यात्रा- पुंग बुग्याल से पंचगंगा

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26 सितम्बर 2015
आंख सात बजे से पहले ही खुल गई थी। बाहर निकले तो कोहरा था। चटाई बिछ गई और हम वहां जा भी बैठे। आलू के परांठे बनाने को कह दिया। परांठे खाये तो नीचे से एक ग्रुप आ गया। ये लोग खच्चर पर सवार थे। मुम्बई की कुछ महिलाएं थीं। सबसे पहले एक आईं, इनका नाम नीता था। 35 के आसपास उम्र रही होगी। भारी-भरकम कद-काठी। निशा ने धीरे से मुझसे कहा कि बेचारे खच्चर पर कैसी बीत रही होगी। खैर, अगले तीन दिनों तक हम मिलते रहे। उन्होंने पूर्वोत्तर समेत भारत के ज्यादातर इलाकों में भ्रमण कर रखा है। अच्छा लगता है जब कोई महिला इस तरह यात्रा करती हुई मिलती है।
आठ बजे पुंग बुग्याल से चल दिये। घना जंगल तो है ही। आज कुछ चहल-पहल दिखी। कई बार तो ऊपर से लोग आते मिले और मुम्बई वाला ग्रुप हमारे पीछे था ही। खूब चौडी पगडण्डी है। जंगल होने के बावजूद भी कोई डर नहीं लगा। जितना ऊपर चढते जाते, नीचे पुंग बुग्याल उतना ही शानदार दिखता जाता। चारों ओर घना जंगल और बीच में घास का छोटा सा मैदान। हम आश्चर्य भी करते कि रात हम वहां रुके थे और अब इतना ऊपर आ गये।

Wednesday, November 25, 2015

रुद्रनाथ यात्रा: गोपेश्वर से पुंग बुग्याल

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25 सितम्बर 2015
पांचों केदारों में केवल रुद्रनाथ ही अनदेखा बचा हुआ था, बाकी चारों केदार मैंने देख रखे हैं। सभी के लिये कुछ न कुछ पैदल अवश्य चलना पडता है। लेकिन रुद्रनाथ की यात्रा को कठिनतम माना जाता है। मैंने इसके कई यात्रा-वृत्तान्त पढ रखे हैं लेकिन एक बात का हमेशा सन्देह रहा। गोपेश्वर से रुद्रनाथ जाने के दो रास्ते हैं- एक तो मण्डल, अनुसुईया होते हुए और दूसरा सग्गर होते हुए। मुझे मण्डल का तो पता चल गया कि यह चोपता रोड पर गोपेश्वर से पन्द्रह किलोमीटर दूर है। लेकिन कभी यह पता नहीं चला कि सग्गर कहां है। चोपता रोड पर ही है या किसी और सडक पर है। सग्गर से आगे भी कोई सडक जाती है या सग्गर में ही सडक समाप्त हो जाती है- इस बात को जानने की मैंने खूब कोशिश कर ली लेकिन मैं यात्रा पर जाने तक नहीं जान पाया था कि सग्गर कहां है। गूगल मैप पर भी सग्गर की कोई स्थिति नहीं है। जब आपको यह आधारभूत जानकारी ही नहीं होगी तो आपको आगे का कार्यक्रम बनाने में भी परेशानी आयेगी।

Monday, November 23, 2015

गैरसैंण से गोपेश्वर और आदिबद्री

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25 सितम्बर 2015
   दिल्ली से चले थे तो हमारी योजना बद्रीनाथ और सतोपंथ जाने की थी लेकिन रात जब सतोपंथ के बारे में नेट पर पढने लगे तो पता चला कि वहां जाने का परमिट लेना होता है और गाइड-पोर्टर और राशन-पानी भी साथ लेकर चलना होता है। तभी मैंने सतोपंथ जाना स्थगित कर दिया और विचार किया कि रुद्रनाथ जायेंगे। निशा तो तुरन्त राजी हो गई लेकिन करण को समझाना पडा क्योंकि वह बद्रीनाथ और सतोपंथ का ही विचार किये बैठा था। आखिरकार वह भी मान गया।
   सुबह सवा आठ बजे बिना नाश्ता किये गैरसैंण से चलना पडा क्योंकि रेस्टोरेंट का रसोईया आज नहीं आया था। यहां से आदिबद्री ज्यादा दूर नहीं है। वहीं नाश्ता करेंगे।
   कुछ दूर तक चढाई है, फिर उतराई है। यहां हमें चाय की खेती दिखाई दी। उत्तराखण्ड में अक्सर चाय नहीं होती लेकिन यहां कुछ जगहों पर चाय की खेती होती है। यह इलाका मुझे बडा पसन्द आया। एक तो यह काफी ऊंचाई पर है, फिर चीड का जंगल। कहीं 2000 मीटर से ऊंची जगह पर अगर आपको चीड का जंगल मिले तो समझना कि आप वहां पूरा दिन भी बिता सकते हैं। बार-बार रुकने को मन करता है। खूब फोटो खींचने को मन करता है।

Friday, November 20, 2015

दिल्ली से गैरसैंण और गर्जिया देवी मन्दिर

   सितम्बर का महीना घुमक्कडी के लिहाज से सर्वोत्तम महीना होता है। आप हिमालय की ऊंचाईयों पर ट्रैकिंग करो या कहीं और जाओ; आपको सबकुछ ठीक ही मिलेगा। न मानसून का डर और न बर्फबारी का डर। कई दिनों पहले ही इसकी योजना बन गई कि बाइक से पांगी, लाहौल, स्पीति का चक्कर लगाकर आयेंगे। फिर ट्रैकिंग का मन किया तो मणिमहेश परिक्रमा और वहां से सुखडाली पास और फिर जालसू पास पार करके बैजनाथ आकर दिल्ली की बस पकड लेंगे। आखिरकार ट्रेकिंग का ही फाइनल हो गया और बैजनाथ से दिल्ली की हिमाचल परिवहन की वोल्वो बस में सीट भी आरक्षित कर दी।
   लेकिन उस यात्रा में एक समस्या ये आ गई कि परिक्रमा के दौरान हमें टेंट की जरुरत पडेगी क्योंकि मणिमहेश का यात्रा सीजन समाप्त हो चुका था। हम टेंट नहीं ले जाना चाहते थे। फिर कार्यक्रम बदलने लगा और बदलते-बदलते यहां तक पहुंच गया कि बाइक से चलते हैं और मणिमहेश की सीधे मार्ग से यात्रा करके पांगी और फिर रोहतांग से वापस आ जायेंगे। कभी विचार उठता कि मणिमहेश को अगले साल के लिये छोड देते हैं और इस बार पहले बाइक से पांगी चलते हैं, फिर लाहौल में नीलकण्ठ महादेव की ट्रैकिंग करेंगे और वापस रोहतांग से आ जायेंगे। इस यात्रा में ऊधमपुर के रहने वाले रोमेश शर्मा जी ने भी सहमति दे दी। दिल्ली का ही एक मित्र करण जादौन अपनी बुलेट पर साथ चलेगा और पठानकोट से हम रोमेश जी को ले लेंगे।

Friday, November 13, 2015

पातालकोट से इंदौर वाया बैतूल

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पातालकोट हम घूम चुके और अब बारी थी वापस इन्दौर जाने की। एक रास्ता तो यही था जिससे हम आये थे यानी पिपरिया, होशंगाबाद, भोपाल होते हुए। इस रास्ते को हम देख चुके थे। दूसरा रास्ता था बैतूल होते हुए। मैं इसी बैतूल वाले से जाना चाहता था। नया रास्ता, नई जगह देखने को मिलेगी। तामिया से दोनों रास्ते अलग होते हैं। हम बायें मुड गये और जुन्नारदेव के लिये ग्रामीण रास्ता पकड लिया। तामिया से जुन्नारदेव 28 किलोमीटर है और सारा रास्ता अच्छा बना है। सडक सिंगल लेन है यानी पतली सी है और कोई ट्रैफिक नहीं। ऊंची-नीची छोटी-छोटी पहाडियां इस रास्ते को बाइक चलाने के लिये शानदार बनाती हैं। आधा घण्टा लगा जुन्नारदेव पहुंचने में।
शाम के चार बज चुके थे। बैतूल अभी भी लगभग 100 किलोमीटर था। मुझे इस दूरी को तय करने में लगभग तीन घण्टे लगेंगे, अगर सडक अच्छी हुई तो। यानी बैतूल पहुंचने में अन्धेरा हो जाना है। मैं अन्धेरे में बाइक चलाना पसन्द नहीं करता इसलिये तय कर लिया कि रात बैतूल रुकना है। उधर सुमित पहले ही काफी लेट हो रहा था। उन्हें जल्द से जल्द इन्दौर पहुंचना था इसलिये आज वे बैतूल नहीं रुक सकते थे। सहमति बनी और हम जुन्नारदेव में अलग हो गये। सुमित तेज बाइक चलाता है और जब तक हम बैतूल पहुंचेंगे, वो हरदा पहुंच जायेगा।

Monday, November 9, 2015

पातालकोट भ्रमण और राजाखोह की खोज

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   अगले दिन यानी 24 अगस्त को आराम से साढे आठ बजे सोकर उठे। तेज हवाएं अभी भी चल रही थीं। बाहर निकले तो घना कोहरा था। अगस्त में कोहरा आमतौर पर नहीं होता लेकिन यहां के भूगोल, तेज हवाओं और अगस्त के नम वातावरण की वजह से यहां ऊपर बादल बन गये थे जो कोहरे जैसे लग रहे थे। नीचे घाटी में कोई कोहरा नहीं होगा। अदभुत अनुभव था।
   मैं और सुमित बाइक पर दूध लेने चल दिये। चौकीदार ने बताया कि गांव में किसी के यहां दूध मिल जायेगा। डिब्बा लेकर हम एक घर में पहुंचे। आवाज देने पर एक लडका बाहर आया। पूछने पर उसने पहले तो हमें विस्मय से देखा, फिर बोला- अभी हमारी गईया नहीं ब्याई है। फिर हमने किसी और से नहीं पूछा और सीधे पहुंचे तीन किलोमीटर दूर छिन्दी बाजार में। बाजार खुलने लगा था और हलवाई के यहां हमारी उम्मीदों के विपरीत ताजा पोहा उपलब्ध था। कल हमें बताया गया था कि यहां खाने को कुछ नहीं मिलता। अगर पोहे का पता होता तो हम आज खिचडी नहीं बनाते। देर-सबेर यहां आना ही था। हम सभी पोहे को बडे चाव से खाते हैं, तो आराम से भरपेट खाते।

Monday, November 2, 2015

पचमढ़ी से पातालकोट

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23 अगस्त 2015
बहुत दिनों से सोच रखा था कि जब भी पचमढी जाऊंगा, तब पातालकोट भी जाना है। मेरे लिये पचमढी से ज्यादा आकर्षक पातालकोट था। अब जब हम पचमढी में थे और हमारे पास बाइक भी थी, तो इतना तो निश्चित था कि हम पातालकोट भी अवश्य जायेंगे। पातालकोट का रास्ता तामिया से जाता है, तामिया का रास्ता मटकुली से जाता है और मटकुली पचमढी जाते समय रास्ते में आता है। मटकुली में एक तिराहा है जहां से एक सडक पिपरिया जाती है, एक जाती है पचमढी और तीसरी सडक जाती है तामिया होते हुए छिन्दवाडा और आगे नागपुर।
डेढ बजे पचमढी से चल दिये और एक घण्टे में ही मटकुली पहुंच गये। रास्ता पहाडी है और ढलान भरा है। हम रात के अन्धेरे में पचमढी आये थे। तब यह रास्ता बहुत मुश्किल लग रहा था, अब उतना मुश्किल नहीं लगा। पचमढी में मौसम अच्छा था, लेकिन जितना नीचे आते गये, उतनी ही गर्मी बढती गई।

Friday, October 30, 2015

पचमढी: चौरागढ यात्रा

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   आज हम जल्दी उठे और साढे छह बजे तक कमरा छोड दिया। आज हमें चौरागढ जाना था और वापस आकर दोपहर से पहले पचमढी छोड देना था। कल हम महादेव गये थे, जो कि पचमढी से दस किलोमीटर दूर है। आज भी सबसे पहले महादेव ही गये। रास्ते भर कोई नहीं मिला। लेकिन महादेव जाकर देखा तो हमसे पहले भी कई लोग चौरागढ जाने को तैयार मिले। दुकानें खुली मिलीं और उत्पाती बन्दर भी पूरे मजे में मिले। पार्किंग में बाइकें खडी करने लगे तो दुकान वालों ने कहा कि उधर बाइक खडी मत करो, बन्दर सीट कवर फाड देंगे। यहां हमारे पास खडी कर दो। उनके कहे अनुसार बाइक खडी कीं और उनके ही कहे अनुसार सीटों पर पत्थर रख दिये ताकि बन्दर सीटों पर ज्यादा ध्यान न दें।
   पैदल रास्ता यहीं से शुरू हो जाता है हालांकि सडक भी थोडा घूमकर कुछ आगे तक गई है। करीब एक किलोमीटर बाद सडक और पैदल रास्ते मिले हैं। हमें किसी ने नहीं बताया इस बारे में। बाइक वहां तक आसानी से चली जाती हैं और उधर बन्दरों का आतंक भी नहीं है। खैर।

Wednesday, October 28, 2015

पचमढी: राजेन्द्रगिरी, धूपगढ और महादेव

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   अप्सरा विहार से लौटकर हम गये राजेन्द्रगिरी उद्यान। यहां जाने का परमिट नहीं लगता। हमारा गाइड सुमित था ही। राजेन्द्रगिरी जैसा कि नाम से ही पता चल रहा है कि एक ऊंची जगह है। ज्यादा ऊंची नहीं है लेकिन यहां से पचमढी के कई अन्य आकर्षण दिखाई देते हैं। एक तरफ धूपगढ दिखता है तो दूसरी तरफ चौरागढ। राजेन्द्रगिरी में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की एक प्रतिमा है और अच्छा उद्यान भी है।
   इसके बाद रुख किया हमने धूपगढ का। यह पचमढी की सबसे ऊंची चोटी है। यहां से सूर्योदय और सूर्यास्त का अच्छा नजारा दिखता है। यहां जाने का परमिट लगता है, जिसे हम सुबह ही ले चुके थे। एक जगह जांच चौकी थी, जहां परमिट चेक किये और रजिस्टर में हमारी एण्ट्री की। सडक ठीक बनी है हालांकि संकरी और ‘बम्पी’ है। पहाडी रास्ता है और चढाई भी। कुछ ही दिन पहले तीज थी और उसके दो दिन बाद शायद नागपंचमी। आदिवासी समाज में नागों का बहुत महत्व होता है और इन्हें पूजा भी जाता है। तब यहां मेला लगा होगा। तभी तो रास्ते भर निर्जनता होने के बावजूद भी मेले के निशान मिलते गये।

Monday, October 26, 2015

यात्रा आयोजन- जलोडी जोत, ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क और पराशर झील

अभी पिछले सप्ताह मैं ग्वालियर में था। प्रशान्त जी के यहां डिनर का आनन्द ले रहा था। तभी उन्होंने सुझाव दिया कि अगले साल वे कई मित्र लद्दाख जायेंगे और मैं उनकी अगवानी करूं। किराये की गाडी लेंगे और निकल पडेंगे। उस समय वहां बैठे-बैठे इस मुद्दे पर खूब बातें हुईं।
वापस दिल्ली आकर मैं इस बारे में सोचने लगा। ऐसा नहीं है कि इस तरह की यात्राएं आयोजित करने के बारे में मैं पहली बार सोच रहा हूं। पहले भी मन में इस तरह के विचार आये हैं। क्या मैं इस तरह का आयोजन कर सकूंगा? इसमें जबरदस्त टीम-वर्क की आवश्यकता पडती है और अलग-अलग तरह के लोगों के साथ रहना भी होता है और उनकी समस्याएं सुननी-सुलझानी भी पडती हैं। मेरी प्रकृति अकेले रहने और भ्रमण करने की रही है। पहले भी कई बार यात्राओं पर अपने साथियों से मनमुटाव होता रहा है।
निशा के आने के बाद बहुत बडा परिवर्तन हुआ है। पहले पहले हमारी बहुत लडाई होती थी, अब सब ठीक होने लगा है। एक टीम-भावना मेरे अन्दर जाग्रत होने लगी है। सामने वाला क्या चाहता है, उसके अनुसार मैं स्वयं को ढालने लगा हूं।

Wednesday, October 21, 2015

पचमढी: पाण्डव गुफा, रजत प्रपात और अप्सरा विहार

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20 अगस्त 2015 की रात नौ बजे हम पचमढी पहुंचे। दिल्ली से चलते समय हमने जो योजना बनाई थी, उसके अनुसार हमें पचमढी नहीं आना था इसलिये यहां के बारे में कोई खोजबीन, तैयारी भी नहीं की। मुझे पता था कि यह एक सैनिक छावनी है। हमारे यहां लैंसडाउन और चकराता में भी सैनिक छावनियां हैं। दोनों के अनुभवों से मुझे सन्देह था कि इतनी रात को यहां कोई कमरा मिल जायेगा। लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ। अच्छी चहल-पहल थी और बाजार भी खुला था। सुमित यहां पहले आ चुका था, इसलिये हमारा मार्गदर्शक वही था। मेरे पास समय की कोई कमी नहीं थी। मेरी बस एक ही इच्छा थी कि वापसी में पातालकोट देखना है। आज हमारे पास बाइक है और पातालकोट यहां से ज्यादा दूर भी नहीं, इसलिये इस मौके को मैं नहीं छोडने वाला था। बाकी रही पचमढी, तो जैसे भी घुमाना है, घुमा।

Monday, October 19, 2015

भोजपुर, मध्य प्रदेश

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   अगस्त 2009 में मैं पहली बार मध्य प्रदेश घूमने गया था। सबसे पहले पहुंचा था भीमबेटका। उसी दिन इरादा बना भोजपुर जाने का। भीमबेटका के पास ही है। लेकिन कोई सार्वजनिक वाहन उपलब्ध न होने के कारण आधे रास्ते से वापस लौटना पडा। तब से कसक थी कि भोजपुर जाना है। आज जब बाइक साथ थी और हम उसी सडक पर थे जिससे थोडा सा हटकर भोजपुर है, तो हमारा भोजपुर जाना निश्चित था। भोपाल से थोडा सा आगे भैरोंपुर है। भैरोंपुर से अगर सीधे हाईवे से जायें तो औबेदुल्लागंज 22 किलोमीटर है। लेकिन अगर भोजपुर होते हुए जायें तो यही दूरी 30 किलोमीटर हो जाती है। यह कोई ज्यादा बडा फर्क नहीं है।
   सावन का महीना होने के कारण भोजपुर में थोडी चहल-पहल थी अन्यथा बाकी समय यहां सन्नाटा पसरा रहता होगा। बेतवा के किनारे है भोजपुर। राजा भोज के कारण यह नाम पडा। उन्होंने यहां बेतवा पर बांध बनवाये थे और इस शिव मन्दिर का निर्माण करवाया था। किन्हीं कारणों से निर्माण अधूरा रह गया। पूरा हो जाता तो यह बडा ही भव्य मन्दिर होता। इसकी भव्यता का अन्दाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि एक बडे ऊंचे चबूतरे पर मन्दिर बना है और मन्दिर में जो शिवलिंग है वो 5.5 मीटर ऊंचा व 2.3 मीटर परिधि का है। बिल्कुल विशालकाय शिवलिंग।

Friday, October 16, 2015

इन्दौर से पचमढी बाइक यात्रा और रोड स्टेटस

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21 अगस्त 2015
   मुझे छह बजे ही उठा दिया गया, नहीं तो मैं अभी भी खूब सोता। लेकिन जल्दी उठाना भी विवशता थी। आज हमें पचमढी पहुंचना था जो यहां से 400 किलोमीटर से ज्यादा है। रास्ते में देवास से सुमित को अपने साले जी को भी साथ लेना था। सीबीजेड एक्सट्रीम पर मैं और निशा थे जबकि बुलेट पर सुमित और उनकी पत्नी। साले जी की अपनी बाइक होगी। सुमित ने हमें धन्यवाद दिया कि हम दोनों को देखकर ही उनकी पत्नी भी साथ चलने को राजी हुई हैं अन्यथा उनका दोनों का एक साथ केवल इन्दौर-देवास-इन्दौर का ही आना-जाना होता था, कहीं बाहर का नहीं।
   तो साढे छह बजे यहां से चल दिये। सुबह-सुबह का समय था, आराम से शहर से पार हो गये। मेन रोड यानी एनएच 3 पर पहुंचे। यह शानदार छह लेन की सडक है। देवास तक हम इसी पर चलेंगे, उसके बाद भोपाल के लिये दूसरी सडक पकड लेंगे।

Wednesday, October 14, 2015

शीतला माता जलप्रपात, जानापाव पहाडी और पातालपानी

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   इन्दौर से जब महेश्वर जाते हैं तो रास्ते में मानपुर पडता है। यहां से एक रास्ता शीतला माता के लिये जाता है। यात्रा पर जाने से कुछ ही दिन पहले मैंने विपिन गौड की फेसबुक पर एक झरने का फोटो देखा था। लिखा था शीतला माता जलप्रपात, मानपुर। फोटो मुझे बहुत अच्छा लगा। खोजबीन की तो पता चल गया कि यह इन्दौर के पास है। कुछ ही दिन बाद हम भी उधर ही जाने वाले थे, तो यह जलप्रपात भी हमारी लिस्ट में शामिल हो गया।

शीतला माता जलप्रपात (विपिन गौड की फेसबुक से अनुमति सहित)

   मानपुर से शीतला माता का तीन किलोमीटर का रास्ता ज्यादातर अच्छा है। यह एक ग्रामीण सडक है जो बिल्कुल पतली सी है। सडक आखिर में समाप्त हो जाती है। एक दुकान है और कुछ सीढियां नीचे उतरती दिखती हैं। लंगूर आपका स्वागत करते हैं। हमारा तो स्वागत दो भैरवों ने किया- दो कुत्तों ने। बाइक रोकी नहीं और पूंछ हिलाते हुए ऐसे पास आ खडे हुए जैसे कितनी पुरानी दोस्ती हो। यह एक प्रसाद की दुकान थी और इसी के बराबर में पार्किंग वाला भी बैठा रहता है- दस रुपये शुल्क बाइक के। हेलमेट यहीं रख दिये और नीचे जाने लगे।

Monday, October 12, 2015

महेश्वर यात्रा

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20 अगस्त 2015
   हमें आज इन्दौर नहीं आना था। अभी दो दिन पैसेंजर ट्रेनों में घूमना था और तीसरे दिन यहां आना था लेकिन निशा एक ही दिन में पैसेंजर ट्रेन यात्रा करके थक गई और तब इन्दौर आने का फैसला करना पडा। महेश्वर जाने की योजना तो थी लेकिन साथ ही यह भी योजना थी कि दो दिनों में पैसेंजर यात्रा करते करते हम महेश्वर के बारे में खूब सारी जानकारी जुटा लेंगे, नक्शा देख लेंगे लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं हो सका। सुमित के यहां नेट भी बहुत कम चलता है, इसलिये हम रात को और अगले दिन सुबह को भी जानकारी नहीं जुटा पाये। हालांकि सुमित ने महेश्वर के बारे में बहुत कुछ समझा दिया लेकिन फिर भी हो सकता है कि हम महेश्वर के कुछ अत्यावश्यक स्थान देखने से रह गये हों।

Tuesday, September 22, 2015

भिण्ड-ग्वालियर-गुना पैसेंजर ट्रेन यात्रा

   18 अगस्त 2015
   आज है 20 सितम्बर यानी यात्रा किये हुए एक महीना हो चुका है। अमूमन मैं इतना समय वृत्तान्त लिखने में नहीं लगाता हूं। मैं यथाशीघ्र लिखने की कोशिश करता हूं ताकि लेखन में ताजगी बनी रहे। वृत्तान्त जितनी देर से लिखेंगे, उतना ही यह ‘समाचार’ होने लगता है। इसका कारण था कि वापस आते ही अण्डमान की तैयारियां करने लगा। फिर लद्दाख वृत्तान्त भी बचा हुआ था। अण्डमान तो नहीं जा पाये लेकिन फिर कुछ समय वहां न जाने का गम मनाने में निकल गया। अभी परसों ही चम्बा की तरफ निकलना है, उसमें ध्यान लगा हुआ है। न लिखने के कारण ब्लॉग पर ट्रैफिक कम होने लगा है। बडी अजीब स्थिति है- जब चार दिन वृत्तान्त न लिखूं और मित्रगण कहें कि बहुत दिन हो गये लिखे हुए तो मित्रों को गरियाता हूं कि पता है कितना समय लगता है लिखने में। तुमने तो चार सेकण्ड लगाये और शिकायत कर दी। इस बार किसी मित्र ने शिकायत नहीं की तो भी गरियाने का मन कर रहा है- भाईयों, भूल तो नहीं गये मुझे?

Friday, September 11, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा का कुल खर्च

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   हम कोठारी साहब के साथ यात्रा पर निकले थे। खर्च हमने सम्मिलित रूप से शुरू किया था, बाद में दिल्ली आकर हिसाब लगा लेते। लेकिन कोठारी साहब श्रीनगर में बिछड गये। इन तीन-चार दिनों का हमने कोई हिसाब नहीं किया। जो खर्च कोठारी साहब ने किया, वो उनका था और जो हमने किया, वो हमारा था। 

दिनांक: 6 जून 2015, शनिवार
स्थानदूरीसमयखर्च
दिल्ली017:50800 पेट्रोल (12 लीटर)
बहलगढ4719:20
पानीपत पार10320:15-20:4570 कोल्ड ड्रिंक (कोठारी जी)
पीपली17022:05-22:15
अम्बाला छावनी21123:00-23:20
बनूड24223:59
कुल दूरी:242
मेरा कुल खर्च: 800

Monday, September 7, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 21 (केलांग-मनाली-ऊना-दिल्ली)

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23 जून 2015
हम किसी भी जल्दी में नहीं थे। हमें परसों दोपहर तक दिल्ली पहुंचना था और केलांग से हम आराम से दो दिन में दिल्ली पहुंच सकते हैं। इसी वजह से रोज की तरह आज भी देर तक सोये। उठे तो मनदीप का फोन आया। वो आज सपरिवार मनाली आ रहा है और अभी बिलासपुर के आसपास था। यानी दोपहर तक वह मनाली पहुंच जायेगा। उसके पास अपनी गाडी है। हमने भी इरादा बना लिया कि आज हम मनदीप के साथ ही रुकेंगे और शाम को शानदार डिनर करेंगे।
दस बजे केलांग से चले। जल्दी ही टांडी पहुंच गये। यहां बारालाचा-ला से निकलकर दो अलग-अलग दिशाओं में बही चन्द्रा और भागा नदियों का संगम होता है। आलू के परांठे खाये और बाइक की टंकी फुल करा ली। हिमाचल में रोहतांग पार पूरे लाहौल में एकमात्र पेट्रोल पम्प टांडी में ही है। टांडी से आगे अगला पेट्रोल पम्प लगभग साढे तीन सौ किलोमीटर दूर लेह के पास कारू में है। बाइक की टंकी लगभग खाली हो चुकी थी, इसमें 11.83 लीटर पेट्रोल आया। कम्पनी के अनुसार टंकी की क्षमता 10 लीटर है। मैंने गुजरात से लेकर हिमाचल और जम्मू-कश्मीर तक हर जगह टंकी फुल कराई है, इसमें हमेशा 10 लीटर से ज्यादा ही तेल आता है। अब या तो कम्पनी गलत बता रही है कि टंकी दस लीटर की है। पेट्रोल पम्पों पर धांधलियां होती हैं लेकिन हर पेट्रोल पम्प ऐसा नहीं होता। खैर।

Friday, August 28, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 20 (भरतपुर-केलांग)

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22 जून 2015
आज हमें केवल केलांग तक ही जाना था इसलिये उठने में कोई जल्दबाजी नहीं की बल्कि खूब देर की। मुजफ्फरनगर वाला ग्रुप लेह की तरफ चला गया था और उनके बाद लखनऊ वाले भी चले गये। टॉयलेट में गया तो पानी जमा मिला यानी रात तापमान शून्य से नीचे था। सामने ही बारालाचा-ला है और इस दर्रे पर खूब बर्फ होती है। मनाली-लेह सडक पर सबसे ज्यादा बर्फ बारालाचा पर ही मिलती है। बर्फ के कारण सडक पर पानी आ जाता है और ठण्ड के कारण वो पानी जम भी जाया करता है इसलिये बाइक चलाने में कठिनाईयां आती हैं। देर से उठने का दूसरा कारण था कि धूप निकल जाये और सडक पर जमा हुआ पानी पिघल जाये ताकि बाइक न फिसले।
लखनऊ वालों ने रात अण्डा-करी बनवा तो ली थी लेकिन सब सो गये और सारी सब्जी यूं ही रखी रही। रात उन्होंने कहा था कि सुबह वे अण्डा-करी अपने साथ ले जायेंगे लेकिन अब वे नहीं ले गये। मन तो हमारा कर रहा था कि अण्डा-करी मांग लें क्योंकि दुकानदार को भुगतान हो ही चुका था। हमें ये फ्री में मिलते लेकिन ज़मीर ने साथ नहीं दिया। दूसरी बात कि तम्बू वाले दोनों पति-पत्नी थे। इस तम्बू के सामने वाला तम्बू इसी महिला की मां संभाल रही थी। यह महिला अपने पति के प्रति बहुत आक्रामक थी और जरा-जरा सी बात पर उसे डांट देती थी। एक दुधमुंहा बच्चा भी था। अगर वो रोने लगे तो पति की खैर नहीं। कुल मिलाकर हमारे लिये बडा ही भारी माहौल था, हमने अण्डा-करी मांगना उचित नहीं समझा।

Monday, August 24, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 19 (शो कार- डेबरिंग-पांग-सरचू-भरतपुर)

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21 जून 2015
आराम से सोकर उठे- नौ बजे। नाश्ते में चाय, आमलेट के साथ एक-एक रोटी खा ली। कल जितना मौसम साफ था, आज उतना ही खराब। बूंदाबांदी भी हो जाती थी। पिछली बार यहां आया था, तब भी रात-रात में मौसम खराब हो गया था, आज भी हो गया। पेट्रोल की बात की तो दुकान वाले ने आसपास की दुकानों पर भागादौडी की लेकिन पेट्रोल नहीं मिला। कहा कि डेबरिंग में मिल जायेगा। बाइक कल ही रिजर्व में लग चुकी थी, अब बोतल का दो लीटर पेट्रोल भी खाली कर दिया।
दस बजे यहां से चल दिये। रात हमने बाइक से सामान खोला ही नहीं था। केवल टैंक बैग उतार लिया था। खोलने में तो मेहनत लगती ही है, सुबह बांधने में और भी ज्यादा मेहनत लगती है।

Friday, August 21, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 18 (माहे-शो मोरीरी-सुमडो-शो कार)

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20 जून 2015
साढे आठ बजे सोकर उठे और नौ बजे तक यहां से निकल लिये। बारह किलोमीटर आगे सुमडो है जहां खाने पीने को मिलेगा, वहीं नाश्ता करेंगे। सुमडो का अर्थ होता है संगम। गांव का नाम है पुगा और दो धाराओं के संगम पर बसा होने के कारण बन गया- पुगा सुमडो। लेकिन आम बोलचाल में सुमडो ही कहा जाता है। यहां से एक रास्ता शो मोरीरी जाता है और दूसरा रास्ता शो-कार। आपको याद होगा कि शो-कार झील लेह-मनाली रोड के पास स्थित है। हमें आज पहले शो मोरीरी जाना है, फिर वापस सुमडो तक आकर शो-कार वाले रास्ते पर चल देना है। शो-कार की तरफ चलने का अर्थ है मनाली की ओर चलना और मनाली की ओर चलने का अर्थ है दिल्ली की ओर चलना। इस प्रकार जैसे ही आज हम शो-मोरीरी से वापस मुडेंगे, दिल्ली के लिये वापसी आरम्भ कर देंगे।
सुमडो से थोडा आगे एक दुकान है। हम यहीं रुक गये। दस बजने वाले थे, हम पेट भर ही लेना चाहते थे लेकिन यहां ज्यादा कुछ नहीं मिला। चाय, बिस्कुट में काम चलाया। कोई बात नहीं, आगे शो-मोरीरी पर बहुत कुछ खाने को मिलेगा।

Wednesday, August 19, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 17 (लोमा-हनले-लोमा-माहे)

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19 जून 2015
भारतीय सेना के अपनेपन से अभिभूत होकर सुबह सवा नौ बजे हमने हनले के लिये प्रस्थान किया। जरा सा आगे ही आईटीबीपी की चेकपोस्ट है और दो बैरियर भी हैं। यहां से एक रास्ता सिन्धु के साथ-साथ उप्शी और आगे लेह चला जाता है, एक रास्ता वही है जिससे हम आये हैं यानी चुशुल वाला और तीसरा रास्ता सिन्धु पार जाने के लिये है। सिन्धु पार होते ही फिर दो रास्ते मिलते हैं- एक सीधा हनले जाता है और दूसरा बायें कोयुल होते हुए देमचोक। देमचोक ही वो स्थान है जहां से सिन्धु तिब्बत से भारत में प्रवेश करती है। गूगल मैप के भारतीय संस्करण में देमचोक को भारत का हिस्सा दिखाया गया है, अन्तर्राष्ट्रीय संस्करण में इसे विवादित क्षेत्र बताया है जो भारतीय दावे और चीनी दावे के बीच में है और चीनी संस्करण में इसे चीन का हिस्सा दिखाया है। लेकिन फिलहाल जमीनी हकीकत यह है कि देमचोक भारतीय नियन्त्रण में है। देमचोक का परमिट बिल्कुल नहीं मिलता है। अगर आपकी सैन्य पृष्ठभूमि रही है तो शायद आप वहां जा सकते हैं अन्यथा नहीं। हालांकि लोमा में सिन्धु पार करके देमचोक वाली सडक पर कोई नहीं था, आप भूलवश कुछ दूर तक जा सकते हैं, शायद कोयुल तक भी।

Monday, August 17, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 16 (मेरक-चुशुल-सागा ला-लोमा)

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18 जून 2015
दोपहर के पौने दो बजे हम पेंगोंग किनारे स्थित मेरक गांव से चले। हमारा आज का लक्ष्य हनले पहुंचने का था जो अभी भी लगभग 150 किलोमीटर दूर है। मेरे पास सभी स्थानों की दूरियां थीं और यह भी ज्ञात था कि कितनी दूर खराब रास्ता मिलेगा और कितनी दूर अच्छा रास्ता। इन 150 किलोमीटर में से लगभग 60 किलोमीटर खराब रास्ता है, बिल्कुल वैसा ही जैसा हमने स्पांगमिक से यहां तक तय किया है। इन 60 किलोमीटर को तय करने में तीन घण्टे लगेंगे और बाकी के 90 किलोमीटर को तय करने में भी तीन ही घण्टे लगेंगे; ऐसा मैंने सोचा था। यानी हनले पहुंचने में अन्धेरा हो जाना है। अगर कुछ देर पहले वो बुलेट खराब न होती तो हम उजाला रहते हनले पहुंच सकते थे।

Friday, August 14, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 15 (पेंगोंग झील: लुकुंग से मेरक)

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17 जून 2015
दोपहर बाद साढे तीन बजे हम पेंगोंग किनारे थे। अर्थात उस स्थान पर जहां से पेंगोंग झील शुरू होती है और लुकुंग गांव है। इस स्थान को ‘पेंगोंग’ भी कह देते हैं। यहां खाने-पीने की बहुत सारी दुकानें हैं।
पूरे लद्दाख में अगर कोई स्थान सर्वाधिक दर्शनीय है तो वो है पेंगोंग झील। आप लद्दाख जा रहे हैं तो कहीं और जायें या न जायें लेकिन पेंगोंग अवश्य जायें। अगर शो-मोरीरी छूट जाये तो छूटने दो, नुब्रा छूटे तो छूटने दो लेकिन पेंगोंग झील नहीं छूटनी चाहिये।
यह एक साल्टवाटर लेक है यानी नमक के पानी की झील है। नमक का पानी होने का यह अर्थ है कि इसका पानी रुका हुआ है, बहता नहीं है। हिमालय में अक्सर बहते पानी के रास्ते में कोई अवरोध आता है तो वहां झील बन जाती है। जब पानी का तल अवरोध से ऊंचा होने लगता है तो पानी बह निकलता है, रुकता नहीं है। लेकिन पेंगोंग ऐसी झील नहीं है। इसमें चारों तरफ से छोटे छोटे नालों से पानी आता रहता है और जाता कहीं नहीं है। तेज धूप पडती है तो उडता रहता है और खारा होता चला जाता है।

Wednesday, August 12, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 14 (चांग ला - पेंगोंग)

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17 जून 2015
शोल्टाक से हम सवा दस बजे चले। तीन किलोमीटर ही चले थे कि दाहिनी तरफ एक झील दिखाई दी। इसका नाम नहीं पता। हम रुक गये। यह एक काफी चौडी घाटी है और वेटलैण्ड है यानी नमभूमि है। चांगला और अन्य बर्फीली जगहों से लगातार पानी आता रहता है और नमी बनी रहती है। साथ ही हरियाली भी। ऐसी जगहें लद्दाख में कई हैं। मनाली रोड पर डेबरिंग तो विश्व प्रसिद्ध है। डेबरिंग की पश्मीना भेडों का बडा नाम है। कहीं भेडपालन होता है, कहीं याकपालन। यहां जहां रात हम रुके थे, वहां याकपालन हो रहा था। पानी के रास्ते में थोडा सा अवरोध आते ही वो झील का रूप ले लेता है। यहां भी इसी तरह की झील बनी है। अच्छी लगती है। हो सकता है कि पेंगोंग के चक्कर में आपने यह झील न देखी हो। अगली बार पेंगोंग जाना हो तो इसे अवश्य देखना। पेंगोंग अपनी जगह है लेकिन यह भी खूबसूरती में कम नहीं है।
इससे आगे रास्ता भी बेहद खूबसूरत है। हरी घास कालीन की तरह बिछी है और लद्दाख के बंजर में आंखों को अच्छी लगती है। थोडा ही आगे यह नदी दुरबुक की तरफ से आती एक नदी में मिल जाती है और दोनों सम्मिलित होकर श्योक में मिलने चल देती हैं। जहां इसका और श्योक का संगम होता है, वहां श्योक नामक गांव भी है। श्योक भी बडी दूर से आती है और दिस्कित के पास नुब्रा नदी इसमें मिल जाती है। श्योक आगे बढती है और पाक अधिकृत कश्मीर में स्कार्दू के पास सिन्धु में मिल जाती है।

Monday, August 10, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 13 (लेह-चांग ला)

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(मित्र अनुराग जगाधरी जी ने एक त्रुटि की तरफ ध्यान दिलाया। पिछली पोस्ट में मैंने बाइक के पहियों में हवा के प्रेशर को ‘बार’ में लिखा था जबकि यह ‘पीएसआई’ में होता है। पीएसआई यानी पौंड प्रति स्क्वायर इंच। इसे सामान्यतः पौंड भी कह देते हैं। तो बाइक के टायरों में हवा का दाब 40 बार नहीं, बल्कि 40 पौंड होता है। त्रुटि को ठीक कर दिया है। आपका बहुत बहुत धन्यवाद अनुराग जी।)
दिनांक: 16 जून 2015
दोपहर बाद तीन बजे थे जब हम लेह से मनाली रोड पर चल दिये। खारदुंगला पर अत्यधिक बर्फबारी के कारण नुब्रा घाटी में जाना सम्भव नहीं हो पाया था। उधर चांग-ला भी खारदुंगला के लगभग बराबर ही है और दोनों की प्रकृति भी एक समान है, इसलिये वहां भी उतनी ही बर्फ मिलनी चाहिये। अर्थात चांग-ला भी बन्द मिलना चाहिये, इसलिये आज उप्शी से शो-मोरीरी की तरफ चले जायेंगे। जहां अन्धेरा होने लगेगा, वहां रुक जायेंगे। कल शो-मोरीरी देखेंगे और फिर वहीं से हनले और चुशुल तथा पेंगोंग चले जायेंगे। वापसी चांग-ला के रास्ते करेंगे, तब तक तो खुल ही जायेगा। यह योजना बन गई।

Saturday, August 8, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 12 (लेह-खारदुंगला)

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16 जून 2015
एक बात मैं अक्सर सोचता हूं। हम मैदानों में बाइक के पहियों में हवा लगभग 35 पौंड पर भरते हैं। जब हम लद्दाख जैसी ऊंची जगहों पर पहुंचते हैं तो वातावरण में हवा का दबाव कम होने के कारण पहियों में हवा का दाब बढ जाता है। जैसे कि मान लो लेह में हवा का दाब दिल्ली के मुकाबले आधा है, तो दिल्ली में भरी गई 35 पौंड की हवा लेह में 70 पौंड का प्रभाव पैदा करेगी। यह खतरनाक हो सकता है। बाइकों में अधिकतम 40 पौंड तक ही हवा भरी जाती है, उससे ज्यादा हवा अगर भरी गई तो टायर के फटने का डर हो जाता है। लेकिन ऊंचाईयों पर पहुंचने पर दाब 70 पौंड तक भी पहुंच जाता है, जो निश्चित रूप से अत्यधिक खतरनाक है। ऐसे में अत्यधिक दाब वाली हवा ट्यूब पर, पहिये पर दबाव डालती है और ट्यूब जहां से भी कमजोर होती है, वहीं से पंचर हो जाती है।
लद्दाख में दर्रों के आसपास पंचर ज्यादा होते हैं। केवल इसीलिये।
इसलिये जरूरी था कि हवा चेक की जाये। यह काम हम कल नहीं करा सके, सोचा कि आज चलते समय करायेंगे। लेकिन आज सुबह नौ बजे हम चल पडे, लेह से बाहर निकल गये लेकिन हवा चेक नहीं कराई। यह खतरनाक तो था लेकिन जो होगा देखा जायेगा।

Wednesday, August 5, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 11 (खालसी-लेह)

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14 जून 2015,
आज रविवार था और हम खालसी में थे। हमें आगे की यात्राओं के लिये चुशुल, हनले और चुमुर के परमिट की आवश्यकता थी। लेकिन आज परमिट नहीं बन सकता। इसलिये योजना थी कि आज खारदुंगला पार करके पनामिक तक पहुंचने की कोशिश करेंगे। कल तुरतुक और परसों वारी-ला के रास्ते कारू पहुंचेंगे, टंकी फुल करायेंगे और परमिट बनवाने लेह आ जायेंगे। उसके बाद फिर कारू और आगे पेंगोंग की तरफ चले जायेंगे।
लेकिन नौ बजे सोकर उठे। जब तक यहां से चले, तब तक दस बज चुके थे। यहां से लेह सौ किलोमीटर दूर है और शानदार टू लेन सडक बनी है। काफी रास्ता समतल है इसलिये तीन घण्टे में लेह पहुंच जाने का इरादा था।
रास्ता सिन्धु के साथ साथ है। ससपोल से आगे ऊपर चढकर जहां से लिकिर गोम्पा के लिये रास्ता अलग होता है, हम रुक गये। यहां काफी लम्बा-चौडा मैदान है। अच्छा लगता है। दस मिनट यहां रुके, फिर चल पडे।
बारह बजे तक निम्मू पार कर लिया। यहां सिन्धु में जांस्कर नदी आकर मिलती है। जांस्कर एक बहुत बडे इलाके का पानी अपने साथ लाती है। इसका जल-प्रवाह क्षेत्र इतना दुर्गम है कि आज तक वहां ढंग की सडक भी नहीं बन पाई है। इसी जांस्कर घाटी में सर्दियों में चादर ट्रेक होता है। नदी जम जाती है और इस पर ट्रैकिंग की जाती है।

Monday, August 3, 2015

डायरी के पन्ने- 33

नोट: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं।

1. हमारा एक व्हाट्स एप ग्रुप है- `घुमक्कडी... दिल से'। इसमें वे लोग शामिल हैं जो घूमते हैं और फिर उसे ब्लॉग पर लिखते भी हैं। लेकिन इसमें कुछ ऐसे भी लोग हैं जो साल में एकाध यात्रा-पोस्ट डाल देते हैं। इनमें दर्शन कौर धनोए प्रमुख हैं। कुछ तो ऐसे भी लोग हैं जो न लिखते हैं और न ही कहीं घूमने जाते हैं। ये लोग बेवजह आकर बेकार की बातें करते थे। मुझे इन लोगों से आपत्ति थी और एक बार ग्रुप छोड भी दिया था लेकिन एडमिन साहब अपने बेहद नजदीकी हैं, इसलिये पुनः शामिल हो गया।
एक दिन प्रदीप चौहान ने अपने ब्लॉग का लिंक शेयर किया- safarhaisuhana.blogspot.in। उधर रीतेश गुप्ता जी के ब्लॉग का यूआरएल है- safarhainsuhana.blogspot.in। जाहिर है कि दोनों में एक N का फर्क है। रीतेश गुप्ता भी इस ग्रुप में शामिल हैं। प्रदीप ने हम सबसे अपना ब्लॉग पढने और टिप्पणी करने की गुजारिश की थी। मेरा दूसरों के यात्रा-वृत्तान्त पर टिप्पणी करने का कडवा अनुभव रहा है, इसलिये आजकल मैं न कोई यात्रा ब्लॉग पढता हूं और न ही टिप्पणी करता हूं; एकाध को छोडकर। मैं जब कोई यात्रा-वृत्तान्त पढता हूं तो उसमें कमियां निकालने की कोशिश करता हूं। अक्सर कमियां मिल भी जाती हैं। सामने कमी होते हुए मुझसे वाहवाही नहीं होती। मैं उस कमी को उघाड देता हूं। यही गडबड हो जाती है। लेखक आरोप लगा देता है कि तू ज्यादा स्याणा बन रहा है। कई बार ऐसा हो चुका है, तो अब पढना बन्द कर रखा है।

Friday, July 31, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 10 (शिरशिरला-खालसी)

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13 जून 2015
सवा दो बजे हम शिरशिरला पहुंच गये थे। यह स्थान समुद्र तल से 4800 मीटर ऊपर है। यहां से फोतोकसर दिख तो नहीं रहा था लेकिन अन्दाजा था कि कम से कम दस किलोमीटर तो होगा ही। रास्ता ढलान वाला है, फिर भी स्पीड में कोई बढोत्तरी नहीं होगी। हम औसतन दस किलोमीटर प्रति घण्टे की रफ्तार से यहां तक आये थे। फिर भी मान लो आधा घण्टा ही लगेगा। यानी हम तीन बजे तक फोतोकसर पहुंच जायेंगे। भूख लगी थी, खाना भी खाना होगा और गोम्पा भी देखना होगा। जल्दी करेंगे फिर भी चार साढे चार बज जाने हैं। पांच बजे तक वापस शिरशिरला आयेंगे। वापसी में दो घण्टे हनुपट्टा के और फिर कम से कम दो घण्टे ही मेन रोड तक पहुंचने के लगेंगे। यानी वापस खालसी पहुंचने में नौ बज जायेंगे। वैसे तो आज ही लेह पहुंचने का इरादा था जोकि खालसी से 100 किलोमीटर आगे है। हमारा सारा कार्यक्रम बिगड रहा है और हम लेट भी हो रहे हैं।

Tuesday, July 28, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 9 (खालसी-हनुपट्टा-शिरशिरला)

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13 जून 2015
नौ बजकर पचास मिनट हो गये थे जब हम खालसी से निकले। इससे पहले आठ बजे के आसपास हम उठ भी गये थे। कल 200 किलोमीटर बाइक चलाई थी, बहुत थकान हो गई थी। पहाडों में संकरे रास्तों पर 200 किलोमीटर भी बहुत ज्यादा हो जाते हैं। आज हमारे सामने दो विकल्प थे- एक, आज ही लेह जायें और चुशुल, हनले का परमिट लेकर खारदुंग-ला पार कर लें। दूसरा, आज फोतोकसर गोम्पा जायें और रात तक लेह पहुंच जायें। कल रविवार है, परमिट नहीं मिलेगा। इसलिये कल खारदुंग-ला पार जाकर नुब्रा घाटी देख लें और मंगलवार को वापसी में चुशुल, हनले का परमिट ले लें। पहले विकल्प में हमें फोतोकसर देखने को नहीं मिल रहा है लेकिन दूसरे में फोतोकसर भी मिल रहा है और बाकी सबकुछ भी। इसलिये दूसरा विकल्प चुना।
आलू के परांठे खाते समय होटल वाले ने पक्का कर दिया कि फोतोकसर तक बाइक चली जायेगी।

Friday, July 24, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा-8 (बटालिक-खालसी)

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12 जून 2015
सिन्धु यहां बहुत गहरी घाटी में बहती है। पहाड बिल्कुल सीधे खडे हैं। ऐसे इलाके दुर्गम होते हैं। लेकिन इसके बावजूद भी यहां कुछ बसावट है, कुछ गांव हैं। इनमें जो लोग निवास करते हैं, वे स्वयं को शुद्ध आर्य बताते हैं। इसीलिये धा और हनुथांग व अन्य गांव प्रसिद्ध हैं। वैसे तो हिमाचल के मलाणा निवासी भी स्वयं को आर्य कहते हैं लेकिन उनमें बहुत सी गन्दगी पनप गई है। यहां वो गन्दगी नहीं है। मेरी इच्छा इसी तरह के किसी गांव में रुकने की थी। लद्दाख के ज्यादातर गांवों में होम-स्टे की सुविधा मिलती है, रुकने की ज्यादा समस्या नहीं आती।
लेकिन हम चलते रहे। शाम का समय था और सूरज की किरणें अब नीचे नहीं आ रही थीं। अन्धेरा होने से पहले ही रुक जाना ठीक था। लेकिन धा गांव कब निकल गया, पता ही नहीं चला। एक निर्जन पुल के पास साइनबोर्ड अवश्य लगा था जिस पर मोटे मोटे अक्षरों में अंग्रेजी में लिखा था- धा। हो सकता है कि गांव सडक से कुछ ऊपर हो। हम इसे छोडकर आगे बढ गये। धा के बाद एक गांव और मिला। यहां एक होम-स्टे का बोर्ड भी लगा था लेकिन हम इसे भी छोडकर आगे चल दिये।

Wednesday, July 22, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 7 (द्रास-कारगिल-बटालिक)

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12 जून 2015, शुक्रवार
सुबह आराम से सोकर उठे। कल जोजी-ला ने थका दिया था। बिजली नहीं थी, इसलिये गर्म पानी नहीं मिला और ठण्डा पानी बेहद ठण्डा था, इसलिये नहाने से बच गये।
आज इस यात्रा का दूसरा ‘ऑफरोड’ करना था। पहला ऑफरोड बटोट में किया था जब मुख्य रास्ते को छोडकर किश्तवाड की तरफ मुड गये थे। द्रास से एक रास्ता सीधे सांकू जाता है। कारगिल से जब पदुम की तरफ चलते हैं तो रास्ते में सांकू आता है। लेकिन एक रास्ता द्रास से भी है। इस रास्ते में अम्बा-ला दर्रा पडता है। योजना थी कि अम्बा-ला पार करके सांकू और फिर कारगिल जायेंगे, उसके बाद जैसा होगा देखा जायेगा।
लेकिन बाइक में पेट्रोल कम था। द्रास में कोई पेट्रोल पम्प नहीं है। अब पेट्रोल पम्प कारगिल में ही मिलेगा यानी साठ किलोमीटर दूर। ये साठ किलोमीटर ढलान है, इसलिये आसानी से बाइक कारगिल पहुंच जायेगी। अगर बाइक में पेट्रोल होता तो हम सांकू ही जाते। यहां से अम्बा-ला की ओर जाती सडक दिख रही थी। ऊपर काफी बर्फ भी थी। पूछताछ की तो पता चला कि अम्बा-ला अभी खुला नहीं है, बर्फ के कारण बन्द है। कम पेट्रोल का जितना दुख हुआ था, सब खत्म हो गया। अब मुख्य रास्ते से ही कारगिल जायेंगे।

Monday, July 20, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 6 (श्रीनगर-सोनमर्ग-जोजीला-द्रास)

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11 जून 2015
सुबह साढे सात बजे उठे। मेरा मोबाइल तो बन्द ही था और कोठारी साहब का पोस्ट-पेड नम्बर हमारे पास नहीं था। पता नहीं वे कहां होंगे? मैं होटल के रिसेप्शन पर गया। उसे अपनी सारी बात बताई। उससे मोबाइल मांगा ताकि अपना सिम उसमें डाल लूं। मुझे उम्मीद थी की कोठारी साहब लगातार फोन कर रहे होंगे। पन्द्रह मिनट भी सिम चालू रहेगा तो फोन आने की बहुत प्रबल सम्भावना थी। लेकिन उसने मना कर दिया। मैंने फिर उसका फोन ही मांगा ताकि नेट चला सकूं और कोठारी साहब को सन्देश भेज सकूं। काफी ना-नुकुर के बाद उसने दो मिनट के लिये अपना मोबाइल मुझे दे दिया।
बस, यही एक गडबड हो गई। होटल वाले का व्यवहार उतना अच्छा नहीं था और मुझे उससे प्रार्थना करनी पड रही थी। यह मेरे स्वभाव के विपरीत था। अब जब उसने अपना मोबाइल मुझे दे दिया तो मैं चाहता था कि जल्द से जल्द अपना काम करके उसे मोबाइल लौटा दूं। इसी जल्दबाजी में मैंने फेसबुक खोला और कोठारी साहब को सन्देश भेजा- ‘सर, नौ साढे नौ बजे डलगेट पर मिलो। आज द्रास रुकेंगे।’ जैसे ही मैसेज गया, मैंने लॉग आउट करके मोबाइल वापस कर दिया। इसी जल्दबाजी में मैं यह देखना भूल गया कि कोठारी साहब मुझे एक मैसेज पहले ही भेज चुके थे- ‘नीरज, कहां हो तुम? तुम्हारा मोबाइल नहीं लग रहा है। मैं घण्टाघर के पास सनातन यात्री निवास में कमरा नम्बर 307 में रुका हुआ हूं।’ अपना सन्देश भेजने के चक्कर में उनका यह सन्देश मैं नहीं देख सका। अन्यथा सीधा सनातन यात्री निवास में ही चला जाता।

Wednesday, July 15, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा-5 (पारना-सिंथन टॉप-श्रीनगर)

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10 जून 2015
सात बजे सोकर उठे। हम चाहते तो बडी आसानी से गर्म पानी उपलब्ध हो जाता लेकिन हमने नहीं चाहा। नहाने से बच गये। ताजा पानी बेहद ठण्डा था।
जहां हमने टैंट लगाया था, वहां बल्ब नहीं जल रहा था। रात पुजारीजी ने बहुत कोशिश कर ली लेकिन सफल नहीं हुए। अब हमने उसे देखा। पाया कि तार बहुत पुराना हो चुका था और एक जगह हमें लगा कि वहां से टूट गया है। वहां एक जोड था और उसे पन्नी से बांधा हुआ था। उसे ठीक करने की जिम्मेदारी मैंने ली। वहीं रखे एक ड्रम पर चढकर तार ठीक किया लेकिन फिर भी बल्ब नहीं जला। बल्ब खराब है- यह सोचकर उसे भी बदला, फिर भी नहीं जला। और गौर की तो पाया कि बल्ब का होल्डर अन्दर से टूटा है। उसे उसी समय बदलना उपयुक्त नहीं लगा और बिजली मरम्मत का काम जैसा था, वैसा ही छोड दिया।

Wednesday, July 8, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा-4 (बटोट-डोडा-किश्तवाड-पारना)

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9 जून 2015
हम बटोट में थे। बटोट से एक रास्ता तो सीधे रामबन, बनिहाल होते हुए श्रीनगर जाता ही है, एक दूसरा रास्ता डोडा, किश्तवाड भी जाता है। किश्तवाड से सिंथन टॉप होते हुए एक सडक श्रीनगर भी गई है। बटोट से मुख्य रास्ते से श्रीनगर डल गेट लगभग 170 किलोमीटर है जबकि किश्तवाड होते हुए यह दूरी 315 किलोमीटर है।
जम्मू क्षेत्र से कश्मीर जाने के लिये तीन रास्ते हैं- पहला तो यही मुख्य रास्ता जम्मू-श्रीनगर हाईवे, दूसरा है मुगल रोड और तीसरा है किश्तवाड-अनन्तनाग मार्ग। शुरू से ही मेरी इच्छा मुख्य राजमार्ग से जाने की नहीं थी। पहले योजना मुगल रोड से जाने की थी लेकिन कल हुए बुद्धि परिवर्तन से मुगल रोड का विकल्प समाप्त हो गया। कल हम बटोट आकर रुक गये। सोचने-विचारने के लिये पूरी रात थी। मुख्य राजमार्ग से जाने का फायदा यह था कि हम आज ही श्रीनगर पहुंच सकते हैं और उससे आगे सोनामार्ग तक भी जा सकते हैं। किश्तवाड वाले रास्ते से आज ही श्रीनगर नहीं पहुंचा जा सकता। अर्णव ने सुझाव दिया था कि बटोट से सुबह चार-पांच बजे निकल पडो ताकि ट्रैफिक बढने से पहले जवाहर सुरंग पार कर सको। अर्णव को भी हमने किश्तवाड के बारे में नहीं बताया था।

Monday, July 6, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 3 (जम्मू से बटोट)

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8 जून 2015
आज का दिन बहुत खराब बीता और बहुत अच्छा भी। पहले अच्छाई। कोठारी साहब की बाइक स्टार्ट होने में परेशानी कर रही थी और कुछ इंडीकेटर भी ठीक काम नहीं कर रहे थे। मुझे लगा बैटरी में समस्या है। इसे ठीक कराना जरूरी था क्योंकि आगे ऊंचाईयों पर ठण्ड में यह काम करना बन्द भी कर सकती है।
चलिये, आगे की कहानी शुरू से शुरू करते हैं।
छह बजे मेरी आंख खुल गई थी हालांकि अलार्म 7 बजे का लगाया था। अभी तक निशा भी सो रही थी और कोठारी साहब भी। यह बडी अच्छी बात है कि कोठारी जी भी पक्के सोतडू हैं। उनके ऐसा होने से इतना तो पक्का हो गया कि इस यात्रा में मुझे कभी कोई नहीं उठायेगा। निशा भी इसी श्रेणी की जीव है। अगर उसे न उठाया जाये तो वह दस बजे तक भी नहीं उठने वाली।

Thursday, July 2, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 2 (दिल्ली से जम्मू)

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यात्रा आरम्भ करने से पहले एक और बात कर लेते हैं। परभणी, महाराष्ट्र के रहने वाले निरंजन साहब पिछले दो सालों से साइकिल से लद्दाख जाने की तैयारियां कर रहे थे। लगातार मेरे सम्पर्क में रहते थे। उन्होंने खूब शारीरिक तैयारियां की। पश्चिमी घाट की पहाडियों पर फुर्र से कई-कई किलोमीटर साइकिल चढा देते थे। पिछले साल तो वे नहीं जा सके लेकिन इस बार निकल पडे। ट्रेन, बस और सूमो में यात्रा करते-करते श्रीनगर पहुंचे और अगले ही दिन कारगिल पहुंच गये। कहा कि कारगिल से साइकिल यात्रा शुरू करेंगे।

खैर, निरंजन साहब आराम से तीन दिनों में लेह पहुंच गये। यह जून का पहला सप्ताह था। रोहतांग तभी खुला ही था, तंगलंग-ला और बाकी दर्रे तो खुले ही रहते हैं। बारालाचा-ला बन्द था। लिहाजा लेह-मनाली सडक भी बन्द थी। पन्द्रह जून के आसपास खुलने की सम्भावना थी। उनका मुम्बई वापसी का आरक्षण अम्बाला छावनी से 19 जून की शाम को था। इसका अर्थ था कि उनके पास 18 जून की शाम तक मनाली पहुंचने का समय था। मैंने मनाली से लेह साइकिल यात्रा चौदह दिनों में पूरी की थी। मुझे पहाडों पर साइकिल चलाने का अभ्यास नहीं था। फिर मनाली लगभग 2000 मीटर पर है, लेह लगभग 3500 मीटर पर है। मैं 2000 से 3500 मीटर पर गया था, जबकि निरंजन साहब को 3500 मीटर से 2000 मीटर पर आना था, उन्हें पहाडों पर साइकिल चलाने का अनुभव भी था। इसलिये उन्हें यह यात्रा करने में एक सप्ताह ही लगता या फिर ज्यादा से ज्यादा दस दिन। उनके पास अभी भी पन्द्रह दिन थे यानी कम से कम पांच दिन ज्यादा।

Monday, June 29, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 1 (तैयारी)

बुलेट निःसन्देह शानदार बाइक है। जहां दूसरी बाइक के पूरे जोर हो जाते हैं, वहां बुलेट भड-भड-भड-भड करती हुई निकल जाती है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि लद्दाख जाने के लिये या लम्बी दूरी की यात्राओं के लिये बुलेट ही उत्तम है। बुलेट न हो तो हम यात्राएं ही नहीं करेंगे।
बाइक अच्छी हालत में होनी चाहिये। बुलेट की भी अच्छी हालत नहीं होगी तो वह आपको ऐसी जगह ले जाकर धोखा देगी, जहां आपके पास सिर पकडकर बैठने के अलावा कोई और चारा नहीं रहेगा। अच्छी हालत वाली कोई भी बाइक आपको रोहतांग भी पार करायेगी, जोजी-ला भी पार करायेगी और खारदुंग-ला, चांग-ला भी।
वास्तव में यह मशीन ही है जिसके भरोसे आप लद्दाख जाते हो। तो कम से कम अपनी मशीन की, इसके पुर्जों की थोडी सी जानकारी तो होनी ही चाहिये। सबसे पहले बात करते हैं टायर की। टायर बाइक का वो हिस्सा है जिस पर सबसे ज्यादा दबाव पडता है और जो सबसे ज्यादा नाजुक भी होता है। इसका कोई विकल्प भी नहीं है और आपको इसे हर हाल में पूरी तरह फिट रखना पडेगा।

Friday, June 12, 2015

करसोग-दारनघाटी यात्रा का कुल खर्च

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दिनांक: 4 मई 2015, सोमवार
स्थानदूरीसमयखर्च
शास्त्री पार्क, दिल्ली006:05पेट्रोल- 700 (11 लीटर)
पानीपत पार10407:45-08:15परांठे- 140
पीपली16909:20-09:25साइकिल यात्रियों को- 50
अम्बाला छावनी21110:10-10:15
शम्भू बॉर्डर22510:30-10:35
खरड26611:20-11:40मौसमी जूस- 60

Wednesday, June 10, 2015

कुफरी-चायल-कालका-दिल्ली

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9 मई 2015
डेढ बजे हम कुफरी पहुंचे। हे भगवान! इतनी भीड... इतनी भीड कि निशा ने कहा- सभी लोग कुफरी ही आ गये, शिमला पास ही है, कोई शिमला क्यों नहीं जा रहा? और बदबू मची पडी पूरे कुफरी की सडकों पर गधों और घोडों की लीद की। गधे वालों में मारामारी हो रही कि कौन किसे अपने यहां बैठाये और अच्छे पढे लिखे भी सोच-विचार कर रहे कि इस गधे पर बैठे कि उस गधे पर। यह चार रुपये ले रहा है और वो तीन रुपये। जरूर इस चार रुपये वाले गधे में कुछ खास बात है, तभी तो महंगा है। (नोट: गधे को खच्चर या घोडा पढें।)
थोडी देर रुकने का इरादा था, कुफरी देखने का इरादा था लेकिन मुझसे पहले ही पीछे बैठी ‘प्रधानमन्त्री’ ने जब कहा कि कुफरी देखने की चीज नहीं है, आगे चलता चल तो मैं भी आगे चलता गया। अच्छा हुआ कि कुफरी से चायल वाली सडक पर आखिर में कुछ दुकानें थीं और उनमें से एक में हमारी बहुप्रतीक्षित कढी चावल भी थे तो हम रुक गये। बाइक किनारे खडी की नहीं कि तीस रुपये की पर्ची कट गई पार्किंग की। मुझसे ज्यादा निशा हैरान कि यह क्यों हुआ? मैंने कहा- यह टूरिस्ट-फ्रेण्डली स्थान है। ऐसी जगहों पर ऐसा ही होता है।

Monday, June 8, 2015

हाटू चोटी, नारकण्डा

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9 मई 2015
सुबह सात बजे सोकर उठे। नहा-धोकर जल्दी ही चलने को तैयार हो गये। जसवाल जी आ गये और साथ बैठकर चाय पी व आलू के परांठे खाये। परांठे बडे स्वादिष्ट थे। आलू के परांठे तो वैसे भी स्वादिष्ट ही होते हैं। यहां से जसवाल जी ने ऊपर मेन रोड तक पहुंचने का शॉर्ट कट बता दिया। यह शॉर्ट कट बडी ही तेज चढाई वाला है। नौ बजे हम नारकण्डा थे।
देखा जाये तो अब हम दिल्ली के लिये वापसी कर चुके थे। लेकिन चूंकि आज हमें एक रिश्तेदारी में कालका रुकना था, इसलिये कोई जल्दी नहीं थी। नारकण्डा से हाटू पीक की ओर मुड लिये। यहां से इसकी दूरी आठ किलोमीटर है। दो किलोमीटर चलने पर इस नारकण्डा-थानाधार रोड से हाटू रोड अलग होती है।

Friday, June 5, 2015

दारनघाटी और सरायकोटी मन्दिर

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8 मई 2015
दारनघाटी की कुछ जानकारी तो पिछली बार दे दी थी। बाकी इस बार देखते हैं। दारनघाटी 2900 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और यहां से दो किलोमीटर दूर सरायकोटी माता का मन्दिर है जो समुद्र तल से 3090 मीटर ऊपर है। 3000 मीटर की ऊंचाई पर पहुंचने का अलग ही आकर्षण होता है। 2999 मीटर में उतना आकर्षण नहीं है जितना इससे एक मीटर और ऊपर जाने में।
दारनघाटी का जो मुख्य रास्ता है यानी तकलेच-मशनू को जोडने वाला जो रास्ता है, उसमें से सरायकोटी मन्दिर जाने के लिये एक रास्ता और निकलता है। यह सरकारी रेस्ट हाउस से एक किलोमीटर तकलेच की तरफ चलने पर आता है। यह पूरी तरह कच्चा है, खूब धूल है और तीव्र चढाई। इसी तरह की चढाई पर एक जगह जहां खूब रेत थी, बाइक धंस गई। आगे एक मोड था और रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था; हमने सोचा कि आगे अब पैदल जाना पडेगा। बाइक वहीं रेत में खडी की, सामान इसी पर बंधा रहने दिया और पैदल बढ चले।

Wednesday, June 3, 2015

सराहन से दारनघाटी

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8 मई 2015
आराम से सोकर उठे। आज जाना है हमें दारनघाटी। दारनघाटी हमारे इधर आने की एक बडी वजह थी। रास्ता बहुत खराब मिलने वाला है। सराहन में इसके बारे में पूछताछ की तो सुझाव मिला कि मशनू से आप दारनघाटी चढ जाना। फिर दारनघाटी से आगे तकलेच मत जाना, बल्कि वापस मशनू ही आ जाना और वहां से रामपुर उतर जाना। क्योंकि एक तो मशनू से दारनघाटी का पूरा रास्ता बहुत खराब है और उसके बाद तकलेच तक चालीस किलोमीटर का रास्ता भी ठीक नहीं है। यह हमें बताया गया।
भीमाकाली के दर्शन करके और श्रीखण्ड महादेव पर एक दृष्टि डालकर सवा दस बजे हम सराहन से प्रस्थान कर गये। चार किलोमीटर तक तो ज्यूरी की तरफ ही चलना पडता है फिर घराट से मशनू की तरफ मुड जाना होता है। मशनू यहां से बीस किलोमीटर है। दस किलोमीटर दूर किन्नू तक तो रास्ता बहुत अच्छा है, फिर बहुत खराब है। रास्ता सेब-पट्टी से होकर है तो जाहिर है कि मौसम बहुत अच्छा था। सेब-पट्टी 2000 मीटर से ऊपर होती है। चारों तरफ सेब के बागान थे। अभी कहीं फूल लगे थे, कहीं नन्हें-नन्हें सेब आ गये थे। कहीं सेब के पेडों के ऊपर जाल लगा रखा था ताकि आंधी तूफान से ज्यादा नुकसान न हो। दो महीने बाद ये पकने शुरू हो जायेंगे, तब इन बागानों की रौनक भी कुछ और हो जायेगी।

Monday, June 1, 2015

डायरी के पन्ने-32

ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं।
इस बार डायरी के पन्ने नहीं छपने वाले थे लेकिन महीने के अन्त में एक ऐसा घटनाक्रम घटा कि कुछ स्पष्टीकरण देने के लिये मुझे ये लिखने पड रहे हैं। पिछले साल जून में मैंने एक पोस्ट लिखी थी और फिर तीन महीने तक लिखना बन्द कर दिया। फिर अक्टूबर में लिखना शुरू किया। तब से लेकर मार्च तक पूरे छह महीने प्रति सप्ताह तीन पोस्ट के औसत से लिखता रहा। मेरी पोस्टें अमूमन लम्बी होती हैं, काफी ज्यादा पढने का मैटीरियल होता है और चित्र भी काफी होते हैं। एक पोस्ट को तैयार करने में औसतन चार घण्टे लगते हैं। सप्ताह में तीन पोस्ट... लगातार छह महीने तक। ढेर सारा ट्रैफिक, ढेर सारी वाहवाहियां। इस दौरान विवाह भी हुआ, वो भी दो बार।
आप पढते हैं, आपको आनन्द आता है। लेकिन एक लेखक ही जानता है कि लम्बे समय तक नियमित ऐसा करने से क्या होता है। थकान होने लगती है। वाहवाहियां अच्छी नहीं लगतीं। रुक जाने को मन करता है, विश्राम करने को मन करता है। इस बारे में मैंने अपने फेसबुक पेज पर लिखा भी था कि विश्राम करने की इच्छा हो रही है। लगभग सभी मित्रों ने इस बात का समर्थन किया था।

Friday, May 29, 2015

करसोग से किन्नौर सीमा तक

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6 मई 2015
आज हमें वहां नहीं जाना था जहां शीर्षक कह रहा है। हमारी योजना थी शिकारी देवी जाने की। यहां से शिकारी देवी जाना थोडा सा ‘ट्रिकी’ है। कुछ समय पहले तक जो सडक का रास्ता था वो डेढ सौ किलोमीटर लम्बा था- रोहाण्डा, चैल चौक, जंजैहली होते हुए। जंजैहली से शिकारी देवी 16 किलोमीटर है। इसमें 10 किलोमीटर चलने पर एक तिराहा आता है जहां से शिकारी देवी तो 6 किलोमीटर रह जाता है और तीसरी सडक जाती है करसोग जो इस तिराहे से 16 किलोमीटर है।
असल में करसोग और जंजैहली के बीच में एक धार पडती है। यह धार सुन्दरनगर के पास से ही शुरू हो जाती है। कमरुनाग इसी धार के ऊपर है। यह धार आगे और बढती जाती है। आगे शिकारी देवी है। इसके बाद भी धार आगे जाती है और जलोडी जोत होते हुए आगे कहीं श्रीखण्ड महादेव के महाहिमालयी पर्वतों में विलीन हो जाती है। इस तरह अगर हम शिकारी देवी पर खडे होकर दक्षिण की तरफ देखें तो करसोग दिखेगा और अगर उत्तर में देखें तो जंजैहली दिखेगा। लेकिन अभी तक सडक सुन्दरनगर के पास से इसका पूरा चक्कर लगाकर आती थी।
पिछले कुछ महीनों में इस धार के आरपार सडक बनी है। पहले जहां करसोग से शिकारी देवी डेढ सौ किलोमीटर दूर थी, अब मात्र 22 किलोमीटर रह गई है। हमने इन्हीं 22 किलोमीटर पर चलने की सोची। सनारली में स्थानीयों से पूछ लिया तो पता चला कि सडक बहुत खराब है लेकिन बाइक जा सकती है।

Wednesday, May 27, 2015

करसोग में ममलेश्वर और कामाक्षा मन्दिर

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5 मई 2015
प्राकृतिक दृश्य मेरी यात्राओं के आधार होते हैं। मन्दिर वगैरह तो बहाने हैं। आप कभी अगर करसोग जाओ तो शाम होने की प्रतीक्षा करना और पता है कहां प्रतीक्षा करना? कामाक्षा वाले रास्ते पर।
करसोग समुद्र तल से लगभग 1300-1400 मीटर की ऊंचाई पर एक लम्बी चौडी घाटी है। चारों ओर ऊंचे पहाड हैं, बीच में समतल मैदान। गांव हैं और खेत हैं; खेतों के बीच में बहती नदी। आप चाहें तो इन खेतों में पैदल भी घूम सकते हैं। करसोग से कामाक्षा का 6-7 किलोमीटर का रास्ता खेतों से होकर भी नापा जा सकता है। हम सडक से गये थे।

इससे पहले शाम चार बजे हम करसोग पहुंचे। बस अड्डे से आगे निकल गये और ममलेश्वर मन्दिर से कुछ पहले एक होटल में कमरा ले लिया। 500 रुपये का कमरा था लेकिन गीजर देखकर घरवाला और घरवाली दोनों खुश हो गये। नहाकर जब बाहर निकले तो हम कुछ और ही थे।

Monday, May 25, 2015

सुन्दरनगर से करसोग और पांगणा गांव

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5 मई 2015
कल मैं, निशा, तरुण और उनकी घरवाली चारों बैठे बातें कर रहे थे। तरुण भाई ने भी प्रेमविवाह किया है। मेरे प्रेमविवाह की जब उन्हें जानकारी मिली तो बडे खुश हुए थे। हालांकि वे अपने यात्रा-वृत्तान्तों में भाभीजी का जिक्र नहीं करते लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि भाभीजी को ट्रैकिंग और भूगोल की जानकारी नहीं है। अचानक उन्होंने एक ऐसा प्रश्न भाई से पूछ लिया जिससे मैं अब तक हैरान हूं।
उन्होंने पूछा- “कांगडा से सीधे लाहौल का भी कोई दर्रा है क्या?”

Wednesday, May 20, 2015

दिल्ली से सुन्दरनगर वाया ऊना

योजना थी कि 3 मई की सुबह निकल पडेंगे और दोपहर तक अम्बाला से आगे बनूड में अपनी एक रिश्तेदारी में रात रुकेंगे और अगले दिन सुन्दरनगर जायेंगे। लेकिन एक गडबड हो गई। नाइट ड्यूटी की थी, सुबह नींद आने लगी इसलिये नहीं निकल सके। मैं अक्सर नाइट ड्यूटी करके निकल पडता हूं लेकिन हमेशा थोडे ही ऐसा होता है। नींद तो आती ही है; कभी जल्दी, कभी देर से। इस बार जल्दी आ गई। फिर सोचा कि दोपहर तक सोकर फिर निकलेंगे और रात तक बनूड पहुंच जायेंगे।
दोपहर को केशव का फोन आ गया। हम साथ में ही काम करते हैं। उसकी लडकी को देखने वाले आ रहे हैं। मिलने-जुलने का कार्यक्रम लडके वालों ने कहीं बाहर रखने को कहा था तो केशव को मैं याद आ गया। कई दिन पहले इस बारे में बात हो गई थी। अब जब फोन आया तो मैंने सोचा कि दो परिवार आयेंगे, तो कुछ खाने-पीने का भी कार्यक्रम बनेगा। इस मौके को क्यों छोडा जाये? दोपहर को भी निकलना नहीं हुआ।

Wednesday, May 6, 2015

पुस्तक-चर्चा

कुछ पुस्तकें पढीं- इनमें पहली है- ‘वह भी कोई देस है महराज’। अनिल यादव की लिखी इस किताब को अन्तिका प्रकाशन, गाजियाबाद ने प्रकाशित किया है। पेपरबैक का मूल्य 150 रुपये है। आईएसबीएन नम्बर 978-93-81923-53-5 है।
‘वह भी कोई देस है महराज’ वास्तव मे शानदार यात्रा-वृत्तान्त है। लेखक ने पूर्वोत्तर के राज्यों की यात्राएं की थीं। पुस्तक की शुरूआत ही कुछ इस तरह होती है- ‘पुरानी दिल्ली के भयानक गन्दगी, बदबू और भीड से भरे प्लेटफार्म नम्बर नौ पर खडी मटमैली ब्रह्मपुत्र मेल को देखकर एकबारगी लगा कि यह ट्रेन एक जमाने से इसी तरह खडी है।’ बस, यात्रा असम पहुंचती है, फिर मेघालय, नागालैण्ड, अरुणाचल, मणिपुर और त्रिपुरा। मिजोरम छूट जाता है।
यात्रा आज से लगभग 15 साल पहले की गई थी। जाहिर है कि उस समय वहां का महौल आज के मुकाबले खराब ही रहा होगा। लेकिन यादव साहब ने पूरी किताब इस शैली में लिखी है कि कोई आज भी अगर वहां जाना चाहे तो किताब पढकर कतई नहीं जायेगा। साहब पेशे से पत्रकार हैं। पता नहीं पत्रकारों को किस चीज की ट्रेनिंग दी जाती है कि ये लोग दुनिया को नकारात्मक नजरिये से देखने लगते हैं। यही इस किताब में भी हुआ है। आतंकवाद पूरी किताब पर हावी है। इसके अलावा दूसरी गन्दगियां मारधाड, वेश्यावृत्ति आदि का वर्णन भी खूब है।

Monday, May 4, 2015

डायरी के पन्ने- 31

नोट: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं।
# फरवरी के मध्य में विवाह हुआ और मार्च के पहले सप्ताह में निशा के मम्मी-पापा शास्त्री पार्क आ गये। फिर होली पर मैं और निशा उनके घर गये। इसके बाद उसके पापा एक बार और आये और तय हुआ कि सामाजिक रीति-रिवाजों से पुनः विवाह किया जाये। हम तो कभी से इसके लिये राजी थे। चूंकि इस बार मामला विवाह का उतना नहीं था, औपचारिकता निभाने का ज्यादा था और औपचारिकताओं से मुझे परेशानी होती है लेकिन दोनों परिवारों के मेल-मिलाप के लिये यह करना भी पडेगा। इसलिये मैंने कुछ शर्तें रख दीं; मसलन विवाह दिल्ली में ही होगा, सोमवार या मंगल को होगा ताकि मुझे छुट्टी न लेनी पडे। और चलते-चलते ससुर जी के कान में फुसफुसा दिया- कुछ भी देना-दुवाना नहीं होगा। हमारे पास सबकुछ है, आप न कोई सामान दोगे और न ही नकद दोगे। वे मुस्कुरा दिये और बोले- औपचारिकता तो निभानी ही पडेगी। हां, औपचारिकता ठीक है लेकिन इससे ज्यादा नहीं।

Wednesday, April 22, 2015

उत्तरकाशी से दिल्ली वाया मसूरी

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3 अप्रैल 2015
हम उत्तरकाशी से तीन किलोमीटर आगे गंगोत्री की तरफ थे। सुबह आठ बजे सोकर उठे। गीजर था ही, नहा लिये। आज दिल्ली पहुंचना है, जो यहां से 400 किलोमीटर से भी ज्यादा है। सामान पैक कर लिया। जब कमरे से निकलने ही वाले थे तो मन में आया कि एक बार बालकनी में खडे होकर बाहर का नजारा देखते हैं। बालकनी का दरवाजा खोला तो होश उड गये। बारिश हो रही थी। हवा नहीं चल रही थी और बिल्कुल सीधी बारिश हो रही थी। अगर पहाडों पर सुबह सवेरे बारिश होती मिले तो समझना कि हाल-फिलहाल रुकने वाली नहीं है। और उधर हम भी नहीं रुक सकते थे। रेनकोट पहने और नौ बजे तक बारिश में ही चल दिये।
मैंने पहले भी बताया था कि जब हम धरासू बैंड से उत्तरकाशी आये थे तो वो रास्ता कहीं कहीं बडा खराब था। अब बारिश की वजह से उस पर फिसलन हो गई थी या फिर गड्ढों में पानी भर गया था। बडी मुश्किल हुई इस पर चलने में। फिर भी डेढ घण्टे में धरासू बैंड पहुंच गये। यहां के आलू के परांठे हमें बहुत पसन्द आये थे। इस बार दोनों ने दो-दो परांठे मारे।

Monday, April 20, 2015

डोडीताल यात्रा- मांझी से उत्तरकाशी

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पूरी रात मुझे नींद नहीं आई। इसके कई कारण थे। पहला तो कारण था वो सस्ते वाला स्लीपिंग बैग जो मैं कुछ दिन पहले पठानकोट से लाया था। पठानकोट जब हम गये थे, तो स्टेशन के बाहर बाजार में गर्म कपडों की बहुत सारी दुकानें हैं। उनमें स्लीपिंग बैग बाहर ही रखे थे। मैंने देखना शुरू किया तो एक स्लीपिंग बैग पसन्द आ गया। इसका साइज बहुत छोटा था, बहुत हल्का था और 1200 रुपये का था। इसमें पंख भरे थे। ले लिया। इसका परीक्षण करने को इसे मैंने ही इस्तेमाल किया। लेकिन यह मेरी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। गौरतलब है कि मुझे सर्दी कम लगती है। फिर भी मैं ठण्ड से कांपता रहा। पैर बर्फ से हुए रहे। दूसरा कारण था कि मेरे नीचे मैट्रेस नहीं थी। हमारे पास एक ही मैट्रेस थी और वो निशा को दे रखी थी। मुझे नीचे से भी बहुत ठण्ड लगी। पहले तो लगा था कि शरीर की गर्मी से जमीन का वो टुकडा भी गर्म हो जायेगा और ठण्ड नहीं लगेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कुल मिलाकर नींद नहीं आई।

Friday, April 17, 2015

डोडीताल यात्रा- अगोडा से मांझी

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1 अप्रैल 2015
अगोडा की समुद्र तल से ऊंचाई 2100 मीटर है जबकि डोडीताल 3200 मीटर पर। दूरी लगभग 12 किलोमीटर है। आजकल डोडीताल तक आवाजाही तो है लेकिन उतनी नहीं है। अगोडा में होटल वाले ने पहले ही बता दिया था कि मांझी के बाद बहुत ज्यादा बर्फ है, रास्ता मुश्किल है। फिर खाने का भी भरोसा नहीं था। इसलिये यहीं से आलू के चार परांठे भी पैक करा लिये। पेटभर खा तो लिये ही थे।
पौने नौ बजे यहां से चल पडे। गांव से निकलते ही एक पगडण्डी दाहिने नीचे की तरफ उतर जाती है। यह आगे नदी पार करके उस तरफ ऊपर चढती है। उधर गुज्जरों के कुछ ठिकाने दिख रहे थे, यह उन्हीं ठिकानों पर जाती होगी। अगर उधर ऊपर चढते जायें तो आखिरकार दयारा बुग्याल पर पहुंच जायेंगे। दयारा पर आजकल खूब बर्फ थी।

Wednesday, April 15, 2015

डोडीताल यात्रा- उत्तरकाशी से अगोडा

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31 मार्च 2015
दोपहर बाद दो बजे हम उत्तरकाशी से पांच किलोमीटर आगे गंगोरी में थे। यहां असी गंगा पर पुल बना हुआ है। यहीं से डोडीताल का रास्ता अलग हो जाता है। दस किलोमीटर आगे संगमचट्टी तक तो सडक बनी है, उसके बाद 23 किलोमीटर पैदल चलना पडता है, तब हम डोडीताल पहुंच सकते हैं।
गंगोरी में एक जीप वाले से संगमचट्टी के रास्ते की बाबत पूछा तो उसने बताया कि यह रास्ता बहुत खराब है। बाइक जानी भी मुश्किल है, आप बाइक यहीं खडी कर दो और संगमचट्टी के लिये टैक्सी कर लो। हम अभी थोडी ही देर पहले धरासू बैंड से उत्तरकाशी आये थे। वहां भी कई जगह बडी खराब सडक थी। हम दोनों ने एक दूसरे को देखा और कहा- उससे भी ज्यादा खराब सडक मिलेगी क्या? और बाइक पर ही चल पडे।

Monday, April 13, 2015

डोडीताल यात्रा- दिल्ली से उत्तरकाशी

डोडीताल का तो आपने नाम सुना ही होगा। नहीं सुना होगा तो कोई बात नहीं। आप स्वयं ही गूगल पर सर्च करेंगे कि डोडीताल क्या है। इस बार मैं नहीं बताऊंगा कि यह क्या है, कहां है, कैसे जाया जाता है। बस, चलता जाऊंगा और लौट आऊंगा। आपको अन्दाजा हो जायेगा।
दिल्ली से दोनों मियां-बीवी निकल पडे सुबह छह बजे। बाइक पर सामान बांधा और चल दिये। सामान भी बहुत ज्यादा हो गया। आखिर ट्रेकिंग थी और अभी ट्रेकिंग का मौसम शुरू नहीं हुआ था इसलिये टैंट भी ले लिया, स्लीपिंग बैग भी ले लिया, ढेर सारे गर्म कपडे ले लिये और कुछ नमकीन बिस्कुट भी। दो रकसैक थे- एक मेरे लिये, एक निशा के लिये।

Friday, April 3, 2015

अमृतसर- स्वर्ण मन्दिर और जलियाँवाला बाग

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मैं पहले अमृतसर तो आ चुका था लेकिन घूमा पहली बार। स्टेशन से ऑटो लिया और सीधे पहुंचे स्वर्ण मन्दिर। अब ये किया, वो किया; ऐसा नहीं लिखूंगा। स्वर्ण मन्दिर अच्छा लगा। यहां से बाहर निकलकर सामने ही जलियांवाला बाग है, वहां पहुंचे। यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि जलियांवाला बाग का यह नाम इसलिये पडा क्योंकि यह किसी जिले सिंह या पंजाबी लहजे में कहें तो जल्ले सिंह का बाग था। इसी से इसे जल्लेयां वाला बाग कहते थे जो धीरे धीरे जलियांवाला बाग हो गया। बाद में जब वो नरसंहार हुआ तो देशभक्तों ने स्मारक बनाने के लिये इसे खरीद लिया और इसे स्मारक बना दिया।

Wednesday, April 1, 2015

डलहौजी के नजारे

डलहौजी का क्या यात्रा वृत्तान्त लिखूं? इतना प्रसिद्ध पर्यटक स्थान... मैं यहां पहली बार गया। आप सभी जा चुके होंगे। ऐसे स्थानों पर पहली बात कि मेरा जाने का ही मन नहीं करता और दूसरी बात कि वापस आकर यात्रा वृत्तान्त लिखने का भी मन नहीं करता। लेकिन कुछ तो लिखना पडेगा।
विवाह हुआ, हम दो हो गये। तो क्या हुआ? घुमक्कडी मेरा पहला प्रेम है, शौक है, इसे नहीं छोडा जा सकता। घरवाली को यह सब समझाने की आवश्यकता ही नहीं पडी। उसने पहले ही कह दिया था कि जहां तू, वहां मैं। वह मेरे लेख भी पढती है, इसका अर्थ है कि घूमने की इच्छा उसकी भी होती है। अब मुझे देखना था कि इसकी सीमा कहां तक है? किस तरह की यात्रा में यह बोर होगी। मुझे रेलयात्राएं भी करनी हैं, बस यात्राएं भी करनी हैं, ट्रेकिंग भी करनी है और ऊल-जलूल स्थानों पर भी जाना है। भूखा भी रहना है, कई कई दिन का एक ही दिन में भी खाना है, जगना भी है, खूब सोना भी है। साफ सुथरे कपडे पहनने हैं तो एक ही जोडी कपडों में दस दिन भी निकालने हैं। उसकी सीमा कहां तक है, यही मुझे देखना था। फिर कुछ उसे परिवर्तित होना है, कुछ मुझे।

Monday, March 30, 2015

कच्छ यात्रा का कुल खर्च

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12 जनवरी 2015 की सुबह दिल्ली से निकल पडा था। पहले दिन बाइक में 700 रुपये का पेट्रोल भरवाया। घर से खाकर चला था, दोपहर को नीमराना अशोक भाई के यहां खा लिया और शाम को पहुंच गया विधान के यहां। इस तरह इस दिन कोई खर्च नहीं हुआ। अब चर्चा करते हैं इस यात्रा के कुल खर्च की:

12 जनवरी:
पेट्रोल (दिल्ली) 700 रुपये

Friday, March 27, 2015

कच्छ से दिल्ली वापस

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अब बारी थी दिल्ली लौटने की। दिल्ली अभी भी 1000 किलोमीटर से ज्यादा थी और मेरे पास थे दो दिन। यानी प्रतिदिन 500 किलोमीटर के औसत से चलना पडेगा जोकि बाइक से कतई भी आसान नहीं है। उस पर भी आखिर के ढाई सौ किलोमीटर यानी जयपुर से आगे का रास्ता और ट्रैफिक जान निकाल देने वाला होगा। चलिये, देखते हैं क्या होगा?
रापर से चला मैं सुबह साढे नौ बजे। पहली गलती। बल्कि पहली क्या... हमेशा की तरह आज भी गलती की कि इतनी देर से चला। सात बजे ही निकल जाना चाहिये था, अब तक सौ किलोमीटर दूर जा चुका होता। लेकिन रापर मुझसे भी सुस्त निकला। कोई दुकान खुली नहीं मिली, भूखे पेट ही निकलना पडा।

Monday, March 23, 2015

धोलावीरा- 2

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पिछली बार आपको धोलावीरा के पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व के बारे में बताया था, आज वहां की यात्रा करते हैं। यात्रा वृत्तान्त लिखते हैं। खास बात यह है कि धोलावीरा जाने का रास्ता भी कच्छ के सुन्दरतम रास्तों में से एक है। इसी वजह से कच्छ जाने वाला हर आदमी धोलावीरा की भी योजना बनाता है।
भचाऊ में प्रभु आहिर ने बताया कि आप पहले एकल माता जाओ, वहां से दसेक किलोमीटर रन में चलना पडेगा और आप सीधे धोलावीरा पहुंच जाओगे। असल में धोलावीरा एक टापू पर स्थित है। इस टापू को खडीर बेट कहते हैं। इसके चारों तरफ समुद्र है जो बारिश के मौसम में भर जाता है और सर्दियां आते आते सूखने लगता है जैसा कि पूरे रन में होता है। गर्मियों में यह इतना सूख जाता है कि इस ‘समुद्र’ को आप गाडियों से भी पार कर सकते हैं। प्रभु ने कहा कि तुम एकल माता से सीधे रन में उतर जाना और सीधे चलते जाना। खडीर बेट आयेगा, तो वहां जल्दी ही आपको धोलावीरा वाली सडक मिल जायेगी जिससे आप धोलावीरा जा सकते हो।

Friday, March 20, 2015

धोलावीरा- सिन्धु घाटी सभ्यता का एक नगर

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पहले धोलावीरा का थोडा सा परिचय दे देता हूं, फिर वहां घूमने चलेंगे। इतिहास की किताब में आपने पढा होगा- मैंने भी पढा है- कि कोई सिन्धु घाटी सभ्यता थी। इसका प्रमुख नगर हडप्पा था, इसलिये हडप्पा सभ्यता भी कहते हैं। मुझे याद है कि जब सातवीं-आठवीं में मास्टरजी इतिहास की किताब पढवाया करते थे तो कई सहपाठी हडप्पा शब्द को हडम्पा पढते थे। गौरतलब है कि हमारे यहां किसी महिला को नालायक कहने की बजाय हडम्पा कह देते हैं।
खैर, हडप्पा के साथ एक और स्थान के बारे में हम पढते थे- वो है मोहनजोदडो। ये दोनों स्थान अब पाकिस्तान में हैं इसलिये हमारे लिये उतने सुलभ नहीं हैं। लेकिन कुछ स्थान ऐसे हैं जो उसी काल के हैं, उसी तरह के लोग वहां बसते थे, उसी तरह का आचरण था, वही नगर व्यवस्था थी और आज वे भारत में हैं। इनमें कुछ नाम हैं- धोलावीरा, कालीबंगा, लोथल और रोपड। रोपड तो आज का रूपनगर है जो पंजाब में है। स्थानीय लोग इसे अभी भी रोपड ही कहते हैं- रोप्पड। कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ जिले में है जो पीलीबंगा रेलवे स्टेशन से कुछ ही दूर स्थित है। लोथल और धोलावीरा दोनों गुजरात में हैं। इनके अलावा और भी कई नाम हैं जो कम प्रसिद्ध हैं। इनमें कुछ हरियाणा में हैं, कुछ उत्तर प्रदेश में हैं।

Wednesday, March 18, 2015

माण्डवी बीच पर सूर्यास्त

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शाम साढे पांच बजे हम तीनों माण्डवी पहुंच गये। सुमित और गिरधर पहले ही काफी लेट हो चुके हैं, इसलिये उन्हें इन्दौर के लिये आज ही निकलना पडेगा जबकि मेरा इरादा आज यहीं माण्डवी में रुकने का है। कुछ देर बाद सूर्यास्त हो जायेगा, फिर अन्धेरा हो जायेगा, इसलिये माण्डवी मैं कल देखूंगा- ऐसा सोचा।
सीधे समुद्र तट पर पहुंच गये। शहर में काफी भीड थी, लेकिन समुद्र तट अच्छा लगा। भूख लगी हो, आप कच्छ में हों और दाबेली न खायें, तो बेकार है। लेकिन हमने स्वयं को बेकार नहीं होने दिया। दबा के दाबेली खाईं।

Monday, March 16, 2015

यात्रा में आनन्द कैसे लें?

वैसे तो आपको यात्राएं करने में आनन्द आता है, अच्छा लगता है, मन-मस्तिष्क तरोताजा हो जाता है लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होता है? याद कीजिये जब आप पिछली बार कहीं गये थे, तो क्या सोचकर गये थे और वहां जाकर क्या वो सब मिला? सोचिये एक बार। बडी सिरदर्दी का काम होता है। पहले तो घर पर इतनी योजनाएं बनाओ, इतना सबकुछ सोचो; फिर वहां जाकर भी सारा समय योजनाएं बनाने में चला जाता है। बस, यही काम रह जाता है हमें- योजनाएं बनाते रहो, प्लानिंग करते रहो। नौकरी में भले ही मैनेजर न बन पायें हों, लेकिन यहां हम हमेशा मैनेजर होते हैं।

Friday, March 13, 2015

पिंगलेश्वर महादेव और समुद्र तट

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मुझे पिंगलेश्वर की कोई जानकारी नहीं थी। सुमित और गिरधर के पास एक नक्शा था जिसमें नलिया और कोठारा के बीच में कहीं से पिंगलेश्वर के लिये रास्ता जाता दिख रहा था। मोबाइल में गूगल मैप में दूरी देखी, मुख्य सडक से 16 किलोमीटर निकली। तय कर लिया कि पिंगलेश्वर भी जायेंगे। बाइक का फायदा।
एक बजे नारायण सरोवर से चल पडे और सवा दो बजे तक 70 किलोमीटर दूर नलिया पहुंच गये। सडक की तो जितनी तारीफ की जाये, उतनी ही कम है। नलिया में कुछ समय पहले तक रेलवे स्टेशन हुआ करता था। उस जमाने में भुज से मीटर गेज की लाइन नलिया आती थी। गेज परिवर्तन के बाद भुज-नलिया लाइन को परिवर्तित नहीं किया गया और इसे बन्द कर दिया गया। अब यह लाइन पूरी तरह खण्डहर हो चुकी है और इस पर पडने वाले स्टेशन भी। उस समय तक नलिया भारत का सबसे पश्चिमी स्टेशन हुआ करता था। इसे देखने की मेरी बडी इच्छा थी लेकिन शानदार सडक और इस पर बाइक चलाने के आनन्द के आगे यह इच्छा दब गई। नलिया ‘फिर कभी’ पर चला गया।