Monday, December 29, 2014

2014 की घुमक्कडी का लेखा-जोखा

यात्राओं के लिहाज से यह साल बिल्कुल भी शानदार नहीं रहा। एक के बाद एक बिगडते समीकरण, यात्राओं को बीच में छोडना; मतलब जो नहीं होना चाहिये था, वो सब हुआ। कुछ बडी यात्राएं जरूर हुईं लेकिन एकाध को छोडकर लगभग सभी में कुछ न कुछ गडबड होती रही। कई बार ऐसा लगा... बल्कि अब भी ऐसा लग रहा है कि इस साल जो भी यात्राएं कीं, सभी जबरदस्ती की गई यात्राएं थीं।
चलिये, पहले बात करते हैं उन यात्राओं की जिनका वृत्तान्त प्रकाशित हुआ।
साल के शुरू में ही जब सुना कि कश्मीर में भारी बर्फबारी हो रही है तो यहां की ट्रेन में यात्रा करने का मन हो गया। यहां ब्रॉड गेज है और भारत की एकमात्र ऐसी ब्रॉडगेज की लाइन है जहां बर्फ पडती है। जब शून्य से नीचे के तापमान में कश्मीर गया तो दूर तक फैली बर्फ में ट्रेन को गुजरते देखना बेहद सुखद एहसास था।

Friday, December 26, 2014

पदुम-दारचा ट्रेक- अनमो से चा

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
आपको याद होगा कि हम अनमो पहुंच गये थे। पदुम-दारचा ट्रेक आजकल अनमो से शुरू होता है। वास्तव में यह ट्रेक अब अपनी अन्तिम सांसे गिन रहा है। जल्दी ही यह ‘पदुम-दारचा सडक’ बनने वाला है। पदुम की तरफ से चलें तो अनमो से आगे तक सडक बन गई है और अगर दारचा की तरफ से देखें तो लगभग शिंगो-ला तक सडक बन गई है। मुख्य समस्या अनमो से आठ-दस किलोमीटर आगे तक ही है। फिर शिंगो-ला तक चौडी घाटी है, कच्ची मिट्टी है। सडक और तेजी से बनेगी। एक बार सडक बन गई तो ट्रेक का औचित्य समाप्त। इसी तरह पदुम को निम्मू से भी जोडने का काम चल रहा है। निम्मू वो जगह है जहां जांस्कर नदी सिन्धु नदी में मिलती है। पदुम से काफी आगे तक सडक बन चुकी है और उधर निम्मू से भी बहुत आगे तक सडक बन गई है। बीच में थोडा सा काम बाकी है। सुप्रसिद्ध चादर ट्रेक इसी पदुम-निम्मू के बीच में होता है। निम्मू से चलें तो चिलिंग से आगे तक सडक बन गई है। जहां सडक समाप्त होती है, वहीं से चादर ट्रेक शुरू हो जाता है। जब यह सडक पूरी बन जायेगी तो चादर ट्रेक पर भी असर पडेगा। उधर पदुम और कारगिल पहले से ही जुडे हैं।

Wednesday, December 24, 2014

जांस्कर यात्रा- रांगडुम से अनमो

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
अगले दिन सुबह साढे तीन बजे ही ड्राइवर ने आवाज लगा दी। कसम से इस समय उठने का बिल्कुल भी मन नहीं था। सर्दी में रजाई छोडने का क्षण मेरे लिये बडा दुखदाई होता है। लेकिन उठना तो था ही। चार बजते बजते यहां से निकल चुके थे। अभी भी रात काफी थी। पांच बजे जाकर कहीं उजाला होना शुरू होगा।
आगे चलकर सूरू का पाट अत्यधिक चौडा हो गया और सडक छोडकर ड्राइवर ने गाडी सीधे पत्थरों में घुसा दी। ऊबड-खाबड रास्ता अभी तक था, ऊबड खाबड अभी भी है तो कुछ भी फर्क पता नहीं चला। पत्थरों से कुछ देर में पुनः सडक पर आ गये। कुछ ही आगे एक जगह गाडी रोक दी। यहां एक सन्तरी खडा था। यह असल में रांगडुम गोम्पा था। बडा प्रसिद्ध गोम्पा है यह। इसी के पास एक चेकपोस्ट है। यह पता नहीं सेना की चेकपोस्ट है या बीएसएफ की या किसी और बल की। पुलिस की तो नहीं है। ड्राइवर ने रजिस्टर में एण्ट्री की। हम सन्तरी को देखकर हैरान थे। आंखों में नींद का नामोनिशान तक नहीं था। जबकि यहां न कोई पाकिस्तान की सीमा है, न किसी चीन की। यहां ट्रैफिक भी बिल्कुल नहीं था। आखिरी गाडी कल दिन रहते ही गुजरी होगी। हमारे बाद जो गाडी आयेगी, वो भी उजाला होने के बाद ही आयेगी।

Monday, December 22, 2014

खूबसूरत सूरू घाटी

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
कल ही पता चल गया था कि पदुम तक कोई बस नहीं जाती बल्कि सुबह सुबह सूमो चलती हैं। कारगिल से पदुम की दूरी लगभग ढाई सौ किलोमीटर है और शेयर्ड सूमो में प्रति यात्री डेढ हजार रुपये किराया लगता है। हमारे पास भी अब डेढ हजार देकर सूमो में जाने के अलावा कोई चारा नहीं था लेकिन सुबह सोते रह गये और जितनी गाडियां पदुम जानी थीं, सभी जा चुकी थीं।
विधान और प्रकाश जी सूमो स्टैण्ट की तरफ चले गये और मैं कमरे पर ही रुका रहा। इस दौरान मैं नहा भी लिया। कारगिल में बिल्कुल भी सर्दी नहीं थी, रात हम पंखा चलाकर सोये थे। जब दोनों आये तो बताया कि अब हमें टैक्सी ही करनी पडेगी जो नौ हजार की पडेगी। इसका अर्थ था तीन-तीन हजार प्रति व्यक्ति। विधान ने सबसे पहले विरोध किया। उसे अभी भी यकीन नहीं था कि अब कोई भी शेयर्ड गाडी नहीं मिलेगी। खैर, बाहर निकले। पता चला कि शाम चार बजे के आसपास एक बस परकाचिक तक जायेगी। मैंने तुरन्त नक्शा खोलकर देखा। परकाचिक तो आधी दूरी पर भी नहीं है। उसके बाद? परकाचिक तक पहुंचते पहुंचते रात हो जायेगी। बहुत ही छोटा सा गांव होगा दो-चार घरों का। पता नहीं कोई रुकने का ठिकाना मिलेगा या नहीं। हालांकि हमारे पास रुकने का पूरा इंतजाम था। खाना कारगिल से लेकर चलेंगे। लेकिन परकाचिक से आगे कैसे जायेंगे? कोई ट्रक मिल जायेगा। लेकिन रात को ट्रक का क्या काम? ट्रक अगर कोई जायेगा भी तो दिन में जायेगा। इस रास्ते पर राज्य परिवहन की बसें नहीं चलतीं। इसका अर्थ है कि रास्ता बडे वाहनों के लिये नहीं है। फिर ट्रक भी नहीं मिलेगा। कल सुबह वही सूमो मिलेंगी जो कारगिल से जायेंगी। तो फिर परकाचिक क्यों जायें? सुबह यहां कारगिल से ही उन्हीं सूमो को पकड लें। लेकिन ऐसा करने से हम फिर एक दिन लेट हो रहे थे।

Friday, December 19, 2014

जांस्कर यात्रा- दिल्ली से कारगिल

तैयारी
अगस्त में भारत में मानसून पूरे जोरों पर होता है। हिमालय में तो यह काल बनकर बरसता है। मानसून में घुमक्कडी के लिये सर्वोत्तम स्थान दक्षिणी प्रायद्वीप माना जाता है लेकिन एक जगह ऐसी भी है जहां बेफिक्र होकर मानसून में घूमने जाया जा सकता है। वो जगह है लद्दाख। लद्दाख मूलतः एक मरुस्थल है लेकिन अत्यधिक ऊंचाई पर होने के कारण यहां ठण्ड पडती है। हिमालय के पार का भूभाग होने के कारण यहां बारिश नहीं पडती- न गर्मियों में और न सर्दियों में। मानसून हो या पश्चिमी विक्षोभ; हिमालय सबकुछ रोक लेता है और लद्दाख तक कुछ भी नहीं पहुंचता। जो बहुत थोडी सी नमी पहुंचती भी है वो नगण्य होती है।
जांस्कर भी राजनैतिक रूप से लद्दाख का ही हिस्सा है और कारगिल जिले में स्थित है। जांस्कर का मुख्य स्थान पदुम है। अगर आप जम्मू कश्मीर राज्य का मानचित्र देखेंगे तो पायेंगे कि हिमाचल प्रदेश की सीमा पदुम के काफी नजदीक है। पदुम जाने के लिये केवल एक ही सडक है और वो कारगिल से है। बाकी दिशाओं में आने-जाने के लिये अपने पैरों व खच्चरों का ही सहारा होता है। चूंकि जांस्कर की ज्यादातर आबादी बौद्ध है इसलिये इनका सिन्धु घाटी में स्थित विभिन्न बौद्ध मठों में आना-जाना लगा रहता है। यह सारी आवाजाही पैदल ही होती है। अगर किसी को पदुम से हेमिस जाना हो तो सडक के रास्ते जाने में दो दिन लगेंगे, कारगिल व लेह होते हुए। जबकि स्थानीय निवासी पदुम से हेमिस दो दिनों में पैदल भी तय कर सकते हैं। जाहिर है कि वे पैदल यात्रा को ही वरीयता देंगे। इसलिये जांस्कर में ट्रैकिंग काफी प्रचलित है।

Tuesday, December 16, 2014

डायरी के पन्ने-27

नोट: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं।

1. आज की चर्चा आरम्भ करते हैं गूगल मैप मेकर से। पिछली बार आपको बताया था कि गूगल मैप को कोई भी एडिट कर सकता है- मैं भी और आप भी। कुछ लोग अपने को बडा भयंकर जानकार समझते हैं। जिन्होंने कभी सोचा तक नहीं कि गूगल मैप को एडिट कैसे किया जाता है, वे एडिटर को दस बातें समझा सकते हैं। मुझे भी कुछ लोगों ने इसी तरह की बातें बताईं। मसलन आप गूगल को सुझाव भेजोगे कि यह रास्ता या यह गांव इस स्थान पर स्थित है। गूगल अपनी टीम को उस स्थान पर देखने भेजेगा कि वाकई वो रास्ता या गांव वहां है या नहीं। जब गूगल की टीम उस स्थान का सर्वे कर लेगी, तब आपका सुझाव गूगल मैप में प्रकाशित होना शुरू हो जायेगा। यह केवल अफवाह है। ऐसा कुछ नहीं है।

Sunday, December 14, 2014

ओशो चर्चा

हमारे यहां एक त्यागी जी हैं। वैसे तो बडे बुद्धिमान, ज्ञानी हैं; उम्र भी काफी है लेकिन सब दिखावटी। एक दिन ओशो की चर्चा चल पडी। बाकी कोई बोले इससे पहले ही त्यागी जी बोल पडे- ओशो जैसा मादर... आदमी नहीं हुआ कभी। एक नम्बर का अय्याश आदमी। उसके लिये रोज दुनियाभर से कुंवाई लडकियां मंगाई जाती थीं।
मैंने पूछा- त्यागी जी, आपने कहां पढा ये सब? कभी पढा है ओशो साहित्य या सुने हैं कभी उसके प्रवचन? तुरन्त एक गाली निकली मुंह से- मैं क्यों पढूंगा ऐसे आदमी को? तो फिर आपको कैसे पता कि वो अय्याश था? या बस अपने जैसों से ही सुनी-सुनाई बातें नमक-मिर्च लगाकर बता रहे हो?
चर्चा आगे बढे, इससे पहले बता दूं कि मैं ओशो का अनुयायी नहीं हूं। न मैं उसकी पूजा करता हूं और न ही किसी ओशो आश्रम में जाता हूं। जाने की इच्छा भी नहीं है। लेकिन जब उसे पढता हूं तो लगता है कि उसने जो भी प्रवचन दिये, सब खास मेरे ही लिये दिये हैं।

Friday, December 12, 2014

जगदलपुर से दिल्ली वापस

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
जगदलपुर से रायपुर की बसों की कोई कमी नहीं है। हालांकि छत्तीसगढ में राज्य परिवहन निगम जैसी कोई चीज नहीं है। सभी बसें प्राइवेट ऑपरेटरों की ही चलती हैं। उत्तर भारत में भी चलती हैं प्राइवेट ऑपरेटरों की लम्बी दूरी की बसें लेकिन उनका अनुभव बहुत कडवा होता है। पहली बात उनका चलने का कोई समय नहीं होता, जब बस भरेगी उसके एक घण्टे बाद चलेगी। दूसरा... क्या दूसरा? सभी निगेटिव पॉइण्ट हैं। मैंने कई बार भुगत रखा है उन्हें।
लेकिन यहां ऐसा नहीं है। सभी बसों की समय सारणी निर्धारित है और बसें उसी के अनुसार ही चलती हैं। लम्बी दूरी की बसें स्लीपर हैं जिनमें नीचे एक कतार बैठने की हैं और बाकी ऊपर सोने व लेटने के लिये। किराये में कोई अन्तर नहीं है, जितना सीट का किराया है, उतना ही बर्थ का। बस में चढो, अपनी पसन्दीदा या खाली जगह पर बैठो या लेटो। जब बस चलेगी तो कंडक्टर आयेगा और आपसे किराया ले लेगा। जगदलपुर से रायपुर 300 किलोमीटर है और इस दूरी का किराया था 240 रुपये। मैं तो हैरान था ही कि इतना सस्ता; सुनील जी भी हैरान थे कि पिछली बार जब जगदलपुर आये थे तो 270 रुपये किराया था, अब बढना चाहिये था लेकिन उल्टा घट गया। मार्ग ज्यादातर तो मैदानी है लेकिन कुछ हिस्सा पर्वतीय भी है खासकर केसकल की घाटी। कोई सन्देह नहीं कि सडक शानदार बनी है। हम ऊपर जाकर लेट गये। कई दिन से बारिश होने के कारण एक जगह से पानी चू रहा था। तौलिया लटकाकर उसे सीधे अपने ऊपर टपकने से बचाया।

Wednesday, December 10, 2014

तीरथगढ जलप्रपात

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
बारह बजे के आसपास जगदलपुर से तीरथगढ के लिये चल पडे। इस बार हम चार थे। मेरे और सुनील जी के अलावा उनके भतीजे शनि, ममेरे भाई मनीष दुबे और भानजे प्रशान्त भी साथ हो लिये। लेकिन ये तो कुल पांच हो गये। चलो, पांच ही सही। शनि ने अपनी कार उठा ली। बारिश में भीगने का खतरा टला।
कुछ दूर तक दन्तेवाडा वाली सडक पर चलना होता है, फिर एक रास्ता बायें सुकमा, कोंटा की ओर जाता है। इसी पर चल दिये। मुडते ही वही रेलवे लाइन पार करनी पडी जिससे अभी कुछ देर पहले मैं किरन्दुल से आया था।
थोडा ही आगे चलकर कुख्यात जीरम घाटी शुरू हो जाती है जो तकरीबन चालीस किलोमीटर तक फैली है। पिछले साल नक्सलियों ने जोरदार आक्रमण करके 28 कांग्रेसी नेताओं को मौत के घाट उतार दिया था। देश हैरान रह गया था इस आक्रमण को देखकर। यह पूरा इलाका पहाडी है और घना जंगल है। तीरथगढ जलप्रपात और कुटुमसर की गुफाएं इसी घाटी में स्थित हैं।

Monday, December 8, 2014

किरन्दुल रेलवे- किरन्दुल से जगदलपुर

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
अब बारी थी बारसूर के बाद पहले दन्तेवाडा जाने की और फिर किरन्दुल जाने की। बारसूर से दन्तेवाडा की दूरी 40 किलोमीटर है और दन्तेवाडा से किरन्दुल भी लगभग इतनी ही दूरी पर स्थित है। बारसूर से बीस किलोमीटर दूर गीदम पडता है जहां से जगदलपुर और बीजापुर की सडकें मिलती हैं। गीदम से दन्तेवाडा वाली सडक बहुत खराब हालत में थी। इसकी मरम्मत का काम चल रहा था, ऊपर से लगातार होती बारिश। पूरे बीस किलोमीटर कीचड में चलना पडा। गीदम में बीआरओ की सडक देखकर हैरान रह गया। मैं तो सोचता था कि देश के सीमावर्ती इलाकों में ही सीमा सडक संगठन है लेकिन यहां देश के बीचोंबीच बीआरओ को देखकर आश्चर्य तो होता ही है।
दन्तेवाडा में दन्तेश्वरी मन्दिर है जो एक शक्तिपीठ है। दन्तेवाडा आयें और इस मन्दिर को देखे बिना निकल जायें, असम्भव था। मन्दिर में केवल धोती बांध कर ही प्रवेश किया जा सकता है। यहां लिखा भी था कि पैंट या पायजामा पहनकर प्रवेश न करें। हालांकि मैंने हाफ पैंट पहन रखी थी, इसी के ऊपर वहीं अलमारी में रखी धोती लपेट ली।

Friday, December 5, 2014

बारसूर

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
चित्रकोट से बारसूर की सीधी दूरी 45 किलोमीटर है। वास्तव में इस रास्ते से हम शंकित थे। अगर आप दक्षिण छत्तीसगढ यानी बस्तर का नक्शा देखें तो चार स्थान एक चतुर्भुज का निर्माण करते हैं- जगदलपुर, चित्रकोट, बारसूर और गीदम। इनमें चित्रकोट से जगदलपुर, जगदलपुर से गीदम और गीदम से बारसूर तक शानदार सडक बनी है। इतनी जानकारी मुझे यात्रा पर चलने से पहले ही हो गई थी। जब सुनील जी से रायपुर में मिला तो उन्होंने चित्रकोट-बारसूर सीधी सडक पर सन्देह व्यक्त किया था। हम जगदलपुर पहुंच गये, फिर भी इस रास्ते की शंका बनी रही।
कुछ दिन पहले तरुण भाई बस्तर घूमने आये थे। उनसे बात की तो पता चला कि वे भी बारसूर से पहले गीदम गये, फिर जगदलपुर और फिर चित्रकोट। आखिरकार सन्देह सुनील जी के भतीजे ने दूर किया। उन्होंने बताया कि एक सडक है जो सीधे चित्रकोट को बारसूर से जोडती है जो तकरीबन पचास किलोमीटर की है। लेकिन साथ ही हिदायत भी दी कि उस रास्ते से न जाओ तो अच्छा। क्योंकि एक तो वह सडक बहुत खराब हालत में है और फिर वो घोर नक्सली इलाका है।

Wednesday, December 3, 2014

चित्रकोट जलप्रपात- अथाह जलराशि

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
चित्रधारा से निकले तो सीधे चित्रकोट जाकर ही रुके। जगदलपुर से ही हम इन्द्रावती नदी के लगभग समान्तर चले आ रहे थे। चित्रकोट से करीब दो तीन किलोमीटर पहले से यह नदी दिखने भी लगती है। मानसून का शुरूआती चरण होने के बावजूद भी इसमें खूब पानी था।
इस जलप्रपात को भारत का नियाग्रा भी कहा जाता है। और वास्तव में है भी ऐसा ही। प्रामाणिक आंकडे तो मुझे नहीं पता लेकिन मानसून में इसकी चौडाई बहुत ज्यादा बढ जाती है। अभी मानसून ढंग से शुरू भी नहीं हुआ था और इसकी चौडाई और जलराशि देख-देखकर आंखें फटी जा रही थीं। हालांकि पानी बिल्कुल गन्दला था- बारिश के कारण।
मोटरसाइकिल एक तरफ खडी की। सामने ही छत्तीसगढ पर्यटन का विश्रामगृह था। विश्रामगृह के ज्यादातर कमरों की खिडकियों से यह विशाल जलराशि करीब सौ फीट की ऊंचाई से नीचे गिरती दिखती है। मोटरसाइकिल खडी करके हम प्रपात के पास चले गये। जितना पास जाते, उतने ही रोंगटे खडे होने लगते। कभी नहीं सोचा था कि इतना पानी भी कहीं गिर सकता है। जहां हम खडे थे, कुछ दिन बाद पानी यहां तक भी आ जायेगा और प्रपात की चौडाई और भी बढ जायेगी।

Monday, December 1, 2014

डायरी के पन्ने- 26

ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं। इनसे आपकी धार्मिक और सामाजिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। कृपया अपने विवेक से पढें।

1. आज की शुरूआत करते हैं जितेन्द्र सिंह से। शिमला में रहते हैं। पता नहीं फेसबुक पर हम कब मित्र बन गये। एक दिन अचानक उनके एक फोटो पर निगाह पडी। बडा ही जानदार फोटो था। फिर तो और भी फोटो देखे। एक वेबसाइट भी है। हालांकि हमारी कभी बात नहीं हुई, कभी चैट भी नहीं हुई। फोटो डीएसएलआर से ही खींचे गये हैं, बाद में कुछ एडिटिंग भी हुई है। चाहता हूं कि आप भी अपनी फोटोग्राफी निखारने के लिये उनके फोटो देखें और उनके जैसा कैप्चर करने की कोशिश करें।
इसी तरह एक और फोटोग्राफर हैं तरुण सुहाग। दिल्ली में ही रहते हैं और ज्यादातर वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी करते हैं खासकर बर्ड्स फोटोग्राफी।