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किरन्दुल लाइन-1 (विशाखापट्टनम से अरकू)

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
इतना तो आप जानते ही हैं कि हावडा-चेन्नई के बीच में विशाखापट्टनम स्थित है। विशाखापट्टनम से जब ट्रेन से हावडा की तरफ चलते हैं तो शीघ्र ही एक स्टेशन आता है- कोत्तवलसा जंक्शन। यहां लोकल ट्रेनें रुकती हैं। ज्यादातर एक्सप्रेस व सुपरफास्ट ट्रेनें यहां नहीं रुकतीं। कोत्तवलसा एक जंक्शन इसलिये है कि यहां से एक लाइन किरन्दुल जाती है। हम आज इसी किरन्दुल वाली लाइन पर यात्रा करेंगे। कोत्तवलसा और किरन्दुल को जोडने के कारण इसे के-के लाइन भी कहते हैं।
1959 में जब भिलाई स्टील प्लांट शुरू हुआ तो उसके लिये दल्ली राजहरा से लौह अयस्क आ जाता था। भिलाई से दल्ली राजहरा तक रेलवे लाइन बनाई गई थी उस समय। शीघ्र ही इस प्लांट की क्षमता में वृद्धि करने की कोशिश हुई तो और ज्यादा लौह अयस्क की आवश्यकता थी। इस आवश्यकता को बस्तर में स्थित बैलाडीला की खानें पूरा कर सकती थीं लेकिन उस समय वहां पहुंचना ही लगभग असम्भव था। भीषण जंगल और पर्वतीय इलाके के कारण। तब पहली बार यहां रेलवे लाइन बिछाने की योजना बनी। इसे सीधे भिलाई से न जोडने का कारण शायद यह रहा होगा कि विशाखापट्टनम से जोडने पर यहां का अयस्क देश व दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी पहुंच सके। विशाखापट्टनम में बहुत बडा बन्दरगाह भी है।

कोत्तवलसा-किरन्दुल लाइन पर एक स्टेशन है कोरापुट। के-के लाइन के साथ ही कोरापुट से रायागडा तक भी लाइन बिछा दी गई। इसे के-आर लाइन कहते हैं। वर्तमान में बैलाडीला से जो लौह अयस्क की ट्रेनें भिलाई जाती हैं, सभी के-आर लाइन के रास्ते ही जाती हैं। हालांकि आजकल दल्ली राजहरा से किरन्दुल को रेल से जोडने की योजना बन रही है लेकिन यह प्रस्तावित लाइन अबूझमाड से गुजरेगी। अबूझमाड के बारे में अगर आप नहीं जानते तो जान लो। यह छत्तीसगढ का वो इलाका है जहां नक्सली पूर्ण सुरक्षित हैं। अबूझमाड भले ही भारत में स्थित हो लेकिन यहां भारत का कोई कानून नहीं चलता, न ही कानून के रखवाले यहां कभी दिखते। कोई सेना, अर्द्धसेना, पुलिस कभी अबूझमाड में प्रवेश नहीं कर पाई। नक्सलियों के साथ जितनी भी मुठभेडें व खूनखराबा होता है, सभी अबूझमाड के बाहर ही बाहर होता है। जब भारत सरकार ने यहां रेल लाइन बिछाने का टेंडर निकाला तो किसी भी स्थानीय कम्पनी ने इसे नहीं लिया। सभी जानते हैं कि नक्सलियों के घर में प्रवेश करने का क्या नतीजा होगा?
यही कहानी के-के लाइन की भी है। आये दिन यहां रेल की पटरियां उखाडी जाती हैं, गाडियां उडाई जाती हैं। इस पूरे मार्ग पर केवल यही एक यात्री गाडी चलती है, बाकी सभी लौह अयस्क की मालगाडियां होती हैं। नक्सली कभी नहीं चाहते कि उनकी सम्पदा को कोई बाहर ले जाये। इसी वजह से वे भरपूर कोशिश करते हैं कि यहां से एक भी ट्रेन न निकल पाये। उनकी इसी गतिविधि के कारण यह किरन्दुल पैसेंजर भी ज्यादातर जगदलपुर से ही वापस मुड लेती है, किरन्दुल नहीं जाती। विशाखापट्टनम से जब यह गाडी चलती है तो कोई भी नहीं कह सकता कि यह किरन्दुल पहुंचेगी या नहीं। सभी का जवाब होता है कि जगदलपुर जाकर ही पता चलेगा। बिल्कुल ताजी खबर यह थी कि सप्ताह भर पहले ही नक्सलियों ने पटरी उखाडकर एक मालगाडी उडा दी थी। यात्रा पर आने से पहले दिल्ली में अखबार में मैंने भी इसे पढा था।
इतना होने के बावजूद भी यहां ट्रेनें चलती हैं। जबरदस्त ट्रैफिक रहता है। हर साल करोडों का शुद्ध लाभ इस अकेली लाइन से रेलवे को मिलता है। यह सिंगल लाइन है और विद्युतीकृत है। हर स्टेशन पर कई कई मालगाडियां खडी अपने सिग्नल का इंतजार करती रहती हैं।
ट्रेन के विशाखापट्टनम से चलने का समय सुबह छह बजकर पचास मिनट है लेकिन यह साढे सात बजे रवाना हुई। इसमें विशाखापट्टनम शेड का WAG-5D इंजन लगा था। इस इंजन से मालगाडियां खींची जाती हैं लेकिन यहां इस पैसेंजर गाडी में इसे लगाना बिल्कुल उपयुक्त ही था क्योंकि आगे पर्वतीय मार्ग आने वाला है और इस ट्रेन को अभी लगभग समुद्र तल से यानी शून्य मीटर से चलकर आगे 1000 मीटर तक की ऊंचाई पर पहुंचना है। मालगाडियों में यहां दो-दो तीन-तीन इंजन लगते हैं।
इसी दौरान सिकन्दराबाद-विशाखापट्टनम स्पेशल आई। ताज्जुब की बात थी कि इसमें लुधियाना का इंजन लगा था।
विशाखापट्टनम से निकलते ही एक हाल्ट है- मर्रीपालेम हाल्ट, फिर सिम्हाचलम, उत्तर सिम्हाचलम, पेन्दुर्ति और फिर कोत्तवलसा जंक्शन। यहां तक हम चेन्नई-हावडा लाइन पर ही थे, अब के-के लाइन पर चलेंगे।
यह पूरी लाइन वर्तमान में पूर्वतट रेलवे की वाल्टेयर डिवीजन में आती है। विशाखापट्टनम को ब्रिटिश काल में वाल्टेयर कहते थे। हालांकि अब वाल्टेयर नाम विलुप्त हो चुका है लेकिन रेलवे की डिविजन में अभी भी यह वाल्टेयर ही है। इसी डिब्बे में कुछ नये भर्ती हुए लोको पायलट भी बैठे थे। इनका यहां विशाखापट्टनम में प्रशिक्षण चल रहा था और शीघ्र ही इन्हें मालगाडियां चलाने बचेली भेजा जायेगा। बचेली किरन्दुल के पास है। बेचारों की पहली ही नौकरी और वो भी इतनी खतरनाक जगह पर! आज इनकी छुट्टी थी और ये अरकू जा रहे थे।
इस ट्रेन में साधारण डिब्बों के अलावा गैर-वातानुकूलित कुर्सीयान व गैर-वातानुकूलित प्रथम श्रेणी के भी डिब्बे होते हैं। हमारा आरक्षण कुर्सीयान में था। ज्यादातर आरक्षणधारी अरकू तक ही जाने वाले थे। उसके बाद पूरी ट्रेन खाली हो जायेगी।
कोत्तवलसा से आगे मल्लिवीडू, लक्कवरपुकोटा और श्रंगवरपुकोटा स्टेशन हैं। विशाखापट्टनम जहां लगभग 6 मीटर की ऊंचाई पर है, वहीं कोत्तवलसा 52 मीटर पर और श्रंगवरपुकोटा 96 मीटर पर है। यहां तक ऊंचाई ज्यादा नहीं बढती। ऊंचाई इसके बाद शुरू होती है। पहाडी मार्ग आरम्भ हो जाता है। ट्रेन की सभी सवारियां खिडकियों व दरवाजों पर पहुंच जाती है। बोडवरा 146 मीटर, शिवलिंगपुरम, त्याडा 411 मीटर, चिमिडिपल्ली 585 मीटर और बोर्रा गुहलू 778 मीटर पर हैं। बोर्रा गुहलू का अर्थ है बोरा गुफाएं। स्टेशन के कुछ नीचे ही यहां की विशाल प्रसिद्ध गुफाएं हैं। इनकी सैर भी आपको कराऊंगा।
बोर्रा गुहलू में पूरी ट्रेन खाली हो गई। लगभग चार घण्टे बाद किरन्दुल से आने वाली ट्रेन आयेगी तो ये सभी यात्री गुफाएं देखकर आ जायेंगे और विशाखापट्टनम लौट जायेंगे। हमारे सहयात्री लोको पायलट भी।
हमें भी ये गुफाएं देखनी थीं लेकिन हम नहीं उतरे। इसके दो कारण थे। अगर हम यहां उतर जाते तो हमें आगे जाने के लिये ट्रेन चौबीस घण्टे बाद मिलती। इससे कुछ ही आगे अरकू है, हमें अरकू घाटी भी देखनी थी। सुनील जी ने सुझाया था कि बोर्रा गुहलू उतरकर सडक मार्ग से अरकू चले जायेंगे और अगले दिन अरकू से ट्रेन पकडेंगे। लेकिन मैंने इसे नामंजूर कर दिया। पहला कारण, उस अवस्था में बोर्रा गुहलू से अरकू तक का रेलमार्ग मुझसे छूट जाता। दूसरा कारण, बोर्रा गुहलू और अरकू के बीच में पडने वाला शिमिलिगुडा स्टेशन भी छूट जाता। इसलिये तय हुआ कि अरकू उतरते हैं, तब जैसा बन पडेगा करेंगे।
बोर्रा गुहलू से अगला स्टेशन है करकवलसा जो 889 मीटर पर है। इतनी ऊंचाई पर हवा से उमस कभी की गायब हो चुकी थी और ठण्ड भी लगने लगी थी। करकवलसा से आगे शिमिलिगुडा है जिसकी ऊंचाई 996 मीटर है।
किसी जमाने में शिमिलिगुडा देश का सबसे ऊंचा ब्रॉड गेज का स्टेशन हुआ करता था। यहां एक सूचना-पट्ट भी लगा है कि शिमिलिगुडा के पास यह खिताब 2004 तक था। अब यह खिताब कश्मीर रेलवे के हिल्लर शाह आबाद के नाम है जो 1754 मीटर की ऊंचाई पर है। हिल्लर शाह आबाद से पहले यह खिताब कश्मीर रेलवे पर ही काजीगुण्ड के नाम रहा जो 1722 मीटर पर है। लेकिन एक दुविधा है। वो ये कि कश्मीर में पहली ट्रेन 11 अक्टूबर 2008 को मजहोम और अनन्तनाग के बीच चली। उधर शिमिलिगुडा कहता है कि उसके पास सबसे ऊंचे ब्रॉड गेज स्टेशन का खिताब केवल 2004 तक ही था। फिर 2004 से 2008 तक कौन सा स्टेशन सबसे ऊंचा था? इस बारे में मुझे वडोदरा डिवीजन में मैकेनिकल ऑफिसर (इंजीनियर) विमलेश चन्द्र जी ने आगाह किया। उन्होंने स्वयं अपने स्तर पर खोजबीन की, मैंने अपने स्तर पर लेकिन इस बात का पता नहीं चल सका। मुझे शक था कि इस दौरान किसी राज्य में खासकर कर्नाटक में कहीं आमान परिवर्तन हुआ हो और कोई लाइन मीटर गेज या नैरो गेज से ब्रॉड गेज में बदली गई हो। लेकिन ऐसा भी नहीं था। आखिरकार सबकुछ कश्मीर रेलवे पर ही छोड दिया। भले ही वहां 2004 तक ट्रेन चालू न हुई हो लेकिन लाइनें तो बिछनी शुरू हो ही चुकी थीं।
शिमिलिगुडा से आगे अरकू स्टेशन है। हम यहीं उतर गये। ट्रेन एक घण्टे की देरी से चल रही थी। अभी दोपहर के बारह बजे थे। कम से कम छह सात घण्टे हमारे घूमने के लिये थे। कल इसी ट्रेन से हम जगदलपुर जायेंगे।





किरन्दुल से आता लौह अयस्क



















अरकू स्टेशन पर किरन्दुल से आती मालगाडी

पैसेंजर ट्रेन किरन्दुल के लिये प्रस्थान कर गई। हम कल जायेंगे।




अगला भाग: बोर्रा गुहलू यानी बोरा गुफाएं

4. किरन्दुल लाइन-1 (विशाखापट्टनम से अरकू)




Comments

  1. EaSt Ho Ya WeSt NeErAj Is ThE bEsT .

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  2. नीरज भाई ,मस्त ट्रेन यात्रा और मस्त फोटोग्राफी। आप नक्सली इलाके मे भी गजब के आत्म विस्वास से यात्रा करते है। जबकि हम लोगो को तो उनका नाम सुनकर ही डर लगता है। खैर , आपकी यात्रा सुखद और शांति पूर्वक समाप्त हो ,ईश्वर से यही कामना है , अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा।

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    1. पढते जाइये... आपका नक्सली डर समाप्त हो जायेगा।

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  3. अद्भुत नीरजजी!!!! वाकई आप आश्चर्यजनक यात्राएँ करते हैं और हमें भी कराते हैं! :) :) ग्रेट|

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  4. शिमलीगुड़ा वाले रुट पर मैं 1986 में गया था।

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  5. Adbhut yatra vritant...aap jaise train men yatra karvate hain vaise aaj tak koi nahin karva paya..aapka trains ke prati deevanapan kmaal ka hai...mera slaam hai aapko aur aap itne khoobsutar chitr khiinchte hain ke bas kya kahun ? waah waah waah...main aapka bahut bada fan hoon aur rahunga...

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    1. धन्यवाद गोस्वामी जी... आपकी टिप्पणियां उत्साह भर देती हैं।

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    2. क्यों हमारी नहीं --- ?????? हा हा हा हा

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  6. Neeraj bhai......
    Aap ki ghummakri ka jawab nahi..
    Aap k lekh ko padhkar romanch badhta ja raha hai.....photo k kiya kehne..... ..

    Ranjit........

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  7. dlhi me news pd kr v us jagah me itne utsah se ghumne ka dam to aap me hi ho skta h

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  8. वाह क्या बात है।यात्रा बृतांत पढ़ कर मजा आ गया । ऐसा लगा की मै खुद यात्रा कर रहा हु। उचाई के कारण यह रेल मार्ग तथा शिमिलीगुड़ा स्टेशन मेरे रेल्वे लेख के एक अहम हिस्सा रहे है। इस रेल मार्ग पर मै कभी गया नहीं हु। यह बृतांत पढ़ने के बाद अब जाने की जरूरत नहीं रह गयी है। अच्छा फोटो वाले इतनी बढ़िया जानकारी देने के लिए श्री जाट जी को बहुत बहुत धन्यबाद।

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  9. जहा तक शिमिलीगुड़ा स्टेशन के उचाई की बात है निः संदेह यह स्टेशन 10 अक्टूबर 2008 तक भारतीय रेल का सबसे ऊँचा स्टेशन था। शिमिलीगुड़ा स्टेशन बोर्ड पर 2004 तक की जो जानकारी लिखी है वह वास्तव मे गलत लिखी है।मैंने इस बारे मे इसे मण्डल मे इंजीन्यरिंग विभाग के अनेक लोगो से बात किया था किन्तु कोई सही जबाब नहीं दे पाया। केवल यह जानकारी मिल पायी की 2004 मे जब कश्मीर रेल्वे बननी शुरू हुई तब यहा से रेल्वे के स्लीपर कश्मीर भेजे गए थे।तभी से मान लिया गया की कश्मीर मे बन रही रेल लाइन और उसके स्टेशन शिमिलीगुड़ा स्टेशन के उचाई से जायदा है। इस बारे मे मै आइ आर यफ सी ए से पूंछताछ किया वे भी सही जानकारी नहीं दे पाये। वे भी इतना ही बता पाये की शिमिलीगुड़ा के बाद अनन्तनाग ही सबसे ऊँचा स्टेशन था। मैंने इस बारे मे और जानकारी जुटाने जी कोशिश किया तो पता चला की पूरे भारत मे 996 /1000 मीटर से 1582 मीटर उचाई के बीच मे कोई भी स्टेशन नहीं है। खैर श्री जाट जी ने इस विवरण मे मेरे नाम का उललेख किया इस के लिए धन्यबाद।

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    1. विमलेश सर, आपका बहुत बहुत धन्यवाद। वैसे कर्नाटक में चिकमगलूर स्टेशन 1000 मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर स्थित है और यह ब्रॉड गेज भी है। नया बना है।

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    2. इतना सही एवं सटीक जानकारी देने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। चिकमगलूर स्टेशन की ऊंचाई 1009.845 मीटर है । इस प्रकार से यह कश्मीर रेल्वे को यदि छोड़ दे तो भारतीय रेल का बड़ी लाइन का सबसे ऊंचा स्टेशन हो गया है।यह स्टेशन 19 नवम्बर 2013 अर्थात एक साल पहले चालू हुआ था।

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  10. डर के आगे नहीं बल्कि हिम्मत के आगे जीत है। इस लिए नक्सली से डरने की बात ही नहीं है.

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  11. वैसे पूरे भारत मे 7172 स्टेशनो मे मीटर गेज और नैरो गेज मे 1000 से 1500 मीटर के बीच उचाई वाले 16 स्टेशन है तथा 1000 से 2000 मीटर के बीच मीटर गेज और नैरो गेज और बड़ी लाइन मे कुल लगभग 50 स्टेशन है । इसी प्रकार 2000 मीटर से ज्यादा उचाई वाले कुल 07 स्टेशन है।

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  12. पूरे भारत मे 996 /1000 मीटर से 1582 मीटर उचाई के बीच मे बड़ी लाइन का कोई भी स्टेशन नहीं है।

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  13. Mast, zabardast best of luck for next.

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  14. सजीव चित्रों से आपका यह लेख जीवंत हो उठा है. ऐसा लगा जिसे हम खुद ही यात्रा कर रहे हो. भाई तुमसे ही प्रेरणा पाकर मैंने भी एक यात्रा वृतांत लिखा है. उम्मीद है आप मेरे ब्लॉग पर आकर मेरा मार्गदर्शन करेंगे .............. http://vishalanand30000.blogspot.in/2014/11/blog-post.html

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    1. धन्यवाद विशाल जी, आपका ब्लॉग पढा। अच्छा लिखा है। बस, इसी तरह लिखते रहिये।

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    2. धन्यवाद नीरज भाई

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  15. साहस का नाम ही "नीरज " है ----

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