Tuesday, December 31, 2013

2013 की घुमक्कडी का लेखा-जोखा

साल 2013 घुमक्कडी के लिहाज से एक बेहतरीन साल रहा। इस साल मेरे कुछ बडे सपने पूरे हुए मसलन लद्दाख जाना। दो महायात्राएं हुईं और दोनों ही लद्दाख की। अभी भी बीते साल की घुमक्कडी के बारे में सोचता हूं तो स्वयं ही सिर गर्व से उठ जाता है। कभी विचार आता है कि क्या वे यात्राएं मैंने ही की हैं। क्या फिर से वैसी ही कोई यात्रा कर सकूंगा?
बाकी बातें बाद में करेंगे, पहले एक नजर इस साल हुई छोटी बडी सभी यात्राओं पर:

Monday, December 16, 2013

डायरी के पन्ने- 18

चेतावनी: ‘डायरी के पन्ने’ मेरे निजी और अन्तरंग विचार हैं। कृपया इन्हें न पढें। इन्हें पढने से आपकी धार्मिक और सामाजिक भावनाएं आहत हो सकती हैं।
1 दिसम्बर 2013, रविवार
1. पिछले पखवाडे डायरी नहीं लिख सका। इसका एकमात्र कारण है आलस। भगवान ने इस विद्या में मुझे पारंगत बनाया है। फिर भी पिछले पखवाडे की कुछ बातें हैं, जो लिखना चाहता हूं:
#1 ऋषिकेश से ऊपर फूलचट्टी में गंगा किनारे कैम्पिंग करने की योजना बनी। रेल से आने-जाने का आरक्षण भी हो गया। साथ में सहकर्मी विपिन और भरत भी चलने को तैयार हो गये। झांसी से विनय, दिल्ली से तारकेश्वर व देहरादून से भी कुछ मित्र राजी थे। असल में योजना मैंने और विपिन ने ही बनाई थी। बाद में कारवां बढता चला गया। हमारी छुट्टियां भी पास हो गई थीं।

Monday, December 9, 2013

गढमुक्तेश्वर में कार्तिक मेला

लगभग बीस साल पहले की बात है। हम चारों जने- पिताजी, माताजी, धीरज और मैं- आधी रात के आसपास गंगा मेले में पहुंचे। उससे पहले मैंने कोई नदी नहीं देखी थी। गंगा किनारे ही हमारा डेरा लगा था। रात को चांद की चांदनी में गंगा का थोडा सा प्रतिबिम्ब दिखा, या शायद नहीं दिखा लेकिन मान लिया कि मैंने गंगा दर्शन कर लिया। हम दोनों भाईयों के बाल उतरने थे। परम्परा है जीवन में एक बार गंगाजी को बाल अर्पण करने की। बहुत से लोग तो अपने बच्चों के बाल तब तक नहीं कटाते जब तक कि गंगाजी को अर्पित न कराये जायें।
हम ताऊजी के डेरे में रुके थे। हैसियत नहीं थी अपना डेरा लगाने की। खैर, बाल उतरे, दोनों गंजे हो गये, सभी गंजे गंजे कहकर हमारा मजाक उडाते रहे। रेत में घर बनाये, तोडे, गंगा में खूब डुबकी लगाई लेकिन किनारे पर ही। नरेन्द्र भाई कन्धे पर बिठाकर बहुत अन्दर ले गये। शायद नतीजा मालूम था, इसलिये चिल्लाता रहा। खूब भीतर जाकर जब उन्होंने मुझे गंगाधार में छोड दिया तो पता चल गया कि यह नतीजा कितना डरावना है।