Wednesday, August 28, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन

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22 जून 2013
सुबह उठा तो बच्चों ने घेर लिया। पानी का मग्गा लाकर पकडा दिया। न चाहते हुए भी जाना पडा। शौचालय लद्दाखी तरीके वाला था। दो छोटे छोटे कमरे होते हैं ऊपर नीचे। ऊपर वाले के लकडी के फर्श में एक बडा सा छेद होता है ताकि गन्दगी नीचे गिरती रहे। साथ ही ऊपर वाले में मिट्टी का ढेर भी होता है जिसमें से थोडी थोडी मिट्टी नीचे गिरा देते हैं। इससे गन्दगी ढक जाती है, बदबू नहीं आती और वह बंजर मिट्टी खाद बन जाती है जिसे खेतों में डाल देते हैं।
मोटी मोटी बडी बडी रोटियां मिलीं चाय के साथ। घर की मालकिन ने आग्रह किया कि मैं लद्दाखी चाय पीऊं- नमकीन चाय जिसे बडी लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पडता है। सही बात तो यह है कि मैंने आज तक यह लद्दाखी नमकीन चाय नहीं पी है। फिर भी मैंने मना कर दिया। मना करने के बाद दिमाग में आया कि पी लेनी चाहिये थी।
मैं एक ही रोटी खा सका। भूख तो लगी थी लेकिन स्वाद नहीं आया। एक तो फीकी रोटियां चाय के साथ, फिर कम से कम एक दर्जन आंखें भी देख रही थीं खाते हुए। ऐसे मुझे आनन्द नहीं आता। कल ही पता चल गया था कि करीब पांच किलोमीटर आगे बीआरओ के कैम्प हैं और वहां एक ढाबा भी है। सोच लिया कि वहां जाकर आलू के परांठे खाऊंगा।
कल से मैं इनके आतिथ्य में हूं। मुश्ताक ने कितनी खुशी से मुझे रास्ते चलते रोका और अपने घर लाया। यहां भी मेरी बढिया खातिरदारी हुई। हालांकि कल मुश्ताक ने पैसे की बात करने से मना कर दिया था लेकिन मेरा फर्ज है कि बच्चों को कुछ दूं। ठीक है, मुश्ताक को सबके सामने दो सौ रुपये दे दूंगा। अगर अकेले में दूंगा तो यह बच्चे की आदत खराब करने के बराबर है, सबके सामने दूंगा तो ज्यादा बेहतर है।
जेब देखी। पांच पांच सौ के कई नोट थे और एक नोट दस का, बस। पांच सौ रुपये देकर क्या इनसे तीन सौ वापस मांगूंगा? नहीं। न तो पांच सौ रुपये दे सकता, न ही दस रुपये। धर्मसंकट तो था लेकिन आखिरकार फैसला किया कि बिना पैसे दिये ही खिसक लूंगा।
नौ बजे यहां से चल पडा। कई बच्चे नीचे तक छोडने आये। नीचे दो लडके और मिले, इसी गांव के थे। उन्होंने साइकिल चलाने की इच्छा जाहिर की। सामान नहीं बांधा था इसलिये चलाने दी। सवा नौ बजे यहां से चल पडा।
जिस स्थान को मैं पांच किलोमीटर आगे मानकर चल रहा था, वो बीआरओ का कैम्प एक किलोमीटर आगे ही मिल गया। आधा घण्टा यहां रुका रहा और आलू के दो परांठे खाये। यहां दो ट्रक वाले मिले। वे श्रीनगर जाने वाले थे। उन्होंने जोजीला का नाम लेकर डराने की कोशिश की। आग्रह किया कि उनके ट्रक खाली जा रहे हैं, साइकिल उनमें डाल दूं। मैंने सधन्यवाद मना कर दिया कि मनाली से अब तक सात दर्रे पार कर चुका हूं, जोजीला तो सबसे छोटा है, उसे भी पार कर लूंगा। फिर भी उन्होंने कहा कि हम कुछ देर बाद यहां से चलेंगे, रास्ते में कहीं मिलेंगे, अगर आपको साइकिल चलाने में परेशानी आये तो इसे ट्रक में डाल देना।
अब लद्दाखी परिदृश्य समाप्त होने लगा था। आखिर जोजीला के उस पार तो हमारा हिमालयी परिदृश्य आरम्भ हो जायेगा। रोहतांग से आगे निकलकर लाहौल में प्रवेश किया था, उसी तरह का परिदृश्य यहां है। रेत खत्म हो गई और चट्टानी पहाड आ गये। इनमें घास के मैदान भी दिखने लगे।
एक परिवर्तन और आया कि पानी प्रचुर मात्रा में मिलने लगा। सडक अच्छी बनी है, इसलिये कहीं भी नाले पार नहीं करने पडे। एक जगह तीन चार लोग सडक किनारे काम कर रहे थे। कश्मीरी थे, जाहिर है मुसलमान थे। मैंने उनसे पूछा कि चश्मा आगे कितनी दूर है। उन्होंने कहा कि तीन किलोमीटर आगे। चश्मा यानी पानी का स्रोत। मुझे बडे जोर की प्यास लगी थी और बोतल खाली थी। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हमारा लडका पानी लाने गया है कुछ ऊपर से। थोडी देर रुक जाओ। मैंने उन्हें बोतल दे दी कि जब वो पानी ले आये तो इसे भर देना। इस दौरान हम बातें करते रहे। जब लडका पन्द्रह मिनट तक नहीं आया तो मैंने बोतल वापस मांगी कि आगे तीन किलोमीटर दूर चश्मा है, वहां से भर लूंगा। उन्होंने बोतल देने से मना कर दिया कि आपको बिना पानी के नहीं जाने देंगे। जल्दी मुझे भी नहीं थी, फिर भी मैं अभिभूत रह गया उनकी यह भावना देखकर। कुछ ही देर में लडका आ गया, भरपेट ठण्डा पानी पीया और बोतल भी भर ली।
द्रास से छह किलोमीटर पहले तोलोलिंग पहाडी के नीचे युद्ध संग्रहालय है। इसे कारगिल युद्ध की याद में बनाया गया है। इसे देखना आवश्यक था। मैंने सोचा था कि यह द्रास में ही होगा, जब अचानक दाहिने हाथ की बराबर से यह निकल गया तो संयोग से दृष्टि पड गई। संयोग इसलिये कह रहा हूं कि यहां सेना की गतिविधि है। सैनिक गतिविधियों के स्थानों पर मेरी कोई दिलचस्पी नहीं होती। सडक के किनारे कुछ ‘सिविलियन’ वाहन खडे थे। क्यों खडे हैं, शायद यही देखने के लिये मैंने संग्रहालय की तरफ निगाह घुमा ली हो। तुरन्त साइकिल रोकी, एक तरफ खडी की और प्रवेश कर गया।
1999 की गर्मियों में पाकिस्तानी सेना ने भारतीय इलाके में घुसपैठ की। मश्कोह घाटी पर पूरी तरह कब्जा कर लिया और मश्कोह नदी पार करके ऊंची चोटियों पर भी चढ गये जहां से श्रीनगर-लेह सडक पूरी तरह पाकिस्तानियों के नियन्त्रण में हो गई। द्रास भी उनके कब्जे में आने ही वाला था। भारतीयों ने उनकी इस हरकत का करारा जवाब दिया और उन्हें मश्कोह घाटी से खदेड दिया। साथ ही तोलोलिंग और टाइगर हिल जैसी चोटियों को भी आजाद करा लिया। इसके अलावा बटालिक की तरफ भी लडाई हुई। कारगिल में कोई लडाई नहीं हुई लेकिन द्रास और बटालिक कारगिल जिले में होने के कारण इस युद्ध को कारगिल युद्ध कहा जाता है।
यह जानकारी मुझे बाद में मटायन में एक वृद्ध ने दी। उन्होंने बताया कि जोजीला से लेकर आगे द्रास और बटालिक तक का सारा भारतीय इलाका उनके नियन्त्रण में आ गया था। हमें अपने घर-जमीन छोडकर यहां से पलायन करना पडा, श्रीनगर चले गये। युद्ध समाप्त होने पर वापस लौटे तो न जमीन मिली, न घर। जमीन पर बारूदी सुरंगें थीं और घर युद्ध में तबाह हो गये थे। धीरे धीरे बारूदी सुरंगें हटाईं, खेत मिल गये। सेना ने ही घर भी बनवाये।
मैंने पूछा कि मश्कोह नदी पर तो कोई पुल नहीं था और उसका बहाव भी तेज है, फिर मश्कोह के उस तरफ का इलाका भी काफी दूर तक भारतीय है, तो क्या वहां भारतीय तैनाती नहीं थी? इतने सारे हथियार कैसे उन्होंने मश्कोह पार कराये और टाइगर हिल जैसी जगहों पर ले गये? उसने बताया कि यह आज भी एक रहस्य है।
खैर, इसी युद्ध की याद में यह संग्रहालय बना है। इसका ज्यादा वर्णन करने की आवश्यकता नहीं है। विभिन्न रेजीमेण्टों का परिचय, उनके शहीद हुए जवानों के नाम, युद्ध के दौरान क्रियाकलापों, हथियारों आदि का अच्छा परिचय दिया गया है। प्रवेश करने का कोई शुल्क नहीं है।
संग्रहालय से छह किलोमीटर आगे द्रास कस्बा है। द्रास नदी और मश्कोह नदी के अलावा भी कई नदियों के संगम यहां है। काफी चौडी घाटी है यह। मैदानी भागों में चरागाह हैं जहां भेडें और गायें चर रही थीं।
ढाई बजे द्रास पहुंचा। एक होटल में खाना खाया और साढे तीन बजे यहां से चल पडा। लेह में जब कार्यक्रम बनाया था तो उसके अनुसार आज यहीं रुकना था लेकिन समय बच गया और आगे भी गांव मिलेंगे, यह जानकर आगे बढ चला। यहां से मटायन 21 किलोमीटर है। आज वहीं रुकूंगा।
द्रास प्राकृतिक दृष्टि से काफी समृद्ध है। कश्मीर और सोनमर्ग जाने वाले हर पर्यटक और घुमक्कड को द्रास भी जाना चाहिये। था कभी यह असुरक्षित, लेकिन अब ऐसा नहीं है। आज के समय में द्रास कश्मीर के मुकाबले पूर्ण रूप से शान्त है। यहां से एक रास्ता सीधे कारगिल भी जाता है। वैसे तो यह राष्ट्रीय राजमार्ग भी कारगिल वाला ही है जिससे मैं आया था लेकिन एक नया रास्ता भी कारगिल के लिये बनाया गया है। वह या तो इसके मुकाबले लम्बा है, या फिर बेहद खराब कि उससे कोई नहीं जाता।
द्रास दुनिया का दूसरा सबसे ठण्डा आबादी वाला स्थान है। पहला स्थान कहीं साइबेरिया में है। 9 जनवरी 1995 को यहां शून्य से 60 डिग्री नीचे तापमान रिकार्ड किया गया। आज भी सर्दियों में लेह से कारगिल तक दो सौ किलोमीटर की सडक खुली रहती है लेकिन द्रास अत्यधिक शीत और हिम के कारण कट जाता है। मुझे यात्रा शुरू करने से पहले एक खौफ भी था कि इस जून में भी द्रास में सर्दी लग सकती है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। धूप निकली थी, मौसम साफ था, गर्मी ही लग रही थी।
मश्कोह घाटी द्रास का मुख्य आकर्षण है। यह ट्रेकिंग के लिये प्रसिद्ध है। इस घाटी में जाने के लिये परमिट लेना पडता है जो द्रास से ही मिल जाता है। अगर मश्कोह नदी के साथ साथ चलते जायें तो एक दर्रा पार करके किशनगंगा नदी की घाटी में प्रवेश कर जाते हैं। यही किशनगंगा आगे पाकिस्तान चली जाती है और वहां यह नीलम नदी व नीलम घाटी के नाम से प्रसिद्ध है। श्रीनगर से एक दर्रा पार करके किशनगंगा घाटी में जाया जा सकता है। सुना है कि अब द्रास किशनगंगा घाटी से सडक मार्ग से जुड गया है। हालांकि यह सडक अभी नक्शों में नहीं दिखाई जाती है। अगर ऐसा है तो घुमक्कडों के लिये भारत के सीमान्त का एक और इलाका भ्रमण के लिये खुल जायेगा।
शम्शा 2860 मीटर की ऊंचाई पर है जबकि द्रास 3085 मीटर पर। द्रास के बाद भी हल्की हल्की चढाई जारी रहती है। आज मटायन में रुकना है जो यहां से 21 किलोमीटर दूर है। संग्रहालय में मटायन की कुछ तस्वीरें देखी थीं जिनसे पता चला कि मटायन एक बडा समतल मैदान है। वहां भी अच्छा खासा युद्ध हुआ था। मटायन भी पाकिस्तानियों की सीधी दृष्टि में था।
पूरा रास्ता नदी के साथ साथ है। नदी भी काफी चौडी घाटी बनाकर बहती है। इस कारण बडे बडे चरागाह बन गये हैं जहां गडरिये अपने अपने ‘कुनबे’ के साथ डेरा जमाये रहते हैं। लद्दाख के सूखे पहाडों से आया था, यहां की हरियाली आंखों को अच्छी लगती है। हालांकि पेड अभी भी नहीं आये हैं। जोजीला पार करने के बाद पेड दिखेंगे। यह हिमालय और लद्दाख का मिलन स्थल भी है।
साढे छह बजे मटायन पहुंचा। छोटा सा गांव है और मुसलमान आबादी होने के कारण मस्जिद भी है। सडक किनारे ही दो दुकानें दिखीं। बच्चों ने रोक लिया। मुझे रुकना था ही। पता चला कि गांव में कहीं भी रुकने का इन्तजाम नहीं है। मैंने बच्चों को गांव में भेज दिया ताकि कहीं शम्शा जैसा ही इन्तजाम मिल जाये किसी के घर में। असफल रहने पर टैण्ट लगाने का फैसला किया। बच्चों की सलाह पर सडक किनारे एक खेत में टैण्ट लगा दिया। टैण्ट लगाने में मेरा हाथ कम बच्चों का ज्यादा रहा। बाद में उनके फोटो भी खींचे, सभी खुश हो गये।
साढे छह बजे मटायन पहुंचा था। यह स्थान समुद्र तल से 3225 मीटर की ऊंचाई पर है। एक ढाबे पर गया। बताया कि वहां सिर्फ चाय और आमलेट ही मिल सकता है, रोटी या चावल सब्जी नहीं। मेरे लिये इतना भी काफी था। चाय आमलेट से ही पेट भर लिया।

शम्शा में मुश्ताक के घर से नीचे सडक पर उतरते हुए।


रास्ते में मिला एक गांव पंडरस

इन्होंने स्वयं मुझे रोका और फोटो खींचने के लिये कहा।


द्रास की ओर

द्रास की ओर


यहीं थे जिन्होंने मेरी बोतल ले ली और पानी आने तक इंतजार करने को कहा।

जब मैंने खाली बोतल ही वापस मांगी तो मुल्लाजी बोतल लेकर दूर चले गये कि लडका आयेगा पानी लेकर तो पानी पिलाकर ही जाने देंगे।



द्रास की ओर




द्रास से छह किलोमीटर पहले युद्ध संग्रहालय













द्रास


टाइगर हिल के साये में बसा द्रास

द्रास








मटायन गांव


बच्चों ने टैण्ट लगा दिया।



अगला भाग: लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकी-ला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकी-ला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

27 comments:

  1. Aapki post ki khaas baat ye hai ke subah sabse pehle mein aapki post padhkar niptata hoon.

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  2. Happy krishna janamastmi
    चारो ओर फैली खुबसूरती को आपने बहुत खुभी से केमरे मे उतारा है।बच्चो का प्यार आपपे खुब आ रहा है।कारगिल म्युजियम अचछा लगा। लेकिन वह जानकारी नही मिल पाई की पकिस्तानी सेना इतना असला बारूद आखिर ले कैसे आई हमारे हिन्दुस्तान मे?क्या म्युजियम मे भी इस बात का पता नही चल पाया?

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    1. ये जानकारी तो अटल जी को भी नहीं मिल पायी थी.. तभी तो पाक सेना इतनी आगे तक आ गयी थी... भारतीय गुप्तचर तंत्र सिर्फ राजनेताओं की गुप्तचरी तक सीमित है...

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  3. shame shame aakhir kanjusi ki bhi hadd hoti hai......................... Dont mind just joking

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  4. नीरज भाई , हैट्स ऑफ़ :) कमाल बेमिसाल , मालामाल , क्या कहूं और कैसे कहूं । घुमक्कडी जिंदाबाद । आपकी खींची फ़ोटो की एक एक्ज़ीबीशन के बारे में गंभीरता से सोच रहा हूं , किसी मित्र को सुझाता हूं । यकीनन ये एक बेहतरीन किताब बन सकती है और बनेगी भी मुझे विश्वास है ।

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  5. Yahan ke kashmiri srinagar k behude kashmirion se lakh darze sabhya maloom dete hain..
    kargil yudh ke bare me padh k dil me aag lag jati hai.

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  6. Mera matlab srinagar k mullaon se hai.

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  7. आसपास आबादी देखकर आश्चर्य होता है की आबादी के इतने पास बंकर बने कैसे होंगे? इतने अधिक हथियार, सैनिक, रसद कैसे सीमा के इतने अन्दर पहुंचे होंगे? जबकि हाइवे के आसपास बारह महीने सैन्य गतिविधि रहती है. कुछ तो गड़बड़ है, बहुत कुछ छिपाया गया है.

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  8. इस ब्लॉग पर आपकी लद्दाख यात्रा, लद्दाख के आखिरी पड़ाव पर है और मेरी लद्दाख यात्रा तीन दिनों बाद शुरू होने को है।

    हमेशा की तरह अच्छा विवरण और बेहतरीन तस्वीरें। बहुत खूब !!

    - Anilkv

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  9. अपने को तो रोहतांग पास की ठंड में ही कुल्फ़ी जम गई थी, द्रास में तो पता नहीं क्या होगा.. आपने इतनी ठंड में साईकिल कैसे चलाई होगी.. क्या विशेष किस्म के कपड़े लेकर गये थे और जब आप द्रास पहुँचे तब वहाँ का तापमान कितना था यह भी बताईये ।

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  10. दुर्भाग्‍य कह सकता हूँ अपना जो आपके ब्‍लॉग तक अब पहुंचना हो सका। खैर देर आयद दुरस्‍त आयद। बहुत अच्‍छा लगा आपके ब्‍लॉग के इस यात्रा संस्‍मरण को पढ़कर। कभी लैंसडॉउन के आगे पौड़ी गढ़वाल की ओर भी रुख करें। मैं आपको भरोसा दिलाता हूँ वहां रहने,ठहरने,खाने की दिक्‍कत नहीं होगी।

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  11. यात्रा संस्मरण पढ़कर यात्रा में ही खो गये। इससे ज्यादा कुछ कह भी नही सकता।

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  12. Kaisa lag raha hai 300Rs bacha kar?

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  13. श्री प्रवीण पाण्डे जी का आभार जिनका आलेख पढ कर इस ब्लाग तक पहुँच सकी । सचमुच यह आपके लेखन का कमाल है कि पढते हुए एक एक चित्र सामने आता प्रतीत होता है । आपकी ऊर्जा ऐसी ही बनी रहे । सारी दुनिया का सफलता पूर्वक भ्रमण करें और हमें भी उन अनुभूतियों में शामिल करें ।

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  14. श्री प्रवीण पाण्डे जी का आभार जिनका आलेख पढ कर इस ब्लाग तक पहुँच सकी । सचमुच यह आपके लेखन का कमाल है कि पढते हुए एक एक चित्र सामने आता प्रतीत होता है । आपकी ऊर्जा ऐसी ही बनी रहे । सारी दुनिया का सफलता पूर्वक भ्रमण करें और हमें भी उन अनुभूतियों में शामिल करें ।

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  15. प्रणाम स्वीकार करें घुमक्कड जी

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  16. नीरज जी,
    आपकी लेखनी, फोटोग्राफ्स, और आपकी हिम्मत की तारीफ़ करना तो जैसे सूरज को दीपक दिखाना है, सब कुछ बेजोड़ है।

    बस आज की पोस्ट में पैसे वाली बात पढ़कर कहीं न कहीं तकलीफ हुई। कुछ न कुछ तो उम्मीद उनलोगों को रही होगी आपसे, यूँ ही किसी अजनबी को अपने घर में ठहराना किसी का शौक नहीं होता. आपने यूँ ही अपना दामन छुड़ा के भागने के बजाय थोडा शांत दिमाग से सोच होता, शायद कुछ हल निकल जाता। आप अपनी तरफ से घर के मालिक से पूछ सकते थे की कितना चार्ज हुआ, अगर वो कुछ बोलता तो फिर आप अपना पांच सौ का नोट देकर अपने बाकी पैसे वापिस मांग सकते थे। खैर ये आपका निजी मामला है ..........

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  17. DRASS SECTOR K SAMNE TIGER HILL.... WAOOO KISI NE KHUBH KHA HAI ZANNAT HAI TO SIRF HINDUSTAN MEIN..... JAI HIND

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  18. पाँच सो का नोट _ ऐसी बात लिखनी के लिए भी हिम्मत चाहिए। नीरज जी अपनी लेखनी में बिलकुल इमानदारी से अपनी अच्छाई -बुराई -कमियां बिना किसी संकोच के प्रकट करतें हैं।
    इसीलिए इनके यात्रा वर्णन का इन्तजार रहता हे. . जिसको कोई झुठला नहीं सकता।
    प्रणाम स्वीकार करें घुमक्कड जी

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  19. घर में जगह हो न हो,
    दिल बड़ा होना चाहिए,
    जगह खुद-ब-खुद निकल आती है.

    गुस्ताखी माफ़, पर ऐसे बड़े दिलवालों के लिए ५०० भी कम हैं. इन मौकों पर पैसे नहीं गिने जाते.

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  20. Paise apne saath nark me le jaaiyo. Lekh accha harbaar kee tarah lekin niyat mei marwari kaa bhi number peeche. Sharam kya Meerut mei dafna dee hai.

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  21. अबे, कंजूस 500रु दे देता तो क्या होता ? यहाँ शहर में हम इन निकम्मों के आगे रोज ठगे जाते है ..वो गरीब मासूम लोगो के दिल कितने बड़े थे की कुछ सामान न होने पर भी उन्होंने इतनी अच्छी मेहमान नवाजी की ... कुछ पैसो से उनको ख़ुशी मिलती
    खेर. चित्र बहुत ही बढ़िया है हमेशा की तरह ...

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  22. pdne or dekhne m mza a rha h......

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  23. नीरज जी नमस्कार
    लद्दाख का यात्रा विवरण पढ़ा , आनंद आ गया। मै आपके ब्लॉग को बहुत दिनों से पढ़ रहा हूँ। एक समस्या आ रही है की आपके फोटो आधे कटे हुए दीखते हैं ,साइड का जो अल्फाबेटिकल यात्राओ का बार है उसकी वजह से फोटो कट जाते है. क्या करें कि वो पूरे दिख सके.
    - ब्रजेश मिश्रा
    लखनऊ

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  24. क्या करें कि फोटो पूरे दिख सके कोई और अगर मेरी समस्या का समाधान कर दे तो बहुत धन्यवाद
    - ब्रजेश मिश्रा
    लखनऊ

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    1. ब्राऊजर बदल कर देखिये

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