Monday, August 19, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल

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18 जून 2013
नौ बजे सोकर उठा। उठने के मामले में कभी जल्दबाजी नहीं की। रात शानदार नींद आई।
लेह शहर में मैं जनवरी में अच्छी तरह घूम चुका था, अब घूमने की आवश्यकता नहीं थी। खारदूंगला भी जाना चाहिये था लेकिन सबसे पहली बात कि मन नहीं था, दूसरी बात मौसम खराब होने और भारी बर्फबारी की वजह से खारदूंगला का परमिट भी नहीं दिया जा रहा था। फिर लगातार समाचार आ रहे थे कि हिमाचल और उत्तराखण्ड में बारिश ने भारी तबाही मचा दी है। लद्दाख में तो खैर उतना भय नहीं है लेकिन जोजीला के बाद जम्मू तक अवश्य बारिश व्यवधान पैदा कर सकती है। अगर कोई व्यवधान हो गया तो रास्ते में पता नहीं कितने दिन रुकना पड जाये। अब जरूरी था जल्द से जल्द इस यात्रा को समाप्त करके दिल्ली पहुंचना।
लेह से श्रीनगर तक तीन दर्रे पडते हैं- फोतू-ला, नामिक-ला और जोजी-ला। इनमें फोतू-ला सबसे ऊंचा है- 4100 मीटर। सारे उतार-चढावों को ध्यान में रखते हुए सात दिन में श्रीनगर पहुंचने का कार्यक्रम इस प्रकार बनाया- लेह से ससपोल, ससपोल से लामायुरू, लामायुरू से मुलबेक, मुलबेक से कारगिल या खारबू, कारगिल या खारबू से द्रास, द्रास से सोनामार्ग और सोनामार्ग से श्रीनगर।
गर्म पानी आ रहा था। दस दिन पहले आठ तारीख को गोंदला में ही नहाया था। तब से लगातार पसीना बहा रहा हूं। शरीर पर कहीं भी हाथ लगा दूं, मैल की परतें उतरने लगती। सबसे जरूरी था मुंह अच्छी तरह धोना लेकिन मुंह पर हाथ लगाना भी मुश्किल था। नाक बिल्कुल जल चुकी थी, ऊपर से गर्म पानी लगता तो और भी जलन होती। साबुन और भी भयंकर। यहां प्रतिज्ञा की कि श्रीनगर तक 434 किलोमीटर के रास्ते में एक किलोमीटर भी मुंह उघाडकर साइकिल नहीं चलाऊंगा। एक सप्ताह बाद जब दिल्ली पहुंचूंगा तो काफी हद तक चेहरा ठीक हो जाना चाहिये।
अब समस्या आई कपडों की। दस दिनों से एक ही जोडी कपडों में काम चला रहा हूं। वैसे तो मैं पर्याप्त कपडे लाया था लेकिन पैकिंग करते समय बुद्धि पर पत्थर पड गये थे, दो जोडी हाफ पैंट व आधी बाजू की टी-शर्ट रख ली। शरीर का कोई भी हिस्सा लद्दाख की धूप में नंगा रहना खतरनाक है। पैण्ट भी नहीं पहन सकता था क्योंकि इसे पहनकर अगर आज दिनभर साइकिल चला ली तो शाम को बैठने लायक भी नहीं रहूंगा। ऐसे में वही एकमात्र लोवर बचता है जिसे मैं पिछले दस दिन से पहने हुए था। लोवर के ऊपर हाफ पैण्ट पहन ली, लुक बदल गया।
लद्दाख में ठण्ड उतनी बडी समस्या नहीं है, जितनी धूप। साइकिल चलाते समय हथेली के ऊपर का हिस्सा लगातार सूरज के सामने पडता था। शुरूआत में न तो दस्ताने पहने और न ही क्रीम लगाई। दोनों जल गये। जब जली हुई त्वचा की पपडी उतरने लगी तो क्रीम लगानी शुरू कर दी। इससे भी काम नहीं चला और नई नाजुक त्वचा जो अभी जली त्वचा के नीचे थी, वो भी जलने लगी। डबल धमाका। अब तय किया कि दस्ताने पहनूंगा।
लेकिन पंजों पर ऐसी समस्या नहीं आई। मैं चप्पलें पहने था और पंजों का कुछ हिस्सा सीधे धूप में पडता था। जो हिस्सा धूप में आया वो जला नहीं, बल्कि काला पड गया। उसमें न दर्द हुआ, न त्वचा उतरी, इसलिये उस हिस्से को नंगा ही रहने दिया। लेह से जब चला तो पूरे शरीर पर केवल पंजों का कुछ हिस्सा ही था जो नंगा था। कोई मुझे देखकर नहीं बता सकता था कि मैं भारतीय हूं या विदेशी।
दस बजकर चालीस मिनट पर इस साइकिल यात्रा का दूसरा चरण आरम्भ कर दिया। यह पहले चरण के मुकाबले आसान ही रहेगा क्योंकि एक तो पूरे रास्ते आबादी मिलती रहेगी और सडकें भी अच्छी हैं, ज्यादातर नीचे उतरना है।
मुख्य बाजार में ही एक दुकान है जहां मैदानी खाना अच्छा मिलता है। यह दुकान जनवरी में भी खुली थी। चाय समोसे खाये।
तीन किलोमीटर दूर मुख्य चौक तक तो भयंकर ढलान है। यहां से बायें सडक मनाली चली गई है और सीधे श्रीनगर। मेरे काम की सीधी सडक थी। ढलान जारी है। विमानपत्तन के सामने से गुजरा तो जनवरी वाली यात्रा याद आ गई। मेरी पहली हवाई यात्रा दिल्ली से यहीं के लिये हुई थी- कुशोक बकुला रिन्पोछे विमानपत्तन।
पहले बूंदाबांदी हुई, अब तेज बारिश होने लगी। इससे बचने का इंतजाम था मेरे पास, बस पन्द्रह मिनट रुकना पडा। मैं बारिशविरोधी तामझाम से लैस हो गया।
यहां दूर दूर तक सेना का पडाव है। सैनिक पडावों पर मैं फोटो नहीं खींचा करता। फिर बारिश भी थी, फोटो न खींचने का एक और बहाना।
पिटुक गोनपा पहले देखा हुआ था, इस बार बिना रुके ढलान पर सीधा बढ गया। रास्ते में ईण्डेन का एलपीजी बोटलिंग संयन्त्र मिला, जहां लिखा था विश्व का सर्वोच्च बोटलिंग संयन्त्र, ऊंचाई 11800 फीट।
लेह 3400 मीटर की ऊंचाई पर है। इसके बाद ढलान शुरू हो जाता है और ऊंचाई 3200 मीटर से भी नीचे आ जाती है। इसके बाद करीब दस किलोमीटर फिर चढाई है। यह चढाई सर्पाकार नहीं है बल्कि सीधे रास्ते पर ही है। पत्थर साहिब से दो किलोमीटर पहले तक यह बरकरार रहती है और हम 3535 मीटर तक जा पहुंचते हैं। यहां सिन्धु कुछ दूर चली जाती है और दिखती भी नहीं। इस चढाई भरी दस किलोमीटर की दूरी को तय करने में दो घण्टे लग गये।
गुरुद्वारा पत्थर साहिब- लेह से पच्चीस किलोमीटर दूर समुद्र तल से 3473 मीटर ऊपर। कहते हैं गुरू नानक देव जी यहां सन 1517 में आये थे। यहां की जनता एक राक्षस के अत्याचारों से बडी तंग थी तो इससे मुक्ति दिलाने का काम नानकदेव जी ने शुरू किया। राक्षस जिस पहाडी पर रहता था उसी के नीचे बैठ गये। राक्षस परेशान हो गया। उसने ऊपर से एक बडी चट्टान गुरूजी के ऊपर फेंकी। लेकिन उससे गुरूजी को कुछ नहीं हुआ और वह मोम की बन गई व उनका शरीर चट्टान में धंस गया। शरीर की आकृति बन गई, वो आकृति उस चट्टान पर आज भी है। वही चट्टान है, जो भी कुछ है।
वैसे गुरू नानक बडे जबरदस्त घुमक्कड थे। जब भारत में इस्लामी शासन था, उस दौर में वे पैदा हुए थे। मक्का मदीना से लेकर तिब्बत तक, यारकन्द से लेकर श्रीलंका तक उनके पैर पडे।
गुरूद्वारा शानदार है। लघु लंगर मिला चाय और शायद हलुवे का। उस समय आकाश में काले काले बादल थे, तेज हवा चल रही थी और टिमटिम बूंदें भी पड रही थीं। ऐसे में लद्दाख में तापमान बहुत नीचे चला जाता है। गुरूद्वारे में बिछे नरम मोटे मोटे गद्दों पर चलना काफी सुकून भरा रहा।
आधे घण्टे बाद यहां से चल पडा। ढलान है और सडक भी शानदार है। पिछले काफी दिनों से मैं ऐसे रास्ते के लिये तरस रहा था। इसलिये ब्रेक से उंगलियां हटा लीं और साइकिल को दौडा दिया। एक ट्रक से आगे निकालकर कार के पीछे पीछे लग गया। कार में बैठे पर्यटक पीछे साइकिल को कार की स्पीड से चलते देखकर हैरान से लग रहे थे। मैग्नेटिक हिल पर कार रुक गई और मैं आगे बढ गया। एक तो मौसम भी बिगडता जा रहा था, फिर ढलान; मैं मैग्नेटिक हिल पर नहीं रुका।
निम्मू से दो तीन किलोमीटर पहले सिन्धु-जांस्कर संगम दिखाई देता है। जनवरी में यहां कोई नहीं था और जांस्कर जमी हुई थी। अब यहां पर्यटकों की अच्छी संख्या मस्ती कर रही है। यहां से निम्मू तक नदी शान्त होकर बहती है तो राफ्टिंग भी हो जाती है।
भूख लगी थी, निम्मू में ही कुछ खाना था। गांव पार करके बायें हाथ एक गेस्ट हाउस दिखा जहां भोजन भी मिल जाता है। दो परांठे व चाय का आदेश दे दिया। लद्दाख में गेस्ट हाउसों की परम्परा मुझे बडी अच्छी लगी। हालांकि मुझ जैसों के लिये यहां रुकना थोडा महंगा अवश्य होता है लेकिन पैसे भी पूरे वसूल हो जाते हैं। बिल्कुल लद्दाखी घर में रहना होता है खेतों व बगीचों के बीच। मुझे यहां रुकना तो नहीं था लेकिन भोजन इसी माहौल में किया, अच्छा लगा।
आधे घण्टे बाद पौने चार बजे यहां से चल पडा। अच्छा हां, निम्मू समुद्र तल से 3130 मीटर ऊपर है। सिन्धु के बिल्कुल किनारे। दूसरे गांवों की तरह यहां भी सिन्धु जल का अच्छा उपयोग करके पेड लगाये गये हैं जो मरुस्थल में आंखों को सुकून देते हैं।
कहते हैं अच्छे दिन ज्यादा देर तक नहीं चलते। बुरे दिन लम्बे खिंच जाते हैं। यहां भी ऐसा ही हुआ। निम्मू के बाद चढाई शुरू हो गई और बासगो के बाद तो बढिया ढंग की चढाई है। सोचा था कि रास्ता सिन्धु के साथ साथ है तो ढलान ही मिलेगा लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। बासगो के बाद सिन्धु दक्षिणप्रवाही हो जाती है, कुछ दूर दक्षिणप्रवाही होने के बाद मुडकर उत्तर पश्चिमी हो जाती है और ससपोल तक उत्तरपश्चिमी ही रहती है। यानी अगर बासगो से ससपोल का नक्शा देखें तो सिन्धु ‘यू’ के आकार में दिखती है। इस दूरी को सडक मार्ग के लिये कम करने को बासगो से सीधे ससपोल तक सडक बना दी है। इससे सडक पहले तो ऊपर चढती है, फिर नीचे उतरती है। बासगो में सिन्धु दिखती है, फिर ससपोल में दिखती है, रास्ते में कहीं नहीं दिखती।
बासगो लगभग 3200 मीटर की ऊंचाई पर है। इससे आगे चढाई शुरू हो जाती है। तीन चार लूपों के बाद एक विस्तृत मैदान दिखाई देता है और सडक सीधी हो जाती है। अगर गाडी से जायेंगे तो यह एक समतल मैदान ही दिखेगा, लेकिन साइकिल से जाने वाले को स्पष्ट चढाई दिखेगी। बासगो से दस किलोमीटर तक चढाई है, फिर एकाएक उतराई शुरू हो जाती है, जो ससपोल जाकर ही खत्म होती है। वह सर्वोच्च बिन्दु 3520 मीटर पर है, ससपोल 3090 मीटर पर।
यह मैदान बिल्कुल निर्जन है। कोई गांव नहीं, कोई बसावट नहीं। हां, आकाशवाणी का एक टावर अवश्य है। यहां से एक निर्माणाधीन सडक भी है जो ना-ला दर्रे को पार करके हुण्डुर तक जायेगी। इससे कश्मीर से नुब्रा घाटी जाने के लिये लेह जाना जरूरी नहीं होगा व दूरी भी काफी घट जायेगी। ना-ला दर्रा करीब 5500 मीटर ऊंचा है।
बासगो के बाद कहीं भी पानी नहीं मिला। चढाई पर पानी की बहुत ज्यादा आवश्यकता पडती है। बोतल खाली हो चुकी थी। मैदान में सडक किनारे एक टैंकर खडा मिला। सरदारजी सडक के दूसरे किनारे बैठकर ढलते सूरज की गुनगुनी धूप का आनन्द ले रहे थे। यहां टैंकर खडा होने का एक ही अर्थ है कि वह खराब हो गया है। मैंने पानी मांगा। सरदारजी पंजाबी गिलास में ठण्डा पानी भरकर ले आये और बोतल भी भर दी। उन्होंने बताया कि तीन दिनों से गाडी खराब है, कल ठीक हो जाने की उम्मीदें हैं। उनके साथ सोलह सत्रह साल का उनका लडका भी था। बताया कि इसकी छुट्टियां पड गई हैं, तो सोचा कि इसे भी ट्रक पर लद्दाख का एक चक्कर लगवा लाऊं। मैंने कहा यह महा-पुण्य का काम किया आपने। उन्होंने रुकने और खाना खाकर जाने का न्यौता भी दिया लेकिन मैं धन्यवाद कहते हुए आगे बढ गया।
पांच बजकर बावन मिनट पर मैंने बासगो-ससपोल के बीच के सर्वोच्च बिन्दु को पार किया। इसके बाद 13 किलोमीटर दूर ससपोल पहुंचने में 48 मिनट लगे और इस समय में काफी सारे फोटो भी खींचे गये। अच्छी सडक थी, अच्छी स्पीड मिली। एक तिराहा भी मिला जहां से तीसरी सडक लिकिर गोम्पा जाती है। यह गोम्पा लद्दाख के माने हुए गोम्पाओं में से एक है। समय नहीं था, इसलिये नहीं गया और असल बात कि जानकारी भी नहीं थी। और जानकारी होती तब भी नहीं जाता। ठिक्से नहीं गया, हेमिस भी नहीं गया, लिकिर कैसे चला जाता?
जब ससपोल पहुंचा तो 62 किलोमीटर साइकिल चला चुका था। काफी थक गया था। टैण्ट लगाने का मन नहीं था। ससपोल में घुसते ही एक गेस्ट हाउस दिखा। किराया पांच सौ रुपये। मैंने मोलभाव किया तो सौ रुपये नीचे आ गया, चार सौ। घर में दो ही सदस्य थे, दोनों महिलाएं, मां बेटी। खाने की बात की तो उन्होंने अपने साथ ही मेरा खाना भी बना दिया। थोडे से चावल और थोडी दी सब्जी।
ससपोल सिन्धु के किनारे स्थित है और सिन्धु के उस तरफ प्रसिद्ध गोम्पा अल्ची है। यहां से अल्ची गोम्पा दिखता है लेकिन इस गेस्ट हाउस से नहीं दिखता। अल्ची जाने की भी मेरी इच्छा नहीं है।

लेह का मुख्य चौक। बायें मनाली, सीधे श्रीनगर। मौसम भी खराब।

दुनिया का सबसे ऊंचा बोटलिंग प्लांट।





गुरुद्वारा पत्थर साहिब

पत्थर साहिब से निम्मू की तरफ का नजारा।

यही है वो चट्टान जिसपर गुरूजी की आकृति है।

गुरूद्वारे के अन्दर

गुरूजी की यात्राओं का नक्शा


“भारी वाहन पार्किंग”


सिन्धु नदी

सिन्धु जांस्कर संगम। बायें सिन्धु, सामने जांस्कर।


सामने निम्मू है।




बासगो से आगे चढाई।

अब यह राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 1 है। पहले 1D था।



किलोमीटर के पत्थरों पर ज्यादातर अंग्रेजी में लिखा है, कहीं कहीं हिन्दी में भी लेकिन स्थानीय लद्दाखी में दुर्लभ हैं। ऐसा ही एक दुर्लभ पत्थर। इस पर लिखा है ससपोल 12 किलोमीटर।




ससपोल में गेस्ट हाउस में।

कमरे की खिडकी से
अगला भाग: लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकी-ला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकी-ला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

15 comments:

  1. बहुत रोमांचक रही ये यात्रा.

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  2. सिन्धु जांस्कर संगम।
    नीरज जी यह वही जगह हे जहाँ पर आप ने जनवरी मै चादर ट्क किया था.?
    आज की याञा सडक मारग पर जयादा रही ।फोटो मे सुनदरता बहुत दिखाई हे आपने।पतथर साहिब के दशॅन कर मन को अचछा लगा।

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  3. Pichle saal jis ghar me ruke the unse milne ka khayaal nahi aya mun me??

    ek sardaarji ka bhi photo chap dete ji.. bhool guye..

    badhiya photos..

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    1. हमेशा शिकायतें ही शिकायतें!
      वो जनवरी वाला घर चिलिंग में है। चिलिंग निम्मू से चालीस किलोमीटर ऊपर जांस्कर घाटी में है। जाना और आना अस्सी किलोमीटर हो जाता। इसी से बचने के लिये चिलिंग नहीं गया।

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    2. अरे नहीं जी कोई शिकायत नहीं थी ये .. मन में बात आई तो पूछा ..

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  4. "अच्छा हां" कई पोस्टों के बाद दिखा।
    मैं तो इसे आपकी सभी पोस्टों में ढूंढता रहता हूं :-)

    प्रणाम

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  5. यात्रा का अगला चरण शुरू हो गया है।
    भई वाह !!
    आज की तस्वीरें भी अच्छी हैं
    और मैं जानता हूँ की अगले दिन कुछ बेहतरीन वायुक्षरण तस्वीरें दिखने वाली है।
    - Anilkv

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  6. नीरज जी! नमस्कार, अभी तक अपने अपनी जली नाक के बारे में कई पोस्ट में जिक्र कर चुके हैं लेकिन अभी उस तस्वीर के दर्शन नही करये।

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  7. नीरज सरदार जी की किस्मत अच्छी निकली की आपने वहाँ खाना नही खाया नही तो सरदार जी क्या खाता?

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  8. जितने भी महापुरुष हुये हैं, गजब के घुमक्कड़ हुये हैं। बिना घुमक्कड़ी देश को समझना संभव ही कहाँ है।

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  9. बहुत बढ़िया रही लेह की यात्रा ....एक बार फिर पत्थर साहेब के दर्शन मन को प्रफुल्लित कर गए .....वो "नाक " कहाँ है ठाकुर ...

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  10. Shandar Nazare, Guest House behtarin hai,

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  11. हिंद में ब्लॉग लिखना जयदा सरल है क्योकि यह हमारी मात्र भाषा है आप का ब्लॉक में जानकारी क लियें धन्यबाद शंकर सिंह कुशवाहा आगरा ९३५८३४३८८४

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  12. हिंदी में ब्लॉग लिखना जयदा सरल है क्योकि यह हमारी मात्र भाषा है आप का ब्लॉक में जो यात्रा बृतान्त साइकिल की यात्रा भाई मजा आ गया हम बास्तव में इसी खोज में थे हम गुमाक्कर को पढ़ रहें थे जानकारी के लियें धन्यबाद शंकर सिंह कुशवाहा आगरा ९३५८३४३८८४

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