Friday, August 30, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर

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23 जून 2013
पौने आठ बजे मैं चलने को तैयार हो गया। खाने का अगला ठिकाना सोनमर्ग में बताया गया। यानी कम से कम 40 किलोमीटर दूर। इसलिये यहां भरपेट खाकर चला। आमलेट और चाय के अलावा कुछ नहीं था, इसलिये चार अण्डों का आमलेट बनवा लिया।
आज इस यात्रा का आखिरी दर्रा पार करना है- जोजीला। मेरे पास लेह-श्रीनगर मार्ग का नक्शा और डाटा उपलब्ध नहीं था, इसलिये नहीं पता था कि जोजीला कितनी ऊंचाई पर है और कितना दूर है। किलोमीटर के पत्थरों पर गुमरी नामक स्थान की दूरियां लिखी आ रही थीं। यानी गुमरी जाकर पता चलेगा कि जोजीला कितना दूर है। मटायन से गुमरी 16 किलोमीटर है।
चढाई है जरूर लेकिन मामूली ही है। हर आठ-नौ मिनट में एक किलोमीटर चल रहा था यानी सात-आठ किलोमीटर प्रति घण्टे की स्पीड थी। इस स्पीड का अर्थ यही है कि चढाई है जरूर लेकिन तीव्र नहीं है।
सडक अच्छी ही बनी है और आसपास के चरागाहों में पशुपालक भी अपनी उपस्थिति बनाये रखते हैं। हरियाली तो है ही। थकान बिल्कुल नहीं हुई।

Wednesday, August 28, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन

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22 जून 2013
सुबह उठा तो बच्चों ने घेर लिया। पानी का मग्गा लाकर पकडा दिया। न चाहते हुए भी जाना पडा। शौचालय लद्दाखी तरीके वाला था। दो छोटे छोटे कमरे होते हैं ऊपर नीचे। ऊपर वाले के लकडी के फर्श में एक बडा सा छेद होता है ताकि गन्दगी नीचे गिरती रहे। साथ ही ऊपर वाले में मिट्टी का ढेर भी होता है जिसमें से थोडी थोडी मिट्टी नीचे गिरा देते हैं। इससे गन्दगी ढक जाती है, बदबू नहीं आती और वह बंजर मिट्टी खाद बन जाती है जिसे खेतों में डाल देते हैं।
मोटी मोटी बडी बडी रोटियां मिलीं चाय के साथ। घर की मालकिन ने आग्रह किया कि मैं लद्दाखी चाय पीऊं- नमकीन चाय जिसे बडी लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पडता है। सही बात तो यह है कि मैंने आज तक यह लद्दाखी नमकीन चाय नहीं पी है। फिर भी मैंने मना कर दिया। मना करने के बाद दिमाग में आया कि पी लेनी चाहिये थी।

Monday, August 26, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- अट्ठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा

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21 जून 2013
हमेशा की तरह आराम से सोकर उठा। आज आराम कुछ भारी पड सकता है क्योंकि बताया गया कि आगे कारगिल के बाद सिर्फ द्रास में ही रुकने का इन्तजाम है। यहां से कारगिल 40 किलोमीटर और द्रास 100 किलोमीटर है। पूरी यात्रा में मैं कभी भी इतनी दूर तक साइकिल नहीं चला सका, चढाई तो दूर ढलान पर भी नहीं। आज कहीं भी ढलान नहीं है, अपवादस्वरूप कारगिल तक यदा-कदा ढलान मिल सकता है, उसके बाद जोजीला तक तो कतई नहीं। तो सीधी सी बात है कि कारगिल चार घण्टों में पहुंच जाऊंगा लेकिन किसी भी हालत में द्रास नहीं पहुंच सकूंगा। अन्धेरे में मैं साइकिल नहीं चलाया करता।
आज की एक और भी समस्या है। मुझे यात्रा शुरू करने से पहले ही बताया गया था कि कारगिल और द्रास के बीच में करीब पन्द्रह किलोमीटर का रास्ता ऐसा है जो पाकिस्तानी सेना की फायरिंग रेंज में आता है। सन्दीप भाई के यात्रा विवरण को पढा, वे मोटरसाइकिल पर थे लेकिन उन्होंने लिखा था कि इस रास्ते पर उन्हें कोई होश नहीं था सिवाय जल्दी से जल्दी इसे पार कर लेने के। फिर यह रास्ता चढाई भरा है। पन्द्रह किलोमीटर यानी मुझे चार घण्टे लगेंगे। मैं इसी को सोच-सोचकर डरा जा रहा था। यहां तक कि सोच भी लिया था कि इस रास्ते को किसी ट्रक में बैठकर पार करूंगा।

Friday, August 23, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक

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20 जून 2013
यहां कोई पेड वेड तो थे नहीं कि टैण्ट पर छांव पड रही हो। जब सूरज निकला तो निकलते ही आग बरसाने लगा। टैण्ट के अन्दर यह आग और भी भयंकर लग रही थी। बाहर निकला तो शीतल हवाओं ने स्वागत किया। फटाफट टैण्ट उखाडा। साढे आठ बज चुके थे। देखा काफी सारे मजदूर मुझे देख रहे हैं। वो लद्दाखी चौकीदार पता नहीं सुबह भी आया या नहीं, लेकिन अब भी नहीं था। मैंने मजदूरों से उसके बारे मे पूछा तो बताया कि उसकी यहां चौकीदारी की रात की ही ड्यूटी होती है, दिन में वो अपने घर चला जाता है। असलियत शायद किसी को नहीं मालूम थी, लेकिन मैं जानता था कि वो पूरी रात अपने घर रहा था।
सवा नौ बजे यहां से चल पडा। फोतूला अभी भी आठ किलोमीटर है। चढाई तो है ही और जल्दी ही लूप भी शुरू हो गये। लेकिन चढाई मुश्किल मालूम नहीं हुई। फोतूला से करीब चार किलोमीटर पहले खराब सडक शुरू हो जाती है। इसका पुनर्निर्माण चल रहा है, फिर तेज हवाओं के कारण धूल भी काफी उडती है। चढाई भरे रास्ते पर जहां आपको अत्यधिक साफ हवा की आवश्यकता पडती है, यह धूल बहुत खतरनाक है।

Wednesday, August 21, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला

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19 जून 2013
चूंकि नौ बजे ससपोल से चल पडा तो इसका अर्थ है कि साढे सात बजे उठ भी गया होऊंगा। कल लेह में नहाया था, आज तो सवाल ही नहीं। गेस्ट हाउस चूंकि घर ही होते हैं। और यह भी काफी बडा था। खूब ताक-झांक कर ली, कोई नहीं दिखा। आन्तरिक हिस्से में मैं झांका नहीं करता। कुछ देर बाद जब लडकी दिखाई पडी तो पता चला कि उसकी मम्मी लामायुरू गई हैं, वहां कोई पूजा है। घर में लडकी अकेली ही थी। उसने नाश्ते के बारे में पूछा, मैंने तुरन्त हां कर दी। पूछने लगी कि यहीं आपके कमरे में लाऊं या आप अन्दर चलोगे रसोई में। मेरी इच्छा तो थी कि लद्दाखी घर में अन्दर जाऊं लेकिन पापी मन अकेली लडकी की वजह से मना भी कर रहा था। कह दिया कि यहीं ले आओ। वह जैसा तुम चाहो कहकर चली गई। अचानक पुनः प्रकट हुई। बोली नहीं भैया, आप अन्दर ही चलो, कोई परेशानी नहीं है। मुझे काफी सारा सामान उठाकर लाना पडेगा। मैं झट पीछे पीछे हो लिया।

Monday, August 19, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल

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18 जून 2013
नौ बजे सोकर उठा। उठने के मामले में कभी जल्दबाजी नहीं की। रात शानदार नींद आई।
लेह शहर में मैं जनवरी में अच्छी तरह घूम चुका था, अब घूमने की आवश्यकता नहीं थी। खारदूंगला भी जाना चाहिये था लेकिन सबसे पहली बात कि मन नहीं था, दूसरी बात मौसम खराब होने और भारी बर्फबारी की वजह से खारदूंगला का परमिट भी नहीं दिया जा रहा था। फिर लगातार समाचार आ रहे थे कि हिमाचल और उत्तराखण्ड में बारिश ने भारी तबाही मचा दी है। लद्दाख में तो खैर उतना भय नहीं है लेकिन जोजीला के बाद जम्मू तक अवश्य बारिश व्यवधान पैदा कर सकती है। अगर कोई व्यवधान हो गया तो रास्ते में पता नहीं कितने दिन रुकना पड जाये। अब जरूरी था जल्द से जल्द इस यात्रा को समाप्त करके दिल्ली पहुंचना।
लेह से श्रीनगर तक तीन दर्रे पडते हैं- फोतू-ला, नामिक-ला और जोजी-ला। इनमें फोतू-ला सबसे ऊंचा है- 4100 मीटर। सारे उतार-चढावों को ध्यान में रखते हुए सात दिन में श्रीनगर पहुंचने का कार्यक्रम इस प्रकार बनाया- लेह से ससपोल, ससपोल से लामायुरू, लामायुरू से मुलबेक, मुलबेक से कारगिल या खारबू, कारगिल या खारबू से द्रास, द्रास से सोनामार्ग और सोनामार्ग से श्रीनगर।

Friday, August 16, 2013

डायरी के पन्ने- 11

[डायरी के पन्ने हर महीने की पहली व सोलह तारीख को छपते हैं।]

1 अगस्त 2013, गुरूवार
1. डायरी के पन्ने छपे तो आशीष लाल साहब ने बडी भावपूर्ण बात कह दी- जब कोई बीमार हो जाता है तो उसे देखने जाना ही बहुत महत्वपूर्ण होता है। जो करेगा वो तो डॉक्टर करेगा। आज उत्तराखण्ड घायल है नीरज, तुझे भी उसे देखने जाना चाहिये। बात अन्दर तक प्रविष्ट हो गई। सोच लिया कि गोवा के नाम की इन छुट्टियों में उत्तराखण्ड जाऊंगा। आशीष साहब के फेसबुक पेज पर गया तो वहां जाकर एक और दुविधा में पड गया। उनके यहां दूधसागर का जबरदस्त फोटो लगा था। यह फोटो देखकर दूधसागर देखने की चाह होने लगी।
पिछले साल भी सितम्बर में गोवा व दूधसागर का कार्यक्रम बनाया था जो ऐन वक्त पर रद्द हो गया और मैं रूपकुण्ड चला गया। इस बार भी शायद ऐसा ही होगा।

Wednesday, August 14, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह

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17 जून 2013
सात बजे आंख खुली। देखा उसी कमरे में कुछ लोग और भी सोये हुए हैं। पता चला ये लेह से मनाली जा रहे थे। रात ग्यारह बजे जब उप्शी से गुजरे तो पुलिस ने रोक दिया। कहा आगे रास्ता बन्द है। मजबूरन इन्हें रातभर के लिये यहां शरण लेनी पडी। बाहर झांककर देखा तो सडक पर एक बैरियर लगा था व गाडियों की कतारें भी। लेह से दिल्ली जाने वाली बस भी यहीं खडी थी।
तंगलंग-ला पर दो दिनों से बर्फबारी हो ही रही है। मैंने भी इसे बर्फीला ही पार किया था। आज मौसम और बिगड गया होगा, तो रास्ता बन्द कर दिया। अब कहा जा रहा है कि जब तंगलंग-ला के दूसरी तरफ से कोई गाडी आ जायेगी, तभी यहां से आगे भेजा जायेगा। लेकिन मुझे एक सन्देह और भी है। यहां से रूमसे तक रास्ता बडे खतरनाक पहाडों के नीचे से होकर गुजरता है। रात बारिश हुई होगी तो थोडा बहुत भू-स्खलन हो गया होगा। उससे बचाने के लिये उप्शी में यातायात रोक रखा है। नहीं तो मीरु, ग्या, लातो व रूमसे में भी रुकने के इंतजाम हैं। वहां से तंगलंग-ला नजदीक भी है। पता नहीं कब तंगलंग-ला खुलेगा, उसके कम से कम दो घण्टे बाद कोई गाडी यहां तक पहुंचेगी, तब यहां से यातायात आगे बढेगा।

Monday, August 12, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंग-ला से उप्शी

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16 जून 2013
सात बजे आवाजें सुनकर आंख खुली। थोडे से खुले दरवाजे से बाहर निगाह गई तो बर्फ दिखाई दी। यानी रात बर्फ पडी है। मजदूरों ने बढा-चढाकर बताया कि बहुत ज्यादा बर्फ गिरी है। मैंने बाहर निकलकर देखा तो पाया कि दो इंच से ज्यादा नहीं है। तंगलंग-ला यहां से ज्यादा दूर नहीं है, इसलिये वहां भी इससे ज्यादा बर्फ की सम्भावना नहीं। पुरानी बर्फ पर चलना मुश्किल भरा होता है, फिसल जाते हैं लेकिन ताजी बर्फ पर ऐसा नहीं है। ज्यादा बर्फ नहीं है तो फिसल नहीं सकते। हां, ज्यादा बर्फ में धंसने का खतरा होता है। यहां तो दो ही इंच बर्फ थी, सडक से तो वो भी खत्म हो गई थी। आने-जाने वाली गाडियों ने उसे कुचलकर खत्म कर दिया था। यह मेरे लिये और भी अच्छा था।
साइकिल पर भी थोडी सी बर्फ थी, उसे झाडकर हटा दिया। सामान बांधा व सवा आठ बजे निकल पडा। खाने-पीने का तो सवाल ही नहीं। पानी की बोतल जरूर भर ली। मेरी एक-एक गतिविधि मजदूरों के लिये तमाशा थी। उठने से लेकर अलविदा कहने तक उनकी भावहीन आंखें मेरे चेहरे व हाथों पर ही जमी रहीं।

Friday, August 9, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंग-ला

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15 जून 2013
साढे सात बजे आंख खुली। ध्यान दिया कि तम्बू चू रहा है, वो भी कई जगहों से। कुछ बूंदें तो मेरे बिस्तर पर भी गिर रही थीं। जब तम्बू के ऊपर रेन कवर नहीं लगायेंगे, तो ऐसा ही होगा। अचानक यह सोचकर झुरझुरी दौड गई कि बारिश हो रही है।
बाहर निकला तो कुदरत बारिश से भी ज्यादा खतरनाक खेल खेल रही थी। बर्फ पड रही थी। अभी तंगलंग-ला पार करना बाकी है। यहां 4630 मीटर की ऊंचाई पर ही बर्फबारी हो रही है, तो 5300 मीटर ऊंचे तंगलंग-ला पर क्या हो रहा होगा, इसका अन्दाजा था मुझे।
बर्फबारी के बीच निकल पडूं या यहीं रुका रहूं- यह प्रश्न मन में था। मन ने कहा कि यहीं रुका रह। बर्फबारी जब बन्द हो जायेगी तो आठ किलोमीटर आगे डेबरिंग चले जाना। बाकी दूरी कल पूरी कर लेना। बर्फबारी में निकलना ठीक नहीं।

Wednesday, August 7, 2013

शो-कार (Tso Kar) झील

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शाम चार बजे शो-कार के लिये चल पडा। पहले तो मामूली सी चढाई है, उसके बाद मामूली ढलान। 16 किलोमीटर तक यही ढलान पैडल नहीं मारने देता। सिंगल सडक है और कोई आवागमन नहीं।
झील काफी दूर से ही दिखने लगती है। लेकिन नजदीकी मानव बस्ती थुक्जे गोम्पा 16 किलोमीटर दूर है। यहां से भी करीब चार किलोमीटर और आगे चलकर झील के नजदीक तक पहुंचा जा सकता है।
जब मैं थुक्जे से करीब 7-8 किलोमीटर दूर था तो दूर सामने से चार मोटरसाइकिल वाले आ रहे थे। सडक पर मामूली ढलान अवश्य है लेकिन यह पहाडी सडक नहीं है। झील क्षेत्र काफी विशाल है। पानी एक कोने में ही है, बाकी क्षेत्र विशाल मैदान है। 7-8 किलोमीटर दूर से ही थुक्जे दिख रहा था।
तो मोटरसाइकिल वाले आ रहे थे, उनसे करीब 100 मीटर दूर सडक से हटकर चार-पांच जानवर भी बडी तेजी से दौड लगा रहे थे। काफी दूरी होने से जानवर पहचान में नहीं आ रहे थे। वे मोटरसाइकिलों के साथ साथ भाग रहे थे तो जाहिर है मेरी तरफ आ रहे थे। मुझे लगा कुत्ते हैं। लद्दाखी कुत्ते कुछ बडे होते हैं। पता नहीं मुझसे क्या खता हो गई कि वे मेरी तरफ आ रहे हैं। मैं बुरी तरह डर गया।

Monday, August 5, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड

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14 जून 2013
सुबह साढे सात बजे आंख खुली। दोनों होटल संचालिकाओं ने जुले कहकर नये प्रभात की शुभकामनाएं दीं। अब मैं ‘जुले-जुले’ की धरती पर हूं। हर व्यक्ति एक दूसरे को जुले जुले कहने में लगा है। झारखण्डी मजदूर भी मौका मिलते ही जुले कहते हैं। विदेशी आते हैं भारत घूमने। हवाई अड्डे पर उतरते ही उन्हें सबसे पहले नमस्ते कहना सीखना होता है। लद्दाख में नमस्ते किसी काम का नहीं, यहां जुले का शासन है। सोचते होंगे बडा अजीब देश है, हजार किलोमीटर चले नहीं, अभिवादन का तरीका बदल गया। नमस्ते सीखा था इतनी मेहनत से, एक झटके में बेकार हो गया।
साइकिल पर जब सामान बांध रहा था तो स्पीति वाले तीर्थ यात्री मिले। उनमें से एक का नाम रणजीत सिंह है। बौद्ध नाम कुछ और है। उनके पिता पंजाबी थी, तो रणजीत नाम रख दिया। गांव में सभी रणजीत के ही नाम से जानते हैं, सभी कागज-पत्र रणजीत सिंह के हैं। बौद्ध नाम किसी को नहीं पता। पिन घाटी स्थित अपने गांव शगनम में ट्रैकिंग कराते हैं। न्यौता दिया कि कभी पिन-पार्वती पास या भाभा पास ट्रैक करना हो, तो अवश्य मिलना। भला नीचे का आदमी पिन-पार्वती या भाभा पास करने पहले शगनम क्यों जायेगा? सभी लोग मणिकर्ण या किन्नौर से ट्रैक शुरू करते हैं व मुद में खत्म करते हैं। उल्टा रिवाज कौन शुरू करना चाहेगा?

Friday, August 2, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग

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13 जून 2013
स्थान- व्हिस्की नाला। एक और नाला है ब्राण्डी नाला। कहते हैं यहां व्हिस्की व ब्राण्डी के ट्रक पलटे थे तो उन्हीं के नाम पर नाले बन गये। मुझे यह गलत लगता है। इन नामों की खोज जरूरी है। पिछले 20-25 साल से ही यह सडक अस्तित्व में है। उससे पहले पगडण्डी थी। यानी ट्रक अधिकतम 20-25 सालों से ही चल रहे हैं। अब खोज यह करनी है कि क्या पगडण्डी वाले जमाने में भी इसे व्हिस्की नाला ही कहते थे? अगर हां, तो दो ट्रक पलटने से बच जायेंगे।
सोने में कोई लापरवाही नहीं। शरीर जब भी कहे- उठ जाग मुसाफिर भोर भई, तभी उठते हैं। जबरदस्ती कभी नहीं। साढे आठ बजे आंख खुली। बाहर निकलकर देखा, बादल थे, हवा भी। क्या मानसून आ गया है? चार जून को मानसून ने केरल में दस्तक दे दी थी जब मैं दिल्ली से चला था। क्या आठ-नौ दिन में वह हिमालय भी पार कर गया? मुश्किल लग रहा है। पांच दिन पहले जब केलांग में था, तो घर पर बात की थी। मानसून उत्तर भारत में नहीं आया था। पांच दिनों में मानसून का उत्तर भारत पर छा जाना, हिमालय पर आ जाना व हिमालय भी पार कर जाना असम्भव है। नहीं, यह मानसून नहीं है। कुछ और ही मामला है।

Thursday, August 1, 2013

डायरी के पन्ने- 10

[डायरी के पन्ने हर महीने की पहली व सोलह तारीख को छपते हैं।]

16 जुलाई 2013, मंगलवार
1. ऑल इण्डिया रेडियो से एक फोन आया। वे एक पर्यटन कार्यक्रम में जयपुर के सिटी पैलेस के बारे में मुझसे बात करना चाह रहे थे। मैंने स्वीकृति दे दी तो बोले कि पांच मिनट बाद रिकार्डिंग के लिये पुनः फोन करेंगे। मैंने कहा कि मैं सिटी पैलेस गया जरूर हूं, लेकिन शहरों में घूमने की मेरी प्रवृत्ति नहीं है, इसलिये मैं अभी अचानक सिटी पैलेस के बारे में एक मिनट भी नहीं बोल सकता। मुझे इसके लिये तैयारी करनी पडेगी और आज मेरे पास इतना समय नहीं है कि तैयारी कर सकूं। बोले कि कुछ नहीं बोलना है, बस ऐसे ही कुछ भी कह देना है। मैंने कहा तो ठीक है, रिकार्ड करो- सिटी पैलेस बहुत अच्छी और सुन्दर जगह है। यह पुराने राजाओं द्वारा बनवाया गया एक बहुत बडा महल है। बस। अभी इस समय मैं इससे ज्यादा नहीं बोल सकता। मात्र एक मिनट भी बोलने का अर्थ है कम से कम आधे पेज की सामग्री पढना। हां, हिमालय या ट्रेकिंग या रेल यात्राओं के बारे में अभी का अभी आधे घण्टे तक बोलने को तैयार हूं। सखेद मना करना पडा।