Wednesday, July 31, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकी-ला से व्हिस्की नाला

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12 जून 2013
सुबह आठ बजे आंख खुली। बाहर कुछ आवाजें सुनाई पडीं। दो मोटरसाइकिलें व दो कारें रुकी थीं और यात्री हमारे टैण्ट के पास आकर फोटो खींच रहे थे। हमने टैण्ट रात बिल्कुल आपातकाल में लगाया था। पीछे 34 किलोमीटर दूर सरचू व आगे 11 किलोमीटर दूर व्हिस्की नाले पर ही आदमियों का निवास था। ऐसे सुनसान वीराने में हमारा यह टैण्ट आने-जाने वालों के लिये आकर्षण का केन्द्र था। ये लोग रोहतक के थे।
मैंने चलने से पहले गूगल मैप से रास्ते की दूरी व ऊंचाईयां नोट कर ली थीं। नकी-ला की स्थिति लिखने में भूल हो गई। मैंने लिखा- गाटा लूप (4600 मीटर) के दो किलोमीटर आगे 4740 मीटर की ऊंचाई पर नकी-ला है। इसके बाद नोट किया- नकी-ला से 19 किलोमीटर आगे 5060 मीटर की ऊंचाई पर लाचुलुंग-ला है। इस डाटा से यह पता नहीं चलता कि नकी-ला पार करने के बाद थोडी बहुत उतराई है या सीधे लाचुलुंग-ला की चढाई शुरू हो जाती है।

Monday, July 29, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकी-ला

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11 जून 2013
साढे आठ बजे आंख खुली। सचिन कभी का जग चुका था। आज बडा लम्बा रास्ता तय करना है। कम से कम पांग तक तो जाना ही पडेगा जो यहां से 78 किलोमीटर दूर है। सरचू व पांग के बीच में खाने ठहरने को कुछ नहीं। साथ ही दो दर्रे भी पार करने हैं। ज्यादातर रास्ता चढाई भरा है। और ज्यादा पूछताछ की तो पता चला कि व्हिस्की नाले पर रहने खाने को मिल जायेगा। व्हिस्की नाला यानी लगभग 50 किलोमीटर दूर। हमें आज व्हिस्की नाले तक पहुंचना भी मुश्किल लगा। इसलिये भरपेट खाना खाने के बाद आलू के छह परांठे पैक करा लिये।
दस बजे यहां से चले। कल सोचा था कि आज पूरा दिन सरचू में विश्राम करेंगे, इसलिये उठने में देर कर दी। फिर आज जब उठ गये तो चलने का मन बन गया।
सरचू हिमाचल प्रदेश में है लेकिन यहां से निकलकर जल्द ही जम्मू कश्मीर शुरू हो जाता है। जम्मू कश्मीर में भी लद्दाख। वैसे भौगोलिक रूप से लद्दाख बारालाचा-ला पार करते ही आरम्भ हो जाता है लेकिन राजनैतिक रूप से यहां से आरम्भ होता है। वास्तव मे सरचू से करीब सात-आठ किलोमीटर आगे एक पुल है- ट्विंग ट्विंग पुल, वही हिमाचल व लद्दाख की सीमा है। हालांकि कहीं जम्मू कश्मीर या लद्दाख का स्वागत बोर्ड नहीं दिखा। सरचू मनाली से 222 किलोमीटर दूर है और लेह से 252 किलोमीटर। फिर भी इसे इस मार्ग का मध्य स्थान माना जाता है। आप सरचू पहुंच गये, मानों आधी दूरी तय कर ली।

Friday, July 26, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू

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10 जून 2013
सुबह साढे पांच बजे आंख खुल गई। मेरठ से आया कुनबा जब जाने की तैयारी करने लगा तो शोर हुआ। मैं भी जग गया। तम्बू से बाहर निकला, सामने सचिन खडा था। पता चला वो भी बहुत थका है। वह कल जिस्पा में रुका था, गेमूर से 5-6 किलोमीटर आगे। एक ही दिन में 1000 मीटर चढने से उसकी भी हालत ज्यादा अच्छी नहीं थी।
यहां से सूरजताल 13 किलोमीटर व बारालाचा 16 किलोमीटर है। यानी 16 किलोमीटर तक हमें ऊपर चढना है। नाश्ता करके साढे सात बजे निकल पडे। आज 47 किलोमीटर दूर सरचू पहुंचना है।
यहां से निकलते ही चढाई शुरू हो गई, हालांकि ज्यादा तीव्र चढाई नहीं थी। सडक भी अच्छी है। कुछ आगे चलकर एक नाला पार करना पडा। इसमें काफी पानी था लेकिन ज्यादा फैला होने के कारण उतना तेज बहाव नहीं था। पार करने के बाद काफी देर तक अपने पैर ढूंढते रहे।

Wednesday, July 24, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार

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9 जून 2013
गेमूर मनाली से 133 किलोमीटर दूर है। सात बजे आंख खुली। गांव के बीचोंबीच एक नाला है, बडा तेज बहाव है। कुछ नीचे इसी के किनारे सार्वजनिक शौचालय है। नाले के पानी का कुछ हिस्सा शौचालय में भी जाता है। बडी सावधानी से गया, फिर भी बर्फीले ठण्डे पानी में पैर भीग गये।
साइकिल धूल धूसरित हो गई थी। पुनः नाले का लाभ उठाया, दस मिनट में चकाचक।
यहीं नाश्ता किया। नौ बजे निकल पडा। आज का लक्ष्य 36 किलोमीटर दूर जिंगजिंगबार है। सचिन रात पता नहीं कहां रुका था, लेकिन आज वो जिंगजिंगबार में मिलेगा।
गेमूर से जिस्पा 5 किलोमीटर दूर है। सडक अच्छी बनी है, ढलान भी है। पौन घण्टा लगा। जिस्पा में होटलों की कोई कमी नहीं है। अगर कल गेमूर में रुकने का इंतजाम न मिलता तो मैं जिस्पा ही रुकता।

Monday, July 22, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर

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8 जून 2013
साढे आठ बजे आंख खुली। और अपने आप नहीं खुल गई। सचिन ने झिंझोडा, आवाज दी, तब जाकर उठा। वो हेलमेट लगाकर जाने के लिये तैयार खडा था। मैंने उसे कल ही बता दिया था कि भरपूर नींद लूंगा, इसीलिये उसने जल्दी उठकर मुझे नहीं उठाया। मेरी आंख खुलते ही उसने मेरी योजना पूछी। मैं भला क्या योजना बनाता? कल योजना बनाई थी भरपूर सोने की और अभी मेरी नींद पूरी नहीं हुई है। पता नहीं कब पूरी हो, तुम चले जाओ। मैं उठकर जहां तक भी पहुंच सकूंगा, पहुंच जाऊंगा। आज रात भले ही केलांग या जिस्पा में रहूं लेकिन कल जिंगजिंगबार में रात गुजारूंगा। उधर सचिन का इरादा आज जिस्पा या दारचा में रुककर अगली रात जिंगजिंगबार में रुकने का था। जिंगजिंगबार बारालाचा-ला का सबसे नजदीकी मानव गतिविधि स्थान है। आज तो पता नहीं हम मिलें या न मिलें, लेकिन कल जिंगजिंगबार में अवश्य मिलेंगे।
सचिन के जाने के बाद मैं फिर सो गया। साढे ग्यारह बजे आंख खुली। असल में पिछली दो रातें स्लीपिंग बैग में गुजारी थीं, उनसे पहली रात दिल्ली से मनाली बस में और उससे भी पहले चार नाइट ड्यूटी। नाइट ड्यूटी करके दिन में कम ही सोता था व यात्रा की तैयारी करता था। यानी पिछले एक सप्ताह से मैं ढंग से सो नहीं पाया था। आज सारी कसर निकल गई।

Friday, July 19, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला

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7 जून 2013, स्थान मढी
पांच बजे आंख खुली। सोच रखा था कि आज जितनी जल्दी हो सके, निकल जाना है। बाद में रोहतांग जाने वाली गाडियों का जबरदस्त रेला हमें चलने में समस्या पैदा करेगा। फिर भी निकलते निकलते साढे छह बज गये। सचिन को साइकिल का अच्छा अभ्यास है, वो आगे निकल गया।
कुछ आगे चलकर खराब सडक मिली। इस पर कीचड ही कीचड था। जहां तक हो सका, साइकिल पर बैठकर ही चला। बाद में नीचे भी उतरना पडा और पैदल चला। पीछे से गाडियों का काफिला आगे निकलता ही जा रहा था, वे ठहरे जल्दबाज जैसे कि रोहतांग भाग जायेगा, कीचड के छींटे मुझ पर और साइकिल पर भी बहुत पडे।
मढी समुद्र तल से 3300 मीटर की ऊंचाई पर है और रोहतांग 3900 मीटर पर, दोनों की दूरी है सोलह किलोमीटर। शुरू में सडक लूप बनाकर ऊपर चढती है। जिस तरह आगे सरचू के पास गाटा लूप हैं, उसी तरह इनका भी कुछ नाम होना चाहिये था जैसे कि मढी लूप।
साढे आठ बजे चाय की गाडी मिली। यहां संकरी सडक की वजह से जाम भी लगा था। पन्द्रह मिनट बाद यहां से चल पडा।

Tuesday, July 16, 2013

डायरी के पन्ने- 9

1 जुलाई, दिन सोमवार
1. कल दैनिक जागरण के यात्रा पेज पर अपना लेख छपा- चादर ट्रेक वाला। मार्च में भेजा था, तब से प्रतीक्षा थी कि अब छपे अब छपे। पूरे पेज पर बिना कांट-छांट के छापा गया। यह थी अच्छी बात। बुरी लगने वाली बात थी कि केवल दिल्ली में ही छपा। यूपी में नहीं छपा। बाकी कहां छपा कहां नहीं, पता नहीं।
2. प्रभात खबर में 26 मई को मेरा एक यात्रा सम्बन्धी लेख छपा था। उसके ऐवज में आज 1500 रुपये का चेक और उससे भी शानदार उस पृष्ठ की एक प्रति मिली। जब कभी लेख छपा था तो मुझे देर से पता चला और मैं अखबार नहीं खरीद सका था। मेरी निराशा जब बोकारो के मित्र अमन को पता चली तो उन्होंने अपने यहां से वह पृष्ठ भेज दिया। पृष्ठ मुझ तक पहुंचता, मैं साइकिल उठाकर लद्दाख के लिये निकल चुका था। लौटने पर उन्होंने पुनः इसे भेजा। तब से प्रतीक्षा जारी थी। आज जब कोरियर आया तो सबसे पहले अमन का ही ख्याल आया कि उन्होंने भेजा होगा। लेकिन चेक देखकर यह ख्याल गडबडा गया। तुरन्त अमन को फोन करके चेक के बारे में पूछा। उन्होंने कहा कि उन्होंने तो कोई चेक नहीं भेजा। बाद में लिफाफे पर निगाह गई जहां प्रभात खबर की मोहर लगी थी तो पता चला कि यह प्रभात खबर की कारगुजारी है।

Monday, July 15, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी

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6 जून 2013, स्थान-गुलाबा
पांच बजे अलार्म बजा लेकिन उठा सात बजे। बाहर निकला तो एक गाय अभी भी टैण्ट से सटकर बैठी थी। टैण्ट पर पतला गोबर भी कर रखा था, पानी से धो दिया। सामान समेटने, बांधने व साइकिल पर चढाने में साढे आठ बज गये। जब आगे के लिये चला तो आठ बजकर पचास मिनट हो गये थे।
आज सामान बांधने में एक परिवर्तन किया। टैण्ट को हैण्डल पर बांध दिया, हैण्डल के नीचे। इसके दो फायदे हुए, एक तो पीछे वजन कम हो गया और अगले पहिये पर भी कुछ वजन आ गया। अब गड्ढों व ऊबड-खाबड रास्तों पर चलने में अगला पहिया उठेगा नहीं। पीछे कैरियर के ऊपर बैग बांधा व बराबर में डिस्क ब्रेक के कुछ ऊपर कैरियर से ही स्लीपिंग बैग लटका दिया। हवा भरने का पम्प स्लीपिंग बैग से ही बंधा था। कल कुछ दूर चलते ही सारा सामान असन्तुलित हो गया था व एक तरफ झुक गया था। अब सबकुछ सन्तुलित लग रहा है। बाकी कुछ दूर चलने पर पता चल जायेगा।

Friday, July 12, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा

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5 जून 2013
सुबह पाँच बजे बस मंड़ी पहुँची। ज्यादा देर न रुककर फिर चल पड़ी। औट के पास जलोड़ी जोत जाने वाला भोपाल से आने वाला साइकिलिस्ट उतर गया। भुंतर में सारपास वाले उतर गये। सारपास ट्रेक कसोल से शुरू होता है।
जो जाये कुल्लू, बन जाये उल्लू। कंडक्टर ने सभी सवारियाँ उतार दीं। बोला यह बस आगे नहीं जायेगी। दूसरी बस में बैठा दिया। मुझे कोई परेशानी नहीं थी, लेकिन एक बस से साइकिल उतारकर दूसरी बस पर चढ़ाना श्रमसाध्य कार्य था।
आठ बजे मनाली पहुँचे। अच्छी धूप, अच्छा मौसम, सैलानियों की भीड़। साथ ही होटल वालों की भी। बस से उतरा नहीं कि होटल वालों ने घेर लिया।
साइकिल का पहले निरीक्षण किया। फिर सारा सामान बांध दिया। बांधने के लिये पर्याप्त सुतली लाया था। पीछे कैरियर पर ही बांधा - बैग भी, टैंट भी और स्लीपिंग बैग भी। यह बड़ा पेचीदा काम था और किसी आपातकाल में आसानी से खोला भी नहीं जा सकता था। इसका बाद में नुकसान भी उठाना पड़ा।
कपड़े वही पहने रखे, जो दिल्ली से पहनकर आया था, हाफ़ पैंट व टी-शर्ट। मनाली लगभग 2000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। अच्छी धूप निकली होने के कारण ठंड़ का नामोनिशान तक नहीं था।
परसों साइकिल के दोनों धुरों में तेल डाला था। यह तेल बाहर बह गया और डिस्क पर फैल गया। दोनों पहियों में यही हुआ। ब्रेक लगने बंद। किसी तरह डिस्क की सफ़ाई की, तो ब्रेक थोड़े-थोड़े लगने लगे। अभी भी यही हाल था। ब्रेक अच्छी तरह नहीं लग रहे थे। कामचलाऊ थे। हालाँकि आज चढ़ाई भरा रास्ता है, ब्रेक की यदा कदा ही आवश्यकता पड़ेगी, लेकिन कल इसकी सफ़ाई सूक्ष्मता से करनी पड़ेगी क्योंकि कल मैं रोहतांग पार कर लूँगा।
ब्यास पार की और साइकिल यात्रा की विधिवत शुरूआत कर दी। करीब चार किलोमीटर बाद जब भूख बहुत लगने लगी तो चाय आमलेट खाये गये।
9 किलोमीटर दूर पलचान है - बारह बजे पहुँचा यानी तीन किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड़ से। आज इरादा था मढ़ी जाकर रुकने का। मढ़ी मनाली से 34 किलोमीटर दूर है। यानी अगर इसी स्पीड़ से चलता रहा तो ग्यारह घंटे लगेंगे, यानी रात आठ बजे के बाद ही पहुँचूंगा। अंधेरे में मैं चलना पसंद नहीं करता, इसलिय मढ़ी पहुँचना मुश्किल लगने लगा।
तरुण गोयल से बात हुई। वे हिमाचल के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने बताया कि मढ़ी में कुछ भी खाने को नहीं मिलेगा। पहले मिल जाता था, लेकिन उच्च न्यायालय के आदेश के बाद अब नहीं मिलता। यह मेरे लिये बुरी ख़बर थी।
पलचान में चाऊमीन खाई। यहाँ गोयल साहब के कथन की पुष्टि हो गयी। लेकिन एक राहत की बात पता चली कि मढ़ी में शाम पाँच बजे तक ही मिलेगा, उसके बाद नहीं। मैं पाँच बजे से पहले किसी भी हालत में मढ़ी नहीं पहुँच सकता था, इसलिये यह राहत वाली बात मेरे किसी काम की नहीं थी।
पलचान से सोलांग जाने वाली सड़क अलग हो जाती है। रोहतांग के साथ-साथ सोलांग भी अत्यधिक भीड़ वाली जगह है। इसी वजह से इस तिराहे पर जाम लग जाता है।
पलचान से चार किलोमीटर आगे कोठी है। दो बजे पहुँचा। अब इतना तो पक्का हो ही गया है कि कोठी से आगे कुछ भी खाने को मिलने वाला नहीं। आलू के दो पराँठे पैक करा लिये। पौने तीन बजे यहाँ से चल पड़ा। आठ बजे तक मढ़ी पहुँचने का पक्का इरादा है।
रोहतांग से गाड़ियों का रेला वापस लौटने लगा। सिंगल सड़क, चढ़ाई, साइकिल की न्यूनतम गति व इस रेले ने परेशान किये रखा। चूँकि सभी गाड़ियाँ नीचे उतर रही थीं, इसलिये गोली की रफ़्तार से चल रही थीं।
कैरियर पर जो सारा सामान बांध दिया था, वो एक तरफ़ झुक गया। एक बार गाड़ियों की वजह से सड़क से नीचे उतरना पड़ गया, नीचे रास्ता बड़ा ऊबड़-खाबड़ था, साइकिल का अगला पहिया ऊपर उठ गया। एक तो पहले से ही रास्ता चढ़ाई वाला था, पिछले पहिये के मुकाबले अगला पहिया कुछ ऊपर था। फिर पिछले पहिये के ऊपर ही सारा सामान, बीस किलो से कम नहीं होगा। अगला पहिया भार-रहित था, ऊपर उठने के लिये पूरी तरह स्वतंत्र। यहाँ सोचा कि आगे रास्ता इससे भी ख़राब मिलने वाला है, तब कैसे होगा? अवश्य कुछ न कुछ करना पड़ेगा। अगले पहिये के ऊपर भी भार डालना पड़ेगा। लेकिन अगले पहिये पर तो मड़गार्ड़ तक नहीं है, सामान बांधना टेढ़ी खीर होगा।
उच्च हिमालय की एक बड़ी बुरी आदत है - दोपहर बाद बादल और शाम तक बारिश। बहुत बुरी आदत है यह, चूकता भी नहीं है कभी। साढ़े चार बजते-बजते बूंदाबांदी होने लगी। ऊपर मुँह उठाकर चारों तरफ़ देखा - काले-काले बादल। यानी भयंकर बारिश होने वाली है।
पाँच बजे तक गुलाबा पहुँच गया। अभी भी मढी 13 किलोमीटर दूर है। ख़राब मौसम को देखते हुए यहीं रुकने का फैसला कर लिया। यहाँ सीमा सड़क संगठन यानी बी.आर.ओ. का पड़ाव है। बी.आर.ओ. वालों से रुकने की बात की, उन्होंने मना कर दिया। टैंट लगाने का इरादा बना तो मूसलाधार बारिश होने लगी। मज़बूरन बी.आर.ओ. वालों के यहीं बारिश बंद होने तक रुके रहना पड़ा। गुलाबा में भी पहले रुकने व खाने-पीने का इंतज़ाम होता था, लेकिन उच्च न्यायालय के आदेश के बाद सब हट गये।
इसी दौरान तीन जने भीगते हुए आये। भले मानुसों ने - बी.आर.ओ. वालों ने - हमारे लिये चाय बना दी। ये लोग मोटरसाइकिलों पर थे और रोहतांग से लौट रहे थे। बारिश होने लगी तो यहाँ सिर बचाने को रुक गये। कम होने पर चले गये। साथ ही मेरी टोपी भी ले गये। मैंने अभी तक हेलमेट नहीं लगाया था, टोपी से ही काम चला रहा था। बूंदाबांदी में सिर बचाने को उन्होंने टोपी लेने की इच्छा ज़ाहिर की, मैंने सहर्ष दे दी। वे हालाँकि मोटरसाइकिलों पर थे, लेकिन एक के पास हेलमेट नहीं था। या फिर शर्म आ रही होगी उसे हेलमेट लगाते हुए।
मैंने बी.आर.ओ. वालों से रुकने के लिये फिर प्रार्थना की - खाने पीने को नहीं माँगूंगा व ओढ़ने-बिछाने को भी नहीं। उन्होंने अपनी मज़बूरी बताते हुए कहा कि हम साहब की आज्ञा के बिना आपको नहीं ठहरा सकते। साहब नीचे गये हैं, पता नहीं कब तक लौटेंगे। तो मुझे मज़दूरों के यहाँ ठहरा दो। वे मज़दूरों की झौंपड़ियों में गये, लेकिन उन्होंने भी मना कर दिया। ज्यादातर मज़दूर झारखंड़ी थे, मेरे हिमालय के होते तो मना नहीं करते।
अब टैंट लगाने के सिवा कोई चारा नहीं था। बारिश बंद होने पर कुछ ऊपर जाकर टैंट लगा भी दिया। टैंट लगा ही रहा था कि जंगल में से एक मज़दूर मेरे पास आया। उसने रोंगटे खड़े कर देने वाली सूचना दी - उधर जंगल में मत जाना। वहाँ जंगली कुत्ते हैं। कल वे एक बच्चे को खा रहे थे। किसके बच्चे को? पता नहीं। पहले तो हम सोचते थे कि बच्चे को भालू उठाकर ले गया होगा, लेकिन यह तो जंगली कुत्तों का काम निकला।
बच्चे के प्रति सहानुभूति तो जगी ही, लेकिन उससे भी ज्यादा जंगली कुत्तों व भालुओं का डर लगने लगा।
अंधेरा हो गया। नीचे आदमियों के बोलने की आवाजें भी मद्धम होने लगीं, उधर मेरा भी डर बढता रहा। तभी टैंट के बाहर बराबर में कुछ सरसराने की आवाज़ हुई। पक्के तौर पर यह कोई जानवर ही था। कुछ देर बाद उसने टैंट को सूंघा व शरीर भी रगड़ा। उसकी साँसें भी मुझे सुनायी दे रही थीं। मैं इतना डर गया कि काटो तो खून नहीं। यह भालू है और थोड़ी देर में टैंट को फाड़ देगा। बाहर झाँककर देखने की तो हिम्मत ही ख़त्म।
कुछ देर बाद पत्थर पर किसी चीज के टकराने की आवाज आयी। आधा डर तुरंत दूर हो गया। यह अपनी जानी पहचानी आवाज थी - खुर की आवाज। भालू के पंजे होते हैं, इसलिये वे ऐसी आवाज नहीं कर सकते। हिम्मत करके टैंट की चेन खोली। सिर बाहर निकाला। कुछ दूर कोई खड़ा था। टॉर्च की रोशनी मारी तो सारा डर खत्म। पाँच गायें थीं। इसके बाद तो उन्होंने टैंट के खूब चक्कर काटे। घास चरी, बाहर पड़ी साइकिल पर भी चढ़ीं। कोई डर नहीं लगा, इत्मीनान से सोया।
आज 21 किलोमीटर साइकिल चलाई। आज साइकिल चलाकर मैंने एक गलती भी की। आज ही दिल्ली से आया था। और आज ही साइकिल भी उठा ली। एक दिन मनाली में रुकना चाहिये था। शरीर आबोहवा के अनुकूल हो जाता।


मनाली में यह दृश्य आम है।

मनाली से दूरियां

मनाली से एक किलोमीटर आगे


अपने सफर के साथी

ओहो! पलट गई। पहले फोटो खींचेंगे, बाद में सीधा करेंगे।

सोलांग मोड पर लगा जाम

और सोलांग मोड पर पडी अपनी साइकिल

रोहतांग की ओर

कोठी

बीआरओ के ये नारे बडे कीमती हैं।



हेलमेट आवश्यक है- चाहे साइकिल हो या कोई और दुपहिया वाहन- चाहे पुलिस वाला हो या न हो। जिन्दगी तो अपनी ही है।


गुलाबा में अपना टैण्ट

...
इस यात्रा के अनुभवों पर आधारित मेरी एक किताब प्रकाशित हुई है - ‘पैडल पैडल’। आपको इस यात्रा का संपूर्ण और रोचक वृत्तांत इस किताब में ही पढ़ने को मिलेगा।
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अगला भाग: लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकीला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकीला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

Wednesday, July 10, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान

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4 जून 2013
साइकिल उठाने का पक्का निश्चय कर रखा था। सोच लिया था कि लद्दाख जाऊँगा, वो भी श्रीनगर के रास्ते। मनाली के रास्ते वापसी का विचार था। सारी तैयारियाँ श्रीनगर के हिसाब से हो रही थीं। सबकुछ तय था कि कब-कब कहाँ-कहाँ पहुँचना है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों व हिमालय पार में साइकिल चलाने का कोई अनुभव नहीं था, तो इस गणना की कोई महत्ता नहीं रह गयी थी। जैसे कि साइकिल यात्रा के पहले ही दिन श्रीनगर से सोनमर्ग जाने की योजना थी। यह दूरी 85 किलोमीटर है और लगातार चढ़ाई है। नहीं कह सकता था कि ऐसा कर सकूँगा, फिर भी योजना बनी।
दिल्ली से सीधे श्रीनगर के लिये दोपहर एक बजे बस चलती है। यह अगले दिन दोपहर बाद दो बजे श्रीनगर पहुँच जाती है। इस बस की छत पर रेलिंग नहीं लगी होती, इसलिये साइकिल खोलकर एक बोरे में बांधकर ले जाना तय हुआ।
दूसरा विकल्प था जम्मू तक ट्रेन से, उसके बाद बस या जीप। दिल्ली से जम्मू के लिये सुबह मालवा एक्सप्रेस निकलती है। इसका समय नई दिल्ली से साढ़े पाँच बजे है। कभी-कभी लेट भी हो जाती है। बस यात्रा की बजाय ट्रेन यात्रा ज्यादा सुविधाजनक है, इसलिये मेरा मन ट्रेन से भी जाने का था।
इस यात्रा की तैयारियाँ काफ़ी दिन पहले से शुरू हो गयी थीं। लेकिन आलसी जीव कैसी तैयारियाँ करते हैं, पता तो होगा ही। नतीज़ा यह हुआ कि तीन तारीख़ की शाम तक भी पूरी तैयारियाँ नहीं हो पायीं। रात ड्यूटी चला गया। जब मालवा एक्सप्रेस दिल्ली से निकली, तब भी बैग खाली ही था। घर आया, सो गया। आँख खुली ग्यारह बजे। जब बैग आधा ही भरा था, तो श्रीनगर वाली बस भी चली गयी। अब पहले पहल इरादा बना मनाली से यात्रा शुरू करने का। हिमाचल परिवहन की बसों की समय सारणी ऑनलाइन उपलब्ध रहती है। शाम चार चालीस वाली बस पसंद आ गयी।
अब पैकिंग का काम युद्धस्तर पर शुरू हुआ। सबसे पहले कपड़े - बाइस दिनों के लिये तीन जोड़ी - दो जोड़ी बैग में व एक जोड़ी पहन लिये। शून्य से कम तापमान का भी सामना करना पड़ेगा, पर्याप्त गरम कपड़े भी ले लिये। कपड़ों से ही बैग भर गया। इनके अलावा मंकी कैप, तौलिया, दस्ताने, जुराबें भी ले लिये। ऐसी यात्राओं पर मैं काजू, किशमिश, बादाम हमेशा रखता ही हूँ, वे भी ले लिये। मोबाइल, कैमरे चार्जर सहित व एक-एक अतिरिक्त बैटरी और मेमोरी कार्ड भी। दवाईयाँ कभी नहीं रखता, इस बार भी नहीं रखीं। हालाँकि रख लेनी चाहिये।
सवा चार बजे शास्त्री पार्क से चल पड़ा। लोहे के पुल से होता हुआ दस मिनट में कश्मीरी गेट। मनाली वाली बस तैयार खड़ी थी। साढ़े पाँच सौ का मेरा टिकट व पौने तीन सौ का साइकिल का टिकट। छत पर बांध दी।
कुछ लड़के और मिले। इनमें से ज्यादातर यूथ हॉस्टल के सारपास ट्रेक में हिस्सा लेने जा रहे थे। एक लड़का यूथ हॉस्टल की ही तरफ़ से तीर्थन घाटी में जलोड़ी जोत तक साइकिलिंग करने वाला था। गौरतलब है कि यूथ हॉस्टल के कार्यक्रमों में ज्यादातर पहली बार वाले यानी सिखदड़ होते हैं। साइकिल छत पर रखते ही उन्होंने पूछताछ शुरू कर दी। मैं किस मिट्टी का बना हूँ, रूपकुंड़ का नाम लेते ही उन्होंने जान लिया।
बस में बोरियत नहीं हुई। इसका एक कारण था, बगल वाली खाली सीट। दूसरा कारण था, सामने वाली सीट की पर्याप्त दूरी। खूब पैर फैलाकर व चौड़ा होकर बैठा रहा। हालाँकि चंड़ीगढ़ जाकर पूरी बस भर गयी। रात ग्यारह बजे चंड़ीगढ़ से चल पड़े।

साइकिल में पंक्चर लगाने का अभ्यास

महायात्रा के लिये प्रस्थान

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इस यात्रा के अनुभवों पर आधारित मेरी एक किताब प्रकाशित हुई है - ‘पैडल पैडल’ आपको इस यात्रा का संपूर्ण और रोचक वृत्तांत इस किताब में ही पढ़ने को मिलेगा।
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अगला भाग: लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकीला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकीला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

Monday, July 8, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा का आगाज़

दृश्य एक: ‘‘हेलो, यू आर फ्रॉम?” “दिल्ली।” “व्हेयर आर यू गोइंग?” “लद्दाख।” “ओ माई गॉड़! बाइ साइकिल?”
“मैं बहुत अच्छी हिंदी बोल सकता हूँ। अगर आप भी हिंदी में बोल सकते हैं तो मुझसे हिन्दी में बात कीजिये। अगर आप हिंदी नहीं बोल सकते तो क्षमा कीजिये, मैं आपकी भाषा नहीं समझ सकता।”
यह रोहतांग घूमने जा रहे कुछ आश्चर्यचकित पर्यटकों से बातचीत का अंश है।

दृश्य दो: “भाई, रुकना जरा। हमें बड़े जोर की प्यास लगी है। यहाँ बर्फ़ तो बहुत है, लेकिन पानी नहीं है। अपनी परेशानी तो देखी जाये लेकिन बच्चों की परेशानी नहीं देखी जाती। तुम्हारे पास अगर पानी हो तो प्लीज़ दे दो। बस, एक-एक घूँट ही पीयेंगे।” “हाँ, मेरे पास एक बोतल पानी है। आप पूरी बोतल खाली कर दो। एक घूँट का कोई चक्कर नहीं है। आगे मुझे नीचे ही उतरना है, बहुत पानी मिलेगा रास्ते में। दस मिनट बाद ही दोबारा भर लूँगा।”
यह रोहतांग पर बर्फ़ में मस्ती कर रहे एक बड़े-से परिवार से बातचीत के अंश हैं।