Wednesday, February 27, 2013

लेह में परेड और युद्ध संग्रहालय

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आज मुझे खारदुंगला जाना था। कोई और दिन होता तो मैं नौ दस बजे सोकर उठता लेकिन आज सात बजे ही उठ गया। आज का पूरा दिन खारदुंगला को समर्पित था। सोच रखा था कि हर हाल में वहां तक जाना है और टैक्सी भी नहीं करनी है। बस मिलेगी तो ठीक है, नहीं तो कुछ आगे जाकर किसी ट्रक में बैठ जाऊंगा। ट्रक इस सडक पर चलते रहते हैं। परमिट था ही मेरे पास।
आज परेड मैदान पर गणतन्त्र दिवस परेड का रिहर्सल भी होना था। मेरे सीआरपीएफ वाले सभी साथी परेड के लिये तैयार हो रहे थे। विकास ने विशेष प्रार्थना की कि लेह में गणतन्त्र दिवस देखने को तो नहीं मिलेगा, लेकिन रिहर्सल जरूर देखना। रिहर्सल दस बजे के बाद होना था। मैंने ग्यारह बजे तक लेह में रुकने में आपत्ति की कि जल्दी से जल्दी खारदुंगला जाना है, लेकिन विकास ने अपने कुछ तर्क लगाकर मुझे रुकने पर बाध्य कर दिया।
कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें हम अपना सबकुछ समर्पित कर सकते हैं। हमारे जीवन निर्माण में इन लोगों का बहुत बडा हाथ होता है। लेकिन जब ये ही लोग हम पर अविश्वास करने लगते हैं तो बडा दुख होता है। इसी तरह का एक दुख मुझ पर भी आ पडा। जिन्हें मैं अपना सबकुछ समर्पित कर रहा हूं, उनके लिये कुछ भी कर सकता हूं, वही मुझ पर अविश्वास करने लगे। एक मित्र ने फोन करके मुझे सारी बात बताई। इस वाकये को कभी उपयुक्त समय आने पर विस्तार से बताऊंगा।
इसका नतीजा यह हुआ कि मन बहुत भारी हो गया। कहां तो खारदूंगला जाने की उत्सुकता और खुशी थी, कहां अब सब उदासी में परिवर्तित हो गया। खारदूंगला जाने की अब कोई खुशी नहीं बची।
परेड मैदान पहुंचा। चारों तरफ काफी दर्शक थे। धूप होने के बावजूद भी ठण्ड चरम पर थी। हाथों से दस्ताने नहीं उतारे जा सकते थे।
परेड में स्कूली बच्चे, स्काउट, गाइड, एनसीसी कैडेट, राज्य पुलिस, आईटीबीपी, सीआरपीएफ, बीएसएफ, सेना के अलावा लामा भी थे। सभी का अनुशासित तरीके से पैदल मार्च अच्छा लगा। सलामी के लिये शायद कमिश्नर आये हुए थे। कौन सा दूर से आना था! जिला कमिश्नर कार्यालय के सामने ही परेड मैदान है।
परेड खत्म होने तक ग्यारह बज चुके थे। मैं वैसे तो अभी भी खारदूंगला जा सकता था लेकिन मन बेहद उदास था। इच्छा थी कि कहीं एकान्त में धूप में दो तीन घण्टे बैठा रहूं। इसके लिये पिटुक गोनपा एक उपयुक्त स्थान था। पिटुक को अंग्रेजी में स्पिटुक (Spituk) कहते हैं। टैक्सी स्टैंड से एयरपोर्ट की तरफ जाने वाली टैक्सी पकडी और पिटुक के लिये चल दिया।
संयोग से यह वही टैक्सी थी जिससे मैं कुछ दिन पहले चिलिंग गया था। ड्राइवर इब्राहिम था। हालचाल के अलावा हममें कोई और बात नहीं हुई। गौरतलब है कि तब चिलिंग पहुंचने पर उसने मुझसे चौबीस सौ रुपये मांगे थे लेकिन मैंने बारह सौ में ही उसे चलता कर दिया था।
एयरपोर्ट से कुछ आगे कैंटीन है। ड्राइवर ने यही से टैक्सी वापस मोड ली कि आगे नहीं जाऊंगा। मैं पैदल चल पडा। करीब एक किलोमीटर आगे युद्ध संग्रहालय है। प्रवेश शुल्क दस रुपये है और फोटो खींचने का शुल्क पचास रुपये। मैंने साठ रुपये देकर पर्ची ले ली।
दो कमरों में लद्दाख के बारे में काफी जानकारी थी। लद्दाख की विभिन्न जातियों की वेशभूषा, जंगली जानवर, पेड पौधे, विभिन्न मोनेस्ट्री- यथा हेमिस, फ्यांग, ठिक्से, लिकिर, लामायुरु, पिटुक आदि के बारे में सामान्य जानकारी दी गई थी।
बाकी के हिस्से में लद्दाख के इतिहास, सैनिक जानकारी, हथियार आदि का काफी अच्छा संग्रह है। कारगिल युद्ध के समय प्रसिद्ध हुई चोटियों जैसे तोलोलिंग, टाइगर हिल आदि की भौगोलिक स्थिति दर्शाता नक्शा भी है।
सियाचिन गैलरी में सियाचिन ग्लेशियर से सम्बन्धित हर जानकारी है। इसमें सैनिकों की वेशभूषा, खानपान, रहन सहन, मानचित्र, उपकरण और चित्र संग्रह है।
युद्ध और गश्त के दौरान पाकिस्तानी सेना से मुठभेड होती रहती है। इसमें पाकिस्तानियों की डायरी और पत्र आदि भी मिलते हैं। अल्लाह से एक प्रार्थना भी की गई है-
“बिस्मिल्लाह रहमाने रहीम
दुआये दुश्मन के मिसाइल, रॉकेट, बम्ब, गोला और हर किस्म के हथियार को रफासुत हाफिज रहे।
या अल्लाह ताला बलाल ओ पी में 100 साल के लिये दुश्मन के हथियार से हाफिज रखें, आमीन।
या अल्लाह मदद... या अल्लाह मदद... या अल्लाह मदद... या अल्लाह मदद...
या अल्ला ताला खैर करे...
या वक्त के इमाम नूरे मौला साये करम सौ साल के लिये बलाल ओ पी में हर दुश्मन के हथियार से हाफिज रखे।
या अल्लाह ताला हम सब तेरे निगाह में हैं हमें अपना अपना मिले।
बलाल ओ पी दुश्मन के हर हथियार से हमें हाफिज रखे, आमीन सुम्मा अली।”
बलाल ओपी एक सैनिक बस्ती है।
इनके अलावा जो सबसे महत्वपूर्ण जानकारी है, वो है जनरल जोरावर सिंह के लद्दाख अभियानों का विस्तृत विवरण। कश्मीर के राजा गुलाब सिंह की सेना में जोरावर सिंह थे। सन 1835 के आरम्भ मे जोरावर सिंह ने पहला लद्दाखी अभियान किया। यह अभियान श्रीनगर, कारगिल के रास्ते किया गया था। इसी साल नवम्बर में दूसरा अभियान किया गया जो किश्तवाड से जांस्कर के रास्ते किया गया। इसी रास्ते नवम्बर 1837 और मई 1839 में जोरावर सिंह तीसरी और चौथी बार लद्दाख जा धमका। तभी से लद्दाख भारत का अंग हो गया।
पूर्वी लद्दाख में 1962 में चीनी आक्रमण का काफी वर्णन भी यहां है। पता चला कि जिस तरह नेफा में चीनी सेना गुवाहाटी तक पहुंच गई थी, ऐसा लद्दाख में नहीं हुआ। फिर भी चीन काफी बडे भारतीय भू-भाग पर कब्जा करने में सफल हो गया।
संग्रहालय से निकलकर मैं पिटुक के लिये चल पडा।

जेल की बैरक में

विकास- परेड के लिये तैयार

परेड स्थल

परेड स्थल

निरीक्षण





दूर शान्ति स्तूप दिख रहा है।

संग्रहालय में लद्दाख की एक जाति की वेशभूषा- यह जाति धा और हनु गांवों में रहती है। यह शुद्ध आर्य रक्त वाली जाति है।


सियाचिन में तैनात सैनिकों की वेशभूषा





एक पाकिस्तानी सैनिक की पे बुक और पहचान पत्र

एक पाकिस्तानी द्वारा अल्लाह से की गई सलामती की प्रार्थना



शक्तिशाली जाट


संग्रहालय का प्रवेश द्वार




अगला भाग: पिटुक गोनपा (स्पिटुक गोनपा)

लद्दाख यात्रा श्रंखला
1. पहली हवाई यात्रा- दिल्ली से लेह
2. लद्दाख यात्रा- लेह आगमन
3. लद्दाख यात्रा- सिन्धु दर्शन व चिलिंग को प्रस्थान
4. जांस्कर घाटी में बर्फबारी
5. चादर ट्रेक- गुफा में एक रात
6. चिलिंग से वापसी और लेह भ्रमण
7. लेह पैलेस और शान्ति स्तूप
8. खारदुंगला का परमिट और शे गोनपा
9. लेह में परेड और युद्ध संग्रहालय
10. पिटुक गोनपा (स्पिटुक गोनपा)
11. लेह से दिल्ली हवाई यात्रा

10 comments:

  1. खारदूंगला जाना हर किसी की किस्मत में नहीं होता। हम भी 10-15 किमी की जोरदार बर्फ़ में अपनी इच्छाशक्ति क एबल पर सब कुछ झेलते हुए जा पाये थे।
    चलिये अच्छा हुआ विकास के पास रुकने के कारण उसकी बात मान ली। इस यात्रा में नीरज को कई बार अपनी इच्छा के विपरीत बाते झेलनी पड़ी। होता है समय हमेशा एक सा नहीं होता।
    यहाँ का संग्रहालय भी अच्छा लगा, लेकिन कारगिल के संग्रहालय में लड़ाई के फ़ोटो देखकर माहौल अलग होने लगने लगता है।

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  2. बहुत बढ़िया नीरज भाई...

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  3. गर्व से सीना चौड़ा करते चित्र

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  4. जय जवान जय किसान, वन्देमातरम...

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  5. कमाल की यात्रा और बेमिसाल वर्णन व चित्र

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  6. बहुत ही बढ़िया चित्र ....वहाँ की परेड और वेशभूषा देखते ही बनती है ....बर्फ के पहाड़ मन मोह रहे है ...संग्राहलय के चित्र और वहाँ की हर चीज़ लाजबाब ...

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  7. भाई शब्द नहीं हैं इन चित्रों की तारीफ़ के लिए. आपको साधुवाद !!

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  8. बहुत बढ़िया लाजबाब

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