Friday, November 16, 2012

जयपुर- चूरू मीटर गेज ट्रेन यात्रा

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शेखावाटी में आज के समय (2012) में एक ही रूट पर मीटर गेज चलती है- जयपुर से चूरू के बीच। एक समय ऐसा हुआ करता था कि शेखावाटी के लोगों को पता भी नहीं था कि भारत में कहीं बडी ट्रेन भी चलती है। उनकी सबसे नजदीकी ब्रॉड गेज दिल्ली में हुआ करती थी।
पिछले दिनों शेखावाटी में अचानक दो लाइनें बन्द हो गईं। पहली रतनगढ- सरदारशहर और दूसरी लोहारू- सीकर। इनमें से दूसरी वाली पर मैंने यात्रा कर रखी थी, सरदारशहर वाली पर नहीं की थी। इनके बन्द होते ही मुझे डर लगने लगा कि कहीं जयपुर-चूरू भी बन्द ना हो जाये। यह लाइन बन्द हो, इससे पहले ही इस पर यात्रा कर लेनी चाहिये। इसी सिलसिले में आज मैं जयपुर में हूं।
यात्रा शुरू होती है नींदर बेनाड स्टेशन से। असल में कल रात मैं दस बजे जयपुर पहुंचा। अपने एक मित्र विधान उपाध्याय जयपुर के ही रहने वाले हैं और नींदर बेनाड के पास उनका घर है। रात उनके यहां चला गया। सुबह छह बजे तक आंख खुल जाये, यही बहुत बडा काम है। इसलिये तय हुआ सवा छह बजे तक नींदर बेनाड स्टेशन पहुंच जाना है। पन्द्रह किलोमीटर पीछे जयपुर जाकर वहां से यात्रा शुरू करनी चाहिये थी, लेकिन इतना भी काफी है।
बीच में ढहर का बालाजी स्टेशन पडता है। वो छूट गया यानी ढहर का बालाजी ढेर।
विधान ने बताया कि नींदर बेनाड का मतलब है निः+धड और बे+नाड। नाड कहते हैं गर्दन को। अब कहानी बिना धड और बिना गर्दन वाली है तो आगे कुछ भी जोडा जा सकता है।
अगर मैं भारत के इस अर्धमरुस्थलीय भाग में यात्रा न करता तो ट्रेन के सबसे पीछे वाले डिब्बे में बैठता। लेकिन अब धूल से बचने के लिये अगले डिब्बों में बैठना पडेगा। मैं अक्सर बीच वाले डिब्बों में बैठना पसन्द नहीं करता क्योंकि बीच वाले डिब्बों में यात्रियों का घनत्व सबसे ज्यादा होता है।
नींदर बेनाड के बाद भट्टों की गली, चौमूं सामौद, लोहरवाडा, गोविन्दगढ मलिकपुर, छोटा गुढा स्टेशन हैं और इनके बाद आता है रींगस जंक्शन। रींगस में बडी लाइन को पार करती हुई यह छोटी लाइन आगे चल पडती है। बडी लाइन रेवाडी को फुलेरा से जोडती है। सुबह विधान के यहां से एक कप चाय पीकर चला था, रींगस में कचौडियां खाई गईं।

Wednesday, November 14, 2012

दिल्ली- जयपुर डबल डेकर ट्रेन यात्रा

एक दिन अचानक नजर में आया कि लोहारू- सीकर मीटर गेज लाइन बन्द हो गई है। उसे बडी लाइन में बदला जायेगा और कुछ महीनों बाद वो भारत के मुख्य रेल नेटवर्क से जुड जायेगी। हालांकि हर बन्द होती छोटी लाइन के बारे में जानकर दुख तो होता है लेकिन ऐसा तो होना ही है। कब तक और क्यों दुखी हों? मेरे एक मित्र हैं- अभिषेक कश्यप जिनके बारे में मैंने सबसे पहले जाना कि वे ‘रेल-फैन’ हैं। यानी रेलों के जबरदस्त फैन। लेकिन उनका शौक केवल छोटी लाइनों तक ही है, बडी लाइनों के फैन हैं या नहीं लेकिन गेज परिवर्तन के जबरदस्त विरोधी। जी भरकर कोसते हैं वे रेलवे के गेज परिवर्तकों को।
खैर, हमारा स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि हम किसी भी तरह के परिवर्तन को स्वीकार करने में झिझकते हैं, जबकि हमें इसे स्वीकार करना चाहिये। बल्कि जिन्दगी में खुद भी परिवर्तित होते रहना चाहिये।
तो जी, राजस्थान में कुछ समय पहले तक मीटर गेज ही हुआ करती थी, अब सब खत्म होती जा रही हैं। गिनी चुनी मीटर गेज ही बची हुई हैं, इनमें से भी ज्यादातर पर मैंने यात्रा कर रखी है। लोहारू- सीकर लाइन के बन्द होते ही मुझे चिन्ता सताने लगी जयपुर- चुरू लाइन की। मैंने लोहारू- सीकर लाइन पर तो यात्रा कर रखी है लेकिन जयपुर- सीकर- चुरू अभी भी मुझसे अछूती है। कोशिशें होने लगीं बन्द होने से पहले शेखावाटी की इस आखिरी बची छोटी लाइन पर यात्रा करने की।
पिछले हफ्ते यानी 31 अक्टूबर को योजना फाइनल हो गई। हां, सुबह छह बजे ट्रेन जयपुर से चलकर दोपहर तक चुरू पहुंच जाती है। उसके बाद चुरू से एक पैसेंजर ट्रेन बीकानेर के लिये चलती है। मैंने इस बीकानेर वाली बडी लाइन पर भी यात्रा नहीं की है, इसलिये लगे हाथों इसे भी भुनाने का निर्णय कर लिया। शाम तक बीकानेर जाऊंगा। आधी रात के आसपास वहां से दिल्ली के लिये ट्रेन है, उससे वापसी का आरक्षण करा लिया।
तो जब 30 अक्टूबर को दिल्ली से चलने लगा तो करण का सन्देश आया कि साइकिल से कहीं चलना है। बिना सोचे समझे ऋषिकेश फाइनल हो गया। मीटर गेज यात्रा फिर से कैंसिल हो गई।
अगले हफ्ते फिर, यानी 6 नवम्बर को। नाइट ड्यूटी के कारण छह को पूरे दिन खाली, सात की साप्ताहिक छुट्टी- हमेशा की तरह दो दिन हाथ में। फिर से मीटर गेज की सम्भावना लेकिन कोई रिजर्वेशन नहीं। दिन भर में किसी भी ट्रेन में बैठकर शाम तक आराम से जयपुर जाया जा सकता है, रिजर्वेशन की कोई जरुरत भी नहीं लेकिन बीकानेर से दिल्ली वापस आने के लिये रात भर का रिजर्वेशन जरूरी है। उसी पिछले सप्ताह वाली ट्रेन से करा लिया।

Monday, November 12, 2012

नीलकंठ से हरिद्वार साइकिल यात्रा

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नीलकंठ से अब बारी थी वापस आने की। दोपहर बाद ढाई बजे के आसपास नीलकंठ से वापस चल दिये। बड़ी जबरदस्त तलब लगी है वापस चलने की क्योंकि अब सारे रास्ते नीचे ही उतरना है। ऋषिकेश से यहाँ आने में जो बुरी हालत हुई, अब हालत उसके बिल्कुल विपरीत होने वाली है। पैड़ल की जगह ब्रेक पर ध्यान लगाना पड़ेगा।
नीलकंठ से निकलते ही ढलान शुरू हो गयी। पाँच किलोमीटर तक बड़ी जबरदस्त ढलान है। दो सौ मीटर नीचे पहुँच जाते हैं हम इस दूरी में। एक बात बड़ी अच्छी है कि सड़क बिल्कुल मस्त है, कहीं कोई गड्ढा तक नहीं है। साइकिल की अधिकतम स्पीड़ 36.5 किलोमीटर प्रति घंटा रिकार्ड़ की गयी।
पाँच किलोमीटर बाद जब तिराहे से ऋषिकेश की तरफ़ मुड़ जाते हैं तो सड़क कुछ ऊबड़-खाबड़ हो जाती है। साइकिल के अगले पहिये को ऐसे में जबरदस्त झटके झेलने पड़ते हैं। इनसे बचने के लिये इसमें शॉकर लगे हैं।

Thursday, November 8, 2012

ऋषिकेश से नीलकंठ साइकिल यात्रा

हम ऋषिकेश में हैं और आज हमें सौ किलोमीटर दूर दुगड्डा जाना है साइकिल से। इसके लिये हमने यमकेश्वर वाला रास्ता चुना है - पहाड़ वाला। दिन भर में सौ किलोमीटर साइकिल चलाना वैसे तो ज्यादा मुश्किल नहीं है, लेकिन पूरा रास्ता पहाड़ी होने के कारण यह काम चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
कुछ दिनों पहले मैंने अपने एक दोस्त करण चौधरी का ज़िक्र किया था, जो एम.बी.बी.एस. डॉक्टर भी है। हमारी जान-पहचान साइकिल के कारण ही हुई। करण ने तब नई साइकिल ली थी गियर वाली। उसने इंडियामाइक वेबसाइट पर पूछा कि दिल्ली से पचास किलोमीटर की रेंज में कौन-सी ऐसी जगह है, जहाँ आसानी से साइकिल से जाया जा सकता है। संयोग से वो प्रश्न मेरे सामने भी आ गया। मैंने बता दिया कि सुल्तानपुर नेशनल पार्क चले जाओ। बस, हो गयी जान-पहचान।

Monday, November 5, 2012

रूपकुण्ड का नक्शा और जानकारी

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रूपकुण्ड का यात्रा वृत्तान्त तो खत्म हो गया है। आज कुछ और सामान्य जानकारी दी जायेगी, जो बाद में जाने वालों के काम आयेगी।
रूपकुण्ड के यात्रा मार्ग में एक बेहद खूबसूरत बुग्याल आता है- बेदिनी बुग्याल। इसका पडोसी आली बुग्याल है। बेदिनी के बाद रूपकुण्ड जाने का एक ही रास्ता है जबकि बेदिनी जाने के दो रास्ते हैं- लोहाजंग से कुलिंग, वान होते हुए और लोहाजंग से कुलिंग, दीदना, आली बुग्याल होते हुए। लोहाजंग से कुलिंग होकर वान तक मोटर योग्य सडक बनी है लेकिन इस पर कोई बस नहीं चलती। बसें लोहाजंग तक ही आती हैं। लोहाजंग से वान जाने के लिये दिन भर में गिनी चुनी जीपें चलती हैं, यात्रियों की अपनी गाडियां भी चलती हैं, नहीं तो पैदल भी जाया जा सकता है- दूरी दस किलोमीटर है।
अब प्रस्तुत हैं इस यात्रा मार्ग के छोटे-छोटे टुकडों की जानकारी:
1. वान से बेदिनी बुग्याल: बेहतरीन पगडण्डी बनी है, हो सकता है कि एक बार किसी से पूछना पडे कि बेदिनी का रास्ता किधर से जाता है। एक बार रास्ता पकड लेंगे तो दोबारा नहीं पूछना पडेगा। वान से शुरूआत में मध्यम स्तर की चढाई है। लगभग तीन किलोमीटर के बाद रास्ता नीचे उतरने लगता है और नीलगंगा के पुल तक उतरता जाता है। वान की ऊंचाई 2460 मीटर है, तीन किलोमीटर के बाद ऊंचाई 2717 मीटर तक पहुंच जाती है, इसके बाद नीलगंगा का पुल 2558 मीटर पर है। नीलगंगा के बाद तीव्र चढाई शुरू होती है। पांच किलोमीटर बाद बेदिनी बुग्याल की सीमा में घुस जाते हैं, बुग्याल शुरू हो जाता है। यहां से कैम्प साइट करीब डेढ किलोमीटर दूर है। बेदिनी बुग्याल की ऊंचाई 3473 मीटर है।
2. लोहाजंग से दीदना: यह लोहाजंग से बेदिनी जाने वाला दूसरा रास्ता है। पहला रास्ता वान से होकर है, जिसका वर्णन ऊपर किया जा चुका है। लोहाजंग से वान रोड पर चार किलोमीटर बाद कुलिंग गांव आता है। कुलिंग से नीलगंगा के दूसरी तरफ दीदना दिखाई पडता है। दीदना जाने के लिये पहले नीचे उतरना पडता है, फिर नीलगंगा पार करके ऊपर चढना होता है। इस रास्ते में जहां कुलिंग से नीलगंगा तक जबरदस्त तेज उतराई है, वहीं नीलगंगा पार करके दीदना तक चढाई भी जबरदस्त है। कुलिंग से दीदना की दूरी करीब चार किलोमीटर है, जिसमें पुल बीच में पडता है। लोहाजंग की ऊंचाई 2350 मीटर, कुलिंग 2310 मीटर, नीलगंगा का पुल 1950 मीटर और दीदना 2433 मीटर पर है।

Saturday, November 3, 2012

रूपकुण्ड यात्रा- आली से लोहाजंग

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आली बुग्याल के बिल्कुल आखिरी सिरे पर है वो छोटा सा पानी का कुण्ड, मुझे बताया गया गया था कि वहां से नीचे उतरने का रास्ता मिलेगा। मैं कुण्ड के पास पहुंचा तो नीचे उतरने का रास्ता दिख गया। लेकिन मैं मुश्किल में पड गया कि रास्ता यही है या अभी कुछ और सीधे चलते जाना है। यहां से दाहिने की तरफ भी रास्ता होने का भ्रम था और सीधे भी।
मुझे पता था कि आगे दीदना गांव तक भयानक जंगल मिलने वाला है। बेदिनी में ही मैंने इसकी पुष्टि कर ली थी। जंगल में अकेले चलते हुए मुझे डर लगता है।
कुछ देर के लिये मैं कुण्ड के पास ही बैठ गया। एक आदमी आता दिखाई पडा। वो महिपत दानू (फोन- 09411528682, 09837439533) था, जो दीदना का रहने वाला है और लोहाजंग में उसकी दुकान भी है। उसने बताया कि दाहिने वाला रास्ता शॉर्टकट है, जो बहुत ढलान वाला है जबकि सीधा जाने वाला रास्ता खच्चरों वाला है। मैंने पूछा कि तुम किस रास्ते से जाओगे, तो बोला कि खच्चरों वाले रास्ते से क्योंकि मुझे इधर आये हुए बहुत दिन हो गये हैं, सुना है कि खच्चरों वाला रास्ता पक्का बन रहा है। देखूंगा कि कितना पक्का बन गया है। और हम शॉर्टकट रास्ते को छोडकर सीधे चल पडे।
जल्दी ही जंगल शुरू हो गया। लेकिन एक तो महिपत के साथ होने से और दूसरे आवाजाही होने से उतना डर नहीं लगा। पूरे रास्ते भर रूपकुण्ड जाने वाले कई ग्रुप मिले।
कुछ देर बाद तोलपानी पहुंच गये। तोलपानी दीदना से पहले दो तीन झौंपडियों वाली जगह है, जहां टैंट लगाने और झौंपडियों में रुकने की सुविधा है। चारों ओर जंगल से घिरी खूबसूरत जगह है तोलपानी- समुद्र तल से 2872 मीटर की ऊंचाई पर।
तोलपानी से कुछ नीचे उतरकर दीदना गांव के ऊपर एक खुली समतल जमीन है जिसे दीदना कैम्पिंग ग्राउण्ड कहा जाता है। दीदना में रात्रि विश्राम करने वाले ज्यादातर ग्रुप यही अपने तम्बू लगाते हैं।
दीदना- समुद्र तल से 2400 मीटर की ऊंचाई पर एक गांव। इसके सामने नीलगंगा के दूसरी तरफ कुलिंग है जहां मुझे जाना है। महिपत चूंकि दीदना का ही रहने वाला था इसलिये अपने घर ले गया। उसने घर को होम स्टे बना रखा है, जहां रूपकुण्ड या बेदिनी जाने वाले लोग रुक सकते हैं और खाना आदि भी खा सकते हैं। जाते ही मुझे चाय मिली जिसके पैसे लेने से उसने इंकार कर दिया। उसने यहीं रुक जाने को भी कहा लेकिन कल सुबह सवेरे लोहाजंग से बस पकडनी जरूरी बताकर मैं चल पडा। चलने से पहले महिपत ने नीचे नीलगंगा तक उतरने और फिर कुलिंग तक चढने का रास्ता समझा दिया।