Sunday, September 30, 2012

सारनाथ

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सात बजे काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस वाराणसी पहुंची। यह दो घण्टे से भी ज्यादा लेट थी। इसके लेट होने का फायदा यह निकला कि हमें जहां पांच बजे ही उठना पडता, अब सात बजे सोकर उठे, ज्यादा नींद ले ली।
स्टेशन के बाहर ही चन्द्रेश भाई इंतजार कर रहे थे। चन्द्रेश वाराणसी से करीब पच्चीस किलोमीटर दूर अपने गांव में रहते हैं। इसके बावजूद भी वे बाइक लेकर सुबह छह बजे से पहले कैंट स्टेशन आ गये। वाराणसी जंक्शन को कैंट भी कहते हैं।
अब हम दोनों चन्द्रेश के अधीन थे। उन्होंने सबसे पहले एक कमरा दिलाया, सामान रखा, नहाये धोये और सारनाथ के लिये निकल पडे। सबसे अच्छी बात थी कि उन्होंने दो बाइकों का इंतजाम कर लिया था। बाइक से सारनाथ गये।
सारनाथ एक बौद्ध तीर्थ स्थल है। बोधगया में जब महात्मा बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हो गया तो उन्होंने पहला उपदेश सारनाथ में दिया था। चूंकि वाराणसी पहले से ही भयंकर हिन्दू तीर्थ रहा है तो जरूर काशी वालों की तथा बुद्ध की भिडन्त हुई होगी। हो सकता है कि बुद्ध काशी ही जा रहे हों और उन्हें नास्तिक घोषित करके काशी के बाहर ही रोक लिया गया हो। देखा जाये तो सारनाथ काशी से बाहर ही है। जिसे ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वो पत्थर की मूर्तियों में भगवान को नहीं ढूंढता, इसलिये काशी वालों ने उन्हें नास्तिक बताया होगा।

Friday, September 28, 2012

बडा इमामबाडा और भूल भुलैया, लखनऊ

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बाराबंकी से जब मैं और अतुल चले तो दिमाग में बडा इमामबाडा था। लखनऊ सिटी स्टेशन पर ट्रेन से उतरे। मोबाइल में नक्शा खोलकर देखा, दूरी करीब डेढ किलोमीटर दिखाई। रास्ता भी इसी ने बता दिया। स्टेशन के सामने हल्का नाश्ता करके मोबाइल के बताये रास्ते पर चल पडे।
तभी संजय भास्कर का फोन आया कि वो लखनऊ पहुंच चुका है। वो हिसार से गोरखधाम एक्सप्रेस के जनरल डिब्बे में बैठकर आया था। इसका कारण उसने बताया कि स्लीपर में सीट नहीं थी। जबकि एक दिन पहले तत्काल कोटे में रिजर्वेशन हो जाता है। बाद में शाम तक वो जब हमारे ही साथ रहा तो हमने पाया कि वो अव्वल दर्जे का कंजूस भी है। अभी तक हम खुद को ही अव्वल दर्जे का कंजूस मानते थे, वो हमारा भी गुरू निकला।
मैंने उससे कहा कि हम बडा इमामबाडा देखने जा रहे हैं, आ जा। बोला कि आता हूं। थोडी देर में फोन आया कि टम्पू वाला डेढ सौ रुपये मांग रहा है। पूछने लगा कि कोई सस्ता साधन बता। डेढ सौ रुपये सुनकर मेरे भी होश उड गये। मैं उसे ट्रेन के बारे में बता सकता था लेकिन मुझे ट्रेन का टाइम मालूम नहीं था। मैंने कहा कि तू और पूछताछ कर, कोई ना कोई बस जरूर मिल जायेगी। पूछता पूछता आ जा, भले ही रास्ते में एक दो जगह बसें बदलनी ही क्यों ना पडे।

Wednesday, September 26, 2012

वर्ष का सर्वश्रेष्ठ घुमक्कड- नीरज जाट

एक दिन सन्दीप भाई घूमते घूमते हमारे यहां आ गये। उनका जब भी कभी लोहे के पुल से जाना होता है, वे अक्सर आ ही जाते हैं। बोले कि इस बार तू परिकल्पना द्वारा आयोजित वर्ष के सर्वश्रेष्ठ घुमक्कड के लिये टॉप तीन में पहुंच गया है। पूरी उम्मीद है कि तू ही सर्वश्रेष्ठ बनेगा।
चलो इसे थोडा विस्तार से बता देता हूं। परिकल्पना एक समूह है जो हिन्दी ब्लॉगिंग को बढावा देने के लिये पुरस्कार वितरण करता है। ज्यादा नहीं मालूम मुझे इसके बारे में लेकिन इसका साथ तस्लीम (TSALIIM- Team for Scientific Awareness on Local Issues in Indian Masses) समूह भी देता है। परिकल्पना समूह के मालिक रविन्द्र प्रभात हैं जबकि तस्लीम के डॉ जाकिर अली रजनीश। बस, अगर कोई और जिज्ञासा है इनके बारे में तो मैं नहीं बता पाऊंगा।
पिछले साल इन्होंने दिल्ली में हिन्दी भवन में पुरस्कार वितरण किया था। काफी सारी श्रेणियों में नामांकन होता है। काफी लोगों को उनके लेखन क्षेत्र के अनुसार पुरस्कृत किया जाता है। पिछले साल ही इन्होंने पुरस्कारों की शुरूआत की थी। मैं और सन्दीप दोनों उसमें भाग लेने पहुंचे थे, हालांकि हमें कुछ नहीं मिला।

Monday, September 24, 2012

भारत परिक्रमा- आखिरी दिन

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21 अगस्त 2012
ट्रेन नई दिल्ली पहुंची। इसी के साथ अपनी भारत परिक्रमा पूरी हो गई।
अब वक्त था विश्लेषण करने का। इस यात्रा में मैंने क्या खोया और क्या हासिल किया, इस बारे में सोचने का।
एक घुमक्कड के पास कुछ भी खोने को नहीं होता। इसलिये जाहिर है कि अपनी तरफ से कुछ भी खोया नहीं गया है, पाया ही है, हासिल ही किया है।
कुछ दोस्तों ने इस यात्रा पर जाने से पहले काफी आलोचना की थी। बेकार का काम बताया था इसे। हालांकि इसमें उतना हासिल नहीं हुआ जितना कि मेरी बाकी यात्राओं में हासिल होता रहा है। पहले एक स्थान पर जाता था और ढेर सारी सामग्री मिलती थे, इसमें ढेर सारे स्थानों पर गया और कम सामग्री मिली है।
मैं पहले से ही पर्यटक और घुमक्कड में फर्क करता आया हूं, आज भी उस मुद्दे को उठाऊंगा। पर्यटक कभी भी घुमक्कड को नहीं समझ पायेगा। ज्यादातर लोग पर्यटक होते हैं, उन्हें घुमक्कड और घुमक्कडी उतने पसन्द नहीं होते, जितना कि पर्यटन। मैं न्यू जलपाईगुडी से होकर निकला, पर्यटकों ने सलाह दी कि दार्जीलिंग और सिक्किम पास ही हैं। डिब्रुगढ गया तो सलाह मिली कि काजीरंगा भी जाना था। इसके अलावा जहां जहां से गुजरा, पर्यटकों ने सलाह देने में कोई कसर नहीं छोडी।

Monday, September 10, 2012

भारत परिक्रमा- तेरहवां दिन- पंजाब व जम्मू-कश्मीर

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20 अगस्त 2012
ट्रेन यानी जन्मभूमि एक्सप्रेस भटिण्डा से निकल चुकी थी, जब मेरी आंख खुली। साढे सात से ज्यादा का समय था और ट्रेन बिल्कुल सही समय पर चल रही थी।
पंजाब से मेरा आना-जाना कई बार हो चुका है और मैं अच्छी तरह जानता हूं कि पंजाब से एक सिरे पर जो भी फसल दिखाई देगी, धुर दूसरे सिरे पर भी वही फसल दिखेगी। पानी की कोई कमी नहीं है इस राज्य में। नहरों का जाल बिछा हुआ है। भारत के किसी दूसरे राज्य के लिये खेती के मामले में पंजाब से टक्कर लेना आसान नहीं है। लेकिन पंजाब के अलावा भारत में एक इलाका और भी है जो उसे टक्कर दे सकता है। वो इलाका है- दोआब। पंजाब के कम्प्टीशन के लिये दोआब। दोआब यानी (राम)गंगा-यमुना के बीच का इलाका यानी मुख्यतया पश्चिमी उत्तर प्रदेश। मैं दोआब का ही रहने वाला हूं और हिन्दुस्तान के कई हिस्सों में घूमने के बाद दोआब से तुलना करके देखता हूं। या फिर अपनी जन्मभूमि होने के कारण दोआब मुझे सर्वश्रेष्ठ लगता है?

Sunday, September 9, 2012

भारत परिक्रमा- बारहवां दिन- गुजरात और राजस्थान

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19 अगस्त 2012
ठीक समय पर ट्रेन चल पडी। यह थी जन्मभूमि एक्सप्रेस (19107) जो अहमदाबाद से ऊधमपुर जाती है। यह गाडी तकरीबन सालभर पहले ही चलना शुरू हुई है। यह एक ऐसी ट्रेन है जो तटीय राज्य से चलकर राजस्थान के धुर मरुस्थलीय इलाके से होती हुई हिमालय की ऊंचाईयों तक जाती है। इसके रास्ते में पंजाब का विशाल उपजाऊ मैदान भी पडता है। वैसे तो अहमदाबाद-जम्मू एक्सप्रेस (19223) भी लगभग इसी रास्ते से चलती है लेकिन वो अर्द्ध मरुस्थलीय रास्ते से निकलकर मात्र जम्मू तक ही जाती है। पहली वाली जोधपुर से जैसलमेर वाली लाइन पर चलकर फलोदी से दिशा परिवर्तन करके लालगढ (बीकानेर) और फिर भटिण्डा के रास्ते जाती है जबकि दूसरी वाली जोधपुर से मेडता रोड, नागौर और बीकानेर के रास्ते भटिण्डा जाती है। दोनों में मुख्य अन्तर बस यही है।
अहमदाबाद से मेहसाना यानी करीब सत्तर किलोमीटर तक डबल गेज की लाइनें हैं यानी मीटर गेज और ब्रॉड गेज की लाइनें साथ साथ बराबर बराबर में। अहमदाबाद से फलोदी होते हुए भटिण्डा एक हजार किलोमीटर से भी ज्यादा है और कुछ साल पहले यह सब मीटर गेज हुआ करता था। अब गुजरात में अहमदाबाद से मेहसाना और उसके आसपास की कुछ लाइनें मीटर गेज की बची हैं। मेहसाना और अहमदाबाद के बीच में मीटर गेज की पांच छह ट्रेनें चलती हैं। मेहसाना से तरंगा हिल के लिये मीटर गेज की डीएमयू भी चलती हैं। मेरी बडी इच्छा है कि मीटर गेज की डीएमयू में यात्रा करूं। बडी लाइन की डीएमयू में कई बार घूम चुका हूं।

Saturday, September 8, 2012

भारत परिक्रमा- ग्यारहवां दिन- गुजरात

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18 अगस्त 2012
सुबह दो बजे सही समय पर ट्रेन राजकोट पहुंच गई। अहमदाबाद से जो बर्थ मेरी थी, राजकोट के बाद यही बर्थ किसी और की हो जायेगी। उसे राजकोट से ही इस ट्रेन में चढना है। कायदा यह बनता है कि राजकोट में ट्रेन रुकते ही उसे मुझे जगा कर डिब्बे से बाहर नहीं तो कम से कम बर्थ से नीचे तो उतार ही देना था। लेकिन मेरी बर्थ का उत्तराधिकारी नहीं आया और मैं सोता रह गया। अच्छा था कि अलार्म लगा लिया था, आंख खुल गई नहीं तो सोमनाथ महाराज ने बुलाने में कसर नहीं छोडी थी। यह सोमनाथ एक्सप्रेस थी जो वेरावल जाती है। वेरावल से चन्द किलोमीटर आगे ही सोमनाथ है। सुबह सात बजे ओखा पैसेंजर की बजाय सोमनाथ के दरबार में बैठा मिलता या नींद से झूलता मिलता।
सोमनाथ बाबा किसी को आमन्त्रित करने में बडा उस्ताद है। अपनी इसी आदत के चक्कर में हजार साल पहले गलत लोगों को आमन्त्रित कर बैठा और सत्रह बार लुटा। वाह जी वाह सोमनाथ!

Friday, September 7, 2012

भारत परिक्रमा- दसवां दिन- बोरीवली नेशनल पार्क

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17 अगस्त 2012
आज का दिन बहुत खराब रहा। बल्कि खराबी रात से ही आनी शुरू हो गई। पता नहीं क्या हुआ कि दाहिने हाथ के कन्धे में बडा तेज दर्द होने लगा। मंगलौर से चला था तो कम था लेकिन मडगांव से निकला तो बढ गया। लेटने की ज्यादातर अवस्थाओं में यह असहनीय हो जाता। मात्र एक अवस्था में दर्द नहीं होता था- बिल्कुल सीधे लेटकर दाहिना हाथ पेट पर रखकर सोने पर।
लेकिन मेरे लिये पेट पर हाथ रखकर सोने से अच्छा है कि ना ही सोऊं। क्योंकि पेट पर हाथ रखकर सोने से मुझे बडे भयंकर डरावने सपने आते हैं। मुझे याद है, होश संभालने से अब तक, जब भी मुझे डरावने सपने आते हैं, इसका मतलब पेट पर हाथ ही होता है। मैं भूलकर भी इस अवस्था में नहीं सोता हूं, लेकिन कभी कभी नींद में ऐसा हो जाता है। पसीने से लथपथ हो जाता हूं और आंख खुल जाती है। आज भी ऐसा ही हो रहा था। नींद आती और गडबड शुरू, पसीना और नींद गायब। पेट से हाथ हटाते ही असहनीय दर्द। फिर से वही हाथ रखना पडता। और यह चक्र मुम्बई आने तक चलता रहा। इस दौरान कई बार कभी मुझपर तो कभी घर-परिवार पर भयंकर आपदा टूटती दिखाई पडीं। हालांकि मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करता लेकिन कुछ तो मामला है कि पेट या छाती पर हाथ रखकर सोने से डरावने सपने आते हैं।

Thursday, September 6, 2012

भारत परिक्रमा- नौवां दिन- केरल व कर्नाटक

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16 अगस्त 2012
चार बजे अपने आप आंख खुल गई। यह शोरानूर जंक्शन था। यहां से चार लाइनें निकलती हैं- कोयम्बटूर के लिये, त्रिवेन्द्रम के लिये, मंगलौर के लिये और चौथी नीलाम्बर रोड के लिये। अपनी ट्रेन मंगलौर की तरफ चल पडी। अपन दोबारा पसर गये।
अब आंख खुली बडागारा पहुंचकर। यह कोई लम्बी-चौडी ठाठ वाली ट्रेन नहीं है, नाम तो एक्सप्रेस का है लेकिन हर दस पन्द्रह मिनट में, बीस पच्चीस किलोमीटर पर रुकती जरूर है। ट्रेन सही समय पर चलनी चाहिये, चाहे हर जगह रुकती हुई चले।
अगला स्टेशन माहे है। मैं अपने साथ अपनी यात्रा में काम आने वाली हर ट्रेनों के ठहरावों की लिस्ट लेकर निकला हूं जिससे पता चल जाता है कि अब गाडी कहां रुकेगी। इसलिये पता चल गया कि अब माहे में रुकेगी।
माहे पुदुचेरी में है। हां जी, सही कह रहा हूं कि माहे पुदुचेरी में है, पांडिचेरी में है। सोचिये मत कि पुदुचेरी तो चेन्नई के पास है, पूर्वी समुद्र से मिला हुआ है, यहां पश्चिमी समुद्र के किनारे पुदुचेरी कहां से आ गया। इस बारे में कुछ भी सोचना मना है। जो कह दिया सो कह दिया। बोल दिया कि माहे पुदुचेरी में है तो है। असल में पुदुचेरी में चार जिले हैं- पुदुचेरी, कराईकल, माहे और यानम। शुरू वाले दोनों जिलों की सीमा तमिलनाडु से मिलती है, माहे की केरल से और यानम की आन्ध्र प्रदेश से। पुदुचेरी पर फ्रांस का शासन रहा है, अंग्रेजों से भारत आजाद हो गया लेकिन पुदुचेरी आजाद नहीं हुआ। बाद में जब फ्रांसीसी भी चले गये तो उनकी चार अलग-अलग स्थानों पर बसी बस्तियों को उनके नजदीकी राज्य में नहीं मिलाया गया बल्कि फ्रांसीसी शासन की याद जिन्दा रखने के लिये सभी को पांडिचेरी नाम दे दिया गया जो बाद में पुदुचेरी हो गया और अब ये केन्द्र शासित प्रदेश हैं।

Wednesday, September 5, 2012

भारत परिक्रमा- आठवां दिन- कन्याकुमारी

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15 अगस्त 2012
आज स्वतन्त्रता दिवस है। असोम से मेरे जो साथी तीन दिनों से साथ आ रहे थे, वे कल देर रात तक धीरे धीरे छोडकर चले गये। उनकी जगह और लोग आ गये, जिनकी यात्रा मात्र एक रात की ही होगी। कुछ सेलम से आये, कुछ ईरोड से, कुछ कोयम्बटूर से।
मेरी आंख खुली सुबह साढे छह बजे के आसपास। ट्रेन त्रिवेन्द्रम पहुंचने वाली थी। बाहर बारिश हो रही थी। सभी खिडकियां बन्द थीं। पंखे भी बन्द थे। नीचे वाली सवारियों को ठण्ड लगने लगी थी, इसलिये उन्होंने पंखे बन्द कर दिये थे।
केरल पश्चिमी घाट की पहाडियों के बीच बसा हुआ है। पश्चिमी घाट की पहाडियां मानसून में खूब बारिश के लिये मशहूर हैं। मेरी अभी तक की तटीय यात्रा पूर्वी घाट के साथ साथ हुई है। कहीं भी बारिश नहीं मिली। बल्कि कल तो आन्ध्र प्रदेश में इतनी गर्मी थी कि गर्म हवा लग रही थी। अब यात्रा पश्चिमी तट के साथ साथ होगी। कन्याकुमारी से मुम्बई और उससे भी आगे वडोदरा तक खूब बारिश का सामना करना पडेगा, ऐसा मेरा अन्दाजा है।

Tuesday, September 4, 2012

भारत परिक्रमा- सातवां दिन- आन्ध्र प्रदेश व तमिलनाडु

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14 अगस्त 2012
कल बुखार हो जाने के कारण कमजोरी आ गई थी, लेकिन अब बुखार ठीक था। विजयवाडा स्टेशन पर मैं नीचे उतरा। बराबर वाले प्लेटफार्म पर दक्षिण लिंक एक्सप्रेस खडी थी, जो विशाखापटनम से निजामुद्दीन जाती है। काजीपेट जाकर यह हैदराबाद- निजामुद्दीन दक्षिण एक्सप्रेस से जा मिलती है यानी विशाखापटनम से काजीपेट तक यह लिंक के तौर पर चलती है।
गाडी चल पडी तो थोडी देर खिडकी वाली सीट पर बैठ गया। धूप निकली थी व लू जैसा एहसास भी हो रहा था। फिर भी कमजोरी के कारण नीचे मन नहीं लगा, वापस अपनी ऊपर वाली बर्थ पर चला गया। पडा रहा लेकिन नींद भी नहीं आई।
पूर्वोत्तर वालों ने व दक्षिण वाले फौजी ने ताश खेलने शुरू कर दिये। उनकी बातचीत हिन्दी में हो रही थी लेकिन मेरे पल्ले ना तो पूर्वोत्तरी हिन्दी पडी, ना दक्षिणी हिन्दी। इन लोगों का भी अधिकतम कोयम्बटूर तक का साथ है।

Monday, September 3, 2012

भारत परिक्रमा- छठा दिन- पश्चिमी बंगाल व ओडिशा

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13 अगस्त 2012
आंख खुली अण्डाल पहुंचकर। वैसे तो ट्रेन का यहां ठहराव नहीं है लेकिन दुर्गापुर जाने के लिये ट्रेन यहां सिग्नल का इंतजार कर रही थी। आसनसोल से जब हावडा की तरफ चलेंगे तो पहले अण्डाल आयेगा, फिर दुर्गापुर। ट्रेन रामपुर हाट के रास्ते आई है। मुझे समझ नहीं आ रहा कि रामपुर हाट से गाडी सीधे आसनसोल जा सकती थी, फिर क्यों पचास किलोमीटर का फालतू चक्कर लगाकर दुर्गापुर में भी ठहराव दिया गया? रामपुर हाट से गाडी पहले अण्डाल आती है, फिर हावडा की तरफ चलकर दुर्गापुर जाती है, दुर्गापुर में इसका डीजल इंजन हटाकर इलेक्ट्रिक इंजन लगाया जाता है, फिर गाडी विपरीत दिशा में चलती है, अण्डाल होते हुए आसनसोल पहुंचती है। अगर मात्र इंजन बदलने के लिये गाडी को दुर्गापुर ले जाया जाता है तो यह काम तो आसनसोल में भी हो सकता है। नहीं तो रामपुर हाट में भी हो सकता है।
दुर्गापुर में अपने एक मित्र को मिलना था लेकिन वे नहीं आये।